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Sunday, May 6, 2012

हर कोई गोलबंद है

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/18696-2012-05-06-08-06-32

Sunday, 06 May 2012 13:35

चंचल चौहान 
जनसत्ता 6 मई, 2012: ओम थानवी की टिप्पणी 'आवाजाही के हक में' ('अनन्तर', 29 अप्रैल) अगर हिंदी लेखक समुदाय में व्याप्त संकीर्ण रुझानों को लेकर पीड़ा व्यक्त करती, तो उसके मूल संवेदनात्मक उद्देश्य से असहमत होने की गुंजाइश नहीं होती।

यह एक पवित्र उद्देश्य ही होता कि लेखक विचारधारा के आधार पर छुआछूत न बरतें, सौ तरह के फूलों को खिलने दें, मानव इतिहास अपने सौंदर्यबोध से गुलाब और धतूरे का फर्क कर लेगा। यह तो भारत की सांस्कृतिक परंपरा है कि 'वाद' से ही सत्य का जन्म होता है, इसलिए वाद से परहेज रखना भी स्वस्थ समाज की अवस्था नहीं माना जाएगा। दरअसल, ओम थानवी की टिप्पणी में व्यक्त नजरिया वही दोषपूर्ण नजरिया है, जो हमारे समाज के बहुत से बुद्धिजीवियों, संपादकों को सामंती परंपरा से मिला है और जिसके इस्तेमाल को आज विश्वपूंजीवाद की नई शक्ति यानी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी, बढ़ावा दे रही है। 
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी दुनिया भर में यह विचार या चेतना फैला रही है कि विचारधारा और विचारधारा से लैस संगठन व्यर्थ हैं। ऐसे दर्शन और फलसफे रचने के लिए अपार धनराशि खर्च की जा रही है। उत्तर-आधुनिकता के दर्शन के आविष्कार के लिए जां फ्रांस्वा ल्योतार को जो प्रोजेक्ट दिया गया था, उसे देखने से पता चलता है कि खेल क्या है। उसने यही स्थापना दी कि सारे महान आख्यान (विचारधारात्मक दर्शन) व्यर्थ हो गए हैं, उनसे सत्य नहीं जाना जा सकता। मध्यवर्ग को अपने भोलेपन में यह दर्शन अपना-सा लगता है कि 'कोउ नृप होउ हमहिं का हानी।' 
अवाम को लोकतांत्रिक आधार पर संगठित न होने देने या जो संगठित हैं उन्हें लांछित या बदनाम करके यानी प्रतिरोध की अवामी ताकत को 'नष्ट'-'भ्रष्ट' करके ही विश्व-पूंजीवाद अपना खेल हमारे जैसे देश में खेल सकता है। इजारेदार घराने अपने संगठन; जैसे फिक्की, सीआइआइ आदि या अपनी राजनीति के संगठन जैसे कांग्रेस या भाजपा आदि बना लें, तो कोई तकलीफ नहीं, मगर शोषित-शासित अवाम के विभिन्न हिस्से अपने जनवादी अधिकारों को सुरक्षित रखने भर के इरादे से भी संगठन बना लें, तो नींद हराम! संगठन विरोधी इस शोषकवर्गीय मुहिम का हिस्सा बहुत-से बुद्धिजीवी भी अपने भोलेपन से बने हुए हैं और उन्हें अपनी यह असलियत मालूम तक नहीं।
हमें शायद यह लिखने की जरूरत न होती, अगर ओम थानवी ने अपनी टिप्पणी में जनवादी लेखक संघ को खासकर और अन्य वामपंथी लेखक संगठनों को आमतौर पर बदनाम करने के अपने छिपे एजेंडों को अपनी टिप्पणी के केंद्रीय संवेदन के रूप में शामिल न कर लिया होता। जनवादी लेखक संघ ने ओम थानवी समेत किसी भी लेखक को कोई क्षति पहुंचाई हो, ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता। हां, अपनी सीमाओं के भीतर अगर कहीं मदद संभव हुई तो जरूर की। जनवादी लेखक संघ ने किसी भी सदस्य पर किसी तरह की आवाजाही का प्रतिबंध नहीं लगाया। एक बार एक लेखक सदस्य ने तो अपने ऊपर ही प्रतिबंध लगवाने की लिखित अभ्यर्थना की, हमारी कार्यकारिणी ने कहा, जनवादी लेखक संघ किसी भी लेखक के जनवादी अधिकार को नहीं छीन सकता, उसका गठन ही इस नीति के आधार पर हुआ था कि हमारे देश में जनवाद के लिए खतरा है, इसलिए जलेस का केंद्रीय सरोकार है, 'जनवाद की रक्षा और विकास'। 
जलेस लेखक ही नहीं, अवाम की भी नागरिक स्वतंत्रताओं और उनके जनवादी अधिकारों के पक्ष में रहा है और रहेगा। अतीत को याद करें तो प्रेस की आजादी छीनने वाले भांति-भांति के कानूनों को पारित न होने देने के लिए जो भी संगठित आंदोलन चले उन सबमें जलेस की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही। ओम थानवी ने उदय प्रकाश के जनवादी लेखक संघ से 'मोहभंग' के विचित्र कारण की शोधमयी पत्रकारिता करते हुए ऐसा आभास दिया जैसे जनवादी लेखक संघ अर्जुन सिंह की गोद में जा बैठा, और इस वजह से उदय प्रकाश जलेस से भाग गए। ऐसा विचित्र तर्क तो उदय प्रकाश भी संभवत: स्वीकार नहीं करेंगे। जलेस से उन्होंने इस्तीफा दे दिया हो, ऐसा भी कोई सबूत नहीं है। क्या ओम थानवी संगठन का ऐसा कोई दस्तावेज, प्रस्ताव, बयान, ग्रुप फोटो या कोई अन्य प्रमाण दिखा सकते हैं, जिसमें अर्जुन सिंह की गोद में जा बैठने का तर्क प्रमाणित होता हो या यह साबित हो सके कि जनवादी लेखक संघ ने अर्जुन सिंह या किसी सरकार से कुछ मदद, धनराशि या कोई और नकदी लाभ हासिल किया हो। किसी सदस्य की किसी व्यक्ति विशेष के यहां 'आवाजाही' को इस तरह चित्रित करना मानो जनवादी लेखक संघ अर्जुन सिंह की गोद में जा बैठा, उसी व्यक्ति-केंद्रित अवैज्ञानिक समझ का सबूत है, जिसकी गिरफ्त में बहुत-से संपादक हैं, जो एक व्यक्ति के चरित्र या कारनामे से झट से पूरे संगठन पर ही नहीं, 'सारे वामपंथी लेखक सगठनों' पर अपना इल्जाम लगा देते हैं। 

इस तरह का नजरिया बड़े पूंजीवादी घरानों के अखबारों का ही नहीं, कई लघुपत्रिकाओं के संपादकों का भी रहता है, जो आए दिन जनवादी लेखक संघ को अकारण बदनाम करने से नहीं चूकते। भइए, ऐसा क्या बिगाड़ा है जलेस ने आपका?
जनवादी लेखक संघ जम्हूरियत-पसंद संगठन होने की वजह से आलोचना पसंद करता है, आलोचनात्मक विवेक को बढ़ावा देता है और आलोचना करने का अधिकार भी रखता है। जो लेखक हमारे सांगठनिक और आयोजनात्मक कामों से जुड़े रहे हैं, वे इस बात के साक्षी हैं कि हम कड़वी से कड़वी आलोचना के विषपायी हैं, लेकिन आलोचना का आधार जरूर होना चाहिए। आजादी तो हम निराधार आलोचना को भी देते हैं, वह तो अभिव्यक्ति की आजादी है, जिसके लिए   हिंदी-उर्दू के लेखकों ने मिल कर इतिहास के एक ऐसे दौर में इस संगठन की रचना की जब लेखक का लिखने का ही अधिकार खतरे में था, पत्रकारों का सत्यशोधक अखबारनवीसी का अधिकार भी खतरे में था। 
यह देख कर दुखभरा आश्चर्य होता है कि ओम थानवी जैसा संपादक अपनी टिप्पणी में संगठन को 'पार्टी का पोशीदा अखाड़ा' कह कर उसके प्रति अपनी हिकारत का इजहार करता है। क्या वे इतने अबोध हैं कि यह भी नहीं जानते कि कोई राजनीतिक पार्टी या अवाम के विभिन्न हिस्सों के संगठन सामाजिक विकास प्रक्रिया के दौरान ही वजूद में आते हैं, और बहुत से विलीन भी हो जाते हैं! 
ओम थानवी की लंबी टिप्पणी में एक पूरा पैरा संगठनों के बनने देने के लिए 'विचारवान' लेखकों को कसूरवार ठहराने पर केंद्रित किया गया है। वे लिखते हैं, 'प्रगति या जनगण की बात करने वाले अपनी ही विचारधारा के घेरे में गोलबंद होने लगे, इसके लिए खुद 'विचारवान' लेखक कम कसूरवार नहीं हैं'। ओम थानवी जैसे 'विचारवान' कम से कम अपराधी होने से तो बचे हैं, बाकी सारे तो अपराधी हैं, भई वाह! वे नहीं जानते कि मुक्तिबोध के 'अंधेरे में' कविता के वाचक ने ऐसे ही पत्रकारों को उस जुलूस में गोलबंद देखा था, जो मध्यवर्ग को संगठित सर्वहारा वर्ग से अलग रहने की सलाह देते थे। अगर ओम थानवी यह सोचते हैं कि वे गोलबंद नहीं हैं तो यह उनकी मिथ्या चेतना है। 
वर्गविभाजित समाज में कोई व्यक्ति खुद को सर्वस्वतंत्र और विचारवान मान कर अपना पक्ष या अपना 'अखाड़ा' छिपाए रहे, यह संभव नहीं। इसी मिथ्या चेतना के चलते उन्हें लेखक संगठनों के बनने और टूटने की प्रक्रिया का वैज्ञानिक आधार नहीं दिखाई देता। वे बस एक सरलीकरण से काम चला लेते हैं, कि 'पार्टी टूटी तो संघ के लेखक भी टूट गए'। पार्टी तो 1964 में टूटी थी, जबकि जनवादी लेखक संघ 1982 में बना, यही नहीं, भाकपा तो 1925 में बनी, प्रलेस 1936 में बना, नक्सलवादी तो 1970 से पहले ही अलग गुटों में विभाजित हो गए थे, उनके समांतर लेखक संगठन तो वजूद में नहीं आए। ओम थानवी इन सारे पेचीदा पचड़ों में जाने वाले 'विचारवान' संपादक नहीं हैं। बस जो हांक लग गई, सो उन्होंने लगा दी। उन्हें तो लेखकों को अपराधी ठहरा कर गालियां देनी थीं, सो दे लीं, दिल-दिमाग ठंडा कर लिया। 
उन्होंने लिखा, 'इन लेखक संघों ने अक्सर अपने मत के लेखकों को ऊंचा उठाने की कोशिश की है और दूसरों को गिराने की। ...इसी संकीर्णता की ताजा परिणति यह है कि कौन लेखक कहां जाए, कहां बैठे, क्या कहे, क्या सुने, इसका निर्णय भी अब लेखक संघ या सहमत विचारों वाले दूसरे लेखक करने लगे हैं।' यह कैसी खोजी पत्रकारिता है जो आधारहीन तर्कों से लेखक संघों को लांछित और इसलिए अवांछित करार दे रही है। 'ऊंचा उठाने' या नीचे गिराने जैसे कामों के आरोप संगठनों पर लगाना आधारहीन है। हां, लेखक संघ के सदस्य लेखकों को भी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है कि वे अपने आलोचनात्मक विवेक से किसी लेखक का कैसा आकलन करते हैं, संघों ने उन्हें कोई निर्देश नहीं दिए। जनवादी लेखक संघ का घोषणा-पत्र इस तरह की आलोचनात्मक बहुलता का आदर करता है, किसी तरह की संकीर्णता को प्रश्रय देने का नहीं।

(लेखक जनवादी लेखक संघ के महासचिव हैं)

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