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Thursday, February 16, 2012

बजट से पहले आर्थिक कवायद तेज,बिजली परियोजनाओं के साथ 31 मार्च तक फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट (एफएसए) करने का निर्देश कोल इंडिया को

बजट से पहले आर्थिक कवायद तेज,बिजली परियोजनाओं के साथ 31 मार्च तक फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट (एफएसए) करने का निर्देश कोल इंडिया को

ओएनजीसी में पांच फीसदी हिस्सेदारी के विनिवेश का भी निर्णय

उत्पादन में आई ऐतिहासिक गिरावट से उबरने को जूझ रही कोल इंडिया की मुश्किल बढ़ जाएगी।


मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

बजट से पहले आर्थिक कवायद तेज होगयी है। आर्थिक नीतियों में सुस्ती के आरोप को खारिज करने के लिहाज से प्रधानमंत्री ने सीधे हस्तक्षेप किया है, जिससे बाजार और निवेशकों को भारी प्रोत्साहन मिला है।

सरकार ने देश की सबसे बड़ी तेल उत्खनन कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) में 5 प्रतिशत हिस्सेदारी संस्थागत निवेशकों को बेचने का बुधवार को निर्णय किया। चालू वित्त वर्ष में 40,000 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के कुछ करीब पहुंचने की अंतिम कोशिश के तहत सरकार ने यह निर्णय किया है।कोयला आपूर्ति को लेकर पिछले कुछ समय से देश के बिजली उद्योग और कोल इंडिया के बीच चल रही खींचतान में उद्योग ने जीत हासिल की है। कोयले की उपलब्धता में आ रही अप्रत्याशित गिरावट पर कड़ा रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोल इंडिया को बिजली कंपनियों से किए गए पूरी आपूर्ति का वादा निभाने का निर्देश दिया है। हालांकि इस आदेश से बिजली कंपनियों के लिए 50,000 मेगावॉट बिजली के उत्पादन लक्ष्य तक पहुंचना मुमकिन हो सकेगा लेकिन उत्पादन में आई ऐतिहासिक गिरावट से उबरने को जूझ रही कोल इंडिया की मुश्किल बढ़ जाएगी।

टाटा पावर और अदाणी पावर जैसी बिजली उत्पादक कंपनियों के शेयरों में गुरुवार को खासी चमक देखी गई। हालांकि कोल इंडिया के शेयरों में गिरावट का रुख रहा। दरअसल, बुधवार को सरकार ने कोल इंडिया से कहा था कि खरीद करार के तहत वह बिजली कपंनियों को कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करे। बंबई स्टॉक एक्सेंचज में गुरुवार को टाटा पावर का शेयर 2.63 फीसदी चढ़कर 113.35 रुपये पर बंद हुआ। बुधवार को भी कंपनी का शेयर 5.9 फीसदी बढ़त पर बंद हुआ था।

पावर कंपनियों को बड़ी राहत मिली है। कोल इंडिया 31 मार्च तक 20 साल के लिए पावर कंपनियों की जरूरत का 80 फीसदी कोयला सप्लाई करने का करार करेगी।अगर कोल इंडिया 80 फीसदी से कम कोयले की सप्लाई करती है, तो कंपनी पर जुर्माना लगेगा। हालांकि, कोल इंडिया को कोयला आयात करने की छूट दी गई है। आयातित कोयले की ज्यादा कीमत पावर कंपनियों को देनी होगी।


एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स के डीजी, अशोक खुराना का कहना है कि इस फैसला का सबसे ज्यादा फायदा 5,000 मेगावॉट से ज्यादा क्षमता वाले पावर प्लांट को होगा।


प्रधानमंत्री द्वारा पावर सेक्टर की दिक्कतों पर बनाई गई कमेटी ने फैसला किया है कि 30 दिसंबर 2011 तक जो पावर प्लांट बन चुके हैं, उनके साथ कोल इंडिया को फ्यूल सप्लाई अग्रीमेंट करना होगा।


साथ ही, जो प्लांट 31 मार्च 2015 तक तैयार होंगे और पावर परचेज अग्रीमेंट कर चुके हैं, उन प्लांट के साथ भी कोल इंडिया को फ्यूल सप्लाई अग्रीमेंट करना होगा।



वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाला मंत्रियों का अधिकार प्राप्त समूह ने ओएनजीसी में नीलामी बिक्री के जरिये शेयर बेचे जाने का निर्णय किया, वहीं भेल में विनिवेश के निर्णय को अगले वित्त वर्ष के लिये टाल दिया गया।

ईजीओएम में भाग लेने वाले मंत्रियों ने कीमत संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर विनिवेश के समय के बारे में कुछ नहीं कहा। आरक्षित मूल्य एवं समय के बारे में निर्णय करने के लिये मंत्री समूह की जल्दी ही बैठक होगी।

बहरहाल, ओएनजीसी में हिस्सेदारी बिक्री से सरकार को 31 मार्च तक 40,000 करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी विनिवेश लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद नहीं मिलेगी। विनिवेश सचिव मोहम्मद हलीम खान ने कहा कि बजट लक्ष्य को हासिल करना अब लगभग असंभव है।

ओएनजीसी में नीलामी मार्ग के जरिये 5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर सरकार 12,000 करोड़ रुपये तक जुटा सकती है। इसके अलावा पावर फाइनेंस कारपोरेशन में विनिवेश से 1,145 करोड़ रुपये प्राप्त किये जा चुके हैं। ऐसे में कुल मिलाकर सरकार 13,000 करोड़ रुपये ही चालू वित्त वर्ष में प्राप्त कर सकती है। इसके अलावा नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन में आईपीओ के जरिये करीब 250 करोड़ रुपये प्राप्त हो सकते हैं।

ओएऩजीसी का विनिवेश जहां आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया में बजट के बाद तेजी लाने का​ ​ संकेत है। वहीं कोयलाखानों से आपूर्ति सुनिश्चत करके बिजली उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है। दूर संचार की नयी नाति भी निवेशकों को खुश करने की कोशिश है।अर्थव्यवस्था की चाल सुस्त होने संबंधी व्यापार जगत की तोहमतों के बाद संप्रग सरकार ने नीतियों को बदलने और रफ्तार देने का काम शुरू कर दिया है। इसी क्रम में विभिन्न मंत्रालयों ने बुधवार को आर्थिक मोर्चे पर कई कदम उठाने का ऐलान किया। इनमें मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों को ज्यादा स्पेक्ट्रम रखने,संचार सेवाओं के लिए एक लाइसेंस की नीति, बिजली क्षेत्र के लिए कोयला खानों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने और अरुणाचल प्रदेश में पनबिजली परियोजना को पर्यावरण मंजूरी का फैसला शामिल हैं। इतना ही नहीं, सरकार ने ओएनजीसी में पांच फीसदी हिस्सेदारी के विनिवेश का भी निर्णय लिया है।

सामान्य करदाताओं के लिए आज का दिन काफी महत्वपूर्ण होने जा रहा है क्योंकि आज संसदीय समिति की एक बैठक में कर छूट की सीमा को तीन लाख करने पर विचार किया जा सकता है। डीटीसी की विस्तृत रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए वित्त मामलों की स्थायी समिति एक बैठक करेगी जिसमें आयकर छूट सीमा 3 लाख तक बढ़ाए जाने पर फैसला लिया जा सकता है।


भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता में पिछले हफ्ते स्थायी समिति की बैठक हुई थी लेकिन कुछ मुद्दो को लेकर एक राय नहीं बन पाई थी। लेकिन माना जा रहा है कि स्थायी समिति अपनी रिपोर्ट 12 मार्च से शुरु होने वाले बजट सत्र से पहले ही सौंप देगी।



प्रधानमंत्री की तरफ से गठित सचिव स्तरीय समिति ने 31 दिसंबर, 2011 तक स्थापित हो चुकी बिजली परियोजनाओं के साथ आगामी 31 मार्च तक फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट (एफएसए) करने का निर्देश कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) को दिया है। निर्देश के मुताबिक सीआईएल उन परियोजनाओं के साथ भी कोयला आपूर्ति के लिए एफएसए करेगी जिन्होंने बिजली वितरण कंपनियों के साथ लंबे समय के लिए पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) कर लिया है और जो 31 मार्च, 2015 तक स्थापित हो जाएंगी।


मालूम हो कि एफएसए करने के बाद सीआईएल वैधानिक रूप से बिजली परियोजनाओं को कोयला आपूर्ति के लिए बाध्य हो जाती है।


प्रधानमंत्री कार्यालय ने बयान में कहा, 'आश्वस्ति पत्र में उल्लिखित कोयले की पूरी मात्रा की आपूर्ति के लिए करार होंगे, जिसकी अवधि 20 साल होगी।' कंपनी को अनिवार्य रूप से देसी बाजार में कोयले की मांग पूरी करने के लिए कहा गया है, भले ही इसके लिए उसे विदेश में भी विकल्प खंगालने पड़ें। यह ऐसा कदम है, जिसका विरोध पिछले एक साल से कंपनी के साथ कोयला मंत्रालय भी कर रहा है।


गौरतलब है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया (सीआईएल) का एकीकृत शुद्ध लाभ चालू वित्त वर्ष 2011-12 की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में 54 प्रतिशत बढ़कर 4,037.7 करोड़ रुपये रहा। बिक्री में सुधार से कंपनी के लाभ में वृद्धि हुई। इससे पूर्व वित्त वर्ष की इसी तिमाही में कंपनी का एकीकृत शुद्ध लाभ 2,621.5 करोड़ रुपये था।

आलोच्य तिमाही में कंपनी की एकीकृत कुल आय 17,205.1 करोड़ रुपये रही जो इससे पूर्व वित्त वर्ष की इसी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर) में 13,937.4 करोड़ रुपये थी।

कोल इंडिया की चेयरमैन और प्रबंध निदेशक जोहरा चटर्जी ने  कहा, कोल इंडिया के प्रदर्शन से मैं बहुत खुश हूं। सार्वजनिक उपक्रम और उंचाई पर ले जाने के लिये हर संभव प्रयास करूंगी। एकल आधार पर कंपनी का शुद्ध लाभ दिसंबर तिमाही में 957 प्रतिशत बढ़कर 1,219.33 करोड़ रुपये रहा जो इससे पूर्व वित्त वर्ष की इसी तिमाही में 115.3 करोड़ रुपये था।

एकल आधार पर कंपनी की कुल आय आलोच्य तिमाही में बढ़कर 1,566 करोड़ रुपये रही जो इससे पूर्व वित्त वर्ष की इसी तिमाही में 400.5 करोड़ रुपये रही।


पिछले महीने बिजली उद्योग के प्रतिनिधियों की प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद सचिवों की समिति का गठन किया गया था। टाटा पावर के चेयरमैन रतन टाटा, लैंको इन्फ्राटेक के चेयरमैन एल मधुसूदन राव, रिलायंस पावर के चेयरमैन अनिल अंबानी और जिंदल पावर के नवीन जिंदल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। कोल इंडिया ग्राहकों के साथ पहले आश्वस्ति पत्र पर हस्ताक्षर करती है। ग्राहकों द्वारा समयसीमा में परियोजना विकसित करने की शर्त पूरी होने पर यह पत्र ईंधन आपूर्ति करार में तब्दील हो जाता है। अभी तक कोल इंडिया ने सभी आश्वस्ति पत्र 90 फीसदी के ट्रिगर स्तर पर ही किए हैं। इसका मतलब है कि अगर कंपनी 90 फीसदी से कम कोयला आपूर्ति करती है, तो उस पर जुर्माना लगेगा और अगर इससे ज्यादा आपूर्ति करती है, तो उसे फायदा दिया जाएगा। लेकिन हाल में कंपनी ने 50 फीसदी ट्रिगर स्तर पर करार करने शुरू किए हैं।


मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति पर फैसला लंबित होने के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला का आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए सरकार ने घरेलू संगठित क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने राज्यों से कृषि आपूर्ति श्रृंखला में बड़े उद्योगों के निवेश को प्रोत्साहित करने की अपील की। साथ ही जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों की मार्केटिंग, परिवहन और भंडारण सुविधाओं में निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री बुधवार को कृषि क्षेत्र पर राष्ट्रपति द्वारा आयोजित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। इसमें 20 राज्यों के राज्यपाल, आठ केंद्रीय मंत्री और पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की। मनमोहन व प्रणब दोनों ने कहा कि रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी को अनुमति मिलने से पहले घरेलू निवेशकों को मजबूत बनाने की जरूरत है।


वित्त मंत्री ने राज्यों से कहा कि मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में विदेशी निवेश की अनुमति मिलने के बाद भी वे खाद्य उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला में घरेलू संगठित क्षेत्र को प्रोत्साहित करें। रिटेल कारोबार में पर्याप्त संभावनाएं हैं। मुखर्जी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए कृषि क्षेत्र में सतत वृद्धि के साथ-साथ इसे अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की भी आवश्यकता है। बंपर कृषि पैदावार पर प्रधानमंत्री ने कहा कि किसानों ने देश का सिर ऊंचा किया है। चालू फसल वर्ष में भी 25 करोड़ टन से अधिक खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान है। बागवानी और पशु उत्पादों की बढ़ी मांग को देखते हुए इसे और प्रोत्साहित करने की जरूरत है।



प्रधानमंत्री के निर्देश पर पीएमओ के प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी के नेतृत्व में गठित सचिव स्तरीय समिति के इस फैसले से 50,000 मेगावाट से अधिक क्षमता की विभिन्न बिजली परियोजनाओं को राहत मिलने की संभावना है।


पीएमओ से प्राप्त जानकारी के मुताबिक यह एफएसए 20 साल के लिए होगा और परियोजनाओं को कोयला लिंकेज के लिए जारी लेटर आफ एश्योरेंस (एलओए) के मुताबिक ही एफएसए किया जाएगा। गत 18 जनवरी को प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर (एपीपी) ने कहा था कि सीआईएल बिजली परियोजनाओं की जरूरत के सिर्फ 50 फीसदी कोयले की आपूर्ति के लिए एफएसए करना चाहती है जिस कारण मार्च, 2009 के बाद किसी भी परियोजना के साथ एफएसए नहीं किया गया है।


सचिव स्तरीय समिति ने अपने निर्देश में यह भी कहा है कि सीआईएल अगर अपने उत्पादन से एफएसए के तहत कोयले की पूर्ण आपूर्ति नहीं कर पाती है तो उसे आयात करके या अन्य सार्वजनिक उपक्रम को आवंटित कोयला ब्लॉक से उन परियोजनाओं के लिए कोयले की व्यवस्था करनी होगी। इन सभी निर्देशों को प्रधानमंत्री ने भी अपनी मंजूरी दे दी है।


पीएमओ के मुताबिक इस फैसले से बिजली परियोजनाओं के प्रति निवेशकों का भरोसा बहाल होगा और 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बिजली उत्पादन क्षमता में विस्तार के तय लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर के लक्ष्य को भी पाने में मदद मिलेगी।


कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री की ओर से जारी निर्देश मंत्रालय को मिल गया है और इस संबंध में पूरी तैयारी की जा रही है।


दरअसल, बिजली परियोजनाओं के साथ एफएसए नहीं होने से इन परियोजनाओं के लिए कर्ज मुहैया कराने वाले बैंकों का भरोसा उनके प्रति कम हो रहा था। एपीपी इस बात की भी आशंका जाहिर कर चुकी है कि इस दिशा में जल्द कार्रवाई नहीं होने पर बड़ी संख्या में बिजली परियोजनाएं डिफॉल्टर हो सकती हैं और नई बिजली परियोजनाओं को बैंकों से कर्ज लेना काफी मुश्किल होगा।

पीएम के कुछ अहम फैसले
1. सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा मुहैया कराने की पहल। पीएमओ के समर्थन से स्वास्थ्य मंत्रालय ने तैयार की 30 हजार करोड़ की मुफ्त दवा योजना
2. राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को शहरी इलाकों में विस्तार देने की पहल
3. श्रम कानूनों को मजबूत और तर्कसंगत बनाने की खातिर फैक्ट्री एक्ट में संशोधन की तैयारी। वर्ष 1987 के बाद से कोई संशोधन नहीं
4. कृषि उत्पादन पर बने वर्किंग ग्रुप की सिफारिशों को मंजूरी। कृषि लोन पर ब्याज कम करने और कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने की कोशिश  
5. राजमार्गों को विस्तार देने की पहल। प्रतिदिन 21 किलोमीटर के निर्माण की योजना  
6. 3300 किमी लंबे डेडिकेटेड फे्रट कॉरिडोर को तीव्र गति से पूरा करने की पहल। सितंबर 2012 तक पहले चरण को अंजाम देने की तैयारी
7. चीनी को नियंत्रण मुक्त करने की खातिर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन की अगुवाई में विशेषज्ञ कमेटी गठित  
8. कोयला, अनाज, दवाओं आदि की ढुलाई में बेहतर संभावनाएं ढूंढने को आंतरिक जलमार्ग परिवहन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ाने की तैयारी  
9. फार्मा सेक्टर में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन
10. गैस व तेल क्षेत्र में शोधन को बढ़ावा देने की पहल

ओएनजीसी के विनिवेश का फैसला

ओएनजीसी में 5 फीसदी हिस्सा ऑक्शन के जरिए बेचा जाएगा।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक उपक्रम ओएनजीसी के विनिवेश का फैसला कर निवेशकों को खुश कर दिया है। सरकारी क्षेत्र की ऑयल कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) के लिए ब्रोकरों के दांवपेंच भी शुरू हो चुके हैं।


ईजीओएम ने ऑक्शन के जरिए ओएनजीसी के 5 फीसदी हिस्से को बेचने की मंजूरी दी है। वहीं बीएचईएल के विनिवेश पर फैसला नहीं हुआ है।वहीं ईजीओएम ने कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए सभी एफपीओ के लिए ऑक्शन के जरिए विनिवेश को मंजूरी दी है।


पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी का कहना है कि ईजीओएम नेओएनजीसी के विनिवेश को हरी झंडी दिखा दी है। ईजीओएम ने ऑक्शन के जरिए ओएनजीसी के विनिवेश को मंजूरी दी है। ऑक्शन के जरिए ओएनजीसी के विनिवेश मसले पर ईजीओएम की जल्द दोबारा बैठक होगी।


जयपाल रेड्डी के मुताबिक अगली ईजीओएम की बैठक में ओएनजीसी और बीएचईएल के विनिवेश की तारीख का फैसला किया जाएगा। वहीं अब ईजीओएम की मंजूरी के बाद ओएनजीसी के विनिवेश के लिए कैबिनेट की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। ओएनजीसी में 5 फीसदी हिस्सा ऑक्शन के जरिए बेचा जाएगा। वहीं बीएचईएल के एफपीओ को भी ईजीओएम ने सैद्धांतिक मंजूरी दी है।


भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल के मुताबिक ईजीओएम की बैठक मेंबीएचईएल के विनिवेश पर फैसला टल गया है।


प्रफुल्ल पटेल का कहना है कि बाजार की हालात ठीक नहीं होने की वजह से बीएचईएल के विनिवेश का फैसला टालना पड़ा है। ऐसे में वित्त वर्ष 2013 में ही बीएचईएल का विनिवेश हो सकता है।


विनिवेश सचिव का कहना है कि ईजीओएम ने कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए सभी एफपीओ के लिए ऑक्शन के जरिए विनिवेश को मंजूरी दी है जिसमें सेल का विनिवेश का भी शामिल है। हालांकि वित्त वर्ष 2012 में विनिवेश के जरिए 40,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है।



इस बारे में बाजार के एक अग्रणी ब्रोकर का कहना है कि पिछले दो महीनों में जिस तरह से बांबे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का सेंसेक्स 2,000 अंक से  ऊपर की बढ़त हासिल कर चुका है, और शेयरों का मूल्यांकन काफी ऊंचा हो गया है। ऐसे में इन निवेशकों को हम यही सलाह दे रहे हैं कि वे इन शेयरों में मुनाफा वसूली करके ओएनजीसी के शेयरों के लिए पैसे रख लें।


सीएनआई रिसर्च के चेयरमैन किशोर ओस्तवाल कहते हैं कि इस महीने एमसीएक्स का आईपीओ आना है और उसी के बाद ओएनजीसी का फॉलोऑन पब्लिक ऑफर आने की उम्मीद है। निवेशकों के लिए अच्छा मौका है। उनका कहना है कि बाजार यहां से नीचे नहीं  जाएगा, बल्कि वह इसे आधार बना लेगा और ओएनजीसी के आने के बाद बाजार और ज्यादा बढ़त हासिल कर लेगा।


प्राइम डाटाबेस के सीएमडी पृथ्वी हल्दिया का कहना है कि ओएनजीसी के ऑक्शन से ही सरकार के विनिवेश की राह तय हो पाएगी। लेकिन अगर ओएनजीसी के ऑक्शन को ज्यादा प्रतिसाद नहीं मिल पाया तो सरकार दोबारा ऑक्शन का प्रस्ताव रख सकती है।


पृथ्वी हल्दिया के मुताबिक एफपीओ की बजाय ऑक्शन का रास्ता विनिवेश के लिए बेहतर साबित हो सकता है। रिटेल निवेशकों की ऑक्शन में ज्यादा हिस्सेदारी बढ़ने की उम्मीद है। ऑक्शन के तहत शेयरों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे लिक्विडिटी में बढ़ोतरी हो सकती है।


पृथ्वी हल्दिया ने ओएनजीसी के लिए 300 रुपये प्रति शेयर के फ्लोर प्राइस का सुझाव दिया है। वहीं ऑक्शन की वजह से निवेशकों को शेयरों में मौजूदा भाव से ज्यादा भाव मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। ऐसे में पेंशन फंडों के ऑक्शन में शामिल होने के आसार हैं।



उधर दूसरी ओर जीवन बीमा कंपनी एलआईसी और देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक भी ओएनजीसी के एफपीओ को सफल बनाने के लिए कमर कस चुका है। यह दोनों बड़े बाजार के निवेशक ओएनजीसी के लिए अच्छी खासी रकम डालेंगे ताकि सरकार का यह एफपीओ अच्छी तरह से सफल हो।


नई दूरसंचार नीति


केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने प्रस्तावित नई दूरसंचार नीति के कुछ हिस्सों की घोषणा करते हुए कहा, जीएसएम सेवाएं दे रहे आपरेटरों के लिए सभी सेवा क्षेत्रों में 2जी स्पेक्ट्रम की अधिकतम सीमा 6.2 से बढ़कर आठ मेगाह‌र्ट्ज होगी। दिल्ली-मुंबई के लिए यह सीमा 10 मेगाह‌र्ट्ज निर्धारित की जाएगी। जिनके पास तय सीमा से ज्यादा स्पेक्ट्रम है उन्हें वो वापस करना होगा। हालांकि कंपनियां खुले बाजार से अधिक फ्रीक्वेंसी हासिल करने को स्वतंत्र होंगी, लेकिन ऐसे में स्पेक्ट्रम की नीलामी होनी चाहिए और यह लाइसेंस के विलय के लिए तय सीमा पर निर्भर है। कंपनियों को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के लिए एकमुश्त शुल्क देना होगा, पर अभी यह साफ नहीं है कि शुल्क नई निर्धारित सीमा से अधिक होगा या नहीं। सिब्बल ने कहा, सेवा एवं सर्किलों के लिए समायोजित सकल आय पर आठ फीसदी की दर से समान लाइसेंस फीस लगाने का प्रस्ताव है। फिलहाल यह छह से आठ प्रतिशत के बीच है। उन्होंने कहा, कंपनियों का लाइसेंस नवीनीकरण 10 साल के लिए किया जाएगा। सीडीएमए कंपनियों के लिए अधिकतम 2जी स्पेक्ट्रम की सीमा पांच मेगाह‌र्ट्ज बनाए रखी गई है।

दूरसंचार नीति में हुए बदलावों के मुताबिक नई एकीकृत लाइसेंस व्यवस्था में जाने के लिए कंपनियों को प्रवेश शुल्क देना होगा। महानगरों तथा ए सर्किल के लिए यह दो करोड़ तथा बी तथा सी सर्किल के लिए यह क्रमश: एक करोड़ रुपये तथा 50 लाख रुपये होगा। सिब्बल ने कहा, विलय में शामिल कंपनियों का सम्मिलित हिस्सा 35 प्रतिशत तक रहने पर ही इसकी अनुमति होगी। इस मुद्दे पर दूरसंचार नियामक (ट्राई) से दिशा निर्देश बनाने को कहा गया है। मंत्रालय उसके बाद ही इस पर अंतिम निर्णय करेगा। नई नीति में एक ही सर्किल में कंपनियों को एक दूसरे के साथ 2जी स्पेक्ट्रम के लेन देन की छूट होगी। यह पूछे जाने पर कि आज की घोषणा से ग्राहकों को क्या फायदा होगा, केंद्रीय मंत्री ने कहा, स्पेक्ट्रम के बेहतर उपयोग के कारण उन्हें सस्ती दर पर अच्छी सेवा मिलेगी।

एक अन्य अहम निर्णय में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने पारिस्थितिकीय चिंताओं को छोड़ अरुणाचल प्रदेश में लोहित नदी पर 1,750 मेगावाट जलविद्युत परियोजना को हरी झंडी दे दी। राष्ट्रीय विनिर्माण नीति को बढ़ावा देते हुए सरकार ने घोषणा की है कि इस नीति के तहत प्रस्तावित मेगा औद्योगिक परिसरों में स्थित इकाइयों को पर्यावरण मंजूरी देने के मामले में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित अधिकार संपन्न मंत्री समूह की बैठक में ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी ओएनजीसी में सरकार की पांच फीसदी हिस्सेदारी के विनिवेश का भी निर्णय ले लिया गया। शेयरों की बिक्री नीलामी के जरिए की जाएगी। मंत्री समूह के इस फैसले से सरकार को विनिवेश के जरिए 12,000 करोड़ रुपए जुटाने में मदद मिलेगी। वहीं, पीएमओ के इशारे पर कोल इंडिया लिमिटेड ने कहा है कि वह दिसंबर 2011 तक चालू बिजली परियोजनाओं के लिए मार्च अंत तक कोयला आपूर्ति का समझौता कर देगा। इससे सरकारी क्षेत्र के तहत आने वाले कोयला उद्योग और निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा तैयार बिजली परियोजनाओं के बीच कोयला आपूर्ति को लेकर चल रही खींचतान दूर होने की उम्मीद बढ़ गई है। प्रधानमंत्री ने मामले में गौर करने के लिए सचिवों की एक समिति गठित की थी।

इक्विटीज मार्केट में एक बार फिर रौनक

पिछले कुछ समय के दौरान सुस्त पड़े इक्विटीज मार्केट में एक बार फिर रौनक दिखने लगी है। इस एसेट क्लास में दुनियाभर के निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत होता दिख रहा है। एक हालिया सर्वे में खुलासा हुआ है कि उभरते बाजारों की इक्विटीज में दुनियाभर के निवेशकों की तरफ से की जा रही निवेश की मात्रा आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रही है।


बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच द्वारा फरवरी, २०१२ में फंड मैनेजर्स पर किए गए सर्वे में खुलासा हुआ है कि इस दौरान २६ फीसदी निवेशकों ने इक्विटीज में निवेश किया है। पिछले महीने यही आंकड़ा महज १२ फीसदी था। सर्वे के मुताबिक बाजार की सुधरती हालत तथा आर्थिक विकास के मोर्चे पर उम्मीदों की मजबूती ने निवेशकों में यह भरोसा लौटाया है।


क्या कहता है सर्वे

ग्लोबल निवेशक दुनियाभर के किसी भी अन्य क्षेत्र के मुकाबले उभरते बाजारों को दे रहे ज्यादा तरजीह

फरवरी, २०१२ में अब तक के दौरान दुनियाभर के एसेट एलोकेटर्स ने इक्विटीज में किया २० फीसदी निवेश

वर्ष २०११ की शुरुआत से अब तक किसी एक महीने में इक्विटी बाजार में यह सबसे बड़ा निवेश

करीब ८६ फीसदी निवेशक मानते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था की 'सॉफ्ट लैंडिंग' होगी

यूरोप के बारे में ग्लोबल निवेशकों के मूड में होता दिख रहा है सकारात्मक सुधार

ग्लोबल निवेशकों की नजर में फिलहाल जापान बन गया है यूरोजोन से भी कम पसंद किया जाने वाला बाजार


इस सर्वे के नतीजों पर टिप्पणी करते हुए बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ग्लोबल रिसर्च के मुख्य ग्लोबल इक्विटी स्ट्रैटजिस्ट माइकल हार्टनेट कहते हैं कि पिछले कुछ समय में बाजार में तरलता की हालत सुधरी है। इस वजह से इक्विटी मार्केट में निवेश की मात्रा बढ़ी है। उनके मुताबिक इससे यह भी स्पष्ट हो रहा है कि इकनॉमिक सेंटीमेंट्स भी सुधर रहे हैं।


सर्वे के मुताबिक वर्ष २०११ की शुरुआत से अब तक किसी एक महीने में इक्विटी बाजार में यह सबसे बड़ा निवेश है। इसमें उभरते बाजारों की इक्विटीज ने दुनियाभर के निवेशकों को आकर्षित करने में खासी सफलता पाई है। सर्वे में कहा गया है कि इस महीने में ४४ फीसदी एसेट एलोकेटर्स ने उभरते बाजारों पर अपना जोर बनाए रखा। जनवरी, २०१२ में यही आंकड़ा महज २० फीसदी था।


चीन की अर्थव्यवस्था पर दुनियाभर के निवेशकों का भरोसा बना हुआ है। करीब ८६ फीसदी निवेशक मानते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था धम्म से नीचे की तरफ नहीं जा रही है, बल्कि बल्कि उसकी 'सॉफ्ट लैंडिंग' होगी। वहीं, करीब ३६ फीसदी ग्लोबल निवेशकों ने कहा है कि वे दुनियाभर के किसी भी अन्य क्षेत्र के मुकाबले उभरते बाजारों को ज्यादा तरजीह देते हैं।


रिपोर्ट के मुताबिक दिलचस्प तथ्य यह है कि निवेशकों ने उभरते बाजारों के मुकाबले तरजीह नहीं देने वाले क्षेत्रों में अमेरिका का नाम भी शामिल किया। हालांकि यूरोप के बारे में ग्लोबल निवेशकों के मूड में सकारात्मक सुधार होता दिख रहा है। जनवरी, २०१२ के सर्वे में यूरोप के बारे में ग्लोबल निवेशकों के विचार अच्छे नहीं थे।


उस दौरान ५० फीसदी निवेशकों ने यूरोपीय बैंकों को तरजीह नहीं देने की बात की थी। लेकिन फरवरी, २०१२ में यह आंकड़ा घटकर १२ फीसदी रह गया, जो यूरोप के लिए अच्छी बात है।


पिछले कुछ समय तक जापान दुनियाभर के निवेशकों के लिए पसंदीदा निवेश डेस्टिनेशन बना हुआ था। लेकिन इस समय जापान के बाजार से निवेशकों का भरोसा कम होता दिखाई दे रहा है। सर्वे के मुताबिक जापान के इक्विटी मार्केट की तरफ ग्लोबल निवेशक अभी बेहद सधे कदमों से चल रहे हैं। हालत यह है कि ग्लोबल निवेशकों की नजर में अभी जापान यूरोजोन से भी कम पसंद किया जाने वाला बाजार बन गया है।


हालांकि सर्वे में शामिल जापान के उत्तरदाताओं में से ८१ फीसदी यह मानते हैं कि आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था में खासा सुधार होगा। पिछले महीने के सर्वे में महज ४७ फीसदी जापानी उत्तरदाता आने वाले समय में अपने देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती के प्रति आश्वस्त दिख रहे थे।


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Palash Biswas
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Fwd: CC News Letter, 16 Feb - Shocking News Of Human Sacrifice



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From: Countercurrents <editor@countercurrents.org>
Date: Thu, Feb 16, 2012 at 10:00 PM
Subject: CC News Letter, 16 Feb - Shocking News Of Human Sacrifice
To: palashbiswaskl@gmail.com



Dear Friend,

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 In Solidarity
 Binu Mathew, Editor,
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 Educate! Organize! Agitate!


 Shocking News Of Human Sacrifice
 By Narabail Virodi Vedike

http://www.countercurrents.org/nvv160212.htm

A 17 year old dalit boy , Basavaraja Kadimani was sacrificed to set right Vastu Dosha (Inauspicious faults and shortcomings in a building) of a house at Thirumaladevara Koppa in Ranebennuru taluk of Haveri district of Karnataka State, India


Israeli Embassies Attacked: Whose Vengeance And Unholy Wars Are These?
 By Farzana Versey

http://www.countercurrents.org/versey160212.htm

The question is not whether global terror is being fought on Indian soil but how much of it is being arranged here. If it is legitimate to ask about the role of local handlers, then why has there been no concern about the incident of a planned vengeance by Israelis?


Exposing The Irsraeli-Mossad False Flag Terror Attacks In New Delhi, Tbilisi And Bangkok
 By Feroze Mithiborwala

http://www.countercurrents.org/mithiborwala160212.htm

A war is on the horizon . . .we are heading towards WWIII & now India is being prepared to fight that war on the side of the Imperial-Zionist powers


The Secret, Corporate-Funded Plan To Teach Children That Climate Change Is A Hoax
 By Brad Johnson

http://www.countercurrents.org/johnson160212.htm

Heartland Institute, a right-wing think tank funded by the Koch brothers, Microsoft, and other top corporations, is planning to develop a "global warming curriculum" for elementary schoolchildren that presents climate science as "a major scientific controversy." This effort, at a cost of $100,000 a year, will be developed by Dr. David E. Wojick, a coal-industry consultant


American Decline In Perspective
 By Noam Chomsky

http://www.countercurrents.org/chomsky160212.htm

While the principles of imperial domination have undergone little change, the capacity to implement them has markedly declined as power has become more broadly distributed in a diversifying world. Consequences are many. It is, however, very important to bear in mind that -- unfortunately -- none lifts the two dark clouds that hover over all consideration of global order: nuclear war and environmental catastrophe, both literally threatening the decent survival of the species


The Nature Of Empire
 By John Michael Greer

http://www.countercurrents.org/greer160212.htm

The twilight of cheap abundant energy is in many ways the dominant theme of global politics in our time, but another factor is coming to play an important role as well -- the waning of America's global empire


BDS: Power Of The People At Work
 By Ramzy Baroud

http://www.countercurrents.org/baroud160212.htm

The outpouring of support for BDS initiatives was hardly done at the behest of any individual or group. Rather it was a response to a call made by 171 Palestinian civil society organizations in July 2005


The Struggle For Leadership Within "Leaderless" Occupy
 By Mark Vorpahl

http://www.countercurrents.org/vorpahl160212.htm

It is without doubt that the capitalist crisis is creating the conditions for a great social movement to emerge. What is at stake for Occupy is whether it will spearhead this development or be left as a predecessor of it that veered off into a dead end before realizing its promise


The Most Colossal Failure of Nerve in Human History
 By Steven Earl Salmony

http://www.countercurrents.org/salmony160212.htm

By 'kicking all cans down the road' and confronting no present dangers, perhaps the human community is about to come face to face with the worst of two worlds: the results of a human population explosion and a human population crash


Off-the-Grid vs. Tighter Grid
 By Peter Goodchild

http://www.countercurrents.org/goodchild160212.htm

Whether you believe in "off-the-grid" or "tighter grid," to use Michael Braun's terms -- raising chickens in the country vs. finding a room in a downtown core -- depends on your view of Collapse


Zionist Invaders Celebrate Other Invaders of Palestine
 By Salim Nazzal

http://www.countercurrents.org/nazzal160212.htm

Of course Zionists can do what they like as they have the power to impose facts on the ground, but it is extremely doubtful whether this would make them any better than other invaders of Palestine


Sri Lankan Diaspora Cosmetic Failure Is Actually A Cosmic Failure
 By Janani Paramsothy

http://www.countercurrents.org/paramsothy160212.htm

It is the 'Sri Lankan' Diaspora who is now walking forwards into potentially dangerous territory with blindfolds stubbornly on. They, like the make-up artist in our battered woman example, have a responsibility to highlight to the world what is actually happening. Not what they wish would be happening if we were all living in a utopian fairy-tale world. This whole thing is a doomed to fail exercise from the start. Time they learnt that hard truth and started living up to their responsibility for the on-going devastation in the Tamil Homeland


On SIT's Clean Chit
 By R B Sreekumar

http://www.countercurrents.org/sreekumar160212.htm

Riot victims feel that SIT had used tools of skill, discernment and caution, available to them for collection, collation, analysis and submission of evidence to the Court in favour of the perpetrators of various crimes in 2002 riots. Will Judiciary be able to sift through the materials before it and adjudicate to deliver long-delayed justice to "the wretched of the earth", who bore the brunt of 2002 man-made communal holocaust? World at large is waiting for the D day


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Fwd: [BAMCEF & Buddhist] घटना बुधवार को तब घटी जब उस युवक को प्यास लगी और...



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From: Mulnivasi Boy Sumit <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: 2012/2/16
Subject: [BAMCEF & Buddhist] घटना बुधवार को तब घटी जब उस युवक को प्यास लगी और...
To: BAMCEF & Buddhist <332149346829942@groups.facebook.com>


Mulnivasi Boy Sumit posted in BAMCEF & Buddhist.
घटना बुधवार को तब घटी जब उस युवक को प्यास लगी...
Mulnivasi Boy Sumit 10:02pm Feb 16
घटना बुधवार को तब घटी जब उस युवक को प्यास लगी और वह वहीं रखे मटके से पानी पीने गया. इसी दौरान एक युवक उसके पास आया और राजेश से उसकी जाति पूछी, युवक द्वारा हरिजन बताते ही उसने दरांते से उसका हाथ काट दिया.
*** पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें।
हरियाणा के हिसार स्थित उकलाना के दौलतपुर गांव में छुआछूत का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है. गांव में...

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Palash Biswas
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Fwd: हस्तक्षेप.कॉम यूपी में अब न चल पाएगी फिरकेवाराना सियासत



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From: Amalendu Upadhyaya <amalendu.upadhyay@gmail.com>
Date: 2012/2/16
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Fwd: [bangla-vision] How the Monsters at Goldman Sachs Caused a Greek Tragedy (2010)



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From: Romi Elnagar <bluesapphire48@yahoo.com>
Date: Fri, Feb 17, 2012 at 12:05 AM
Subject: [bangla-vision] How the Monsters at Goldman Sachs Caused a Greek Tragedy (2010)
To:


 

Hi all!

Yesterday, a friend challenged me about an article about Goldman Sachs in Greece that I had sent her.  I really thought it was common knowledge about how GS machinations had triggered unrest in Greece more than a year ago, with the consequences still being played out.

So, I dug out this article.  I know there are better ones, but right now Yahoo! won't let me search my own archives, so this one will have to do, but you can find plenty more yourself on this topic by googling "Goldman Sachs + Greece" and doing a little digging and sorting.
Hajja Romi/Blue

How the Monsters at Goldman Sachs Caused a Greek Tragedy

Greece's crushing debt has exploded into a full-blown crisis, with the country on the precipice of the unthinkable: the default of a sovereign nation. Thanks Goldman Sachs.

March 4, 2010  |  
 
 
 
 
Another Greek-based cargo ship and its crew was recently hijacked by Somalian pirates, costing the Greek owners an undisclosed amount in ransom.
Such ongoing acts of brazen piracy off the coast of Somalia have riveted the establishment media's attention. But the same news hawks have missed (or ignored) a much more brazen, longer-running and far larger robbery in Greece by Gucci-wearing thieves who are more sophisticated than common pirates -- but lack a pirate's moral depth.
I refer to -- who else? -- Wall Street financiers. Specifically, Goldman Sachs.
Goldman, a global financial conglomerate and America's largest banking fiefdom, is notorious in our country for its arrogant, anything-goes corporate ethic that is astonishingly avaricious, even by Wall Street's dissolute standards. The firm is villainous enough that it could be its own reality TV show, perhaps titled, "Bankers Behaving Badly." A few highlights:
-- During the past decade, Goldman's wizards were particularly inventive monkey-wrenchers, devising much of the investment gimmickry that enriched crafty Wall Streeters like them, even as it led to the wrecking of our economy.
-- In 2006, Goldman's CEO was considered such a whiz that he was elevated to treasury secretary and soon was handed the task of fixing the very economic mess he had helped create. His "fix" was the cockamamie, self-serving, multitrillion-dollar taxpayer bailout that did save Wall Street ... but has left our economy in shambles.
-- Rather than apologizing for their failures and using their bailout funds to rush loans to America's credit-starved businesses, Goldman's debauched financiers immediately went back to playing the same old global game of high-risk craps that caused America's crash, this time rolling the dice with the backing of our tax dollars.
-- Juiced by an infusion of federal funds, Goldman executives declared a profit this year and promptly lavished more than $16 billion in bonus payments on themselves.
-- To keep the fun rolling, Goldman is now lobbying furiously in Washington to kill regulatory and consumer bills that could rein in its destructive greed.
-- Moving from mere greed to naked narcissism, Goldman's current CEO, Lloyd Blankfein, has proclaimed that his bonus bonanza is warranted because he is "doing God's work."
Perhaps he was referring to one of the Greek gods. It turns out that, for the past decade, Goldman has also been practicing its ethical flimflammery in Greece, a nation long mired in a sea of debt.
In 2001, Goldman's financial alchemists formulated a scheme to allow the Greek government to hide the extent of its rising debt from the public and the European Community's budget overseers. Under this diabolical deal, Goldman funneled new capital from super-wealthy investors into the government's coffers.
Fine. Not so fine, though, is that, in exchange, Greek officials secretly agreed that the investors would get 20 years' worth of the annual revenue generated by such public assets as Greece's airports. For its part, Goldman pocketed $300 million in fees paid by the country's unwitting taxpayers.
The financial giant dubbed its airport scheme "Aeolus," after the ancient Greek god of the wind -- and, sure enough, any long-term financial benefit for Greece was soon gone with the wind. By hiding the fact that the government's future revenues had been consigned to secret investors, Goldman bankers made the country's balance sheet look much rosier than it was, allowing Greek officials to keep spending like there was no tomorrow.
Last month, however, tomorrow arrived. Greece's crushing debt has exploded into a full-blown crisis, with its leaders disgraced and the country on the precipice of the unthinkable: the default of a sovereign nation.
So, who is getting punished for the finagling of Greek politicos and Goldman profiteers? The people, of course -- just like here! Greeks now face deep wage cuts, rising taxes and the elimination of public services just so their government can pay off debts the people didn't even know it had. Meanwhile, Greece's financial conflagration is endangering the stability of Europe's currency and causing financial systems worldwide (including ours) to wobble again. All of this to enrich a handful of global speculators.
Thanks, Goldman Sachs.
To find out more about Jim Hightower, and read features by other Creators Syndicate writers and cartoonists, visit the Creators Syndicate web page at www.creators.com.
 
Jim Hightower is a national radio commentator, writer, public speaker, and author of the new book, "Swim Against the Current: Even a Dead Fish Can Go With the Flow." (Wiley, March 2008) He publishes the monthly "Hightower Lowdown," co-edited by Phillip Frazer.

__._,_.___

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Palash Biswas
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Fwd: [Social Equality] जाति प्रथा की सच्चाई – 1



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From: Bhismah Arya <notification+kr4marbae4mn@facebookmail.com>
Date: 2012/2/17
Subject: [Social Equality] जाति प्रथा की सच्चाई – 1
To: Social Equality <wearedalits@groups.facebook.com>


जाति प्रथा की सच्चाई – 1 ब्राह्मण कौन है ?...
Bhismah Arya 6:40am Feb 17
जाति प्रथा की सच्चाई – 1

ब्राह्मण कौन है ?



जाति प्रथा के बारे में सबसे हँसी की बात ये है कि जन्म आधारित जातिप्रथा अस्पष्ट और निराधार कथाओं पर आधारित हैं. आज ऐसा कोई भी तरीका मौजूद नहीं जिससे इस बात का पता चल सके कि आज के तथाकथित ब्राह्मणों के पूर्वज भी वास्तविक ब्राह्मण ही थे. विभिन्न गोत्र और ऋषि नाम को जोड़ने के बाद भी आज कोई भी तरीका मौजूद नहीं है जिससे कि उनके दावे की परख की जा सके.

जैसे हम पहले भी काफी उदाहरण दे चुके हैं की वैदिक समय / प्राचीन भारत में एक वर्ण का आदमी अपना वर्ण बदल सकता था. कृपया पढ़ें;

http://agniveer.com/888/caste-system/

अगर हम ये कहें कि आज का ब्राह्मण [जाति / जन्म आधारित ] शूद्र से भी ख़राब है क्योंकि ब्राह्मण 1000 साल पहले चंडाल के घर में पैदा हुआ था, हमारे इस दावे को नकारने का साहस कोई भला कैसे कर सकता है ? अगर आप ये कहें कि ये ब्राह्मण परिवार भरद्वाज गोत्र का है तो हम इस दावे की परख के लिए उसके DNA टेस्ट की मांग करेंगे. और किसी DNA टेस्ट के अभाव में तथाकथित ऊँची जाति का दावा करना कुछ और नहीं मानसिक दिवालियापन और खोखला दावा ही है.



क्षत्रिय कौन है ?



ऐसा माना जाता है कि परशुराम ने जमीन से कई बार सभी क्षत्रियों का सफाया कर डाला था. स्वाभाविक तौर पर इसीलिए आज के क्षत्रिय और कुछ भी हों पर जन्म के क्षत्रिय नहीं हो सकते!

अगर हम राजपूतों की वंशावली देखें ये सभी इन तीन वंशों से सम्बन्ध रखने का दावा करते हैं – 1. सूर्यवंशी जो कि सूर्य / सूरज से निकले, 2. चंद्रवंशी जो कि चंद्रमा / चाँद से निकले, और 3. अग्निकुल जो कि अग्नि से निकले. बहुत ही सीधी सी बात है कि इनमे में से कोई भी सूर्य / सूरज या चंद्रमा / चाँद से जमीन पर नहीं आया. अग्निकुल विचार की उत्पत्ति भी अभी अभी ही की है. किवदंतियों / कहानियों के हिसाब से अग्निकुल की उत्पत्ति / जन्म आग से उस समय हुआ जब परशुराम ने सभी क्षत्रियों / राजपूतों का जमीन से सफाया कर दिया था. बहुत से राजपूत वंशों में आज भी ऐसा शक / भ्रम है कि उनकी उत्पत्ति / जन्म; सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, अग्निकुल इन वंशो में से किस वंश से हुई है.

स्वाभाविक तौर से इन दंतकथाओं का जिक्र / वर्णन किसी भी प्राचीन वैदिक पुस्तक / ग्रन्थ में नही मिलता. जिसका सीधा सीधा मतलब ये हुआ कि जिन लोगों ने शौर्य / सेना का पेशा अपनाया वो लोग ही समय समय पर राजपूत के नाम से जाने गए.



ऊँची जाति के लोग चंडाल हो सकते हैं



अगर तथाकथित ऊँची जाति के लोग ये दावा कर सकते हैं कि दूसरे आदमी तथाकथित छोटी जाति के हैं तो हम भी ये दावा कर सकते हैं कि ये तथाकथित छोटी जाति के लोग ही असली ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं. और ये ऊँची जाति के लोग असल में चांडालों की औलादें हैं जिन्होंने शताब्दियों पहले सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था और सारा इतिहास मिटा / बदल दिया था. आज के उपलब्ध इतिहास को अगर हम इन कुछ तथाकथित ऊँची जाति के लोगों की उत्पत्ति / जन्म की चमत्कारी कहानियों के सन्दर्भ में देखें तो हमारे दावे की और भी पुष्टि हो जाती है.

अब अगर किसी जन्मगत ब्राह्मणवादी को हमारी ऊपर लिखी बातों से बेईज्ज़ती महसूस होती है तो उसका भी किसी आदमी को तथाकथित छोटी जाति का कहना अगर ज्यादा नहीं तो कम बेईज्ज़ती की बात नहीं है.



हम लोगों में से म्लेच्छ कौन है ?



इतिहास से साफ़ साफ़ पता लगता है कि यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि इनके सत्ता पर काबिज़ होने के समय में भारतीय समाज में सम्मिलित होते रहे हैं. इनमे से कुछों ने तो लम्बे समय तक भारत के कुछ हिस्सों पर राज भी किया है और इसीलिए आज ये बता पाना बहुत मुश्किल है कि हममे से कौन यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि आदि हैं! ये सारी बातें वैदिक विचारधारा – एक मानवता – एक जाति से पूरी तरह से मेल खाती है लेकिन जन्म आधारित जातिप्रथा को पूरी तरह से उखाड़ देती हैं क्योंकि उन लोगो के लिए म्लेच्छ इन तथाकथित 4 जातियों से भी निम्न हैं.

जाति निर्धारण के तरीके की खोज में



आप ये बात तो भूल ही जाओ कि क्या वेदों ने जातिप्रथा को सहारा दिया है या फिर नकारा है ? ये सारी बातें दूसरे दर्जे की हैं. जैसा कि हम सब देख चुके हैं कि असल में "वेद" तो जन्म आधारित जातिप्रथा और लिंग भेद के ख्याल के ही खिलाफ हैं. कृपया देखें http://agniveer.com/5276/vedas-caste-discrimination/. इन सारी बातों से भी ज्यादा जरूरी बात ये है कि हमारे में से किसी के पास भी ऐसा कोई तरीका नहीं है कि हम सिर्फ वंशावली के आधार पर ये निश्चित कर सकें कि वेदों कि उत्पत्ति के समय से हममे से कौन ऊँची जाति का है और कौन नीची जाति का. अगर हम लोगों के स्वयं घोषित और खोखले दावों की बातों को छोड़ दें तो किसी भी व्यक्ति के जाति के दावों को विचारणीय रूप से देखने का कोई भी कारण हमारे पास नहीं है.

इसलिए अगर वेद जन्म आधारित जातिप्रथा को उचित मानते तो वेदों में हमें किसी व्यक्ति की जाति निर्धारण करने का भरोसेमंद तरीका भी मिलना चाहिए था. ऐसे किसी भरोसेमंद तरीके की गैरहाजिरी में जन्म आधारित जातिप्रथा के दावे औंधे मुंह गिर पड़ते हैं.

इसी वज़ह से ज्यादा से ज्यादा कोई भी आदमी सिर्फ ये बहस कर सकता है कि हो सकता है की वेदों की उत्पत्ति के समय पर जातिप्रथा प्रसांगिक रही हो, पर आज की तारीख में जातिप्रथा का कोई भी मतलब नहीं रह जाता.

हालाँकि हमारा विचार ये है कि, जो कि सिर्फ वैदिक विचारधारा और तर्क पर आधारित है, जातिप्रथा कभी भी प्रसांगिक रही ही नहीं और जातिप्रथा वैदिक विचारधारा को बिगाड़ कर दिखाया जाना वाला रूप है. और ये विकृति हमारे समाज को सबसे महंगी विकृति साबित हुई जिसने कि हमसे हमारा सारा का सारा गर्व, शक्ति और भविष्य छीन लिया है.



नाम में क्या रखा है ?



कृपया ये बात भी ध्यान में रखें की गोत्र प्रयोग करने की प्रथा सिर्फ कुछ ही शताब्दियों पुरानी है. आपको किसी भी प्राचीन साहित्य में 'राम सूर्यवंशी' और 'कृष्ण यादव' जैसे शब्द नहीं मिलेंगे. आज के समय में भी एक बहुत बड़ी गिनती के लोगों ने अपने गाँव, पेशा और शहर के ऊपर अपना गोत्र रख लिया है. दक्षिण भारत के लोग मूलत: अपने पिता के नाम के साथ अपने गाँव आदि का नाम प्रयोग करते हैं. आज की तारीख में शायद ही ऐसे कोई गोत्र हैं जो वेदों की उत्पत्ति के समय से चले आ रहे हों.

प्राचीन समाज गोत्र के प्रयोग को हमेशा ही हतोत्साहित किया करता था. उस समय लोगों की इज्ज़त सिर्फ उनके गुण, कर्म और स्वाभाव को देखकर की जाती थी न कि उनकी जन्म लेने की मोहर पर. ना तो लोगों को किसी जाति प्रमाण पत्र की जरूरत थी और ना ही लोगों का दूर दराज़ की जगहों पर जाने में मनाही थी जैसा कि हिन्दुओं के दुर्भाग्य के दिनों में हुआ करता था. इसीलिए किसी की जाति की पुष्टि करने के लिए किसी के पास कोई भी तरीका ही नहीं था . किसी आदमी की प्रतिभा / गुण ही उसकी एकमात्र जाति हुआ करती थी. हाँ ये भी सच है कि कुछ स्वार्थी लोगों की वज़ह से समय के साथ साथ विकृतियाँ आती चली गयीं. और आज हम देखते हैं कि राजनीति और बॉलीवुड भी जातिगत हो चुके हैं. और इसमें कोई भी शक की गुंजाईश नहीं है कि स्वार्थी लोगों की वज़ह से ही दुष्टता से भरी इस जातिप्रथा को मजबूती मिली. इन सबके बावजूद जातिप्रथा की नींव और पुष्टि हमेशा से ही पूर्णरूप से गलत रही है.

अगर कोई भी ये दावा करता है कि शर्मा ब्राहमणों के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला गोत्र है, तो यह विवादास्पत है क्योंकि महाभारत और रामायण के काल में लोग इसका अनिवार्य रूप से प्रयोग करते थे, इस बात का कोई प्रमाण नहीं. तो हम ज्यादा से ज्यादा ये मान सकते हैं कि हम किसी को भी शर्मा ब्राह्मण सिर्फ इसीलिए मानते हैं क्योंकि वो लोग शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करते हैं. ये भी हो सकता है कि उसके दादा और पड़दादा ने भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग किया हो. लेकिन अगर एक चंडाल भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करने लगता है और उसकी औलादें भी ऐसा ही करती हैं तो फिर आप ये कैसे बता सकते हो कि वो आदमी चंडाल है या फिर ब्राह्मण? आपको सिर्फ और सिर्फ हमारे दावों पर ही भरोसा करना पड़ेगा. कोई भी तथाकथित जातिगत ब्राह्मण यह बात नहीं करता कि वो असल में एक चंडाल के वंश से भी हो सकता है, क्योंकि सिर्फ ब्राहमण होने से उसे इतने विशेष अधिकार और खास फायदे मिले हुए हैं.



मध्य युग के बाहरी हमले



पश्चिम और मध्य एशिया के उन्मादी कबीलों के द्वारा हजार साल के हमलों से शहरों के शहरों ने बलात्कार का मंज़र देखा. भारत के इस सबसे काले और अन्धकार भरे काल में स्त्रियाँ ही हमेशा से हमलों का मुख्य निशाना रही हैं. जब भी कासिम, तैमूर, ग़ज़नी और गौरी जैसे लुटेरों ने हमला किया तो इन्होने ये सुनिश्चित किया कि एक भी घर ऐसा ना हो की जिसकी स्त्रियों का उसके सिपाहियों ने बलात्कार ना किया हो. खुद दिल्ली को ही कई बार लूटा और बर्बाद किया गया. उत्तर और पश्चमी भारत का मध्य एशिया से आने वाला रास्ता इस अत्याचार को सदियों से झेलता रहा है. भगवान् करे कि ऐसे बुरे दिन किसी भी समाज को ना देखने पड़ें. लेकिन हमारे पूर्वजों ने तो इसके साक्षात् दर्शन किये हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे पीड़ित व्यक्तियों के बच्चों को तथाकथित जातिप्रथा के हिसाब से "जाति से बहिष्कृत" लोगों के सिवाय और क्या नाम दे सकते हैं ? लेकिन तसल्ली कि बात ये है कि ऐसी कोई बात नहीं है.

हमारे ऋषियों को ये पता था कि विषम हालातों में स्त्रियाँ ही ज्यादा असुरक्षित होती हैं. इसीलिए उन्होंने "मनु स्मृति" में कहा कि " एक स्त्री चाहे कितनी भी पतित हो, अगर उसका पति उत्कृष्ट है तो वो भी उत्कृष्ट बन सकती है. लेकिन पति को हमेशा ही ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वो पतित ना हो.

ये ही वो आदेश था जिसने पुरुषों को स्त्रियों की गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया और भगवन ना करे, अगर फिर से कुछ ऐसा होता है तो पुरुष फिर से ऐसी स्त्री को अपना लेंगे और अपने एक नए जीवन की शुरुआत करेंगे. विधवाएं दुबारा से शादी करेंगी और बलात्कार की शिकार पीड़ित स्त्रियों का घर बस पायेगा. अगर ऐसा ना हुआ होता तो हमलावरों के कुछ हमलों के बाद से हम "जाति से बहिष्कृत" लोगों का समाज बन चुके होते.

निश्चित तौर से, उसके बाद वाले काल में स्त्री गरिमा और धर्म के नाम पर विधवा और बलात्कार की शिकार स्त्रियों के पास सिर्फ मौत, यातना और वेश्यावृति का ही रास्ता बचा. इस बेवकूफी ने हमें पहले से भी ज्यादा नपुंसक बना दिया.

कुछ जन्म आधारित तथाकथित ऊँची-जातियों के ठेकेदार इस बात को उचित ठहरा सकते हैं कि बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ ही "जाति से बहिष्कृत" हो जाती हैं. अगर ऐसा है तो हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि ये विकृति की हद्द है.

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Palash Biswas
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