
कथा जो दर्ज नहीं कर सके हम
सरला जी नहीं रहीं।मेरे भाई P Lochan से उन्होंने कहा था,पुलिनबाबू मेरे भाई हां। लोचन से उनकी लंबी चौड़ी बात हुई थी।घर लौटकर लोचन कहा कि उन्हें सबकुछ याद है।उनसे एक बार मिल लो।
अगले ही दिन जाकर उन्हें प्रणाम कर आया।दुलाल बाबू से कहा,इनसे बात करनी है। तराई के आबाद होने की कहानी उनकी जुबानी सुननी है।तब काफी सर्दी थी और उनकी तबियत ठीक नहीं थी। दुलाल बाबू ने कहा कि धूप खिलने दीजिए,तब धूप में बैठकर बात कर लीजिएगा।
फिर धूप नहीं खिली।बात नहीं हुई।
108 साल की मनमोहिनी देवी से सूरज फार्म में बात तो हुई थी,लेकिन Rupesh Kumar की विस्थापितों की आपबीती की किताब #छिन्नमूल के लिए उनकी बातचीत रिकॉर्ड नहीं हो सकी।उन्हें सबकुछ याद था। मुझे करीब पचास साल पहले देखा था,लेकिन देखते ही पहचान लिया। हमारे घर के सभी लोगों को याद किया।पूर्वी बंगाल की अनेक कहानियां सुनाई।
जब हम रिकॉर्ड करने जाने ही वाले थे,पता चला कि मनमोहिनी जी चली गईं।
अपनी कहानियों की पोटली लेकर सरला जी भी चली गई।
अजीब कोफ्त होती है अपनी बेबसी पर। इतने सारे बुजुर्ग चले गए और उनकी जुबानी उनकी कथा दर्ज करने से हम चूक गए।
दुलाल चक्रवर्ती नामी पत्रकार हां।अभी शोक में हैं। मां की कोई उम्र नहीं होती। मां मां होती है। हम भी उनके शोक में शामिल हैं। सरला जी कहे मुताबिक वे हमारी बुआ थीं। यह रिश्ता खून के रिश्ते से बड़ा है।
विभाजन की त्रासदी में हमारे कटे फटे लोग सबकुछ खोकर आए थे।जल जंगल जमीन ही नहीं अपनी जिंदगी, अपनी पहचान, रिश्ते नाते, भाषा,संस्कृति,इतिहास,भूगोल,विरासत और परिवार भी। वे सभी एक दूसरे के रिश्तेदार थे।
एक नया समाज बना तब,जब तराई बस रही थी।धर्म, जाति,भाषा की दीवारें ध गई थी तराई के घने जंगल में। सभी समुदायों के लोग,बंगाली,सिख,पंजाबी,पहाड़ी,देशी,पूर्बिया, थारू बुक्सा मुसलमान गांवों के लोग तब रिश्तेदार थे।
जंगल अब भी हां।सीमेंट का जंगल।
यहां सिर्फ दीवारें हैं।अपना के बीच भी दीवारें खड़ी हो गई।
पुरानी तराई अपने साथ ले गई सरला जी।
हम देखते ही रह गए।
अंतिम प्रणाम कहने का मौका ही मिला।
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
मुझे उम्मीद है कि दुलाल बाबू अपनी मन की कथा जरूर दर्ज करेंगे।जो भी बुजुर्ग उस समय के बारिश हैं,उनके परिवार,गांव के लोग यह अनकही कथा दर्ज करें तो हमारा अपराध थोड़ा कम हो जाएगा।
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