डेटलाइन कोलकाता बारह
इसी इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता के संपादक में हमने पूरे पच्चीस साल जिंदगी के बीता दिए। पच्चीस साल तक हर रात हमने जनसत्ता निकला।
एक्सप्रेस समूह के संपादकीय से अन्यत्र नौकरी के बेहतर और बड़े अवसर अक्सर सभी साथियों को मिलते है। तमाम मतभेद,लड़ाई के बावजूद हमने किसी अवसर के लिए एक्सप्रेस नहीं छोड़ा। क्योंकि न्यूज ब्रेक करने के मामले में इंडियन एक्सप्रेस की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है।
इस मामले में फैसला करने में सुविधा इसलिए हुई कि जब भी कोई ऑफर आया, सविता जी ने वीटो लगा दिया।बोली,एक्सप्रेस छोड़कर कहां जाओगे? हमें न पद चाहिए, न पैसे और न बेहतर जिंदगी।
एक्सप्रेस से बेहतर कोई जगह मेरे लिए उनकी नजर में नहीं थी। जब टकराव बढ़ता गया, अखबार की नीतियां बदलती गई, तब भी हमने दूसरे विकल्प पर नहीं सोचा।
क्या हम गलत थे?
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