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Saturday, March 14, 2026

Trump begs,'Let Me Out of Oil'

BREAKING: PATHETIC! Trump begs the world to help bail him out of his Iran quagmire less than a week after declaring that he doesn’t need help because he had “already won!” In response to Trump’s illegal and unprovoked war on Iran, the Iranians have quite reasonably closed off the Strait of Hormuz, like they said they would if they were attacked, to international shipping. This has brought the world’s fossil fuel transportation to a grinding halt, sending gas prices skyrocketing and creating a completely predictable disaster for Trump. Trump has now been forced to beg the international community to send ships to help keep the Strait open so that gas can be brought in for all his fans who drive overcompensating F-150 trucks. “Many Countries, especially those who are affected by Iran’s attempted closure of the Hormuz Strait, will be sending War Ships, in conjunction with the United States of America, to keep the Strait open and safe. We have already destroyed 100% of Iran’s Military capability, but it’s easy for them to send a drone or two, drop a mine, or deliver a close range missile somewhere along, or in, this Waterway, no matter how badly defeated they are.” “Hopefully China, France, Japan, South Korea, the UK, and others, that are affected by this artificial constraint, will send Ships to the area so that the Hormuz Strait will no longer be a threat by a Nation that has been totally decapitated. In the meantime, the United States will be bombing the hell out of the shoreline, and continually shooting Iranian Boats and Ships out of the water. One way or the other, we will soon get the Hormuz Strait OPEN, SAFE, and FREE! President DONALD J. TRUMP! It’s a mark of how badly this war is going for Trump that he has to say this, because just SIX days ago, he declared that “We don't need people to join wars after we've already won!" Far from having “won” already, this war is rapidly developing into a Vietnam-level disaster – except this time, there was absolutely no reason to do this, and Trump has created a personal hell of his own making.

भारत का नवजागरण नमोशूद्र आंदोलन

भारत का नवजागरण, नमोशुद्र आंदोलन पलाश विश्वास भारत में नवजागरण दलित नवजागरण था, जिसकी बुनियाद जल,जमीन और जंगल, नागरिक मानव अधिकार, अस्मिता और आत्मसम्मान के मुद्दों में थी। इसका आधार दलितों में व्यापक शिक्षा आंदोलन था। भारत के आदिवासी किसान आंदोलनों की विरासत से यह जुड़ा है, जो जाति आधारित मनुस्मृति की व्यवस्था, पुरोहित तंत्र, अस्पृश्यता के खिलाफ समानता और न्याय का आंदोलन था। यह कोई समाज सुधार आंदोलन न था,जो ब्रिटिश संरक्षण में चला।बल्कि यह आंदोलन राजसत्ता और धर्म सत्ता दोनों के खिलाफ था। इस पर शेखर बंदोपाध्याय का बहुचर्चित पुस्तक है, जो शोधात्मक तो है, लेकिन इतिहास नहीं है। इस आंदोलन की चर्चा बंगाल से बाहर बहुत कम हुई है। अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु और पेरियार के आंदोलनों से बहुत पहले दो सौ साल पहले यह अंडों उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ। लेकिन बीसवीं सदी में इस आंदोलन का चरित्र राजसत्ता और धर्मसत्ता से अनुकूलित हो गया। Sekhar Bandyopadhyay's work on the Namasudra movement focuses on the history of this untouchable caste in colonial Bengal, particularly in his book, Caste, Protest and Identity in Colonial India: The Namasudras of Bengal, 1872–1947. He analyzes their struggles for social and political recognition, the internal differentiation and changing aspirations within the community, and their eventual, complex relationship with Hindu nationalism and the Partition of India. बंगाल के दलितों और खासतौर पर नमोशुद्रों को भारत विभाजन के जरिए बंगाल से खदेड़ने, उन्हें छिन्नमूल बना दिए जाने और उनकी मातृभाषा, इतिहास, भूगोल, नागरिकता, संस्कृति, विरासत, सामाजिक,राजनीतिक हैसियत खत्म कर दिए जाने से इस आंदोलन का भगवाकरण हो गया,भारत में समता और न्याय, जल जंगल जमीन के आंदोलनों के भगवाकरण की तरह। इस आंदोलन को समझे बिना भारत के विस्थापितों की समस्या और उनके सफाए के इंतजाम को समझा नहीं जा सकता। अंबेडकर ने 1916 में अपना आंदोलन शुरू किया,लेकिन इससे पहले नमोशुद्र आंदोलन के फलस्वरूप 1911 में ही बंगाल में नमोशुद्र आंदोलन के कारण अस्पृश्यता निषिद्ध हो गई। उन्नीसवीं सदी के हरिचांद ठाकुर के मतुआ आंदोलन के बारह सूत्री अनुशासन और आज्ञा पुरोहित तंत्र और अस्पृश्यता, जाति आधारित भेदभाव, कर्मकांड और पाखंड के खिलाफ गृहस्थ धर्म पर केंद्रित है। जिसमें शिक्षा और जमीन के अधिकार मुख्य है। कविगुरु रवींद्र नाथ टैगोर इस आंदोलन के समर्थक थे। 1920 में हुए नमोशुद्र सम्मेलन में उन्होंने भाग लिया था। पहली ‘आम हड़ताल’ तब नमोशुद्रों को चांडाल कहा जाता था और उनकी जनगणना में गिनती अलग होती थी। फॉरवर्ड प्रेस के अनुसार: ऊँची जातियों के दमनचक्र और शोषण ने चांडालों को उन्हें सताने वालों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। फरीदपुर के जिला मजिस्ट्रेट सीए कैली ने 8 अप्रैल, 1873 को ढाका के संभागीय आयुक्त को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि उस साल चांडालों ने ”जिले में आम हड़ताल की और यह निर्णय किया कि वे उच्च वर्ग के किसी भी सदस्य की किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें हिंदू जातियों में उससे बेहतर स्थान प्राप्त न हो जाए, जो उन्हें वर्तमान में प्राप्त है।” एक समकालीन इतिहासविद ने इस हड़ताल को ऊँची जातियों का सामाजिक बहिष्कार निरूपित किया। चांडालों ने तय किया कि वे न तो ऊँची जातियों के लोगों की ज़मीनें जोतेंगे और ना ही उनके घरों की छतों को फुंस से ढकेंगे। यह हड़ताल चार से पांच महीने चली। यह भारत की पहली ऐसी आम हड़ताल थी, जिसके संबंध में आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध हैं। अन्य जिलों जैसे बारीसाल, ढाका, जैसोर, मैमनसिंह व सिलहट के चांडालों ने भी फरीदपुर के अपने साथियों से हाथ मिला लिया। सन 1871 की जनगणना के अनुसार, बंगाल में 16,20,545 चांडाल थे। इन पांच विशाल जिलों के हड़ताली चांडालों की संख्या 11,91,204 (कुल आबादी का 74 प्रतिशत) थी। भद्रलोक (ब्राह्मणों, बैद्यों और कायस्थों का जाति सिंडीकेट) को निशाना बनाने वाली इस विशाल हड़ताल की सफलता, निरक्षर चांडालों की संगठनात्मक और परस्पर एकता कायम करने की क्षमता की द्योतक थी। चांडालों ने यह संकल्प किया कि वे शिक्षा के ज़रिए अपनी सामाजिक हैसियत में सुधार लायेंगे और अपना विकास करेंगे। इस सामाजिक-शैक्षणिक आंदोलन के केंद्र, फरीदपुर के चांडालों की शैक्षणिक स्थिति दयनीय थी। ऊँची जातियां, पददलित वर्गों को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने देने के सख्त खिलाफ थीं। ब्राह्मण और कायस्थ यह मानते थे कि शिक्षा उनकी बपौती है। चांडाल और मुसलमान इस पूर्वग्रह के सबसे बड़े शिकार थे। फरीदपुर में 1,56,000 चांडाल रहते थे परंतु केवल 200 चांडाल बच्चे स्कूल जाते थे। हरिचांद ठाकुर (1812-1877) व उनके प्रतिभाशाली पुत्र गुरू चांद ठाकुर (1847-1937) ने इस निरक्षर व अज्ञानी समुदाय को शिक्षित करना अपना मिशन बनाया। हरी चंद ठाकुर ने मातुआ पंथ की स्थापना की, जो कापाली, पोंड्रा, मालो व मूची जातियों में बहुत लोकप्रिय हुआ। दोनों ने पिछड़ों की उन्नति के लिए शिक्षा को एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ज़ोर दिया। इस सामाजिक न्याय आंदोलन को आस्ट्रेलियाई बैप्टिस्ट मिशनरी डॉ. सीएस मीड ने अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। फरीदपुर जिले में ठाकुर के पैतृक गांव ओड़ाकांदी में नामशूद्र, अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोलना चाहते थे ताकि निरक्षर व अज्ञानी किसानों को लगान और ऋण चुकाने में उच्च जातियों के ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा उनके साथ की जा रही धोखाधड़ी से उन्हें बचाया जा सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों के कायस्थों ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि शिक्षित हो जाने के बाद, बटाई पर खेती करने वाले किसान और उनके सेवक काम नहीं करेंगे। भद्रलोकों के विरोध के चलते, गुरूचंद ठाकुर ने डॉ. मीड से सहायता मांगी। मीड ने उन्हें न केवल स्कूल के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई वरन अंग्रेज़ अफसरों से उनका परिचय भी करवाया। यह नमोशूद्रों के सशक्तिकरण की ओर एक प्रभावी कदम था। डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा का सदस्य बनाने को लगा दिया एड़ी-चोटी का जोर भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, जातियों और स्त्रियों के लिए जो संवैधानिक प्रावधान किए गए, अगर आंबेडकर न होते तो क्या वे संभव थे? डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने का श्रेय जोगेंद्रनाथ मंडल को ही जाता है। उनका मानना था कि अगर डॉ. आंबेडकर संविधान सभा में नहीं गए तो दलित समाज को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। दरअसल, उस समय अनेक लोग चाहते थे कि डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में जगह नहीं मिले। इसके लिए तमाम प्रपंच किए जा रहेथे। इस संदर्भ में दिलीप गायेन ने जोगेंद्रनाथ मंडल के प्रयासों के बारे में लिखा है कि उस समय के बंगाल में सुहरावर्दी सरकार सत्ता में थी। उनके अनुसूचित जाति के विधायकों को लेकर साहस के साथ जोगेंद्रनाथ मंडल आगे बढ़े थे। बंगाल से डॉ. आंबेडकर को खड़ा कर उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। उन्हें कांग्रेस के दो एमएलए गयानाथ बिस्वास और द्वारिकानाथ राय, निर्दलीय मुकुंद बिहारी मल्लिक, रंगपुर के क्षत्रिय समिति के नागेंद्रनारायण राय और अनुसूचित जाति फेडरेशन के एकमात्र एमएलए जोगेंद्रनाथ मंडल ने वोट दिया। विडंबना यह है कि बंगाल के जिन दलितों ने आंबेडकर को संविधानसभा में पहुंचाने की कीमत बंगाल के इतिहास भूगोल,मातृभाषा, जल जंगल जमीन ,नागरिकता और मानवाधिकारों से बेदखली के रूप में चुकाया, उनके लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है और न कोई कानूनी ढांचा उनके लिए है।वे अब भी विदेशी कानून के दायरे में कैद बंधुआ वोट बैंक बनकर सत्तादकों की अनुकम्पा से जीते मरते हैं। विडंबना है कि इतिहास हमें बताता है कि समाज सुधार आंदोलन और सामाजिक न्याय के संघर्ष, एक दूसरे के पूरक नहीं होते बल्कि वे परस्पर-विरोधी और असंगत होते हैं। औपनिवेशिक बंगाल में 19वीं और 20वीं सदी में सामाजिक सुधार और सामाजिक न्याय के आंदोलन एक-दूसरे के समानांतर चले। जहां सामाजिक सुधार आंदोलन का उद्देश्य ऊँची जातियों के घिसे-पिटे दकियानूसी कर्मकांडों और परंपराओं जैसे सती, बहुपत्नी प्रथा, भारी-भरकम दहेज़, बाल-विवाह, बच्चों को गंगा सागर में फेंकना, अंतरजली यात्रा इत्यादि को उखाड़ फेंकना था, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन का लक्ष्य अशिक्षा का नाश और समाज के निचले वर्गों में मानवीय गरिमा की अलख जगाना था। जहां सामाजिक सुधार आंदोलनों की भारतीय इतिहासविदों ने भूरी-भूरी प्रशंसा की, वहीं सामाजिक न्याय आंदोलन को इतिहास के अंधेरे में गुम हो जाने दिया। इस आंदोलन पर अभी सिलसिलेवार कम करने की जरूरत है। कौन करेगा? The Namasudra movement was a socio-religious and political movement of the Namasudra (formerly Chandal) people of Bengal, primarily in the late 19th and early 20th centuries, that sought to challenge social discrimination, gain dignity, and secure education and political power. Key components included early protests against oppressive practices, such as the 1872-73 strike over forced labor, and the development of a community identity through the Matua religion founded by Harichand Thakur and developed by his son Guruchand Thakur. Key aspects of the movement Social and political origins: The movement arose from centuries of social inequality and economic hardship faced by the Namasudras, who were treated as "untouchables". Early protest: A major early event was the "general strike" of 1872-73, where Namasudras protested being forced to perform conservancy services in jails while other castes were exempt. This strike lasted for several months and pressured authorities to take action against mistreatment. and a spiritual foundation for their struggles. Goals: The movement's objectives evolved over time, shifting from seeking equal status to focusing on concrete goals like acquiring education, securing employment, achieving economic prosperity, and gaining political representation. Education movement: Under Guruchand Thakur, the movement launched a specific drive for education among the Namasudras, who had little to no access to educational institutions at the time. Political organization: The Namasudras began to form their own political organizations and caste associations, successfully influencing government policies and gaining sympathetic support, as seen in the Poona Pact of 1932. Terminology: The term "Namasudra" gained official recognition in the 1911 census, solidifying the community's identity and paving the way for further political mobilization. The Matua Movement: The socio-religious and political awakening of the community was strongly influenced by the Matua movement, which was founded by Harichand Thakur and guided by his son Guruchand Thakur. The Matua faith provided the Namasudras with a strong sense of community, self-respect, and a spiritual foundation for their struggles. Key aspects of Bandyopadhyay's analysis: Identity formation: Bandyopadhyay examines how the Namasudras developed a shared identity due to oppression and marginalization, using the Matua sect, founded by Harichand Thakur, as a key example of resistance and a new spiritual identity. Caste consciousness: He highlights the varied levels of consciousness and aspirations within the Namasudra movement, noting that despite a shared identity, different goals and ideologies coexisted. Political engagement: The movement's political trajectory is analyzed, including its involvement in anti-colonial movements and the significant role of leaders like Jogendranath Mandal. Integration with dominant hegemony: Bandyopadhyay critically discusses the Namasudras' gradual alignment with upper-caste ideologies, which complicated their relationship with the anti-colonial movement. Internal differentiation: A key point of his work is recognizing the internal differentiation within the Namasudra community, which shaped its responses to social and political changes. https://www.amazon.in/Caste-Protest-Identity-Colonial-India/dp/0198075960 By Shekhar Bandopadhyay संदर्भ: https://www.forwardpress.in/2016/11/bangal-ka-vismrit-namshudr-aandolan/ https://www.forwardpress.in/2021/01/remembering-jogendranath-mandal-hindi/#:~:text=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%2011%20%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A4%B0%2C%201948%20%E0%A4%95%E0%A5%8B,%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2'%2C%20%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95%20%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%B6%20%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%20%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2

नमोशूद्र आंदोलन:क्या दलित अपना इतिहास जानते हैं

1873 में बंगाल के पांच जिलों में अस्पृश्यता के खिलाफ अपनी पहचान के लिए दलितों ने पांच महीने तक हड़ताल की। भारत में दलितों की पहचान और आरक्षण का यही आधार है। क्या आज दलित अपना इतिहास जानते हैं? फॉरवर्ड प्रेस के मुताबिक पहली ‘आम हड़ताल’ ऊँची जातियों के दमनचक्र और शोषण ने चांडालों को उन्हें सताने वालों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया। फरीदपुर के जिला मजिस्ट्रेट सीए कैली ने 8 अप्रैल, 1873 को ढाका के संभागीय आयुक्त को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि उस साल चांडालों ने ”जिले में आम हड़ताल की और यह निर्णय किया कि वे उच्च वर्ग के किसी भी सदस्य की किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें हिंदू जातियों में उससे बेहतर स्थान प्राप्त न हो जाए, जो उन्हें वर्तमान में प्राप्त है।” एक समकालीन इतिहासविद ने इस हड़ताल को ऊँची जातियों का सामाजिक बहिष्कार निरूपित किया। चांडालों ने तय किया कि वे न तो ऊँची जातियों के लोगों की ज़मीनें जोतेंगे और ना ही उनके घरों की छतों को फुंस से ढकेंगे। यह हड़ताल चार से पांच महीने चली। यह भारत की पहली ऐसी आम हड़ताल थी, जिसके संबंध में आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध हैं। अन्य जिलों जैसे बारीसाल, ढाका, जैसोर, मैमनसिंह व सिलहट के चांडालों ने भी फरीदपुर के अपने साथियों से हाथ मिला लिया। सन 1871 की जनगणना के अनुसार, बंगाल में 16,20,545 चांडाल थे। इन पांच विशाल जिलों के हड़ताली चांडालों की संख्या 11,91,204 (कुल आबादी का 74 प्रतिशत) थी। भद्रलोक (ब्राह्मणों, बैद्यों और कायस्थों का जाति सिंडीकेट) को निशाना बनाने वाली इस विशाल हड़ताल की सफलता, निरक्षर चांडालों की संगठनात्मक और परस्पर एकता कायम करने की क्षमता की द्योतक थी। चांडालों ने यह संकल्प किया कि वे शिक्षा के ज़रिए अपनी सामाजिक हैसियत में सुधार लायेंगे और अपना विकास करेंगे। इस सामाजिक-शैक्षणिक आंदोलन के केंद्र, फरीदपुर के चांडालों की शैक्षणिक स्थिति दयनीय थी। ऊँची जातियां, पददलित वर्गों को किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने देने के सख्त खिलाफ थीं। ब्राह्मण और कायस्थ यह मानते थे कि शिक्षा उनकी बपौती है। चांडाल और मुसलमान इस पूर्वग्रह के सबसे बड़े शिकार थे। फरीदपुर में 1,56,000 चांडाल रहते थे परंतु केवल 200 चांडाल बच्चे स्कूल जाते थे। हरी चंद ठाकुर (1812-1877) व उनके प्रतिभाशाली पुत्र गुरूचंद ठाकुर (1847-1937) ने इस निरक्षर व अज्ञानी समुदाय को शिक्षित करना अपना मिशन बनाया। हरी चंद ठाकुर ने मातुआ पंथ की स्थापना की, जो कापाली, पोंड्रा, मालो व मूची जातियों में बहुत लोकप्रिय हुआ। दोनों ने पिछड़ों की उन्नति के लिए शिक्षा को एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर ज़ोर दिया। इस सामाजिक न्याय आंदोलन को आस्ट्रेलियाई बैप्टिस्ट मिशनरी डॉ. सीएस मीड ने अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। फरीदपुर जिले में ठाकुर के पैतृक गांव ओराकंडी में नामशूद्र, अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोलना चाहते थे ताकि निरक्षर व अज्ञानी किसानों को लगान और ऋण चुकाने में उच्च जातियों के ज़मींदारों और साहूकारों द्वारा उनके साथ की जा रही धोखाधड़ी से उन्हें बचाया जा सके। इस प्रस्ताव का स्थानीय ऊँची जातियों के कायस्थों ने कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि शिक्षित हो जाने के बाद, बटाई पर खेती करने वाले किसान और उनके सेवक काम नहीं करेंगे। भद्रलोकों के विरोध के चलते, गुरूचंद ठाकुर ने डॉ. मीड से सहायता मांगी। मीड ने उन्हें न केवल स्कूल के लिए आर्थिक मदद उपलब्ध करवाई वरन अंग्रेज़ अफसरों से उनका परिचय भी करवाया। यह नामशूद्रों के सशक्तिकरण की ओर एक प्रभावी कदम था। मील का पत्थर सन 1881 में खुलना जिले के दत्ताडंगा में अखिल-बंगाल नामशूद्र सम्मेलन हुआ। पूरे बंगाल से हजारों नामशूद्रों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन की अध्यक्षता गुरूचंद ठाकुर ने की। इस सम्मेलन में शिक्षा के संबंध में जो संकल्प पारित किए गए, वे सामाजिक उत्थान की राह में मील के पत्थर साबित हुए। इसके बाद से, हर वर्ष सामाजिक और हर वर्ष सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर विचार-विनिमय के लिए अलग-अलग जिलों में नामशूद्र सम्मेलनों का आयोजन शुरू हो गया। हर नामशूद्र गांव में एक समिति गठित की गई। पंद्रह ग्रामीण समितियों का एक संकुल बनाया गया और हर जिले में जिला समिति का गठन हुआ। ग्रामीण, संकुल व जिला समितियों को यह अधिकार दिया गया कि वे ”नामशूद्र अंशदान कोष” के लिए चंदा इकट्ठा कर सकें। हर परिवार अपना भोजन शुरू करने के पहले मुट्ठीभर चावल अलग रख देता था, जो गांव की समिति को जाता था। गांव की समिति का हर सदस्य एक आना प्रतिमास का चंदा देता था, संकुल समिति के सदस्य दो आने और जिला समिति के सदस्य चार आने प्रतिमास चंदे के रूप में देते थे। श्राद्ध, विवाह और अन्य मौकों पर होने वाले खर्च का तीन प्रतिशत इस कोष में दान दिया जाता था। जो परिवार अपने 20 साल से कम उम्र के लड़कों या 10 साल से कम उम्र की लड़कियों का विवाह करते थे, उन्हें जात बाहर कर दिया जाता था। https://www.forwardpress.in/2016/11/bangal-ka-vismrit-namshudr-aandolan/

भारत विभाजन का असली कारण: अछूतों की गिनती हिंदुओं में नहीं होना

अछूतों, पिछड़ों की गिनती हिंदुओं में नहीं होती थी भारत विभाजन का असली कारण और पुनर्वास में भेदभाव भी इसीलिए बंगाल और पूरे भारत में अछूतों को ब्रिटिश काल की जनगणनाओं में अलग से गिना जाता था, जिसकी शुरुआत 1909 में हुई और 1911 और 1931 तक यह प्रक्रिया और भी पुख्ता हो गई, ताकि उन्हें व्यापक हिंदू समुदाय से अलग पहचाना जा सके। यह अलगाव मंदिरों में प्रवेश से वंचित होने और "अशुद्ध" व्यवसायों जैसे मानदंडों पर आधारित था, जिसके कारण उन्हें अक्सर "बाहरी जाति" के रूप में वर्गीकृत किया जाता था। नमोशूद्र आंदोलन: बंगाल में, गुरुचंद ठाकुर जैसे नेताओं ने 1880 के दशक से अछूतों, विशेष रूप से नमोशूद्र समुदाय के लिए एक अलग पहचान स्थापित करने के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन में बंगाल की सभी अछूत जातियां शामिल थीं। बंगाल से बाहर फेंके गए भारत विभाजन के शिकार विस्थापित इसी नमो शूद्र आंदोलन में शामिल थे।भारत विभाजन के जरिए उन्हें सजा दी गई। 1909 की घोषणा: भारत के जनगणना आयुक्त ने औपचारिक रूप से 1909 में अछूतों की अलग से गणना करने की घोषणा की ताकि उन्हें "अविभाजित" हिंदुओं से अलग किया जा सके। गणना के मानदंड: अलग-अलग गणनाएँ उन समूहों पर केंद्रित थीं जो पारंपरिक हिंदू मानकों के अनुरूप नहीं थे, जैसे कि वे लोग जिनकी मंदिरों तक पहुँच नहीं थी, जिनकी सेवा गैर-ब्राह्मण पुजारी करते थे, या जिन्हें अपवित्रता का कारण माना जाता था। ब्रिटिश काल की जनगणनाओं में, विशेष रूप से 1909 के बाद से, जब जनगणना आयुक्त ने उन्हें एक अलग श्रेणी के रूप में नामित किया, तो बंगाल और पूरे भारत में अछूतों (अब दलितों) को सामान्य हिंदू आबादी से अलग गिना जाता था। यह कदम, इस निष्कर्ष के आधार पर उठाया गया था कि वे रूढ़िवादी हिंदू मानदंडों में फिट नहीं बैठते थे, और इसका उद्देश्य "बाहरी जातियों" या "पिछड़े वर्गों" की अलग से गणना करना था। इस पृथक गणना से संबंधित मुख्य विवरण: संदर्भ: 1872 की बंगाल जनगणना में पहली बार यह सुझाव दिया गया था कि "अछूतों" को अलग से गिना जाए, यह तर्क देते हुए कि वे वास्तव में हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं थे। 1909 की घोषणा: 27 जनवरी, 1909 को जनगणना आयुक्त ने आधिकारिक तौर पर अछूतों की अलग से गणना की घोषणा की। मापदंड: 1911 की जनगणना ने औपचारिक रूप से उन लोगों को अलग कर दिया जो मुख्यधारा की हिंदू प्रथाओं का पालन नहीं करते थे (उदाहरण के लिए, ब्राह्मण वर्चस्व को नकारते थे, मंदिरों में प्रवेश नहीं करते थे, प्रदूषण फैलाते थे)। 1931 की जनगणना: 1931 की जनगणना ने इसे और परिष्कृत किया, इन समूहों के लिए "बाहरी जातियाँ" जैसे शब्दों का उपयोग करते हुए, उन्हें "हिंदू पिछड़े समुदायों" से अलग किया। राजनीतिक प्रभाव: बंगाल में, गुरुचंद ठाकुर जैसे नेताओं ने इस मान्यता के लिए जोर दिया, और समुदाय ने 1880 के दशक की शुरुआत में ही अलग पहचान की मांग की थी।

Friday, March 13, 2026

तेल गैस से बड़ा संकट विस्थापन का, रोजगार का।भारत सरकार क्या करेगी?

कितने लोगों को खाड़ी से निकालेंगे मोदीजी, कितनों को रोजगार देंगे? एक करोड़ खाड़ी के बेरोजगार और तेल गैस से बड़ा रोजगार का संकट कोच्चि में मोदीजी ने दावा किया,आज का भारत संकट में अपने नागरिकों को कभी अकेला नहीं छोड़ता। पश्चिम एशियन फंसे भारतीयों को निकालने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। खाड़ी से तेल और गैस भारत लाने में नाकाम सरकार लोगों को निकाल लें तो बहुत बड़ी बात होती। लेकिन हो क्या रहा है? जहां तहां फंसे हैं लोग और मदद की गुहार लगा रहे हैं।वीडियो वायरल हैं।क्यों खाड़ी देशों (GCC) में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ के बीच भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्था और तेल उद्योग में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सबसे अधिक संख्या संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में (34 लाख से अधिक) है, इसके बाद सऊदी अरब (25-27 लाख) दूसरे स्थान पर है। विकिपीडिया और संयुक्त अरब अमीरात के मुताबिक अमीरात में 45 लाख भारतीय हैं। कितनों को निकल सके मोदी जी? अपने ऊधम सिंह नगर जिले के 424 लोग खाड़ी के 11 देशों में फंसे हैं।खाड़ी में फंसे एक करोड़ लोगों की छोड़िए, इन सवा चार सौ लोगों को ही निकल लाते! केरल में बोल रहे थे मोदी जी।केरल के लगभग 22 लाख से अधिक लोग खाड़ी देशों (GCC) में रहते हैं, जबकि कुल प्रवासी मलयाली समुदाय लगभग 50 लाख (वैश्विक स्तर पर) होने का अनुमान है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के अनुसार, केरल के कुल निवासियों का लगभग 10% हिस्सा राज्य से बाहर रहता है, जिसमें खाड़ी देशों का योगदान सबसे अधिक है। उनके लिए या देश के किसी भी राज्य में लोगों के रोजगार के लिए सरकार क्या कर रही है? उत्तराखंड की आबादी एक करोड़ है और पहाड़ के गांव वीरान हैं। खाड़ी के देशों में उत्तराखंड के कितने लोग हैं इसके आंकड़े नहीं हैं। उत्तराखंड से पलायन के आंकड़े हैं? दुनिया भर में पंजाबी प्रवासी (Diaspora) की कुल संख्या लगभग 3 से 5 मिलियन (30-50 लाख) के बीच मानी जाती है, जो मुख्य रूप से कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व में बसे हैं। पिछले कुछ वर्षों में, पंजाब से हर साल लगभग 1.25 से 1.5 लाख युवा पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जा रहे हैं। देश में रोजगार हो तो लोग क्यों जाते विदेश? तेल और गैस का संकट गहराता ही जा रहा है।कल कारखाने उद्योग बंद होने को हैं। देश में भारी रोजगार संकट तेल गैस संकट से बड़ा है। तेल गैस के बिना भी जी लेंगे।रोजगार के बिना कैसे जिएंगे। खाड़ी में कमाने गए करीब एक करोड़ भारतीय वाहन फंसे हुए हैं।जिन्हें देर सवेर लौटना है।उनकी वापसी की संभावना कम है क्योंकि खाड़ी देशों की अर्थ व्यवस्था को इजराइल अमेरिका ने ध्वस्त कर दिया है। देश में बढ़ती बेरोजगारी के साथ इन एक करोड़ विस्थापित बेरोजगारों की बेरोज़गारी देश की बड़ी समस्या बनने वाली है। प्रमुख खाड़ी देशों में भारतीयों की अनुमानित संख्या: संयुक्त अरब अमीरात (UAE): ~34-35 लाख से अधिक (दुबई, अबू धाबी में सबसे ज्यादा)। सऊदी अरब: ~25-27 लाख। कुवैत: ~9-10 लाख। कतर: ~7-8 लाख। ओमान: ~6-7 लाख। बहरीन: ~3 लाख। अन्य मध्य पूर्वी देश: इजराइल: ~20,000 ईरान: ~10,000 इराक: ~17,000 मुख्य बिंदु: इन छह देशों (UAE, सऊदी, कुवैत, कतर, ओमान, बहरीन) को GCC देश कहा जाता है। भारत को इन देशों से सबसे अधिक रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) मिलती है। भारतीय मूल के लोग वहां निर्माण, सेवा और तेल क्षेत्रों में काम करते हैं।

Wednesday, March 11, 2026

सारा तेल अमेरिका का?

ईरान खत्म और सारा तेल अमेरिका का अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ट्रंप समर्थक अमेरिकी टीवी चैनल फॉक्स न्यूज में दावा किया है कि सिर्फ 14 दिनों इराक खत्म हो जाएगा।दुनिया के नक्शे से मिट जाएगा ईरान।फिर सारा तेल अमेरिका का। युद्ध का असली मकसद यही है। ग्राहम ने दावा किया है कि ईरान और वेनेजुएला में दुनिया का कुल 31 प्रतिशत तेल है।यह सारा तेल अब अमेरिका का हुआ। “ইরানের মেয়াদ আর মাত্র ১৪ দিন… এরপর দেশটি শেষ।” সোমবার ফক্স নিউজে এমনই বাজি ধরে বললেন মার্কিন রিপাবলিকান সিনেটর লিন্ডসে গ্রাহাম। মাত্র ৫ মিনিট ১ সেকেন্ডের একটি সাক্ষাৎকার। কিন্তু সেই কয়েক মিনিটেই এমন কিছু কথা বলেছেন তিনি যা শুনে স্তম্ভিত অনেকেই।নিজেও ফেঁসেছেন, বিপদে ফেলেছেন ট্রাম্পকেও। কি এমন মন্তব্য করেছিলেন তিনি? কয়েকটা অংশ দেখুন: লিন্ডসে গ্রাহাম বলেছিলেন, “বিশ্বের মোট তেলের ৩১ শতাংশ মজুত রয়েছে ভেনেজুয়েলা ও ইরানে। আমরা এই ৩১ শতাংশ তেলের মালিকানা পেতে যাচ্ছি। এটি চীনের জন্য দুঃস্বপ্ন। আমেরিকার জন্য ভালো বিনিয়োগ।” “ ইরানের ‘শাসকগোষ্ঠী এখন মৃত্যুর পথে। আগামী দুই সপ্তাহ পর তারা হাঁটু গেড়ে বসতে বাধ্য হবে। তাদের এমন শাস্তি হবে, যা আগে কখনো হয়নি। যুক্তরাষ্ট্র এমন সমৃদ্ধি পেতে যাচ্ছে, যা কেউ কখনো কল্পনা করেনি।” “ হ্যা, যুদ্ধে প্রথম চারদিনে যুক্তরাষ্ট্রের ২০০কোটি ডলার খরচ হয়েছে, পরের দুদিনে আরও বেশী। তবে এতে চিন্তার কিছু নেই, এসবই আসলে বিনিয়োগ। যুদ্ধ শেষে ইরানের যে পরিমান তেলের মালিকানা পাওয়া যাবে তাতে তিনমাসেই এই অর্থ উঠে আসবে। ” “ আমি চাই সৌদি ও কাতার ইরানের বিরদ্ধে যুদ্ধে যোগ দিক। আমরা তাদের কাছে অস্ত্র বিক্রি করি। তাদের ভালো সক্ষমতা আছে।” মার্কিন সিনেটর লিন্ডসে গ্রাহামের বক্তব্য শুনে গা জ্বলে উঠছে? তাহলে জানা যাক কে এই লোক। বিশ্লেষকরা বলছেন, যেসব ব্যক্তি ট্রাম্প প্রশাসনের ইসরায়েলপ্রীতি এবং ইরানের বিরুদ্ধে যুদ্ধের পক্ষে সরব, তাদের মধ্যে অন্যতম এই গ্রাহাম। তার প্রথম পরিচয়, তিনি ইরানের ওপর হামলার মূল উদ্যোক্তা। দ্য ওয়াল স্ট্রিট জার্নাল বলছে, শুরুতে ইরানে হামলার পরিকল্পনা ছিল না ট্রাম্পের। কিন্তু গ্রাহাম ইসারাইল সফর করে নেতানিয়াহুকে বোঝান ইরান আক্রমণ করা কতটা লাভজনক হবে। নেতানিয়াহু সাথে সাথে আগ্রহী হলেন। এরপর কীভাবে প্রেসিডেন্ট ট্রাম্পকে যুদ্ধের জন্য রাজি করানো যায়, সে বিষয়ে নেতানিয়াহুকে পরামর্শ দেন গ্রাহাম। নেতানিয়াহু এরপর ট্রাম্পকে এমন কিছু গোয়েন্দা তথ্য দেখান, যা দেখে ট্রাম্পও ইরানের বিরুদ্ধে যৌথ যুদ্ধ শুরু করতে রাজি হয়। সুতরাং বুঝতেই পারছেন, লিন্ডসে গ্রাহাম হয়তো সেই লোক, যার ‘প্ররোচনায়’ ইরান যুদ্ধটা হচ্ছে। এবার আরেকটি ভয়ানক তথ্য শুনুন। ভেনেজুয়েলার প্রধানমন্ত্রী নিকোলা মাদুরোকে যুক্তরাষ্ট্রের অপহরণ এবং ইরানে হামলা এই দুটো কাজই করা হয়েছে, গ্রাহামের পরামর্শে, তেলসম্পদের নিয়ন্ত্রণ নিতে। গ্রাহামের পোর্টফলিও আরও লম্বা। ২০০৩ সালের ইরাক যুদ্ধের কথা মনে আছে নিশ্চয়। এই যুদ্ধটা শুরুর জন্য তিনি মার্কিন প্রেসিডেন্ট বুশকেও প্ররোচিত করেন এবং সফল হন। গ্রাহামের সাজানো পরিকল্পনায় ইরাক ধ্বংসস্তূপে পরিণত হয়, প্রাণ হারান ইরাকের ৩ লাখ বেসামরিক নাগরিক । গাজায় হামলা চালিয়ে জায়গা ফাঁকা করে ট্রাম্পের স্বপ্নের শহর তৈরি করার বুদ্ধিটাও কিন্তু গ্রাহামের। সিরিয়া ও লিবিয়ায় সামরিক হস্তক্ষেপেরও পরামর্শক ছিলেন লিন্ডসে গ্রাহাম। এই দুটো দেশ এখন বিপর্যস্ত। এভাবে গত দুই দশক ধরে নিরলস ভাবে মধ্যপ্রাচ্যে যুদ্ধ বাঁধিয়ে যাচ্ছেন গ্রাহাম। ও হ্যা! সেই ফক্স নিউজ সাক্ষাৎকারের শেষদিকে গ্রাহাম আরেকটি ইঙ্গিতও দেন। উপস্থাপককে নিজের ক্যাপ দেখিয়ে তিনি বলেন, “দেখছেন? এতে লেখা Free Cuba। অপেক্ষা করুন… কিউবার মুক্তিও আসছে। আমরা বিশ্বজুড়ে অভিযান চালাচ্ছি। খারাপ লোকদের সরিয়ে দিচ্ছি। এরপর কিউবার পালা।” এবার আপনাকে একটা প্রশ্ন করি ? পৃথিবীতে যারা অশান্তি সৃষ্টি করে, আগ্রাসন দিয়ে অজস্র নিরীহ মানু্‌ষকে হ*ত্যা করে, শেষ পর্যন্ত ইতিহাস তাদের কী নামে ডাকে? #iran #war #Israel #Trump

No War, Investment For Oil Monopoly

ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम ईरान युद्ध को अमेरिका के लिए एक बढ़िया निवेश बता रहे हैं। उन्होंने एक टीवी चैनल से बात करते हुए कहा, 'वेनेजुएला और ईरान के पास दुनिया के तेल भंडार का 31 फीसदी हिस्सा है। इस 31 फीसदी हिस्से के साथ हमारा पार्टनरशिप होना चीन के लिए बुरे सपने के समान है। यह युद्ध एक अच्छा निवेश है।' उनके इस बयान का साफ और सीधा मतलब है कि अमेरिका की नजर ईरान के तेल पर है और तेल भंडारों पर कब्जे के लिए ही अमेरिका ने यह युद्ध शुरू किया है। Lindsey Graham Says $1B a Day on Iran War Is “Best Money Ever Spent” Lindsey Graham, the veteran Republican senator who has been pushing for war against Iran for decades, has issued a dire warning to the Iranian government, saying it was worth spending money to “take this regime down”. Good Investment" Argument: In March 2026, Graham stated that the U.S. and its partners could control 31% of the world's oil reserves by dealing with a post-regime Iran and Venezuela, calling it a "good investment". Regime Change Strategy: Graham has pushed for the fall of the current Iranian government, arguing it would lead to a new, peaceful Middle East and significant financial gains. Focus on Resources: He has highlighted the importance of securing Iran's oil infrastructure for future economic advantage.

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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