इसी इंडियन एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता के संपादक में हमने पूरे पच्चीस साल जिंदगी के बीता दिए। पच्चीस साल तक हर रात हमने जनसत्ता निकला।
एक्सप्रेस समूह के संपादकीय से अन्यत्र नौकरी के बेहतर और बड़े अवसर अक्सर सभी साथियों को मिलते है। तमाम मतभेद,लड़ाई के बावजूद हमने किसी अवसर के लिए एक्सप्रेस नहीं छोड़ा। क्योंकि न्यूज ब्रेक करने के मामले में इंडियन एक्सप्रेस की प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है।
इस मामले में फैसला करने में सुविधा इसलिए हुई कि जब भी कोई ऑफर आया, सविता जी ने वीटो लगा दिया।बोली,एक्सप्रेस छोड़कर कहां जाओगे? हमें न पद चाहिए, न पैसे और न बेहतर जिंदगी।
एक्सप्रेस से बेहतर कोई जगह मेरे लिए उनकी नजर में नहीं थी। जब टकराव बढ़ता गया, अखबार की नीतियां बदलती गई, तब भी हमने दूसरे विकल्प पर नहीं सोचा।
क्या हम गलत थे?
#Dateline_kolkata
Indian Express समूह में न्यूजब्रेक आम है। जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस चैनल में आप देख ही रहे हैं कि चुनाव आयोग में मतभेद की जैसी खबर को ब्रेक करने के लिए किसी बीट में वर्षों की मेहनत और साख कम आती है।
#रितिका_चोपड़ा ने भी बताया कि रातोंरात कोई खबर ब्रेक नहीं होती।खबर के लिए तथ्य और सबूत जुटाने में सालों,महीनों लग जाते हैं।
खबर तैयार हो जाती है तो उसे प्रकाशित करने से पहले तथ्यों, प्रमाणों,तर्कों और भाषा की जांच पड़ताल संपादकीय में होती है।
इंडियन एक्सप्रेस समूह में बिना इस जांच पड़ताल की कोई खबर नहीं छपती। एफआईआर और चार्जशीट की कॉपी तक परखी जाती है।
अखबारों में,पत्रकारिता में साख,प्रामाणिकता और प्रतिबद्धता के साथ बहुत मेहनत की जरूरत होती है। संपादकीय साथी विशेषज्ञ न हो सही, भाषाओं के साथ साथ विविध विषयों,विधाओं और माध्यमों का ज्ञान उनके लिए हमारे जमाने में अनिवार्य था। भरती से पहले कई स्तरों पर कड़ी परीक्षा होती थी।
कंप्यूटर जब हम मेरठ #जागरण में थे अस्सी के दशक में,तभी आ गया था। लेकिन तब कंप्यूटर विभाग अलग था। #अमर_उजाला और #प्रभात_खबर में भी।
#दैनिक_आवाज में कंप्यूटर का कोई काम नहीं था।
#जनसत्ता में 1991 में ही कंप्यूटर हमारे हवाले कर दिए गए। बाद में कंपोजिंग,संपादन,पेज मेकिंग, लय आउट डिजाइन से लेकर विज्ञापन लगाना भी संपादकीय काम में शामिल हो गया। मेरे बगल में रखा बड़ा प्रिंटर पेज प्रूफ निकालने के लिए था। अब तो पेज सीधे छपने के लिए मशीन को भेजने की तकनीक आ गई है।
अखबारों में #ऑटोमेशन की पूरी प्रक्रिया से हम अपने कार्यकाल में गुजरे।
कोलकाता जनसत्ता के लिए देशभर में शुरुआत में करीब तीन सौ संवाददाता थे और सारे के सारे पेड थे स्टाफ रिपोर्टरों के अलावा। स्टाफ रिपोर्टरों का काम Amit Prakash Singh जी देखते थे।उन्हें असाइन भी वे करते थे।बाकी रिपोर्टरों का कामकाज मेरे जिम्मे था। कंप्यूटर में ही उनका लेखा जोखा रखना होता था।
इसके अलावा रोज प्रकाशित अखबार की समीक्षा के लिए # #इंपैक्ट_रिपोर्ट बनती थी।कोलकाता से सभी भाषाओं के अखबारों की तुलना में हम कितने आगे रहे,कितने पीछे और क्या कमी रही,आगे की रणनीति क्या हो,इसकी विस्तृत समीक्षा। यह इम्पैक्ट रिपोर्ट मैं बनाता था। इसके लिए सुबह उठकर मुझे सारे अखबार बारीकी से पढ़ने होते थे।
समाचारों के साथ लगातार #इन्वॉल्वमेंट की मेरी आदत हो गई। 1980 से ही,धनबाद में दैनिक आवाज से। इस आदत से छुटकारा नहीं मिला तो बाकी चीजें छूटती चली गईं।
दैनिक जागरण में #बीके_शर्मा जी और मैं #रिक्रूटर भी थे। नए पत्रकारों की खोज, उनकी परख और उनके प्रशिक्षण की जिम्मेदारी हमारी थी। यह अनुभव जनसत्ता में भी काम आया।
यह प्रक्रिया बेहद जटिल है।
कोई पत्रकार यूं ही नहीं बन जाता। पत्रकारों की भी ग्रूमिंग होती है। जनसत्ता में यह ग्रूमिंग प्रभाष जोशी जी करते थे।
#जनसत्ता,कोलकाता से पहले 1991में #बरेली
#सूरजमल_हाईस्कूल, भूड़, बरेली
#सविता जी तब भी #अध्यापिका थीं।
#बाबरी_मस्जिद में कार सेवा के बाद आतंकवादी हिंसा में नफरत की सियासत का जलवा शुरू हो गया था।
उन दिनों,जब #उत्तर_भारत के #किसी_शहर का मतलब #आग_धुआं और #नरसंहार था।
#अंडे_सेंते_लोग लोग में देश के उस जलते दौर की कहानियां हैं और हैं तमाम मासूम बच्चे।
#जहर का असर तब शुरू ही हुआ था।बच्चे तब भी खिलखिला रहे थे।
अब #हवा_पानी_वक्त सबकुछ जहरीला।
अंडे सेंते लोग अब सत्ता में हैं।
असली अंडे सेंते लोग
#डेटलाइन_कोलकाता
हमने जनसत्ता के लिए आवेदन नहीं किया था।
अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग वर्ष 1991 में नहीं, बल्कि 30 अक्टूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 को हुई थी। उस वक्त मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव। कर्फ्यू और दंगों का दौर शुरू हो गया।इससे पहले आरक्षण विरोधी आंदोलन चल रहा था।
विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) ने भारत के प्रधानमंत्री के पद से 7 नवंबर 1990 को इस्तीफा दिया था। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव हारने के बाद उन्होंने यह इस्तीफा दिया था।इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में राम रथ यात्रा के दौरान गिरफ्तार किया गया था। इस गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने समर्थन वापस लिया और वीपी की सरकार गिर गई।
वीपी सरकार के गिरने के बाद घृणा और हिंसा की राजनीति को बढ़ाने में अखबारों की अहम भूमिका थी।
तब टीवी चैनल के एंकर नहीं थे।
हम कार सेवा और दंगों की खबरों को बेहद संयमित ढंग से छाप रहे थे।पूरा संपादकीय की रणनीति थी कि हम उन्माद को बढ़ावा नहीं देंगे। मृतकों की संख्या कुछ भी छप रही थी अखबारों में।दंगा,कर्फ्यू, फायरिंग का माहौल था।
उन्माद फैला रहे अखबारों का सर्कुलेशन बहुत ज्यादा हो गया और अपना लगातार गिरता जा रहा था।
वीरेन डंगवाल, सुनील साह, इंदुभूषण रस्तोगी, इंद्रकांत मिश्र, देशपाल पवार और उदित साहू जी के साथ हम सभी दृढ़ संकल्प थे कि इस आग में हम घी नहीं डालेंगे।
इसी बीच एक दिन मालिक जी आगरा से आ गए। दो युवा मालिक संपादकीय के साथ थे,लेकिन बड़े मालिक सर्कुलेशन गिरने से बौखलाए हुए थे। सीधे प्रेस में दनदनाते हुए घुस गए।
मैं पहला पेज बना चुका था। प्रूफ देख रहा था।
मालिक जी ने पेज मुझसे छीनकर सबके सामने फाड़ दिया। बोले, इन लोगों ने सत्यानाश कर दिया। लगाओ दंगों की खबरों पर ऊपर बैनर, बीच में बैनर और बॉटम में भी बैनर।
मैंने उनके मुंह पर कह दिया, मैं नहीं करता नौकरी। कहकर मुख्य गेट से बाहर निकल गया।तो स्थानीय मालिक ने दौड़कर मुझे पकड़ लिया।बोले, उनको आप जानते हैं। गुस्से में हैं।आप अंदर चलिए। अंदर मैं चला गया लेकिन कह दिया, अब यहां मैं काम नहीं करूंगा।
दफ्तर से घर लौटकर मैंने प्रभाष जोशी जी को एक निजी पत्र लिखा कि वे मुझे कोलकाता जनसत्ता की टीम में शामिल कर लें। उन्होंने शामिल कर लिया। हमारे सारे साथी अखबार छोड़ने के खिलाफ थे।
वीरेन दा ने कहा, जाओ। जरूर जाओ। लौटने में कितना वक्त लगता है? हालांकि मेरा लौटना नहीं हुआ।
कोलकाता में मैं सबसे पहले वहां के सबसे बड़े बांग्ला अखबार समूह में गया,जहां बांग्ला साहित्य के तमाम दिग्गज संपादकीय में थे। फिर उनसे मुलाकाते होती रही।
इसी अखबार ने ममता बनर्जी को शुरू से प्रोजेक्ट किया,उनकी छवि बनाई, उन्हें विपक्ष के नेता और आंदोलनकारी बतौर प्रतिष्ठित किया और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
चुनाव हारने से पहले तक यह समूह दीदी के साथ था।क्योंकि यह समूह कम्युनिस्टों के सख्त खिलाफ है और मुक्त बाजार के कॉरपोरेट राज का प्रवक्ता भी।
ममता के चुनाव हारते ही इस अखबार में कमल की खेती शुरू हो गई। सत्ता विरोध उनकी ब्रांडिंग थी और मार्केटिंग भी।
अब सत्ता के विरुद्ध कोई खबर नहीं होती। आंदोलन की भी कोई खबर नहीं। जो कुछ छपता है,सत्ता के पक्ष में,आंदोलन के खिलाफ, जनता के खिलाफ।
एकमात्र संस्करण की प्रसार संख्या के हिसाब से देश का शायद यह सबसे बड़ा अखबार है।वर्गीकृत विज्ञापन में रोजाना इनकी करोड़ों की कमाई है। बांग्ला साहित्य और प्रकाशन जगत पर इनका शुरू से अबतक एकाधिकार वर्चस्व है।
अखबार वाले भी अंडे सेंते लोग हैं।
देश में जमीनी पत्रकारों के साथ क्या होता है,इसका अंदाजा क्या देश को है? खासकर दूर दराज के इलाकों में,पूर्वोत्तर में और आदिवासी भूगोल में?
दिल्ली में एक मुख्य चुनाव आयुक्त को बचाने के लिए सीमा पर देश की सुरक्षा में तैनात जवानों को देश के छात्रों युवाओं को कुचलने के लिए बुला लिया गया।दिल्ली आने जाने वाली ट्रेनें रोक दी गई। त्योहारों का मौसम शुरू हो गया।नवरात्रि शुरू हो गई और दिल्ली को लॉकडाउन कर दिया।दिल्ली की सीमाएं सील कर दी।सड़कों पर चार पांच लेयर के बैरिकेड के अलावा किलेबंदी भी कर दी गई।कचरा डाला गया सड़कों पर।
मालगाड़ियों से युवाओं का हुजूम आ गया।सारी किलेबंदी धरी रह गई।इंटरनेट बंद कर दिया गया कि किसीको खबरें मालूम न हो।मेट्रो के सारे स्टेशन बंद कर दिए गए। यातायात बंद।लेकिन गुंडों और अपराधियों को लड़कियों पर हमले करने की छूट दे दी गई।सात हजार प्रदर्शनकारी गिरफ्तार हुए लेकिन सादी वर्दी में, नेम प्लेट के बिना वर्दी में जुल्म का इंतहा कर रहे अपराधियों,गुंडों में कोई गिरफ्तार नहीं हुआ।
प्रदर्शनकारी छात्राओं,युवतियों और महिलाओं के साथ जो हुआ सो हुआ,महिला पत्रकारों के साथ जो सलूक हुआ,वह किसी सभ्य देश में नहीं होता। तमाम पत्रकारों को घर में डिटेन कर लिया गया।फिर भी मौके पर पहुंचे पत्रकारों को कवरेज से रोका गया,डिटेन कर लिया गया,बदसलूकी की गई और तो और प्रेस क्लब की पुलिस ने नाकाबंदी कर दी।
अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz की हमारी टीम को कदम कदम पर रोका गया।चैनल के संपादक Rupesh Kumar से बदसलूकी की गई।रूपेश ने मुंहतोड़ जवाब दिया।
भारत की राजधानी में प्रेस की आजादी कुचल दी गई। पत्रों और खास तौर पर महिला पत्रकारों से बहुत बुरा सलूक हुआ।महिला पत्रकारों पर यौन हमले हुए।
फिर भी प्रेस खामोश है।
तमाम अखबारों को देख लीजिए,खबर कहां हैं?
चैनलों में खबर कहां है?
यही पेशेवर पत्रकारिता है?
एडिटर गिल्ड और प्रेस क्लबों को छोड़िए,पत्रकार यूनियनें कहां हैं? यूनियनें क्या मौज मस्ती, सौर सपाटे और सरकारी सुविधाओं के लिए हैं?
हमने इंडियन एक्सप्रेस समूह के संपादकीय में 25 साल हर रात अखबार निकाले।कुल 36 साल बड़े बड़े अखबार निकाले।
हमारे लिए आज का दिन काला दिन है।
आपके लिए?
आपातकाल के दौरान हम नैनीताल में पढ़ रहे थे। तब देशभर में पत्रकारों का प्रतिरोध देखा था। प्रेस सेंसरशिप था। लेकिन अखबारों का संपादकीय की जगह काला देखा। सारे प्रेस को प्रतिरोध में एकजुट देखा।
हम दैनिक आवाज धनबाद में थे और बिहार के मुख्यमंत्री थे डॉ जगन्नाथ मिश्र। उन्होंने प्रेस की आजादी छीनने के लिए प्रेस एक्ट बनाया बिहार में ।प्रतिरोध में पूरे देश के अखबारों ने नेताओं,मंत्रियों के बयान और सरकारी खबरों का बहिष्कार किया,आंदोलन किए और एक्ट रद्द हो गया।
अब क्या हो रहा है?
कभी कभी इच्छा होती है की कुछ सृजनात्मक लिखूं। लेकिन हिम्मत नहीं होती। 1973 से 2003 तक लगभग हर विधा में लिखा। तीस साल का सृजनात्मक लेखन कम नहीं हैं। सैकड़ों कविताएं प्रकाशित हुईं। इनमें काम से काम सौ लम्बी कविताएं हैं।लेकिन मेरा कोई कविता संग्रह नहीं है। कहानियां 50 से ज्यादा छपी। दो कहानी संग्रह भी आए।
मेरे लिखे की हिंदी में कोई चर्चा कभी नहीं हुई। नए संग्रह का इसलिए भी कोई औचित्य नहीं है।वैसे मैंने जो भी लिखा, कहीं सहेजा नहीं। न अब सहेजने की कोई जरूरत है।
2003 से में विशुद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हूं। प्रेरणा अंशु से जुड़ने के बाद 2018 से साहित्य और साहित्यकारों से नए सिरे से संबंध बन रहे हैं। लेकिन सृजनात्मक लेखन करीब दो दशक बाद नए सिरे से शुरू करने की कोई वजह नजर नहीं आती।
2003 से लगातार हिंदी,बांग्ला और अंग्रेजी में जरूरी मुद्दों पर हस्तक्षेप करने की दिनचर्या बन गई थी। कोलकाता छोड़ने के बाद अंग्रेजी और बांग्ला में लेखन छूट गया है। अब विशुद्ध हिंदी का लेखक हूं।
2023 में मेरे निरंतर हिंदी में लिखने के 50 साल पूरे हो जाएंगे। इतनी लंबी अवधि से किसी भाषा में निरंतर लेखन के बावजूद मुझे लेखकों में गिना नहीं जाता। लिखने के लिए कभी व्यवस्थित होने की नहीं सोची। जब तक नौकरी थी, दाल रोटी चल जाती थी।
अब सोचता हूं कि छीजती हुई बचत को देखते हुए दो चार साल और जिंदा रह गए तो रीढ़ की हड्डी सही सलामत रहेगी या नहीं।
पिछले दिनों मामूली सर्दी के इलाज में इतना खर्च हो गया कि अब डर भी लगता है कि सामाजिक असुरक्षा के इस घनघोर संकट में गंभीर रूप में बीमार पड़ गए तो क्या होगा।
फिर संपादन का का काम पूर्णकालिक है। इसमें सृजनात्मक लेखन की गुंजाइश नहीं बचती। इधर उधर लिखने के अवसर भी काम हैं।
विडंबना यही है कि पूरे 50 साल के निरंतर लेखन के बावजूद मैं हिंदी का लेखक नहीं हूं।
यही नियति और कर्मफल के सिद्धांत का सामाजिक सच है।इसलिए हाशिए के हर हस्ताक्षर को सामने लाना अब मेरा एक मात्र काम और उत्तरदायित्व है। जिस अस्पृश्यता और बहिष्कार के दंश मैने पूरे पांच दशक तक झेले,उनसे मुक्त होकर कुछ नए लोग लिखें तो अपनी जिंदगी सार्थक मानूंगा।
पलाश विश्वास
09.12.2022
इसे कहते हैं ज़िंदा दफनाना
पलाश विश्वास
आज फिर कोलकाता से गुरुजी जयनारायण का फोन आया। कोलकाता जनसत्ता में सिर्फ मार्केटिंग विभाग है। दो इंजीनियर हैं। बिल्डिंग है,सम्पादकीय नहीं है।प्रेस लखनऊ चला गया।दिल्ली से पीडीएफ आता है।
कोलकाता महानगर ने हिंदी,बांग्ला,ओड़िया, उर्दू, गुरमुखी और उर्दू,किसी भी भाषा के अखबार में किसी की स्थायी नौकरी नहीं है।सभी पत्रकार संविदा पर है।
योग्य,प्रशिक्षित और पढ़े लिखे पत्रकारों में कोलकाता में दिहाड़ी मजदूरी तो क्या बीस रुपये का भी काम नहीं है।
जिंदगीभर किसी और पेशा या नौकरी की कोशिश न करके 5 दशक पत्रकारिता को मिशन मानकर सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ हारने के बावजूद अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा।
जनसत्ता में या किसी भी अखबार में डेस्क पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर से बुरी हालत में होते हैं। सम्पादक ऐसे लोग बनाये जाते हैंजिन्होने एक दिन भी अखबार नहीं निकला। उपसम्पादक के लिए आईएएस जैसी परीक्षा,लेकिन तमाम बड़े पदों के लिए बिना परीक्षा,बिना अनुभव वर्चस्ववादी तबके के खास जाति के लोग सीधे सम्पादक बना दिये जाते हैं। यही जीवन के हर क्षेत्र का किस्सा है।
मीडिया में बचे हुए साथियों की इस दुर्गति और आदरणीय प्रभाष जोशी के अखबार जनसत्ता की इस दशा पर बहुत दुखी हूं।
ओम थानवी ने हमारी कभी सुनी नहीं। लेकिन उनके जमाने में भी यह हाल नहीं हुआ।
जाति, वर्ण और नस्ल देखकर सम्पादक चुनने की परंपरा ने जनसत्ता जैसी संस्था, नई दुनिया जैसे अखबार और पूरी हिंदी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया।
कोलकाता में जिस तरीके से मुझे मेरी औकात में रखने की तिकड़में भिड़ाई गई और हार न मानते हुए प्रभाष जी से और बाकी सम्पादकों और मैनेजरों से लड़ते भिड़ते हुए हम जनपक्षधर पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे, उसकी कथा कम रोमांचक और कम दुःखद नहीं है। हमने कभी किसीको बख्शा भी नहीं है।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली हो या हंस का पन्ना या कोलकाता,हम पिछले बीस साल से हिंदी समाज से अपनी गौरवशाली विरासत सहेजने की अपील करते रहे हैं। बांग्ला समाज से तो हम बहिस्कृत थे ही। वहां का कूलित वर्चस्व तो निरंकुश है ही।
बदलाव की उम्मीद तो फिर भी गाय पट्टी से ही थी क्योंकि यहां सामाजिक ताकतें और लोक अभी ज़िंदा है।बस,यही पूंजी है,जिसके भरोसे न सिर्फ ज़िंदा हूँ, हाशिये पर होबे के बावजूद सक्रिया हूँ।
पत्रकारिता के मिशन और साहित्य का क्या हुआ,कहने की जरूरत नहीं है,लेकिन हमारा मिशन जारी है।
मुख्यधारा की पत्रकारिता में जो पेशेवर लोकतंत्र रहा है, उसका असल चेहरा यही है। इसमें काम करना पहले कठिन था,अब असम्भव। इसीलिए हम लोग सत्तर के दशक से वैकल्पिक मीडिया बनाने का प्रयास करते रहे हैं।
जनसत्ता में देशभर के जनपक्षधर जुझारू पत्रकारों को बुलाकर उन्हें अच्छे वेतन देकर फ्रिज में डालने की रीति रही है। व न किसी दूसरे अख़बर्बमें लिख सकते थे अपने अखबार में। समझौता दूसरे अखबारों में न लिखने का होता था और अपने अखबार में सिर्फ रिपोर्टर और प्रधान संपादक लिख सकते थे।डेस्क के लोगों से कहा जाता था कि सम्पादक लिख नहीं सकता।डेस्क से रिपोर्टर बनते नहीं। उनकी दक्षता से अखबार चलता,लेकिन उन्हें हर हाल में लिखने का कोई मौका भी नहीं दिया जाता।पहले से बनी उनकी पहचान और हैसियत खत्म कर दी जाती। हम वैकल्पिक मीडिया और ब्लॉगिंग से अब तक जिंदा हैं और हमारी जनपक्षधरता बची हुई है।लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। वेटनबन्द होते ही सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के अंधकार के सिवाय कुछ नहीं बचता।
आपके शहर और सूबे में पत्रकारों और पत्रकारिता के क्या हाल हैं?सबकुछ ठीक ठाक? अच्छे दिनों की तरह?