डेटलाइन कोलकाता सैंतीस
दैनिक जागरण मेरठ में सहकर्मी रहे Opsaxena Saxena जी ने 31 अक्टूबर 1984 की हमारी मनोदशा पर एक संस्मरण साझा किया है,जिसे हम भूल ही गए थे।उनका आभार।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की एकता,अखंडता, विविधता, बहुलता और संप्रभुता को जो खतरे बन गए थे, उसकी आशंका 31 अक्टूबर को भी बेचैन कर रही थी।वे खतरे कभी खत्म नहीं हुए फिर।बढ़ते जा रहे हैं।
इंदिरा जी को श्रद्धांजलि।अस्सी के दशक में देशभर में हिंसा और दंगों में मारे गए सभी लोगों को श्रद्धांजलि।
ओपी ने लिखा है:
मैं तो जिन पलाश जी को जनता हूं वो खबरों में डूब जाने वाले पलाश जी थे। मुझे याद है मेरठ दैनिक जागरण में पलाश जी जनरल डेस्क के इंचार्ज थे और मैं सिटी रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा था।
इंदिरा गांधी जी को गोली मारे जाने की खबर आई तो ये तय हुआ की दिन में ही एक विशेष संस्करण निकला जाए जो 12 - 1 बजे तक मार्केट में हो।
अखबार के मालिक और निदेशक धीरेंद्र मोहन जी भी ऑफिस आ गए थे। अखबार लगभग तैयार हो गया था लेकिन तबतक इंदिरा जी के मरने की अधिकार घोषणा नहीं हुई थी। न्यूज रूम में जबरदस्त तनाव का माहौल था।
पलाश जी बार बार भाग कर टेलीप्रिंटर रूम में जाते। दिन के लगभग एक बजने वाले थे। उधर प्रोसेस में धीरेंद्र मोहन जी ने आदेश दे दिया था कि अखबार को अब और लेट न किया जाए और प्रधानमंत्री पर जानलेवा हमले की हेडिंग से ही इसे छाप दिया जाए।
इस आदेश पर पेज को प्लेट बनने के लिए भेजा ही जाने वाला था की पलाश जी टेलीप्रिंटर का एक तार पढ़ते और चिल्लाते हुए प्रोसेस रूम की ओर भागे.....रोक दो रोक दो मर गई मर गई।
इसी बीच जमीन पर फैले टेलीफोन आदि के तारों में उनका पैर उलझा और वो धड़ाम से गिरे लेकिन बिना एक पल गंवाए वो उठे और फिर भागे।
प्रोसेस रूम में पहुंचते पहुंचते उन्होंने पूरा तार पढ़ा। फिर दृश्य बना उसे याद कर आज भी मैं हंस पड़ता हूं। हुआ यूं की पलाश जी अभी भी चिल्ला रहे थे....रोक दो रोक दो मर गई मर गई।
उनके हाथ में तार एक हिस्सा था और दूसरा हिस्सा धीरेंद्र मोहन जी के हाथ में। इसी दौरान पलाश जी ने तार को पूरा पढ़ लिया और तार को धीरेंद्र मोहन जी के हाथ से लगभग छीनते हुए चिल्लाए...नहीं मरी नहीं मरी नहीं मरी।
उस समय हम सब पलाश जी को हतप्रभ हो कर देख रहे थे। धीरेंद्र मोहन जी के मुंह से बस एक ही वाक्य निकला... अरे क्या हो गया है इनको?
सच कहूं तो खबरों के साथ ऐसा इन्वालमेंट मैने अपने बत्तीस साल के पत्रकारिता जीवन में किसी भी पत्रकार में नहीं देखा।

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