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Friday, April 12, 2013

मार्क्सवादियों द्वारा हिंदू साम्राज्यवाद की अनदेखी

गैर-मार्क्सवादियों से संवाद-9 
मार्क्सवादियों द्वारा हिंदू साम्राज्यवाद की अनदेखी 
एच एल दुसाध
Dusadh Hari Lal
भारत के मार्क्सवादियों द्वारा साम्राज्यवादविरोधी अत्यंत असफल लड़ाई लड़े जाने के बावजूद उन्हें अपनी इस लड़ाई पर गर्व का अंत नहीं है.इस बात का खुलासा करते हुए देश के सर्वाधिक ईमानदार चिंतकों में से एक,प्रोफ़ेसर वीरभारत तलवार ने कहा है-'हिंदी की वामपंथी दुनिया में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष परंपरा की बात अक्सर जोर शोर से की जाती है.रामविलास शर्मा इसमें अगुवा रहे हैं.उनका कीर्तन करनेवाली मंडली को तो यही एकमात्र भजन आता है जिसे वे हर वक्त गाते रहते हैं-मौका चाहे जो भी हो.असल में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की परंपरा उनके हाथ में एक लाठी की तरह आ गई है जिससे वे मतभेद या विरोधी विचार रखनेवाले किसी भी व्यक्ति की पिटाई करते सकते हैं.किन्तु साम्राज्यवाद विरोधी मन्त्र का दिन रात जाप करनेवाले क्या उसका अर्थ भी जानते हैं?अक्सर जोर-शोर से मन्त्र का जाप करनेवाले उसका अर्थ भी नहीं जानते,बल्कि उसका उच्चारण भी ठीक से नहीं कर पाते.रामविलास शर्मा ने भारत और हिंदी पट्टी में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की जो परंपरा बनाई है,उस परम्परा में दलित कहा हैं?'तलवार साहब ने भारतीय मार्क्सवादियों के साम्राज्यवाद विरोध पर टिपण्णी करते हुए बहुत ही सटीक सवाल उठाया है कि इसमें दलित कहाँ हैं?अपने हर विरोधी को साम्राज्यवाद विरोध की लाठी से पिटाई करनेवाले मार्क्सवादियों को यह पता है कि दलित आन्दोलनों में साम्राज्यवाद विरोध कभी प्रमुख मुद्दा नहीं रहा ,इसलिए वे आम दलित बुद्धिजीवियों से लेकर उनके प्रेरणा स्रोत महामना फुले,डॉ.आंबेडकर,कांशीराम इत्यादि तक को भी गाहे बगाए उस लाठी से पिटाई करते रहते हैं.
बहरहाल वामपंथियों को अपने साम्राज्यवाद विरोध पर जितना भी फक्र हो, किन्तु दलितों में इसे लेकर कभी ग्लानिबोध नहीं रहा .क्योंकि उनके लिए हिंदू-साम्राज्यवाद से मुक्ति बराबर ही शीर्ष पर रही है.लेकिन तलवार साहब को भ्रांत प्रमाणित करते हुए भले ही कुछ वामपंथी साम्राज्यवाद का सही उच्चारण सीख लिए हो,पर इसमे कोई शक नहीं कि एमएन राय उर्फ नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य-डांगे- नम्बूदरीपाद से लेकर आज की तारीख में नरम-गरम कई खेमों में बंटे उनके असंख्य अनुयायियों में से किसी ने भी कभी हिन्दू साम्राज्यवाद की बात जुबां पर नहीं लाया.नहीं लाया इसीलिए इससे सर्वस्व-हारोंओं को कभी मुक्त करने का अभियान भी नहीं चलाया.लेकिन वे इससे जितना भी आंखे मूंदे रहे,हिन्दू साम्राज्यवाद एक सचाई है.
हिंदू साम्राज्यवाद से आँखे मूंदे रहनेवाले वामपंथियों के विपरीत जिन मूलनिवासियों को इसकी अनुभति रही उन्होंने उसकी भयावहता की पहचान कर उसके खात्मे का अभियान चलाया.इस कारण ही केरल के संत नारायण गुरु के योग्य शिष्य स्वामी धर्मतीर्थ(1893-1978) ने 'द मेनेस ऑफ हिन्दू इम्पीरियलिज्म' जैसा कालजयी इतिहास विषयक ग्रन्थ लिखा जो बाद में 'हिस्ट्री ऑफ हिन्दू इम्पीरियलिज्म 'नाम से पकाशित हुआ.उस ग्रन्थ पर टिपण्णी करते हुए समाजवादी चिन्तक मस्तराम कपूर ने 'हिंदुत्व की राजनीति'के पृष्ठ 152 पर पर लिखा है-'मार्क्सवादी भाजपा को केवल साम्प्रदायिक शक्ति मानते हैं.यह आकलन अधूरा है.साम्प्रदायिक शक्ति के अलावा वह ब्राह्मणवादी पार्टी भी है और ब्राह्मणवाद कम भयानक नहीं है.यह आतंरिक साम्राज्यवाद है,जो अपने ही देशवासियों का भयानक शोषण करता है और देश के भीतर उपनिवेश स्थापित करता है.इस आतंरिक साम्राज्यवाद की कल्पना मार्क्स,एंगेल्स,लेनिन ने नहीं की ,इससे इसका अस्तित्व असिद्ध नहीं हो जाता,जैसा कि कुछ मार्क्सवादी तर्क देते हैं.यह भारतीय समाज की ज्वलंत सचाई है.'
अनुभूतिजन्य कारणों से ही मार्क्सवादी से आंबेडकरवादी बने दलित इतिहासकार एस.के.विश्वास विश्व के प्रचीनतम उपनिवेशवाद और उसकी जीवनी शक्ति की पहचान कर सके .उन्होंने लिखा है-वैदिक आर्यों ने सिंधु –हडप्पा का द्वार तोड़कर क्षेत्र अधिकार के संग-संग ,समय परिवर्तन और जनजातियों के प्रतिरोध के सामने अपनी सभ्यता व धर्म विश्वास,भाषा व साहित्यादि में प्रचुर समझौते किये.अनार्यों से बहुत कुछ लिए हैं,दिए हैं,भूले हैं और ग्रहण किये हैं.किन्तु जाति-भेद के साथ कभी समझौते नहीं किये.आर्यों ने इसी पद्धति की आड़ में अपने प्राचीन उपनिवेश की रक्षा किया अर्थात स्वयं को पृथक और उर्द्धोस्थित रखा है(आदि भारत मुक्ति:बहुजन समाज ,हिन्दू साम्राज्यवाद के खिलाफ मूल निवासियों के संघर्ष की दास्तान,पृ.59) 
ऐसा नहीं कि सिर्फ दलित इतिहासकारों ने ही हिन्दू साम्राज्यवाद के वजूद का एहसास कराया है,स्वयं आर्यपुत्र पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जाति/वर्ण –व्यवस्था में आर्य उपनिवेशवाद की क्रियाशीलता को स्वीकार किया है.उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तन के पृष्ठ में क्रियाशील कारणों की खोज में निकल कर लिखा है-'एक ऐसे ज़माने में जब तलवार के बल पर फतेह करनेवालों का यह कायदा रहा कि हारे हुए लोगों को या तो गुलाम बना लेते थे,या बिलकुल मिटा देते थे ,वर्ण-व्यवस्था ने एक शांतिवाला हल पेश किया और धंधे के बंटवारे की जरुरत से इसमें विषय बने ,जिनमें किसान ,कारीगर और व्यापारी लोग थे ;क्षत्रिय हुए जो हुकुमत करते य युद्ध करते थे;ब्राह्मण बने जो पुरोहिती करते थे,विचारक थे ,जिनके हाथ में नीति की बागडोर थी और जिनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे जाति के आदर्शों की रक्षा करेंगे .इन तीनों वर्णों से नीचे शूद्र थे ,जो मजदूरी करते और ऐसे धंधे करते थे ,जिनमे खास जानकारी की जरूरत नहीं होती और जो किसानों से अलग थे.कदीम वाशिंदों से भी बहुत से इन समाजों में मिला लिए गए और उन्हें शूद्रों के साथ इस समाज व्यवस्था में सबसे नीचे का दर्ज़ा दिया गया.(कंवल भारती द्वारा सम्पादित, दलित जन उभार,पृ-138 पर प्रकाशित नेहरु का आलेख,समन्वय और समझौता:वर्ण व्यवस्था का आरम्भ).
अब सवाल पैदा होता है कि आर्यों द्वारा प्रवर्तित वर्ण/जाति-व्यवस्था में हिंदू साम्राज्यवाद कैसे अटूट व क्रियाशील रहा?तो उसका जवाब यह है कि सारी दुनिया में ही विजयी कौमों(साम्राज्यवादियों)का हमेशा ही प्रमुख लक्ष्य विजित देश की सम्पदा-संसाधनों पर कब्ज़ा जमाना तथा मूलनिवासियों के श्रम का स्व-हित में इस्तेमाल करना रहा है.इसके लिए वे अपनी सुविधानुसार कानून बनाते रहे हैं. सम्पदा-संसाधनों पर चिरकाल के लिए ही अपनी भावी पीढ़ी का कब्ज़ा सुनिश्चित तथा मूलनिवासियों को निःशुल्क दास में परणित करने के उद्देश्य से ही आर्यों ने वर्ण-व्यवस्था का प्रवर्तन किया.उन्होंने कर्म-संकरता के सुपरिकल्पित निषेध के जरिये इसमें ऐसा प्रावधान किया जिससे चिरकाल के लिए शक्ति के सारे स्रोत(आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक) ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्यों के लिए आरक्षित होकर रह गए,शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की इस व्यवस्था को ढेरों लोग ब्राह्मणवादी व्यवस्था कहते हैं जबकि यह लेखक हिंदू-आरक्षण कहता है.इसी हिंदू-आरक्षण के खिलाफ सदियों से बहुजन नायकों ने अपने-अपने तरीके से संग्राम चलाया जिसमें अंततः बाबासाहेब आंबेडकर कामयाब हुए और आधुनिक आरक्षण के जरिये मूलनिवासियों के लिए शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी अर्जन का द्वारोन्मोचन कर दिए.किन्तु आंबेडकरी आरक्षण के बावजूद शक्ति के स्रोतों पर आज चिर-सुविधाभोगी वर्ग का 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा कायम है तो इसलिए कि इसमें मूलनिवासियों(शुद्रातिशूद्रों और इनसे धर्मान्तरित) का न्यूनतम शेयर ही सुनिश्चित हुआ है.अगर उन्हें शक्ति के प्रमुख स्रोतों-आर्थिक(सेना और न्यायपालिका सहित सभी प्रकार की नौकरियों,भूमि,सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग,परिवहन,फिल्म-मीडिया इत्यादि);राजनीति(पंचायत,शहरी निकाय,संसद-विधानसभा ,राजसभा-विधान परिषद की सीटों व मंत्रीमंडलों)और धार्मिक(मंदिर-मठों की सम्पदा सहित पौरोहित्य)-में संख्यानुपात में हिस्सेदारी मिली होती,जोकि उनका लोकतांत्रिक अधिकार था,हिन्दू-साम्राज्वाद भारतभूमि से विलुप्त हो गया होता.लेकिन ऐसा नहीं हुआ इसलिए जहां अतीत में आंबेडकर के निशाने पर ब्रितानी साम्राज्यवाद शीर्ष पर नहीं रहा उसी तरह आज के आंबेडकरवादियों के एजेंडे में अमेरिकी नहीं,हिन्दू साम्राज्यवाद ही शीर्ष पर है.
दिनांक:12 अप्रैल,2013 - (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)
मित्रों मेरा उपरोक्त लेख आज,13 अप्रैल,2013 के देशबंधु में छपा है.इस लेख से जुडी निम्न शंकाएं आपके समक्ष समाधान हेतु रख रहा हूँ-
1-क्या आप प्रोफेसर वीरभारत तलवार की इस बात से सहमत हैं कि मार्क्सवादी जब भी मौका पाते हैं,अपने विरोधियों की साम्राज्यवाद विरोधी लाठी से पिटाई कर देते हैं? 
2-दिवंगत समाजवादी चिन्तक मस्तराम कपूर ने जिसे आतंरिक साम्राज्यवाद कहा है,दरअसल वह हिंदू - साम्राज्यवाद है.क्या आप उनकी इस बात से सहमत हैं कि अगर मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन इत्यादि ने आतंरिक साम्राज्यवाद अर्थात हिंदू-साम्राज्यवाद की बात नहीं कही है तो इससे इसका वजूद असिद्ध नहीं हो जाता.
3 -क्या आप इस शाश्वत सचाई से सहमत हैं कि हर काल में ही विजेताओं का लक्ष्य ऐसा कानून बनाना रहा है जिसके जरिये पराधीन मुल्क की सम्पदा- संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने के साथ पराधीन मूलनिवासियों के श्रम का इस्तेमाल अपे भावी पीढ़ी कि सुख-समृद्धि में किया जा सके!अगर यह सत्य है तो क्या ऐसा नहीं लगता कि आर्यों ने वर्ण-व्यवस्था का निर्माण चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों पर अपनी भावी पीढ़ी का एकाधिकार कायम करने तथा शुद्रातिशूद्रों को निःशुल्क दास में परिणत करने के उद्देश्य से किया?
4-अगर हिदू-साम्राज्यवाद एक सच्चाई है तो क्या ऐसा नहीं लगता कि इसे सुपरिकल्पित से तरीके वर्ण-व्यस्था के वितरणवादी ढांचे में ही अटूट रखा गया है तथा इसे बरक़रार रखने के लिए ही मार्क्सवादी जाति की अनदेखी तथा विदेशी साम्राज्यवाद का हौवा खड़ा करते रहते हैं?
5-हजारों साल से कायम हिदू साम्राज्यवाद का चाल-चरित्र देखते हुए क्या आपको ऐसा लगता है कि उसका खात्मा किसी ऐसे हथियार के द्वारा ही किया जा सकता है,जिसके तहत भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों की संख्यानुसार शक्ति के स्रोतों का बंटवारा किया जा सके.अगर ऐसा है तो क्या हिंदू-साम्राज्यवाद के खात्मे का डाइवर्सिटी से भी बेहतर कोई हथियार है?

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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

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Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

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