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Thursday, October 11, 2012

संतों, महापुरूषों का नाम जपना और पराया माल अपना!

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संतों, महापुरूषों का नाम जपना और पराया माल अपना!

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तो बहुसंख्यक समुदायों दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक, आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेता,अस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं? उनकी क्या भूमिका है? संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं? विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं , वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैं? उत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों, मजदूरों, महिलाओं, छात्रों, आदिवासियों, युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैं?
-पलाश विश्वास||

हम एक अनंत अंधेरी सुरंग में फंसे हुए हैं और बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। विडंबना यह है कि हम, निनानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता ब्लैक होल में जीने के आदी हो गये हैं।अंधेरा हमारी आंखों में किरचों के मानिंद बिंधता नहीं है।इस अंधेरे में हम कार्निवाल मना रहे हैं।अंधेरे को खत्म करना हमारे ख्वाब का सबब नहीं है और न हम अंधेरे को अंधेरा मानने को तैयार हैं।जाहिर है, हाथ पांव हिलाने की जरुरत बी महसूस नहीं होती। ममता बनर्जी ने रसोई गैस में सब्सिडी खत्म करने के खिलाफ समर्थन वापस लिया केंद्र सरकार से , पर बंगाल के पूजा बाजार में अंधाधुंध खरीददारी, शापिंग माल में उमड़ती भीड़ और महीनों से तैयार किया जा रहा पूजा परिवेश में लगता नहीं कि कहीं रसोई में आग लगी है।

मध्य और निम्न मध्य वर्ग के लोग रोजाना हजारों फूंकने के लिए बाजार में गुत्थमगुत्था है। दूसरी ओर, मान्यवर कांशीराम की राख में बची खुची चिनगारी से आग पैदा करने की मायावती की चुनावी कवायद का हश्र यह कि ऐन मौके पर सुप्रीम कोर्ट से आय से बाहर की संपत्ति पर जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी होते न होते आर्थिक नीतियों पर भारी गर्जन तर्जन के बाद फिरउसी कारपोरेट सरकार को समर्थन जारी रखने का फैसला। खोदा पहाड़, निकली चूहिया! बहिष्कृतो और बहुजनों का नेतृत्व करेने वाले तमाम दलित, पिछड़ा, आदिवासी, अल्पसंख्यक, द्रविड़ नेताओं की जान तोते में है। तोते की गरदन पर दबाव पड़ते न पड़ते ये सारे लोग सुर ताल में नाचने गाने लगते हैं। मायावती ने एक बार फिर यूपीए सरकार को समर्थन बनाए रखने या वापस लेने के फैसले को कुछ दिनों के लिए टाल दिया है। उन्होंने कल ही अपनी रैली में कहा था कि यूपीए सरकार को समर्थन देने के मुद्दे पर वे आज फैसला लेगी। लेकिन उन्होंने उधर रैली में यूपीए सरकार को समर्थन देने पर पुनर्विचार का ऐलान किया और इधर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और मायावती को नोटिस जारी कर दिया।

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने केंद्र की संयुक्‍त प्रगतिशील सरकार से समर्थन वापसी का फैसला फिलहाल टाल दिया है। मायावती ने कहा है कि डीजल की बढ़ी कीमतों और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) जैसे फैसले पर विरोध के बावजूद वह केंद्र सरकार से समर्थन वापस नहीं लेंगी।लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद मायावती ने यूपीए सरकार का आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। इसके बाद भी समर्थन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि फिलहाल वह यथास्थिति ही चाहती हैं। समर्थन वापसी का फैसला उचित समय पर किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच के लिए सीबीआई स्वतंत्र है।उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले की जांच से केन्द्रीय जांच ब्यूरो को रोका नहीं गया है।

इससे पहले बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन करके साबित किया है कि वह विधानसभा चुनाव भले ही हार गई हों, पर बीएसपी का जनाधार अभी भी कायम है। वहीं दूसरी ओर यह भी जता दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में वह नए 'जातीय समीकरणों' का इस्तेमाल करेंगी। संकल्प रैली में भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने माया के विरोधियों को करारा जवाब दे दिया है।  रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने केंद्र और राज्य की अखिलेश सरकार पर हमला बोला। कांशीराम की पुण्यतिथि पर घोषित अवकाश को रद्द किए जाने के एसपी सरकार के फैसले पर माया ने राज्य सरकार को घेरा तो इसे राष्ट्रीय शोक न मनाने के फैसले पर केंद्र पर भी हमला किया। माया ने दोनों दलों को दलित विरोधी बताया।
यूपी विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी रैली को संबोधित करते हुए माया ने कहा कि वर्तमान एसपी सरकार शहर और योजनाओं के नाम बदल रही है। इन्हें बाबा साहब अंबेडकर और अन्य दलित नेताओं के नामों पर रखा गया था और एसपी शासन में कुल 24 मूर्तियां तोड़ी गईं हैं। यही नहीं मेरी मूर्ति को भी तोड़ा गया। दलित राजनीति करने वाली माया ने इस बार भी इसी ओर अपने भाषण का रुख मोड़ते हुए नौकरियों में आरक्षण के बिल की बात कही। माया ने कहा कि यह बिल अभी तक संसद में अटका है।प्रदेश में 6 महीने पहले ही जीतकर आई समाजवादी पार्टी की सरकार पर हमला करते हुए पूर्व सीएम मायावती ने कहा इस सरकार को यादवों को छोड़ न तो ओबीसी की फिक्र है न मुस्लिमों की। एसपी पर चुनावी वादे पूरे न करने का आरोप लगाते हुए माया ने कहा कि इस राज में यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है।

इस रैली और यूपी के बदले माहौल को देखते हुए लग रहा है कि अब वह अपनी रणनीति बदल रही हैं। अब तक सर्वसमाज की बात करने वाली मायावती अब 'दलित-मुस्लिम' समीकरण पर ध्यान दे रही हैं। जिन अगड़ों के सहारे वे 2007 में यूपी की सत्ता पर काबिज हुई थीं, वे अब उनकी प्राथमिकता में नहीं है। संकल्प रैली स्थल पर किसी वर्ग विशेष को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। राजनैतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि मायावती अब अपना ध्यान मुसलमानों पर केंद्रित कर रही हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि उनकी सत्ता मुसलमानों की वजह से ही गई है। इसलिए अब उनका पूरा ध्यान दलितों के साथ-साथ मुसलमानों पर है। रैली में माया दलित अत्याचार पर तो अपने स्वभाव के अनुकूल बोलीं लेकिन उन्होंने प्रदेश की सत्ता में भागीदारी मुसलमानों के साथ पक्षपात की भी बात कही। उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का सवाल भी उठाया।

माना जा रहा है कि माया अब दलित मुस्लिम गठजोड़ को फिर से ताकत देने का काम करेंगी। दलित अत्याचार के साथ-साथ मुसलमानों के साथ 'धोखा' उनका अहम मुद्दा होने वाला है। माया को यह अच्छी तरह मालूम है कि सपा के मुस्लिम नेताओं में आपसी खींचतान चल रही है। हवा के साथ बहे मुस्लिम मतदाताओं को बीएसपी के साथ वापस जोड़ने में ये नेता ही अहम भूमिका निभाएंगे। एसपी द्वारा मुसलमानों के साथ किए गए वायदे उनका मुख्य मुद्दा होंगे। जहां तक आम मुसलमानों का सवाल है कम से कम कानून व्यवस्था के मामले में वे मायावती सरकार को अब याद कर रहे हैं।

कांग्रेस और संघपरिवार अल्पसंख्यक बाजार वर्चस्व वाले तबके के हितों के मद्देनजर राजनीति के जरिये हिंदू राष्ट्रवाद के तहत मनुस्मृति की व्यवस्था कायम करके कारपोरेट साम्राज्यवादी यहूदी हिंदू गठजोड़ की विश्वव्यवस्था के मुताबिक अर्थ व्यवस्था को खुला बाजार में तब्दील करके बहुसंख्यक जनता को जल जंगल जमीन आजीविका रोजगार और उत्पादन के साधनों से वंचित करने में लगी हैं।नागरिकता और मानवाधिकार निलंबित है। राष्ट्र का सैन्यीकरण हो रहा है तो अंतरिक्ष का भी।समता और न्याय की बलि चढ़ा दी गयी है। रोज संसदीय व्यवस्था को धता बताते हुए, संविधान की हत्या करते हुए एक के बाद एक फैसले लागू किये जा रहे हैं कारपोरेट नीति निर्धारण के जरिये। वाशिंगटन और तेल अबीब के निर्देशन में। ज्यादातर हिमालयी क्षेत्र और पूरे मध्यभारत में सशस्त्र बल विशेष सैन्य कानून लागू है या फिर तरह तरह के सैन्य अभियानों या सलवा जुड़ुम जैसे सरकारी कार्यक्रम के तहत इस कानून के प्रवधान लागू हैं।जिन लोगों पर शासन किया जा रहा है उन पर नियंत्रण रखने के लिए सूचना एकत्रित करना किसी भी शासक सत्ता का मूलभूत सिद्धांत है। जिस समय भूमि अधिग्रहण और नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध भारत में बढ़ता जा रहा है, तब मध्य भारत में खुल्लमखुल्ला जंग की छाया में, सरकार ने नियंत्रण तकनीक के तौर पर एक विशाल बायोमेट्रिक कार्यक्रम का प्रारंभ किया, यूनिक आइडेंटीफिकेशन नंबर (विशिष्ट पहचान संख्या या यूआइडी) जो शायद दुनिया का सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और बड़ी लागत की सूचना एकत्रीकरण परियोजना है। लोगों के पास पीने का साफ पानी, या शौचालय, या खाना, या पैसा नहीं है मगर उनके पास चुनाव कार्ड या यूआइडी नंबर होंगे। क्या यह संयोग है कि इनफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलकेणी द्वारा चलाया जा रहा यूआइडी प्रोजेक्ट, जिसका प्रकट उद्देश्य 'गरीबों को सेवाएं उपलब्ध करवाना' है, आइटी उद्योग में बहुत ज्यादा पैसा लगाएगा जो आजकल कुछ परेशानी में है? (यूआइडी बजट का मोटा अंदाज भी भारत सरकार के वार्षिक शिक्षा खर्च से ज्यादा है। ) इतनी ज्यादा तादाद में नाजायज और "पहचान रहित" – लोग जो झुग्गियों में रहने वाले हैं, खोमचे वाले हैं, ऐसे आदिवासी हैं जिनके पास भूमि के पट्टे नहीं- जनसंख्या वाले देश को 'डिजीटलाइज' करने का असर यह होगा कि उनका अपराधीकरण हो जायेगा, वे नाजायज से अवैध हो जायेंगे। योजना यह है कि एन्क्लोजर ऑफ कॉमंस का डिजिटल संस्करण तैयार किया जाए और लगातार सख्त होते जा रहे पुलिस राज्य के हाथों में अपार अधिकार सौंप दिए जाएं। तो बहुसंख्यक समुदायों दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक, आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेता,अस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं? उनकी क्या भूमिका है? संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं? विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं , वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैं?उत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों, मजदूरों, महिलाओं, छात्रों, आदिवासियों, युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैं?अमेरिका में हो रहे ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन के विपरीत हजारे आंदोलन ने निजीकरण, कॉर्पोरेट ताकत और आर्थिक 'सुधारों' के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। उसके विपरीत इसके प्रमुख मीडिया समर्थकों ने बड़े-बड़े कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार घोटालों (जिनमें नामी पत्रकारों का भी पर्दाफाश हुआ था) से जनता का ध्यान सफलतापूर्वक हटा दिया और राजनीतिकों की जन-आलोचना का इस्तेमाल सरकार के विवेकाधीन अधिकारों में और कमी लाने एवं और अधिक निजीकरण की मांग करने के लिए इस्तेमाल किया। (2008 में अण्णा हजारे ने विश्व बैंक से उत्कृष्ट जन सेवा का पुरस्कार लिया। ) विश्व बैंक ने वाशिंगटन से एक वक्तव्य जारी किया कि यह आंदोलन उसकी नीतियों से पूरी तरह 'मेल खाता' है।

हालत कितनी विकराल है कल जब पूरे देश में हिंदी और अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के टीवी चैनल लखनऊ में बहुजनों की मेगा रैली की लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे, तो बंगाल के तमाम टीवी चैनल ने स्क्रालिंग तक में इसका उल्लेख नहीं किया। आज के अखबारों में भी इसकी सूचना नहीं है। लेकिन बंगाल में ब्राह्मणवादी व्यवस्था तो आजादी के बाद ही लागू हुई। ग्यरहवीं सदी तक यहा बौद्धकाल रहा। फिर अठारवीं सदी तक मुसलमानों का शासन। अठारवीं सदी तक महाराष्ट्र और केरल तमिलनाडु से लेकर चटगांव और मणिपुर तक रियासतों में मूल निवासी राज कर रहे थे।बंगाल में वर्ण व्यवस्था कभी लागू नहीं रही। आज भी बंगाल में न क्षत्रिय हैं और न राजपूत। आजादी से पहले तीनें अंतरिम सरकार मुसलमान और दलित मिलकर चला रहे थे। आज हालत यह है कि चंडाल आंदोलन के जरिए अस्पृश्यता मोचन का आगाज करने वाले , नील विद्रोह के जरिए किसान आंदलन की अगुवाई करनेवाला, अंबेडकर को संविधान सभा में भेजनेवाला मतुआ आंदोलन की सिरमौर ममता बनर्जी
है। इसी तरह तमिलनाडु में पेरियार नारायण गुरू के आंदोलन के नेतृत्व में अयंगर ब्राह्मण जयललिता हैं।तमिलनाडु, बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जो पंजाब जो बहुजन आंदोलन के आधार रहे हैं , खत्म हैं। वहां सर्वत्र अति अल्प संख्यक तबका जीवन के हर क्षेत्र में काबिज हैं और वे बहुजनों का नेतृत्व जिहादी तेवर के साथ करके मुक्ति और मोक्ष का तिलस्मी किला बनाये हुए हैं।

वामपंथियों की व्राह्मणवादी विचारधारा और संगठन में वर्चस्ववादी रवैये पर हम खूब बोल लिख चुके हैं। पर अंबेडकर, फूले, कांशीराम विचारधारा का कारोबार कर रहे लोगों की आपराधिक गतिविधियों पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। जहां एक ही रणनीति है, संतों महापुरूषों का नाम जपना, पराया माल अपना! विचारधारा के नाम पर गाली गलौज और घृणा अभियान!और कैडर के नाम पर मूर्खों और गुंडों की वाहिनी बनाकर अफसरों, डाक्टरों, इंजीनियरों और वंचितों में मालदार तबके से नियमित एकतरफा वसूली। जिसका कोई हिसाब किताब किसी को देना नहीं होता।निनानब्वे फीसद जनता की पहचान और अस्मिता के नाम पर अगुवाई करने वाले लोगों का मिशन अगर बहुजनों की आजादी का मिशन होता तो कहीं किसी बिंदू पर उनमें भी वहीं एका होता , जो सत्तावर्ग की तमाम पार्टियों संघ परिवार, कांग्रेस और वामपंथी दलों में है। हर फैसले , हर जनविरोधी कार्रवाई, जनता के खिलाफ युद्ध में उनमें गजब का समन्वय है। पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंखय्कों, आदिवासियों के नेताओं में कोई सहमति और समन्वय की कल्पना तक नहीं की जा सकती। न मायावती और मुलायम , और न ही लालू, पासवान और नीतीश किसी एक एजंडा के लिए काम कर सकते हैं।

कांशीराम के बामसेफ के हजार टकड़े हो गए। हर टुकड़ा असली, मूलनिवासी संगठन।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी भी हजार धड़ों में बंटाधार। अठावले चाहे तो मुंबई ठप कर दें। पर उनका गठजोड़ हिंदू राष्ट्रवाद के धारक वाहक बाल ठाकरे परिवार से है। अठावले शिवशक्ति भीमशक्ति के गठजोड़ से जाति उन्मूलन और बाबा साहेब के आर्थिक सशक्तीकरण,जाति उन्मूलन और सामाजिक न्याय के कार्यक्रम को अंजाम दे रहे हैं।

मुलायम के मुकाबले मोर्चे में जमा हुआ है मायावती का सर्वजन समाज। मायावती और मुलायम न दलितों, न पिछड़ों, न बहुजनों और न सर्वजन समाज, न देश की तमाम बहिष्कृत जनता और न देश के हित में कोई फैसला करते हैं। केंद्र को समर्थन हो या आर्थिक नीतियों को विरोध वे दरअसल एक दूसरे के खिलाफ सत्ता की लड़ाई के मद्देनजर फैसला
करते हैं। और बहिष्कृत जनता को उम्मीद है कि ये लोग समता और सामाजिक न्याय का राजमार्ग तैयार करेंगे।

गांधी नेहरु परिवार के वंशवाद के खिलाफ देश में विरोध की राजनीति चलती है। पर विरोध की राजनीति में वंसवाद का क्या कहिये। उत्तर दश्क्षिम पूर्व पश्चिम चारों दिशाओं में क्षत्रपों के संगठन और दलों में वंसावाद परिवारवाद हावी है। विधवा और पुत्र उत्तराधिकारी, यह तो शुरू से चलन रहा है। अब सत्ता में भागेदीरी के जरिये पूरे कुनबे को खपाने का काम हो रहा है। बहिष्कृत समुदायों का नेतृत्व न सिर्फ तानाशाह है, बल्कि वे वंशवाद और कुनबाबाद के निकृष्ट उदाहरण है। मजबूत जातियां ब्राह्ममों की स्थानापन्न हो रही हैं और कमजोर जातियों का सत्यानाश हो रहा है। आरक्षण पर भी जाति वर्चस्व हावी है। बहुत सी अछूत, आदिवासी और शरणार्थी जातियों को आरक्षण सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि आरक्षण पर काबिज मलाईदार तबका उन्हें सामाजिक न्याय का हकदार नहीं मानतीं।

इन संगठनों और दलों का एकमात्र मिशन है फंडिंग। ये आंदोलन वगैरह दिखावे के लिए करते हैं।आदिवासियों, शरमार्थियों, बस्तीवालों और बंजारों में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती। उनमें भी नहीं जो नकद भुगतान न कर सकें। मजे की बात है कि ऐसे संगठनों और दलों की सारी चल अचल संपत्ति व्यक्तिगत खाते में हैं। नेतृत्व बदल नहीं सकता, क्योंकि संपत्ति से बेदखल होने का खतरा है। लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं है, सवाल पूछने का अधिकार नहीं है और यहां तक भी साथ बैठने तक का भी हक नहीं है। अब तो ब्राह्मण और सवर्ण जातियां तक बहुजनों के साथ ऐसी अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं करती, जैसा कि इनके नेता और मसीहा करते हैं। कार्यकर्ताओं के लिए दाल भात और सूखी रोटी। नेताओं  और उनके परिजनों के लिए पांच सितारा जीवन, जेवरात और विदेश यात्राएं। कोई समझदार, जानकार, प्रतिबद्ध आदमी मिशन के झांसे में इनके यहां पहुंच भी गया तो उन्हें बदनाम करके अलग करने में देरी नहीं लगती। बदनामी के लिए बिना सबूत कोई भी आरोप काफी है। इतना भी काफी है कि फलां अमूक दल या ग्रुप के लिए काम कर रहा है या अमूक असल में ब्राह्मण हैं। हमारे लोग इतने बुरबक हैं, कि बहुत जल्दी बहकावे में आ जाते हैं। कोई तहकीकात नहीं होती।

नतीजतन इन संगठनों और दलों में सामूहिक नेतृत्व तो दूर, द्विती तृतीय श्रेनी का नेतृत्व भी नहीं है। प्रादेशिक, जिला या पंचायत स्तर तक का फैसला तानाशाह करता है। चुनाव होते नहीं हैं। हों तो नेतृत्व खतरे में पड़ जाये, मनोनयन से काम चल जाता है। इनके यहां इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, समाज के अध्येता के लिए कोई जगह नहीं है। ये समाज को अपढ़ और अज्ञानी बनाये रखते हुए दुश्मनों के खिलाफ छायायुद्ध करके घृणा अभियान के जरिये अकूत संपत्ति जमा करने और भोगने का मिशन  चला रहे हैं।

कल और आज मायावती के कथनी करनी का रहस्य यही है। जो बाकी लोगों की कथनी और करनी से किसी मायने में अलग नहीं है।

राम पुनियानी आईआईटी में २००४ तक प्राध्यापक थे। वे विश्वविख्यात चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी यह पुस्तक भारत की असली तस्वीर पेश करती है। अंबेडकर के बारे में उनके अनुयायियों और विरोधियों में अनेक भ्रांतियां है। अंबेडकर की पूजा हो रही है मनुस्मति व्यव्स्था बनाये रखने के लिए और कारपोरेट साम्राज्यवाद, जिओनिज्म व ग्लोबल ब्राहमणवादी वर्चस्व बनाये रखने के लिए, जबकि उनकी विचारधारा और जाति उन्मूलन, सामाजिक आर्थिक न्याय के कार्यक्रम, जो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत के लिए सबसे जरूरी हैं, को कचरा पेटी में डाला जा रहा है। हिंदुत्व के झांसे में फंस गये हैं खुला बाजार की व्यवस्था में जीते मरते दलित आदिवासी पिछड़े मूलनिवासी बहुजन।इस दुश्चक्र को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पाठ्य है, जिसके आधार पर प्रतिरोध की जमीन बन सकती है।

बाबा साहेब आम्बेड़कर की जयंती हर साल धूम धाम से मनाई जाती है। प्रश्न यह है कि जिन मूल्यों के लिए डॉ. आम्बेड़कर ने जीवन भर संघर्ष किया, वे मूल्य अब कहॉं हैं? प्रश्न यह है कि उन दलितों की – जिनकी बेहतरी के लिए डॉ. आम्बेड़कर ने अपना जीवन होम कर दिया – आज क्या स्थिति है?

दलितों और समाज के अन्य दबे-कुचले वर्गों के अतिरिक्त, इस देश के क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के लिए डॉ. आम्बेड़कर आज भी एक महानायक हैं। जो राजनैतिक दल, सामाजिक न्याय के विरोधी हैं, वे तक डॉ. आम्बेड़कर के विरुद्ध एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते।

बाबा साहेब, सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे जमींदारों की आर्थिक गुलामी और ऊँची जातियों की सामाजिक गुलामी से दलितों की मुक्ति के भी अक्षय प्रतीक हैं। पी.एच.डी. और डी.एस.सी. होते हुए भी उन्हें अपने कार्यस्थल पर अपमान सहना पड़ा। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि राजनैतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन रहेगी जब तक उसके साथ-साथ सामाजिक बदलाव नहीं होता, जब तक शूद्रों और महिलाओं को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलती। राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम किया।

आम्बेड़कर ने स्वाधीनता आंदोलन के लक्ष्यों में सामाजिक परिवर्तन को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे चमत्वृळत कर देने वाली मेधा के धनी थे और उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य, दलितों की बेहतरी था। वे निरंतर हमारे देश की जाति प्रथा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे। उन्होंने इस देश में राजनैतिक व सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को गति दी। यह अकारण ही नहीं था कि वे कमजोर वर्गों के संघर्ष के प्रतीक और अगुवा थे। और यही कारण है कि देश के सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उनकी भूमिका को नकारने या कम करके प्रस्तुत करने की कोशिशें हो रही हैं। चूंकि उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है। इसलिए प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया जाये और फिर उनके प्रिय सिद्धांतों और आदर्शों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जावे। उनके योगदान के महत्व को घटा कर प्रस्तुत करने के भी योजनाबद्ध प्रयास हो रहे हैं।

मायावती के फैसले से कांग्रेस ने निश्‍चित रूप से राहत की सांस ली होगी। हालांकि कांग्रेस के रणनीतिकारों को भरोसा था कि फिलहाल मायावती समर्थन वापसी जैसा फैसला नहीं लेंगी। कल की रैली में उन्होंने एफडीआई के फैसले का जमकर विरोध किया था, जिससे कांग्रेस के अंदरखाने में चिंता थी लेकिन पार्टी के प्रबंधक इसे राजनीतिक मजबूरी भर मान रहे थे। उनका कहना था कि माया यूपीए सरकार को जितना भी कोसें, वह अपना समर्थन जारी रखेंगी।

इससे पहले समाजवादी पार्टी के खिलाफ खुलकर गुस्से का इजहार करते हुए, रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने कहा कि यह सरकार काम कम और ढिंढोरा खूब पीट रही है। मुलायम और उनके परिवार पर हमला करते हुए माया ने कहा कि अगर आरक्षण न होता तो यह पूरा परिवार भैंस चराता।एसपी सरकार पर हमेशा से जुर्म को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। पूर्व सीएम माया ने कहा कि इस सरकार को गुंडे चला रहे हैं जिससे महिलाएं बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा बसपा रैली में सपा पर लगाए गए आरोपों पर आजमगढ़ में कन्‍या विद्याधन और बेरोजगारी भत्‍ता बांटने गए मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी सजा चुनाव में हार होती है और यह सजा यूपी की जनता ने बसपा को दे दी है।

मायावती जिन दलित महापुरुषों के अपमान की बात कर रही हैं और वह जरा सा भी उन महापुरुषों को मानतीं तो प्रदेश में भीमराव अम्‍बेडकर और दूसरे महापुरुषों के नाम पर बनाए गए पार्कों में अरबों रुपयों की लूट नहीं करतीं। दरअसल मायावती ने रैली में कहा कि अगर अम्‍बेडकर नहीं होते तो मुलायम और अखिलेश भैंस चरा रहे होते।

सीएम ने कहा कि समाजवादी पार्टी अपने वायदों पर खरी उतरती है, इसी लिए सिर्फ 6 महीने में कन्‍या विद्याधन, बेरोजगारी भत्‍ता बंटने लगा है। मायावती को यह जानकार तकलीफ हो रही है। उन्‍होंने कहा कि सपा सरकार सिर्फ बेरोजगारी भत्‍ता ही नहीं रोजगार दिलाने की भी कोशिश में है। तभी तो प्रदेश में नए उद्योग लगाने के लिए नई उद्योग नीति बनाई जा रही है। इससे लाखों युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद है।

माया ने अपने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि हमारे शासन में राज्य की कानून व्यवस्था दुरुस्त थी लेकिन वर्तमान सरकार के 6 महीने के कार्यकाल में ही एक दर्जन दंगे हो गए। राज्य सरकार पर दलित विरोधी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि कुल अपराधों में से सिर्फ 20 फीसदी की ही एफआईआर दर्ज की गई हैं। पूर्व सीएम ने कहा कि यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है और एसपी शासन में गुंडों को प्रमोशन दिया जा रहा है।

माया को कुर्सी से हटाकर सीएम पद पर काबिज हुए अखिलेश यादव पर हमला करते हुए माया ने कहा कि वह सिर्फ 'घोषणा सीएम' तक ही सीमित हैं। माया ने कहा कि हमने बेरोजगारों के हाथों में भत्ते की जगह नौकरियां दीं लेकिन अखिलेश घोषणाओं में अपने बाप मुलायम से भी आगे आ गए हैं। अखिलेश सरकार की लैपटॉप और टैबलेट देने के योजना पर हमला करते हुए माया ने कहा कि इसका अंत इनके दुकानों पर बिकने से होगा।

राज्य की जनता की पीड़ा के लिए बीजेपी-कांग्रेस को भी निशाने पर लेते हुए माया ने कहा कि इन दो दलों ने भी चुनाव में यह सोचकर काम किया कि मायावती दोबारा सत्ता में न आने पाए। वह हमारी कामयाबी से डर चुके थे। माया ने कहा कि अगर बीजेपी-कांग्रेस कमजोर उम्मीदवारों को खड़ा कर एसपी उम्मीदवारों की जीत का मार्ग प्रशस्त न करती तो हम 250 सीट जीतते।

बीते दिनों यूपी के कद्दावर मंत्री और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव ने प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में घूस लेने की सलाह दे डाली थी। माया ने इसी बयान पर एसपी की खिंचाई करते हुए कहा कि यहां मंत्री ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। रिटेल में एफडीआई से किसानों के नुकसान का जिक्र करते हुए माया ने कहा कि अगर इससे किसानों को फायदा हुआ तो ही समर्थन दिया जाएगा।

दरअसल कांग्रेस के इस भरोसे का आधार भी था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो मायावती अभी लोकसभा चुनाव से बचना चाहती हैं। उत्‍तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की हार से अभी तक उनकी पार्टी उबर नहीं पाई है। हार के बाद कल मायावती ने उत्‍तर प्रदेश में पहली बार शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की। लोकसभा चुनावों के लिए बसपा सांगठनिक रूप से तैयार नहीं है, यह बात पार्टी के रणनीतिकार भी बखूबी समझते हैं। पिछले एक साल में मायावती सरकार के पूर्व मंत्रियों और पार्टी नेताओं के खिलाफ कई घोटाले और अपराध के मामले भी सामने आए हैं। ये ऐसे पेंच है जिनकी वजह से मायवती को हमेशा ही केंद्र की सरपरस्ती की दरकार रहेगी।

मायावती खुद भी आय से अधिक संप‌त्ति के मामले में फंसी हैं। सीबीआई और अदालती कार्रवाही का खौफ भी उन्हें यूपीए की बांह थामने के लिए मजबूर कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन ने मायावती पर यही आरोप लगाकर उनसे सफाई भी मांग ली है। हुसैन ने कहा है कि मायावती जैसे नेता एक ओर तो एफडीआई के मुद्दे पर केंद्र की आलोचना कर रहे हैं, दूसरी ओर उसी का समर्थन कर रहे हैं। क्या ये नेता सीबीआई से डरे हुए हैं? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी कहना है कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में उच्चतम न्यायालय ने 'सीबीआई को जांच के लिए स्वतंत्र है' कह कर उन्हें पिछले पायदान पर ला दिया। अब वह समर्थन वापस नहीं ले सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच करने के लिए स्वतंत्र है। इस मामले में मायावती को क्लीन चिट देने के फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार, सीबीआई और बसपा सुप्रीमो को नोटिस जारी करते हुए शीर्ष अदालत ने यह बात कही।

सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अदालत ने कभी यह नहीं कहा कि मायावती की संपत्ति के मामले की जांच सीबीआई नहीं कर सकती। एजेंसी जांच करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि इसके लिए एजेंसी को प्रदेश सरकार से मंजूरी लेनी होगी। जस्टिस पी. सदाशिवम् और जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह मामला निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग पर अपने निर्णय को स्पष्ट करेगी।

ओपन कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि अदालत केंद्र, सीबीआई और मायावती को सिर्फ स्पष्टीकरण के लिए नोटिस जारी कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि आय से अधिक संपत्ति का मामला निरस्त करने का निर्णय किसी को संरक्षण प्रदान करने के लिए नहीं है।

वहीं याचिकाकर्ता कमलेश वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि सरकार ऐसे मामले में मंजूरी नहीं देगी। ऐसे मसलों पर तो वे एक-दूसरे को बचाते हैं, तब अदालतों को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 अक्तूबर, 04 को आय से अधिक संपत्ति के मसले पर एजेंसी को जांच के लिए तीन माह का समय दिया था।

इसके बाद 7 अगस्त, 06 के आदेश में ताज कॉरिडोर और संपत्ति की जांच के लिए मसले को अलग किया था। दोनों ही पूर्ववर्ती आदेशों से यह स्पष्ट है कि सीबीआई को संपत्ति की जांच का आदेश शीर्ष अदालत ने दिया था। भूषण के तर्क पर पीठ ने अपने फैसले में दी गई व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए नोटिस जारी कर दिया।

पुनर्विचार याचिका में वर्मा ने सर्वोच्च अदालत से उसके 6 जुलाई के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए दलील दी है कि मायावती के खिलाफ सीबीआई की ओर से एकत्र किए गए सबूतों पर गौर किए बगैर अदालत ने तकनीकी आधार पर इस मामले का निपटारा कर दिया।

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के खिलाफ नौ साल से लंबित संपत्ति मामला निरस्त करने के साथ ही सीबीआई को आड़े हाथों लिया था। अदालत ने फैसले में कहा था कि मायावती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के बारे में किसी निर्देश के बगैर ही एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसा किया।

सीबीआई ने अदालत के आदेशों को ठीक तरीके से समझे बगैर ही बसपा सुप्रीमो के खिलाफ कार्यवाही की। अदालत का आदेश ताज कॉरिडोर प्रकरण में बगैर मंजूरी के उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कथित रूप से 17 करोड़ रुपये के भुगतान के मामले तक सीमित था।


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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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