#डेटलाइन_कोलकाता
#बांग्लादेश में दुर्गोत्सव में इतनी मुस्लिम महिलाएं,
#भारत में कितनी?
पलाश विश्वास
Taslima Nasrin के तेवर बदले नहीं हैं।धर्म के नाम अधर्म,उत्पीड़न और अत्याचारों के खिलाफ उनकी कलम अभी थमी नहीं है।इस वक्त भी वे बाग्लादेश के मदरसों में यौन उत्पीड़न के खिलाफ खूब लिख रही हैं।#लज्जा लिखने के बाद बांग्लादेश से निर्वासित होकर वे कोलकाता चली आई।
इससे पहले उन्होंने #निर्वाचित_कालम के लिए आनंद पुरस्कार मिला।इसमें प्रकाशित तमाम लेखों में धर्म के बारे में उनके विचार बांग्लादेश की तमाम पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।तब तसलीमा बांग्लादेश में ही थीं।
तब भी उनकी आलोचना खूब होती थी और लोकप्रिय भी खूब थीं। लेकिन उनपर लज्जा लिखने से पहले कोई हमला या उनके खिलाफ किसी फतवे की मुझे जानकारी नहीं थी।
जब निर्वासित होकर तसलीमा कोलकाता आई,तब भी कामरेड #ज्योति_बसु मुख्यमंत्री थे। तब भी मुसलमान वन दलों को ही वोट करते थे।लेकिन तब न धर्मोंमाद था और न धर्म की राजनीति इतनी प्रभावी थी।धार्मिक ध्रुवीकरण भी नहीं था। यह मेरे कोलकाता #जनसत्ता में पहुंचने के कुछ ही दिनों पहले की बात है।
दुर्गोत्सव तब राजनीतिक नहीं था और न ही पूजा के लिए क्लबों को कोई अनुदान मिलता था। दुर्गोत्सव में वन दलों के #बुक_स्टाल जरूर लगते थे। जैसा #पुस्तकमेला में लगता था।ज्योतिबाबू के जमाने में पुस्तक मेला और दुर्गोत्सव में कोई फर्क नहीं था। दोनों सांस्कृतिक महोत्सव थे।
दरअसल ज्योतिबाबू कुलीन,भद्रलोक शहरी बंगालियों की,कोलकाता की कोई खास परवाह नहीं करते थे।उनका सारा फोकस कृषि और ग्राम बांग्ला,मजदूरों किसानों युवाओं के जनाधार और संगठनों का था।तसलीमा से उन्हें कोई तकलीफ नहीं थी।
#जनसत्ता में हमारे सहयोगी रंजीब ने सबसे पहले लज्जा का संक्षिप्त अनुवाद किया,जो जनसत्ता में नहीं छपा।वह अनुवाद #प्रभात_खबर,रांची के दिवाली विशेषांक में प्रकाशित हुआ। हिंदी में लज्जा का अधिकृत अनुवाद जो प्रकाशित हुआ,उसकी अनुवादक #मुनमुन_सरकार थीं। मुनमुन कवि Chaturved Arvind जी के साथ #हिंदी_परिवर्तन में थे अस्सी के दशक में।
अरविंद जी मेरे धनबाद छोड़ने के बाद #दैनिक_आवाज में थे। उनसे पहले से परीक्षा था। हिंदी परिवर्तन के संपादक थे राजकिशोर जी #रविवार छोड़ने के बाद। मैं तब मेरठ #जागरण में था। धनबाद से #अजित_राय के साथ मैं बांग्ला परिवर्तन में लिखता था।बांग्ला परिवर्तन के संपादक थे डॉ पार्थ बनर्जी। मेरठ से भी मैं बांग्ला परिवर्तन में लिखता था,जो मेरठ में मिलता नहीं था। तब जागरण में मेरे साथी मशहूर पत्रकार Vivek Shukla मेरे लिए दिल्ली के गोल मार्केट से बांग्ला परिवर्तन ले आते थे।हिंदी परिवर्तन शुरू होते ही मैं उसमें लिखने लगा। इसी सिलसिले में मुनमुन जी से मेरी मुलाकात थी।
#समयांतर में मैं नियमित लिखता था। #संपादक Pankaj Bisht जी से नैनीताल में ही मुलाकात थी।जब वे #आजकल में थे,उस वक्त भी आजकल में मेरी कहानियां प्रकाशित हुई। #लज्जा के प्रकाशन और तसलीमा के निर्वासन के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न का मामला फोकस में आया।
हालांकि बांग्लादेश के प्रमुख लेखक ,फिल्मकार शहरयार कबीर ने पहले ही अल्पसंख्यक उत्पीड़न पर इनसाइक्लोपीडिया प्रकाशित किया था और बांग्लादेश के तमाम साहित्यकार,पत्रकार,बुद्धिजीवी अल्पसंख्यक उत्पीड़न के खिलाफ मुखर थे।
भारत में और खासतौर पर बंगाल में हिंदुत्ववादियों ने लज्जा को अपनी नफरती सियासत के मार्क हथियार में तब्दील कर दिया।बंगाल में तसलीमा के उपन्यास लज्जा के पायरेटेड संस्करण खूब बिके पांच पांच,दस दस रुपए में।मुफ़्त भी बंटे।बंगाल में सांप्रायिक ध्रुवीकरण की यह शुरुआत थी।इसकी तीखी प्रतिक्रिया सरहद के आरपार मुसलमानों में हुई।
फिरभी बंगाल में ज्योति बसु के रहते सांप्रदायिक ताकतें सर उठा नहीं पा रही थी।क्योंकि ज्योतबाबू और माकपा महासचिव अनिल विश्वास की संगठनात्मक दक्षता का कोई मुकाबला नहीं था। जनाधार ठोस था। लेकिन लज्जा को पूरे देश में सियासत का औजार बना दिया गया।
पंकज दा ने मुझसे तसलीमा का इंटरव्यू करने को कहा। तसलीमा से मेरा तब तक कोई परिचय नहीं था। अरविंदजी तब जनसत्ता में #सबरंग के प्रभारी थे और मुनमुन के अनुवाद में उनकी भी बड़ी भूमिका थी।अरविंद जी ग्रेट ईस्टर्न होटल में मुझे लेकर गए।
जैसा कि #महाश्वेता_देवी कहती थी, तसलीमा बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले की एक सीधी सी लड़की है,जो कवयित्री है और डॉक्टर भी। उसे सिर्फ लिखने की इतनी बड़ी सजा मिली,मुझे भी उनसे मिलकर यही लगा। जैसा कि कोई भी बंगाली लड़की करती है, वह खुद किचन में गई और हमारे लिए चाय बनाकर लाई। अरविंद जी चाय पीकर चले आये।
उस दिन करीब तीन चार घंटे धर्म जाति धर्मग्रन्थ नास्तिकता अस्पृश्यता स्त्री अस्मिता स्त्री उत्पीड़न अल्प संख्यक उत्पीड़न समता न्याय और मानवाधिकार के मुद्दों पर तसलीमा से हमारी सीधी बातचीत हुई।
समयान्तर में यह इंटरव्यू दो किश्तों में छपा, जिसे डॉ #अभिज्ञात ने सब दुनिया में भी दो किश्तों में लगाया। मैंने पत्रकारिता में सैकड़ों ऐसे इंटरव्यू राजनेताओं, साहित्यकारों, फिल्मकारों, कलाकारों और आंदोलनकारियों के किए जो प्रकाशित भी हुए।
तसलीमा का उस दिन जो स्टैंड था, वही रहा।
इस बीच ममता बनर्जी सड़क पर थीं। लगातार आंदोलन कर रही थी और विधानसभा चुनावों में दीदी ने कोलकाता दख़ल कर लिया। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हो गया।वामपंथी। मुस्लमानों और हिंदुओं का भी।
ज्योतिबाबू के रिटायर करते ही मुख्यमंत्री बने बुद्धदेव भट्टाचार्य की प्राथमिकता बदल गई। उन्होंने कोलकाता को खुश करने के लिए नंदीग्राम,सिंगुर और लालगढ़ में भयानक गलतियां की।
बेदखली के शिकार हुए सबसे ज्यादा मुसलमान। ममता उनके साथ थी। वामदलों का मुस्लिम वोटबैंक बेदखल हो गया।मुसलमानों के सांप्रदायिक होते ही खेल बदल गया।
पूर्वी बंगाल मूल के शरणार्थियों ने हरि चाँद गुरु चाँद के वंशजों के नेतृत्व में मतुआ और नमोशूद्र आंदोलन की विरासत का भगवाकरण कर दिया।
बंगाल के केशरिया बनने की शुरुआत हमने देखी है।केसरिया बनने से पहले भी ज्योतिबाबू के जमाने में भी हमने दुर्गोत्सव में मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं की इतनी ज्यादा भागीदारी कभी नहीं देखी,जो इस बार बांग्लादेश में दिख रही है। अब देखना है, बांग्लादेश के कट्टरपंथी कैसा जवाबी हमला करते हैं।लेकिन मुस्लिम महिलाओं की दुर्गोत्सव में सक्रिय भागीदारी बांग्ला राष्ट्रीयता का पुनरुत्थान है या नहीं,यह कहना अभी मुश्किल है।
आवामी लोग के जमाने में भी ऐसा नहीं देखा गया।
खुद प्रधानमंत्री तारिक रहमान पूजा पंडालों में गए।
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने तो गैर हिन्दुओं को प्रतिमा स्पर्श करने पर पुलिस एक्शन का फरमान जारी कर दिया।
अल्पसंख्यक उत्पीड़न के इतिहास को देखते हुए दुर्गोत्सव में मुसलमानों की बांग्लादेश में व्यापक भागीदारी देखते हुए हमें जरूर खुश होना चाहिए।शायद सरहद पार से शरणार्थी सैलाब ठहर ही जाए।