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Tuesday, October 27, 2026

डेटलाइन कोलकाता छब्बीस

बंगाल के दूरस्थ ग्रामीण इलाके में हरिचांद मंदिर प्रांगण में हम बांग्ला दलित साहित्यकारों और शरणार्थी आंदोलनकारियों के साथ सन 2000 के आसपास। बंगाल के विभाजन के शिकार दलितों की आपबीती पर विख्यात उपन्यास उजानतलीर उपकथा के लेखक Kapil Krishna Thakur ने यह तस्वीर भेजकर बहुत सारी स्मृतियां को जिंदा कर दिया है। उन्होंने लिखा है আপনার কালেকশনে থাকা দরকার ছবিটা। इस छवि में कपिलबाबू दाएं से दूसरे नंबर पर हैं। मेरे बगल में कोट पैंट में अंग्रेजी और बांग्ला के लेखक व कोलकाता के रिटायर्ड पोस्टमास्टर जनरल मनोहर मौली विश्वास हैं। बीच में सबसे लंबे सज्जन सबसे बुजुर्ग और सबसे जवान बांग्ला दलित साहित्य आंदोलन के संस्थापकों में प्रमुख नकुल बैरागी हैं। बंगाल में matua आंदोलन हरिचांद ठाकुर के युवा वंशज शांतनु ठाकुर के केंद्र में मंत्री बनने के साथ ही संघ परिवार में समाहित हो गया है। बंगाल विधानसभा में भाजपा को ज्यादातर सीटें दलित matua इलाकों में मिली हैं। फिर भी बांग्लादेश के फरीदपुर के ओराकांदी में आज भी कर्मकांड का विरोध जारी है। भारत में भी अनेक लोग हरिचांद गुरुचांद के आदर्शों पर चलने वाले अनेक लोग हैं।जैसे इस तस्वीर के सारे लोग। आभार कपिलबाबू। पलाश विश्वास 16.03.2023

डेटलाइन कोलकाता पच्चीस

पेड़ों की छांव में शरण मधुमती की तरह बहती थी मेरी दादी वे दोनों आम के पेड़ नहीं रहे,जिनके नीचे बैठी थी शहीदेआजम भगत सिंह की मां और न जाने कितने खास लोग पलाश विश्वास करीब चार दशक के बाद आम के पेड़ों की छांव में शरण ली है। ये पेड़ मेरी ताई ने लगाए थे। ताईजी का निधन मेरे कोलकाता में जाने के सालभर के अंदर 1992 में हो गया था। चालीस साल के प्रवासी पत्रकार जीवन ने मुझे पेड़ों की छांव से बाहर कर दिया। बिना बिजली के जंगल के आदिम गन्ध और खेतों के कीचड़ पानी, हिमालय की गोद से बेदखल हो गया मैँ।जैसे हमारे लोग भारत विभाजन की त्रासदी में अपनी नदियों,खेतों,बगीचों और गांव से बेदखल हो गए थे। बेदखली का सिलसिला कभी रुकता नहीं है। विस्थापन ही सफरनामा है ज़िन्दगी का। मेरी दादी शांतिदेवी जैशोर जिले के नडाल के कुमोर डांगा गांव से तीन बेटों अनिल,पुलिन,सुधीर,बेटी सरला और मेरी ताई हेमलता,मां के साथ बसंतीपुर आयी थी। चाचा सुधीर की शादी नेताजीनगर की उषा के साथ हुई थी। कुमोर डांगा पूर्वी बंगाल की बड़ी नदी मधुमती के किनारे बसा था।इस पार नडाल था तो नदी के उस पार् फरीदपुर का गोपालगंज का ओडाकांदी। हरिचंद गुरुचंद ठाकुर का घर।ताईजी इसी परिवार की बेटी थी। सविता जी का मायका भी ओडाकांदी में ही था। हमारी दादी ने बहुत संघर्ष किये।दादाजी उमेश जी का निधन तब हुआ,जब वे कक्षा दो में पढ़ते थे। शरीको ने जमीन जायदाद हड़प ली।वे विभाजन के बाद बंगाल में ही बस गए। हमारे दादा चार भी थे जो जमींदारों के खिलाफ किसानों की लड़ाई के योद्धा थे।इस लड़ाई में घर की औरतें भी शामिल थीं।हरिचाँद गुरुचन्द की विरासत के साथ यह परिवार न जाने कहाँ कहाँ से गुजरकर ट्रैन में आकर जंगल को आबाद करके बस गया और दूसरों को भी बसाया। पिताजी खाली हाथ,नंगे बदन नैनीताल की कड़ाके की सर्दी में विस्थापन और बेदखली के खिलाफ लड़ते रहे जीवनभर और हम वतानुकूलित महत्वाकांक्षाओं की बर्फीली दृवरों में कैद होते चले गए। मौसम और जलवायु के मामूली हेर फेर में हमारी जान निकल जाती है जबकि रीढ़ में कैंसर होने के बावजूद पिताजी की रीढ़ कभी झुकी नहीं।अपने मोर्चे पर आखिरी सांस तक लामबंद थे वे। हम तो भगोड़ा ही निकले। पिताजी विभाजन से पहले बारासात के दत्त पुकुर में एक सिनेमाहाल में काम करते थे। ताउजी और चाचाजी पुलिस में थे। विभाजन के बाद दत्तपुकुर में परिवार एक जुट हुआ।फिर रानाघाट और कटक के चरबेटिया कैम्प होकर वे नैनिताल आ गए। बंगाल में शरणार्थी आंदोलन की वजह से वे ओडिशा के चरबेटिया कैम्प भेजे गए।वहां भी उनका आंदोलन नहीं थमा तो 1952 में तराई के जंगल में फेंक दिया।उन्होंने अपने जांबाज साथियों की मदद से इस जंगल को आबाद किया। 1954 और 1956 में शरणार्थी आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1958 में ढिमरी ब्लॉक किसान विद्रोह के भी नेता थे।पुलिस ने पीटकर हाथ तोड़ दिया। घर की कुर्की जब्ती हुई। जेल गए। दस साल तक उनपर मुकदमा चला। पूर्वी पाकिसयं जाकर भी वे भाषा आंदोलन में जेल गए,जहां से उन्हें छुड़ाकर लाये अमृत बाजार पत्रिका के सम्पादक तुषार कांति घोष। देशभर के विस्थापितों पीड़ितों के लिए इन्हीं पेड़ों की छांव से ऊर्जा लेकर निकलते थे पुलिन बाबू।हमारी मां बसंती देवी,दादी शांति देवी और बुआ सरला देवी ने इन्हीं पेड़ों से एक दुर्जेय किले का निर्माण किया था। हमारी ताई हेमलता घर के मामले में सारे फैसले करती थीं। हमारी दादी अनपढ़ थीं।लेकिन उन्होंने घर में सैकड़ो फलदार और औषधियों के पेड़ लगाए। उन्होंने नल पर कभी नहीं नहाया। बगल में एक। छोटी सी नदी थी,जो उनके लिए मधुमती थी।इसी नदी से एकात्म होकर 1970 तक वे जीती रहीं। मधुमती की तरह निर्बाध बहती रही। हमारे घर की पहचान घर के केंद्र में दो आम के पेड़ थे। जहां चौपाल लगती थी।जिसके चबूतरे पर हम पढ़ते थे।पढ़ते पढ़ते सो जाते थे।पिताजी बाहर से आकर घर के अंदर ले जाते थे। उन सैकड़ों पेड़ों में अब बीस भी नहीं बचे। वे दोनों आम के पेड़ भी नहीं बचे,जिसके नीचे आकर बैठी थी शहीदे आजम भगत सिंह की मां 1969 में। कितने ही लोग एनडी तिवारी,श्याम लाल वर्मा,कैसी पन्त, क्रान्तिकारी मन्मथ गुप्त, बंगाल के कामरेड अशोक सेन और पिताजी के आंदोलनों के तमाम साथी,इस गांव और तराई को बसाने वाले लोगों की स्मृति से जुड़े दोनों पेड़ पक्के मकान की भेंट हो गए।बचपन की दुपहरी और शाम की सारी यादें फिर दफन हो गईं। आज बिजली न आने की वजह से घर में तजिक न पाने की वजह से इन पेड़ों की छांव में लगता है कि बचपन लौट आया है। पड़ोस के दो बच्चे साथ हैं जिनके जरिये फिर बचपन की यात्रा में वापसी हो गयी। रोहित और दिशा इनके नाम हैं।

डेटलाइन कोलकाता चौबीस

प्रवास वृत्तांत- मजदूर बस्ती के एक बेरोजगार कलाकार की ट्रेन से कटकर मौत,एक प्रेमकथा का दुःखद अंत पलाश विश्वास बंगाल में 35 साल के वाम शासन में आज़ाद भारत की उद्योग विरोधी शहरीकरण के कारपोरेटपरस्त मुक्तबाजारी अर्थ व्यवस्था में 56 हजार कल कारखाने बन्द हो गए। ममता बनर्जी के परिवर्तन आंदोलन और वाम तख्ता पलट का यह सबसे बड़ा मुद्दा था। विडम्बना यह है कि तीसरी बार निरंकुश मुख्यमंत्रित्व के ममता बनर्जी के राजकाज में शहरीकरण और निजीकरण का यह सिलसिला तेज हुआ और कोलकाता और हावड़ा के तमाम कलकारखानों की जमीन पर बहुमंजिली आवासीय कालोनियां और बाजारों की रौनक है,जहां ब्रिटिश हुक़ूमत के दो सौ साल के औद्योगिकीकरण के कारण बंगाल में आ बसे भारत भर के मजदूरों की बस्तियां गरीबी,बेरोज़गारी और बेदखली की शिकार हैं। बांग्ला के मशहूर कथाकारों समरेश बसु और माणिक बन्दोपध्याय का कथा संसार इसे मेहनतकश तबके का जीवन संघर्ष और प्रवास वृत्तांत है। हाल में हमारे लिक्खाड़ मित्र H L Dusadh Dusadh जो ऐसे ही एक मजदूर बस्ती से उठकर देश के अनूठे लेखक बन गए हैं,ने इन बस्तियों पर लिखा है। उनका जीवन संघर्ष भी इन दलित बस्तियों की आत्मकथा है,जो उन्होंने लिखी नहीं है। मैंने उनसे लिखने को कहा है। भारतीय समाज मुगल साम्राज्य तक जिस मनुस्मृति शासन की कैद रहा है,उससे मुक्ति का संघर्ष अंग्रेजी राज में हुए औद्योगिकीकरण से बदले उत्पादन संघर्ष से ही शुरू हुआ,जो बंगाल के सूफी बाउल फकीर मतुआ दलित नवजागरण, महात्मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, अयंकाली,अम्बेडकर और पेरियार के आंदोलनों से तेज़ हुआ। भारत विभाजन के फलस्वरूप जनसंख्या स्थानांतरण के जरिये मनुस्मृति समर्थकों ने देश की जनसंख्या विन्यास को सिरे से बदलकर दलित नवजागरण की विरासत को खत्म करके अम्बेडकर मिशन,लिंगायत मतुआ आंदोलन और आदिवासी भूगोल का भगवाकर्ण को तोड़ डाला और जाति व्यवस्था तोड़ रहे औद्योगिकीकरण की जगह जनसंख्या की राजनीति के तहत अस्मिताओं के युद्ध में जाति को इतिहास के अमित शिला लेख में तब्दील कर दिया। बंगाल, मद्रास और बम्बई अंग्रेजी हुकूमत के दौरान औद्योगिकीकरण के केंद्र थे। देशभर के दलित, पिछड़े लोग सिर्फ रोजगार की तलाश में ही नहीं बल्कि गांव में सवर्णों की बंधुआ मजदूरी, अस्पृश्यता और नरसंहार से बचने के लिए इन्हें अपना शरणस्थल बना लिया था। ये मजदूर बस्तियां देश की ऐसी दलित बस्तियां थीं, जो सामंती अत्याचार और उत्पीड़न से मुक्त थीं। औद्योगिकीकरण के अवसान के बाद भी मध्य बिहार जैसे नरसंहारी इलाकों से सिर्फ जान बचाने के लिए इन महानगरों की मजदूर बस्तियों की भीड़ बढ़ती रही,जिसमें बड़ी संख्या में भारत विभजन के शिकार बंगाली विस्थापित और देश के आदिवासी भूगोल में बेदखली और विस्थापन के शिकार लोग बड़ी संख्या में शामिल हो गए। कोरोना इन बस्तियों के सफाये का हथियार हो गया। कोलकाता,मुंबई, चेन्नई के अलावा देश के सभी बड़े छोटे शहरों की नई जनसंख्या का विन्यास इन्हीं उखड़े हुए सतह के लोगों की बसासत से बना है। कोलकाता के सारे उपनगर इसीतरह बने झाने शहरीकरण और बाजारीकरण की सुनामी में बाकी देश की मजदूर बसत्यों और आदिवासी गांवों की तरह ये दलित पिछड़े भी उखाड़े जा रहे हैं। हम कोलकाता में 27 साल तक इन्ही लोगों के साथ और इन्ही के बीच रहे भद्रलोक बिरादरी से घिरे हुए। हम सोदपुर के जिस गोस्टो कानन मजदूर बस्ती में रहे हैं,वहां से एक प्रेमकथा के दुःखद अंत की कथा आज हम तक पहुंची। कोरोनाकाल में बेरोजगार एक कलाकार दम्पति की प्रेमकथा का दुःखद अंत बाजार से लौटते हुए पति के ट्रेन से कट जाने से हो गयी। उसका नाम है सुमित। उसकी पत्नी मुहल्ले की ही लड़की है,जिसने 14 साल की उम्र में उसके साथ भागकर शादी कर ली थी और दोनों पति पत्नी पिछले 10- 12 साल से कोलकाता और आस पड़ोस के राज्यों में स्टेज शो के जरिये नाच गा कर गुजर बसर करते थे। कोरोना नई जिसे बन्द कर दिया। दोनों को बड़ा होते हुए हमने अपनी आंखों के सामने देखा। हम उनके प्यार को भूल नहीं पाए। इन तमाम लोगों की रोजमर्रे की ज़िंदगी,बीमारी , आपदा,शोक में घर, अड़पटल से लेकर श्मशानघाट तक सविताजी और हम शामिल थे। वे हमारी तरह वैचारिक नहीं,लेकिन हमसे कहीं ज्यादा मनुष्य हैं। यही प्रेम है। वे दोनों बेदखली की लड़ाई की अगुवाई भी करते थे। यह मजदूर बस्ती हमारे किराये के घर की खिड़की से खुलती थी। सुबह होते ही उन सभी से मुलाकात हो जाती थी जो कभी सोदपुर के मशहूर काँचकल में मजदूर थे। दफ्तर निकलते वक्त या देर रात या सुबह तड़के घर लौटते वक्त हिंदी स्कूल के आसपास किसी न किसी से बातचीत ही जाती थी। उन्हें हमारी फिक्र थी। है। घर घर से होली के गुजिये और छठ के ठेकुए आ जाते थे। वे सभी हमारे परिवार में शामिल थे,जिनमे सोदपुर के तमाम सब्जीवाले, मछलिवाले भी हुआ करते थे या फिर हॉकर।ये सभी कोलकाता के सभी उपनगरों के बन्द कल करखानों के बेरोजगार मजदूर थे। अमित और सुमित दो भाई थे।सुमित छोटा भाई। उनके दादा जी हरियाणा के यादव थे। पिता किशोर भी मजदूर थे। उनकी मां लीला पूर्वी बंगाल की विस्थापित थी। इनमें ब्राह्मण और ठाकुर जैसे सवर्ण यूपी,बिहार के लोग भी थे लेकिन पीढ़ियों से साथ रहते रहते उनके बीच जाति गायब सी हो गयी थी। औद्योगिकरण से शहरीकरण का यह मुक्तबाजार हर मायने में मनुस्मृति राज है। करीब 15 साल पहले भी हक हकूक की वर्गचेतना से लैस थी ये तमाम मजदूर बस्तियां मनुस्मृति से मुक्त। कल कारखाने बन्द होने से पॉश कालोनियों से घिरकर फिर ये लोग मनुस्मृति के शिकंजे में है और इसी वजह से बंगाल भी बाकी देश की तरह गोबर पट्टी में तेज़ी से शामिल होता जा रहा है और वहां वाम का कोई नामलेवा बचा नहीं। लगता नहीं कि कोलकाता ज़िंदा भी है। सुमित की पत्नी बहुत प्यारी बच्ची है। अब शायद 25-26 की हो गयी होगी।वह भी अपनी सास की तरह बंगाली थी। स्टेज शो करके घर लौटने पर सविता जी से जरूर मिलने आती थी। हमारी उस बिटिया से मिलने की अब कोई संभावना हालांकि नहीं हैं लेकिन बहुत बेचैन है कि कभी मुलाकात हो गयी तो उसके दुःख का सामना कैसे हम करेंगे। बूढ़े होने की एक मजबूरी यह भी है कि हम बच्चों की तरह आंसू भी बहा नहीं सकते। शव वाहिनी गंगा मैया की गोद में इन लावारिश बस्तियों की लाशें भी शामिल हैं,यह भी सनद रहे। सौ करोड़ या दो सौ करोड़ मुफ्त टीकों या बूस्टर खुराक से इन बेदखल होती मजदूर बस्तियों की लाइलाज महामारियों का इलाज होगा? हमारे पास अपने मोहल्ले और मजदूर बस्ती या उन लोगों की तस्वीरें शायद हों या न हों, खोजना मुश्किल है।आपको माहौल का अंदाज़ा हो,इसलिए दुसाध जी की खींची तस्वीरों का साभार इस्तेमाल कर रहे हैं। मित्रों, इस कथा का प्रसार जरूर करें । मोक्ष नहीं मिलता लेकिन जाति उन्मूलन और प्रवास के बारे में कुछ लोग नए सिरे से सोचें तो इस निजी शोक का कोई सामाजिक मायने भी शायद निकले।

डेटलाइन तेईस

भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में पलाश विश्वास एक 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। देश के विभाजन की कीमत पर यह आजादी मिली। रातोंरात अखंड भारत दो हिस्सों में बंट गया। भारी खून खराबा, दंगा, लूटपाट, आगजनी, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के मध्य अखंड भारत के पूर्वी और पश्चिम हिस्से को पाकिस्तान बना दिया गया और वहां के लोग अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए। एक निरंतर चलने वाले युद्ध और गृहयुद्ध शुरू हो गया। जिस देश में हजारों साल से विविधता और बहुलता का लोकतंत्र था, साझा चूल्हा का चलन था,किसी को किसी से बैर नहीं था, अलग अलग धर्म जाति, नस्ल के लोग एक साथ अमन चैन से रहते थे, वहां निरंतर जलने वाली हिंसा और नफरी की आग सुलगा दी गई। करोड़ों लोग विभाजन की त्रासदी के शिकार हुए। भारत विभाजन के दौरान हुई हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे, हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 15 लाख से 20 लाख तक भी हो सकती है। इस दौरान लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे। जो लोग जिंदा बच गए,इस देश में वे आज भी भारत विभाजन का दंश झेल रहे हैं। कटे फटे उन लोगों की संतानें अब भी विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। उनकी नागरिकता संदिग्ध है।वे घुसपैठियों के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं आज भी।नागरिक और मानवाधिकार, इतिहास, भूगोल, विरासत, मातृभाषा, संस्कृति, पहचान से वंचित हो गए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी विभाजन का दर्द झेल रहे हैं। करोड़ों दूसरे लोगों की तरह ऋत्विक घटक ने भी भारत विभाजन के फलस्वरूप भारत में शरण ली और शरणार्थी होने का यथार्थ को भोगा। यूं तो पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान से आए कुलीन, सम्पन्न तबके के अनेक लोग बंगाल और बाकी देश में राजनीति, अर्थ व्यवस्था, साहित्य, कला, फिल्म आदि क्षेत्रों में अग्रणी बन गए और विभाजन की त्रासदी का कुलीन,संपन्न तबके पर कोई असर नहीं हुआ। ऐसा पाकिस्तान में भी हुआ।भारत से जो लोग पाकिस्तान चले गए,उनमें जो संपन्न और कुलीन थे, उनकी हैसियत में खास फर्क नहीं पड़ा। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में अभिजात तबकों पर विभाजन का असर एक सदमा जैसा होकर गुजर गया। ऋत्विक घटक के परिवार की पृष्ठभूमि कुलीन थी। उनके परिवार के लोग आदरणीय हैं और विविध क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन ऋत्विक ने एक आम शरणार्थी की तरह अपनी तमाम फिल्मों में विभाजन की त्रासदी को निरंतर जिया, जैसे विभाजनपीडित हर शरणार्थी पीढ़ी दर पीढ़ी जीता है। भारत विभाजन पर ऋत्विक घटक की तीन फिल्में विश्वविख्यात हैं। शरणार्थी स्त्रियों ने विभाजन के कारण बेपटरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने के लिया, परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर जो ऐतिहासिक लड़ाई वक्त की चुनौतियों के मुकाबले लगातार अपना वजूद मिटाकर लड़ती रही, उनकी जिजीविषा पर ऋत्विक की मास्टरपीस फिल्म है मेघे ढाका तारा। भारत विभाजन के सदमे और सामूहिक पीड़ा की पृष्ठभूमि में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन यानि भारतीय जन नाट्य संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बिखराव पर उनकी फिल्म है कोमल गांधार। भारत आए शरणार्थियों के साथ जाति के आधार पर जो भेदभाव किया गया, उसपर भारतीय साहित्य मौन है। क्योंकि वंचित तबकों के लोग अपढ़ अधपढ़ थे और वे अपनी आपबीती कहीं दर्ज नहीं कर सके।भारत विभाजन का पूरा आख्यान , पूरा narrative शासक वर्ग का रचा इतिहास है,जिसमें विभाजन पीड़ितों का पक्ष किसी ने नहीं रखा। शरणार्थी शिविरों और पुनर्वास योजनाओं में जाति के आधार पर भेदभाव पर केंद्रित है ऋत्विक की भारत विभाजन पर बनाई तीसरी फिल्म सुवर्णरेखा। इन तीन फिल्मों की बहुत भारी कीमत उन्हें आजीवन चुकाते रहना पड़ा। वे कम्युनिस्ट पार्टी से निकाले गए।बंगाल से बहिष्कृत कर दिए गए। ऋत्विक की फिल्मों की अंतर्वस्तु उनकी कथा की आम जिंदगी में रचा बसा लोक है। उनकी फिल्मों में लोक कोई सितम गीत नृत्य नहीं है,फ्रेम दर फ्रेम संरचना है।इसलिए उनकी सारी फिल्में बाकी भारतीय फिल्मकारों की फिल्मों से एकदम अलहदा हैं। दो ऋत्विक घटक और उनकी फिल्मों को समझने के लिए उनकी जड़ों को पहचानने और समझने की जरूरत है। उनकी जीवन दृष्टि और उनके सौंदर्यबोध की पृष्ठभूमि को समझे बिना बंगाल के सर्वव्यापी लोक और जनपदों की जीवनशैली और इस मेहनतकश मुश्किल जीवन यापन में रची बसी उनकी रचनात्मक प्रतिभा को समझना मुश्किल है।अपने उतार-चढ़ाव भरे करियर में उन्होंने भले ही कुछ एक फिल्में निर्देशित कीं, अनेक फिल्में आधी अधूरी छोड़ दी, अपनी ही रचना से उपजे गहरे असंतोष के कारण,लेकिन उनका काम भारतीय और वैश्विक सिनेमा की भाषा को नई दिशा देता है। वे न केवल बांग्ला फिल्मों में बल्कि सिनेमायी आधुनिकता में भी आधारभूत व्यक्तित्व हैं। उनकी रचनात्मकता आम जनमानस का दर्पण बना सिनेमा की भाषा में। व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिक आघात को उन्होंने जिस नवाचारी शैली के साथ जोड़ा, उसने पीढ़ियों के फिल्मकारों और दर्शकों को झकझोरा है। 1947 का भारत-विभाजन ऋत्विक घटक के जीवन और रचनात्मकता दोनों पर गहरी छाप छोड़ गया। ढाका में जन्मे ऋत्विक लाखों विस्थापितों की तरह बंगाल के बंटवारे के शिकार बने। जहां अधिकतर समकालीन फिल्मकारों ने विभाजन को या तो किनारे से छुआ या उसकी हिंसा तक ही सीमित रखा, वहीं ऋत्विक की फिल्में विभाजन के मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत घावों को केंद्र में रखती हैं। खुद उनका वजूद लहूलुहान रहा जीवनभर इस त्रासदी से आम विभाजनपीड़ितों की तरह। कोमल गांधार फिल्म में जन नाट्य संघ की एक नाट्यमंडली के पद्मा नदी के किनारे विभाजन की त्रासदी को अनुभव करने वाला दृश्य याद करें। ट्रेन का इंजन त shunting करते हुए ठीक पद्मा नदी के किनारे रुक जाती है।एक जबरदस्त झटके से जूम करता कैमरा क्लोज अप में जम हो जाता है। हृदय विदारक दृश्य है।कैमरा नायक नायिका के पीड़ित,दुखी चेहरों पर फोकस करता है।नायक नायिका की आंखों में एकमुश्त स्मृतियों और पीड़ाओं का समुंदर झोंकता हुआ उंगली के इशारे पर बेटे के इंतजार में खड़ी मां की छवि उकेरते हुए खाता है।वहीं खड़ी मन मेरा इंतजार करती थी। जो अब पाकिस्तान है। आपने भूस्खलन की त्रासदी देखी है? लोगों को जिंदा दफ्न होते देखा है? गांव जनपद को जमीन और पानी में,नदी और समुद्र में समाहित होते देखा है? हिमालय के लोग इस अभिज्ञता का जीवनभर सामना करते हैं ।हम इसे प्राकृतिक आपदा कहते हैं। मुर्शिदाबाद जिले के लालगोला इलाके मन पद्मा नदी को किनारे का जनजीवन लीलते हुए देखा है? इसे लोग प्राकृतिक आपदा कहते हैं। वजूद का खींचों में बिखरकर अनंत में समाहित होने और फिसलते रेत की तरह स्मृतियों के क्षरण को हम भारत विभाजन की राजनीतिक त्रासदी कह सकते है। इस त्रासदी के गहरे साए में कैमरे की भाषा के साथ ऋत्विक के सौंदर्यबोध के साथ बेबस पीड़ितों की पीड़ा, आर्तनाद और आक्रोश एकमुश्त अभिव्यक्त होती है। ऋत्विक की इस रचना प्रक्रिया को समझना हर किसी के बूते में नहीं है।फिल्मकारों, फिल्मविशेषज्ञों के लिए भी उनकी फिल्म समय सरोकार और मनुष्यता की प्रति सघन प्रतिबद्धता के साथ गंभीर चुनौती बन जाती है। मेघे ढाका तारा में टीबी मरीज बन गई नीता का अपने कामयाब संगीतकार भाई के सामने चरमोत्कर्ष के क्षण समूचे हिमालय की दहलती हुई जिजीविषा चीख दादा आमी बाँचते चाई.. इसी त्रासदी का ज्वालामुखी विस्फोट है,जो दर्शक के दिलोदिमाग की गूंज बनकर ठहर जाती है।प्रतिध्वनित होती रहती है। या रिफ्यूजी बस्ती में नीता के कमरे में छनछनाती तार तार चांदनी में नीता का उस प्रेमी से संवाद, जो अंततः उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेता है। कोमल गांधार में विवाह के दौरान गाय जाने वाले उच्चकित लोकगीत का विरोधाभासी द्वंद्व या सुवर्णरेखा की पतिता बन गई रिफ्यूजी बहन सीता के कमरे में ग्राहक बनकर उपस्थित हुए सगे नहीं का सदमा, यह सबकुछ सिनेमा की भाषा को सिरे से बदल कर रख देता है। बौद्धिक समुदाय जिसे मेलोड्रामा कहता है, दरअसल वह ऋत्विक का अपना लोकसंसार है,जो उनकी फिल्म की परत दर परत झीनी झीनी बिनी चदरिया है। ऋत्विक घटक का जन्म पूर्वी बंगाल में ढाका में हुआ था (अब बांग्लादेश)। वे और उनका परिवार पश्चिम बंगाल में कलकत्ता में स्थानांतरित हो गये (अब कोलकाता), जिसके तुरंत बाद पूर्वी बंगाल से लाखों शरणार्थियों का इस शहर में आगमन शुरू हो गया, वे लोग विनाशकारी 1943 के बंगाल के अकाल और 1947 में बंगाल के विभाजन के कारण वहां से पलायन करने लगे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध और आजाद हिंद फौज के महासंग्राम के मद्देनजर और खासकर ,1946 के डायरेक्ट एक्शन के दौरान बंगाल के पढ़े लिखे भद्रलोक बंगाली को विभाजन की नियति का अनुभव हो गया। भारत का विभाजन उनके लिए नियति का अभिसार था।लेकिन पूर्वी बंगाल के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में जो अपढ़, अधपढ़ आम लोग थे, उन्हें बदलते हुए वैश्विक प्रदर्श, ब्रिटिश हुकूमत के डूबते हुए सूरज और सत्ता शतरंज के दांवपेंच का कोई अंदाजा नहीं था।सम्पन्न वर्ग की जड़ें कोलकाता और पश्चिम बंगाल में गहरी पैठी थी। नौकरी पेशा और जमीनदार श्रेणी को विभाजन से प्रयाप्त पहले पश्चिम बंगाल में सुरक्षित स्थानांतरित होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पश्चिम पाकिस्तान में भी बहुत हद तक ऐसा ही हुआ। इसके विपरीत भारत विभाजन होने के बावजूद आम लोग हर कीमत पर अपना गांव खेत जनपद को छोड़ने को तैयार नहीं थे।सरहद के आरपार हुए दंगों में वे छिन्नमूल बनकर रह गए। ऋत्विक घटक भी छिन्नमूल हो गए और आजीवन छिन्नमूल होकर जिए।उनकी फिल्में छिन्नमूल मनुष्यता की कथा व्यथा और जिजीविषा, विस्थापन का यथार्थ और पुनर्वास की लड़ाई का महाकाव्यिक आख्यान है। शरणार्थी जीवन का उनका यह अनुभव उनके काम में बखूबी नज़र आता है, जिसने सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन के लिए एक अधिभावी रूपक का काम किया और उनके बाद के रचनात्मक कार्यों को एक सूत्र में पिरोया. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध ने भी, जिसके कारण और अधिक शरणार्थी भारत आये, उनके कार्यों को समान रूप से प्रभावित किया। पूर्वी बंगाल के पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने और 26 मार्च 1971 को स्वतंत्र बांग्लादेश बन जाने के बावजूद विभाजनपीड़ितों के लिए भारत विभाजन की विभीषिका निरंतर जारी है। इस त्रासदी,पीड़ा और जीवनसंघर्ष को ऋत्विक ने ही सिनेमा की भाषा में प्रस्तुत किया। समूचा पूर्वी बंगाल बंगाल की खाड़ी के समुद्री तूफानों के दायरे में हैं। समुंदर में गहरे धंसे पूर्वी बंगाल की सारी जमीन असंख्य नदियों,झीलों में बंटी हुई है। यातायात जलपथ से होता रहा है। पेयजल नदियों और झील का पानी। नदी से जल भरने के गीतों की दर्जनों शैलियां हैं। नदी में नाव,ज्वार भाटा का भटियाली संगीत सर्वव्यापी है। यह मंगल काव्यों की जमीन है,जहां हिन्दू मुसलमान साझा चूल्हे के वारिश सदियों से सारे तीज त्यौहार मनाते रहे हैं। हमलावरों से सुरक्षित इस भूगोल में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा आम जनजीवन पर जमींदारों के अमानवीय अत्याचार और कठोर पुरोहित तंत्र को छोड़कर भारत विभाजन से पहले कोई राजनीतिक भूचाल का इतिहास नहीं है।यहीं के जनपदों में गीत नृत्य गीतिका जीवन यौन का अनिवार्य अंग है। पूर्वी बंगाल (आज के पश्चिम बंगाल के क्षेत्र) का भूगोल, मौसम और जलवायु मुख्य रूप से इसकी विविध भौगोलिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिसमें उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक शामिल है। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित होती है। मौसम में बहुत गर्मी और आर्द्रता (गर्मी में), भारी बारिश (मानसून के दौरान) और हल्की ठंड (सर्दियों में) होती है। भूगोल, जलवायु और मौसम की विविधता, बहुलता और विचित्रता के कारण पूर्वी बंगाल का लोक संसार इंद्रधनुषी है। बाउल, पीर, साधु, संत,फकीर का सामाजिक नेतृत्व ने हमेशा साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद की चुके हिलाने के जनविद्रोह किसान, आदिवासी विद्रोह का सिलसिला बनाए रखा। भारत में पहला बहुजन आंदोलन जल जंगल जमीन हक्की का मतुआ आंदोलन की दो सौ साल की निरंतरता की हकीकत और मनुस्मृति राज, विधान और अनुशासन के खिलाफ अस्पृश्यता मुक्ति का नमोशुद्र आंदोलन इसी भूगोल, जलवायु और मौसम का सच है, जिसका सबसे ईमानदारी से सामना लोक की सघन ऊर्जा के साथ ऋत्विक घटक ने निरंतर किया है। जिस ढाका शहर में ऋत्विक का जन्म हुआ, वह हमेशा कृषि,कारोबार और मेहनतकश तबकों का केंद्र रहा है। कोलकाता इस तुलना में अतिशय भद्रलोक है। चैन तरफ जनपदों से घिरे होने के बावजूद कोलकाता कोई जनपद नहीं है।जबकि मुगल साम्राज्य के दौरान दौरान ढाका को 17वीं शताब्दी में जहाँगीर नगर के नाम से भी जाना जाता था, यह न सिर्फ प्रादेशिक राजधानी हुआ करती थी बल्कि यहाँ पर निर्मित होने वाले मलमल के व्यापार में इस शहर का पूरी दुनिया में दबदबा था। आधुनिक ढाका का निर्माण एवं विकास ब्रिटिश शासन के दौरान उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और जल्द ही यह कोलकाता के बाद पूरे बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गया। आज भी ढाका कपड़ा उद्योग का वैश्विक केंद्र है। ढाका जनपदों से घिरा हुआ स्वयं एक जनपद है।हर जनपद की बोली अलग है।रीति रिवाज,जीवनशैली अलग है,लोक और जीवन यौन अलग अलग है। लेकिन हिलसा मछली का स्वाद जैसा कुछ,भटियाली का संगीत जैसा कुछ बहुत कुछ एकदम साझा चूल्हा है। ऋत्विक इस साझा चूल्हा का रसोइया है। तीन भारत विभाजन की त्रासदी पर अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के उत्कर्ष समय में ऋत्विक घटक ने अपनी विभाजन त्रयी फिल्में पार्टीशन ट्रायलॉजी, एक के बाद एक तीन फिल्में बनाईं। वे रंगकर्मी थे। विचारधारा के प्रतिबद्ध थे। वे 1950 में पूर्वी बंगाल से छिन्नमूल होकर लौटने के बाद कहानियां और नाटक लिखते थे।अच्छे अभिनेता भी थे। नाटकों का इस्तेमाल उन्होंने सतर्कता पूर्वक किया राजनीतिक हथियार के रूप में। फिल्म को उन्होंने सबसे शक्तिशाली माध्यम समझकर इसको भी छिन्नमूल मनुष्यता के हक में राजनीतिक हथियार बतौर बनाना शुरू किया।बिजन भट्टाचार्य और वे दोनों जन नाट्य संघ में सक्रिय थे। भारत विभाजन की त्रासदी करोड़ों विभाजन पीड़ितों की तरह बेइंतहा दर्द और बेचैनी के साथ उनके खून, दिल और दिमाग में आजीवन खौलती रही ज्वालामुखी के लव की तरह। उनका जन्म जरूर ढाका में हुआ,लेकिन उनका घर राजशाही जिले में था। राजशाही पूर्वी बंगाल में शिक्षा और संस्कृति का गढ़ रहा है। जनपदों में अमन चैन के साझा चूल्हे के इस तरह हिंसा,नफरत और मारकाट के दावानल में बदल जाने के भयंकर वास्तव को वे कभी स्वीकार नहीं कर पाए।यह विघटन क्यों हुआ? किसने सामाजिक ताना बाना को क्यों और कैसे तहस नहस कर दिया, करोड़ों विभाजन पीड़ितों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुलग रहे इस सवाल का जवाब वे ढूंढते रहे। राजनीतिक हथियार की तरह गहन संवेदना की गहराइयों में पैठकर अपनी फिल्मों में उनकी तफ्तीश जारी रही। 1960 में उन्होंने मेघे ढाका तारा बनाई। 1961 में बनाई कोमल गांधार और अगले ही साल सुवर्णरेखा। यह फिल्म बनी 1962 में लेकिन तीन साल बाद रिलीज़ हो सकी। क्यों? यह सवाल वाजिब है क्योंकि मेघे ढाका तारा को लेकर कोई विवाद नहीं था। शरणार्थी बेटी का संघर्ष बंगाल, पंजाब और बाकी देश का सच था। विस्थापन, युद्ध, गृहयुद्ध , दंगा फसाद की शिकार होती हैं स्त्रियां सबसे ज्यादा, लेकिन अपने लिए,परिवार के लिए और समाज व राष्ट्र के लिए मुक्तिमार्ग का निर्माण भी करती है स्त्री। इस सच को, वैश्विक वास्तव को अस्वीकार करने का उपाय नहीं था। नीता की जिजीविषा इस फिल्म का चरमोत्कर्ष और सार दोनों है। सुगबुगाहट शुरू ही कोमल गांधार के सच का सामना करने से राजनीतिक, वर्गीय, जातिगत वर्चस्ववाद के सीरे से इनकार के साथ। तीनों फिल्मों में विभाजन विभीषिका की तीव्रतम अभिव्यक्ति ही है।तीनों में दर्द अलगाव,उपेक्षा और अपमान का घनघोर झंझावात है, जो चक्रवात की तरह वजूद की चुके हिलाकर रख देता है। तीनों फिल्म का सच है छिन्नमूल मनुष्यता, जो मनुस्मृति राज में वंचितों के सारे अधिकारों से वंचित होने की समग्र यातना, उत्पीड़न और विध्वंस, विघटन, इतिहास,भूगोल, मातृभाषा,विरासत, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक पहचान और शक्ति से जबरन बेदखल करने का बेइंतहा जनसंहार का पर्याय है। कोमल गांधार में रेलवे लाइन और नदी को योग वियोग के प्रतीक के रूप में सघन सिनेमाई प्रयोग के तहत जलजला में तब्दील करने के साथ पूर्वी बंगाल के ठेठ लोक संसार और जनपदों की विरासत की प्रस्तुति है तो जन नाट्य संघ में पार्टी की राजनीतिक दख़लदारी का दो नाट्य गुटों के विवाद कोलाहल के जरिए खुलासा भी है। जन नाट्य आंदोलन में तब हर विधा, हर माध्यम, हर कला के सर्वश्रेष्ठ लोग थे,जिन्हें किनारा कर दिया जा रहा था। कोमल गांधार इस राजनीतिक दुष्कृत्य का सिनेमाई प्रतिरोध है। कुलीन वर्चस्व को यह कतई मंजूर न हुआ। विभाजन पर बनी इन तीनों फिल्मों में विजन भट्टाचार्य की खास भूमिकाएं थीं। ऋत्विक ने खुद अभिनय किया। महाश्वेता देवी के पति और नवारुण भट्टाचार्य के पिता जन नाट्य संघ के नाटक नवान्न के बिजन भट्टाचार्य भी इस वर्चस्ववाद के शिकार हुए। दूसरे लोग भी होते रहे।इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता यहां नहीं है।लेकिन कोमल गांधार बनने से पहले ही जन नाट्य संघ का बिखराव और टूटन सत्ता की राजनीति में विचारधारा के समहित होने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो गया था।ऋत्विक और विजन दोनों वैचारिक रूप से इस्पात की तरह मजबूत थे। कोमल गांधार से उनके बहिष्कार की शुरुआत हुई। फिर सुवर्णरेखा में तो ऋत्विक ने इस बहिष्कार के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध घोषणा कर दी मनुस्मृति वर्चस्ववाद के विरुद्ध, कुलीनत्व के विरुद्ध और ब्राह्मणवाद की अंतरण जातिव्यवस्था के विरुद्ध। जाति व्यवस्था और कुलीन तंत्र को बनाए रखने के लिए ही भारत का विभाजन हुआ, शायद सुवर्णरेखा बनाते वक्त ऋत्विक इस सच को जान चुके थे।सन्यासी विद्रोह , मतु आ नमोशुद्र आंदोलन, आदिवासी किसान विद्रोह और आंदोलन, हरिचांद गुरु चांद ठाकुर, ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, जोगेंद्र नाथ मंडल के नेतृत्व में आदिवासियों मुसलमानों दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की साझा राजनीतिक शक्ति, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से ब्राह्मणवाद के अस्तित्व और मनुस्मृति राज को जो गंभीर खतरा पैदा हो गया था, उसे विखंडित करने के लिए भारत विभाजन की विभीषिका रचा गया। सुवर्ण रेखा में वर्चस्ववाद के मूल जाति व्यवस्था पर सबसे ताकतवर प्रहार किया सुवर्ण रेखा में ऋत्विक घटक ने। शरणार्थी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंप और पुनर्वास कालोनियों में हुए भेदभाव का चरमोत्कर्ष छिन्नमूल स्त्री सीता की आत्महत्या है। इस आत्मध्वंस के बिना जाती वर्चस्व के सम्मुख अपने ईश्वर, अपने मतवाले मदहोश सगे भाई से अपना सम्मान, अपनी अस्मिता को बचाने का कोई रास्ता नहीं है। आक्रोश में बहन का गला काटकर उसे बचाने से भी तीव्र है यह अभिव्यक्ति। छिन्नमूल भाई बहन ईश्वर और सीता को कोलकाता की रिफ्यूजी कॉलोनी में पनाह मिली थी। दोनों भाई बहन कुलीन ब्राह्मण थे। ईश्वर ने बालिका छोटी बहन सीता के साथ एक दलित बालक अभिराम का पालन पोषण कर रहे थे। इसी रिफ्यूजी कॉलोनी में अति दलित बागदी बहू को जमींदार के लोग उठा ले जाते हैं जिसे कॉलोनी से बहिष्कृत किया जाता है। जाति वर्चस्व के कारण किसी की हिम्मत नहीं होती विरोध करने की। फिर सुवर्ण रेखा के तट पर सिंहभूम के घाटशिला के आदिवासी भूगोल में प्राकृतिक परिवेश में अति सुंदरी बहन सीता और अभिराम को लेकर नौकरी करने चले जाते हैं। जाति वर्चस्व के सच का पर्दाफाश करने के लिए ऋत्विक ने जेल जंगल जमीन के हक हकूक की हजारों साल की विरासत जमीन आदिवासी भूगोल को ही क्यों चुना? क्योंकि यही तो मूल निवास है वंचितों का,जिसे वर्गीय जाति आधारित कुलीन वर्चस्व के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचा ने अपने जनसंहार अश्वमेध से तहस बहस कर दिया और यह सिलसिला आज भी जारी है। साथ साथ पले बढ़े सीता और अभिराम के प्रेम से कुलीन ब्राह्मण ईश्वर के उदारतावाद का अंत हो गया।रातोंरात उसने अन्यत्र सीता का विवाह तय कर दिया और सीता अभिराम के साथ कोलकाता भाग गया। कोलकाता में मोबलिंचिंग में अभिराम मारा गया तो नए सिरे से छिन्नमूल हो गई सीता के लिए नाचने गाने की आजीविका अपनाने को बाध्य होना पड़ा और हुआ यह कि जो पहला ग्राहक के सामने उसे पेश किया गया, वह पिता समान उसका बड़ा भाई था जिसे इतना नशा हो गया था कि पता ही नहीं चला कि उसके सामने उसकी सगी बहन है। सीता ईश्वर की हत्या नहीं कर सकती थी तो क्या करती? यह भारत विभाजन की कुल कथा है। जाति वर्चस्व की विभीषिका है विभागों की त्रासदी, यही ऋत्विक घटक की फिल्म सुवर्णरेखा है। रिफ्यूजी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंपों , पुनर्वास कालोनियों , पहाड़ों, मरुस्थल, टाइगर फॉरेस्ट समेत घने जंगलों में बंगाल से बाहर विभाजन पीड़ित जिन करोड़ों लोगों को बिखेर दिया गया, वे पूर्वी बंगाल में आदिवासियों, मुसलमानों,दलितों और पिछड़ों की सम्मिलित फौज थी,जिसने मनुस्मृति राज के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था पलाशी के युद्ध के समय से, उन्हें तहस नहस करने की कथा ऋत्विक ने चूआड़ विद्रोह की जमीन पर कहने का विकल्प चुना। क्या यह सिर्फ संजोग है? यह क्या संजोग मात्र है कि 99 प्रतिशत पूर्वी बंगाल के सवर्ण विस्थापित पश्चिम बंगाल में न सिर्फ व्यवस्थित हो गए, जीवन के हर क्षेत्र में वे आगे हैं? दूसरी ओर 99 प्रतिशत दलित और पिछड़े बंगाल से बाहर 22 राज्यों में बिखेर दिए गए बंगाल के मौसम,जलवायु,जमीन की तरह मातृभाषा,इतिहास,भूगोल, संस्कृति ,विरासत और नागरिकता से भी बेदखल। अंडमान निकोबार और दंडकारण्य से लेकर उत्तर भारत के टाइगर प्रोजेक्ट में जिन्हें बाघ, मगरमच्छ और समुद्री तूफान का चारा बना दिया गया। नई दिल्ली,मुंबई और देश के बड़े शहरों में जहां बंगाली विस्थापितों की पुनर्वास कालोनियों का निर्माण हुआ,वहां दलित और पिछड़े कितने हैं? सिंध से आए सारे सम्पन्न स्वर्ण शरणार्थियों को बड़े शहरों में पुनर्वास दिया गया। पश्चिम पाकिस्तान से आए पंजाबी सवर्ण हिंदुओं और कुलीन सिखों को पंजाब, नई दिल्ली में जगह मिल गई लेकिन दिल्ली में ही दलित पंजाबियों की बस्तियों की कहानी और हैं वैसी ही जैसी पश्चिम बंगाल की हजारों जबर दखल कॉलोनियों में फंसे रह गए दलित पिछड़े पूर्वी बंगाल के विस्थापित। राय सिखों, मजहबी सिखों को तो पूर्वी बंगाल के दलित शरणार्थियों के साथ टाइगर प्रोजेक्ट में ही बाघ का चारा बना दिया गया।सरहद के उस पर पूर्वी पाकिस्तान जा पहुंचे बिहारी यानी उर्दू भाषी मुसलमानों और पश्चिम पाकिस्तान चले गए मुहाजिरों का क्या हुआ। सरहद के आर पार भारत विभाजन के कारण बह निकली खून की नदियां आज भी जिंदा हैं।निरंतर जल प्रवाह के साथ बह रहा है वंचितों का खून। मॉब लांचिंग तो अब सांस्कृतिक राजनीतिक महोत्सव है साहित्य उत्सव की तरह कुलीन। विभाजन की इस जातिगत,वर्चस्ववादी कथा को खाने का दुस्साहस ऋत्विक ने किया और इसी तरह विभाजन की त्रासदी को जिया। बांग्लादेश बनने के बाद वहां जाकर युक्ति तर्क गप्पों या तितास एकटी नदी जैसी फिल्म बनाई। कितना दर्द, कितना विद्रोह और कितने ज्वालामुखी का समाहार है ऋत्विक। स्त्री अस्मिता इस वर्गीय जातिगत वर्चस्ववाद के विरुद्ध इन तीनों फिल्मों में ऋत्विक का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार और सिनेमाई चमत्कार है। मेघे ढाका तारा की नीता का चीत्कार, कोमल गांधार की अनुसुइया की दृढ़ता, सीता का आत्मध्वंस और बाग़दी बहू के भिड़ाकर से तार तार हो गया वर्चस्ववादी कुलीनत्व। यही ऋत्विक घटक का अपराध है। इसकी सजा को उन्होंने आजीवन भोगा। इन फिल्मों के पात्र परिचय और कलात्मक पक्ष को हम इस लेख में छू नहीं सके।इस पर लगातार चर्चा होती रही। जिसकी कभी चर्चा नहीं हो सकी, या चर्चा नहीं होने दी, हमने सिर्फ वही लिखा है। इति

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19 अगस्त 2020 को लिखा था, लेकिन इस पर कोई संवाद हुआ नहीं है। आपकी राय क्या है? हिंदी कविता निष्प्राण देह बनकर रह गई है। पलाश विश्वास कितनी ही सुंदर हो, कितने ही जेवरात सजे हों, सेज फूलों से लबालब लदी फन्दी हो, अगरबत्ती और चंदन की खुशबू हो, लेकिन उसकी सड़ांध सही नहीं जाती। हिंदी कविता में तत्सम शब्दों का,विशुद्धता का, भाषिक दक्षता का, बाजार की ब्रान्डिंग का, अमेज़न की मार्केटिंग का, इंटरनेट आधारित अंतर्राष्ट्रीयता का, राष्ट्र,धर्म ,जाति, वर्ग, कुलीनता और अस्पृश्यता का,महानगरों का वर्चस्व इतना प्रलयंकर है कि केदार आपदा की तरह सारे गांव, शिखर,घाटियां, पगडंडियां और आबादियां सिरे से गायब हो गयी है। हिंदी कविता सिरे से महानगरीय हो गयी है। हिंदी कविता सत्ता की राजनीति की दासी हो गयी है। हिंदी कविता पार्टियां के रंगों से सराबोर है। हिंदी कविता इतिहास और परम्परा से कटी है। हिंदी कविता चरित्र से विदेशी हो गयी है और विदेशी कविताओं के अनुवाद में तब्दील हो गयी है। हिंदी कविता के मुहावरे मर गए हैं। हिंदी कविता में भदेस और लोक से घृणा का स्थायी भाव बन गया है। कमोबेश यह दुर्गति सभी भारतीय भाषाओं की कविता की है। हिंदी कवि चरित्र से कायर शुतुरमुर्ग बन गए हैं जो कोरोना काल में अपने अपने दड़बे से चैबीसों घण्टे लाइव जरूर हैं, लेकिन उनमें समाज और देश को बदलने के ख्वाब जनमानस में पैदा कर देने की कुव्वत नहीं है और न ही ऐसा करने का उनका कोई इरादा है। बड़े,अंतरराष्ट्रीय,पुरस्कृत और प्रतिष्ठित कवियों ने भारतीय भाषाओं की कविता की यह दुर्गति कर दी है। उन्होंने माफिया की तरह गिरोह बना लिए हैं और उनके किले इतने दुर्जेय हैं कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। नई कविता की भ्रूणहत्या करने वाले नवधनाढ्य सामन्त बन गए हैं वे। नये कवि उन्ही का अनुकरण करते हैं और लोक की उन्हें कोई परवाह नही है और महानगरों से बाहर गंदगी, सड़ांध, बेरोज़गारी, भुखमरी, अस्पृश्यता से जद्दोजहद करती ज़िंदगी की धड़कनों से उनका कोई नाता नहीं है। कविता में सबकुछ बेजान शब्द बनकर रह जाता है। उसमें रूप रस गन्ध के जरिये पाठक के इंद्रियों को स्पर्श करने की कोई कारगर कोशिश नहीं होती। गांव और किसान से लेकर हरिजन टोले की बात होती है लेकिन मिट्टी कीचड़ नहीं,सीमेंट के जंगल में कैद बौद्धिकता के तिलिस्म में पाठक के लापता हो जाने के अलावा उसका कोई दूसरा प्रभाव नहीं होता। कविता न दिलों तक पहुंचती है और न दिमाग के तरों में कोई संगीत पैदा करती है। कविता पढ़ने का कोई आनन्द नहीं होता।मज़ा नहीं आता। कोई पंक्ति किसी को याद भी नहीं रहती पढ़ने के बाद कविता किसीको अपने जादू में गिरफ्तार नहीं करती और न उसकी गूंज कही सुनाई पड़ती है। बच्चे ऐसी बेरस बेजान कविता का पाठ नहीं कर सकते और न बाबुलन्द आवाज बनकर अभिव्यक्त हो पाती है कविता और न वह सुर और संगीत में समाहित हो सकती है। नये रचनाकार जल्द से जल्द छपकर मशहूर होकर अमिताभ बच्चन बन जाने के फिराक में हैं। बड़े कवियों का झोला उठाकर यह काम आसानी से कर लेने का उनका जुगाड़ है। उनके साथ अपनी सेल्फी लगाकर वे लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होकर खुद को बड़े कवि समझने लगे हैं। दूतावासों, हिंदी के सत्ता प्रतिष्ठानों और विदेर्शो में वर्गीय जातीय पारिवारिक सम्पर्को के जरिये अपनी बेहद घटिया और ज़िंदगी से कटी कविताओं का अनुवाद छपवाकर और वहां से पुरस्कृत होकर इन कवियों ने हिंदी कविता की हत्या कर दी है। इनकी कविताएँ जनता न पढती है और न सुनती हैं।जनता उन्हें जानती तक नहीं है। वे हाथी दांत के मिनारों में बैठकर महारानी क्लियोपेट्रा की तरह दुनिया को फतह कर लेने की गलतफहमी में हैं। बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री जैसे हिंदी के शीर्ष कवि लोक में गहरे पैठे थे। छायावादी कवियों का भी समाज और सामाजिक यथार्थ ,प्रकृति और पृथ्वी से जितना नाता था,वह मुक्तबाजार के कबियों का नहीं है। महाकवि निराला की कविता वह पत्थर तोड़ती या त्रिलोचन की कविता काला आखर नहीं चीन्हती चंपा से हिंदी कविता खान कितने आगे बढ़ी है? अभीतक हिंदी कविता मुक्तिबोध के अंधेरे में चौराहे पर दिग्भर्मित क्यों है? मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवियों की कविता में जो सघनता थी, वह आज की कविताओं में कहाँ है? मुक्तिबोध और शलभ श्रीराम सिंह की तरह लम्बी कविताएँ साधना हर किसी के बस में नहीं है।लेकिन हर नया कवि मिलों लम्बी कविताएँ लिखकर सीधे छपने को भेजता है और न छापो तो बच्चों की तरह रूठ जाता है। भारतीय सन्त साहित्य धर्म सत्ता और राजसत्ता के खिलाफ जनता की आवाज बुलंद करता रहा है 7 वीं से लेकर 16 वीं सदी तक। उनकी रचनाओं को दुबारा पढ़ने की जरूरत है। जितनी विधाएं उन्होंने पैदा कर दी है,उनसे आगे हम खान तक पहुँचे हैं? कबीर दास से ज्यादा प्रासंगिक कवि कौन है? मीरा बाई से ज्यादा मुखर स्त्री विमर्श किसका है? रसखान से ज्यादा धर्म निरपेक्ष कौन है? सूरदास से ज्यादा प्रखर दृष्टि किसकी है? रविदास से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कौन है? गुरु नानक से ज्यादा सामाजिक कौन है? दादू से ज्यादा लोकप्रिय कौन है? तुलसी न धर्म सत्ता और न ही राजसत्ता के विरुद्ध थे लेकिन लोक में वे गहरे पैठे थे। बोलियों में कही गयी उनकी रचनाएँ कालजयी हैं लेकिन लिखित मुद्रित कविताएँ इतनी तदर्थ क्यों हैं? हिंदी कविताओं के पाठक क्यों नही है? क्या हिंदी समाज को कविता से घृणा है या कविता समझने की संवेदना नही है उसमें? या हिंदी समाज की संवेदना को स्पर्श करने का सामर्थ्य ही नहीं है कविता में? क्या वैचारिक बनने के फिराक में हिंदी कविता असामाजिक या समाजविरोधी हो गयी है? क्या चर्यापद या सन्त आंदोलन के कवि किसी सत्तपोषित महानगरीय राजनीतिक कवि थे? कविता ही साहित्य की जननी है। बाकी विधाएं कविता की कोख से निकली। कविता श्रुति परम्परा के तहत अपढ़ जनता को सम्प्रेषित होती रही है लेखन मुद्रण से पहले। सभ्यता के सारे मानक और आस्था के सारे मिथक कविता ने ही रचे हैं। हम क्या रच रहे हैं जो जन मानस को कहीं स्पर्श ही नहीं करता? हमने प्रेरणा अंशु के आठ पेज बढ़ा दिए हैं और इनमें से चार पेज कविताएँ होंगी। थोक भाव से कवियाएँ आती हैं। हम एक कवि की एक ही छोटी कविता एक अंक में छपते हैं ,फिरभी लम्बी लम्बी कविताओं का पुलिंदा आ जाता है। हम इन अनावश्यक कविताओं का क्या करें? जब बेहतर कविता लिखने की कोई जहमत नहीं करता तो नई कविताएँ कहाँ से लाएं? हम कवर पर काव्य रचना छपते हैं,विषय सूची नहीं। हम चाहते हैं कि हमारी विषय सूची कवर की कविता से अभिव्यक्त हो। बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि कवर के लिए हिंदी कविता मिलना कठिन है। हमें अक्सर शायरों की गज़लों से कम चलाना होता है। समकालीन कविता अति बौद्धिकता से लदी बोझ बन गयी है। समकालीन कविता किसी के दिलों पर दस्तक नहीं देती। मुझे अफ़सोस है कि मेरे बहुत प्रिय मित्रों को नाराज करना पड़ रहा है। वे मुझे इस वक्तव्य के लिये माफ करें।

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भारतीय साहित्य में आलोचना विधा आखिर क्या है? पलाश विश्वास बांग्ला फिल्म चौरंगी बंगाल से बाहर कितने लोगों ने देखी? उत्तम के ग्लैमर का बंगाल से बाहर कितना असर था? सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्में सीमाबद्ध और जन अरण्य के दर्शक कितने और कौन थे? मृत्यु के बाद साहित्यिक के रूप में कुलीन सत्तवर्ग में अवहेलित शंकर की लोकप्रियता सत्यजीत रे और उत्तम कुमार के कारण है,यह फतवा जारी हो गया है। बंगाल के बाहर बाकी भारत के बारे में क्या कहेंगे? क्या यही बात तारा शंकर बंदोपाध्याय और शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के बारे में कह सकते हैं? जिनकी कृतियों पर आधारित सुपर हिट फिल्मों की संख्या कहीं ज्यादा थी। शंकर भी आखिर मणि शंकर बंदोपाध्याय ही थे। उनका जीवन संघर्ष और उत्थान कम रोमांचक नहीं है। उनके पाठकों में कितने लोगों को मालूम था कि वे बंदोपाध्याय भी थे? शंकर के लेखन में कुलीनत्व को हमेशा चुनौती मिली क्योंकि आम जनसामान्य और खास तौर पर युवाओं के संघर्ष ही उनकी कृतियों का मूल तत्व रहा है। उनकी आशा आकांक्षाओं, उनके संघर्ष, उनके मोहभंग और उनकी त्रासदी की कथा कहने वाले शंकर कभी आलोचकों के प्रिय नहीं थे। रवींद्र और शरत भी कम उपेक्षित नहीं थे। खारिज कर दिए गए हिंदी और बाकी भारतीय भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यकार क्या कम हैं? क्या भारतीय साहित्य के आलोचक अब भी नाबालिग हैं और बच्चों की पसंद नापसंद एलर्जी की तरह अपना अपना साहित्यकार चुनकर उनको महिमामंडित करने में ही अपनी मेधा समर्पित कर देते हैं? क्या विधाओं के विकसित होते रहने की इतनी अवधि बीत जाने के बावजूद आलोचना विधा का कोई विकास ही नहीं हुआ या यह विधा खेमों, गिरोहों के ध्वजारोहण के लिए है और साहित्य व जीवन से इसके कोई सरोकार हैं हीं नहीं?

डेटलाइन कोलकाता बीस

इसे कहते हैं ज़िंदा दफनाना पलाश विश्वास आज फिर कोलकाता से गुरुजी जयनारायण का फोन आया। कोलकाता जनसत्ता में सिर्फ मार्केटिंग विभाग है। दो इंजीनियर हैं। बिल्डिंग है,सम्पादकीय नहीं है।प्रेस लखनऊ चला गया।दिल्ली से पीडीएफ आता है। कोलकाता महानगर ने हिंदी,बांग्ला,ओड़िया, उर्दू, गुरमुखी और उर्दू,किसी भी भाषा के अखबार में किसी की स्थायी नौकरी नहीं है।सभी पत्रकार संविदा पर है। योग्य,प्रशिक्षित और पढ़े लिखे पत्रकारों में कोलकाता में दिहाड़ी मजदूरी तो क्या बीस रुपये का भी काम नहीं है। जिंदगीभर किसी और पेशा या नौकरी की कोशिश न करके 5 दशक पत्रकारिता को मिशन मानकर सबकुछ दांव पर लगाकर सबकुछ हारने के बावजूद अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा। जनसत्ता में या किसी भी अखबार में डेस्क पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर से बुरी हालत में होते हैं। सम्पादक ऐसे लोग बनाये जाते हैंजिन्होने एक दिन भी अखबार नहीं निकला। उपसम्पादक के लिए आईएएस जैसी परीक्षा,लेकिन तमाम बड़े पदों के लिए बिना परीक्षा,बिना अनुभव वर्चस्ववादी तबके के खास जाति के लोग सीधे सम्पादक बना दिये जाते हैं। यही जीवन के हर क्षेत्र का किस्सा है। मीडिया में बचे हुए साथियों की इस दुर्गति और आदरणीय प्रभाष जोशी के अखबार जनसत्ता की इस दशा पर बहुत दुखी हूं। ओम थानवी ने हमारी कभी सुनी नहीं। लेकिन उनके जमाने में भी यह हाल नहीं हुआ। जाति, वर्ण और नस्ल देखकर सम्पादक चुनने की परंपरा ने जनसत्ता जैसी संस्था, नई दुनिया जैसे अखबार और पूरी हिंदी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया। कोलकाता में जिस तरीके से मुझे मेरी औकात में रखने की तिकड़में भिड़ाई गई और हार न मानते हुए प्रभाष जी से और बाकी सम्पादकों और मैनेजरों से लड़ते भिड़ते हुए हम जनपक्षधर पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिश करते रहे, उसकी कथा कम रोमांचक और कम दुःखद नहीं है। हमने कभी किसीको बख्शा भी नहीं है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली हो या हंस का पन्ना या कोलकाता,हम पिछले बीस साल से हिंदी समाज से अपनी गौरवशाली विरासत सहेजने की अपील करते रहे हैं। बांग्ला समाज से तो हम बहिस्कृत थे ही। वहां का कूलित वर्चस्व तो निरंकुश है ही। बदलाव की उम्मीद तो फिर भी गाय पट्टी से ही थी क्योंकि यहां सामाजिक ताकतें और लोक अभी ज़िंदा है।बस,यही पूंजी है,जिसके भरोसे न सिर्फ ज़िंदा हूँ, हाशिये पर होबे के बावजूद सक्रिया हूँ। पत्रकारिता के मिशन और साहित्य का क्या हुआ,कहने की जरूरत नहीं है,लेकिन हमारा मिशन जारी है। मुख्यधारा की पत्रकारिता में जो पेशेवर लोकतंत्र रहा है, उसका असल चेहरा यही है। इसमें काम करना पहले कठिन था,अब असम्भव। इसीलिए हम लोग सत्तर के दशक से वैकल्पिक मीडिया बनाने का प्रयास करते रहे हैं। जनसत्ता में देशभर के जनपक्षधर जुझारू पत्रकारों को बुलाकर उन्हें अच्छे वेतन देकर फ्रिज में डालने की रीति रही है। व न किसी दूसरे अख़बर्बमें लिख सकते थे अपने अखबार में। समझौता दूसरे अखबारों में न लिखने का होता था और अपने अखबार में सिर्फ रिपोर्टर और प्रधान संपादक लिख सकते थे।डेस्क के लोगों से कहा जाता था कि सम्पादक लिख नहीं सकता।डेस्क से रिपोर्टर बनते नहीं। उनकी दक्षता से अखबार चलता,लेकिन उन्हें हर हाल में लिखने का कोई मौका भी नहीं दिया जाता।पहले से बनी उनकी पहचान और हैसियत खत्म कर दी जाती। हम वैकल्पिक मीडिया और ब्लॉगिंग से अब तक जिंदा हैं और हमारी जनपक्षधरता बची हुई है।लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। वेटनबन्द होते ही सामाजिक आर्थिक असुरक्षा के अंधकार के सिवाय कुछ नहीं बचता। आपके शहर और सूबे में पत्रकारों और पत्रकारिता के क्या हाल हैं?सबकुछ ठीक ठाक? अच्छे दिनों की तरह?

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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