डेटलाइन कोलकाता तेरह
#डेटलाइन_कोलकाता
गुरुजी ब्रह्मदेव सिंह शर्मा पत्रकारिता में हमारे गुरुजी थे
पलाश विश्वास
हम प्रोफेसर बनना चाहते थे और नैनीताल डीएसबी कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य में शोध की तब 1979 में कोई व्यवस्था नहीं थी। कुमाऊँ विश्वविद्यालय नया बना था।नए नए कॉलेज खुल रहे थे,जहां नौकरी मिल सकती थी।
#डीएसबी में भी अस्थाई नौकरी मिल सकती थी।लेकिन हमने पी एच डी करने का इरादा बना लिया था। #इलाहाबाद_विश्वविद्यालय के डॉ #मानस_मुकुल_दास से डीएसबी में मेरी मैराथन बातचीत हो चुकी थी अंग्रेजी कविता पर।
तब डॉ #विजयदेव_नारायण_साही जी भी उनके साथ अंग्रेजी विभाग में थे
डॉ #मधुलिका_दीक्षित उनकी छात्रा थीं,जो डीएसबी में हमें पढ़ती थीं।उन्होंने कहा कि डॉ दास की गाइडेंस से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पी एच डी कर लो। डॉ बटरोही हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे।
उन्होंने कहा कि सीधे #शैलेश_मटियानी जी के घर चले जाओ।उनके साथ रहकर शोध पूरा कर लेना।बटरोही जी ने उनके साथ रहकर ही पी एच डी की थी।उनकी पत्रिका विकल्प के वे संपादक थे। इलाहाबाद जाने के लिए पैसे डॉ #शेखर_पाठक ने दिए थे।
घर में बताए बिना बटरोही का पत्र लेकर पहाड़ से मूसलाधार वर्षा और भूस्खलन के मध्य मैदान में बरेली पहुंचा और सहारनपुर पैसेंजर पकड़कर सीधे प्रयागराज स्टेशन पहुंचकर शैलेश जी के घर पहुंचे। शैलेश जी ने तुरंत मुझे डॉ रघुवंश के पास भेज दिया। रघुवंश जी ने कहा हिंदी में MA कर लो।रिसर्च भी हिंदी में कर लेना। मुझे यह मंजूर न था।
अंग्रेजी विभाग पहुंचे तो डॉ दास ने कहा कि उनका कोटा पूरा हो गया।उन्होंने मुझे डॉ मालवीय से मिलाया,जो गाइड बनने को तैयार थे। शर्त यह थी कि उनकी पत्रिका में उनकी मदद करूँ।उन्होंने थीसिस की सिनॉप्सिस तैयार करने को कहा।
#विकल्प के नए अंक की तैयारी थी और मटियानी जी #धर्मयुग में संजय गांधी के साथ अपनी तस्वीर खींचने से नाराज थे।वे #धर्मवीर_भारती जी के खिलाफ मानहानि की तैयारी में थे। उनके घर कोई कमरा खाली नहीं था तो मैं 100लूकरगंज में #शेखर_जोशी जी के घर चला गया।वहीं मैने थीसिस की सिनॉप्सिस तैयार की एंग्लो इंडियन नोवेल पर।
#अमृत_प्रभात में मंगलेश डबराल जी साहित्य संपादक थे।वे लूकरगंज में कवि #वीरेन_डंगवाल के साथ रहते थे। बगल में ही खुसरोबाग रोड पर रहते थे #उपेन्द्रनाथ_अश्क जी।उनके बेटे #नीलाभ मंगलेश जी और वीरेन दा के मित्र थे।हम विश्व विद्यालय से निकलकर अमृतप्रभात चले जाते थे।फिर मंगलेश जी और हम साथ लूकरगंज लौटते थे।
माया प्रेस में थे #अमरकांत जी और #भैरव_प्रसाद_गुप्त जी,जिन्होंने मुझे अनुवाद का काम देना शुरू किया।
मंगलेश जी ने कहा कि अमृत प्रभात ज्वाइन कर लो।
मार्कण्डेय जी भी चाहते थे।
समाचार संपादक माथुर जी भारती करने वाले थे।लखनऊ संस्करण की तैयारी थी।
हमने आवेदन किया लेकिन माथुर जी ने हमें नहीं रखा।
दूसरी ओर, इंडो एंग्लिकन नॉवल पर औद्योगीकरण के असर पर मेरी सिनॉप्सिस देखकर मालवीय जी ने कहा कि कमला #मार्कण्डेय को भी रखो। तीन महीने हो गए थे।हम तब ममफोर्ड गंज में रहने लगे थे।वहां से पैदल चलकर चौक ट्यूशन पढ़ाने जाते थे। लेकिन मालवीय जी से हमारी ठन गई।
मंगलेश दा और वीरेन दा ने कहा, जेएनयू चले जाओ। अमृत प्रभात में ही Urmilesh जी मिले। वे #जेएनयू में मैनेजर पांडे के निर्देशन में राहुल सांकृत्यायन पर शोध कर रहे थे।उन्होंने कहा कि जेएनयू में लिंग्विस्टिक्स पर एम फिल कर सकते हो।फिर यह तय हुआ और अगले दिन दिल्ली रवाना होकर जेएनयू पहुंच गए। माया से पेमेंट मिल गया था और दिनमान के लिए दिल्ली में लिखते थे।
इस बीच #नैनीताल गए तो कप्तान एल एम शाह बोले,कहां थे? डीएसबी में इंग्लिश पढ़ाने वाले चाहिए।दो बार हमने तुम्हारे घर खबर भिजवाई। उन्होंने खुद एप्लीकेशन ड्राफ्ट करके मुझसे कहा कि वीसी से जाकर मिलो। लेकिन मैं उनके दफ्तर के बाहर से लौट आया क्योंकि मैं उनके खिलाफ था।
घर लौटा तो बगल में कोलकाता से एक जात्रा पार्टी आई हुई थी। वहां आयोजकों ने किसी बात पर मेरे दोस्त Nityanand Mandal से बदसलूकी कर दी और मैं गुस्से में था।
उन दिनों तराई में मेरे साथ सैकड़ों लड़के होते थे।हमने कार्यक्रम रुकवा दिया। अफरा तफरी नच गई। गुस्सा शांत हुआ तो मैने कार्यक्रम फिर शुरू करवा दिया।
अगले दिन पंचायत बैठ और पिताजी #पुलिनबाबू ने भरी पंचायत में मुझे इस हंगामे का जिम्मेदार बताते हुए डांट दिया।अगले ही #उर्मिलेश की चिट्ठी आ गई कि फौरन दिल्ली आ जाओ। #धनबाद में दैनिक आवाज को एक उपसंपादक चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए कुछ दिन धनबाद में रह आओ। फिर यूनिवर्सिटी लौट आना।
लौटना नहीं हुआ।धनबाद में आवाज़ के संपादकीय में थे Madan Kashyap जी।उन्हीं के साथ ठहरा।
इससे पहले #वीर_भारत_तलवार और #मनमोहन_पाठक जी भी आवाज में थे।
गुरुजी #ब्रह्मदेव_सिंह_शर्मा जी इस अखबार के संपादक थे।उनके साथ थे बिहार के वरिष्ठ पत्रकार #सतीश_चंद्र।दोनों ने मुझे पत्रकारिता में जोत दिया।मैं दिनभर कोयला खानों में रिपोर्टिंग करता। पेज के पेज रंग देता।
मदन कश्यप अखबार छोड़ चुके थे तो रात में डेस्क भी संभालता था।फिर मिल गए #कामरेड_एके_राय, #शिबू_सोरेन, #विनोद_बिहारी_महतो और #महाश्वेता_देवी।
गुरुजी ने कहा,पहले संपादकीय लिखना सीखो।
वे रोज मुझे पत्रकारिता के पथ पढ़ाते।मेरे कारण आवाज की नीतियां उन्होंने बदल दी।अखबार का तेवर बदल दिया।
मदन जी धनबाद में ही थे।#संजीव कुल्टी में।
#श्रीनारायण_समीर भी आवाज में आ गए।पाठक जी, #बीबी_शर्मा,#अनवर_शमीम, प्रोफेसर प्रभाकर शर्मा के साथ लंबी चौड़ी टीम बन गई।हम झारखंड आंदोलन में थे।
इसी बीच मालिकों में ठन गई ।
सतीश जी ने अलग अखबार निकला।हम गुरुजी के साथ थे।
चार साल हम गुरुजी के साथ थे।लेकिन संपादकीय नीति बदलने लगी तो हम धनबाद छोड़कर रांची #प्रभात_खबर में चले गए। वहां नहीं बनी तो #दैनिक_जागरण मेरठ में।वहां खटपट हुई तो #अमर_उजाला बरेली होकर #जनसत्ता कोलकाता में।
धनबाद से लेकर कोलकाता तक गुरुजी से हमेशा संपर्क बना रहा । महाश्वेता देवी जी से भी।
मुझे पत्रकारिता करने का मौका नैनीताल में ही #दैनिक_पर्वतीय, #नैनीताल_समाचार और #दिनमान में करने का मौका जरूर मिला, #रघुवीर_सहाय जी से पत्रकारिता सीखी, लेकिन दैनिक अखबार के संपादन का काम हमने गुरुजी से सीखा जिन्होंने सतीश जी के साथ 150अगस्त 1947 को आवाज का प्रकाशन शुरू किया था
उन्हें प्रणाम।

No comments:
Post a Comment