डेटलाइन कोलकाता अड़तीस
आज आंदोलन केंद्रित #प्रेरणा_अंशु का नवंबर अकन फाइनल हो गया। कल 31 अक्टूबर को रुद्रपुर में प्रेरणा अंशु और अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz की नाट्यसंध्या है। कल इंदिरा गांधी का शहादत दिवस भी है।उनके प्रयत्न के बाद जो राजनीतिक संकट हुआ और जिस राजनीतिक संकट में उनका निधन हो गया, वह दुस्समय अब और गहरा गया है।
अस्सी के दशक में देश की सारी नदियां खून से लबालब थीं। आज भी नदियां खून से लबालब हैं। ग्लेशियरों में जो पिघल रह है, वह भी बर्फ बना हमारा ही लहू है।
आपदाओं की घनघटा है।अर्थ व्यवस्था तो खून ही खून है।जल,जंगल जमीन आजीविका रोजगार से लेकर सड़कों और घरों तक खून ही खून।
लगता है कि खून भी सियासत, मजहब, जाति,भाषा, लिंग,नस्ल, क्षेत्र और पहचान के हिसाब से रंग बदल रहा है इन दिनों।हम अपना खून भी देख नहीं सकते।
खून की शिनाख्त बहुत मुश्किल है। लावारिश सा हो गया है खून। फैज़ ने कहा था,कातिल का सुराग नहीं है। कातिल तो नजरों में है। लेकिन किसी का खून नहीं खौलता क्योंकि खून की कोई शिनाख्त नहीं है।
खून भी इन दिनों गिरगिट है।
आर्थिक संकट से पत्र पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं।सभी जानते हैं। सरकार ने अस्सी हजार पत्र पत्रिकाओं का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।किसी को फर्क पड़ा।
फिर भी हमारी बिरादरी के लोग पूंजी सत्ता प्रायोजित उत्सवों में मदहोश हैं।इतने मदहोश हैं कि पता ही नहीं होता कि किस जख्म से खुद ही लहूलुहान है और उन्हें अपने खून की शिनाख्त लायक होश नहीं है।
अब कंटेंट के संकट भी घनघोर है। मीडिया ही नहीं,विधाएं भी पालतू हैं।पता ही नहीं चलता कि कोई विधा जिंदा है या खालिस लाश।
सृजन में भी सड़ांध ऐसी कि सांस लेना मुश्किल है।अवसरवाद है या लोभ या मोह या डर, वजह भी जानना मुश्किल है।
संवाद का जरिया फिर वहीं अकाउंट फ्रिज,बंद होने के बावजूद सोशल मीडिया है।बात कहीं पहुंचती ही नहीं है।
सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में हर आवाज की शिनाख्त मुकम्मल थी।अब हर आवाज खामोश है।
फिरभी जिंदा होंगे तो हरकतें जरूर होंगी।हलचल हो या नहीं।
दिसंबर अंक बाल विशेषांक है,जो तैयार हैं।कृपया बाल विशेषांक के लिए अब रचना न भेजें।।
जनवरी अंक समकालीन कविता विशेषांक होना फिलहाल तय है। हालांकि समय इतना द्रवित है कि कहना मुश्किल है कि जनवरी में हम कविता विशेषण निकाल पाएंगे कि नहीं।
अंक चाहे कोई हो,कविताओं की प्रासंगिकता शायद बनी रहेगी।कविता भी नहीं लिखी जाएगी तो जीने का कोई मतलब है? लिख रहे हैं यानी लिखने से डर नहीं रहे हैं तो समय और समाज को संबोधित अपनी ताजा,मौलिक और अप्रकाशित,प्रासंगिक कविताएं 45 दिसंबर तक हमें जरूर मेल करें।
Mail-
prernaanshu@gmail.com
जीना है तो फिट रहना है क्योंकि न रेंकना है और न रेंगना है।बशर्ते कि रीढ़ सही सलामत हां।उम्मीद है कि इस उत्सवकालिन दुस्समय में भी आप सही सलामत हैं।
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक
06398418084
#कवि #कविता
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