THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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Thursday, May 26, 2016

तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए। मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है। मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में 28 मई को बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं। जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागडे,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,कस्तूरी, दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े, अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा। जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाह

तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।


मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।


मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में 28 मई को बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।





जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागडे,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,कस्तूरी, दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े, अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा।


जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाहेब का जाति उम्मूलन का मिशन सबसे ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि जाति व्यवस्था की नींव पर ही यह धर्मोन्माद का तिलिस्म मुक्त बाजार है।


आप तनिक भी हमारी या हमारे मिशन की परवाह करते हों तो हस्तेक्षेप के पोर्टल के टाप पर ललगे  पे यू एप्स बटन पर तुरंत जो भी आप पे कर सकें तुरंत कीजिये।यह समर्थन मिला तो हम जरूर कामयाब होंगे।वरना हमारी मौत है।

दुनिया के लिए आज सबसे बुरी खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन जीत चुके हैं और व्हाइट हाउस के तमाम दरवाजे और खिड़कियां उनके लिए खुले हैं उसीतरह जैसे अबाध पूंजी के लिए हमने अगवाड़ा पिछवाड़ा खोल रखा है।संजोगवश आज ही भारत के चक्रवर्ती महाराज के राज्याभिषेक की दूसरी वर्षी के मौके पर भारत में विज्ञापनों की केसरिया सुनामी है।भारत और अमेरिका ही नहीं,सोवियत संघ के विघटन के बाद टुकटा टुकड़ा लेनिन का ख्वाब और गिरती हुई चीन की दीवार पर भी धर्मध्वजा फहरा दिया गया है।


पलाश विश्वास

दैनिक जनतेचा महानायक या आंबेडकरी चळवळीतील अग्रगण्य दैनिकाचा दशकपूर्ती सोहळा येत्या शनिवारी नागपूर येथे संपन्न होत आहे. उत्तर नागपुरातील इंदोर परिसरातील बेझनबाग मैदानात हा भव्य सोहळा आयोजित करण्यात आला आहे. या सोहळ्यासाठी एक्ष्प्रेस वृत्तसमुहात मागील ३५ वर्षापासून कार्यरत असलेले कलकत्ता येथील प्रसिद्ध पत्रकार पलाश बिस्वास प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित राहणार आहेत. त्याचप्रमाणे दिल्ली येथील सुप्रसिद्ध पत्रकार व हस्तक्षेप या वेब पोर्टलचे संपादक अमलेन्दु उपाध्याय हे सुद्धा प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित होत आहेत.


आज रात की गाड़ी से नागपुर रवाना हो रहा हूं।


मिशन यह है कि बाबासाहेब के दीक्षाभूमि में अंबेडकरी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों,बाबासाहेब के अनुयायियों को हमारे वैकल्पिक मीडिया के अनिवार्य अभियान में शामिल करना है।


वहां जनतेचा महानायक के दशकपूर्ती महोत्सव के मौके पर नागपुर के इंदौरा मैदान में 28 मई को सार्वजनिक सभा में वैकल्पिक मीडिया के हमारे युवा और समर्थ संपादक अमलेंदु उपाध्याय महाराष्ट्र की आम जनता के मुखातिब मुख्य वक्ता होंगे।


स्वागत कीजिये कि जनतेचा महानायक के संपादक सुनील खोब्रागड़े अब वैकल्पिक मीडिया के नये सिपाहसालार होंगे।


मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।


इसके साथ ही कृपया गौर करें कि  भारत विभाजन के बाद बंगाल की कुल आबादी के बराबर भारतभर में जो दलित बंगाली शरणार्थी छितराये हुए हैं , उनका बहुत बड़ा हिस्सा दंडकारण्य के आदिवासी भूगोल में बसे हैं।


बांग्ला भाषा उनकी मातृभाषा है और वे अपने इतिहास भूगोल और मातृभाषा से भी बेदखल हैं और उनकी चीखों को कहीं दर्ज नहीं किया जाता।मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं जिन्हें बांग्ला में अपनी जमीन कभी मिली नहीं है और हिंदी में मेरा प्राण बसा है।


हर भारतीय भाषा और दुनियाभर में मनुष्यता की हर भाषा और हर बोली अब बांग्ला के साथ मेरा मातृभाषा है और बंगाल के इतिहास और भूगोल से बेदखली के बाद यही मेरा असल वजूद है।


बाबासाहेब की दीक्षा भूमि के आसपास महाराष्ट्र के विदर्भ में ऐसे मूक दलित बंगाली शरणार्थी भी बड़ी संख्या में बसे हैं और जनचेता महानायक का मुख्य सस्करण भी मुंबई से निकलता है।विदर्भ के माओवादी ब्रांडेड आदिवासी बहुल चंद्रपुर,गड़चिरौली और गोंडिया में मेरे ये स्वजन बसे हैं तो नागपुर भी मेरा उतना ही घर है जितना समूचा दंडकारम्य,अंडमान निकोबार,उत्तराखंड और यूपी।भारत के चप्पे चप्पे में हमारे वे लोग बसे हैं,जिनके लिए मेरे पिता जिये और मरे और वे सारे मेरे अपने परिजन है।उनकी अभिव्यक्ति के लिए वैकल्पिक मीडिया का यह अनिवार्य मिशन और जरुरी है।


हस्तक्षेप के साथ महानायक के समन्वय के आधार पर जो हम मराठी में हस्तक्षेप का विस्तार कर रहे हैं तो इसी मौके पर नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि से ही हस्तक्षेप का बांग्ला संस्करण भी लांच होना है।क्योंकि हमारी लड़ाई के लिए हमें हस्तक्षेप हर कीमत पर जारी रखना है चाहे हमें जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े।


हमें उम्मीद है कि हमारे तमाम स्वजन,मित्र समर्थक सहकर्मी और जनप्रतिबद्ध परिचित अपरिचित इस मुहिम में देर सवेर हमारे साथ होगें।बाबासाहेब ने इस देश का संविधान रचा और मेहनतकशों के हकहकूक के स्थाई बंदोबस्त भी उनने किया तो बाबासाहेब के अनुायायियों का साथ हमें मिलना ही चाहिए और बाबासाहेब का मिशन आगे बढाना ही हमारा अनिवार्य कार्यभार है तो हमें उनका साथ भी हर कीमत पर चाहिए।जनतेचा महानायक हमारा आधार है।हम इसे राष्ट्रव्यापी बनाने का काम भी करेंगे।


इसी तरह हर भारतीय भाषा में अब देर सवेर हस्तक्षेप होगा और इसका सारा बोझ हम अमलेंदु पर लादने जा रहे हैं।हम हस्तक्षेप को हर बोली तक विस्तृत करना चाहते हैं ताकि वह लोकजीवन और लोकसंस्कृति की धड़कन तो बने ही,उसके साथ ही जनपक्षधरता के लिए नये माध्यम,विधा,व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र भी गढ़ सके।


संपादकीय ढांचा जस का तस होगा और हम बाकी वैकल्पिक मीडिया और पूरे देश के साथ हस्तक्षेप को नत्थी करने के मिशन में हैं और हमें आपका बेशकीमती साथ,समर्थन और सहयोग चाहिए क्योंकि हम बाजार के व्याकरण के विरुद्ध विज्ञापन निर्भरता की बजाये आपके समर्थन के भरोसे यह आयोजन कर रहे हैं।


आप तनिक भी हमारी या हमारे मिशन की परवाह करते हों तो हस्तेक्षेप के पोर्टल के टाप पर ललगे  पे यू एप्स बटन पर तुरंत जो भी आप पे कर सकें तुरंत कीजिये।यह समर्थन मिला तो हम जरूर कामयाब होंगे।वरना हमारी मौत है।



अब आप मानें या न मानें मेरे जीवन में सबसे बड़े आदर्श मेरे गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी,मेरे असल बड़े भाई आनंद स्वरुप वर्मा,पंकज बिष्ट और राजीव लोचन साह अपनी अविराम सक्रियता के बावजूद बूढ़े हो चुके हैं और हम भी अब चंद दिनों के मेहमान हैं।


इनके मुकाबले मेरी हालत बहुत ज्यादा खराब है क्योंकि तमाम वजहें हैं कि मैं अपने पहाड़ और अपने गांव के रास्ते को मुड़कर देख भी नहीं सकता और मैं अपने घर और अपनी जमीन से बेदखल हूं और फिलहाल एक बेरोजगार मजदूर हूं जिसके लिए सर छुपाने की भी जगह नहीं है और निजी समस्याएं इतनी भयंकर हैं कि उनसे निबटने के लिए कोई रक्षाकवच कुंडल वगैरह नहीं है मेरे पास।


ऐसे समय में इस रिले रेस का बैटन अब हमारे युवा ताजा दम साथियों के पास है।


जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागड़,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े,अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा।


फिर अपना फोकस तय करना होगा क्योंकि मुक्तबाजार में मुद्दे भी वे ही तय कर रहे हैं और जनता के मुद्दे सिरे से गायब हैं।हम भटक नहीं सकते।इस तिलिस्म को तोड़ना है तो इसके तंत्र मंत्र यंत्र से बचने की दक्षता सजगता अनिवार्य है वरना हम लड़ ही नहीं सकते।कभी नहीं।सावधान।


वे अपने एजंडा लागू करने के लिए इंसानियत के मुल्क को खून के महासमुंदर में तब्दील कर रहे हैं सिर्फ भारत में ही नहीं,दुनियाभर में तो यह मोर्चाबंदी इस विश्वव्यवस्था के खिलाफ विश्वव्यापी होनी चाहिए और इस चुनौती का सामना उन्हें करना है।


हम हरचंद कोशिश में हैं कि अपने जनप्रतिबद्ध तमाम साथियों को एकजुट करें और दुनिया जोड़ने की बात तो बाद में करेंगे अगर आगे भी जियेंगे,फिलहाल देश जोड़ना बेहद जरुरी है।तुरंत जरुरी है।


गौरतलब है कि राजाधिराज मान्यवर डोनाल्ड ट्रंप के राज्य़ाभिषेक से पहले नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के पचासवें साल की शुरुआत आज से हो रही है। इसे हम बसन्त गर्जना या बज्रनाद के रूप में जानते हैं। तेभागा और तेलंगाना किसान आंदोलन की कड़ी में किसानों के इस आंदोलन ने जनवादी भारत का सपना देखा था जिसकी बुनियाद मजदूर किसान राज था।


आज उस सपने की विरासत,उस किसान आदिवासी मेहनतकश मजदूर के बदलाव की लड़ाई,राष्ट्र को जनवादी लोकतांत्रिक बनाने के कार्यभार का जो हुआ सो हुआ,तय यह है कि सत्तर के दशक की हमारी जिस पीढ़ी ने दुनिया बदलने की कसम ली थी,उसके बचे खुचे लोग अब अलविदा की तैयारी में हैं।


दूसरी तरफ भारत में जो असल सर्वहारा हैं,जो बहुसंख्य हैं,जो जल जमीन जंगल के साथ साथ नागरिक और मानवाधिकार से भी इस स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में लगातार बेदखल हो रहे हैं और जिनके लिए मुक्तबाजार की यह व्यवस्था नरसंहारी है,वे लोग ख्वाबों की उस लहलहाती फसल से भी बेदखल हैं।


जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाहेब का जाति उम्मूलन का मिशन सबसे ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि जाति व्यवस्था की नींव पर ही यह धर्मोन्माद का तिलिस्म मुक्त बाजार है।


जातिव्यवस्था के बने रहते हम भारत के लोग न देशभक्त हैं और न राष्ट्रवादी और न लोकतांत्रिक और हम एक अनंत रंगभेदी वर्चस्व के आत्मघाती गृहयुद्ध में स्वजनों के वध के लिए महाभारत जी रहे हैं।

जाति व्यवस्था के बने रहने पर न समता संभव है और न न्याय और समरसता का धर्मोन्माद आत्मघाती है।


धर्मोन्मादी मुक्तबाजार का यह मनुस्मृति अनुशासन बंटी हुई मेहनतकश जनता के नरकंकालों का बेलगाम  कारोबार है तो जाति उन्मूलन के बाबासाहेब का एजंडा ही प्रतिरोध का प्रस्थान बिंदू है क्योंक बंटे हुए हम न अलग अलग जी सकते हैं और न हमारा कोई जनमत या जनादेश है और बच निकलने का कोई राजमार्ग।


दुनिया के लिए आज सबसे बुरी खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन जीत चुके हैं और व्हाइट हाउस के तमाम दरवाजे और खिड़कियां उनके लिए खुले हैं उसीतरह जैसे अबाध पूंजी के लिए हमने अगवाड़ा पिछवाड़ा खोल रखा है।


संजोगवश आज ही भारत के चक्रवर्ती महाराज के राज्याभिषेक की दूसरी वर्षी के मौके पर भारत में विज्ञापनों की केसरिया सुनामी है।भारत और अमेरिका ही नहीं,सोवियत संघ के विघटन के बाद टुकटा टुकड़ा लेनिन का ख्वाब और गिरती हुई चीन की दीवार पर भी धर्मध्वजा फहरा दिया गया है।


यह धर्मध्वजा मुक्तबाजार का है,इसे आस्था में निष्णात मनुष्यता को समझाना बेहद मुश्किल है क्योंकि इतिहास की मृत्यु हो गयी है और विचारधारा भी बची नहीं है।


यह समझाना भी बेहद मुश्किल है कि मुक्तबाजार के व्याकरण के मुताबिक धर्म और नैतिकता,भाषा और संस्कृति,लोक जीवन का भी अवसान हो गया है।हम बेरहम बाजार में नंगे खड़े हैं और क्रयशक्ति ही एकमात्र सामाजिक मूल्य है।


अब हम मनुष्य भी नहीं रहे हैं।


हम बायोमेट्रिक डिजिटल रोबोटिक नागरिक अनागरिक हैं और हमारा कोई वजूद नहीं है।


मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।


तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।



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तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए। मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है। मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में 28 मई को बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं। जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागडे,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,कस्तूरी, दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े, अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा। जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाह

तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।


मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।


मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में 28 मई को बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।





जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागडे,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,कस्तूरी, दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े, अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा।


जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाहेब का जाति उम्मूलन का मिशन सबसे ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि जाति व्यवस्था की नींव पर ही यह धर्मोन्माद का तिलिस्म मुक्त बाजार है।


आप तनिक भी हमारी या हमारे मिशन की परवाह करते हों तो हस्तेक्षेप के पोर्टल के टाप पर ललगे  पे यू एप्स बटन पर तुरंत जो भी आप पे कर सकें तुरंत कीजिये।यह समर्थन मिला तो हम जरूर कामयाब होंगे।वरना हमारी मौत है।

दुनिया के लिए आज सबसे बुरी खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन जीत चुके हैं और व्हाइट हाउस के तमाम दरवाजे और खिड़कियां उनके लिए खुले हैं उसीतरह जैसे अबाध पूंजी के लिए हमने अगवाड़ा पिछवाड़ा खोल रखा है।संजोगवश आज ही भारत के चक्रवर्ती महाराज के राज्याभिषेक की दूसरी वर्षी के मौके पर भारत में विज्ञापनों की केसरिया सुनामी है।भारत और अमेरिका ही नहीं,सोवियत संघ के विघटन के बाद टुकटा टुकड़ा लेनिन का ख्वाब और गिरती हुई चीन की दीवार पर भी धर्मध्वजा फहरा दिया गया है।


पलाश विश्वास

दैनिक जनतेचा महानायक या आंबेडकरी चळवळीतील अग्रगण्य दैनिकाचा दशकपूर्ती सोहळा येत्या शनिवारी नागपूर येथे संपन्न होत आहे. उत्तर नागपुरातील इंदोर परिसरातील बेझनबाग मैदानात हा भव्य सोहळा आयोजित करण्यात आला आहे. या सोहळ्यासाठी एक्ष्प्रेस वृत्तसमुहात मागील ३५ वर्षापासून कार्यरत असलेले कलकत्ता येथील प्रसिद्ध पत्रकार पलाश बिस्वास प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित राहणार आहेत. त्याचप्रमाणे दिल्ली येथील सुप्रसिद्ध पत्रकार व हस्तक्षेप या वेब पोर्टलचे संपादक अमलेन्दु उपाध्याय हे सुद्धा प्रमुख पाहुणे म्हणून उपस्थित होत आहेत.


आज रात की गाड़ी से नागपुर रवाना हो रहा हूं।


मिशन यह है कि बाबासाहेब के दीक्षाभूमि में अंबेडकरी आंदोलन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों,बाबासाहेब के अनुयायियों को हमारे वैकल्पिक मीडिया के अनिवार्य अभियान में शामिल करना है।


वहां जनतेचा महानायक के दशकपूर्ती महोत्सव के मौके पर नागपुर के इंदौरा मैदान में 28 मई को सार्वजनिक सभा में वैकल्पिक मीडिया के हमारे युवा और समर्थ संपादक अमलेंदु उपाध्याय महाराष्ट्र की आम जनता के मुखातिब मुख्य वक्ता होंगे।


स्वागत कीजिये कि जनतेचा महानायक के संपादक सुनील खोब्रागड़े अब वैकल्पिक मीडिया के नये सिपाहसालार होंगे।


मराठी जनता अपने साहित्य.संस्कृति और पत्रकारिता की बहुरंगी विरासत के प्रति हिंदी दुनिया के मुकाबले बहुत ज्यादा संवेदनशील है तो हमें खुशी हो रही है कि हम नागपुर में बाबासाहेब की दीक्षाभूमि पर खड़ी जनता के बीच वहां हस्तक्षेप का मराठी और बांग्ला में विस्तार करने जा रहे हैं।


इसके साथ ही कृपया गौर करें कि  भारत विभाजन के बाद बंगाल की कुल आबादी के बराबर भारतभर में जो दलित बंगाली शरणार्थी छितराये हुए हैं , उनका बहुत बड़ा हिस्सा दंडकारण्य के आदिवासी भूगोल में बसे हैं।


बांग्ला भाषा उनकी मातृभाषा है और वे अपने इतिहास भूगोल और मातृभाषा से भी बेदखल हैं और उनकी चीखों को कहीं दर्ज नहीं किया जाता।मैं भी उन्हीं लोगों में से हूं जिन्हें बांग्ला में अपनी जमीन कभी मिली नहीं है और हिंदी में मेरा प्राण बसा है।


हर भारतीय भाषा और दुनियाभर में मनुष्यता की हर भाषा और हर बोली अब बांग्ला के साथ मेरा मातृभाषा है और बंगाल के इतिहास और भूगोल से बेदखली के बाद यही मेरा असल वजूद है।


बाबासाहेब की दीक्षा भूमि के आसपास महाराष्ट्र के विदर्भ में ऐसे मूक दलित बंगाली शरणार्थी भी बड़ी संख्या में बसे हैं और जनचेता महानायक का मुख्य सस्करण भी मुंबई से निकलता है।विदर्भ के माओवादी ब्रांडेड आदिवासी बहुल चंद्रपुर,गड़चिरौली और गोंडिया में मेरे ये स्वजन बसे हैं तो नागपुर भी मेरा उतना ही घर है जितना समूचा दंडकारम्य,अंडमान निकोबार,उत्तराखंड और यूपी।भारत के चप्पे चप्पे में हमारे वे लोग बसे हैं,जिनके लिए मेरे पिता जिये और मरे और वे सारे मेरे अपने परिजन है।उनकी अभिव्यक्ति के लिए वैकल्पिक मीडिया का यह अनिवार्य मिशन और जरुरी है।


हस्तक्षेप के साथ महानायक के समन्वय के आधार पर जो हम मराठी में हस्तक्षेप का विस्तार कर रहे हैं तो इसी मौके पर नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि से ही हस्तक्षेप का बांग्ला संस्करण भी लांच होना है।क्योंकि हमारी लड़ाई के लिए हमें हस्तक्षेप हर कीमत पर जारी रखना है चाहे हमें जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े।


हमें उम्मीद है कि हमारे तमाम स्वजन,मित्र समर्थक सहकर्मी और जनप्रतिबद्ध परिचित अपरिचित इस मुहिम में देर सवेर हमारे साथ होगें।बाबासाहेब ने इस देश का संविधान रचा और मेहनतकशों के हकहकूक के स्थाई बंदोबस्त भी उनने किया तो बाबासाहेब के अनुायायियों का साथ हमें मिलना ही चाहिए और बाबासाहेब का मिशन आगे बढाना ही हमारा अनिवार्य कार्यभार है तो हमें उनका साथ भी हर कीमत पर चाहिए।जनतेचा महानायक हमारा आधार है।हम इसे राष्ट्रव्यापी बनाने का काम भी करेंगे।


इसी तरह हर भारतीय भाषा में अब देर सवेर हस्तक्षेप होगा और इसका सारा बोझ हम अमलेंदु पर लादने जा रहे हैं।हम हस्तक्षेप को हर बोली तक विस्तृत करना चाहते हैं ताकि वह लोकजीवन और लोकसंस्कृति की धड़कन तो बने ही,उसके साथ ही जनपक्षधरता के लिए नये माध्यम,विधा,व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र भी गढ़ सके।


संपादकीय ढांचा जस का तस होगा और हम बाकी वैकल्पिक मीडिया और पूरे देश के साथ हस्तक्षेप को नत्थी करने के मिशन में हैं और हमें आपका बेशकीमती साथ,समर्थन और सहयोग चाहिए क्योंकि हम बाजार के व्याकरण के विरुद्ध विज्ञापन निर्भरता की बजाये आपके समर्थन के भरोसे यह आयोजन कर रहे हैं।


आप तनिक भी हमारी या हमारे मिशन की परवाह करते हों तो हस्तेक्षेप के पोर्टल के टाप पर ललगे  पे यू एप्स बटन पर तुरंत जो भी आप पे कर सकें तुरंत कीजिये।यह समर्थन मिला तो हम जरूर कामयाब होंगे।वरना हमारी मौत है।



अब आप मानें या न मानें मेरे जीवन में सबसे बड़े आदर्श मेरे गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी,मेरे असल बड़े भाई आनंद स्वरुप वर्मा,पंकज बिष्ट और राजीव लोचन साह अपनी अविराम सक्रियता के बावजूद बूढ़े हो चुके हैं और हम भी अब चंद दिनों के मेहमान हैं।


इनके मुकाबले मेरी हालत बहुत ज्यादा खराब है क्योंकि तमाम वजहें हैं कि मैं अपने पहाड़ और अपने गांव के रास्ते को मुड़कर देख भी नहीं सकता और मैं अपने घर और अपनी जमीन से बेदखल हूं और फिलहाल एक बेरोजगार मजदूर हूं जिसके लिए सर छुपाने की भी जगह नहीं है और निजी समस्याएं इतनी भयंकर हैं कि उनसे निबटने के लिए कोई रक्षाकवच कुंडल वगैरह नहीं है मेरे पास।


ऐसे समय में इस रिले रेस का बैटन अब हमारे युवा ताजा दम साथियों के पास है।


जनांदोलन और जनमोर्चे पर क्या होगा,हम नहीं जानते लेकिन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर अमलेंदु उपाध्याय, यशवंत सिंह, अभिषेक श्रीवास्तव, रेयाजुल हक, साहिल, प्रमोद रंजन, चंदन,सुनील खोब्रागड़,डा.सुबोध बिश्वास,अशोक बसोतरा, अभिराम मल्लिक, ज्ञानशील,शरदेंदु बिश्वास,संजय जोशी,दिलीप मंडल,संजीव रामटेके,प्रमोड कांवड़े,अयाज मुगल जैसे कार्यकर्ताओं के हाथ बैटन है और उन्हें नेतृत्वकारी भूमिका के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार होना होगा और आपस में समन्वय भी बनाना होगा।


फिर अपना फोकस तय करना होगा क्योंकि मुक्तबाजार में मुद्दे भी वे ही तय कर रहे हैं और जनता के मुद्दे सिरे से गायब हैं।हम भटक नहीं सकते।इस तिलिस्म को तोड़ना है तो इसके तंत्र मंत्र यंत्र से बचने की दक्षता सजगता अनिवार्य है वरना हम लड़ ही नहीं सकते।कभी नहीं।सावधान।


वे अपने एजंडा लागू करने के लिए इंसानियत के मुल्क को खून के महासमुंदर में तब्दील कर रहे हैं सिर्फ भारत में ही नहीं,दुनियाभर में तो यह मोर्चाबंदी इस विश्वव्यवस्था के खिलाफ विश्वव्यापी होनी चाहिए और इस चुनौती का सामना उन्हें करना है।


हम हरचंद कोशिश में हैं कि अपने जनप्रतिबद्ध तमाम साथियों को एकजुट करें और दुनिया जोड़ने की बात तो बाद में करेंगे अगर आगे भी जियेंगे,फिलहाल देश जोड़ना बेहद जरुरी है।तुरंत जरुरी है।


गौरतलब है कि राजाधिराज मान्यवर डोनाल्ड ट्रंप के राज्य़ाभिषेक से पहले नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के पचासवें साल की शुरुआत आज से हो रही है। इसे हम बसन्त गर्जना या बज्रनाद के रूप में जानते हैं। तेभागा और तेलंगाना किसान आंदोलन की कड़ी में किसानों के इस आंदोलन ने जनवादी भारत का सपना देखा था जिसकी बुनियाद मजदूर किसान राज था।


आज उस सपने की विरासत,उस किसान आदिवासी मेहनतकश मजदूर के बदलाव की लड़ाई,राष्ट्र को जनवादी लोकतांत्रिक बनाने के कार्यभार का जो हुआ सो हुआ,तय यह है कि सत्तर के दशक की हमारी जिस पीढ़ी ने दुनिया बदलने की कसम ली थी,उसके बचे खुचे लोग अब अलविदा की तैयारी में हैं।


दूसरी तरफ भारत में जो असल सर्वहारा हैं,जो बहुसंख्य हैं,जो जल जमीन जंगल के साथ साथ नागरिक और मानवाधिकार से भी इस स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में लगातार बेदखल हो रहे हैं और जिनके लिए मुक्तबाजार की यह व्यवस्था नरसंहारी है,वे लोग ख्वाबों की उस लहलहाती फसल से भी बेदखल हैं।


जनता के बेशकीमती ख्वाबों की बहाली अब जनप्रतिबद्धता का सबसे बड़ा कार्यभार है और इसलिए बाबासाहेब का जाति उम्मूलन का मिशन सबसे ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि जाति व्यवस्था की नींव पर ही यह धर्मोन्माद का तिलिस्म मुक्त बाजार है।


जातिव्यवस्था के बने रहते हम भारत के लोग न देशभक्त हैं और न राष्ट्रवादी और न लोकतांत्रिक और हम एक अनंत रंगभेदी वर्चस्व के आत्मघाती गृहयुद्ध में स्वजनों के वध के लिए महाभारत जी रहे हैं।

जाति व्यवस्था के बने रहने पर न समता संभव है और न न्याय और समरसता का धर्मोन्माद आत्मघाती है।


धर्मोन्मादी मुक्तबाजार का यह मनुस्मृति अनुशासन बंटी हुई मेहनतकश जनता के नरकंकालों का बेलगाम  कारोबार है तो जाति उन्मूलन के बाबासाहेब का एजंडा ही प्रतिरोध का प्रस्थान बिंदू है क्योंक बंटे हुए हम न अलग अलग जी सकते हैं और न हमारा कोई जनमत या जनादेश है और बच निकलने का कोई राजमार्ग।


दुनिया के लिए आज सबसे बुरी खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन जीत चुके हैं और व्हाइट हाउस के तमाम दरवाजे और खिड़कियां उनके लिए खुले हैं उसीतरह जैसे अबाध पूंजी के लिए हमने अगवाड़ा पिछवाड़ा खोल रखा है।


संजोगवश आज ही भारत के चक्रवर्ती महाराज के राज्याभिषेक की दूसरी वर्षी के मौके पर भारत में विज्ञापनों की केसरिया सुनामी है।भारत और अमेरिका ही नहीं,सोवियत संघ के विघटन के बाद टुकटा टुकड़ा लेनिन का ख्वाब और गिरती हुई चीन की दीवार पर भी धर्मध्वजा फहरा दिया गया है।


यह धर्मध्वजा मुक्तबाजार का है,इसे आस्था में निष्णात मनुष्यता को समझाना बेहद मुश्किल है क्योंकि इतिहास की मृत्यु हो गयी है और विचारधारा भी बची नहीं है।


यह समझाना भी बेहद मुश्किल है कि मुक्तबाजार के व्याकरण के मुताबिक धर्म और नैतिकता,भाषा और संस्कृति,लोक जीवन का भी अवसान हो गया है।हम बेरहम बाजार में नंगे खड़े हैं और क्रयशक्ति ही एकमात्र सामाजिक मूल्य है।


अब हम मनुष्य भी नहीं रहे हैं।


हम बायोमेट्रिक डिजिटल रोबोटिक नागरिक अनागरिक हैं और हमारा कोई वजूद नहीं है।


मनुष्यता बची नहीं रहेगी तो प्रकृति और पृथ्वी के बचे होने की कोई उम्मीद भी नहीं है।


तनिको पांव जमाके रखिये जमीन पर दोस्तों कि आसमान गिर रहा है जमीन को खाने के लिए।



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Tuesday, May 24, 2016

फासिज्म की निरकुंश सत्ता मनुस्मृति की पितृसत्ता है और उसके खिलाफ मोर्चाबंदी ही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। स्त्री अस्मिता के हम पक्षधर हैं तो फासिज्म विरोधी ताकतों को पहले एकजुट करें। बाकी जहां जहां संतन पांव धरिन,तहां तहां पतंजलि साम्राज्य! असम में नये मुख्यमंत्री की ताजपोशी के साथ ही कारपोरेट बाबा को बोडोलैंड में जमीन,उल्फा भी विरोध में! पलाश विश्वास



फासिज्म की निरकुंश सत्ता मनुस्मृति की पितृसत्ता है और उसके खिलाफ मोर्चाबंदी ही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

स्त्री अस्मिता के हम पक्षधर हैं तो फासिज्म विरोधी ताकतों को पहले एकजुट करें।

बाकी जहां जहां संतन पांव धरिन,तहां तहां पतंजलि साम्राज्य!

असम में नये मुख्यमंत्री की ताजपोशी के साथ ही कारपोरेट बाबा को बोडोलैंड में जमीन,उल्फा भी विरोध में!

पलाश विश्वास

हमारे हिसाब से फासिज्म की निरकुंश सत्ता मनुस्मृति की पितृसत्ता है और उसके खिलाफ मोर्चाबंदी ही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।इस वक्त लोकतंत्र से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है और फासिजम की पितृसत्ता तेजी से लोकतंत्र को खत्म कर रही है,संविधान की हत्या कर रही है और कानून का राज है ही नहीं।

हम लोग अगर स्त्री अस्मिता के हम पक्षधर हैं तो व्यक्तियों के खिलाफ मोर्चाबंदी की बजाये फासिज्म विरोधी ताकतों को पहले एकजुट करें।हम जनांदोलन में व्यकित के तानाशाही नेतृत्व और व्यक्तिनिर्भर आंदोलन को जितना आत्मघाती मानते हैं ,उसीतरह व्यक्ति केंद्रित विमर्श के हम एकदम खिलाफ हैं,चाहे आप जो समझें।

बाकी हालात ये हैं कि जहां जहां संतन पांव धरिन,तहां तहां पतंजलि साम्राज्य।

बाकी जहां जहां कमल खिलखिला रहे ,पतंंजलि साम्राज्य ही चक्रवर्ती महाराजाधिराज के स्मार्ट डिजिटल विकास का स्रवोत्तम आर्थिक सुधार है और यह पतंजलि अश्वमेध राजसूय का आवाहन दरअसल अबाध पूंजी है।संपू्र्ण निजीकरण और संपूर्ण विनिवेश है तो स्त्री का संपूर्ण उपभोक्ताकरण का पुत्रजीवक अभियान भी यह है।


यह वर्णश्रेष्ठों के वर्चस्व का रंगभेदी राजधर्म है तो अल्पसंख्यको,स्त्रियों,छात्रों,बच्चों,दलितों,पिछड़ों और आदिवासियों का आखेट भी है।तो हमारे प्रतिरोध का एकमात्र विकल्प जनपक्षधर लोकतांत्रिक ताकतों का मोर्चा है और हमने इसी पर फोकस किया है।


ताजा खबर यह है कि असम में नये मुख्यमंत्री की ताजपोशी के साथ ही कारपोरेट बाबा को बोडोलैंड में जमीन,उल्फा भी विरोध में है।केसरिया सुनामी के विस्तार के साथ साथ जो हिंदुत्व का एजंडा योगाभ्यास और बजरंगी धावा है,उसका यह पतंजलि विस्तार भी संजोग से है और अंबानी अडानी देशी पूंजी के जल जंगल जमीन लूटो देश बेचो हिंदुत्व का असली चेहरा यह सनातन है जो कभी मनमोहन का मायावी संसार रहा है तो अब विशुध पुत्रजीवक है।

हमें स्त्री की अस्मिता और मनुस्मडति मुताबिक उसकी यौनदासी के विधान का प्रतिरोध दरअसल इसी बिंदू से राजधर्म के खिलाफ जनप्रतिबद्ध गोलबंदी के तहत करना चाहिए और व्यक्ति निर्भर आंदोलन की तरह व्यक्ति निर्भर संवाद और विमर्श से यथासंभव बचना चाहि,ऐसी मेरी राय है और मजहबी सियासत और सियासती मजहब की तरह जनपक्षधरता भी असहिष्णुता का विशुध फतवा है,तो मुझे स्पष्टीकरण कोई अब देना नहीं है।चाहे तो आप हमें सिरे से खारिज कर दें या बजरंगी अवतार में हमारा सर कलम कर दें।

हमारे लिए इस महादेश में ही नहीं,ग्लोबल व्यवस्था में रंगभेदी वर्चस्व है तो अटूट जाति धर्म क्षेत्रीय अस्मिताओं की प्रचंड पितृसत्ता का वीभत्स चेहरा है,जो दरअसल हिंदुत्व का एजंडा है और हमारी तमाम गतिविधियों पर इस तिलिस्म में सत्ता पक्ष का ही नियंत्रण है और जनमत की अभिव्यक्ति और निर्माण की गुंजाइश कहीं नहीं क्योंकि मुक्तबाजार सबसे बड़ा हथियार सूचना तंत्र मीडिया और सोशल मीडिया है जिसकी भाषा,विधा,माध्यम,सौदर्यशास्त्र सबकुछ पर मुक्तबाजारी निरंकुश सत्ता है और हम देवमंडल के सनातन पुजारी या तो व्यक्ति पूजा या फिर व्यक्ति नेतृत्व या व्यकितविरोध की क्रांति में निष्णात हैं।हमारे मुद्दे नहीं हैं।

प्रकृति भी स्त्री है और यह पृथ्वी भी स्त्री है और उसके साथ बलात्कार उत्सव अब फासिजम का राजकाज राजधर्म है और उसके खिलाफ प्रतिरोध की क्या कहें, जनमत बनाने की हमारी कोई तैयारी है नहीं और हम मीडिया के रचे जनादेश पर हालात बजलने की मुहिम में जाने अनजाने लगे हुए जनपक्षधरता निभा रहे हैं।


जल जंगल जमीन मनुष्यता सभ्यता लहूलुहान हैंं।हिमालयउत्तुंग शिखरों और समूचे जलस्रोतों के साथ दावानल के कारपोरेट माफिया उद्यम में रोज रोज खाक है तो परमाणु उर्जा का विकल्प चुनकर समुद्र रेडियोएक्टिव है और राष्ट्र अब नागरिकों के खिलाफ युद्ध में है क्योंकि राष्ट्र भी विशुध पतंजलि का विशुध सैन्यतंत्र है।


बाकी मुक्त बाजार में या सूखा है या भूकंप है या बेरोजगारी या भुखमरी है,किसानों की हत्या है,मेहनतकशों के कटेहिए हाथ पांव है,छात्रों के सर कलम हैं और बेइतंहा बेदखली है और जनसंहार का निरंकुश कार्निवाल है।हमारा मुद्दा क्या है।

गायपट्टी के बाद आदिवासी भूगोल का सफाया करने के बाद पूरब और पूर्वोत्तर में केसरिया सुनामी है और बुद्धमय बंगाल का संपूर्ण केसरियाकरण है क्योंकि दस फीसद वोटर विशुध हिंदुत्व का सनातन कैडर है और तमाम स्लीपिंग सेल एक्टिव है और हमें मालूम भी नहीं है कि हमारे क्या ऐसेट हैं।हमें मालूम भी नहीं है कि सारे संसाधन और सारी विरासत और सारा इतिहास भूगोल हमारे हैं।हमारा बिनाशर्त आत्मसमर्पण है।

वैचारिक क्रांति की आत्मरति घनघोर है और दसों दशाओं में फासिज्म की सुनामी है।कारपोरेटराज अब विशुध पतंजलि और बजरंगी योगाभ्यास है और हमारी जवनप्रतिबद्धता विशुध सनातन संस्कृति पितृसत्ता में तब्दील है।


स्त्री को कदम कदम पर यौन दासी बनाने के तंत्र मंत्र यंत्र के विरोध के अनिवार्य कार्य़भार को तिलाजंलि देकर हम देहमुक्ति में स्त्री मुक्ति तलाश रहे है जो फासिज्म के इस मनुस्मृति राज में निहायत असंभव है।


करोड़ों बजरंगियों से निबटने के बजाय इकलोता बजरंगी के खिलाफ हम तीर तरकश आजमा रहे हैं और यह भी समझ में नहीं रहे हैं कि यह प्रतिस्थापित विमर्श है हवा हवाई।लगे रहो भाई।

असम भी अब गुजरात है और हमारे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है।

सलावाजुड़ुम मुद्दा नहीं है।आफस्पा मुद्दा नहीं है।सैन्यतंत्र सलवा जुडुम मुद्दा नहीं है।जाति और आरक्षण मुद्दा है।मुक्तबाजार,संपूर्ण निजीकरण,संपूर्ण विनिवेश,अबाध पूंजी और सत्ता का फासिज्म और सैन्य राष्ट्र हमारे मुद्दे नहीं हैं।हम क्रांतिकारी हैं।

असम को सर्बानंद सोनोवाल के रूप में आज प्रदेश का नया मुख्यमंत्री मिला है जिनने पद संभालने से पहले ही बांग्लादेशियों के बहाने शरणार्थियों,अल्पसंख्यकों और असम में रहने वाले गैर असमिया जनसंख्या के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया है।


लोकतंत्र का यह जनादेश है या फिर उल्फा का आतंक है,कहा नहीं जा सकता।अस्सी के दशक का असम फिर नये कलेवर में उल्फा नियंत्रण में है।


बहरहाल मीडिया की खबर है कि मुख्यमंत्री की  इस कुर्सी के साथ सोनोवाल को मिल रहा है एक बड़ा सवाल। सवाल भी छोटा नहीं है, पतंजलि के सर्वेसर्वा और योग गुरु स्वामी रामदेव से जुड़ा है।


बहरहाल मीडिया की खबर है कि दरअसल, रामदेव प्रदेश में कुछ जमीन लेना चाहते हैं लेकिन राज्य में बीजेपी की गठबंधन सहयोगी बोडोलैंपल्स फ्रंट (बीपीएफ) पतंजलि ट्रस्ट को जमीन अलॉट करने में नाकाम दिख रही है। बड़ी बात यह है कि उन्हें अपने ही धड़े यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है।

बहरहाल मीडिया की खबर है कि टीम अन्ना के पूर्व सदस्य और कृषक मुक्ति संग्राम समिति के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के पतंजलि को जमीन अलॉट करने के कदम का विरोध किया है।


बहरहाल मीडिया की खबर है कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य के नए मुख्यमंत्री सोनोवाल को शुरू में ही इस मामले से निपटना होगा। उनके लिए रामदेव को जमीन मुहैया कराना बड़ी चुनौती होगी। यही नहीं, भविष्य में रामदेव का इनवेस्टमेंट भी इसी पर निर्भर करेगा। बता दें कि अखिल गोगोई पहले लैंड पॉलिसी के खिलाफ आंदोलन करते रहे हैं।


सबसे पहले यह साफ कर दूं बाहैसियत लेखक मेरी शैली और भाषा से शायद मैं अपना पक्ष साबित नहीं कर पा रहा हूं जो हर हालत में पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री पक्ष है।मैं मुक्तबाजारी उत्तरआधुनिकतावाद के तहत यौन संवतंत्रता का जो उपभोक्ता करण है,उसका हमेशा विरोध करता रहा हूं लेकिन मैं स्त्री की अपना सेक्स पार्टनर की स्वतंत्रता और सेक्स की इच्छा और अनिच्छा के मामले उसकी स्वतंत्रता का समर्थन करता हूं।हिंदुत्व हो या अन्य़ कोई धर्ममत,राजनीति हो या बाजार स्त्री को यौनदासी बनाने की हर परंपरा और सनातन रीति के खिलाफ मैं खड़ा हूं।


कविता कृष्णन  भी शायद मुक्तबाजारी उन्मुक्त सेक्स कार्निवाल की बात नहीं कर रही है बल्कि वह सीधे तौर पर स्त्री अस्मिता और स्त्री स्वतंत्रता की बात कर रही है।


मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं और उनके खिलाफ किसी भी मुहिम का उतना ही विरोध और निंदा करता हूं जितना मैं आदिवासी भूगोल,हिमालय क्षेत्र,शरणार्थी,अश्वेत अछूत दुनिया की तमाम स्त्रियों का समर्थन सोनी सोरी और इरोम शर्मिला तक करता रहा हूं।

हम पुत्रजीवक के कारोबारी नहीं रहे हैं और न हम वैचारिक कठमुल्ला हैं बजरंगी संस्कृति के मुताबिक।अंध राष्ट्रवाद का न हुआ ,धर्म राजनीति और बाजार का न हुआ तो वैचारिक जड़ अंध कठमुल्लापन की उम्मीद हमसे न करें तो बेहतर है।


हम लोकतांत्रिक संवाद के पक्ष में हैं और प्रतिपक्ष के वैचारिक मतभेद का तब तक सम्मान करते हैं ,जबतक संवाद की भाषा लोकतांत्रिक है।


जन्मजात बंगाली हूं लेकिन मेरा दिलोदिमाग विशुध कुंमाउनी है और जड़ें हिमालयी है,जहां भाषा और आचरण का संयम ही लोकसंस्कृति है जो कुल मिलाकर इस देश में विविधता और बहुलता की संस्कृति है।

इसके अलावा मैं करीब चार दशक से पत्रकारिता से जुड़़ हूं और निरंतर सामाजिक सक्रियता जारी रखने और रोजी रोटी कमाने के बीच कोई ऐसा अंतर्विरोध पैदा न हो कि हम जनपक्षधरता का मोर्चा छोड़कर सत्तापक्ष के समाने आत्मसमर्पण कर दूं।


यह निर्णय सत्तर के दशक में मैंने लिया था,जब पत्रकारिता सचमुच मिशन था और कारोबार से इसका दूर दूर का नाता तो इतना वीभत्स मुनाफावसूली का कार्यक्रम न था।वंचित वर्ग से होने के कारण अपने लोगों के रोजमर्रे की लड़ाई में मैंने हमेशा अपनी इस पेशा का उपयोग यथासंभव किया तो इस पेशे से पुरस्कार या सम्मान,हैसियत वगैरह की उम्मीद न मेरे पिता को थी और न मेरे भाइयों को और न मेरी पत्नी को थी।हमारी जनपक्षरता अटूट है,यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

मेरे अपढ़ पिता जो तेभागा आंदोलन की पुरखों की विरासत मेरे कंदे पर छोड़कर तजिंदगी जुनूनी हद तक जनपक्षधरता का इकलौता काम करते रहे और मेरी तरह रोजी रोटी की परवाह नहीं करते थे,उनकी सीख यही थी कि हर स्तर पर आखिरी क्षण तक संवाद का सिलसिला जारी रहना चाहिए और प्रतिपक्ष अगर भाषा का संयम खो दें और निजी हमले पर उतर आये,जनपक्षधरता के लिए जनहित में लोकतांत्रिक बहस का माहौल हर सूरत में बनाया रखना जरुरी है।


इसके साथ ही उनने यह सीख भी हमें दी है कि अपनी जमीन हो या अपने लोग या जिनके साथ काम काज के सिलसिले में दोस्ती हो,या जनांदोलन के जो साथी हैं,उनसे रिश्ता उनकी करतूतों के बावजूद यथासंभव बनाये रखनी चाहिए और अगर जनपक्षधरता की कीमत पर ऐसे रिश्ते को बनाये रखने की नौबत आती है,तो वे रिश्ते खतम करके पीछे भी देखना मत।


कुंमाउनी संस्कृति में भी अपनापा का जो रसायन है,मेरी रचनाधर्मिता की और मेरी जनपक्षधरता की जमीन भी वही है।

सुमंत भट्टाचार्य होंगे बड़े पत्रकार,उनके जैसे या किसी भी ऐसे पत्रकार साहित्यकार के महान रचनाक्रम में मेरी दिलचस्पी नही है क्योंकि मैं हेैसियत और प्रतिष्ठा देखकर कुछ भी नही पढ़ता।


मैं शास्त्रीयता और शास्त्र का शिकार नहीं हूं।न व्याकरण का।भाषा हमारे लिए संवाद की अंनत नहीं है जो शुध पतंजलि और अशुध शूद्र नहीं है।


इसके बजाय आधे अधुरे अशुद्ध अधकचरे अशास्त्रीय कुछ भी,बुलेटिन,चिट्ठा,मंतव्य. परचा इत्यादि जो कुछ जनसंघर्ष और मेहनतकशों के जीवन आजीविका के लिए और उनके हकहकूक की लड़ाई में प्रासंगिक है,जो पीड़ितों,उत्पीड़ितों,वंचितों और सर्वहारा जनता की चीखें हैं,वे मेरे लिए अनिवार्य पाठ है और मैंने हमेशा रातदिन लगातार बिना व्यवधान 1973 से छात्रावस्था और पेशेवर नौकरी में भी इस कथ्य के लिए खुद को लाउडस्पीकर से ज्यादा कुछ कभी समझा नहीं है।यही मेरी औकात है।हैसियत है।

क्योंकि रचनाकर्म  मेरे लिए सामाजिक उत्पादन है और उसका आधार उत्पादन संबंध है तो उत्पादकों की दुनिया को उजाड़ने के हर उद्यम का विरोध करना और मेहनतकशों के हकहकूक के मोर्चे पर अंगद की तरह खड़ा होना मेरा अनिवार्य कार्यभार है।

सुमंत भट्टाचार्य की भाषा के बारे में और उनकी पत्रकारिता के बारे में भी जबसे वे जनसत्ता छोड़ गये,मुझे कुछ भी मालूम नहीं है।


चूंकि कविता कृष्णन मेहनतखशों के मोर्चे पर अत्यंत प्रतिबद्ध और अत्यंत सक्रिय कार्यकर्ता होने के साथ एक स्त्री भी है और मैं हर  हाल में पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री के पक्ष में हूं तो फ्रीसेक्स विवाद मेरा विषय और मेरी प्राथमिकता नहीं होने के बावजूद मैंने सुमंत का वाल देखा और अपने पुराने साथी को जनसत्ता की पुरानी भूमिका और भाषा के विपरीत जिस भाषा का प्रयोग एक स्त्री के विरुद्ध करते देखा,उससे मुझे गहरे सदमे का अहसास तो हुआ ही,इसके साथ ही कुमांउनी जड़ों पर कुठाराघात जैसा लगा।

प्रभाष काल में सती प्रथा समर्थक जनसत्ता के संपादकीय का विरोध जितना व्यापक हुआ,उस इतिहास को देखें तो आम पाठकों के नजरिये से भी स्त्री के विरुद्ध ऐसा आचरण न जनसत्ता,न उनके दिवंगत संपादक प्रभाष जोशी और न उनके किसी अनुयायी से  किसी को कोई उ्मीद रही हैं।


बहरहाल मैं प्रभाष जोशी का न अनुयायी रहा हूं और न उनका प्रिय पात्र।


उन्हीं प्रभाष जोशी के प्रिय जनसत्ता के पूर्व पत्रकार के इस आचरण से मौजूदा कारपोरेट पत्रकारों का जो स्त्री विरोधी चेहरा बेपर्दा हुआ,इस सिलसिले में मेरी टिप्पणी इसे रेखांकित करने की थी।

मैंन बाद में सुमंत से कहा भी कि देहमुक्ति को मैं स्त्री मुक्ति नहीं मानता और मेरे लिए स्त्री को पितृसत्ता से मुक्ति अनिवार्य कार्यभार लगता है जिसके बिना समता और सामाजिक न्याय असंभव है।


मैंन बाद में सुमंत से कहा भी कि नैतिकता और संस्कृति के बहाने स्त्री की अस्मिता पर कुठाराघात के मैं खिलाफ हूं और यौन स्वतंत्रता का मामला इतना जटिल है और इतना संवेदनशील है कि इसपर चलताउ मंतव्य नही किया जा सकता।मैं नहीं करता।


बल्कि बिना शर्त मैं नारीवाद और नारीवादियों का समर्थन करता हूं जो अनिवार्य है।इसलिए केसरियाकरण के बावजूद मैं तसलिमा नसरीन का समर्थन करता रहा हूं।

मैंने सुमंत से साफ साफ कहा कि मतभेद और वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न अलग है और विमर्श में विचार भिन्नता का स्पेस भी है।

इस देश की विविध और बहुलता की संस्कृति में तमाम मुद्दों पर वैचारिक मतभेद हो सकते हैं और उन पर लोकतांत्रिक संवाद हो सकता है और इसी लोकतंत्र के लिए हम निरंकुश फासिज्म की असहिष्णु सत्ता के विरोध में लामबंद है।लेकिन लोकतंत्र में विमर्श की भाषा भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

मैंन कहा कि इस मुद्दे पर तुम्हारा मतामत तो अभिव्यक्त हुआ ही नहीं है और तुम्हारी भाषा और मंत्वय से तुम जो भी कहना चाहते हो,उसके बजाये यह सरासर स्त्री विरुद्ध मामला बन गया है और शायद अब विमर्श की गुंजाइश नहीं है।

विमर्श की अनुपस्थिति अगर पत्रकारिता की उपलब्धि है और निरंकुश असहिष्णुता अगर वैचारिक मतभेद की लहलहाती फसल है तो अभिव्यक्ति का यह संकट मेरे लिए बेहद घातक है।

मैं स्त्री के पक्ष में हूं और मुझे इस सिलसिले में हस्तक्षेप करना ही था तो मैंने पत्रकारिता के बदले चरित्र को और उसके कारपोरेट मुक्तबाजारी तेवर को रेखांकित करना ही बेहतर माना है।

न मैं वेचारिक पंडित और मौलवी हूं और दार्शनिक और विद्वान ।हम अपने अनुभव और अपनी संवेदनाओं का बात इंसानियत के मुल्क पर खड़ा कर सकता है।कुछ और नहीं।हमारा कोई शिल्प या कोई दक्षता नहीं है।इसलिए मैं सृजन का दुस्साहस भी नहीं करता।पहले लिखता था लेकिन सामाजिक यथार्थ को संबोधित करना अब मेरा काम है।इसके अलावा मेरी कोई दूसरी प्रतिबद्धता नहीं है।

इसके साथ ही हम ऐसे मुद्दों और ऐसे व्यक्तियों को बहस का विषय बना दें तो निरकुंश फासिज्म के खिलाफ लड़ाई के लिए अनिवार्य गोलबंदी का फोकस नष्ट होता है और सत्तापक्ष,मुक्तबाजारी मस्तिष्क नियंत्रण और फासिज्म के सूचना आधिपात्य के तहत हम डायवर्ट होते हैं।


बजाय मेहनतकशों के हक हकूक के हम ऐसे मुद्दों पर बेमतलब बहस में उलझ जाये तो बुनियादी मुद्दों पर हमारी ल़ड़ाई भी फोकस और फ्रेम के बाहर हैं और रात दिन चौबीसों घंटे लाइव सर्वव्यापी मीडिया यही गैर मुद्दा बेमतलब मुद्दा फोकस कर रहा है।मीडिया से सारे अनिवार्य सवाल और मुद्दे गायब है तो हम भी वही करे,सवाल यह है।

इसीलिए मैंने यह लिखने की जुर्रत की कि सुमंत को बेवजह नायक या खलनायक बनाने की जरुरत नही है और हस्तक्षेप पर अमलेंदु ने त्तकाल यह टिप्पणी टांग दी तो हमारे अत्यंत प्रिय और प्रतिबद्ध मित्र  मुझे स्त्री विरोधी साबित करने लगे हैं।


स्त्री के पक्ष में लिखना ही काफी होता नहीं है ,पितृसत्ता के खिलाफ मोर्चाबंदी सड़क से संसद तक अनिवार्य है और इस सिलसिले में हिंदी और अंग्रेजी में लगातार स्पष्टीकरण के बावजूद कुछ मित्र मुझे सुमंत का वकील और स्त्रीविरोधी साबित करने पर आमादा हैं,तो आगे अपना पक्ष रखने का उत्रदायित्व मेरा नहीं है ।आप खुद इन चार दशकों की मेरी सक्रियता और रचनाधर्मिता के मद्देनजर मेरा जो भी मूल्यांकन करें, वह सर माथे।




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बुद्धाचे तत्त्वज्ञान चातुर्वर्ण्यव्यवस्था, जातीभेद नाकरते म्हणुन मला ते आवडते. बुद्धांनी केवळ जातीव्यवस्थेविरुद्ध हत्यार उपसले नाही, तर तर आपल्या संघात शुद्रातिशुद्रांना सन्मनाने जागा दिली. बौद्ध धम्म म्हणजे हिरे, माणिक, मोत्यांची खाण आहे. ही मी तुमच्यासाठीच शोधली आहेत यातील जवाहिरांचा मुक्त वापर करा. सागरामध्ये मिळाल्यावर ज्याप्रमाणे गंगा नदीचे पाणी ओळखणे अशक्य असते त्याचप्रमाणे बौद्ध धम्मात आपल्या जाती नष्ट होवुन सर्व समान होतात. असे सांगणारे एकच महापुरुष होत आणि ते म्हणजे भगवान बुद्ध. भारतालाच नव्हे तर सर्व जगाला सदाचार शिकविणारा पहिला महापुरुष भगवान बुद्ध होय. बुद्धाचा हा खरा मानवी धर्म आहे. बुद्धाने आपण ईश्वराचे अवतार आहोत असे केव्हाही व कोठेही सांगितले नाही. म्हणुनच बौद्धधम्म हा मानवधम्म आहे, मानवाच्या संपुर्ण विकासासाठी तो प्रयत्नशील आहे. तो आमच्यासारख्या आधुनिक व अद्ययावत असलेल्या प्रत्येक मनुष्याला पटकन पटु शकतो. बुद्धाची शिकवण अगदे साध्या व स्पष्ट शब्दात मांडलेली आहे. या धम्मामध्ये मनुष्यास पुर्ण वैयक्तिक स्वातंत्र्य दिले आहे व मानवतेला आणि सदसद्विवेक बुद्धीला पटतील त्याच ग

बुद्धाचे तत्त्वज्ञान चातुर्वर्ण्यव्यवस्था, जातीभेद नाकरते म्हणुन मला ते आवडते. बुद्धांनी केवळ जातीव्यवस्थेविरुद्ध हत्यार उपसले नाही, तर तर आपल्या संघात शुद्रातिशुद्रांना सन्मनाने जागा दिली. बौद्ध धम्म म्हणजे हिरे, माणिक, मोत्यांची खाण आहे. ही मी तुमच्यासाठीच शोधली आहेत यातील जवाहिरांचा मुक्त वापर करा. सागरामध्ये मिळाल्यावर ज्याप्रमाणे गंगा नदीचे पाणी ओळखणे अशक्य असते त्याचप्रमाणे बौद्ध धम्मात आपल्या जाती नष्ट होवुन सर्व समान होतात. असे सांगणारे एकच महापुरुष होत आणि ते म्हणजे भगवान बुद्ध. भारतालाच नव्हे तर सर्व जगाला सदाचार शिकविणारा पहिला महापुरुष भगवान बुद्ध होय. बुद्धाचा हा खरा मानवी धर्म आहे. बुद्धाने आपण ईश्वराचे अवतार आहोत असे केव्हाही व कोठेही सांगितले नाही. म्हणुनच बौद्धधम्म हा मानवधम्म आहे, मानवाच्या संपुर्ण विकासासाठी तो प्रयत्नशील आहे. तो आमच्यासारख्या आधुनिक व अद्ययावत असलेल्या प्रत्येक मनुष्याला पटकन पटु शकतो. बुद्धाची शिकवण अगदे साध्या व स्पष्ट शब्दात मांडलेली आहे. या धम्मामध्ये मनुष्यास पुर्ण वैयक्तिक स्वातंत्र्य दिले आहे व मानवतेला आणि सदसद्विवेक बुद्धीला पटतील त्याच गोष्टी ग्राह्य मानण्यात आल्याआहेत.
- डॉ बाबासाहेब आबेडकर



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दै. जनतेचा महानायक दशकपूर्ती सोहळा - आरोहण २०१६ दिनांक - २८ मे २०१६, सायं- ६ ते १० वाजेपर्यंत स्थळ - बेझनबाग मैदान इंदोरा, नागपूर आंबेडकरवादी स्वाभिमानी समाजधारणेसाठी दै. जनतेचा महानायकचे योगदान प्रमुख वक्ते- अमलेंदु उपाध्याय, संपादक, हस्तक्षेप, दिल्ली. पलाश बिस्वास, वरिष्ठ पत्रकार , एक्स्प्रेस वृत्तसमुह, कलकत्ता. डाॅ. भाऊ लोखंडे,ज्येष्ठ साहित्यिक व विचारवंत. नागपूर प्रा. रणजीत मेश्राम, ज्येष्ठ पत्रकार, साहित्यिक व विचारवंत, नागपूर कार्यक्रम अध्यक्ष - सुनील खोबरागडे, संपादक दै. जनतेचा महानायक निमंत्रक - दै. जनतेचा महानायक दशकपूर्ती सोहळा आयोजन समिती


दै. जनतेचा महानायक दशकपूर्ती सोहळा - आरोहण २०१६
दिनांक - २८ मे २०१६, सायं- ६ ते १० वाजेपर्यंत
स्थळ - बेझनबाग मैदान इंदोरा, नागपूर 
आंबेडकरवादी स्वाभिमानी समाजधारणेसाठी दै. जनतेचा महानायकचे योगदान
प्रमुख वक्ते- अमलेंदु उपाध्याय, संपादक, हस्तक्षेप, दिल्ली.
पलाश बिस्वास, वरिष्ठ पत्रकार , एक्स्प्रेस वृत्तसमुह, कलकत्ता.
डाॅ. भाऊ लोखंडे,ज्येष्ठ साहित्यिक व विचारवंत. नागपूर
प्रा. रणजीत मेश्राम, ज्येष्ठ पत्रकार, साहित्यिक व विचारवंत, नागपूर
कार्यक्रम अध्यक्ष - सुनील खोबरागडे, संपादक दै. जनतेचा महानायक
निमंत्रक - दै. जनतेचा महानायक दशकपूर्ती सोहळा आयोजन समिती


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Monday, May 23, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख बलात्कारी मानसिकता के लोगों से हम ‘भारत माता की जय’ कहना तो नहीं सीख सकते

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख बलात्कारी मानसिकता के लोगों से हम 'भारत माता की जय' कहना तो नहीं सीख सकते


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