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Thursday, October 29, 2026

डेटलाइन कोलकाता छत्तीस

लॉक डाउन और कोरोना कर्फ्यू में ज़िंदगी और मौत आज बसंतीपुर में शोक का समय है। हमारी सावित्री भाभी करीब आठ महीने तक मरणासन्न रहने के बाद कल रात 3 बजे के करीब चल बसी। वे 70 साल के करीब थी। पति हाजू साना की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी। एकमात्र बेटा जगदीश शायद लिवर सिरोयसिस से जवानी में ही चल बसा।दो बेटियां हैं। जगदीश के दो बेटे उनकी देखभाल करते रहे हैं। आठ महीने पहले हल्द्वानी अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हल्द्वानी से मतकोटा काली नगर के रास्ते बसंतीपुर आते हुए गड्ढों में गाड़ी उछलते रहने से वे रास्ते में जिंदा हो गयी। गांव में तब मौत की खबर फैल गयी थी। लेकिन सावित्री भाभी घर ज़िंदा लौटी। उससे महज तीन दिन पहले उन्हें दिनेशपुर निकलते वक्त सड़क साफ करते देखा था। अजब गजब जीवट की थी सावित्री भाभी। शरत चन्द्र की किसी नायिका से कम कष्ट और शोक उन्होंने नहीं झेले। कम संघर्ष नही किया। वे सारी बातें याद आ रही हैं। पहले पहल फिर अस्पताल में भर्ती करने की कोशिश हुई। कोई अस्पताल तैयार नही हुआ। वे होश में थी। दिनेशपुर से झोलाछाप डॉक्टर बुलाकर, ग्लूकोज चढ़ाकर उन्हें ठीक करने की कोशिशें की जाती रहीं। वे कभी होश में होती कभी नहीं। खाना पीना थोड़ा बहुत शुरू जरूर हुआ, लेकिन बिस्तर से उठ नहीं सकी। आज सुबह साढ़े छह बजे उनका पोता पंकज ने दरवाजा खटखटाया और घर में गांववालों को बुलाने की बात कही। मेरी नींद नहीं खुली थी। जागते जागते वह निकल गया था। साबिता जी बोली, कोरोना समय में क्यों गांव के लोगों को बुला रहा है पंकज? मेरी नींद उड़नछू हो गई। में तुरन्त समझ गया। उनके घर गया तो अंत्येष्टि की तैयारी हो रही थी। गांव के लोग सामाजिक दूरी बनाते हुए जमा थे। सामने राशन की दुकान पर बीपीएल कार्ड वालों को पहलीबार पांच पांच किलो अनाज बांटा जा रहा था। छोटे छोटे घेरे में लोग खड़े थे। उनका मायका करीब 60 किमी दूर शक्ति फार्म के रत्न फार्म नम्बर एक में है। फोन कर दिया था। लेकिन जाहिर है कि वे आ नहीं सकते। आस पड़ोस के गांव से पंकज और सूरज की छोटी बहन आयी। अकेली। मैंने पूछा, तुम्हारा वर कहाँ है? वह बोली, महाराष्ट्र में लोकडौन में फंसा है। महाराष्ट्र में कहाँ? चंद्रपुर के आसपास। मैंने कहा, चिंता मत करो। वहां हालात ठीक होंगे। वह बोली, नागपुर में कोरोना के मरीज हैं। अंदर सावित्री भाभी की छोटी बेटी रो रही थी। मैंने पूछा, बड़ी कहाँ है? जवाब मिला, कर्नाटक में फंसी है लॉक डाउन में। सावित्री भाभी के पति हाजू साना अपने मौसा बिपिन सरदार और मौसी हजारी के साथ बसंतीपुर आये थे। मौसेरे भाई नाबालिग थे। हाजू दा ही खेती करते थे। बसंतीपुर में ऐसे परिवार काफी थे, जिनमे जोड़ तोड़ कर परिवार बना था। कोई चाचा के साथ, कोई मौसा के साथ, कोई सिर्फ दो भाई। बाकी लोग विभाजन में उस पार छूट गये। ज्यादातर महिलाओं का मायका पीछे छूट गया। मेरी ताई और मेरी मां के साथ भी ऐसा हुआ। धर्म भाई, धर्म पिता कहकर ऐसी महिलाओं ने तराई के गांवों में अपना नया मायका बना लिया था। दिलों की मरम्मत करने का वह लहूलुहान वक्त था। अपनों से बिछुड़कर परायों को अपना बनाकर फिर ज़िंदगी शुरू करने का वक्त था। इसिलिये बसंतीपुर में अलग अलग जिलों से आये अलग अलग जातियों के लोग एक साझा परिवार में बदल गए। इसी लिहाज से हाजू साना मेरे बड़े भाई थे। कार्तिक साना मेरे चाचा हैं। विधु अधिकारी बड़े भाई और दिवंगत महेंद्र मण्डल मेरे मामा। सावित्री भाभी का विबाह बसंतीपुर में ही हुआ। मुझे उनकी शादी याद नही है। तब गांव और पूरी तराई में जहां तहां सांप पाए जाते थे। जहरीले सांप। हर साल अनेक लोग सर्पदंश के शिकार होते थे। मन्तर पढ़कर जड़ी बुटी से सांप कटे का इलाज करते थे हाजू दा। बसंतीपुर की जात्रा पार्टी की बड़ी धूम थी। हाजू दा अनोखे कलाकार थे। रुद्रपुर हल्द्वानी के कार्यक्रमों में भी वे जाया करते। हंसमुख और हमेशा सबकी मदद करने वाले। पीने की लत लगी और इसीमें जान चली गयी।एकमात्र बेटा भी बाप की तरह मरा। हाजू दा पता नहीं किससे प्रेम करते थे। सावित्री भाभी सुंदर थी, लेकिन उन्हें पसंद नहीं थीं। तीसरी चौथी कक्षा में यह बात समझ में आ गयी। तभी से भाभी अपना दुख मुझसे बांटती थी। नैनीताल पढ़ते हुए यह सिलसिला जारी रहा। फिर मैं पत्रकारिता में ऐसे खप्प गया कि मुझे पता नही चला कि भाभी किससे अपना दुख बांटती थी। इस बीच हाजू दा और उनके बेटे की मौत हो गयी। उनके मौसा और मौसी भी नही रही। मौसेरे भाई बड़े हो गए। सबसे छोटे मौसेरे भाई से मेरी तहैरी बहन रेखा का विबाह हो गया। में घर लौट आया 40 साल बाद तो देखा, जगदीश के दोनों बेटे पंकज और सूरज भाभी का बहुत खयाल रखते हैं। पहलीबार सावित्री भाभी को ज़िंदगी में खुश देख रहा था। उनकी खुशी लम्बी नहों चली। वह बिस्तर पर पड़ गयी। अब उन्हें बिस्तर से राहत मिली। कोरोना कर्फ्यू में बसन्तीपुर में यह पहली मौत है। मुझे इतनी राहत है कि बाकी देश की तरह सावित्री भाभी की अंत्येष्टि में कोई दिक्कत न हुईं। लॉक डाउन की वजह से रिश्तेदार नहीं आ सके। लेकिन गांव के रिश्ते अभी सही सलामत है। लॉक डाउन तोड़ नही रहे हैं। सामाजिक दूरी भी बनाये रखते हैं। फिरभी सभी अब भी सुख दुख में साथ साथ हैं। मनुष्यता और सभ्यता इन्ही गांवों में बसी है। आत्मीयता और रिश्ते भी, परिवार और समाज भी गांव में बचे हुए हैं, जिनपर मुक्त बाजार और पूंजीवाद को कोई असर नही हैं। मुझे खूब महसूस हो रहा है कि महानगरों और बड़े शहरों के मुक्त बाजार से करोड़ो की तादाद में जो लोग गांव पैदल भी पहुंचना चाहते हैं, वे रोजी रोटी के लिए नहीं, इन्ही रिश्तों, इन्हीं परिवारों और इसी शुद्ध भारतीय ग्रामीण समाज के लिए सब कुछ दांव पर लगाकर घर आना चाहते हैं। कोरोना को हारना ही होगा। मुक्तबाजार और पूंजीवाद का ग्लोबल तिलिस्म भी न्यूयार्क से लेकर भारत के गांवों में भी टूटने लगा है।

डेटलाइन कोलकाता पैंतीस

भारत का नवजागरण, नमोशुद्र आंदोलन पलाश विश्वास भारत में नवजागरण दलित नवजागरण था, जिसकी बुनियाद जल,जमीन और जंगल, नागरिक मानव अधिकार, अस्मिता और आत्मसम्मान के मुद्दों में थी। इसका आधार दलितों में व्यापक शिक्षा आंदोलन था। भारत के आदिवासी किसान आंदोलनों की विरासत से यह जुड़ा है, जो जाति आधारित मनुस्मृति की व्यवस्था, पुरोहित तंत्र, अस्पृश्यता के खिलाफ समानता और न्याय का आंदोलन था। यह कोई समाज सुधार आंदोलन न था,जो ब्रिटिश संरक्षण में चला।बल्कि यह आंदोलन राजसत्ता और धर्म सत्ता दोनों के खिलाफ था। इस पर शेखर बंदोपाध्याय का बहुचर्चित पुस्तक है, जो शोधात्मक तो है, लेकिन इतिहास नहीं है। इस आंदोलन की चर्चा बंगाल से बाहर बहुत कम हुई है। अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु और पेरियार के आंदोलनों से बहुत पहले दो सौ साल पहले यह अंडों उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ। लेकिन बीसवीं सदी में इस आंदोलन का चरित्र राजसत्ता और धर्मसत्ता से अनुकूलित हो गया। Sekhar Bandyopadhyay's work on the Namasudra movement focuses on the history of this untouchable caste in colonial Bengal, particularly in his book, Caste, Protest and Identity in Colonial India: The Namasudras of Bengal, 1872–1947. He analyzes their struggles for social and political recognition, the internal differentiation and changing aspirations within the community, and their eventual, complex relationship with Hindu nationalism and the Partition of India. बंगाल के दलितों और खासतौर पर नमोशुद्रों को भारत विभाजन के जरिए बंगाल से खदेड़ने, उन्हें छिन्नमूल बना दिए जाने और उनकी मातृभाषा, इतिहास, भूगोल, नागरिकता, संस्कृति, विरासत, सामाजिक,राजनीतिक हैसियत खत्म कर दिए जाने से इस आंदोलन का भगवाकरण हो गया,भारत में समता और न्याय, जल जंगल जमीन के आंदोलनों के भगवाकरण की तरह। इस आंदोलन को समझे बिना भारत के विस्थापितों की समस्या और उनके सफाए के इंतजाम को समझा नहीं जा सकता। अंबेडकर ने 1916 में अपना आंदोलन शुरू किया,लेकिन इससे पहले नमोशुद्र आंदोलन के फलस्वरूप 1911 में ही बंगाल में नमोशुद्र आंदोलन के कारण अस्पृश्यता निषिद्ध हो गई। उन्नीसवीं सदी के हरिचांद ठाकुर के मतुआ आंदोलन के बारह सूत्री अनुशासन और आज्ञा पुरोहित तंत्र और अस्पृश्यता, जाति आधारित भेदभाव, कर्मकांड और पाखंड के खिलाफ गृहस्थ धर्म पर केंद्रित है। जिसमें शिक्षा और जमीन के अधिकार मुख्य है। कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर इस आंदोलन के समर्थक थे। 1920 में हुए नमोशुद्र सम्मेलन में उन्होंने भाग लिया था। पहली ‘आम हड़ताल’ तब नमोशुद्रों को चांडाल कहा जाता था और उनकी जनगणना में गिनती अलग होती थी। फॉरवर्ड प्रेस के अनुसार: ऊँची जातियों के दमनचक्र और शोषण ने चांडालों को उन्हें सताने वालों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। फरीदपुर के जिला मजिस्ट्रेट सीए कैली ने 8 अप्रैल, 1873 को ढाका के संभागीय आयुक्त को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि उस साल चांडालों ने ”जिले में आम हड़ताल की और यह निर्णय किया कि वे उच्च वर्ग के किसी भी सदस्य की किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें हिंदू जातियों में उससे बेहतर स्थान प्राप्त न हो जाए, जो उन्हें वर्तमान में प्राप्त है।” एक समकालीन इतिहासविद ने इस हड़ताल को ऊँची जातियों का सामाजिक बहिष्कार निरूपित किया। चांडालों ने तय किया कि वे न तो ऊँची जातियों के लोगों की ज़मीनें जोतेंगे और ना ही उनके घरों की छतों को फुंस से ढकेंगे। यह हड़ताल चार से पांच महीने चली। यह भारत की पहली ऐसी आम हड़ताल थी, जिसके संबंध में आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध हैं। अन्य जिलों जैसे बारीसाल, ढाका, जैसोर, मैमनसिंह व सिलहट के चांडालों ने भी फरीदपुर के अपने साथियों से हाथ मिला लिया। सन 1871 की जनगणना के अनुसार, बंगाल में 16,20,545 चांडाल थे। इन पांच विशाल जिलों के हड़ताली चांडालों की संख्या 11,91,204 (कुल आबादी का 74 प्रतिशत) थी। भद्रलोक (ब्राह्मणों, बैद्यों और कायस्थों का जाति सिंडीकेट) को निशाना बनाने वाली इस विशाल हड़ताल की सफलता, निरक्षर चांडालों की संगठनात्मक और परस्पर एकता कायम करने की क्षमता की द्योतक थी। चांडालों ने यह संकल्प किया कि वे शिक्षा के ज़रिए अपनी सामाजिक हैसियत में सुधार लायेंगे और अपना विकास करेंगे। इस सामाजिक-शैक्षणिक आंदोलन के केंद्र, फरीदपुर के चांडालों की शैक्षणिक स्थिति दयनीय थी। ऊँची जातियां, पददलित वर्गों को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने देने के सख्त खिलाफ थीं। ब्राह्मण और कायस्थ यह मानते थे कि शिक्षा उनकी बपौती है। चांडाल और मुसलमान इस पूर्वग्रह के सबसे बड़े शिकार थे। फरीदपुर में 1,56,000 चांडाल रहते थे परंतु केवल 200 चांडाल बच्चे स्कूल जाते थे। हरिचांद ठाकुर (1812-1877) व उनके प्रतिभाशाली पुत्र गुरू चांद ठाकुर (1847-1937) ने इस निरक्षर व अज्ञानी समुदाय को शिक्षित करना अपना मिशन बनाया। हरी चंद ठाकुर ने मातुआ पंथ की स्थापना की, जो कापाली, पोंड्रा, मालो व मूची जातियों में बहुत लोकप्रिय हुआ। दोनों ने पिछड़ों की उन्नति के लिए शिक्षा को एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ज़ोर दिया। इस सामाजिक न्याय आंदोलन को आस्ट्रेलियाई बैप्टिस्ट मिशनरी डॉ. सीएस मीड ने अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। फरीदपुर जिले में ठाकुर के पैतृक गांव ओड़ाकांदी में नामशूद्र, अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोलना चाहते थे ताकि निरक्षर व अज्ञानी किसानों को लगान और ऋण चुकाने में उच्च जातियों के ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा उनके साथ की जा रही धोखाधड़ी से उन्हें बचाया जा सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों के कायस्थों ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि शिक्षित हो जाने के बाद, बटाई पर खेती करने वाले किसान और उनके सेवक काम नहीं करेंगे। भद्रलोकों के विरोध के चलते, गुरूचंद ठाकुर ने डॉ. मीड से सहायता मांगी। मीड ने उन्हें न केवल स्कूल के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई वरन अंग्रेज़ अफसरों से उनका परिचय भी करवाया। यह नमोशूद्रों के सशक्तिकरण की ओर एक प्रभावी कदम था। डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा का सदस्य बनाने को लगा दिया एड़ी-चोटी का जोर भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, जातियों और स्त्रियों के लिए जो संवैधानिक प्रावधान किए गए, अगर आंबेडकर न होते तो क्या वे संभव थे? डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने का श्रेय जोगेंद्रनाथ मंडल को ही जाता है। उनका मानना था कि अगर डॉ. आंबेडकर संविधान सभा में नहीं गए तो दलित समाज को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। दरअसल, उस समय अनेक लोग चाहते थे कि डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में जगह नहीं मिले। इसके लिए तमाम प्रपंच किए जा रहेथे। इस संदर्भ में दिलीप गायेन ने जोगेंद्रनाथ मंडल के प्रयासों के बारे में लिखा है कि उस समय के बंगाल में सुहरावर्दी सरकार सत्ता में थी। उनके अनुसूचित जाति के विधायकों को लेकर साहस के साथ जोगेंद्रनाथ मंडल आगे बढ़े थे। बंगाल से डॉ. आंबेडकर को खड़ा कर उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। उन्हें कांग्रेस के दो एमएलए गयानाथ बिस्वास और द्वारिकानाथ राय, निर्दलीय मुकुंद बिहारी मल्लिक, रंगपुर के क्षत्रिय समिति के नागेंद्रनारायण राय और अनुसूचित जाति फेडरेशन के एकमात्र एमएलए जोगेंद्रनाथ मंडल ने वोट दिया। विडंबना यह है कि बंगाल के जिन दलितों ने आंबेडकर को संविधानसभा में पहुंचाने की कीमत बंगाल के इतिहास भूगोल,मातृभाषा, जल जंगल जमीन ,नागरिकता और मानवाधिकारों से बेदखली के रूप में चुकाया, उनके लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है और न कोई कानूनी ढांचा उनके लिए है।वे अब भी विदेशी कानून के दायरे में कैद बंधुआ वोट बैंक बनकर सत्तादकों की अनुकम्पा से जीते मरते हैं। विडंबना है कि इतिहास हमें बताता है कि समाज सुधार आंदोलन और सामाजिक न्याय के संघर्ष, एक दूसरे के पूरक नहीं होते बल्कि वे परस्पर-विरोधी और असंगत होते हैं। औपनिवेशिक बंगाल में 19वीं और 20वीं सदी में सामाजिक सुधार और सामाजिक न्याय के आंदोलन एक-दूसरे के समानांतर चले। जहां सामाजिक सुधार आंदोलन का उद्देश्य ऊँची जातियों के घिसे-पिटे दकियानूसी कर्मकांडों और परंपराओं जैसे सती, बहुपत्नी प्रथा, भारी-भरकम दहेज़, बाल-विवाह, बच्चों को गंगा सागर में फेंकना, अंतरजली यात्रा इत्यादि को उखाड़ फेंकना था, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन का लक्ष्य अशिक्षा का नाश और समाज के निचले वर्गों में मानवीय गरिमा की अलख जगाना था। जहां सामाजिक सुधार आंदोलनों की भारतीय इतिहासविदों ने भूरी-भूरी प्रशंसा की, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन को इतिहास के अंधेरे में गुम हो जाने दिया। इस आंदोलन पर अभी सिलसिलेवार कम करने की जरूरत है। कौन करेगा? The Namasudra movement was a socio-religious and political movement of the Namasudra (formerly Chandal) people of Bengal, primarily in the late 19th and early 20th centuries, that sought to challenge social discrimination, gain dignity, and secure education and political power. Key components included early protests against oppressive practices, such as the 1872-73 strike over forced labor, and the development of a community identity through the Matua religion founded by Harichand Thakur and developed by his son Guruchand Thakur. Key aspects of the movement Social and political origins: The movement arose from centuries of social inequality and economic hardship faced by the Namasudras, who were treated as "untouchables". Early protest: A major early event was the "general strike" of 1872-73, where Namasudras protested being forced to perform conservancy services in jails while other castes were exempt. This strike lasted for several months and pressured authorities to take action against mistreatment. and a spiritual foundation for their struggles. Goals: The movement's objectives evolved over time, shifting from seeking equal status to focusing on concrete goals like acquiring education, securing employment, achieving economic prosperity, and gaining political representation. Education movement: Under Guruchand Thakur, the movement launched a specific drive for education among the Namasudras, who had little to no access to educational institutions at the time. Political organization: The Namasudras began to form their own political organizations and caste associations, successfully influencing government policies and gaining sympathetic support, as seen in the Poona Pact of 1932. Terminology: The term "Namasudra" gained official recognition in the 1911 census, solidifying the community's identity and paving the way for further political mobilization. The Matua Movement: The socio-religious and political awakening of the community was strongly influenced by the Matua movement, which was founded by Harichand Thakur and guided by his son Guruchand Thakur. The Matua faith provided the Namasudras with a strong sense of community, self-respect, and a spiritual foundation for their struggles. Key aspects of Bandyopadhyay's analysis: Identity formation: Bandyopadhyay examines how the Namasudras developed a shared identity due to oppression and marginalization, using the Matua sect, founded by Harichand Thakur, as a key example of resistance and a new spiritual identity. Caste consciousness: He highlights the varied levels of consciousness and aspirations within the Namasudra movement, noting that despite a shared identity, different goals and ideologies coexisted. Political engagement: The movement's political trajectory is analyzed, including its involvement in anti-colonial movements and the significant role of leaders like Jogendranath Mandal. Integration with dominant hegemony: Bandyopadhyay critically discusses the Namasudras' gradual alignment with upper-caste ideologies, which complicated their relationship with the anti-colonial movement. Internal differentiation: A key point of his work is recognizing the internal differentiation within the Namasudra community, which shaped its responses to social and political changes. https://www.amazon.in/Caste-Protest-Identity-Colonial-India/dp/0198075960 By Shekhar Bandopadhyay संदर्भ: https://www.forwardpress.in/2016/11/bangal-ka-vismrit-namshudr-aandolan/ https://www.forwardpress.in/2021/01/remembering-jogendranath-mandal-hindi/#:~:text=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%2011%20%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A4%B0%2C%201948%20%E0%A4%95%E0%A5%8B,%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2'%2C%20%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95%20%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%B6%20%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%20%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2

डेटलाइन कोलकाता चौतीस

भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में पलाश विश्वास एक 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। देश के विभाजन की कीमत पर यह आजादी मिली। रातोंरात अखंड भारत दो हिस्सों में बंट गया। भारी खून खराबा, दंगा, लूटपाट, आगजनी, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के मध्य अखंड भारत के पूर्वी और पश्चिम हिस्से को पाकिस्तान बना दिया गया और वहां के लोग अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए। एक निरंतर चलने वाले युद्ध और गृहयुद्ध शुरू हो गया। जिस देश में हजारों साल से विविधता और बहुलता का लोकतंत्र था, साझा चूल्हा का चलन था,किसी को किसी से बैर नहीं था, अलग अलग धर्म जाति, नस्ल के लोग एक साथ अमन चैन से रहते थे, वहां निरंतर जलने वाली हिंसा और नफरी की आग सुलगा दी गई। करोड़ों लोग विभाजन की त्रासदी के शिकार हुए। भारत विभाजन के दौरान हुई हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे, हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 15 लाख से 20 लाख तक भी हो सकती है। इस दौरान लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे। जो लोग जिंदा बच गए,इस देश में वे आज भी भारत विभाजन का दंश झेल रहे हैं। कटे फटे उन लोगों की संतानें अब भी विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। उनकी नागरिकता संदिग्ध है।वे घुसपैठियों के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं आज भी।नागरिक और मानवाधिकार, इतिहास, भूगोल, विरासत, मातृभाषा, संस्कृति, पहचान से वंचित हो गए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी विभाजन का दर्द झेल रहे हैं। करोड़ों दूसरे लोगों की तरह ऋत्विक घटक ने भी भारत विभाजन के फलस्वरूप भारत में शरण ली और शरणार्थी होने का यथार्थ को भोगा। यूं तो पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान से आए कुलीन, सम्पन्न तबके के अनेक लोग बंगाल और बाकी देश में राजनीति, अर्थ व्यवस्था, साहित्य, कला, फिल्म आदि क्षेत्रों में अग्रणी बन गए और विभाजन की त्रासदी का कुलीन,संपन्न तबके पर कोई असर नहीं हुआ। ऐसा पाकिस्तान में भी हुआ।भारत से जो लोग पाकिस्तान चले गए,उनमें जो संपन्न और कुलीन थे, उनकी हैसियत में खास फर्क नहीं पड़ा। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में अभिजात तबकों पर विभाजन का असर एक सदमा जैसा होकर गुजर गया। ऋत्विक घटक के परिवार की पृष्ठभूमि कुलीन थी। उनके परिवार के लोग आदरणीय हैं और विविध क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन ऋत्विक ने एक आम शरणार्थी की तरह अपनी तमाम फिल्मों में विभाजन की त्रासदी को निरंतर जिया, जैसे विभाजनपीडित हर शरणार्थी पीढ़ी दर पीढ़ी जीता है। भारत विभाजन पर ऋत्विक घटक की तीन फिल्में विश्वविख्यात हैं। शरणार्थी स्त्रियों ने विभाजन के कारण बेपटरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने के लिया, परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर जो ऐतिहासिक लड़ाई वक्त की चुनौतियों के मुकाबले लगातार अपना वजूद मिटाकर लड़ती रही, उनकी जिजीविषा पर ऋत्विक की मास्टरपीस फिल्म है मेघे ढाका तारा। भारत विभाजन के सदमे और सामूहिक पीड़ा की पृष्ठभूमि में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन यानि भारतीय जन नाट्य संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बिखराव पर उनकी फिल्म है कोमल गांधार। भारत आए शरणार्थियों के साथ जाति के आधार पर जो भेदभाव किया गया, उसपर भारतीय साहित्य मौन है। क्योंकि वंचित तबकों के लोग अपढ़ अधपढ़ थे और वे अपनी आपबीती कहीं दर्ज नहीं कर सके।भारत विभाजन का पूरा आख्यान , पूरा narrative शासक वर्ग का रचा इतिहास है,जिसमें विभाजन पीड़ितों का पक्ष किसी ने नहीं रखा। शरणार्थी शिविरों और पुनर्वास योजनाओं में जाति के आधार पर भेदभाव पर केंद्रित है ऋत्विक की भारत विभाजन पर बनाई तीसरी फिल्म सुवर्णरेखा। इन तीन फिल्मों की बहुत भारी कीमत उन्हें आजीवन चुकाते रहना पड़ा। वे कम्युनिस्ट पार्टी से निकाले गए।बंगाल से बहिष्कृत कर दिए गए। ऋत्विक की फिल्मों की अंतर्वस्तु उनकी कथा की आम जिंदगी में रचा बसा लोक है। उनकी फिल्मों में लोक कोई सितम गीत नृत्य नहीं है,फ्रेम दर फ्रेम संरचना है।इसलिए उनकी सारी फिल्में बाकी भारतीय फिल्मकारों की फिल्मों से एकदम अलहदा हैं। दो ऋत्विक घटक और उनकी फिल्मों को समझने के लिए उनकी जड़ों को पहचानने और समझने की जरूरत है। उनकी जीवन दृष्टि और उनके सौंदर्यबोध की पृष्ठभूमि को समझे बिना बंगाल के सर्वव्यापी लोक और जनपदों की जीवनशैली और इस मेहनतकश मुश्किल जीवन यापन में रची बसी उनकी रचनात्मक प्रतिभा को समझना मुश्किल है।अपने उतार-चढ़ाव भरे करियर में उन्होंने भले ही कुछ एक फिल्में निर्देशित कीं, अनेक फिल्में आधी अधूरी छोड़ दी, अपनी ही रचना से उपजे गहरे असंतोष के कारण,लेकिन उनका काम भारतीय और वैश्विक सिनेमा की भाषा को नई दिशा देता है। वे न केवल बांग्ला फिल्मों में बल्कि सिनेमायी आधुनिकता में भी आधारभूत व्यक्तित्व हैं। उनकी रचनात्मकता आम जनमानस का दर्पण बना सिनेमा की भाषा में। व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिक आघात को उन्होंने जिस नवाचारी शैली के साथ जोड़ा, उसने पीढ़ियों के फिल्मकारों और दर्शकों को झकझोरा है। 1947 का भारत-विभाजन ऋत्विक घटक के जीवन और रचनात्मकता दोनों पर गहरी छाप छोड़ गया। ढाका में जन्मे ऋत्विक लाखों विस्थापितों की तरह बंगाल के बंटवारे के शिकार बने। जहां अधिकतर समकालीन फिल्मकारों ने विभाजन को या तो किनारे से छुआ या उसकी हिंसा तक ही सीमित रखा, वहीं ऋत्विक की फिल्में विभाजन के मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत घावों को केंद्र में रखती हैं। खुद उनका वजूद लहूलुहान रहा जीवनभर इस त्रासदी से आम विभाजनपीड़ितों की तरह। कोमल गांधार फिल्म में जन नाट्य संघ की एक नाट्यमंडली के पद्मा नदी के किनारे विभाजन की त्रासदी को अनुभव करने वाला दृश्य याद करें। ट्रेन का इंजन त shunting करते हुए ठीक पद्मा नदी के किनारे रुक जाती है।एक जबरदस्त झटके से जूम करता कैमरा क्लोज अप में जम हो जाता है। हृदय विदारक दृश्य है।कैमरा नायक नायिका के पीड़ित,दुखी चेहरों पर फोकस करता है।नायक नायिका की आंखों में एकमुश्त स्मृतियों और पीड़ाओं का समुंदर झोंकता हुआ उंगली के इशारे पर बेटे के इंतजार में खड़ी मां की छवि उकेरते हुए खाता है।वहीं खड़ी मन मेरा इंतजार करती थी। जो अब पाकिस्तान है। आपने भूस्खलन की त्रासदी देखी है? लोगों को जिंदा दफ्न होते देखा है? गांव जनपद को जमीन और पानी में,नदी और समुद्र में समाहित होते देखा है? हिमालय के लोग इस अभिज्ञता का जीवनभर सामना करते हैं ।हम इसे प्राकृतिक आपदा कहते हैं। मुर्शिदाबाद जिले के लालगोला इलाके मन पद्मा नदी को किनारे का जनजीवन लीलते हुए देखा है? इसे लोग प्राकृतिक आपदा कहते हैं। वजूद का खींचों में बिखरकर अनंत में समाहित होने और फिसलते रेत की तरह स्मृतियों के क्षरण को हम भारत विभाजन की राजनीतिक त्रासदी कह सकते है। इस त्रासदी के गहरे साए में कैमरे की भाषा के साथ ऋत्विक के सौंदर्यबोध के साथ बेबस पीड़ितों की पीड़ा, आर्तनाद और आक्रोश एकमुश्त अभिव्यक्त होती है। ऋत्विक की इस रचना प्रक्रिया को समझना हर किसी के बूते में नहीं है।फिल्मकारों, फिल्मविशेषज्ञों के लिए भी उनकी फिल्म समय सरोकार और मनुष्यता की प्रति सघन प्रतिबद्धता के साथ गंभीर चुनौती बन जाती है। मेघे ढाका तारा में टीबी मरीज बन गई नीता का अपने कामयाब संगीतकार भाई के सामने चरमोत्कर्ष के क्षण समूचे हिमालय की दहलती हुई जिजीविषा चीख दादा आमी बाँचते चाई.. इसी त्रासदी का ज्वालामुखी विस्फोट है,जो दर्शक के दिलोदिमाग की गूंज बनकर ठहर जाती है।प्रतिध्वनित होती रहती है। या रिफ्यूजी बस्ती में नीता के कमरे में छनछनाती तार तार चांदनी में नीता का उस प्रेमी से संवाद, जो अंततः उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेता है। कोमल गांधार में विवाह के दौरान गाय जाने वाले उच्चकित लोकगीत का विरोधाभासी द्वंद्व या सुवर्णरेखा की पतिता बन गई रिफ्यूजी बहन सीता के कमरे में ग्राहक बनकर उपस्थित हुए सगे नहीं का सदमा, यह सबकुछ सिनेमा की भाषा को सिरे से बदल कर रख देता है। बौद्धिक समुदाय जिसे मेलोड्रामा कहता है, दरअसल वह ऋत्विक का अपना लोकसंसार है,जो उनकी फिल्म की परत दर परत झीनी झीनी बिनी चदरिया है। ऋत्विक घटक का जन्म पूर्वी बंगाल में ढाका में हुआ था (अब बांग्लादेश)। वे और उनका परिवार पश्चिम बंगाल में कलकत्ता में स्थानांतरित हो गये (अब कोलकाता), जिसके तुरंत बाद पूर्वी बंगाल से लाखों शरणार्थियों का इस शहर में आगमन शुरू हो गया, वे लोग विनाशकारी 1943 के बंगाल के अकाल और 1947 में बंगाल के विभाजन के कारण वहां से पलायन करने लगे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध और आजाद हिंद फौज के महासंग्राम के मद्देनजर और खासकर ,1946 के डायरेक्ट एक्शन के दौरान बंगाल के पढ़े लिखे भद्रलोक बंगाली को विभाजन की नियति का अनुभव हो गया। भारत का विभाजन उनके लिए नियति का अभिसार था।लेकिन पूर्वी बंगाल के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में जो अपढ़, अधपढ़ आम लोग थे, उन्हें बदलते हुए वैश्विक प्रदर्श, ब्रिटिश हुकूमत के डूबते हुए सूरज और सत्ता शतरंज के दांवपेंच का कोई अंदाजा नहीं था।सम्पन्न वर्ग की जड़ें कोलकाता और पश्चिम बंगाल में गहरी पैठी थी। नौकरी पेशा और जमीनदार श्रेणी को विभाजन से प्रयाप्त पहले पश्चिम बंगाल में सुरक्षित स्थानांतरित होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पश्चिम पाकिस्तान में भी बहुत हद तक ऐसा ही हुआ। इसके विपरीत भारत विभाजन होने के बावजूद आम लोग हर कीमत पर अपना गांव खेत जनपद को छोड़ने को तैयार नहीं थे।सरहद के आरपार हुए दंगों में वे छिन्नमूल बनकर रह गए। ऋत्विक घटक भी छिन्नमूल हो गए और आजीवन छिन्नमूल होकर जिए।उनकी फिल्में छिन्नमूल मनुष्यता की कथा व्यथा और जिजीविषा, विस्थापन का यथार्थ और पुनर्वास की लड़ाई का महाकाव्यिक आख्यान है। शरणार्थी जीवन का उनका यह अनुभव उनके काम में बखूबी नज़र आता है, जिसने सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन के लिए एक अधिभावी रूपक का काम किया और उनके बाद के रचनात्मक कार्यों को एक सूत्र में पिरोया. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध ने भी, जिसके कारण और अधिक शरणार्थी भारत आये, उनके कार्यों को समान रूप से प्रभावित किया। पूर्वी बंगाल के पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने और 26 मार्च 1971 को स्वतंत्र बांग्लादेश बन जाने के बावजूद विभाजनपीड़ितों के लिए भारत विभाजन की विभीषिका निरंतर जारी है। इस त्रासदी,पीड़ा और जीवनसंघर्ष को ऋत्विक ने ही सिनेमा की भाषा में प्रस्तुत किया। समूचा पूर्वी बंगाल बंगाल की खाड़ी के समुद्री तूफानों के दायरे में हैं। समुंदर में गहरे धंसे पूर्वी बंगाल की सारी जमीन असंख्य नदियों,झीलों में बंटी हुई है। यातायात जलपथ से होता रहा है। पेयजल नदियों और झील का पानी। नदी से जल भरने के गीतों की दर्जनों शैलियां हैं। नदी में नाव,ज्वार भाटा का भटियाली संगीत सर्वव्यापी है। यह मंगल काव्यों की जमीन है,जहां हिन्दू मुसलमान साझा चूल्हे के वारिश सदियों से सारे तीज त्यौहार मनाते रहे हैं। हमलावरों से सुरक्षित इस भूगोल में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा आम जनजीवन पर जमींदारों के अमानवीय अत्याचार और कठोर पुरोहित तंत्र को छोड़कर भारत विभाजन से पहले कोई राजनीतिक भूचाल का इतिहास नहीं है।यहीं के जनपदों में गीत नृत्य गीतिका जीवन यौन का अनिवार्य अंग है। पूर्वी बंगाल (आज के पश्चिम बंगाल के क्षेत्र) का भूगोल, मौसम और जलवायु मुख्य रूप से इसकी विविध भौगोलिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिसमें उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक शामिल है। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित होती है। मौसम में बहुत गर्मी और आर्द्रता (गर्मी में), भारी बारिश (मानसून के दौरान) और हल्की ठंड (सर्दियों में) होती है। भूगोल, जलवायु और मौसम की विविधता, बहुलता और विचित्रता के कारण पूर्वी बंगाल का लोक संसार इंद्रधनुषी है। बाउल, पीर, साधु, संत,फकीर का सामाजिक नेतृत्व ने हमेशा साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद की चुके हिलाने के जनविद्रोह किसान, आदिवासी विद्रोह का सिलसिला बनाए रखा। भारत में पहला बहुजन आंदोलन जल जंगल जमीन हक्की का मतुआ आंदोलन की दो सौ साल की निरंतरता की हकीकत और मनुस्मृति राज, विधान और अनुशासन के खिलाफ अस्पृश्यता मुक्ति का नमोशुद्र आंदोलन इसी भूगोल, जलवायु और मौसम का सच है, जिसका सबसे ईमानदारी से सामना लोक की सघन ऊर्जा के साथ ऋत्विक घटक ने निरंतर किया है। जिस ढाका शहर में ऋत्विक का जन्म हुआ, वह हमेशा कृषि,कारोबार और मेहनतकश तबकों का केंद्र रहा है। कोलकाता इस तुलना में अतिशय भद्रलोक है। चैन तरफ जनपदों से घिरे होने के बावजूद कोलकाता कोई जनपद नहीं है।जबकि मुगल साम्राज्य के दौरान दौरान ढाका को 17वीं शताब्दी में जहाँगीर नगर के नाम से भी जाना जाता था, यह न सिर्फ प्रादेशिक राजधानी हुआ करती थी बल्कि यहाँ पर निर्मित होने वाले मलमल के व्यापार में इस शहर का पूरी दुनिया में दबदबा था। आधुनिक ढाका का निर्माण एवं विकास ब्रिटिश शासन के दौरान उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और जल्द ही यह कोलकाता के बाद पूरे बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गया। आज भी ढाका कपड़ा उद्योग का वैश्विक केंद्र है। ढाका जनपदों से घिरा हुआ स्वयं एक जनपद है।हर जनपद की बोली अलग है।रीति रिवाज,जीवनशैली अलग है,लोक और जीवन यौन अलग अलग है। लेकिन हिलसा मछली का स्वाद जैसा कुछ,भटियाली का संगीत जैसा कुछ बहुत कुछ एकदम साझा चूल्हा है। ऋत्विक इस साझा चूल्हा का रसोइया है। तीन भारत विभाजन की त्रासदी पर अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के उत्कर्ष समय में ऋत्विक घटक ने अपनी विभाजन त्रयी फिल्में पार्टीशन ट्रायलॉजी, एक के बाद एक तीन फिल्में बनाईं। वे रंगकर्मी थे। विचारधारा के प्रतिबद्ध थे। वे 1950 में पूर्वी बंगाल से छिन्नमूल होकर लौटने के बाद कहानियां और नाटक लिखते थे।अच्छे अभिनेता भी थे। नाटकों का इस्तेमाल उन्होंने सतर्कता पूर्वक किया राजनीतिक हथियार के रूप में। फिल्म को उन्होंने सबसे शक्तिशाली माध्यम समझकर इसको भी छिन्नमूल मनुष्यता के हक में राजनीतिक हथियार बतौर बनाना शुरू किया।बिजन भट्टाचार्य और वे दोनों जन नाट्य संघ में सक्रिय थे। भारत विभाजन की त्रासदी करोड़ों विभाजन पीड़ितों की तरह बेइंतहा दर्द और बेचैनी के साथ उनके खून, दिल और दिमाग में आजीवन खौलती रही ज्वालामुखी के लव की तरह। उनका जन्म जरूर ढाका में हुआ,लेकिन उनका घर राजशाही जिले में था। राजशाही पूर्वी बंगाल में शिक्षा और संस्कृति का गढ़ रहा है। जनपदों में अमन चैन के साझा चूल्हे के इस तरह हिंसा,नफरत और मारकाट के दावानल में बदल जाने के भयंकर वास्तव को वे कभी स्वीकार नहीं कर पाए।यह विघटन क्यों हुआ? किसने सामाजिक ताना बाना को क्यों और कैसे तहस नहस कर दिया, करोड़ों विभाजन पीड़ितों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुलग रहे इस सवाल का जवाब वे ढूंढते रहे। राजनीतिक हथियार की तरह गहन संवेदना की गहराइयों में पैठकर अपनी फिल्मों में उनकी तफ्तीश जारी रही। 1960 में उन्होंने मेघे ढाका तारा बनाई। 1961 में बनाई कोमल गांधार और अगले ही साल सुवर्णरेखा। यह फिल्म बनी 1962 में लेकिन तीन साल बाद रिलीज़ हो सकी। क्यों? यह सवाल वाजिब है क्योंकि मेघे ढाका तारा को लेकर कोई विवाद नहीं था। शरणार्थी बेटी का संघर्ष बंगाल, पंजाब और बाकी देश का सच था। विस्थापन, युद्ध, गृहयुद्ध , दंगा फसाद की शिकार होती हैं स्त्रियां सबसे ज्यादा, लेकिन अपने लिए,परिवार के लिए और समाज व राष्ट्र के लिए मुक्तिमार्ग का निर्माण भी करती है स्त्री। इस सच को, वैश्विक वास्तव को अस्वीकार करने का उपाय नहीं था। नीता की जिजीविषा इस फिल्म का चरमोत्कर्ष और सार दोनों है। सुगबुगाहट शुरू ही कोमल गांधार के सच का सामना करने से राजनीतिक, वर्गीय, जातिगत वर्चस्ववाद के सीरे से इनकार के साथ। तीनों फिल्मों में विभाजन विभीषिका की तीव्रतम अभिव्यक्ति ही है।तीनों में दर्द अलगाव,उपेक्षा और अपमान का घनघोर झंझावात है, जो चक्रवात की तरह वजूद की चुके हिलाकर रख देता है। तीनों फिल्म का सच है छिन्नमूल मनुष्यता, जो मनुस्मृति राज में वंचितों के सारे अधिकारों से वंचित होने की समग्र यातना, उत्पीड़न और विध्वंस, विघटन, इतिहास,भूगोल, मातृभाषा,विरासत, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक पहचान और शक्ति से जबरन बेदखल करने का बेइंतहा जनसंहार का पर्याय है। कोमल गांधार में रेलवे लाइन और नदी को योग वियोग के प्रतीक के रूप में सघन सिनेमाई प्रयोग के तहत जलजला में तब्दील करने के साथ पूर्वी बंगाल के ठेठ लोक संसार और जनपदों की विरासत की प्रस्तुति है तो जन नाट्य संघ में पार्टी की राजनीतिक दख़लदारी का दो नाट्य गुटों के विवाद कोलाहल के जरिए खुलासा भी है। जन नाट्य आंदोलन में तब हर विधा, हर माध्यम, हर कला के सर्वश्रेष्ठ लोग थे,जिन्हें किनारा कर दिया जा रहा था। कोमल गांधार इस राजनीतिक दुष्कृत्य का सिनेमाई प्रतिरोध है। कुलीन वर्चस्व को यह कतई मंजूर न हुआ। विभाजन पर बनी इन तीनों फिल्मों में विजन भट्टाचार्य की खास भूमिकाएं थीं। ऋत्विक ने खुद अभिनय किया। महाश्वेता देवी के पति और नवारुण भट्टाचार्य के पिता जन नाट्य संघ के नाटक नवान्न के बिजन भट्टाचार्य भी इस वर्चस्ववाद के शिकार हुए। दूसरे लोग भी होते रहे।इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता यहां नहीं है।लेकिन कोमल गांधार बनने से पहले ही जन नाट्य संघ का बिखराव और टूटन सत्ता की राजनीति में विचारधारा के समहित होने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो गया था।ऋत्विक और विजन दोनों वैचारिक रूप से इस्पात की तरह मजबूत थे। कोमल गांधार से उनके बहिष्कार की शुरुआत हुई। फिर सुवर्णरेखा में तो ऋत्विक ने इस बहिष्कार के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध घोषणा कर दी मनुस्मृति वर्चस्ववाद के विरुद्ध, कुलीनत्व के विरुद्ध और ब्राह्मणवाद की अंतरण जातिव्यवस्था के विरुद्ध। जाति व्यवस्था और कुलीन तंत्र को बनाए रखने के लिए ही भारत का विभाजन हुआ, शायद सुवर्णरेखा बनाते वक्त ऋत्विक इस सच को जान चुके थे।सन्यासी विद्रोह , मतु आ नमोशुद्र आंदोलन, आदिवासी किसान विद्रोह और आंदोलन, हरिचांद गुरु चांद ठाकुर, ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, जोगेंद्र नाथ मंडल के नेतृत्व में आदिवासियों मुसलमानों दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की साझा राजनीतिक शक्ति, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से ब्राह्मणवाद के अस्तित्व और मनुस्मृति राज को जो गंभीर खतरा पैदा हो गया था, उसे विखंडित करने के लिए भारत विभाजन की विभीषिका रचा गया। सुवर्ण रेखा में वर्चस्ववाद के मूल जाति व्यवस्था पर सबसे ताकतवर प्रहार किया सुवर्ण रेखा में ऋत्विक घटक ने। शरणार्थी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंप और पुनर्वास कालोनियों में हुए भेदभाव का चरमोत्कर्ष छिन्नमूल स्त्री सीता की आत्महत्या है। इस आत्मध्वंस के बिना जाती वर्चस्व के सम्मुख अपने ईश्वर, अपने मतवाले मदहोश सगे भाई से अपना सम्मान, अपनी अस्मिता को बचाने का कोई रास्ता नहीं है। आक्रोश में बहन का गला काटकर उसे बचाने से भी तीव्र है यह अभिव्यक्ति। छिन्नमूल भाई बहन ईश्वर और सीता को कोलकाता की रिफ्यूजी कॉलोनी में पनाह मिली थी। दोनों भाई बहन कुलीन ब्राह्मण थे। ईश्वर ने बालिका छोटी बहन सीता के साथ एक दलित बालक अभिराम का पालन पोषण कर रहे थे। इसी रिफ्यूजी कॉलोनी में अति दलित बागदी बहू को जमींदार के लोग उठा ले जाते हैं जिसे कॉलोनी से बहिष्कृत किया जाता है। जाति वर्चस्व के कारण किसी की हिम्मत नहीं होती विरोध करने की। फिर सुवर्ण रेखा के तट पर सिंहभूम के घाटशिला के आदिवासी भूगोल में प्राकृतिक परिवेश में अति सुंदरी बहन सीता और अभिराम को लेकर नौकरी करने चले जाते हैं। जाति वर्चस्व के सच का पर्दाफाश करने के लिए ऋत्विक ने जेल जंगल जमीन के हक हकूक की हजारों साल की विरासत जमीन आदिवासी भूगोल को ही क्यों चुना? क्योंकि यही तो मूल निवास है वंचितों का,जिसे वर्गीय जाति आधारित कुलीन वर्चस्व के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचा ने अपने जनसंहार अश्वमेध से तहस बहस कर दिया और यह सिलसिला आज भी जारी है। साथ साथ पले बढ़े सीता और अभिराम के प्रेम से कुलीन ब्राह्मण ईश्वर के उदारतावाद का अंत हो गया।रातोंरात उसने अन्यत्र सीता का विवाह तय कर दिया और सीता अभिराम के साथ कोलकाता भाग गया। कोलकाता में मोबलिंचिंग में अभिराम मारा गया तो नए सिरे से छिन्नमूल हो गई सीता के लिए नाचने गाने की आजीविका अपनाने को बाध्य होना पड़ा और हुआ यह कि जो पहला ग्राहक के सामने उसे पेश किया गया, वह पिता समान उसका बड़ा भाई था जिसे इतना नशा हो गया था कि पता ही नहीं चला कि उसके सामने उसकी सगी बहन है। सीता ईश्वर की हत्या नहीं कर सकती थी तो क्या करती? यह भारत विभाजन की कुल कथा है। जाति वर्चस्व की विभीषिका है विभागों की त्रासदी, यही ऋत्विक घटक की फिल्म सुवर्णरेखा है। रिफ्यूजी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंपों , पुनर्वास कालोनियों , पहाड़ों, मरुस्थल, टाइगर फॉरेस्ट समेत घने जंगलों में बंगाल से बाहर विभाजन पीड़ित जिन करोड़ों लोगों को बिखेर दिया गया, वे पूर्वी बंगाल में आदिवासियों, मुसलमानों,दलितों और पिछड़ों की सम्मिलित फौज थी,जिसने मनुस्मृति राज के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था पलाशी के युद्ध के समय से, उन्हें तहस नहस करने की कथा ऋत्विक ने चूआड़ विद्रोह की जमीन पर कहने का विकल्प चुना। क्या यह सिर्फ संजोग है? यह क्या संजोग मात्र है कि 99 प्रतिशत पूर्वी बंगाल के सवर्ण विस्थापित पश्चिम बंगाल में न सिर्फ व्यवस्थित हो गए, जीवन के हर क्षेत्र में वे आगे हैं? दूसरी ओर 99 प्रतिशत दलित और पिछड़े बंगाल से बाहर 22 राज्यों में बिखेर दिए गए बंगाल के मौसम,जलवायु,जमीन की तरह मातृभाषा,इतिहास,भूगोल, संस्कृति ,विरासत और नागरिकता से भी बेदखल। अंडमान निकोबार और दंडकारण्य से लेकर उत्तर भारत के टाइगर प्रोजेक्ट में जिन्हें बाघ, मगरमच्छ और समुद्री तूफान का चारा बना दिया गया। नई दिल्ली,मुंबई और देश के बड़े शहरों में जहां बंगाली विस्थापितों की पुनर्वास कालोनियों का निर्माण हुआ,वहां दलित और पिछड़े कितने हैं? सिंध से आए सारे सम्पन्न स्वर्ण शरणार्थियों को बड़े शहरों में पुनर्वास दिया गया। पश्चिम पाकिस्तान से आए पंजाबी सवर्ण हिंदुओं और कुलीन सिखों को पंजाब, नई दिल्ली में जगह मिल गई लेकिन दिल्ली में ही दलित पंजाबियों की बस्तियों की कहानी और हैं वैसी ही जैसी पश्चिम बंगाल की हजारों जबर दखल कॉलोनियों में फंसे रह गए दलित पिछड़े पूर्वी बंगाल के विस्थापित। राय सिखों, मजहबी सिखों को तो पूर्वी बंगाल के दलित शरणार्थियों के साथ टाइगर प्रोजेक्ट में ही बाघ का चारा बना दिया गया।सरहद के उस पर पूर्वी पाकिस्तान जा पहुंचे बिहारी यानी उर्दू भाषी मुसलमानों और पश्चिम पाकिस्तान चले गए मुहाजिरों का क्या हुआ। सरहद के आर पार भारत विभाजन के कारण बह निकली खून की नदियां आज भी जिंदा हैं।निरंतर जल प्रवाह के साथ बह रहा है वंचितों का खून। मॉब लांचिंग तो अब सांस्कृतिक राजनीतिक महोत्सव है साहित्य उत्सव की तरह कुलीन। विभाजन की इस जातिगत,वर्चस्ववादी कथा को खाने का दुस्साहस ऋत्विक ने किया और इसी तरह विभाजन की त्रासदी को जिया। बांग्लादेश बनने के बाद वहां जाकर युक्ति तर्क गप्पों या तितास एकटी नदी जैसी फिल्म बनाई। कितना दर्द, कितना विद्रोह और कितने ज्वालामुखी का समाहार है ऋत्विक। स्त्री अस्मिता इस वर्गीय जातिगत वर्चस्ववाद के विरुद्ध इन तीनों फिल्मों में ऋत्विक का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार और सिनेमाई चमत्कार है। मेघे ढाका तारा की नीता का चीत्कार, कोमल गांधार की अनुसुइया की दृढ़ता, सीता का आत्मध्वंस और बाग़दी बहू के भिड़ाकर से तार तार हो गया वर्चस्ववादी कुलीनत्व। यही ऋत्विक घटक का अपराध है। इसकी सजा को उन्होंने आजीवन भोगा। इन फिल्मों के पात्र परिचय और कलात्मक पक्ष को हम इस लेख में छू नहीं सके।इस पर लगातार चर्चा होती रही। जिसकी कभी चर्चा नहीं हो सकी, या चर्चा नहीं होने दी, हमने सिर्फ वही लिखा है। इति

Wednesday, October 28, 2026

डेटलाइन कोलकाता तैंतीस

हमारे महायोद्धा कुमुद रंजन सरकार साठ के दशक में बंगाली विस्थापित इलाका दिनेशपुर से कुमुद रंजन सरकार सरपंच और जिला परिषद के सदस्य थे।अब सरपंच नहीं होते और जिला परिषद जिला पंचायत है। खुलना जिले से आए कुमुदबाबू जैसोर के पुलिनबाबू का साथ आखिर तक निभाते रहे। तराई में पुनर्वास की लड़ाई में वे शुरू से आखिर तक पिताजी के साथ थे। उनका गांव पंचाननपुर,हमारा गांव बसंतीपुर और उदयनगर का गठन 1952 में हो गया था। लेकिन पुनर्वास विभाग ने इन तीनों गांवों का पंजीकरण रोक दिया। तीन गांवों के लोगों ने 1954 में रुद्रपुर में इसके खिलाफ आंदोलन,धरना,प्रदर्शन और आमरण अनशन किया।पुलिनबाबू नेतृत्व में थे और उनके साथ थे कुमुदबाबू,दूसरे मातबरों के साथ। फिर हर आंदोलन,संघर्ष और संकट में कुमुद बाबू की तीक्ष्ण बुद्धि विस्थापित समाज के बहुत काम आई।वे कानूनी दांव पेंच में माहिर थे।इसलिए उन्हें चाणक्य भी कहा जाता था। उनकी मां मेरी दादी शांति देवी की पक्की सहेली थीं। उनका बड़ा बेटा सुभाषेंदु मेरा सहपाठी रहा है दिनेशपुर high school में।मेरे जीईसी नैनीताल जाने से साथ छूट गया।लेकिन उनका भांजा दिवंगत दीप्ति सुंदर मल्लिक डीएसबी कॉलेज में भी मेरे सहपाठी थे। कुमुदबाबू की बेटी संदीपनी सरकार अध्यापिका हैं और प्रेरणा अंशु की आजीवन सदस्य। कुमुदबाबू के बेटे अर्धेंदु ने अमेजन ऑनलाइन स्टोर से मेरी किताब पुलिनबाबू खरीदकर अपने पिताजी की यह तस्वीर साझा की है। तराई बसाने में जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, ऐसे परिवारों की नई पीढ़ी अपने पुरखों के संघर्ष गाथा पढ़ने के लिए यह किताब खरीद रही है। हर समुदाय के विस्थापितों के वंशज देशभर में यह किताब पढ़ रहे है, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है। स्मृति धूमिल हो गई है और मैंने यह कथा पुलिनबाबू के संघर्षों के चश्मदीद गवाह की हैसियत से उनके साथियों से मिली जानकारी के आधार पर लिखी है।करोड़ों विस्थापितों के संघर्ष की अपनी अपनी महागाथा है। लिखने की एक कोशिश मैने की है,सैकड़ों हजारों दूसरे विस्थापित परिजन भी अपने हिस्से की कथा लिखने की कोशिश करें तो शायद विस्थापन का पूरा भूगोल इतिहास साहित्य लिखा जा सकेगा। उस दिन का इंतजार है।

डेटलाइन कोलकाता बत्तीस

तराई के शरणार्थी उपनिवेश में यह 1964या 1965 की मेरी तस्वीर है।घने जंगल और उससे घनी गरीबी, मौसम और जलवायु की तस्वीर है यह।सिर्फ मेरी नहीं।मेरे चेहरे में छिपी है भारत विभाजन के शिकार हुए लोगों की उजड़ी दुनिया। 1965 में सर्पदंश से सुबल दा की मृत्यु ही गई थी। मेरे बचपन की यह तस्वीर उस समय की है। मेरे चाचा डॉ सुधीर विश्वास तराई में तब शायद एकमात्र RMP डॉक्टर थे।रुद्रपुर में दो डॉक्टर थे डॉ रस्तोगी और डॉ शाही और गदरपुर में डॉ गुप्ता। भारत विभाजन के शिकार लोगों की पहली पीढ़ी अपढ़ अधपढ़ थी।दूसरी पीढ़ी को पुनर्वास की लड़ाई में पढ़ने का मौका ही नहीं मिला था।खुद पिताजी पुलिनबाबू कक्षा दो तक पढ़े थे। इन लोगों का इलाज करते थे मेरे चाचाजी।इस हादसे से पहले पिताजी के असम से लौटने के बाद चाचाजी असम के दंगा पीड़ित नौगांव इलाके में विस्थापितों का इलाज करके आए थे 1960,61 में।तराई में घना जंगल था और असम में भी। चाचाजी सर्पदंश के मरीजों का भी इलाज करते थे।लेकिन एंटी वेनम इंजेक्शन ग्रामीण इलाकों में आज भी सुलभ नहीं है। 1965 में कैसे मिलता? चाचाजी साइकिल से मरीज देखने जाते थे। मुझे वह दृश्य आज भी याद है। सुबल दा को सर्पदंश की खबर मिलते ही चाचाजी सिरिंज में इंजेक्शन भरकर गांव से करीब डेढ़ किमी दूर उनके घर रवाना हुए थे।कोबरा ने डंसा था।चाचाजी पहुँचते,इससे पहले सुबल दा दम तोड़ चुके थे। आज इकसठ साल बाद उनकी पत्नी का देहांत हो गया। शुरू से उनका घर बसंतीपुर, विजयनगर और हरिदासपुर के मध्य में बसंतीपुर की सीमा पर थी।नैनीताल पढ़ते हुए भी उस घर में आना जाना था। रिटायर होने के बाद घर लौटकर एकबार गया था।तब भाभी जी से मुलाकात हुई थी। सुबल दा के पिताजी का भी निधन हो गया।उनके दो बेटे थे।बड़े बेटे का निधन मेरे घर लौटने के बाद हुआ।छोटा बेटा अमूल्य पिता की मृत्यु के वक्त गर्भ में था,जो इकसठ साल का हो गया। अक्सर उससे मुलाकात हो जाती तो भाभी का हाल पूछ लेता लेकिन जाने का मौका नहीं मिलता। भाभी दो दिन पहले रिश्तेदारी में रुद्रपुर गई थी।जहां उन्हें लू लग गई थी और आज शाम साढ़े पांच बजे उनका निधन हो गया। दफ्तर से घर लौटते ही खबर मिली।भतीजा पावेल तुरंत मोटर साइकिल से मुझे उनके घर ले गया। जब उनके घर पहुंचा तब उनकी अर्थी निकल रही थी।शवयात्रियों के साथ बसंतीपुर के श्मशान घाट पहुंचकर उनको अंतिम प्रणाम कर पाया। उनके निधन के बाद भी इन इकसठ सालों में मुझे उनका नाम नहीं मालूम पड़ा। लेकिन वह आज शाम साढ़े पांच बजे तक जीवित थीं।

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ये हैं कुसुम देवी,बसंतीपुर गांव की सबसे बुजुर्ग नागरिक।करीब सौ साल की उम्र में कल रात साढ़े नौ बजे उनका निधन हो गया।आज हम दिन में उनकी अन्येष्टि करके आ गए।अपने दिवंगत पति अतुल चंद्र शील के अंत्येष्टिस्थल के पास उनकी अपनी जमीन पर उनका दाह संस्कार हुआ।उनकी और हमारी जमीन के बीच एक खेत विधु दादा का है।उनके घर और हमारे घर के बीच तीन घर हैं। उन्होंने पूरी एक सदी की जिंदगी देखी और मरने से पहले उन्होंने भोजन किया।भोजन के बाद करवट बदलते हुए पूरे होश में प्राण त्याग दिए। उन्होंने 1952 में बसंतीपुर गांव बसने के बाद तत्कालीन नैनीताल जिले की तराई को बसते हुए देखा। वे मेरी मां से बड़ी थीं।अपने बचपन की बहुत सारी स्मृतियां उनके साथ जुड़ी हुई थीं। गांव में उनके समय की एकमात्र महिला मेरे प्रिय दोस्त नित्यानंद मंडल की चाची जी जीवित है। जिनके प्यार में हम बड़े हुए वे सभी एक एक कर चली गईं।अब ये भी .. पुरुषों में सिर्फ विधुभूषण अधिकारी और फूल चांद मंडल अस्सी पार हैं,जो हमारे बचपन में जवान हुआ करते थे। अब घरों के बीच दीवारें हैं। उन दीवारों में न कोई दरवाजा है और न खिड़की।अपने ही गांव में अपने ही लोगों के बीच हम अजनबी, पराया हो गए। कुसुम जी और अतुल जी के दो बेटे हैं दीपक और देवाशीष।पांच बहनों के बाद।दोनों मेरे छोटे भाई हैं।सबसे बड़ी देवला दीदी मेरी दीदी मीरा दी की पक्की सहेली हैं,जिनकी शादी 1961 में हुई।वे तब पांचवीं में पड़ती थी।में तब आधी कक्षा में।उनकी पढ़ाई विस्थापन के कारण देरी से शुरू हुई और शादी जल्दी हो गई। देवला दी की बेटी दीपा अजीम प्रेमजी में शिक्षिका हैं। जब मैं मेरठ जागरण में अप्रैल 1984 में संपादकीय में शामिल हुआ,तब जीजाजी और देवलादीदी हस्तिनापुर में थे।मदन मिल बंद होने से वे बेरोजगार थे।लेकिन मुझे उन्होंने अपने साथ ठहरा लिया।मेरठ में किराया का घर न मिलने तक मैं उनके घर से आता जाता था। दूसरे नंबर पर कमला दी थी।जो हरिदासपुर स्कूल में पांचवीं की छात्रा तीन और में कक्षा दो का। उनकी शादी 1964 में पांचवीं पास होते ही हो गई। वे बाद में बसंतीपुर में ही बस गई और करीब दस साल पहले उनका निधन हो गया। अमला,शिवानी और हरिदासी मुझसे छोटी हैं।देवाशीष के बाद दो बहनें और हैं। करुणा और बसंती।सभी भाई बहनों का अपना अपना परिवार है,अपने अपने रिश्ते नाते भी। कुसुमदेवी अपने माता पिता की एकमात्र संतान थीं।जो उन्हीं के साथ बसंतीपूर में बस गए थे।उनके पिता साहित्यप्रेमी थे।वे तराई में बांग्ला साहित्य की दुकान चलाने वाले एकमात्र व्यक्ति हुए। हमेशा पढ़ते रहते थे।हमने बचपन में ही बांग्ला साहित्य उन्हीं की बदौलत पढ़ना सीख। जब हम छठीं कक्षा में पहुंचे,उनसे हमारी दोस्ती हो गई। उनके दिवंगत होने के बाद तराई में बांग्ला भाषा और साहित्य की चर्चा बंद हो गई। संजोग की बात है कि कुसुमदेवीं ने अपने पिता के घर में ही दम तोड़ा।वे इसी घर में अपने छोटे बेटे के परिवार के साथ रहती थी। उनके जाने का मतलब है कि हमारे बचपन के सुनहले हिस्से का अतीत में दफन हो जाना। हम इसी तरह अतीत में विलीन होते जा रहे हैं।वजूद ऐसे ही किरचों में बिखरता जाता है और हमारा बस में कुछ नहीं होता। प्रेरणा अंशु के लघु कथा विशेषांक पर काम शुरू हो गया।सोचा था कि अंतेष्टि में शामिल होकर दफ्तर जाऊंगा। जा नहीं सका। धूप कड़ी है और शोक सबसे कड़ा।दोनों अपने खेत से गुजरते हुए भी एकसाथ झेलना कितना क्षीण है,पहली बार महसूस हुआ। संजोग की बात है कि अपने सपनों के पीछे भागते हुए चार दशक घर,गांव से बाहर दौड़ता रहा। मेरे सारे प्रिय स्त्री पुरुषों का देहांत मेरी अनुपस्थिति में हुआ। मेरे माता,पिता, ताई और चाचा की भी। थका हुआ जब घर लौटा तो बूढ़ा हो गया।दफ्तरों काम करते हुए उम्र जरूर भूल जाता हूं लेकिन शरीर का क्या करें? यह भी तो अतीत में समाहित होने लगा। कुसुमजी को विनम्र श्रद्धांजलि।अंतिम प्रणाम। पलाश विश्वास 13.05.2023

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क्या बंकिम ने ही वन्देमातरम गीत लिखा था? शायद नहीं। मुर्शिदाबाद जिले में नबाब सिराजुद्दौला के शाही महल के बहुत पास पद्मा नदी के किनारे बसे लालगोला केंद्रीय कारागार परिसर में एक काली मंदिर है,जिसमें 1790 अबतक यानी कुल 234 साल से मां काली जंजीरों से बांधी हुई है। इसी मंदिर में भूमिगत रहते हुए 1763 से 1800 तक चले बंगाल बिहार के फकीर बाउल सन्यासी विद्रोह पर केंद्रित अपना उपन्यास बंकिम चंद्र ने लिखा था।इस विद्रोह के नेता भवानी ठाकुर और देवी चौधरानी पर बंकिम का एक अलग उपन्यास देवी चौधरानी है।आनंदमठ में वंदेमारम गीत शामिल है। सविता जी के साथ हम इस मंदिर में गए थे। जहां जंजीरों के वजन से काली प्रतिमा सामने की ओर झुकी हुई है। भारतमाता की छवि इसी मूर्ति से प्रेरित है। हम पास ही उस वटवृक्ष को भी देख आए जहां क्रांतिकारी बारीन्द्र नाथ घोष यानि ऋषि अरविंद भूमिगत थे। पास ही एक और मंदिर है,जिसमें संन्यासी विद्रोह के दौरान तमाम मैदान की मूर्तियों को रखा गया था।वे मूर्तियां भी वहीं है। पास ही भारत बांग्लादेश सीमा पर बह रही है पद्मा नदी जिसके कटाव से एक बड़ी आबादी हर साल प्रभावित होती है। हमने यह पूरा इलाका देखा है। बताया गया है कि वंदे मातरम सचमुच संन्यासी विद्रोह के विद्रोहियों का गीत था,जिसे हिंदू मुसलमान विद्रोही भारत में अंग्रेजी हुकूमत से आजादी के आवाह्न बतौर गाते थे।इसी पहले से प्रचलित गीत को परिष्कृत करके बंकिम चंद्र ने अपने उपन्यास आनंदमठ में डाला। बंकिम ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में डिप्टी कलेक्टर थे। लेकिन फुटबॉल मैदान में एक अंग्रेज अफसर से झगड़ा होने के बाद वे लालगोला के इस मंदिर में भूमिगत हो गए।विद्रोह के बारे में उन्हें यहीं जानकारी मिली। जंजीरों में बंधी काली मन में उन्हें बंग माता की छवि दिखी।उनकी परिकल्पना में भारत माता नहीं थी। वंदे मातरम गीत में बंगमाता और उसकी सप्तकोटी बंगाली संतानों का उल्लेख था, भारत माता का नहीं। रवींद्र नाथ टैगोर ने बंग माता को भारत माता का रूप दे दिया। वैसे भी इन आनंद मठ और देवी चौधरानी दोनों उपन्यासों में बंकिम ने विद्रोहियों का अंग्रेजों के आगे आत्म समर्पण दिखाया है। आनंद मठ में तो उन्होंने म्लेच्छों के खिलाफ विद्रोह के बाद अंग्रेजी हुकूमत को ईश्वर की इच्छा बताई। वास्तव में इस विद्रोह में हिंदू साधुओं के साथ हैं बड़ी संख्या में मुसलमान फकीर भी शामिल थे।हिंदू मुसलमान दोनों मिलकर अंग्रेजी हुकूमत से लड़ रहे थे। देवी चौधरानी और भवानी ठाकुर के आत्मसमर्पण व बंगाल में विद्रोह के दामन के बाद भी मजनू शाह ने बिहार में लंबे समय तक विद्रोह जारी रखा।

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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