डेटलाइन कोलकाता नौ
असली अंडे सेंते लोग
#डेटलाइन_कोलकाता
हमने जनसत्ता के लिए आवेदन नहीं किया था।
अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग वर्ष 1991 में नहीं, बल्कि 30 अक्टूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 को हुई थी। उस वक्त मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव। कर्फ्यू और दंगों का दौर शुरू हो गया।इससे पहले आरक्षण विरोधी आंदोलन चल रहा था।
विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) ने भारत के प्रधानमंत्री के पद से 7 नवंबर 1990 को इस्तीफा दिया था। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव हारने के बाद उन्होंने यह इस्तीफा दिया था।इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में राम रथ यात्रा के दौरान गिरफ्तार किया गया था। इस गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने समर्थन वापस लिया और वीपी की सरकार गिर गई।
वीपी सरकार के गिरने के बाद घृणा और हिंसा की राजनीति को बढ़ाने में अखबारों की अहम भूमिका थी।
तब टीवी चैनल के एंकर नहीं थे।
हम कार सेवा और दंगों की खबरों को बेहद संयमित ढंग से छाप रहे थे।पूरा संपादकीय की रणनीति थी कि हम उन्माद को बढ़ावा नहीं देंगे। मृतकों की संख्या कुछ भी छप रही थी अखबारों में।दंगा,कर्फ्यू, फायरिंग का माहौल था।
उन्माद फैला रहे अखबारों का सर्कुलेशन बहुत ज्यादा हो गया और अपना लगातार गिरता जा रहा था।
वीरेन डंगवाल, सुनील साह, इंदुभूषण रस्तोगी, इंद्रकांत मिश्र, देशपाल पवार और उदित साहू जी के साथ हम सभी दृढ़ संकल्प थे कि इस आग में हम घी नहीं डालेंगे।
इसी बीच एक दिन मालिक जी आगरा से आ गए। दो युवा मालिक संपादकीय के साथ थे,लेकिन बड़े मालिक सर्कुलेशन गिरने से बौखलाए हुए थे। सीधे प्रेस में दनदनाते हुए घुस गए।
मैं पहला पेज बना चुका था। प्रूफ देख रहा था।
मालिक जी ने पेज मुझसे छीनकर सबके सामने फाड़ दिया। बोले, इन लोगों ने सत्यानाश कर दिया। लगाओ दंगों की खबरों पर ऊपर बैनर, बीच में बैनर और बॉटम में भी बैनर।
मैंने उनके मुंह पर कह दिया, मैं नहीं करता नौकरी। कहकर मुख्य गेट से बाहर निकल गया।तो स्थानीय मालिक ने दौड़कर मुझे पकड़ लिया।बोले, उनको आप जानते हैं। गुस्से में हैं।आप अंदर चलिए। अंदर मैं चला गया लेकिन कह दिया, अब यहां मैं काम नहीं करूंगा।
दफ्तर से घर लौटकर मैंने प्रभाष जोशी जी को एक निजी पत्र लिखा कि वे मुझे कोलकाता जनसत्ता की टीम में शामिल कर लें। उन्होंने शामिल कर लिया। हमारे सारे साथी अखबार छोड़ने के खिलाफ थे।
वीरेन दा ने कहा, जाओ। जरूर जाओ। लौटने में कितना वक्त लगता है? हालांकि मेरा लौटना नहीं हुआ।
कोलकाता में मैं सबसे पहले वहां के सबसे बड़े बांग्ला अखबार समूह में गया,जहां बांग्ला साहित्य के तमाम दिग्गज संपादकीय में थे। फिर उनसे मुलाकाते होती रही।
इसी अखबार ने ममता बनर्जी को शुरू से प्रोजेक्ट किया,उनकी छवि बनाई, उन्हें विपक्ष के नेता और आंदोलनकारी बतौर प्रतिष्ठित किया और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
चुनाव हारने से पहले तक यह समूह दीदी के साथ था।क्योंकि यह समूह कम्युनिस्टों के सख्त खिलाफ है और मुक्त बाजार के कॉरपोरेट राज का प्रवक्ता भी।
ममता के चुनाव हारते ही इस अखबार में कमल की खेती शुरू हो गई। सत्ता विरोध उनकी ब्रांडिंग थी और मार्केटिंग भी।
अब सत्ता के विरुद्ध कोई खबर नहीं होती। आंदोलन की भी कोई खबर नहीं। जो कुछ छपता है,सत्ता के पक्ष में,आंदोलन के खिलाफ, जनता के खिलाफ।
एकमात्र संस्करण की प्रसार संख्या के हिसाब से देश का शायद यह सबसे बड़ा अखबार है।वर्गीकृत विज्ञापन में रोजाना इनकी करोड़ों की कमाई है। बांग्ला साहित्य और प्रकाशन जगत पर इनका शुरू से अबतक एकाधिकार वर्चस्व है।
अखबार वाले भी अंडे सेंते लोग हैं।
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