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हमारे महायोद्धा
कुमुद रंजन सरकार
साठ के दशक में बंगाली विस्थापित इलाका दिनेशपुर से कुमुद रंजन सरकार सरपंच और जिला परिषद के सदस्य थे।अब सरपंच नहीं होते और जिला परिषद जिला पंचायत है।
खुलना जिले से आए कुमुदबाबू जैसोर के पुलिनबाबू का साथ आखिर तक निभाते रहे। तराई में पुनर्वास की लड़ाई में वे शुरू से आखिर तक पिताजी के साथ थे।
उनका गांव पंचाननपुर,हमारा गांव बसंतीपुर और उदयनगर का गठन 1952 में हो गया था। लेकिन पुनर्वास विभाग ने इन तीनों गांवों का पंजीकरण रोक दिया। तीन गांवों के लोगों ने 1954 में रुद्रपुर में इसके खिलाफ आंदोलन,धरना,प्रदर्शन और आमरण अनशन किया।पुलिनबाबू नेतृत्व में थे और उनके साथ थे कुमुदबाबू,दूसरे मातबरों के साथ।
फिर हर आंदोलन,संघर्ष और संकट में कुमुद बाबू की तीक्ष्ण बुद्धि विस्थापित समाज के बहुत काम आई।वे कानूनी दांव पेंच में माहिर थे।इसलिए उन्हें चाणक्य भी कहा जाता था।
उनकी मां मेरी दादी शांति देवी की पक्की सहेली थीं। उनका बड़ा बेटा सुभाषेंदु मेरा सहपाठी रहा है दिनेशपुर high school में।मेरे जीईसी नैनीताल जाने से साथ छूट गया।लेकिन उनका भांजा दिवंगत दीप्ति सुंदर मल्लिक डीएसबी कॉलेज में भी मेरे सहपाठी थे।
कुमुदबाबू की बेटी संदीपनी सरकार अध्यापिका हैं और प्रेरणा अंशु की आजीवन सदस्य।
कुमुदबाबू के बेटे अर्धेंदु ने अमेजन ऑनलाइन स्टोर से मेरी किताब पुलिनबाबू खरीदकर अपने पिताजी की यह तस्वीर साझा की है।
तराई बसाने में जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, ऐसे परिवारों की नई पीढ़ी अपने पुरखों के संघर्ष गाथा पढ़ने के लिए यह किताब खरीद रही है। हर समुदाय के विस्थापितों के वंशज देशभर में यह किताब पढ़ रहे है, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।
स्मृति धूमिल हो गई है और मैंने यह कथा पुलिनबाबू के संघर्षों के चश्मदीद गवाह की हैसियत से उनके साथियों से मिली जानकारी के आधार पर लिखी है।करोड़ों विस्थापितों के संघर्ष की अपनी अपनी महागाथा है।
लिखने की एक कोशिश मैने की है,सैकड़ों हजारों दूसरे विस्थापित परिजन भी अपने हिस्से की कथा लिखने की कोशिश करें तो शायद विस्थापन का पूरा भूगोल इतिहास साहित्य लिखा जा सकेगा। उस दिन का इंतजार है।

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