सबकुछ याद रखने वाली मनमोहनी देवी अब नहीं हैं। उनसे दूसरी मुलाकात नहीं हो सकी।
यह आखिरी मुलाकात की कथा है।
एक सौ आठ साल की जिंदगी की हम अकाल मृत्यु और बेमौत लाखों मौतों,एक के बाद एक आपदा,महामारी और घनघोर बेरोजगारी,महंगाई के दुस्सामाय में कल्पना भी नहीं कर सकते।हमारे आस पास कितने ही लोग बहुत कम उम्र में दुनिया को रोज अलविदा कह रहे हैं।
रामपुर जिले के बिलासपुर तहसील के अंतर्गत 1959 में बसाए गए पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ितों के गांव मानपुर ओझा यानी सूरज फार्म की मनमोहनी बैरागी 108 साल की हैं।
सात पीढ़ियों को देख चुकी हैं वे।बिल्कुल स्वस्थ हैं। न शुगर, न प्रेशर और न कोई दूसरी बीमारी।
गांव से एक मिल दूर अपनी जमीन में बने घर से रोज भी गांव टहलने निकलती हैं लाठी ठक ठक करती हुई।
खूब बोलती है और अब भी बिना चश्मे को दुनिया को आंख खोलकर देखती हैं।सिर्फ उनके दांत नहीं रहे।बोली,शाकाहारी हूं क्योंकि दांत नहीं रहे।
उन्होंने बंगाल की भुखमरी देखी,दूसरा विश्वयुद्ध देखा,प्लेग और हैजा चेचक का कहर देखा,गुरुचांद ठाकुर का मतुआ आंदोलन देखा,भारत विभाजन देखा, बारह रिफ्यूजी कैंपों की जिंदगी देखी,रोज सैकड़ों लोगों की मौतें देखी,सामूहिक चिताओं पर जलती सैकड़ों लाशे देखी, कोलकाता और हावड़ा शहर को बनते देखा,सुंदरवन और बंगाल की नदियों को देखा,जंगल महल और यूपी उत्तराखंड की तराई का जंगल देखा और उन्हें सबकुछ याद है।
आजकल के नौजवानों के कंधे लटक जाते हैं।
पचास पार करते न करते जिजीविषा मर जाती हैं।लेकिन पूर्वी बंगाल में जन्मी इस एक सौ आठ साल की अपढ़ स्त्री कभी थकती नहीं है।
प्रेरणा अंशु की टीम पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों की आपबीती दर्ज करने जिला जिला गांव गांव बुजुर्गों की खोज में भटक रही हैं।
बहुत कम लोग आप बीती सुनाने लायक बचे हैं और उनमें से ज्यादातर लोग बहुत कुछ भूल चुके हैं। लेकिन मनमोहनी देवी को सबकुछ याद है।
परीक्षा में बैठ रहे युवाओं को उनसे सीख लेनी चाहिए।
कल हम अपनी बड़ी दीदी के पोते को देखने सूरज फार्म गए थे। मैं,सविता,रूपेश और शालिनी।
बंटी ने कल हमारे घर वापस पहुंचने से पहले दम तोड दिया।उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी।सिर्फ सविता परिजनों के साथ अंदर थी।
हम बाहर बैठे थे तो अनसुनी आवाज के दर्शकों ने कहा कि 108 साल की मन्मोहिनी देवी हमारे आने से पहले बंटी को देखकर घर चली गई और उनकी स्मृतियां बची हुई है।
हमें यकीन नहीं आया।
हम तुरंत पैदल ही उनके घर निकल गए।
उनके बेटों और पोतों ने मुझे पहचान लिया।
करीब 45 साल पहले उनसे मुलाकात हुई होगी और वे हमारे रिश्तेदार भी नहीं हैं।
उनके बेटे ने आवाज लगाई, मां,पलाश एसेचे।
मनमोहनी देवी बाहर निकल आई।
बोली,पलाश पलाश। तुम इतने बूढ़े हो गए।
फिर हंसने लगी।उनकी वह हंसी विश्वसुंद्रियो की हंसी से ज्यादा मोहक थी। फिर उन्हें मेरे पिता पुलिन बाबू की याद आई। उनकी बात करने लगी।
फिर पूछा,तुम्हारे ताऊ अनिल कब गुजर गए?
चाचा डॉक्टर सुधीर जो शक्तिफर्म चले गए थे और उनका बेटा सुभाष जो कोलकाता में है,कैसे हैं?
तुम्हारी ताई,मां और चाची का क्या हुआ?
तुम्हारे तहेरे भाई अरुण की पत्नी तो अब नहीं रही?
तुम तीन भाई हो,पलाश,paddo और पंचानन
फिर हमने पूछना शुरू किया।
भुखमरी की याद है?
जापानी बमबारी?
गुरू चांद ठाकुर का आंदोलन
प्लेग
भारत जब आजाद हुआ तब क्या हुआ था
क्यों पूर्वी बंगाल छोड़कर आए
बोली, पूर्वी बंगाल पाकिस्तान बन गया था और हम हिंदू थे,इसलिए हिंदुस्तान आ गए।
क्या हिंदू मुसलमानों में दंगा हुआ था?
उन्होंने कहा,हिंदू मुसलमान का कोई झगड़ा नहीं था।झगड़ा हिंदुस्तान पाकिस्तान का था।
उन्हे सारी नदियों के नाम याद हैं ब्योरा समेत।
फिर उन्होंने 12 कैंपों की नर्क कथा सुनाई।
साल्टलेक और उल्टाडांगा,बालीगंज और हावड़ा, संतरागाछी,मेदिनीपुर, कैनिंग और 50के दशक के कोलकाता का दर्शन कराया।
खूब बोली,रुक जाओ। कितने सालों बाद आए हो।
हमने कहा, हम आकर आपका इंटरव्यू रिकार्ड करेंगे।चार पांच घंटे लगेंगे।तब रुकेंगे।चाय भी पियेंगे और खाना भी खायेंगे।
फिर मनमोहनी देवी की मनमोहक मुस्कान।उनसे जवान कौन है?
कोई स्त्री ही 108 साल क्या 108 हजार साल की कथा सुना सकती है शायद।
पलाश विश्वास
23 मई 2022
