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Saturday, April 6, 2013

संघ परिवार के उग्र हिंदुत्व से दुनियाभर में हिंदुओं की शामत आनेवाली है! क्या कर रही हैं धर्म निरपेक्ष ताकतें?

संघ परिवार के उग्र हिंदुत्व से दुनियाभर में हिंदुओं की शामत आनेवाली है! क्या कर रही हैं धर्म निरपेक्ष ताकतें?


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


बाबरी विध्वंस के बाद बांग्लादेश में क्या हुआ और वहां अल्पसंख्यकों पर क्या गुजरी, इसका ब्यौरा तसलिमा नसरीन के उपन्यास `लज्जा​​' और सलाम आजाद की पुस्तक `बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न' के अलावा तमाम बांग्लादेशी धर्मनिरपेक्ष लेखकों पत्रकारों की रचनाओं​​ में मिलता है। अब जब वहां धर्मनिरपेक्ष ताकतें एकजुट होकर धर्मांध राष्ट्रवादी कट्टरपंथियों के मुकाबले सड़क पर मोर्चा ले रही हैं, संघ परिवार के इस बयान से धर्मांध राष्ट्रवाद ही मजबूत होगा। तो क्या संघ परिवार भारत में हिंदू साम्राज्यवाद की जय जयकार के लिए बांग्लादेश और ​​अन्यत्र धर्मांध कट्टरपंथियों के हक में माहौल जानबूझकर तैयार कर रहा है?



नरेंद्र मोदी का दावा चाहे कितना ही मजबूत हो, संघ परिवार का एक तबका ्ब भी लौह पुरुष लालकृष्म आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने को​ ​ बेताब है। प्रधानमंत्रित्व की दावेदारी से कथित तौर पर रिटायर आडवानी फिर रथयात्री बतौर अवतरित हुए हैं। भारत जेसे बहुसंस्कृति देश के बावी फ्रधानमंत्री से देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे का सम्मान अपेक्षित है। लेकिन राम मंदिर आंदोलन पर गर्व करने का आह्वान करते हुए आडवानी न केवल प्रधानमंत्रित्वकी दौड़ में वापस आये हैं, बल्कि बाबरी विध्वंस की तर्ज पर हिंदू राष्ट्र के एजंडे के मुताबिक उन्होंने पूरे बारतीय उपमहाद्वीप में  अल्पसंख्यकों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया है। गौरतलब है कि बाबरी विध्वंस के बाद सिर्फ भारत ही नही, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत इस पूरे उपमहाद्वीप और उससे बाहर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और सांप्रदायिक दंगो की सुनामी आ गयी थी। कांग्रेस की विदेश नीति पर हमेशा सवाल खड़ा करने वाले संघपरिवार की राजनयिक पहल का परिप्रेक्ष्य पर गौर करें कि इस वक्त बांग्लादेश में धर्मांध और धर्मनिरपेक्ष ​​राष्ट्रवाद की लड़ाई खूनी सत्तादखल की जंग में तब्दील है। संघ परिवार का राम मंदिर प्रकरण इस आग में ईंधन का काम करेगा। सीमापार से जो शरणार्थियों का आने का सिलसिला रुक सा गया, वह भी तेज हो जाने का अंदेशा है। आडवानी की पहल पर ही बायोमैट्रिक नागरिकता का​​ प्रावधान हुआ।एक तरफ तो विभाजनपीड़ित शरणार्थियों को देश निकाला और दूसरी तरफ दुनियाभर में हिंदुओं को शरणार्थी बनाने का​​ इंतजाम, संघी हिंदुत्व की इस उत्कट अभिव्यक्ति पर भी हिंदू साम्राज्यवाद के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतें एकजुट हो न हो तो देश से बाहर  हिंदुओं की सामत तो आने ही वाली है, बाकी कुछ हो न हो।


बाबरी विध्वंस के बाद बांग्लादेश में क्या हुआ और वहां अल्पसंख्यकों पर क्या गुजरी, इसका ब्यौरा तसलिमा नसरीन के उपन्यास `लज्जा​​' और सलाम आजाद की पुस्तक `बांग्लादेश में अल्पसंख्यक उत्पीड़न' के अलावा तमाम बांग्लादेशी धर्मनिरपेक्ष लेखकों पत्रकारों की रचनाओं​​ में मिलता है। अब जब वहां धर्मनिरपेक्ष ताकतें एकजुट होकर धर्मांध राष्ट्रवादी कट्टरपंथियों के मुकाबले सड़क पर मोर्चा ले रही हैं, संघ परिवार के इस बयान से धर्मांध राष्ट्रवाद ही मजबूत होगा। तो क्या संघ परिवार भारत में हिंदू साम्राज्यवाद की जय जयकार के लिए बांग्लादेश और ​​अन्यत्र धर्मांध कट्टरपंथियों के हक में माहौल जानबूझकर तैयार कर रहा है?


भारतीय सार्वभौम गणराज्य के लिए यह कैसी विडंबना  है कि बहुसंख्य बहिस्कृत जनता इसी हिंदुत्व की पैदल सेना बनी हुई है और ​​धर्मनिरपेक्ष कहने वाले वामपंथी और अंबेडकरवादी एक दूसरे को खारिज करने में सारी मेधा और पूरी ताकत झोंक रहे हैं यह कैसी विडंबना​​ है लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की कि कारपोरेट जायनवादी साम्राज्यवाद का उपनिवेश मुक्त बाजार की हिमायती सरकार का विकल्प हिंदुत्व के अलावा कोई तीसरी ताकत है नहीं और वैकल्पिक जो सरकार वांछित हैं, उसके प्रधानमंत्रित्व के दोनों दावेदार संगीन मानवविरोधी अपराध के आरोप में अभियुक्त हैं! नरेन्द्र मोदी को अमेरिकी वीसा भले ही मिल जाये और वैश्विक व्यवस्था का वरदह्त भी , सच तो यह है कि गुजरात नरसंहार के आरोपों वे अभी बेदाग नहीं निकले हैं। उसी तरह राममंदिर आंदोलन के पुरोधा लालकृष्ण आडवाणी भी बाबरी विध्वंस मामले में अभियुक्त हैं और वे डंके की चोट पर हुंकार रहे हैं कि बाबरी विध्वंस पर माफी नहीं मांगनी चाहिए। यह तो गौरव की बात है। अब विचारणीय यह है कि क्या हम लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कहलाने के हकदार हैं या नहीं!  यह कैसी विडंबना  है कि बहुसंख्य बहिस्कृत जनता इसी हिंदुत्व की पैदल सेना बनी हुई है और ​​धर्मनिरपेक्ष कहने वाले वामपंथी और अंबेडकरवादी एक दूसरे को खारिज करने में सारी मेधा और पूरी ताकत झोंक रहे हैं!


बांग्लादेश में शुक्रवार को इस्लाम धर्म को मानने वाले हजारों लोगों ने नास्तिक ब्लॉगरों को मौत की सजा देने की मांग पर शुक्रवार को राजधानी ढाका की ओर एक बड़ी रैली निकाली।उधर हिंसक टकराव में अवामी लीग की छात्र इकाई के एक कार्यकर्ता की मौत हो गई। एक फोटो पत्रकार ने बताया कि छात्र नेता कि हत्या के तुरंत बाद पुलिस ने करीमनगर इलाके में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रबर की गोलियां चलाईं।बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना की अगुआई वाली सरकार ने पिछले एक हफ्ते में इस्लाम की निंदा करने वाले चार ब्लॉगरों को गिरफ्तार किया है।


भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने शनिवार को पार्टीजनों से कहा कि अयोध्या आंदोलन को लेकर 'शर्मिन्दा' होने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसकी बजाय इस पर गर्व करना चाहिए।


आडवाणी ने नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में पार्टी के 33वें स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह में अपने संबोधन में कहा कि उन्हें यह स्वीकार करने में गर्व महसूस होता है कि उनके दल ने राम मंदिर और अयोध्या का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक मुद्दा है।सपा नेता मुलायमसिंह की ओर से उनकी तारीफ किए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब लोगों ने मुलायमसिंह के मुंह से मेरी प्रशंसा सुनी तो उन्हें चिंता हुई। मेरा मानना है कि अगर आप सही बात कहेंगे तो दुनिया उसे स्वीकार करेगी। झिझकिए नहीं, हीन भावना विकसित मत कीजिए।अगर हम अयोध्या मंदिर मुद्दे में विश्वास करते हैं और उसके लिए आंदोलन चलाया, तो उसके लिए शर्मिन्दा नहीं हों, कभी नहीं, हमें उसमें गर्व होना चाहिए। मुलायम ने पिछले महीने आडवाणी को ईमानदार व्यक्ति बताते हुए कहा था कि भाजपा के इस वरिष्ठ नेता ने कभी झूठ नहीं बोला।आडवाणी ने कहा कि उन्हें लोगों के यह कहने पर कोई आपत्ति नहीं है कि केवल अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन के बल पर भाजपा ने अपना समर्थन आधार बढ़ाया।


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रबल उम्मीदवार पेश किए जाने की भाजपा में चल रही मुहिम के बीच पार्टी की दिल्ली इकाई के प्रमुख विजय गोयल ने शनिवार को यह कहकर सबको हतप्रभ कर दिया कि अगली सरकार लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में बनेगी।पार्टी की स्थापना दिवस के अवसर पर भाजपा मुख्यालय में आयोजित समारोह में आडवाणी और अध्यक्ष राजनाथसिंह की उपस्थिति में गोयल ने कहा कि केन्द्र में अगली सरकार किसी और नहीं बल्कि आडवाणी के नेतृत्व में बनेगी।उनके इस कथन के बाद सवाल पूछे जाने पर उन्होंने अपने बयान को थोड़ा बदलते हुए कहा कि उनके कहने का मतलब यह था कि अगली सरकार आडवाणी के मार्गदर्शन में बनेगी।गोयल ने अपने भाषण में पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और आडवाणी की प्रशंसा करते हुए कहा कि प्रारंभ से ही इन दोनों ने पार्टी का मार्गदर्शन किया है। उन्होंने कहा, चूंकि वाजपेयी अस्वस्थ हैं इसलिए पार्टी आम चुनाव के बाद अगली सरकार बनाने के लिए आडवाणी से मार्गदर्शन लेगी। उन्होंने कहा कि मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं था। मैं प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर कैसे कर सकता हूं। हमारे अध्यक्ष राजनाथसिंह पहले ही कह चुके हैं की प्रधानमंत्री पद का फैसला पार्टी संसदीय बोर्ड ही करेगा। उन्होंने कहा कि आडवाणी के नाम से मेरा मतलब यह था कि हम उनके मार्गदर्शन में चुनाव लड़ेंगे क्योंकि वे पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता हैं।



दुनिया भर में हिंदुत्व की पैरोकारी कर रहे हिंदू स्वयंसेवक संघ को अफसोस है कि कुछ देशों में उनकी शाखाएं नहीं हैं। खासतौर पर पाकिस्तान और बांग्लादेश में। कहते हैं सबको पता है कि इन देशों में हिंदुओं पर क्या गुजर रही है? संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती अगली पीढ़ी को हिंदुत्व में ढालने की है। इसकी कोशिशें जारी हैं।


हिंदू स्वयंसेवक संघ के अंतरराष्ट्रीय सह संयोजक रवि कुमार को पाकिस्तान, बांग्लादेश और फिजी में हिंदू स्वयं सेवक संघ की शाखाएं न होने का मलाल है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर किये गए सवाल पर वह खामोश हो गये। लेकिन अंदाज में इशारा स्पष्ट था, कि वहां हिंदुओं के साथ जो हो रहा है सबके सामने है। इतना जरूर बोले कि फिजी में सबसे ज्यादा आत्महत्या हिंदू कर रहे हैं। जब यह पूछा गया कि इन देशों में हिंदुओं के मंदिर तोड़े जा रहे हैं, उनका उत्पीड़न हो रहा? इस पर प्रश्न भरे लहजे में बोले आप बताइये..।


भारत में ही भारतीय संस्कृति को बहुसंख्यक लोगों द्वारा न मानने के सवाल पर रविकुमार साफगोई से कहते हैं कि संस्था विश्व के चालीस राष्ट्रों में (सभी विदेशी) कार्य कर रही है। वहां बसे तीन करोड़ भारतीयों और उनके बच्चों और उनके बच्चों को अभ्यास वर्ग और बैठक के जरिए सुशिक्षित कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती विदेशों में बसी नयी पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, परंपरा और भाषा से जोड़ना है। इसके लिए वह 30 सालों से नियमित शिविर आयोजित कर रहे हैं। उन्होंने संतोष प्रकट करते हुए बताया कि आस्ट्रेलिया, हांगकांग आदि देशों में लाखों युवा मंगलवार और गुरुवार को केवल शाकाहारी भोजन करते हैं। वह भारतीय संस्कृति को जानने और समझने को लालायित रहते हैं। हिंदी और संस्कृत में तो हजारों बच्चे निपुण हो चुके हैं। इतना ही नहीं गैर भारतीय बच्चों में हिंदी के प्रति भारी लगाव बढ़ा है। वह लोग हिंदी और भारत की संस्कृति को अपना रहे हैं।


Lajja

लज्जा

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तसलीमा नसरीन <<आपका कार्ट
मूल्य11.95  
प्रकाशकवाणी प्रकाशन
आईएसबीएन 00000
प्रकाशित मार्च १४, २००५
पुस्तक क्रं : 2125
मुखपृष्ठ : सजिल्द

सारांश:

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

'लज्जा' बांग्लादेश की बहुचर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन का पाँचवाँ उपन्यास है। इस उपन्यास ने न केवल बांग्लादेश में हलचल मचा दी है, बल्कि भारत में भी व्यापक उत्ताप की सृष्टि की है। यही वह उत्तेजक कृति है, जिसके लिए लेखिका को बांग्लादेश की कट्टरवादी साम्प्रदायिक ताकतों से सजा-ए-मौत की घोषणा की है। दिलचस्प यही है की सीमा के इस पार की साम्प्रादयिक ताकतों ने इसे ही सिर माथे लगाया। कारण ? क्योंकि यह उपन्यास बहुत ही शक्तिशाली ढंग से बांग्लादेश की हिन्दू विरोधी साम्प्रदायिकता पर प्रहार करता है और उस नरक का अत्यन्त मार्मिक चित्रण करता है जो एक लंबे अरसे से बांग्लादेशी हिन्दुओं की नियति बन चुका है। हमारे देश की हिन्दूवादी शक्तियों ने 'लज्जा' को मुस्लिम आक्रमकता के प्रमाण के रूप में पेश करना चाहा है, लेकिन वस्तुतः 'लज्जा' दुधारी तलवार है। यह मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर जितनी तल्खी से आक्रमण करता है, उतनी ही तीव्रता से हिन्दू साम्प्रदायिकता की परतें भी उघाड़ता है। वस्तुतः यह पुस्तक साम्प्रदायिकता मात्र के विरुद्ध है और यही उसकी खूबसूरती है।

'लज्जा' की शुरुआत होती है 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने पर बांग्लादेश के मुसलमानों की आक्रमक प्रतिक्रिया से। वे अपने हिन्दू भाई-बहनों पर टूट पड़ते हैं और उनके सैकड़ों धर्मस्थलों को नष्ट कर देते हैं। लेकिन इस अत्याचार, लूट, बलात्कार और मन्दिर ध्वंस के लिए वस्तुतः जिम्मेदार कौन है ? कहना न होगा कि भारत के वे हिन्दूवादी संगठन जिन्होंने बाबरी मस्जिद ध्वंस का प्रतिशोध की राजनीति का खूँखार चेहरा दुनिया के सामने रखा। वे भूल गये कि जिस तरह भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, उसी तरह पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। लेखिका ने ठीक ही पहचाना है कि 'भारत कोई विच्छिन्न 'जम्बूद्वीप' नहीं है। भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है, तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में, कम-से-कम पड़ोसी देशों में तो सबसे पहले ही फैल जाएगा।' क्यों ? क्योंकि इस पूरे उपमहादेश की आत्मा एक है, यहाँ के नागरिकों का साझा इतिहास और एक साझा भविष्य है। अतः एक जगह की घटनाओं का असर दूसरी जगह पड़ेगा ही। अतः हम सभी को एक-दूसरे की संवेदनशीलता का खयाल रखना चाहिए और एक प्रेम तथा सौहार्दपूर्ण समाज की रचनी करनी चाहिए। ऐसे समाज में ही हिन्दू, मुसलमान तथा अन्य समुदायों के लोग सुख और शान्ति से रह सकते हैं। प्रेम घृणा से अधिक संक्रामक होता है।

लेकिन बांग्लादेश का यह ताजा उन्माद सिर्फ बाबरी मस्जिद टूटने की प्रतिक्रिया भर थी ? नहीं। तसलीमा की विवेक दृष्टि और दूर तक जाती है। वे यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि इसका संबंधमूलतः धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल से है। यद्यपि पाकिस्तान का निर्माण होने के बाद कायदे-आजम मुहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की थी कि धर्म नहीं, जातीयता ही किसी समुदाय को एक रख सकती है, लेकिन पाकिस्तान के दृष्टिहीन शासकों ने इस आदर्श को तिलांजलि दे दी और वे पाकिस्तान को एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने पर तुल गये। लेकिन क्या धर्म का बन्धन पाकिस्तान को एक रख सका ? बांग्लादेश का एक मुक्ति संग्राम एक सर्वथा सेकुलर संघर्ष था। किन्तु सेकुलरबाद का यह आदर्श स्वतंत्र बांग्लादेश में भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका। वहाँ भी, पाकिस्तान की तरह ही धर्मतांत्रिक राज्य बनाने की अधार्मिक कोशिश की गयी। नतीजा यह हुआ कि बांग्लादेश में वह बदसूरत आग फिर सुलग उठी, जिसके कारण पहले के दशकों में लाखों हिन्दुओं को देश त्याग करना पड़ा था। संकेत स्पष्ट है जब भी धर्म और राजनीति का अनुचित सम्मिश्रण होगा, समाज में तरह-तरह की बर्बताएँ फैलेंगी।

तसलीमा नसरीन मूलतः नारीवादी लेखिका हैं। वे स्त्री की पूर्ण स्वाधीनता की प्रखर पक्षधर हैं। अपने अनुभवों से वे यह अच्छी तरह जानती हैं कि स्त्री के साथ होने वाला अन्याय व्यापक सामाजिक अन्याय का ही एक अंग है। इसलिए वे यह भी देख सकीं कि कट्टरतावाद सिर्फ अल्पसंख्यकों का ही विनाश नहीं करता, बल्कि बहुसंख्यकों का जीवन भी दूषित कर देता है। कठमुल्ले पंडित और मौलवी जीवन के हर क्षेत्र को विकृत करना चाहते हैं। सुरंजन और परवीन एक-दूसरे को प्यार करते हुए भी विवाह के बंधन में नहीं बंध सके, क्योंकि दोनों के बीच धर्म की दीवार थी और माहौल धर्मोन्माद से भरा हुआ था। धर्मोन्माद के माहौल में सबसे ज्यादा कहर स्त्री पर ही टूटता हैः उसे तरह-से-तरह से सीमित और प्रताड़ित किया जाता है। सुरंजन की बहन माया का अपहरण करने वाले क्या किसी धार्मिक आदर्श पर चल रहे थे ? उपन्यास का अन्त एक तरह की हताशा से भरा हुआ है और यह हताशा सिर्फ सुरंजन के आस्थावान पिता सुधामय की नहीं, हम सबकी लज्जा है, क्योंकि हम अब भी उपमहादेश में एक मानवीय समाज नहीं बना पाए हैं।
यह एक नये ढंग का उपन्यास है। कथा के साथ रिपोर्ताज और टिप्पणी का सिलसिला भी चलता रहता है। इसलिए यह हमें सिर्फ भिगोता नहीं, सोचने विचारने की पर्याप्त सामग्री भी मुहैया करता है। कहानी और तथ्य उपन्यास में भी उसी तरह घुले-मिले हुए हैं, जिस तरह कल्पना और यथार्थ जीवन में। आशा है, तसलीमा की यह विचारोत्तेजक कृति हिन्दी पाठक को न केवल एक नयी भूमि परिचित कराएगी, बल्कि उसे एक नया विचार संस्कार भी देगी।

राजकिशोर


लज्जा




सुरंजन सोया हुआ है। माया बार-बार उससे कह रही है, "भैया उठो, कुछ तो करो देर होने पर कोई दुर्घटना घट सकती है। सुरंजन जानता है, कुछ करने का मतलब है कहीं जाकर छिप जाना। जिस प्रकार चूहा डर कर बिल में घुस जाता है फिर जब उसका डर खत्म होता है तो चारों तरफ देखकर बिल से निकल आता है, उसी तरह उन्हें भी परिस्थिति शांत होने पर छिपी हुई जगह से निकलना होगा। आखिर क्यों उसे घर छोड़कर भागना होगा ? सिर्फ इसलिए कि उसका नाम सुरंजन दत्त, उसके पिता का नाम सुधामय दत्त, माँ का नाम किरणमयी दत्त और बहन का नाम नीलांजना दत्त है ? क्यों उसके माँ-बाप बहन को घर छोड़ना होगा ? कमाल, बेलाल या हैदर के घर में आश्रम लेना होगा ? जैसा कि दो साल पहले लेना पड़ा था। तीस अक्टूबर को कमाल अपने इस्कोटन के घर से कुछ आशंका करके ही दौड़ा आया था, सुरंजन को नींद से जगाकर कहा, "जल्दी चलो, दो चार कपड़े जल्दी से लेकर घर पर ताला लगाकर सभी मेरे साथ चलो। 

देर मत करो, जल्दी चलो। कमाल के घर पर उनकी मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं थी, सुबह नाश्ते में अंडा रोटी दोपहर में मछली भात शाम को लॉन में बैठकर अड्डेबाजी, रात में आरामदेह बिस्तर पर सोना, काफी अच्छी बीता था वह समय। लेकिन क्यों उसे कमाल के घर पर आश्रय लेना पड़ता है ? कमाल उसका बहुत पुराना दोस्त है। रिश्तेदारों को लेकर उसे क्यों अपना घर छोड़कर भागना पड़ता है, कमाल को तो भागना नहीं पड़ता ? यह देश जितना कमाल के लिए है उतना ही सुरंजन के लिए भी तो है। नागरिक अधिकार दोनों का समान ही होना चाहिए। लेकिन कमाल की तरह वह क्यों सिर उठाये। खड़ा नहीं हो सकता। वह क्यों इस बात का दावा नहीं कर सकता कि मैं इसी मिट्टी की संतान हूँ, मुझे कोई नुकसान मत पहुँचाओ। 

सुरंजन लेटा ही रहता है। माया बेचैन होकर इस कमरे से उस कमरे में टहल रही है। वह यह समझना चाह रही है कि कुछ अघट-घट जाने के बाद दुखी होने से कोई फायदा नहीं होता। सी.एन.एन. टीवी पर बाबरी तोड़े जाने का दृश्य दिखा रहा है। टेलीविजन के सामने सुधामय और किरणमयी स्तंभित बैठे हैं। वे सोचे रहे हैं कि सन् 1990 के अक्टूबर की तरह इस बार भी सुरंजन किसी मुसलमान के घर पर उन्हें छिपाने ले जायेगा। लेकिन आज सुरंजन को कहीं भी जाने की इच्छा नहीं है, उसने निश्चय किया है कि वह सारा दिन सो कर ही बिताएगा। कमाल या अन्य कोई यदि लेने भी आता है तो कहेगा, "घर छोड़कर वह कहीं नहीं जायेगा, जो होगा देखा जायेगा। 

आज दिसम्बर महीने की सातवीं तारीख है। कल दोपहर को अयोध्या में सरयू नदी के किनारे घना अंधकार उतर आया। कार सेवकों द्वारा साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी एक मस्जिद तोड़ दी गयी। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा घोषित कार सेवा शुरू होने के पच्चीस मिनट पहले यह घटना घटी। कार सेवकों ने करीब पाँच घंटे तक लगातार कोशिश करके तीन गुम्बद सहित पूरी इमारत को धूल में मिला दिया। यह सब भारतीय जनता पार्टी विश्व हिन्दू परिषद आर.एस.एस. और बजरंग दल के सर्वोच्च नेताओं के नेतृत्व में हुआ और केन्द्रीय सुरक्षा वाहिनी पी.ए.सी. और उत्तर प्रदेश पुलिस निष्क्रिय खड़ी-खड़ी कार सेवकों का अविश्वसनीय तांडव देखती रही। दोपहर के दो बज कर पैंतालीस मिनट पर एक गुम्बद तोड़ा गया। बारह बजे दूसरा गुम्बद तोड़ा गया, चार बजकर पैतांलिस मिनट पर तीसरे गुम्बद को भी कार सेवकों ने ढहा दिया। इमारत को तोड़ते समय चार कार सेवक मलवे में दबकर मर गये और सौ से अधिक घायल हुए। 

सुरंजन बिस्तर पर लेटे-लेटे ही अखबार के पन्नों को उलट रहा था। आज के सभी अखबारों की बैनर हैडिंग है। बाबरी मस्जिद का ध्वंस विध्वस्त। वह कभी अयोध्या नहीं गया, बाबरी मस्जिद नहीं देखी। देखेगा भी कैसे, उसने तो कभी देश से बाहर कदम रखा ही नहीं। राम का जन्म कब हुआ था और मिट्टी को खोदकर कोई मस्जिद बनी या नहीं, यह उसके लिए कोई मतलब नहीं रखता लेकिन सुरंजन यह मानता है कि सोलहवीं शताब्दी के इस स्थापत्य पर आघात करने का मतलब सिर्फ भारतीय मुसलमानों पर ही आघात करना नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दुओं पर भी आघात करना है। दरअसल, यह सम्पूर्ण भारत पर, समग्र कल्याणबोध पर, सामूहिक विवेक पर आघात करना है। सुरंजन समझ रहा है कि बांग्ला देश में बाबरी मस्जिद को लेकर तीव्र तांडव शुरू हो जायेगा, सारे मन्दिर धूल में मिल जायेंगे। हिन्दुओं के घर जलेंगे। 

दुकानें लूटी जायेंगी। भारतीय जनता पार्टी की प्रेरणा से कार सेवकों ने वहाँ बाबरी मज्जिद को तोड़ कर इस देश के कट्टर कठमुल्लावादी दलों को और भी मजबूत कर दिया है। विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दल क्या यह सोच रहे हैं कि उनके उन्मत्त आचरण का प्रभाव सिर्फ भारत की भौगोलिक सीमा तक ही सीमित रहेगा ? भारत में साम्प्रदायिक हंगामे ने व्यापक आकार धारण कर लिया है। मारे गये लोगों की संख्या पाँच सौ छह सौ, हजार तक पहुँच गयी है। प्रति घंटे की रफ्तार से मृतकों की संख्या बढ़ रही है। हिन्दुओं के स्वार्थ रक्षकों को क्या मालूम नहीं है कि कम-से-कम दो ढाई करोड़ हिन्दू बंगलादेश में हैं ? सिर्फ बंगालदेश में ही क्यों, पश्चिम एशिया के प्रायः सभी देशों में हिन्दू हैं। उनकी क्या दुर्गति होगी, क्या हिन्दू कठमुल्लों ने कभी सोचा भी है ? राजनैतिक दल होने के नाते भारतीय जनता पार्टी को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि भारत कोई 'विच्छिन जम्बू द्वीप' नहीं है। भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में कम से कम पडोसी देशों में तो सबसे पहले फैल जायेगा। 

सुरंजन आँख मूँद कर सोया रहता है। उसे धकेल कर माया बोली, तुम उठोगे कि नहीं, बोलो ! माँ, पिताजी तुम्हारे भरोसे बैठे हैं।"
सुरंजन अँगड़ाई लेते हुए बोला, तुम चाहो तो चली जाओ, मैं इस घर को छोड़कर एक कदम भी नहीं जाऊँगा।"
"और वे ?" 
'मैं नहीं जानता।' 
'यदि कुछ हो गया तो ?'
'क्या होगा !'
'मानो घर लूट लिया, जला दिया।' 
'क्या तुम उसके बाद भी बैठे रहोगे ?'
'बैठा नहीं लेटा रहूँगा।'

खाली पेट सुरंजन ने एक सिगरेट सुलगायी। उसे चाय पीने की इच्छा हो रही थी। किरणमयी रोज सुबह उसे एक कप चाय देती है, पर आज अब तक नहीं दी। इस वक्त उसे कौन देगा एक कप गरमगरम चाय। माया से बोलना बेकार है। यहाँ से भागने के अलावा फिलहाल वह लड़की कुछ भी सोच नहीं पा रही है। इस वक्त चाय बनाने के लिए कहने पर उसका गला फिर से सातवें आसमान पर चढ़ जायेगा। वह खुद ही बना सकता है पर आलस उसे छोड़ ही नहीं रहा है। उस कमरे में टेलीविजन चल रहा है। सी.एन.एन. के सामने आँखें फाड़कर बैठे रहने की उसकी इच्छा नहीं हो रही है। उसे कमरे से माया थोड़ी-थोड़ी देर में चीख रही है, भैया लेटे-लेटे अखबार पढ़ रहा है, उसे कोई होश नहीं।'

सुरंजन को होश नहीं है, यह बात ठीक नहीं। वह जानता है कि किसी भी समय दरवाजा तोड़कर एक झुण्ड आदमी अन्दर आ सकते हैं, उनमें कई जाने, कई अनजाने होंगे। घर के सामान तोड़-फोड़कर लूटपाट करेंगे और जाते-जाते घर में आग भी लगा देंगे। ऐसी हालत में कमाल या हैदर के घर आश्रय लेने पर कोई नहीं कहेगा कि हमारे यहाँ जगह नहीं है, लेकिन उसे जाने में शर्मिदगी महसूस होती है। माया चिल्ला रही है तुम लोग नहीं जाओगे तो मैं अकेली ही चली जा रही हूँ। पारुल के घर चली जाती हूँ। भैया कहीं ले जाने वाले हैं, मुझे नहीं लगता। उसे जीने की जरूरत नहीं होगी मुझे है। 
माया समझ गई है कि चाहे कारण कुछ भी हो सुरंजन आज उन्हें किसी के घर छिपने के लिए नहीं ले जायेगा। निरुपाय होकर उसने खुद ही अपनी सुरक्षा के बारे में सोचा है। सुरक्षा शब्द ने सुरंजन को काफी सताया है। 

सुरक्षा नब्बे के अक्तूबर में भी नहीं थी। प्रसिद्ध ढाकेश्वरी मन्दिर में आग लगा दी गयी। पुलिस निष्क्रिय होकर सामने खड़ी तमाशा देखती रही। कोई रुकावट नहीं डाली गयी। मुख्य मन्दिर जल कर राख हो गया। अन्दर घुस कर उन लोगों ने देवी-देवताओं के आसन को विध्वस्त कर दिया। उन्होंने नटमन्दिर, शिवमन्दिर, अतिथिगृह, उसके बगल में स्थित श्री दामघोष का आदि निवास गौड़ीय मठ का मूल मन्दिर नटमन्दिर, अतिथिशाला आदि का ध्वंस करके मन्दिर की सम्पत्ति लूट ली। उसके बाद फिर माधव गौड़ीय मठ के मूल मन्दिर का भी ध्वंस कर डाला। जयकाली मन्दिर भी चूर-चूर हो गया। ब्रह्म समाज की चारदीवारी के भीतर वाले कमरे को बम से उड़ा दिया गया। राम सीता मन्दिर के भीतर आकर्षक काम किया हुआ सिंहसान तोड़-फोड़ कर उसके मुख्य कमरे को नष्ट कर दिया। शंखारी बाजार के सामने स्थित हिन्दुओं की पाँच दुकानों में लूटपाट व तोड़फोड़ के बाद उन्हें जला दिया गया। शिला वितान, सुर्मा ट्रेडर्स, सैलून और टायर की दुकान, लॉण्ड्री, माता मार्बल, साहा कैबिनेट, रेस्टोरेन्ट-कुछ भी उनके तांडव से बच नहीं पाया। 

शंखारी बाजार के मोड़ पर ऐसा ध्वंस यज्ञ हुआ कि दूर-दूर तक जहाँ भी नजर जाती ध्वंस विशेष के सिवाय कुछ भी नजर नहीं आता था। डेमरा शनि अखाड़े का मन्दिर भी लूटा गया। पच्चीस परिवारों का घर-द्वार सब कुछ दो-तीन सौ साम्प्रदायिक संन्यासियों द्वारा लूटा गया। लक्ष्मी बाजार के वीरभद्र मन्दिर की दीवारें तोड़ कर अन्दर का सब कुछ नष्ट कर दिया गया। इस्लामपुर रोड की छाता और सोने की दुकानों को लूट कर उनमें आग लगा दी गयी। नवाबपुर रोड पर स्थित मरणचाँद की मिठाई की दुकान, पुराना पल्टन बाजार की मरणचाँद की दुकान आदि को भी तोड़ दिया गया। राय बाजार के काली मन्दिर को तोड़ कर वहाँ की मूर्ति को रास्ते पर फेंक दिया गया। सुत्रापुर में हिन्दुओं की दुकानों को लूट कर, तोड़कर उनमें मुसलमानों के नाम पट्ट लटका दिये गये। नवाबपुर के घोष एण्ड सन्स की मिठाई की दुकान को लूट कर उसमें नवाबपुर की रामधन पंसारी नामक प्राचीन दुकान को भी लूटा गया। 

बाबू बाजार पुलिस चौकी से मात्र कुछ गज की दूरी पर अवस्थित शुक लाल मिष्ठान भंडार को धूल में मिला दिया गया। वाद्ययंत्र की प्रसिद्ध दुकान 'यतीन एण्ड कम्पनी' के कारखाना व दुकान को इस तरह तोड़ा गया कि सिलिंग फैन से लेकर सब कुछ भस्मीभूत हो गया। ऐतिहासिक साँप मन्दिर का काफी हिस्सा तोड़ दिया गया। सदरघाट मोड़ में स्थित रतन सरकार मार्केट भी पूरी तरह ध्वस्त हो गयी। 

सुरंजन की आँखों के सामने उभर आया नब्बे की लूटपाट का भयावह दृश्य। क्या नब्बे की घटना को दंगा कहा जा सकता है ? दंगा का अर्थ मारपीट एक सम्प्रदाय के साथ दूसरे सम्प्रदाय के संघर्ष का नाम ही दंगा है, लेकिन इसे तो दंगा नहीं कहा जा सकता। यह है एक सम्प्रदाय के ऊपर दूसरे सम्प्रदाय का हमला, अत्याचार। खिड़की से होकर धूल सुरंजन के ललाट पर पड़ रही है। जाड़े की धूल है। इस धूल से बदन नहीं जलता। लेटे-लेटे उसे चाय की तलब महसूस होती है।



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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

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Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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