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तराई के शरणार्थी उपनिवेश में यह 1964या 1965 की मेरी तस्वीर है।घने जंगल और उससे घनी गरीबी, मौसम और जलवायु की तस्वीर है यह।सिर्फ मेरी नहीं।मेरे चेहरे में छिपी है भारत विभाजन के शिकार हुए लोगों की उजड़ी दुनिया।
1965 में सर्पदंश से सुबल दा की मृत्यु ही गई थी। मेरे बचपन की यह तस्वीर उस समय की है। मेरे चाचा डॉ सुधीर विश्वास तराई में तब शायद एकमात्र RMP डॉक्टर थे।रुद्रपुर में दो डॉक्टर थे डॉ रस्तोगी और डॉ शाही और गदरपुर में डॉ गुप्ता।
भारत विभाजन के शिकार लोगों की पहली पीढ़ी अपढ़ अधपढ़ थी।दूसरी पीढ़ी को पुनर्वास की लड़ाई में पढ़ने का मौका ही नहीं मिला था।खुद पिताजी पुलिनबाबू कक्षा दो तक पढ़े थे।
इन लोगों का इलाज करते थे मेरे चाचाजी।इस हादसे से पहले पिताजी के असम से लौटने के बाद चाचाजी असम के दंगा पीड़ित नौगांव इलाके में विस्थापितों का इलाज करके आए थे 1960,61 में।तराई में घना जंगल था और असम में भी।
चाचाजी सर्पदंश के मरीजों का भी इलाज करते थे।लेकिन एंटी वेनम इंजेक्शन ग्रामीण इलाकों में आज भी सुलभ नहीं है। 1965 में कैसे मिलता?
चाचाजी साइकिल से मरीज देखने जाते थे। मुझे वह दृश्य आज भी याद है। सुबल दा को सर्पदंश की खबर मिलते ही चाचाजी सिरिंज में इंजेक्शन भरकर गांव से करीब डेढ़ किमी दूर उनके घर रवाना हुए थे।कोबरा ने डंसा था।चाचाजी पहुँचते,इससे पहले सुबल दा दम तोड़ चुके थे।
आज इकसठ साल बाद उनकी पत्नी का देहांत हो गया। शुरू से उनका घर बसंतीपुर, विजयनगर और हरिदासपुर के मध्य में बसंतीपुर की सीमा पर थी।नैनीताल पढ़ते हुए भी उस घर में आना जाना था। रिटायर होने के बाद घर लौटकर एकबार गया था।तब भाभी जी से मुलाकात हुई थी।
सुबल दा के पिताजी का भी निधन हो गया।उनके दो बेटे थे।बड़े बेटे का निधन मेरे घर लौटने के बाद हुआ।छोटा बेटा अमूल्य पिता की मृत्यु के वक्त गर्भ में था,जो इकसठ साल का हो गया। अक्सर उससे मुलाकात हो जाती तो भाभी का हाल पूछ लेता लेकिन जाने का मौका नहीं मिलता।
भाभी दो दिन पहले रिश्तेदारी में रुद्रपुर गई थी।जहां उन्हें लू लग गई थी और आज शाम साढ़े पांच बजे उनका निधन हो गया। दफ्तर से घर लौटते ही खबर मिली।भतीजा पावेल तुरंत मोटर साइकिल से मुझे उनके घर ले गया।
जब उनके घर पहुंचा तब उनकी अर्थी निकल रही थी।शवयात्रियों के साथ बसंतीपुर के श्मशान घाट पहुंचकर उनको अंतिम प्रणाम कर पाया।
उनके निधन के बाद भी इन इकसठ सालों में मुझे उनका नाम नहीं मालूम पड़ा। लेकिन वह आज शाम साढ़े पांच बजे तक जीवित थीं।

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