चालीस साल अखबारों के संपादन में जो बिताए, वे अब बेमायने हो गए। फिर भी वे भी दिन थे कभी। खासकर जनसत्ता के संपादकीय में 25 साल के अनुभव के मद्देनजर मेरा मानना है कि चूंकि साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचना करने वाले लोग समाज में सबसे संवेदनशील प्राणी होते हैं और चूंकि सामाजिक यथार्थ,वक्त की चुनौती,दृष्टि,इतिहासबोध और प्रतिबद्धता के बिना कोई रचना रचना नहीं होती,सबसे बेहतर और ईमानदार,संप्रेषणीय रपट और कथा रिपोर्ताज भी वे ही लिख सकते हैं।
पुराने जनसत्ता के पन्ने इसके गवाह हैं।इसलिए कभी जनसत्ता इतना प्रमाणिक और लोकप्रिय भी रहा है।
आज के साहित्यकार विशुद्ध साहित्यकार क्यों बने रहना चाहते हैं?
क्या समाज,समय,इतिहास,भूगोल,लोकतंत्र,मनुष्यता सभ्यता और लोकजीवन,जनता की तकलीफों,बेदखली, शोषण,अत्याचार,उत्पीड़न,हिंसा,घृणा,हत्या, बलात्कार, नरसंहार के इस समय से उनका कोई सरोकार नहीं है?
कवि वही है जो मनुष्य है और किसी भी चीख में,किसी की भी पीड़ा में,किसी भी आपदा में,जलप्रलय में भी कविता का जन्म होता है।
कथाकार तो भूत भविष्य और वर्तमान का सबसे प्रामाणिक इतिहासकार होता है?
इस दुस्समय के चक्रव्यूह से निकलने के लिए रचनात्मकता सबसे जरूरी है।
अभिमन्यु इसलिए मारा गया क्योंकि उसकी शिक्षा रचनात्मकता से नहीं जुड़ी थी।
रचनात्मकता नहीं होगी तो मनुष्यता बचेगी नहीं, न पृथ्वी बचेगी और न प्रकृति।
पृथ्वी और प्रकृति को भी रोज रचना होता है।
कवि और कथाकार को सबसे ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए।हर जिम्मेदार मनुष्य को अपने हिस्से का सच कहने के लिए पत्रकारिता भी करनी चाहिए।
प्रेरणा अंशु के आगामी अंकों में हमें कवियों और क्थाकारों से रपटों और कथा रिपोर्ताज का इंतजार रहेगा।इससे उनके साहित्यिक छवि मजबूत होगी और प्रमाणिक भी।
यह तस्वीर जनसत्ता के संपादकीय विभाग की है। कोलकाता की। जनसत्ता के अलावा दैनिक आवाज, प्रभात खबर, दैनिक जागरण और दैनिक अमर उजाला के संपादकीय में मैने काम किया है।
सैकड़ों युवा पत्रकारों को संपादक भी बनाया है।
Bhuvendra Tyagi , Vivek Shukla , Alok Verma जैसे हमारे पुराने मित्र गवाह हैं।
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक,प्रेरणा अंशु
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