किताबों की संस्कृति कोलकाता की पहचान
किताबों पर हमला किसकी संस्कृति?
#डेटलाइन_कोलकाता
किताबों की संस्कृति बंगाल की संस्कृति है।बंगालियों की सांस्कृतिक पहचान है। कोलकाता पुस्तक मेला और कॉलेज स्ट्रीट किताबों के मुहल्ले से यह बात समझ में नहीं आएगी।
पहले कहावत थी कि कोलकाता में कोई व्यक्ति भूखा है,सड़क पर नहीं है और उसके पास आखिरी एक रुपया है तो वह एक रुपया खाने पर खर्च नहीं करेगा, किताब खरीदेगा।
कोलकाता में किताबें अब भी सस्ती हैं और सुलभ हैं। यही हाल बांग्लादेश में भी है।
बंगालियों, तमिलों और मराठियों को मातृभाषा से अद्भुत प्रेम है।दुनिया का पहला देश भाषा के नाम जो बना वह बांग्लादेश है।भाषायी कट्टरता सबसे ज्यादा भारत में बंगालियों,मराठियों और तमिलों में है।लेकिन बंगाली दूसरी भाषाओं में लिखी गई ज्ञान विज्ञान की किताबें भी पढ़ते हैं।
कोलकाता आने वाले अतिथियों से बंगाली उनकी भाषा में संवाद करने की कोशिश अवश्य करते हैं।
इस बार तीन सौ साल के दुर्गापूजा उत्सव के इतिहास में पहली बार भगदड़ मची। उन्नीस लोग नारे गए।दुर्गा पूजा के दौरान बारिश और आंधी तूफान आम है। पहले कभी इतनी बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। इस बार कैसे हो गई?
कोलकाता में हम सत्ताइस साल रहे। चूंकि अखबार में थे तो इस दौरान दुर्गा पूजा के दौरान लगभग हर रात कोलकाता की परिक्रमा का अनुभव हुआ। 1980 से1984 तक धनबाद में थे।तब भी पूजा के दौरान कोलकाता को देखा है। दुर्गा पूजा बंगाल में धार्मिक उत्सव कभी नहीं रहा। पहले राजा महाराजा,जमींदार तबके के लोग ही दुर्गा पूजा का आयोजन करते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सार्वजनीन दुर्गोत्सव का चलन हुआ राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जोड़कर जिसमें सभी तबके के सभी समुदायों की भागीदारी से सांस्कृतिक, धर्मनिरपेक्ष दुर्गोत्सव का चलन हुआ। जो बंगाल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव बन गया और इसके साथ किताबों के स्टाल भी बड़े पैमाने पर लगने लगे। फिल्म,नाटक, गीत,संगीत और किताबों, पत्र पत्रिकाओं के शारदीय विशेषज्ञों भी इसी उत्सव के अनिवार्य अंग है। इसलिए पश्चिम बंगाल सरकार और खासकर कोलकाता पुलिस,बंगाल पुलिस इसके आयोजन की व्यवस्था में कोई जोखिम नहीं उठाते थे।
कोलकाता में उत्सव के दौरान कानून और व्यवस्था संभालने के विशेषज्ञ और अनुभवी पुलिस,प्रशासनिक अधिकारियों की ड्यूटी लगती थी।लेकिन पूजा से पहले सरकार बदल गई तो नई सरकार ने पुलिस और प्रशासन में व्यापक फेरबदल कर दिया।इसबार बाहर से कोलकाता में पूजा के दौरान तैनात किए गए पुलिस,प्रशासनिक अधिकारियों को पूजा के दौरान व्यवस्था संभालने का अनुभव ही नहीं था और हादसा हो गया।इसका जिम्मेदार कौन है?
जब ममता बनर्जी सत्ता में थी ,तब उन्होंने वाम पुस्तक सालों पर रोक लगाने के बजाय अपने पुस्तक स्टॉल लगवाए। जो लोग अब सत्ता में हैं और जिनका जनाधार अब व्यापक बताया जाता है,वे भी ऐसा ही कर सकते थे। सनातन साहित्य क्या कम हैं? धार्मिक ग्रंथ क्या कम हैं? क्या उनके समर्थक किताबें नहीं पढ़ते? इसके बदले उन्होंने किताबों पर हमला किया।सत्ता में वे हैं और स्वीकृत उनकी विचारधारा ही हावी है।मीडिया और बाजार का समर्थन सबसे ज्यादा उनको है। वाम वैचारिक साहित्य के मुकाबले वे अपने वैचारिक साहित्य का स्टॉल लगवा सकते थे।कौन रोक लेता? इसके बदले गुंडागर्दी हुई।वामपंथियों पर हमले हुए।वाम स्थलों को तहस नहस कर दिया गया।क्यों? क्या उनके पास वैचारिक साहित्य नहीं है?
बंगाल के हर जिले में,शरार में और गांवों में भी पुस्तकालय हैं,जिनमें उनके वैचारिक साहित्य नहीं है।तो क्या उन पुस्तकालयों को भी ध्वस्त कर दिया जाएगा? सत्ता में आते ही इन्होंने कॉलेज स्ट्रीट को तहस नहस करने की कोशिश की थी।
हमने विस्थापित बंगाली समाज का साहित्य प्रेम देखा है।बंगाल से हमारे पुरखे मातृभाषा प्रेम और साहित्य प्रेम की विरासत ले आए थे। बंगाल में साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों, प्राध्यापकों, वैज्ञानिकों का सम्मान अब भी बना हुआ है।राजनेताओं के मुकाबले अब भी ज्यादा।इसी सुशील समाज के समर्थन से ही ममता बनर्जी की साख बनी थी और वाम पंक्तियों का तख्ता पलट हुआ था। हमारी पहली पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी की पहचान जाति,धर्म के मुकाबले हमारी भाषा से रही है। साहित्य हर घर में खरीदा जाता था।
विस्थापितों की यह पांचवीं छठी पीढी है ,जिनकी कोई जड़ ही नहीं है। तो यह विरासत विस्थापितों के उपनिवेश में खत्म है।
क्या बंगाल में भी?
भगदड़ और पुस्तकों पर हमले के साथ क्या संस्कृति और बंगाली अस्मिता का भी अवसान हो गया?
मुख्यमंत्री का ताजा फरमान आया है कि विर्सजन से पहले कोई गैर सनातनी दुर्गा प्रतिमा को छू नहीं सकता। ऐसा करने वालों का नाम पता दर्ज करने के लिए उन्होंने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है और कहा है कि यह सांप्रदायिकता नहीं है बल्कि धार्मिक शुद्धता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है।
नमोशूद्र आंदोलन के प्रणाम स्वरूप जिस बंगाल में अस्पृश्यता निषेध का कानून 1911 में बन गया था, उसी बंगाल में धर्म की आड़ में अस्पृश्यता फिर लौट रही है।
फिर भी संस्कृति है? अस्मिता है?

चोर बागान त्रासदी, 17अक्टूबर, 2026
कृपया अपना कुशल समाचार दें।
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शिवन्या अपनी दादी के साथ इसबार कोलकाता में पूजा देखने गई है। उसकी दादी, भाई पद्योलोचन की पत्नी नमिता जी के भाई दक्षिण कोलकाता में गौड़ीय मठ में संन्यासी हैं।वे वहां अरसे से हैं।जब हम कोलकाता में थे।तभी से। डोडो घर में हमारे साथ हैं। जब से शिवन्या गई है।चिंता लगी है।
दोनों सकुशल हैं। कोलकाता में पूजा के दौरान पहली बार इतनी बड़ी दुर्घटना हुई है। 35 साल के वाम जमाने में किसी पूजा मंडप में ऐसी दुर्घटना नहीं हुई। कांग्रेस जमाने में भी नहीं। अंग्रेजी हुकूमत में भी नहीं। ममता बनर्जी के समय में भी नहीं।
कोलकाता मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों का कहना है कि वहां अठारह लाशें पहुंचीं। बड़ी संख्या में घायल लोग भी पहुंचे।इमरजेंसी में उनकी चिकित्सा चल रही थी। उनको भर्ती करने के लिए कागजात भी तैयार हो गए थे।
तभी राज्य स्वास्थ्य मंत्रालय से निर्देश आया कि मरीजों को विकल्प दिया जाए कि अगर वे सरकारी अस्पताल के इलाज से संतुष्ट न हो और अमुक निजी अस्पताल में इलाज कराना चाहे तो सारा खर्च राज्य सरकार उठाएगी।
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ऐसा शायद देश में पहली बार हो रहा कि सरकारी अस्पताल में इलाज करा रहे मरीजों को किसी खास निजी अस्पताल में सरकारी खर्च से इलाज कराने का ऑफर दिया गया।
अत्यंत दुखद
तेज बारिश में भगदड़,17 मरे
17 अक्टूबर 2026
#डेटलाइन_कोलकाता
हम जब धनबाद में थे 1980 से 1984 तक,तब भी पांच घंटे की दूरी ट्रेन से तय करके अक्सर कोलकाता जाते थे।फिर 1991 से 2018 तक कोलकाता में रहे।कोलकाता महानगर और उसके उपनगरों में पूजा पंडाल आकर्षण के केंद्र होते हैं। महालया के बाद इन दिनों पंडालों में भीड़ उमड़ने लगती है। पूजा की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और राजनीति से भीड़ लगातार अनियंत्रित होती जा रही है। अस्सी के दशक में इतनी अनियंत्रित भीड़ नहीं होती थी। भीड़ होती थी,लेकिन अनियंत्रित नहीं।
कोलकाता में दुर्गा पूजा की सप्तमी की शाम चोरबागान सर्वजनिन दुर्गोत्सव समिति के पंडाल में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गई. मां दुर्गा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे। इसी दौरान बाहर हो रही तेज बारिश के बीच पंडाल में अफरा-तफरी मच गई।
कोलकाता में चोर बागान पूजा मंडप कहां है?
कोलकाता में चोर बागान (Chorbagan) उत्तरी कोलकाता (North Kolkata) के मछुआबाजार (Machuabazar) / जोरासांको (Jorasanko) क्षेत्र में स्थित है।
• प्रमुख स्थान और पता:
• CHOREBAGAN SARBOJANIN DURGOTSAB SAMITY: 10/1, राधा माधव साहा लेन (Radha Madhab Saha Ln), सिमला, मछुआबाजार, कोलकाता, पश्चिम बंगाल 700007
• मुक़्तारम बाबू स्ट्रीट (Muktaram Babu Street) पर राम मंदिर के पास भी यह इलाका फैला हुआ है।
• निकटतम मेट्रो स्टेशन: महात्मा गांधी रोड मेट्रो स्टेशन (Mahatma Gandhi Road Metro Station - ब्लू लाइन), जो यहां से करीब 450 मीटर की पैदल दूरी पर है।
• विशेषता: चोर बागान अपनी ऐतिहासिक सार्वजनिक दुर्गा पूजा (चोर बागान सार्वजनिन दुर्गा पूजा) के लिए जाना जाता है, जिसकी शुरुआत 1938 में हुई थी।
पूजा के दौरान कोलकाता में अक्सर बारिश होती है।इसके लिए तैयारी भी रहती है। क्या इस बार तैयारी नहीं हुई?
हम हमेशा दफ्तर जाते हुए इस भीड़ में फंस जाते थे।मीलों पैदल चलकर, बारिश हुई तो पानी में चलकर दफ्तर पहुंचते थे। उत्तर कोलकाता में शोभाबजार के अहिरिटोला में इंडियन एक्सप्रेस समूह का दफ्तर था। प्रेस के भीतर भी दुर्गापूजा होती थी।एकदम बगल में बड़ा सा अहिरीटोला पूजा पंडाल। इसके पीछे शोभाबजार राजवाड़ी।आसपास दर्जनों पूजा पंडाल।जिनमें चोर बागान भी शामिल।
आधे घंटे, एक घंटे की दूरी पर तमाम विख्यात पंडाल।दफ्तर से ही हमें भीड़ की हलचल मालूम होती रहती थी। लेकिन हमारे सामने कभी भगदड़ नहीं मची।
हां, कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडालों में पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन हर बार स्थिति नियंत्रित कर ली गई। जैसे वर्ष 2015 का हादसा (देशप्रिय पार्क): 19 अक्टूबर 2015 को दक्षिण कोलकाता के देशप्रिय पार्क दुर्गा पूजा पंडाल में भी भारी भीड़ और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हुई थी।
• वजह और नुकसान: वहां दुनिया की सबसे ऊंची (88 फुट) दुर्गा प्रतिमा देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी, जिसके कारण मची अफरा-तफरी में 11 लोग घायल हो गए थे और सुरक्षा कारणों से पंडाल को दर्शन के लिए बंद करना पड़ा था।
रात के दो,तीन,चार बजे पूरे महानगर और उपनगरों की परिक्रमा करके हम सोदपुर अपने घर पहुंचते थे। रात भर ट्रेन बस चलती है।पूजा देखकर लौटने वाली भीड़ और भोर में पूजा देखने जा रही भीड़ में दफ्तर की गाड़ी से भी चलना मुश्किल होता था। तेज बारिश, आंधी तूफान में भी भीड़ रहती ही है।
इस साल सत्ता परिवर्तन हुआ है।। भाजपा की सरकार है और धर्म की राजनीति है।फिरभी चूक कहां हुई?
घायलों को कलकत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया है. इनमें से कई की हालत गंभीर बताई जा रही है. इस बीच मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य घायलों का हाल जानने अस्पताल पहुंच गए हैं. दुर्घटना में 17 लोगों की मौत की सूचना है, जबकि 35 लोग घायल हैं.
पूजा आयोजकों का कहना है कि पूजा पंडाल में भीड़ उमड़ रही थी. इस दौरान बारिश होने लगी और बारिश की वजह से लोग पंडाल में घुसने लगे. इस दौरान ही यह दुर्घटना घटी. यह दुर्घटना करीब शाम साढ़े सात बजे घटी. दुर्घटना में चार-पांच लोगों के घायल होने की सूचना है.
बता दें कि सप्तमी की शाम को मां दुर्गा के दर्शन के लिए मंडप में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. भीड़ इतनी ज्यादा थी कि तिल रखने की जगह नहीं थी. हादसा शायद मंडप का कोई हिस्सा या स्ट्रक्चर गिरने से हुआ होगा. इस अचानक हुई घटना से पल भर में दहशत फैल गई.
एक दर्शनार्थी ने कहा, मैंने सुना कि मंडप का एक हिस्सा गिर गया था. सब लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे. वे गिर रहे थे, और कुचले गए. वहीं, अन्य दर्शनार्थी का कहना है कि भारी भीड़ थी. बारिश के दौरान लोग बचने के लिए मंडप में घुसने लगे और इसी दौरान भारी भीड़ बढ़ गई और ज्यादा लोग एक साथ घुसने से भगदड़ मच गई.
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गुरुजी ब्रह्मदेव सिंह शर्मा पत्रकारिता में हमारे गुरुजी थे
पलाश विश्वास
हम प्रोफेसर बनना चाहते थे और नैनीताल डीएसबी कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य में शोध की तब 1979 में कोई व्यवस्था नहीं थी। कुमाऊँ विश्वविद्यालय नया बना था।नए नए कॉलेज खुल रहे थे,जहां नौकरी मिल सकती थी।
#डीएसबी में भी अस्थाई नौकरी मिल सकती थी।लेकिन हमने पी एच डी करने का इरादा बना लिया था। #इलाहाबाद_विश्वविद्यालय के डॉ #मानस_मुकुल_दास से डीएसबी में मेरी मैराथन बातचीत हो चुकी थी अंग्रेजी कविता पर।
तब डॉ #विजयदेव_नारायण_साही जी भी उनके साथ अंग्रेजी विभाग में थे
डॉ #मधुलिका_दीक्षित उनकी छात्रा थीं,जो डीएसबी में हमें पढ़ती थीं।उन्होंने कहा कि डॉ दास की गाइडेंस से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पी एच डी कर लो। डॉ बटरोही हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे।
उन्होंने कहा कि सीधे #शैलेश_मटियानी जी के घर चले जाओ।उनके साथ रहकर शोध पूरा कर लेना।बटरोही जी ने उनके साथ रहकर ही पी एच डी की थी।उनकी पत्रिका विकल्प के वे संपादक थे। इलाहाबाद जाने के लिए पैसे डॉ #शेखर_पाठक ने दिए थे।
घर में बताए बिना बटरोही का पत्र लेकर पहाड़ से मूसलाधार वर्षा और भूस्खलन के मध्य मैदान में बरेली पहुंचा और सहारनपुर पैसेंजर पकड़कर सीधे प्रयागराज स्टेशन पहुंचकर शैलेश जी के घर पहुंचे। शैलेश जी ने तुरंत मुझे डॉ रघुवंश के पास भेज दिया। रघुवंश जी ने कहा हिंदी में MA कर लो।रिसर्च भी हिंदी में कर लेना। मुझे यह मंजूर न था।
अंग्रेजी विभाग पहुंचे तो डॉ दास ने कहा कि उनका कोटा पूरा हो गया।उन्होंने मुझे डॉ मालवीय से मिलाया,जो गाइड बनने को तैयार थे। शर्त यह थी कि उनकी पत्रिका में उनकी मदद करूँ।उन्होंने थीसिस की सिनॉप्सिस तैयार करने को कहा।
#विकल्प के नए अंक की तैयारी थी और मटियानी जी #धर्मयुग में संजय गांधी के साथ अपनी तस्वीर खींचने से नाराज थे।वे #धर्मवीर_भारती जी के खिलाफ मानहानि की तैयारी में थे। उनके घर कोई कमरा खाली नहीं था तो मैं 100लूकरगंज में #शेखर_जोशी जी के घर चला गया।वहीं मैने थीसिस की सिनॉप्सिस तैयार की एंग्लो इंडियन नोवेल पर।
#अमृत_प्रभात में मंगलेश डबराल जी साहित्य संपादक थे।वे लूकरगंज में कवि #वीरेन_डंगवाल के साथ रहते थे। बगल में ही खुसरोबाग रोड पर रहते थे #उपेन्द्रनाथ_अश्क जी।उनके बेटे #नीलाभ मंगलेश जी और वीरेन दा के मित्र थे।हम विश्व विद्यालय से निकलकर अमृतप्रभात चले जाते थे।फिर मंगलेश जी और हम साथ लूकरगंज लौटते थे।
माया प्रेस में थे #अमरकांत जी और #भैरव_प्रसाद_गुप्त जी,जिन्होंने मुझे अनुवाद का काम देना शुरू किया।
मंगलेश जी ने कहा कि अमृत प्रभात ज्वाइन कर लो।
मार्कण्डेय जी भी चाहते थे।
समाचार संपादक माथुर जी भारती करने वाले थे।लखनऊ संस्करण की तैयारी थी।
हमने आवेदन किया लेकिन माथुर जी ने हमें नहीं रखा।
दूसरी ओर, इंडो एंग्लिकन नॉवल पर औद्योगीकरण के असर पर मेरी सिनॉप्सिस देखकर मालवीय जी ने कहा कि कमला #मार्कण्डेय को भी रखो। तीन महीने हो गए थे।हम तब ममफोर्ड गंज में रहने लगे थे।वहां से पैदल चलकर चौक ट्यूशन पढ़ाने जाते थे। लेकिन मालवीय जी से हमारी ठन गई।
मंगलेश दा और वीरेन दा ने कहा, जेएनयू चले जाओ। अमृत प्रभात में ही Urmilesh जी मिले। वे #जेएनयू में मैनेजर पांडे के निर्देशन में राहुल सांकृत्यायन पर शोध कर रहे थे।उन्होंने कहा कि जेएनयू में लिंग्विस्टिक्स पर एम फिल कर सकते हो।फिर यह तय हुआ और अगले दिन दिल्ली रवाना होकर जेएनयू पहुंच गए। माया से पेमेंट मिल गया था और दिनमान के लिए दिल्ली में लिखते थे।
इस बीच #नैनीताल गए तो कप्तान एल एम शाह बोले,कहां थे? डीएसबी में इंग्लिश पढ़ाने वाले चाहिए।दो बार हमने तुम्हारे घर खबर भिजवाई। उन्होंने खुद एप्लीकेशन ड्राफ्ट करके मुझसे कहा कि वीसी से जाकर मिलो। लेकिन मैं उनके दफ्तर के बाहर से लौट आया क्योंकि मैं उनके खिलाफ था।
घर लौटा तो बगल में कोलकाता से एक जात्रा पार्टी आई हुई थी। वहां आयोजकों ने किसी बात पर मेरे दोस्त Nityanand Mandal से बदसलूकी कर दी और मैं गुस्से में था।
उन दिनों तराई में मेरे साथ सैकड़ों लड़के होते थे।हमने कार्यक्रम रुकवा दिया। अफरा तफरी नच गई। गुस्सा शांत हुआ तो मैने कार्यक्रम फिर शुरू करवा दिया।
अगले दिन पंचायत बैठ और पिताजी #पुलिनबाबू ने भरी पंचायत में मुझे इस हंगामे का जिम्मेदार बताते हुए डांट दिया।अगले ही #उर्मिलेश की चिट्ठी आ गई कि फौरन दिल्ली आ जाओ। #धनबाद में दैनिक आवाज को एक उपसंपादक चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए कुछ दिन धनबाद में रह आओ। फिर यूनिवर्सिटी लौट आना।
लौटना नहीं हुआ।धनबाद में आवाज़ के संपादकीय में थे Madan Kashyap जी।उन्हीं के साथ ठहरा।
इससे पहले #वीर_भारत_तलवार और #मनमोहन_पाठक जी भी आवाज में थे।
गुरुजी #ब्रह्मदेव_सिंह_शर्मा जी इस अखबार के संपादक थे।उनके साथ थे बिहार के वरिष्ठ पत्रकार #सतीश_चंद्र।दोनों ने मुझे पत्रकारिता में जोत दिया।मैं दिनभर कोयला खानों में रिपोर्टिंग करता। पेज के पेज रंग देता।
मदन कश्यप अखबार छोड़ चुके थे तो रात में डेस्क भी संभालता था।फिर मिल गए #कामरेड_एके_राय, #शिबू_सोरेन, #विनोद_बिहारी_महतो और #महाश्वेता_देवी।
गुरुजी ने कहा,पहले संपादकीय लिखना सीखो।
वे रोज मुझे पत्रकारिता के पथ पढ़ाते।मेरे कारण आवाज की नीतियां उन्होंने बदल दी।अखबार का तेवर बदल दिया।
मदन जी धनबाद में ही थे।#संजीव कुल्टी में।
#श्रीनारायण_समीर भी आवाज में आ गए।पाठक जी, #बीबी_शर्मा,#अनवर_शमीम, प्रोफेसर प्रभाकर शर्मा के साथ लंबी चौड़ी टीम बन गई।हम झारखंड आंदोलन में थे।
इसी बीच मालिकों में ठन गई ।
सतीश जी ने अलग अखबार निकला।हम गुरुजी के साथ थे।
चार साल हम गुरुजी के साथ थे।लेकिन संपादकीय नीति बदलने लगी तो हम धनबाद छोड़कर रांची #प्रभात_खबर में चले गए। वहां नहीं बनी तो #दैनिक_जागरण मेरठ में।वहां खटपट हुई तो #अमर_उजाला बरेली होकर #जनसत्ता कोलकाता में।
धनबाद से लेकर कोलकाता तक गुरुजी से हमेशा संपर्क बना रहा । महाश्वेता देवी जी से भी।
मुझे पत्रकारिता करने का मौका नैनीताल में ही #दैनिक_पर्वतीय, #नैनीताल_समाचार और #दिनमान में करने का मौका जरूर मिला, #रघुवीर_सहाय जी से पत्रकारिता सीखी, लेकिन दैनिक अखबार के संपादन का काम हमने गुरुजी से सीखा जिन्होंने सतीश जी के साथ 150अगस्त 1947 को आवाज का प्रकाशन शुरू किया था
उन्हें प्रणाम।

इसी इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता के संपादक में हमने पूरे पच्चीस साल जिंदगी के बीता दिए। पच्चीस साल तक हर रात हमने जनसत्ता निकला।
एक्सप्रेस समूह के संपादकीय से अन्यत्र नौकरी के बेहतर और बड़े अवसर अक्सर सभी साथियों को मिलते है। तमाम मतभेद,लड़ाई के बावजूद हमने किसी अवसर के लिए एक्सप्रेस नहीं छोड़ा। क्योंकि न्यूज ब्रेक करने के मामले में इंडियन एक्सप्रेस की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है।
इस मामले में फैसला करने में सुविधा इसलिए हुई कि जब भी कोई ऑफर आया, सविता जी ने वीटो लगा दिया।बोली,एक्सप्रेस छोड़कर कहां जाओगे? हमें न पद चाहिए, न पैसे और न बेहतर जिंदगी।
एक्सप्रेस से बेहतर कोई जगह मेरे लिए उनकी नजर में नहीं थी। जब टकराव बढ़ता गया, अखबार की नीतियां बदलती गई, तब भी हमने दूसरे विकल्प पर नहीं सोचा।
क्या हम गलत थे?
#Dateline_kolkata
Indian Express समूह में न्यूजब्रेक आम है। जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस चैनल में आप देख ही रहे हैं कि चुनाव आयोग में मतभेद की जैसी खबर को ब्रेक करने के लिए किसी बीट में वर्षों की मेहनत और साख कम आती है।
#रितिका_चोपड़ा ने भी बताया कि रातोंरात कोई खबर ब्रेक नहीं होती।खबर के लिए तथ्य और सबूत जुटाने में सालों,महीनों लग जाते हैं।
खबर तैयार हो जाती है तो उसे प्रकाशित करने से पहले तथ्यों, प्रमाणों,तर्कों और भाषा की जांच पड़ताल संपादकीय में होती है।
इंडियन एक्सप्रेस समूह में बिना इस जांच पड़ताल की कोई खबर नहीं छपती। एफआईआर और चार्जशीट की कॉपी तक परखी जाती है।
अखबारों में,पत्रकारिता में साख,प्रामाणिकता और प्रतिबद्धता के साथ बहुत मेहनत की जरूरत होती है। संपादकीय साथी विशेषज्ञ न हो सही, भाषाओं के साथ साथ विविध विषयों,विधाओं और माध्यमों का ज्ञान उनके लिए हमारे जमाने में अनिवार्य था। भरती से पहले कई स्तरों पर कड़ी परीक्षा होती थी।
कंप्यूटर जब हम मेरठ #जागरण में थे अस्सी के दशक में,तभी आ गया था। लेकिन तब कंप्यूटर विभाग अलग था। #अमर_उजाला और #प्रभात_खबर में भी।
#दैनिक_आवाज में कंप्यूटर का कोई काम नहीं था।
#जनसत्ता में 1991 में ही कंप्यूटर हमारे हवाले कर दिए गए। बाद में कंपोजिंग,संपादन,पेज मेकिंग, लय आउट डिजाइन से लेकर विज्ञापन लगाना भी संपादकीय काम में शामिल हो गया। मेरे बगल में रखा बड़ा प्रिंटर पेज प्रूफ निकालने के लिए था। अब तो पेज सीधे छपने के लिए मशीन को भेजने की तकनीक आ गई है।
अखबारों में #ऑटोमेशन की पूरी प्रक्रिया से हम अपने कार्यकाल में गुजरे।
कोलकाता जनसत्ता के लिए देशभर में शुरुआत में करीब तीन सौ संवाददाता थे और सारे के सारे पेड थे स्टाफ रिपोर्टरों के अलावा। स्टाफ रिपोर्टरों का काम Amit Prakash Singh जी देखते थे।उन्हें असाइन भी वे करते थे।बाकी रिपोर्टरों का कामकाज मेरे जिम्मे था। कंप्यूटर में ही उनका लेखा जोखा रखना होता था।
इसके अलावा रोज प्रकाशित अखबार की समीक्षा के लिए # #इंपैक्ट_रिपोर्ट बनती थी।कोलकाता से सभी भाषाओं के अखबारों की तुलना में हम कितने आगे रहे,कितने पीछे और क्या कमी रही,आगे की रणनीति क्या हो,इसकी विस्तृत समीक्षा। यह इम्पैक्ट रिपोर्ट मैं बनाता था। इसके लिए सुबह उठकर मुझे सारे अखबार बारीकी से पढ़ने होते थे।
समाचारों के साथ लगातार #इन्वॉल्वमेंट की मेरी आदत हो गई। 1980 से ही,धनबाद में दैनिक आवाज से। इस आदत से छुटकारा नहीं मिला तो बाकी चीजें छूटती चली गईं।
दैनिक जागरण में #बीके_शर्मा जी और मैं #रिक्रूटर भी थे। नए पत्रकारों की खोज, उनकी परख और उनके प्रशिक्षण की जिम्मेदारी हमारी थी। यह अनुभव जनसत्ता में भी काम आया।
यह प्रक्रिया बेहद जटिल है।
कोई पत्रकार यूं ही नहीं बन जाता। पत्रकारों की भी ग्रूमिंग होती है। जनसत्ता में यह ग्रूमिंग प्रभाष जोशी जी करते थे।
#जनसत्ता,कोलकाता से पहले 1991में #बरेली
#सूरजमल_हाईस्कूल, भूड़, बरेली
#सविता जी तब भी #अध्यापिका थीं।
#बाबरी_मस्जिद में कार सेवा के बाद आतंकवादी हिंसा में नफरत की सियासत का जलवा शुरू हो गया था।
उन दिनों,जब #उत्तर_भारत के #किसी_शहर का मतलब #आग_धुआं और #नरसंहार था।
#अंडे_सेंते_लोग लोग में देश के उस जलते दौर की कहानियां हैं और हैं तमाम मासूम बच्चे।
#जहर का असर तब शुरू ही हुआ था।बच्चे तब भी खिलखिला रहे थे।
अब #हवा_पानी_वक्त सबकुछ जहरीला।
अंडे सेंते लोग अब सत्ता में हैं।