जन्मजात पत्रकार हूं क्योंकि पत्रकारिता समाज के लिए होती है
पलाश विश्वास
मैं जन्मजात पत्रकार हूं।भारत विभाजन के शिकार पूर्वी बंगाल के एक दलित शरणार्थी परिवार में जब मेरा जन्म हुआ,तो अपने ही देश में रातोंरात शरणार्थी बन गए उखड़े हुए लोग नई जड़ों की तलाश में जीवन मरण की लड़ाई लड़ रहे थे। अपनी नागरिकता, जल जंगल जमीन और नागरिकता से वंचित लोग अपनी मातृभाषा से भी बेदखल हो गए थे।जन्म से ही मैने अपने पिता से सुना हमारी लड़ाई जीतने के लिए मातृभाषा समेत सभी भाषाओं पर दखल होना जरूरी है। मेरे पिता कक्षा दो तक ही पढ़ सके थे। हमारे अधिकांश लोग या तो अपढ़ थे या अधपढ़।मैट्रिक पास कोई नहीं था। तब हिमालय की तलहटी में उत्तराखंड की तराई के घने जंगल में बाघों का चारा बनाकर हमारे लोगों को दलदल के मध्य फेंका गया था।पुनर्वास की लड़ाई विभाजन की त्रासदी और आजादी के लिए स्वतन्त्रता संग्राम से बड़ी थी।हमारे लोग इतिहास भूगोल से बेदखल थे।उनकी कथा,आपबीती कहीं दर्ज नहीं हुई। उनके अपने अस्तित्व,अस्मिता के दस्तावेज तैयार करने थे।मेरे जन्म से पहले यह मेरी जिम्मेदारी हो गई।क्योंकि सिर्फ तराई में ही नहीं, देशभर में मेरे पितापुलिनबाबू पुनर्वास की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे थे।उन्हें हिंदी आती नहीं थी।अक्षर पहचानने के साथ ही मुझे उनकी चिट्ठी पत्री, देश के सभी नेताओं,भारत सरकार, राज्य सरकारों,,प्रशासन को लिखे जाने वाले ज्ञापन लिखने थे।वह विस्थापितों का ही नहीं किसान आंदोलन का दौर था। मेरे जन्म के दो साल बाद 1958 में ढिमरी ब्लॉक किसान विद्रोह के भी वे नेता थे।छात्र जीवन में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हुए भी चिपको आंदोलन के दौरान मुझे हिंदी में पत्रकारिता करनी पड़ी। 1980 में धनबाद के दैनिक आवाज से पेशेवर पत्रकारिता शुरू की तो झारखंड आंदोलन, आदिवासी दुनिया और कोयला खानों पर लिखना पड़ा। दैनिक
प्रभात खबर,दैनिक जागरण, दैनिक अमर उजाला होकर 1991 से 2016 तक दैनिक जनसत्ता में पेशेवर अखबार हर रात निकालते हुए हमने हमेशा एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह हर खबर पर स्टैंड लिया,हर खबर के लिए लड़ा और लिखा। रिटायर होने के बाद भी आज तक अपने शरणार्थी उपनिवेश से लगातार चालीस साल से निकल रही प्रेरणा अंशु में भी मेरी जन्मजात पत्रकारिता जारी है।
पिताजी जन आंदोलनों के नेता थे। मुकदमे और कचहरी की लड़ाई भी जरूरी थी। इसलिए वकीलों और पत्रकारों से वे प्रभावित थे।शरणार्थियों के आंदोलन के दौरान 1956 में पीटीआई और पायनियर अखबार के बरेली संवाददाता एनएम मुखर्जी से उनकी अंतरंगता थी। इसलिए रोज मुझे हिंदी,बांग्ला,अंग्रेजी के अखबारों के संपादकीय जरूर पढ़ने होते थे। रवींद्र,नजरुल,सत्येंद्र नाथ दत्त,सुकांत की कविताएं स्वर रोज आवृत्ति करनी होती थी।हिंदी अंग्रेजी बांग्ला साहित्य पढ़ना हमारे लिए अनिवार्य था। मराठी,पंजाबी और असमिया अखबार जब मिल जाते थे,उन्हें भी पढ़ना था।ताकि अपने हाशिए के लोगों की लड़ाई के लिए भाषाओं पर मेरा दखल हो। ताकि विस्थापितों और किसानों की आवाज बुलंद हो और उनकी सुनवाई हो,उन्हें उनका हक मिले। पिताजी की 2001 में मृत्यु के बाद उनकी लड़ाई मेरी जिम्मेदारी बन गई और मैं सामाजिक कार्यकर्ता बन गया। दरअसल मैं लिखते पढ़ते हुए होश संभालने के बाद आज तक एक सामाजिक कार्यकर्ता ही हूं। सत्तर पार हूं,इसलिए साहित्य कला और पत्रकारिता को हमने हमेशा समाज में सामाजिक प्राणी की रचनात्मक सामाजिकता के रूप में ही देखा।
आज के पत्रकारों की तरह हमारे पास पत्रकारिता की कोई डिग्री नहीं है। पेशेवर पत्रकारिता ने हालांकि तकनीक सीखा दी। जिंदगी हिंदी में बीता दी, लेकिन पढ़ाई मेरी अंग्रेजी साहित्य और भाषा की हुई।सिर्फ एक पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री अंग्रेजी भाषा और साहित्य की है। सामाजिक गतिविधियों के कारण डिग्रियां बटोरने की मुझे फुर्सत नहीं मिली।लेकिन विभिन्न विषयों में अध्ययन जरूर किया है। शोध किए हैं लेकिन पी एच दी या एम फिल नहीं किया। वैचारिक रूप में हमेशा सत्ता और व्यवस्था के विरोध में खड़ा रहा,क्योंकि समाज और समय की चुनौतियों से निबटने के लिए इसके सिवाय कोई दूसरा रास्ता मुझे नहीं दिखा।
एक विषय है,जिसमें मैने कुछ नहीं पढ़ा। वह है पत्रकारिता।वैसे भी जनता का आदमी होने के कारण विमर्श से मेरा कभी लेना देना नहीं है। मैने पत्रकारिता अपने समय, समाज से और अपने लोगों के रोजमर्रा की लड़ाई से सीखा।मेरे सवाल और मुद्दे हमेशा जनता,समाज और समय के सवाल और मुद्दे रहे हैं। साहित्य,कला और पत्रकारिता का भी यही मूल आधार है।यह मेरे सत्तर साल के जीवन का अनुभव है।सारांश भी।
आज जब मैं यह लेख शुरू कर रहा हूं,तब मूसलाधार बारिश हो रही है। प्रकृति और पर्यावरण को भी मैं निहायत जरूरी समाजिक मामला मानता रहा हूं और हिमालय से जुड़े होने के कारण मेरी पत्रकारिता का मुख्य स्वर और तेवर भी यही है। पंच तत्व में विलीन हो गए बिरंची बाबू, तराई को बसाने वाले हमारे महायोद्धाओं में से एक,जिनसे हमने पत्रकारिता सीखी।
कल अपराह्न जब उन्होंने अंतिम साँस ली, उसके बाद बारिश शुरू हो हुई।तब से लगातार मूसलाधार वर्षा हो रही है।जब तराई बस रही थी,तब भी ऐसी ही मूसलाधार बारिश होती थी।लगातार सात दस दिनों तक। हिमालय की तलहटी में तब कोई नदी बंधी नहीं थी।न पहाड़ में नदियां कहीं कैद थी। तराई में तब घना जंगल था। असंख्य नदियां थी और सर्व व्यापी दलदल था।
इस तराई को जिन लोगों ने आबाद किया,उनकी पीढ़ी के शायद आखिरी आदमी की अंतिम विदाई का मौसम कम से कम वही बन गया। उसी दौरान हमारा चूंकि जन्म हुआ था भारत विभाजन की त्रासदी के जख्म जब हरे और लहूलुहान थे, नए सिरे से जड़ें खोजने की जद्दोजहद जब बहुत भयानक थी,विभाजन की त्रासदी से भयानक,आत्मघाती घृणा और हिंसा से भी भयानक, इसलिए जंगल की उस आदिम गंध और दलदल के मौसम से अब भी आजाद नहीं हूं।
मूसलाधार बारिश में भाई मनोरंजन साना के साथ करीब पांच किमी दूर उनके दुर्गापुर नंबर दो स्थित गांव पहुंचा।यह सबसे पुराने गांवों में से एक है।
मोहनपुर नंबर एक, विजयनगर और दुर्गापुर नंबर दो में तब अस्थायी शरणार्थी शिविर थे। जंगल आबाद नहीं हुए थे।जंगली जानवर बहुत थे। पुनर्वास उपनिवेश के गांवों को दलदल और जंगल में बसाने की कवायद चल रही थी बिना सरकारी मदद के।
जंगल में ट्रकों से फेंक दिए गए थे हमारे लोग। जंगल के मध्य इन तीन गांवों में तंबू में ठहराए गए थे लोग। मोहनपुर नंबर एक, दुर्गापुर नंबर दो और विजयनगर थोड़ी ऊंचाई पर थे,जहां दलदल नहीं था।जैसे जैसे बाकी गांव बसते गए,लोग इन तीनों गांवों से अपने अपने गांव में जा बसे।
मूसलाधार बारिश के बीच भी लोग आते रहे। आम मोटर साइकिल और कार बहुत आम हैं।सड़कें जैसी भी हो,पक्की है। जिन्हें आना था,वे सभी आए।
उनका पार्थिव शरीर रिवाज के मुताबिक माटी पर रखा था। शामियाना टंगा था। लेकिन मूसलाधार बारिश में लगा तराई के दलदल में बिरंची बाबू गहरी नींद में हैं। न खुलने वाली नींद में।मुझे लगा कि चारों तरफ धुआंधार सीमेंट के जंगल के मध्य फिर बचपन के उस दलदल में हूं।
जिन महायोद्धाओं के सान्निध्य में बचपन बीता, उनमें से शायद यह अंतिम महायोद्धा की अंतिम विदाई है। पुनर्वास की लड़ाई स्वतंत्रतासंग्राम से कहीं ज्यादा मुश्किल है।
बारिश कुछ रुकी भी।उस विराम के अभ्यांतर में अंतिम यात्रा जब तक दिनेशपुर श्मशान घाट पहुंची, फिर मूसलाधार शुरू हो गई बारिश। वर्षा के मध्य ही उन्हें चिता पर रखा गया और मुखाग्नि दी गई।
दिनेशपुर की आबादी अब पचास के आसपास है। 15 किमी दूर रुद्रपुर की आधी आबादी बंगाली है। मोटर साइकिलें और कारें अब असंख्य हैं। लेकिन अपने महायोद्धा को विदा करने वाले गिनती के ही थे। जिन्हें आना था,वे नहीं आए।शोक से यह दुख बड़ा है।
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