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ये हैं कुसुम देवी,बसंतीपुर गांव की सबसे बुजुर्ग नागरिक।करीब सौ साल की उम्र में कल रात साढ़े नौ बजे उनका निधन हो गया।आज हम दिन में उनकी अन्येष्टि करके आ गए।अपने दिवंगत पति अतुल चंद्र शील के अंत्येष्टिस्थल के पास उनकी अपनी जमीन पर उनका दाह संस्कार हुआ।उनकी और हमारी जमीन के बीच एक खेत विधु दादा का है।उनके घर और हमारे घर के बीच तीन घर हैं।
उन्होंने पूरी एक सदी की जिंदगी देखी और मरने से पहले उन्होंने भोजन किया।भोजन के बाद करवट बदलते हुए पूरे होश में प्राण त्याग दिए। उन्होंने 1952 में बसंतीपुर गांव बसने के बाद तत्कालीन नैनीताल जिले की तराई को बसते हुए देखा। वे मेरी मां से बड़ी थीं।अपने बचपन की बहुत सारी स्मृतियां उनके साथ जुड़ी हुई थीं।
गांव में उनके समय की एकमात्र महिला मेरे प्रिय दोस्त नित्यानंद मंडल की चाची जी जीवित है। जिनके प्यार में हम बड़े हुए वे सभी एक एक कर चली गईं।अब ये भी ..
पुरुषों में सिर्फ विधुभूषण अधिकारी और फूल चांद मंडल अस्सी पार हैं,जो हमारे बचपन में जवान हुआ करते थे।
अब घरों के बीच दीवारें हैं। उन दीवारों में न कोई दरवाजा है और न खिड़की।अपने ही गांव में अपने ही लोगों के बीच हम अजनबी, पराया हो गए।
कुसुम जी और अतुल जी के दो बेटे हैं दीपक और देवाशीष।पांच बहनों के बाद।दोनों मेरे छोटे भाई हैं।सबसे बड़ी देवला दीदी मेरी दीदी मीरा दी की पक्की सहेली हैं,जिनकी शादी 1961 में हुई।वे तब पांचवीं में पड़ती थी।में तब आधी कक्षा में।उनकी पढ़ाई विस्थापन के कारण देरी से शुरू हुई और शादी जल्दी हो गई। देवला दी की बेटी दीपा अजीम प्रेमजी में शिक्षिका हैं।
जब मैं मेरठ जागरण में अप्रैल 1984 में संपादकीय में शामिल हुआ,तब जीजाजी और देवलादीदी हस्तिनापुर में थे।मदन मिल बंद होने से वे बेरोजगार थे।लेकिन मुझे उन्होंने अपने साथ ठहरा लिया।मेरठ में किराया का घर न मिलने तक मैं उनके घर से आता जाता था।
दूसरे नंबर पर कमला दी थी।जो हरिदासपुर स्कूल में पांचवीं की छात्रा तीन और में कक्षा दो का। उनकी शादी 1964 में पांचवीं पास होते ही हो गई। वे बाद में बसंतीपुर में ही बस गई और करीब दस साल पहले उनका निधन हो गया। अमला,शिवानी और हरिदासी मुझसे छोटी हैं।देवाशीष के बाद दो बहनें और हैं। करुणा और बसंती।सभी भाई बहनों का अपना अपना परिवार है,अपने अपने रिश्ते नाते भी।
कुसुमदेवी अपने माता पिता की एकमात्र संतान थीं।जो उन्हीं के साथ बसंतीपूर में बस गए थे।उनके पिता साहित्यप्रेमी थे।वे तराई में बांग्ला साहित्य की दुकान चलाने वाले एकमात्र व्यक्ति हुए। हमेशा पढ़ते रहते थे।हमने बचपन में ही बांग्ला साहित्य उन्हीं की बदौलत पढ़ना सीख। जब हम छठीं कक्षा में पहुंचे,उनसे हमारी दोस्ती हो गई।
उनके दिवंगत होने के बाद तराई में बांग्ला भाषा और साहित्य की चर्चा बंद हो गई।
संजोग की बात है कि कुसुमदेवीं ने अपने पिता के घर में ही दम तोड़ा।वे इसी घर में अपने छोटे बेटे के परिवार के साथ रहती थी।
उनके जाने का मतलब है कि हमारे बचपन के सुनहले हिस्से का अतीत में दफन हो जाना।
हम इसी तरह अतीत में विलीन होते जा रहे हैं।वजूद ऐसे ही किरचों में बिखरता जाता है और हमारा बस में कुछ नहीं होता।
प्रेरणा अंशु के लघु कथा विशेषांक पर काम शुरू हो गया।सोचा था कि अंतेष्टि में शामिल होकर दफ्तर जाऊंगा। जा नहीं सका। धूप कड़ी है और शोक सबसे कड़ा।दोनों अपने खेत से गुजरते हुए भी एकसाथ झेलना कितना क्षीण है,पहली बार महसूस हुआ।
संजोग की बात है कि अपने सपनों के पीछे भागते हुए चार दशक घर,गांव से बाहर दौड़ता रहा। मेरे सारे प्रिय स्त्री पुरुषों का देहांत मेरी अनुपस्थिति में हुआ। मेरे माता,पिता, ताई और चाचा की भी।
थका हुआ जब घर लौटा तो बूढ़ा हो गया।दफ्तरों काम करते हुए उम्र जरूर भूल जाता हूं लेकिन शरीर का क्या करें? यह भी तो अतीत में समाहित होने लगा।
कुसुमजी को विनम्र श्रद्धांजलि।अंतिम प्रणाम।
पलाश विश्वास
13.05.2023

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