THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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Wednesday, October 22, 2014

बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है। गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते। पलाश विश्वास

बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।

गिर्दा की पत्नी हीराभाभी के आंसुओं को लेकिन हम थाम नहीं सकते।

पलाश विश्वास


कई दिनों बाद आज फिर भाई देवप्रकाश और उनके भांजे पिंटू के सौजन्य से आमलाइन हूं।उधमसिंहनगर जिले के जिला मुख्यालय रुद्रपुर शहर के बगल में पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थियों के लिए बसाये गये ट्रांजिड कैंप में बैठा हूं।जो अब सिडकुल के शिकंजे में हैं और यहां का हर शख्स अपनी जमीन खोकर करोड़पति है और शरणार्थी कालोनियां बेशकीमती उपभोक्ता बाजार में तब्दील है।


घर बसंतीपुर से कैंप के बीच हिंदूजा का सबसे बड़ा कारखाना अशोक लेलैंड और सिंगुर प्रकरण के बाद पंतनगर स्थानांतरित टाटा मोटर्स का प्लांट यहां हैं।जहां नैनो लेकिन बनती नहीं है,नैनो मोदी के सानंद से बनती है लेकिन यहं छोटा हाथी निकलता है कारखाने से।


सारी तराई शहरीकरण और औद्योगीकरण की सुनामी में है और जंगल तो खत्म हो ही गया हैं,गन्ने के खेत रास्ते में कहीं मिल नहीं रहे हैं।


एक के बाद एक गांव के लोग लाखों करोड़ों में जमीन बेचकर रईस बनने के चक्कर में भिखारी बनते जा रहे हैं और संस्कृति पूरी तरह हिंग्लिश रैव पार्टी है।


इसके बावजूद बिजली अब नियमित लोड शेडिंग हैं और उत्तराखंड में अविरत बिजली किंवदंती ध्वस्त है तो गांव गांव तक पहुंचने वाली सड़कें खंडहर हैं।


बची खुची खेती में मिट्टी बालू की खदानें हैं।


यही मेरा डिजिटल देश महान है।


यह परिदृश्य तराई में सीमाबद्ध है.ऐसा भी नहीं है।


कल ही नैनीताल होकर आया हूं।


पहाड़ के चप्पे चप्पे में विकाससूत्र की धूम है।अब तो पेड़ों के टूंठ भी कहीं नजर नहीं आते। तराई से लेकर पहड़ा तक नालेज इकोनामी के तहत गांव गांव में कालेज,मेडिकल कालेज,बीएच कालेज,इंजीनियरिंग कालेज,ला कालेज खुल गये हैं।


इंग्लिश कुलीन स्कूल कालेज तो मशरूम है।


कोई नियंत्रण नहीं है।कोई नियमन नही है।

बेलगाम पूंजी,मुनाफाखोरी और कमीशनखोरी का खुल्ला बाजार है।


जो बच्चों का हुजूम बड़ी उम्मीदों के साथ इस शिक्षण संस्थानों से निकल रहा है,उनका आखिरकार होगा क्या,जो किसान बेदखल हो रहे हैं,उनका आखिर होगा क्या,इसका जवाब किसी के पास नहीं है।


दिनेशपुर.ट्रांजिट कैंप से लेकर नैनीताल तक बाजारों में सारे के सारे चेहरे अजनबी हैं।जहां तहां शापिंग माल है।


स्थानीय लोग पक्के मेहनतकश हो गये हैं और व्यापारियों के एक खास तबके को अपना सबकुछ हस्तांतरित करके ऐश कर रहे हैं मौत के इंतजार में।


नैनीताल के लिए काठगोदाम से पहाड़ चढ़ते हुए पहाड़ के रिसते जख्मों से जो खून की धार निकलती रही,उसे अभी दिलोदिमाग से साफ नहीं कर पाया हूं।


अपना नैनीताल भी तेजी से गांतोक नजर आने लगा है।


तल्ली डाट सुनसान है तो कैंट बाजार का कायाकल्प हो गया है।मल्लीबाजार की दुकानें अजनबी हैं तो फ्लैट्स की घेराबंदी है।


तल्ला डांडा और अय़ांर पाटा अब आलीशान हैं और सूखाताल,भीमताल,खुरपाताल तक विकास का कदमताल है और बिना बेदखल कोई एक इंच जमीन कहीं नहीं है जैसे अनबंधी कोई नदी नहीं है।


कल सुबह गिरदा की पत्नी हीराभाभी से तल्ली डाट के बगल में हल्द्वानी रोड पर उनके नये कमरे में सविता और मेरी लंबी बातें होती रहीं।


हीरा भाभी, बोली कम रोयी ज्यादा।उन आंसू की हिस्सेदारी लेकिन हमारी हैं नहीं।


बटरोही से माउंट रोज में उनके घर जाकर हमने पूछा कि गिरदा की कितनी किताबें कोर्स में लगी हैं।बोले ,एक भी नहीं है।लगायेगा कौन,उन्होंने पूछा।


हीराभाभी चाहती हैं कि गिरदा की स्मृति में कोई संग्रहालय बने।


उत्तराखंड सरकार या कुमांयू विश्वविद्यालय चाहे तो यह संभव है।


हीरा भाभी बोलीं कि गिरदा की किताबें और उनका सारा सामान अल्मोड़ें में उनके पुश्तैनी घर में बाथरूम के सामने गली में बक्से में बंद छोड़ आयी हैं क्योंकि केलाखान के पास गिरदा का घर उन्हें छोड़ना पड़ा।


साढ़े बारह सौ का घर छोड़कर अशोक होटल के ठीक सामने जो साढ़े पांच हजार रुपये के किरोये पर उनका एक कमरे का घर है,जहां वे निपट अकेली हैं,उसमें कोई रसोई भी नहीं है तो किताबें वे कहां रखतीं।


मेरे पिता पुलिन बाबू डायरियां लिखा करते थे रोजय़हर छोटी बड़ी जरुरी गैर जरुरी चीजों को लिखा करते थे।हमारा घर झोपड़ियों का झुरमुट था। कोई खाट तक नहीं थी हमारी और हम फर्श पर सोते थे।एक बड़े से लकड़ी के बक्से में सारे जरुरी कागजात ,जमीन का खसरा खतियान से लेकर ढिमरी ब्लाक आंदोलन के पोस्टर,पर्चे और उनकी डायरियां रखी हुई थीं।बाकी पूरे घर में अनाज और पत्र पत्रिकाओं का डेरा और बाकी सांपों का बसेरा था।छप्पर चूंती रहती थीं।


पिताजी की मौत के बाद स्थिर हुआ तो हमें उस काठ के बक्से की सुधि आयी।पता चला कि पद्दो घर से बाहर था और तब दस बारह साल के भतीजे टुटुल ने बाक्स खोलकर दीमक लगे कागजात डायरियों और उसके भीतर की सड़न से घर को बचाने के लिए उस काठ के बक्से को ही फूंक दिया।


पिताजी की इस तरह दो दो बार अंत्येष्टि हो गयी।


हमारी औकात पिताजी के लिए संग्राहालय बनाने की थी नहीं।


दिनेशपर कालेज के सामने जो मूर्ति बनी है,उसे हर साल नये सिरे से सहेजना पड़ता है क्योंकि रात के अंधेरे में हर साल उस मूर्ति को अनजान लोग तोड़ देते हैं।


इस बार भतीजी निन्नी ने छूटते ही कहा कि दादाजी के हाथ में फ्रैक्चर है।


सविता बोली उनकी पूरी देह ही फ्रैक्चर है।


सविता ने फिर जिम्मेदार लोगों से निवेदन भी किया कि कैश कराने के लिए इस मूर्ति पूजा की जरुरत ही क्या है।


सविता ने कहा कि हर मूर्ति गढ़ी जाती ही है विसर्जित होने के लिए।


मुक्तबाजार हुई जा रही तराई में पुलिनबाबू की स्मृति का क्या मोल।


बेहतर हो कि पुलिनबाबू को विसर्जित कर दिया जाये।

उनको इस यातनागृह से मुक्त कर दिया जाये।


हम जो गिरदा की मूरत गढ़ रहे हैं,बेदखल पहाड़ और बेदखल तराई की भावभूमि में उसकी कितनी प्रासंगिकता है,यह बात मेरी समझ में नहीं आती।


राजीव लोचन साह ने कहा भी कि गिरदा ने जनता से लिया और जनता को लौटा दिया।पोथी रचने की उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।


वे बोले कि गिरदा तो चिरकुट पर लिखने वाला ठैरा।


तो इस हुड़किया लोककवि की ब्रांडिंग करके किसे क्या फायदा होने वाला ठैरा।मुझे आशंका है कि जैसे हम अपने पिता की कोई स्मृति और उनके हिस्से का इतिहास बचा नहीं सकें,उसीतरह हमारे गिरदा को भी घुन और दीमक चाट जाने वाले होंगे।


तुहीन और पिरिम अब दिल्ली में हैं और अनिमित नैकरियों में हैं और भाभी को कुल साढ़े सात हजार रुपये की पेंशन मिलती है।


राजीव,दीपा कांडपाल,शेखर,उमा भाभी निजी तौर पर जितना कुछ कर सकते हैं,कर रहे हैं जो शायद काफी नहीं है।


पवन राकेश का कहना है कि भाभी की आंखों से बहते आंसुओं को हम थाम ही नहीं सकते।


कल दो बजे तक तुहीन को नैनीताल होना था।मुझे घर से पद्दो का जरुरी फोन मिलने की वजह से तुरत फुरत पहाड़ छोड़ आना पड़ा शेखर दा और उमा भाभी से मिले बिना ही।


डीके ,विश्वास,कैप्टेन एल एम साह जैसे अनेक लोगों से बिना मिले।


मैंने हीरा भाभी से कहा कि तुहीन लौटते ही फोन करें और तब हम पता लगायेंगे कि क्या वह किसी अखबार में काम करने को इच्छुक है।होगा तो हम लोग किसी संपादक मालिक मित्र से निवेदन करेंगे कि उसे अखबार का कामकाज सीखा दें।


अभी तक तुहीन का फोन नहीं आया और मैं इंतजार में हूं।


बटरोही और राजीवदाज्यू से संग्रहालय की बात हमने चलायी भी।राजीवदाज्यू ने कहा कि सरकारी नियंत्रण में संग्रहालय का हाल तो महादेवी वर्मा पीठ से मालूम पड़ गया ठैरा,जहां उसे रचने वाले बटरोही को ही खदेड़ दिया गया।


उस दूध के जले बटरोही से भी हमारी माउंट रोज पर उनके मकान में लंबी बातें हुईं और उनसे भी कहा कि संग्रहालय बनाने की पहल आप ही कर सकते हैं।


बटरोही जी कोई जवाब देने की हालत में नहीं थे।


अबकी बार मल्लीताल के सबकुछ बदले माहौल में,इसे यूं समझें की नैनीताल के तीनों सिनेमाहाल विशाल,कैपिटल और अशोक बंद पड़े हैं और नैनीताल में कोई सिनेमाहाल इस वक्त है नहीं।


तो मल्ली बाजार में अपने पुराने शर्मा वैष्णव भोजनालय में करगेती और सुदर्शन लाल शाह सत्तर के दशक के कुछ डीएसबी सूरमाओं से मुलाकात हो गयी और एक दम सत्तर के दशक में लौट गये।


इससे पहले इदरीश मलिक की पत्नी कंवल सेमुलाकात हो गयी जो तराई के ही काशीपुर से हैं तो कोलकाता के भवानीपुर में भी उनकी जड़ें हैं।


इदरीश की गैरहाजिरी में उनसे हुई मुलाकात में वे इतनी अंतरंग हुई कि लगी करने शिकायत कि हम उसके घर क्यों नहीं ठहरे।फिर नैनीताल में हर साल दिखायी जानेवाली राजीव कुमार की फिल्म वसीयत की चर्चा भी हुई जिसमें सारे के सारे नैनीतालवाल देशभर से इकट्ठे हुए थे और संजोग से उस फिल्म की पटकथा,संवाद,इत्यादि मैंने लिखी थी और दो चार शाट मुझपर भी फिल्माये गये थे।


इदरीश अभी फिर मुंबई में है और उसकी दो फिल्में रिलीज होने को हैं,खुशी इस बात की है।


नैनीताल इतना बदल गया है कि फिल्मोत्सव के लिए जगह नहीं मिल पा रही है तो युगमंच के रिहर्सल के लिए भी जगह नहीं है।


फिर भी जहूर आलम की अगुवाई में सत्तर दशक की धारावाहिकता में युगमंच के नये पुराने रंगकर्मी हरिशंकर परसाई के मातादीन को मंच पर उतारने की जुगत में है।


वे रिहर्सल की तैयारी में थे तो उनसे ज्यादा बात नहीं हो पायी।


करीब रात के साढ़े बारह बजे हम मालरोड पर बंगाल होटल पहुंचे जहां मैं करीब पांच साल रुककर पढ़ता था डीएसबी में।एक सा गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी के घर में था।


धड़कते हुए दिल के साथ गया कि पता नहीं कि किससे मुलाकात होगी और किससे नहीं।

बंगाल होटल का कायाकल्प हो गया है।जिस कमरे में मैं रहता था,वह अब मौचाक रेस्तरां है।वहीं हम पूछताछ कर रहे थे तो सीढ़ियों पर दादा सदानंद गुहा मजुमदार आ खड़े हो गये।


पहले उन्होंने ही हमें कस्टमर समझ लिया पर जब सविता ने कहा पलाश तो फौरन डांटते हुए बोले ,एखाने की कोरछिस ऊपरे जा।


ऊपर जाते ही उनकी बेटी सुमा जो 1973 में साल भर की थी .हमें देखते ही चीख पड़ी,मां देखो के एसेछे,पलाश अंकल और फिर भाई को आवाज लगाने लगी -- ओ सभ्यो ओ सभ्यो


दीदी अपने उसी कमरे में थीं।बड़ी बहू कोलकाता के बेलेघाटा से है।उसकी सास ने कहा कुछ नहीं, वह तुरंत किचन में घुस गयी।फिर दोनों के लिए माछ भात लेकर लौटीं।


सविता बोली,इनसुलिन तो अशोक में छोड़ आयी लेकिन तुम्हारे हाथ का जरुर खाउंगी।


छोटी बहू कुंमाय़ुनी और नैनीताल की है।पूछा तो बोली कि आस सेंट्स में टीचर है जैसे सुमा बिड़ला कालेज में है।


मैंने कहा कि हमारी मैडम मिसेज अनिल बिष्ट भी कभी आल सेंट्स में पढ़ाती थी।



इसपर उसके पति गुड्डु सुखमय ने कहा कि वह तो मैडम के साथ काम करता है।


दस बजे गये ते ।फिर भी मैडम को एसएमएस करके उसने हमारे वहा होने की जानकारी दी।दो मिनट के भीतर मैडम फोन पर थीं और हम घंटा भर बातें करते रहे।


करीब रात के साढ़े ग्यारह बजे अशोक में लौटे।सभ्यो गाड़ी से पहुंचा गया।


हल्द्वानी में हरुआ दाढ़ी है तो आज सुबह अमर उजाला देखा तो हल्द्वानी में संपादक हमारे पुराने बरेली के सहकर्मी सुनील साह हैं।


करगेती,भास्कर,कमलापंत और लोग हैं।लेकिन हल्द्वानी मैं रुक नहीं सका।

भास्कर उप्रेती से नैनीताल पहुंचते ही मुलाकात हो गयी,गनीमत है।


गुरु जी ताराचंद्र त्रिपाठी इस वक्त मुरादाबाद में हैं।उन्हें प्रमाम करने की बड़ी इच्छा थी।


राजीव लोजन साह ने गुरुजी से फोन पर मिलाया और फोन पर ही सविता और मैंने उन्हें प्रणाम कहकर नैनीताल से विदा ली।


সংবিধান দিবস সমারোহ

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Saturday, October 18, 2014

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।


पलाश विश्वास


कल जो रोजनामचा लिखा,वह दरअसल अधूरा रह गया है।हमारे घर में दो छोटे बच्चे भी हैं।निन्नी और पावेल।छोटे बाई पंचानन की बेटी और बेटा।


निन्नी चौथी में पढ़ती है और बेहद समझदार हो गयी है तो पावेल सातवीं में पढ़ते हुए भी बहुत हद तक वैसा ही है,जैसा कि मैं बचपन में हुआ करता था।


मेरे इलाके में लोग मुझे बलदा यानी बड़े भाई और बुरबक एकसाथ एक ही शब्द में कहा करते थे।पावेल मेरी तरह ही साईकिल से अपने स्कूल छह सात किमी दूर जाता है रोज।वह सातवीं में पढ़ता है।


वह मेरी तरह मुख्य सड़क छोड़कर खेतों की मेढ़़ों से रास्ता बनाकर स्कूल जाता है रोज।मैंने पूछा तो बताया कि मुख्य सड़क पर किसी फार्म हाउस के सात सात कुत्ते हैं,उनसे एक बार वह बच निकला है और उनसे बचने के लिए सुरक्षित खेतों के दरम्यान वह अपना रास्ता बनाता है।


मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।

फर्क यह हुआ कि पहले पूरी तराई एक बड़ा सा फार्म हाउस हुआ करता था और बाकी सारे गांव महनतकश बस्तियां।अब तराई और पहाड़ पूंजी का मुकम्मल सामंती उपनिवेश है।


पिछलीबार जब घर आया था,दोनो बहुत छोटे थे और मेरे साथ चिपके रहते थे।खासतौर पर निन्नी।गांव में लोग उसे चिढ़ाते भी थे,ताउ तो चले जायेंगे,फिर क्या करोगी निन्नी।निन्नी जवाब में गुमसुम हो जाती थी।


अबकी बार स्कूल से लौटने के बाद वे कोचिंग में चले जाते हैं।शाम को ही उनसे मुलाकात हो पाती है।पहले दिन तो उसके पिता ने हमारे आने की खुशी में उन्हें छुट्टी दे दी।अगले दिन सविता उन्हें लेकर बाजार चली गयीं।


दोनो बच्चों ने अपनी ताई के साथ खरीददारी में अपनी पसंद के जो कपड़े खरीदे हैं,उन्हें देखकर मैं चकित रह गया।


हमें इतनी तमीज भी नहीं थी।मुझे एक काला कोट मिला था ,उनकी उम्र में जो मेरी संपत्ति थी और मैं उसे हरवक्त चबाता रहता था।


फिर भी पढ़ाई से जब उनकी छुट्टी होती है,उनसे रोज ढेरों बातें होती हैं और रह रहकर अपने बचपन में लौटना होता है।


निन्नी ने वायदा किया है कि खूब पढेगी।


मैंने उससे कहा कि अब इस घर में न कोई बेटी और न कोई बहू रसोई में कैद होगी फिर कभी।निन्नी से मैंने इस सिलसिले में जो भी कहा,बड़ो के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से उसने सुना और अपने सकारात्मक जवाब से मुझे हैरान करती रहीं।


बहुत समझदार हो गयी है निन्नी।

बहुत समझदार हो गयी है हमारी बेटिया।

बिटिया जिंदाबाद।

बसंतीपुर गांव से मेरी मां कभी अपने मायके ओड़ीशा वापस नहीं गयीं।न वह बाहर जाना पसंद करती थीं और इसी गांव की माटी में मिल गयीं।


मेरी मां,मेरी ताई,मेरी चाची,मेरी बुआ,मेरी नानी और मेरी दादी के साथ साथ बसंतीपुर की सारी स्त्रियों को उनके कठिन संघर्ष के दिनों में बचपन से मैंने देखा है।


रसोई में सिमटी उनकी रोजमर्रे की जिंदगी और उनके बेइंतहा प्यार के मुकाबले हम उन्हें वापस कुछ भी दे नहीं पाये।


मेरी पत्नी सविता तो मेरी महात्वाकांक्षाओं की बलि हो गयीं।हम कोलकाता नहीं जाते तो उसे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर हाउसवाइप भनकर जिंदगी न बितानी होती।हम कोलकाता में उसकी कोई मदद नहीं कर सकें।


खुशी यह है कि निन्नी की मां नौकरी कर रही हैं।


दरअसल मुद्दा यही है कि स्त्री के सशक्तीकरण के बिना न लोकतंत्र बच सकता है और न इस स्वतंत्रता का कोई मतलब है जबकि अपने अपने घरों में हम अपनी बेटियों बहुओं के लिए मुकम्मल कैदगाह रचते रहेंगे।


हमारे घर में और गांव में खेतों,खलिहानों से लेकर घर की व्यवस्था में स्त्रियों की प्रबंधकीय दक्षता का मैं कायल रहा हूं।इस मामले में अधपढ़ हमारी ताई बाकायदा मिसाल है।फिर प्रोफेशनल लाइफ में कामकाजी महिलाओं को मैं दसों हाथों से घर बाहर संभालते हुए रोज जब देखता हूं।


मुझे पक्का यकीन है कि समाज और देश के कायाकल्प के लिए स्त्री भूमिका ही निर्णायक होनी चाहिए।मैं चाहता हूं कि हमारी बहू बेटियां इस चुनौती को मंजूर करें और हम सारे पुरुष इसमें उनका सहयोग करें।


मेरी दूसरी भतीजी,तहेरे भाई की बेटी कृष्णा नई दिल्ली में बीए फाइनल की छात्रा है।इंटर करने के बाद समुद्र विज्ञान की पढ़ाई के लिए वह कोलकाता गय़ी थी और उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई है।लेकिन तभी मैंने उससे वायदा किया हुआ है कि वह कुछ बनकर दिखायें और जिंदगी में जो भी कुछ करना चाहती है,करें,पूरा परिवार उसके साथ होगा।


हमने तभी साफ कर दिया कि हम उसके विवाह के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।जब वह पढ़ लिखकर काबिल हो जायेगी,तब जब चाहे तब, जिसे पसंद करेगी,उसके साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र होगी।जाति भाषा धर्म का कोई बंधन आड़े नहीं आयेगा।


जाहिर है कि चौथी में पढ़ने वाली निन्नी से ये बातें मैं कर नहीं सकता।


मुझे खुशी है कि बसंतीपुर की बेटियां ही नहीं,बहुएं भी पढ़ लिख रही हैं और नौकरी भी कर रही हैं और उनके जीवन में वे बाधाएं नहीं हैं,जो बसंतीपुर में मेरे बचपन के दौरान तमाम स्त्रियां पार नहीं कर सकीं।


फिर भी जाति गोत्र का बंधन वैसा ही अटूट है।इसपर भी हमने अपने गांव वालों को साफ साफ बता दिया है कि हमारे परिवार के बच्चों को अपने अपने जीवन साथी चुनने का हम पूरा हक देंगे और इस सिलसिले में बच्चों की मर्जी ही फाइनल है।गांव में हमारे प्राण है और हम हर मामले में गांव के साथ हैं तो गांववालों को भी इस मामले में हमारा साथ देना चाहिए।


मुझे खुशी है कि जाति उन्मूलन के जिस जाति अंबेडकरी एजंडा के तहत मेरे पिता तराई में सामाजिक एकीकरण की बात करते थे,नई पीढ़ी के बच्चे उसी के मुताबिक चल रहे हैं और उनके लिए जाति उतनी बड़ी बाधा नहीं रही,जिसकी वजह से हम अपनी संवेदनाओं को लगाम देने को मजबूर थे।


ताराशंकर बंदोपाध्याय के महाकाव्यीयआख्यानों के मुकाबले उनका छोटा उपन्यास कवि मुझे बेहद प्रिय रहा है।एक डोम के कवित्व के चरमोत्कर्ष की वह संघर्ष गाथा है बंगाल के लोक में सराबोर।


उसमें झुमुर गानेवाली बसंती की मौत निश्चित जानकर कविगानेर आसर पर जो गीत रचा उस डोम कवि ने ,उसका तात्पर्य अब समझ में आ रहा हैःजीवनडा एतो छोटो कैने।


जिंदगी वाकई बेहद छोटी है।डिडिटल देश में डिजिटल सेना बनाने की बात हो रही है।बुलेट ट्रेन बस अब चलने वाली है।


दिनेशपुर में भी पीटरइंग्लैंड,रिबोक,ली ब्रांडों खी धूम है।


अत्याधुनिक जीवन और प्लास्टिक मनी की बहार के साथ साथ हम अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विकास के साथ सुपरसोनिक हैं बतौर उपभोक्ता।


उपभोग और भोग के लिए हम अमेरिकियों से कम नहीं हैं।लेकिन अपनी ही बहू बेटियों के मामले में हम बर्बर आदिम पुरुषों से कम हैवान नहीं हैं।


इस विरोधाभास के खिलाफ लड़ने खातिर अब हमारे पास कोई राममोहन राय,ईश्वरचंद्र विद्यासागर,ज्योतिबा फूले या हरिचांद गुरुचांद ठाकुर भी नहीं हैं।


हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं,जितने ब्रांडेड होते जा रहे हैं,जितने पढ़ लिख रहे हैं,दहेज की मांग उतनी अश्लील वीभत्स होती जा रही है।


दहेज खत्म कर दो तो बुनियादी जरुरतों के लिए इतने ज्यादा दुश्कर्म और इतने गहरे पैठे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो और न कहीं भ्रूण हत्या की नौबत आयें।


स्त्री की योग्यता और उसकी दक्षता का सही इस्तेमाल हो और पुरुष आधिपात्य से बाज आये समाज तो देश को अमेरिका बनाने की नौबत ही न आये और तब अमेरिका को भारत बनने की जरुरत आन पड़ेगी।


विकास जितना तेज हो रहा है,मुक्त बाजार जैसे शिकंजे में ले रहा है कृषि, कारोबार, उत्पादन प्रणाली, आजीविका,प्राकृतिक मानव संसाधन,उतना ही बर्बर और आक्रामक हो रहा है सैन्य राष्ट्र अपनी ही जनता के विरुद्ध।


सैन्य राष्ट्र के मुक्त बाजार में स्त्री उत्पीड़न की सांढ़ संस्कृति के तहत रोजाना बलात्कार, रोजाना उत्पीड़न,रोाजाना अत्याचार,रोजाना हत्या और रोजाना आत्महत्या स्त्री जीवन की कथा व्यथा है।


पुरुषतंत्रक को उनसे तो चौबीस कैरेट की निष्ठा चाहिए लेकिनअपने लिए रासलीला का पूरा बंदोबस्त चहिए।


उनके क्षणभंगुर सतीत्व के दो इंच पर ही टिकी है पृथ्वी बाकी सारे शिवलिंग हैं जिसका हर तरीके से अभिषेक होने ही चाहिए।


इस ग्लोबीकरण से तो बेहतर है दो सौ साल पहले का नवजागरण,जब भारत में पहली बार स्त्रियों को आजाद करने का आंदोलन शुरु हुआ।


स्वतंत्रता संग्राम शुरु हुआ तो स्त्री मु्क्ति आंदोलन ईश्वर चंद्र विद्यासागर राममोहन राय ज्योतिबा फूल और हिचांद गुरुचांद के तिरोधान की तरह खत्म हो गया।


हमने आजादी हासिल कर ली है लेकिन हमारी स्त्रिया अभी घर बाहर गूुलाम है और हम उनकी देह को तो अपने भोग के लिए मुक्त करना चाहते हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा की मुक्ति के हम विरुद्ध हैं।


उनके सशक्तीकरण के हम विरुद्ध है।हम किस आजाद लोकतांत्रकिक देश में रह रहे हैं,यह सवाल हमें हर्गिज परेशान नहीं करता।


नये सिरे से नवजागरण के लिए जिंदगी बहुत छोटी पड़ गयी है।शरतचंद्र ने स्त्री मन का जो पाठ दिया,हमने अपने साहित्य और संस्कृति में उसे मुकम्मल देहगाथा में तब्दील कर दिया है जो औपनिवेशिक हीनताबोध के मुताबिक है।


चूंकि हम खुद गुलाम हैं तो हम यौनदासी के अलावा स्त्री का आजाद वजूद के बारे में सोच ही नहीं सकते।


हम उन मित्रों को बेहद करीब से जानते हैं जो जाति गोत्र तंत्र में इतने फंसे हैं,कंडली ज्योतिष के अक्टोपस के शिकंजे में ऐसे हैं,कि जातगोत्र समीकरण से बाहर निकलने की इजाजत अपनी बेटियों को न देकर उनकी जिंदगी नर्क बना रहे हैं दरअसल और हमारी मजबूरी है कि हम उनकी कोई मदद  भी नहीं कर सकते।


स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम अब तकनीकी तौर पर हर भाषा में लिखने को समर्थ हैं लेकिन भाषा से भाषांतर हो जाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम ग्लोबीकरण को अपना रहे हैं लेकिन देश से देशांतर तक हमारी दृष्टि कहीं पहुंचती है नहीं और अपने अपने घर के भीतर कैद हम अंध हैं,दृष्टि अंध।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम चांद मंगल तक उपनिवेश गढ़ने को तत्पर हैं और हमारी दसों उंगलियों में ग्रहशाति के यंत्ररत्न हैं,ताबिज है,मंत्र तंत्र हैं।


यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम बात तो करेंगे ज्ञान विज्ञान की लेकिन धर्मग्रंथों के पाठ के संस्कार,मिथकों के तमत्कार और टोटेम के अंधविश्वास को हरगिज हरगिज नही त्याजेंगे।


यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र का।

Friday, October 17, 2014

নমো ঃ অশ্বমেধের ঘোড়া ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন

নমো ঃ অশ্বমেধের ঘোড়া ঃ শরদিন্দু উদ্দীপন


লিখছেনঃ 
তিনি দিগ্বিজয়ের জন্য মনোনীত। যজ্ঞের জন্যউৎসর্গকৃত। ধর্ম যুদ্ধের জন্য নিবেদিত। তিনিঅশ্বমেধের ঘোড়া। তাই তাঁকে সাজানো হয়েছে সযত্নেচন্দন চর্চিত ললাট অগ্নিসম রক্ততিলক শিরে ভাগুয়াধ্বজ তুরিভেরি, দামামার  উন্মত্ত রণহুংকার তুলে তিনিছুটে চলেছেন। তারই হ্রেষারবে শিহরিত হচ্ছে দশদিক হ্যাতিনিই বর্তমান ভারতের মনুবাদী শিবিরের ছুটন্ত ঘোড়াতিনি নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি।

এরকমই একটি ঘোড়ার সন্ধানে ছিল মনুবাদীরা যাকেদিগ্বিজয়ের কাজে ব্যবহার করা যেতে পারে এবংদিগ্বিজয়ের কাজ সমাপ্ত হলে বলি চড়ানো যেতে পারেবলিতেই মোহগ্রস্থ অশ্বের মুক্তি। হোমাগ্নীর পুত রসেভস্মীভূত হওয়াতেই তার  পরম শান্তি ওঁ শান্তিওঁ শান্তি মোদি সেই দাস সংস্কৃতি  পরম্পরার ধারক   বাহক যেদেবপ্রসাদ লাভ করে পরম শান্তি পেতে চায়  

শূদ্র নিধনের প্রতীকী পরিভাষা 
অশ্বমেধ যজ্ঞ ভূদেবতাদের ধর্মঅর্থকাম  মোক্ষ লাভেরসর্বোচ্চ পথ। মূলনিবাসীদের(শূদ্রবিরুদ্ধে কাঙ্ক্ষিত বিজয়লাভের জন্য এক সুনিশ্চিত বার্তা অশ্ব বা ঘোড়াকে দিয়ে এইকাজ পরিচালিত করা হয় এই কারণে যেভূদেবতীয় পরিভাষায়অশ্ব  শূদ্র সমগোত্রীয় ওদের ধর্মীয় ভাবনায় এটাইসম্পৃক্ত হয়ে আছে যেদেব সাম্রাজ্য বিস্তারের জন্য অশ্ব শূদ্রকে বলি প্রদত্ত হতে হয়।  কেননা ওদের বিধাতা জীব সৃষ্টিকালে পুরুষকে বলি দিয়েছিল এবং সেই বলি প্রদত্ত পুরুষেরপায়ের থেকে জন্ম নিয়েছিল শূদ্র  অশ্ব (পুরুষসূক্তঋক বেদ,৯০ শ্লোকঅর্থাৎ অশ্বমেধ হল শূদ্র বা দাস নিধনের প্রতীকীপরিভাষা নরেন্দ্র ভাই দামোদর দাস মোদি একদিকে শূদ্রঅন্যদিকে দাস সুলভ আনুগত্যের জন্য বিশ্বস্ত ঘোড়া। 

রামরাজ্যের রণহুংকারঃ                 
এই অশ্বমেধের ঘোড়া ছুটেছিল খৃষ্টপূর্ব ১৮৭ সাল আগেএকবার। প্রকাশ্যে দিবালোকে যখন পুস্যমিত্র শুঙ্গ সম্রাটঅশোকের প্রপৌত্র ব্রিহদ্রথকে নৃশংস ভাবে হত্যা করল পুস্যমিত্র শুঙ্গের এই অশ্বমেধ যজ্ঞ ছিল ঐতিহাসিক কালের সর্ববৃহৎ শূদ্র নিধন যজ্ঞ। অশ্বমেধের নামেধ্বংস করা হয়েছিল মূলনিবাসী সভ্যতার সমস্ত নিদর্শন। পুস্যমিত্র তার চরিত্রকে অবলম্বন করে লিপিবদ্ধকরেছিল রামায়ন কাহিনী শম্বুকের মতো জ্ঞান তাপসদের হত্যা করে তাদের ধড় থেকে মাথা নামিয়ে দিয়েব্রাহ্মনদের সন্তুষ্ট করেছিল রাজা রাম মোদির ভাষণেও উঠে আসছে  রামরাজ্যের সেই রণহুংকার   

কূর্ম অবতারঃ 
কচ্ছপ তার খোলসের মধ্য থেকে ক্রমশ শুঁড় বাড়তে শুরু করেছে। মৃতদেহ তার প্রধান খাদ্য। ব্রাহ্মণ ভোজনের জন্য শূদ্রের লাশ চাই। সস্তা বহুজনের লাশ। সুলতানি আমল থেকে ইংরেজ কাল পর্যন্ত ওরা মুখ খুলতে পারেনি। ইংরেজদের কাছ থেকে ক্ষমতা হস্তান্তরের পর থেকেই ওরা ক্রমশ দাঁত নখ বার করতে শুরু করেছে। শুরু হয়েছে সস্ত্রের ঝনঝনানি। সস্ত্র পূজা। কিন্তু একটি ঘোড়ার দকার ছিল ওদের। এযাবতকাল ওরা ব্যবহার করছিল ক্ষত্রিয় শক্তি। কিন্তু ক্ষত্রিয়রা ভূসম্পদের ৮০% দখল করে নিলে  ওরা বাণিয়া শক্তি ব্যবহার করে। তুলে আনা হয় মোহনদাস নামক এক বানিয়াকে। প্রয়োজন ফুরিয়ে গেলে মোহনদাস করমচাঁদ গান্ধীকেও তারা হত্যা করতে কুণ্ঠাবোধ করেনি। পাঞ্জাব এবং বাংলার শক্তিকে খর্ব করে তাদের খণ্ডিত করে বিপুল মানুষকে দেশহীন নাগরিকে পরিণত করতেও তারা দ্বিধা করেনি।   

বিনাশায় চ দুষ্কৃতমঃ   
ওদের মোক্ষ লাভের সবথেকে বড় অন্তরায় এখন ভারতীয় সংবিধান এবং তার প্রণেতা বাবাসাহেব ডঃ  বিআর আম্বেদকর। কারণ এই সংবিধান প্রণয়ন করে আম্বেদকর তাদের স্বপ্নের রাম রাজ্যকে আস্তাকুড়ে ফেলে দিয়েছেন। চতুর্বর্ণ ব্যবস্থাকে শুধু ধ্বংস নয় তাকে গর্হিত ও শাস্তি যোগ্য অপরাধ বলে প্রতিপাদিত করে দিয়েছেন। সংবিধানের মধ্যে ভাগিদারী ব্যবস্থা বলবত করে সমস্ত মানুষের সার্বিক উত্থান সম্ভব করে তুলেছেন। এই সংবিধানের কারণেই ক্রমশ রাষ্ট্র ক্ষমতায় উঠে আসছে বহুজন মানুষ। রাষ্ট্র হয়ে উঠছে for the people, by the people, of the people এর। শক্তিশালী বহুজন মানুষের শক্ত অভিঘাতেই উত্তর ভারতে দাঁত বসাতে পারছেনা ভুদেবতারা।   

ধর্মসংস্থাপনার্থায়ঃ 
সুতরাং পুনর্নির্মাণ চাই। সংবিধানকে ধ্বংস করে মনুর শাসন কায়েম করা চাই। জনগণকে পুনরায় বর্ণবাদ বা হিন্দুত্বের খোঁয়াড়ে পোরা চাই। বাবরি ধ্বংস চাই, গোধড়া চাই, সমঝোতা এক্সপ্রেস চাই, গুজরাট মডেল চাই, কাঁসির দখল চাই, বুদ্ধ গয়ার বিলুপ্তি চাই এবং এগুলো নির্দ্বিধায় প্রচার করার জন্য একজন নির্বোধ দাস চাই। একটা ঘোড়া চাই।   

কল্যাণ সিংকে (দাস বংশের আর এক প্রতিনিধি) দিয়ে শুরু হয়েছিল এই রনভেরি। জাঠ রাজ সিং এ খেলার একেবারে অনুপযুক্ত। মুরলী মনোহর যোশির গায়ে এত শক্তি নেই। সুতরাং দাস চাই। ঘোড়া চাই। যে বলি প্রদত্ত হবে জেনেও রামরাজ্য বিস্তারের কাজ করতে পারে।   
নরেন্দ্র দামোদর মোদি সেই দাস সেই অশ্বমেধের ঘোড়া যিনি অবলীলায় এগুলো প্রচার করেতে পারেন।  গুজরাট দাঙ্গায় শত শত মানুষের প্রান নিয়েও গাড়ির চাকায় কুকুর পিষে মরেছে বলে তামাশা করতে পারেন।  ১৯৪৭ সালেরপরে যাঁরা ভারতে এসেছেনতাঁরা বিছানা-বেডিং বেঁধে রাখুন১৬ মে- পরে তাঁদের বাংলাদেশে ফিরে যেতে হবে বলতে পারেন।
 এই মোদির নেতৃত্বে দেশের সম্পদ পুঁজিপতিদের হাতে তুলে দেবার জান্য, নরহত্যার জন্য যদি টাকা লাগে দেবে কর্পোরেট গৌরী সেন। সুতরাং দেশকে মোদির যুগে ঠেলে দাও। গুজরাট মডেল সামনে লাও। সমস্ত মিডিয়াগুলিতে সারাক্ষণ প্রচারিত হোক মোদিবাবুর কীর্তন। আবাল বৃদ্ধ বনিতা নমো নমো গাইতে শুরু করুক। কেননা নমো হলেন একালের অশ্বমেধের ঘোড়া।
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