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Wednesday, December 31, 2025
हमारी बोली हमारी पहचान
#हमारी_बोली_हमारी_पहचान
#शुभ_नववर्ष
सत्तर के दशक में खास तौर पर जीआईसी और डीएसबी नैनीताल के जमाने में कभी सोचा नहीं था कि सत्तर साल जी जाऊंगा और 2026 की सुबह देखूंगा।
लंबी जिंदगी की मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि 1973 से अबतक निरंतर मेरे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी TaraChandra Tripathi जी लगातार मेरे साथ हैं।उनसे संवाद बना हुआ है। जो कुछ मैंने सीखा,उन्हीं से सीखा। वे हैं तो जीने का मतलब है,हमारे वजूद का भी।
आज #नववर्ष की पूर्व संध्या पर फिर उनका फोन आया। वे स्वस्थ, सकुशल और सक्रिय हैं और अपने शिशुओं को भूले नहीं है। दुनिया के किसी भी कोने से उन्होंने हमेशा हम सबसे जवाबतलब किया है।
आज बोले, सबसे जरूरी है कि बच्चों का। अपनी बोली में बोलना सीखना।ध्वनि से बनती हैं भाषाएं, जो एक जैसी होती हैं और लिपि तो ध्वनियों का चित्रों में रूपांतरण है। लोक छवियों के बिना न भाषा बनती है और न संस्कृति। बोलियों का कोई मानक नहीं होता क्योंकि यह लोक है। लोक की विविधता बोलियों में है। अपनी बोली में बोलेंगे तो बच्चे लोक में भी गहरे पैठेंगे।इसके बिना उनकी शिक्षा अधूरी है।
गुरुजी ने अपनी पुस्तक: हमारी बोली हमारी पहचान में इसका शोधात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है।
उन्होंने लिखा है:
कभी-कभी, जब, में पेट की भाषाओं के दबाव तले दम तोड़ती भाषाओं के बारे में चिन्तन करता हूँ तो मुझे घुटन सी होने लगती है. मुझे लगता है कि जिस प्रकार हम अपनी बोलियों की उपेक्षा कर रहे हैं, हमारी बोलियाँ भी अगले बीसपचीस साल में विश्व की अब तक दम तोड़ चुकी उन सैकड़ों भाषाओं और दुदबोलियों में शामिल हो जाएंगी, जिनका आज कोई नाम लेवा भी शेष नहीं है.
(Humari Boli Humari Pahchan)
संसार में जो समाज अपनी मातृभाषाओं या दुदबोलियों के प्रति जागरूक नहीं हैं, उनकी बोलियों को मक्खन लगी रोटी की भाषाएँ निगलती जा रही हैं. आधी दुनियाँ की सैकड़ों बोलियों को स्पेनी निगल चुकी है, अफ्रीकी भाषाएँ स्वहिली भाषा के प्रकोप से मर रही है, रूसी पूर्वी यूरोप की भाषाओं को निगलने के लिए तैयार बैठी है और अंग्रेजी की महामारी आत्मगौरव से सम्पन्न फ्रेंच, जर्मन, जापानी, चीनी जैसी कुछ भाषाओं को छोड़ कर दुनियाँ की सारी बोलियों को उजाड़ देने पर तुली हुई है.
Tara Chandra Tripathi
भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में
भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में
पलाश विश्वास
एक
15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। देश के विभाजन की कीमत पर यह आजादी मिली। रातोंरात अखंड भारत दो हिस्सों में बंट गया। भारी खून खराबा, दंगा, लूटपाट, आगजनी, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के मध्य अखंड भारत के पूर्वी और पश्चिम हिस्से को पाकिस्तान बना दिया गया और वहां के लोग अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए। एक निरंतर चलने वाले युद्ध और गृहयुद्ध शुरू हो गया। जिस देश में हजारों साल से विविधता और बहुलता का लोकतंत्र था, साझा चूल्हा का चलन था,किसी को किसी से बैर नहीं था, अलग अलग धर्म जाति, नस्ल के लोग एक साथ अमन चैन से रहते थे, वहां निरंतर जलने वाली हिंसा और नफरी की आग सुलगा दी गई। करोड़ों लोग विभाजन की त्रासदी के शिकार हुए।
भारत विभाजन के दौरान हुई हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे, हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 15 लाख से 20 लाख तक भी हो सकती है। इस दौरान लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे। जो लोग जिंदा बच गए,इस देश में वे आज भी भारत विभाजन का दंश झेल रहे हैं। कटे फटे उन लोगों की संतानें अब भी विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। उनकी नागरिकता संदिग्ध है।वे घुसपैठियों के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं आज भी।नागरिक और मानवाधिकार, इतिहास, भूगोल, विरासत, मातृभाषा, संस्कृति, पहचान से वंचित हो गए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी विभाजन का दर्द झेल रहे हैं।
करोड़ों दूसरे लोगों की तरह ऋत्विक घटक ने भी भारत विभाजन के फलस्वरूप भारत में शरण ली और शरणार्थी होने का यथार्थ को भोगा। यूं तो पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान से आए कुलीन, सम्पन्न तबके के अनेक लोग बंगाल और बाकी देश में राजनीति, अर्थ व्यवस्था, साहित्य, कला, फिल्म आदि क्षेत्रों में अग्रणी बन गए और विभाजन की त्रासदी का कुलीन,संपन्न तबके पर कोई असर नहीं हुआ।
ऐसा पाकिस्तान में भी हुआ।भारत से जो लोग पाकिस्तान चले गए,उनमें जो संपन्न और कुलीन थे, उनकी हैसियत में खास फर्क नहीं पड़ा। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में अभिजात तबकों पर विभाजन का असर एक सदमा जैसा होकर गुजर गया।
ऋत्विक घटक के परिवार की पृष्ठभूमि कुलीन थी। उनके परिवार के लोग आदरणीय हैं और विविध क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन ऋत्विक ने एक आम शरणार्थी की तरह अपनी तमाम फिल्मों में विभाजन की त्रासदी को निरंतर जिया, जैसे विभाजनपीडित हर शरणार्थी पीढ़ी दर पीढ़ी जीता है।
भारत विभाजन पर ऋत्विक घटक की तीन फिल्में विश्वविख्यात हैं। शरणार्थी स्त्रियों ने विभाजन के कारण बेपटरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने के लिया, परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर जो ऐतिहासिक लड़ाई वक्त की चुनौतियों के मुकाबले लगातार अपना वजूद मिटाकर लड़ती रही, उनकी जिजीविषा पर ऋत्विक की मास्टरपीस फिल्म है मेघे ढाका तारा। भारत विभाजन के सदमे और सामूहिक पीड़ा की पृष्ठभूमि में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन यानि भारतीय जन नाट्य संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बिखराव पर उनकी फिल्म है कोमल गांधार।
भारत आए शरणार्थियों के साथ जाति के आधार पर जो भेदभाव किया गया, उसपर भारतीय साहित्य मौन है। क्योंकि वंचित तबकों के लोग अपढ़ अधपढ़ थे और वे अपनी आपबीती कहीं दर्ज नहीं कर सके।भारत विभाजन का पूरा आख्यान , पूरा narrative शासक वर्ग का रचा इतिहास है,जिसमें विभाजन पीड़ितों का पक्ष किसी ने नहीं रखा। शरणार्थी शिविरों और पुनर्वास योजनाओं में जाति के आधार पर भेदभाव पर केंद्रित है ऋत्विक की भारत विभाजन पर बनाई तीसरी फिल्म सुवर्णरेखा।
इन तीन फिल्मों की बहुत भारी कीमत उन्हें आजीवन चुकाते रहना पड़ा। वे कम्युनिस्ट पार्टी से निकाले गए।बंगाल से बहिष्कृत कर दिए गए।
ऋत्विक की फिल्मों की अंतर्वस्तु उनकी कथा की आम जिंदगी में रचा बसा लोक है। उनकी फिल्मों में लोक कोई सितम गीत नृत्य नहीं है,फ्रेम दर फ्रेम संरचना है।इसलिए उनकी सारी फिल्में बाकी भारतीय फिल्मकारों की फिल्मों से एकदम अलहदा हैं।
दो
ऋत्विक घटक और उनकी फिल्मों को समझने के लिए उनकी जड़ों को पहचानने और समझने की जरूरत है। उनकी जीवन दृष्टि और उनके सौंदर्यबोध की पृष्ठभूमि को समझे बिना बंगाल के सर्वव्यापी लोक और जनपदों की जीवनशैली और इस मेहनतकश मुश्किल जीवन यापन में रची बसी उनकी रचनात्मक प्रतिभा को समझना मुश्किल है।अपने उतार-चढ़ाव भरे करियर में उन्होंने भले ही कुछ एक फिल्में निर्देशित कीं, अनेक फिल्में आधी अधूरी छोड़ दी, अपनी ही रचना से उपजे गहरे असंतोष के कारण,लेकिन उनका काम भारतीय और वैश्विक सिनेमा की भाषा को नई दिशा देता है। वे न केवल बांग्ला फिल्मों में बल्कि सिनेमायी आधुनिकता में भी आधारभूत व्यक्तित्व हैं। उनकी रचनात्मकता आम जनमानस का दर्पण बना सिनेमा की भाषा में। व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिक आघात को उन्होंने जिस नवाचारी शैली के साथ जोड़ा, उसने पीढ़ियों के फिल्मकारों और दर्शकों को झकझोरा है।
1947 का भारत-विभाजन ऋत्विक घटक के जीवन और रचनात्मकता दोनों पर गहरी छाप छोड़ गया। ढाका में जन्मे ऋत्विक लाखों विस्थापितों की तरह बंगाल के बंटवारे के शिकार बने। जहां अधिकतर समकालीन फिल्मकारों ने विभाजन को या तो किनारे से छुआ या उसकी हिंसा तक ही सीमित रखा, वहीं ऋत्विक की फिल्में विभाजन के मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत घावों को केंद्र में रखती हैं। खुद उनका वजूद लहूलुहान रहा जीवनभर इस त्रासदी से आम विभाजनपीड़ितों की तरह।
कोमल गांधार फिल्म में जन नाट्य संघ की एक नाट्यमंडली के पद्मा नदी के किनारे विभाजन की त्रासदी को अनुभव करने वाला दृश्य याद करें। ट्रेन का इंजन त shunting करते हुए ठीक पद्मा नदी के किनारे रुक जाती है।एक जबरदस्त झटके से जूम करता कैमरा क्लोज अप में जम हो जाता है। हृदय विदारक दृश्य है।कैमरा नायक नायिका के पीड़ित,दुखी चेहरों पर फोकस करता है।नायक नायिका की आंखों में एकमुश्त स्मृतियों और पीड़ाओं का समुंदर झोंकता हुआ उंगली के इशारे पर बेटे के इंतजार में खड़ी मां की छवि उकेरते हुए खाता है।वहीं खड़ी मन मेरा इंतजार करती थी। जो अब पाकिस्तान है।
आपने भूस्खलन की त्रासदी देखी है? लोगों को जिंदा दफ्न होते देखा है? गांव जनपद को जमीन और पानी में,नदी और समुद्र में समाहित होते देखा है? हिमालय के लोग इस अभिज्ञता का जीवनभर सामना करते हैं ।हम इसे प्राकृतिक आपदा कहते हैं। मुर्शिदाबाद जिले के लालगोला इलाके मन पद्मा नदी को किनारे का जनजीवन लीलते हुए देखा है? इसे लोग प्राकृतिक आपदा कहते हैं।
वजूद का खींचों में बिखरकर अनंत में समाहित होने और फिसलते रेत की तरह स्मृतियों के क्षरण को हम भारत विभाजन की राजनीतिक त्रासदी कह सकते है। इस त्रासदी के गहरे साए में कैमरे की भाषा के साथ ऋत्विक के सौंदर्यबोध के साथ बेबस पीड़ितों की पीड़ा, आर्तनाद और आक्रोश एकमुश्त अभिव्यक्त होती है। ऋत्विक की इस रचना प्रक्रिया को समझना हर किसी के बूते में नहीं है।फिल्मकारों, फिल्मविशेषज्ञों के लिए भी उनकी फिल्म समय सरोकार और मनुष्यता की प्रति सघन प्रतिबद्धता के साथ गंभीर चुनौती बन जाती है।
मेघे ढाका तारा में टीबी मरीज बन गई नीता का अपने कामयाब संगीतकार भाई के सामने चरमोत्कर्ष के क्षण समूचे हिमालय की दहलती हुई जिजीविषा चीख दादा आमी बाँचते चाई.. इसी त्रासदी का ज्वालामुखी विस्फोट है,जो दर्शक के दिलोदिमाग की गूंज बनकर ठहर जाती है।प्रतिध्वनित होती रहती है। या रिफ्यूजी बस्ती में नीता के कमरे में छनछनाती तार तार चांदनी में नीता का उस प्रेमी से संवाद, जो अंततः उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेता है। कोमल गांधार में विवाह के दौरान गाय जाने वाले उच्चकित लोकगीत का विरोधाभासी द्वंद्व या सुवर्णरेखा की पतिता बन गई रिफ्यूजी बहन सीता के कमरे में ग्राहक बनकर उपस्थित हुए सगे नहीं का सदमा, यह सबकुछ सिनेमा की भाषा को सिरे से बदल कर रख देता है। बौद्धिक समुदाय जिसे मेलोड्रामा कहता है, दरअसल वह ऋत्विक का अपना लोकसंसार है,जो उनकी फिल्म की परत दर परत झीनी झीनी बिनी चदरिया है।
ऋत्विक घटक का जन्म पूर्वी बंगाल में ढाका में हुआ था (अब बांग्लादेश)। वे और उनका परिवार पश्चिम बंगाल में कलकत्ता में स्थानांतरित हो गये (अब कोलकाता), जिसके तुरंत बाद पूर्वी बंगाल से लाखों शरणार्थियों का इस शहर में आगमन शुरू हो गया, वे लोग विनाशकारी 1943 के बंगाल के अकाल और 1947 में बंगाल के विभाजन के कारण वहां से पलायन करने लगे थे।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध और आजाद हिंद फौज के महासंग्राम के मद्देनजर और खासकर ,1946 के डायरेक्ट एक्शन के दौरान बंगाल के पढ़े लिखे भद्रलोक बंगाली को विभाजन की
नियति का अनुभव हो गया। भारत का विभाजन उनके लिए नियति का अभिसार था।लेकिन पूर्वी बंगाल के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में जो अपढ़, अधपढ़ आम लोग थे, उन्हें बदलते हुए वैश्विक प्रदर्श, ब्रिटिश हुकूमत के डूबते हुए सूरज और सत्ता शतरंज के दांवपेंच का कोई अंदाजा नहीं था।सम्पन्न वर्ग की जड़ें कोलकाता और पश्चिम बंगाल में गहरी पैठी थी। नौकरी पेशा और जमीनदार श्रेणी को विभाजन से प्रयाप्त पहले पश्चिम बंगाल में सुरक्षित स्थानांतरित होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पश्चिम पाकिस्तान में भी बहुत हद तक ऐसा ही हुआ। इसके विपरीत भारत विभाजन होने के बावजूद आम लोग हर कीमत पर अपना गांव खेत जनपद को छोड़ने को तैयार नहीं थे।सरहद के आरपार हुए दंगों में वे छिन्नमूल बनकर रह गए।
ऋत्विक घटक भी छिन्नमूल हो गए और आजीवन छिन्नमूल होकर जिए।उनकी फिल्में छिन्नमूल मनुष्यता की कथा व्यथा और जिजीविषा, विस्थापन का यथार्थ और पुनर्वास की लड़ाई का महाकाव्यिक आख्यान है।
शरणार्थी जीवन का उनका यह अनुभव उनके काम में बखूबी नज़र आता है, जिसने सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन के लिए एक अधिभावी रूपक का काम किया और उनके बाद के रचनात्मक कार्यों को एक सूत्र में पिरोया. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध ने भी, जिसके कारण और अधिक शरणार्थी भारत आये, उनके कार्यों को समान रूप से प्रभावित किया।
पूर्वी बंगाल के पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने और 26 मार्च 1971 को स्वतंत्र बांग्लादेश बन जाने के बावजूद विभाजनपीड़ितों के लिए भारत विभाजन की विभीषिका निरंतर जारी है। इस त्रासदी,पीड़ा और जीवनसंघर्ष को ऋत्विक ने ही सिनेमा की भाषा में प्रस्तुत किया।
समूचा पूर्वी बंगाल बंगाल की खाड़ी के समुद्री तूफानों के दायरे में हैं। समुंदर में गहरे धंसे पूर्वी बंगाल की सारी जमीन असंख्य नदियों,झीलों में बंटी हुई है। यातायात जलपथ से होता रहा है। पेयजल नदियों और झील का पानी। नदी से जल भरने के गीतों की दर्जनों शैलियां हैं। नदी में नाव,ज्वार भाटा का भटियाली संगीत सर्वव्यापी है। यह मंगल काव्यों की जमीन है,जहां हिन्दू मुसलमान साझा चूल्हे के वारिश सदियों से सारे तीज त्यौहार मनाते रहे हैं। हमलावरों से सुरक्षित इस भूगोल में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा आम जनजीवन पर जमींदारों के अमानवीय अत्याचार और कठोर पुरोहित तंत्र को छोड़कर भारत विभाजन से पहले कोई राजनीतिक भूचाल का इतिहास नहीं है।यहीं के जनपदों में गीत नृत्य गीतिका जीवन यौन का अनिवार्य अंग है।
पूर्वी बंगाल (आज के पश्चिम बंगाल के क्षेत्र) का भूगोल, मौसम और जलवायु मुख्य रूप से इसकी विविध भौगोलिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिसमें उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक शामिल है। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित होती है। मौसम में बहुत गर्मी और आर्द्रता (गर्मी में), भारी बारिश (मानसून के दौरान) और हल्की ठंड (सर्दियों में) होती है। भूगोल, जलवायु और मौसम की विविधता, बहुलता और विचित्रता के कारण पूर्वी बंगाल का लोक संसार इंद्रधनुषी है। बाउल, पीर, साधु, संत,फकीर का सामाजिक नेतृत्व ने हमेशा साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद की चुके हिलाने के जनविद्रोह किसान, आदिवासी विद्रोह का सिलसिला बनाए रखा। भारत में पहला बहुजन आंदोलन जल जंगल जमीन हक्की का मतुआ आंदोलन की दो सौ साल की निरंतरता की हकीकत और मनुस्मृति राज, विधान और अनुशासन के खिलाफ अस्पृश्यता मुक्ति का नमोशुद्र आंदोलन इसी भूगोल, जलवायु और मौसम का सच है, जिसका सबसे ईमानदारी से सामना लोक की सघन ऊर्जा के साथ ऋत्विक घटक ने निरंतर किया है।
जिस ढाका शहर में ऋत्विक का जन्म हुआ, वह हमेशा कृषि,कारोबार और मेहनतकश तबकों का केंद्र रहा है। कोलकाता इस तुलना में अतिशय भद्रलोक है। चैन तरफ जनपदों से घिरे होने के बावजूद कोलकाता कोई जनपद नहीं है।जबकि मुगल साम्राज्य के दौरान दौरान ढाका को 17वीं शताब्दी में जहाँगीर नगर के नाम से भी जाना जाता था, यह न सिर्फ प्रादेशिक राजधानी हुआ करती थी बल्कि यहाँ पर निर्मित होने वाले मलमल के व्यापार में इस शहर का पूरी दुनिया में दबदबा था। आधुनिक ढाका का निर्माण एवं विकास ब्रिटिश शासन के दौरान उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और जल्द ही यह कोलकाता के बाद पूरे बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गया। आज भी ढाका कपड़ा उद्योग का वैश्विक केंद्र है।
ढाका जनपदों से घिरा हुआ स्वयं एक जनपद है।हर जनपद की बोली अलग है।रीति रिवाज,जीवनशैली अलग है,लोक और जीवन यौन अलग अलग है। लेकिन हिलसा मछली का स्वाद जैसा कुछ,भटियाली का संगीत जैसा कुछ बहुत कुछ एकदम साझा चूल्हा है।
ऋत्विक इस साझा चूल्हा का रसोइया है।
तीन
भारत विभाजन की त्रासदी पर अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के उत्कर्ष समय में ऋत्विक घटक ने अपनी विभाजन त्रयी फिल्में पार्टीशन ट्रायलॉजी, एक के बाद एक तीन फिल्में बनाईं। वे रंगकर्मी थे। विचारधारा के प्रतिबद्ध थे। वे 1950 में पूर्वी बंगाल से छिन्नमूल होकर लौटने के बाद कहानियां और नाटक लिखते थे।अच्छे अभिनेता भी थे। नाटकों का इस्तेमाल उन्होंने सतर्कता पूर्वक किया राजनीतिक हथियार के रूप में। फिल्म को उन्होंने सबसे शक्तिशाली माध्यम समझकर इसको भी छिन्नमूल मनुष्यता के हक में राजनीतिक हथियार बतौर बनाना शुरू किया।बिजन भट्टाचार्य और वे दोनों जन नाट्य संघ में सक्रिय थे।
भारत विभाजन की त्रासदी करोड़ों विभाजन पीड़ितों की तरह बेइंतहा दर्द और बेचैनी के साथ उनके खून, दिल और दिमाग में आजीवन खौलती रही ज्वालामुखी के लव की तरह। उनका जन्म जरूर ढाका में हुआ,लेकिन उनका घर राजशाही जिले में था। राजशाही पूर्वी बंगाल में शिक्षा और संस्कृति का गढ़ रहा है। जनपदों में अमन चैन के साझा चूल्हे के इस तरह हिंसा,नफरत और मारकाट के दावानल में बदल जाने के भयंकर वास्तव को वे कभी स्वीकार नहीं कर पाए।यह विघटन क्यों हुआ? किसने सामाजिक ताना बाना को क्यों और कैसे तहस नहस कर दिया, करोड़ों विभाजन पीड़ितों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुलग रहे इस सवाल का जवाब वे ढूंढते रहे। राजनीतिक हथियार की तरह गहन संवेदना की गहराइयों में पैठकर अपनी फिल्मों में उनकी तफ्तीश जारी रही।
1960 में उन्होंने मेघे ढाका तारा बनाई। 1961 में बनाई कोमल गांधार और अगले ही साल सुवर्णरेखा। यह फिल्म बनी 1962 में लेकिन तीन साल बाद रिलीज़ हो सकी। क्यों? यह सवाल वाजिब है क्योंकि मेघे ढाका तारा को लेकर कोई विवाद नहीं था। शरणार्थी बेटी का संघर्ष बंगाल, पंजाब और बाकी देश का सच था। विस्थापन, युद्ध, गृहयुद्ध , दंगा फसाद की शिकार होती हैं स्त्रियां सबसे ज्यादा, लेकिन अपने लिए,परिवार के लिए और समाज व राष्ट्र के लिए मुक्तिमार्ग का निर्माण भी करती है स्त्री। इस सच को, वैश्विक वास्तव को अस्वीकार करने का उपाय नहीं था। नीता की जिजीविषा इस फिल्म का चरमोत्कर्ष और सार दोनों है।
सुगबुगाहट शुरू ही कोमल गांधार के सच का सामना करने से राजनीतिक, वर्गीय, जातिगत वर्चस्ववाद के सीरे से इनकार के साथ। तीनों फिल्मों में विभाजन विभीषिका की तीव्रतम अभिव्यक्ति ही है।तीनों में दर्द अलगाव,उपेक्षा और अपमान का घनघोर झंझावात है, जो चक्रवात की तरह वजूद की चुके हिलाकर रख देता है। तीनों फिल्म का सच है छिन्नमूल मनुष्यता, जो मनुस्मृति राज में वंचितों के सारे अधिकारों से वंचित होने की समग्र यातना, उत्पीड़न और विध्वंस, विघटन, इतिहास,भूगोल, मातृभाषा,विरासत, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक पहचान और शक्ति से जबरन बेदखल करने का बेइंतहा जनसंहार का पर्याय है। कोमल गांधार में रेलवे लाइन और नदी को योग वियोग के प्रतीक के रूप में सघन सिनेमाई प्रयोग के तहत जलजला में तब्दील करने के साथ पूर्वी बंगाल के ठेठ लोक संसार और जनपदों की विरासत की प्रस्तुति है तो जन नाट्य संघ में पार्टी की राजनीतिक दख़लदारी का दो नाट्य गुटों के विवाद कोलाहल के जरिए खुलासा भी है। जन नाट्य आंदोलन में तब हर विधा, हर माध्यम, हर कला के सर्वश्रेष्ठ लोग थे,जिन्हें किनारा कर दिया जा रहा था। कोमल गांधार इस राजनीतिक दुष्कृत्य का सिनेमाई प्रतिरोध है। कुलीन वर्चस्व को यह कतई मंजूर न हुआ।
विभाजन पर बनी इन तीनों फिल्मों में विजन भट्टाचार्य की खास भूमिकाएं थीं। ऋत्विक ने खुद अभिनय किया। महाश्वेता देवी के पति और नवारुण भट्टाचार्य के पिता जन नाट्य संघ के नाटक नवान्न के बिजन भट्टाचार्य भी इस वर्चस्ववाद के शिकार हुए। दूसरे लोग भी होते रहे।इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता यहां नहीं है।लेकिन कोमल गांधार बनने से पहले ही जन नाट्य संघ का बिखराव और टूटन सत्ता की राजनीति में विचारधारा के समहित होने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो गया था।ऋत्विक और विजन दोनों वैचारिक रूप से इस्पात की तरह मजबूत थे। कोमल गांधार से उनके बहिष्कार की शुरुआत हुई।
फिर सुवर्णरेखा में तो ऋत्विक ने इस बहिष्कार के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध घोषणा कर दी मनुस्मृति वर्चस्ववाद के विरुद्ध, कुलीनत्व के विरुद्ध और ब्राह्मणवाद की अंतरण जातिव्यवस्था के विरुद्ध। जाति व्यवस्था और कुलीन तंत्र को बनाए रखने के लिए ही भारत का विभाजन हुआ, शायद सुवर्णरेखा बनाते वक्त ऋत्विक इस सच को जान चुके थे।सन्यासी विद्रोह , मतु आ नमोशुद्र आंदोलन, आदिवासी किसान विद्रोह और आंदोलन, हरिचांद गुरु चांद ठाकुर, ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, जोगेंद्र नाथ मंडल के नेतृत्व में आदिवासियों मुसलमानों दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की साझा राजनीतिक शक्ति, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से ब्राह्मणवाद के अस्तित्व और मनुस्मृति राज को जो गंभीर खतरा पैदा हो गया था, उसे विखंडित करने के लिए भारत विभाजन की विभीषिका रचा गया।
सुवर्ण रेखा में वर्चस्ववाद के मूल जाति व्यवस्था पर सबसे ताकतवर प्रहार किया सुवर्ण रेखा में ऋत्विक घटक ने। शरणार्थी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंप और पुनर्वास कालोनियों में हुए भेदभाव का चरमोत्कर्ष छिन्नमूल स्त्री सीता की आत्महत्या है। इस आत्मध्वंस के बिना जाती वर्चस्व के सम्मुख अपने ईश्वर, अपने मतवाले मदहोश सगे भाई से अपना सम्मान, अपनी अस्मिता को बचाने का कोई रास्ता नहीं है। आक्रोश में बहन का गला काटकर उसे बचाने से भी तीव्र है यह अभिव्यक्ति। छिन्नमूल भाई बहन ईश्वर और सीता को कोलकाता की रिफ्यूजी कॉलोनी में पनाह मिली थी। दोनों भाई बहन कुलीन ब्राह्मण थे। ईश्वर ने बालिका छोटी बहन सीता के साथ एक दलित बालक अभिराम का पालन पोषण कर रहे थे।
इसी रिफ्यूजी कॉलोनी में अति दलित बागदी बहू को जमींदार के लोग उठा ले जाते हैं जिसे कॉलोनी से बहिष्कृत किया जाता है। जाति वर्चस्व के कारण किसी की हिम्मत नहीं होती विरोध करने की। फिर सुवर्ण रेखा के तट पर सिंहभूम के घाटशिला के आदिवासी भूगोल में प्राकृतिक परिवेश में अति सुंदरी बहन सीता और अभिराम को लेकर नौकरी करने चले जाते हैं। जाति वर्चस्व के सच का पर्दाफाश करने के लिए ऋत्विक ने जेल जंगल जमीन के हक हकूक की हजारों साल की विरासत जमीन आदिवासी भूगोल को ही क्यों चुना? क्योंकि यही तो मूल निवास है वंचितों का,जिसे वर्गीय जाति आधारित कुलीन वर्चस्व के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचा ने अपने जनसंहार अश्वमेध से तहस बहस कर दिया और यह सिलसिला आज भी जारी है।
साथ साथ पले बढ़े सीता और अभिराम के प्रेम से कुलीन ब्राह्मण ईश्वर के उदारतावाद का अंत हो गया।रातोंरात उसने अन्यत्र सीता का विवाह तय कर दिया और सीता अभिराम के साथ कोलकाता भाग गया। कोलकाता में मोबलिंचिंग में अभिराम मारा गया तो नए सिरे से छिन्नमूल हो गई सीता के लिए नाचने गाने की आजीविका अपनाने को बाध्य होना पड़ा और हुआ यह कि जो पहला ग्राहक के सामने उसे पेश किया गया, वह पिता समान उसका बड़ा भाई था जिसे इतना नशा हो गया था कि पता ही नहीं चला कि उसके सामने उसकी सगी बहन है।
सीता ईश्वर की हत्या नहीं कर सकती थी तो क्या करती?
यह भारत विभाजन की कुल कथा है। जाति वर्चस्व की विभीषिका है विभागों की त्रासदी, यही ऋत्विक घटक की फिल्म सुवर्णरेखा है।
रिफ्यूजी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंपों , पुनर्वास कालोनियों , पहाड़ों, मरुस्थल, टाइगर फॉरेस्ट समेत घने जंगलों में बंगाल से बाहर विभाजन पीड़ित जिन करोड़ों लोगों को बिखेर दिया गया, वे पूर्वी बंगाल में आदिवासियों, मुसलमानों,दलितों और पिछड़ों की सम्मिलित फौज थी,जिसने मनुस्मृति राज के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था पलाशी के युद्ध के समय से, उन्हें तहस नहस करने की कथा ऋत्विक ने चूआड़ विद्रोह की जमीन पर कहने का विकल्प चुना। क्या यह सिर्फ संजोग है?
यह क्या संजोग मात्र है कि 99 प्रतिशत पूर्वी बंगाल के सवर्ण विस्थापित पश्चिम बंगाल में न सिर्फ व्यवस्थित हो गए, जीवन के हर क्षेत्र में वे आगे हैं? दूसरी ओर 99 प्रतिशत दलित और पिछड़े बंगाल से बाहर 22 राज्यों में बिखेर दिए गए बंगाल के मौसम,जलवायु,जमीन की तरह मातृभाषा,इतिहास,भूगोल, संस्कृति ,विरासत और नागरिकता से भी बेदखल। अंडमान निकोबार और दंडकारण्य से लेकर उत्तर भारत के टाइगर प्रोजेक्ट में जिन्हें बाघ, मगरमच्छ और समुद्री तूफान का चारा बना दिया गया। नई दिल्ली,मुंबई और देश के बड़े शहरों में जहां बंगाली विस्थापितों की पुनर्वास कालोनियों का निर्माण हुआ,वहां दलित और पिछड़े कितने हैं?
सिंध से आए सारे सम्पन्न स्वर्ण शरणार्थियों को बड़े शहरों में पुनर्वास दिया गया। पश्चिम पाकिस्तान से आए पंजाबी सवर्ण हिंदुओं और कुलीन सिखों को पंजाब, नई दिल्ली में जगह मिल गई लेकिन दिल्ली में ही दलित पंजाबियों की बस्तियों की कहानी और हैं वैसी ही जैसी पश्चिम बंगाल की हजारों जबर दखल कॉलोनियों में फंसे रह गए दलित पिछड़े पूर्वी बंगाल के विस्थापित। राय सिखों, मजहबी सिखों को तो पूर्वी बंगाल के दलित शरणार्थियों के साथ टाइगर प्रोजेक्ट में ही बाघ का चारा बना दिया गया।सरहद के उस पर पूर्वी पाकिस्तान जा पहुंचे बिहारी यानी उर्दू भाषी मुसलमानों और पश्चिम पाकिस्तान चले गए मुहाजिरों का क्या हुआ।
सरहद के आर पार भारत विभाजन के कारण बह निकली खून की नदियां आज भी जिंदा हैं।निरंतर जल प्रवाह के साथ बह रहा है वंचितों का खून। मॉब लांचिंग तो अब सांस्कृतिक राजनीतिक महोत्सव है साहित्य उत्सव की तरह कुलीन।
विभाजन की इस जातिगत,वर्चस्ववादी कथा को खाने का दुस्साहस ऋत्विक ने किया और इसी तरह विभाजन की त्रासदी को जिया। बांग्लादेश बनने के बाद वहां जाकर युक्ति तर्क गप्पों या तितास एकटी नदी जैसी फिल्म बनाई। कितना दर्द, कितना विद्रोह और कितने ज्वालामुखी का समाहार है ऋत्विक।
स्त्री अस्मिता इस वर्गीय जातिगत वर्चस्ववाद के विरुद्ध इन तीनों फिल्मों में ऋत्विक का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार और सिनेमाई चमत्कार है। मेघे ढाका तारा की नीता का चीत्कार, कोमल गांधार की अनुसुइया की दृढ़ता, सीता का आत्मध्वंस और बाग़दी बहू के भिड़ाकर से तार तार हो गया वर्चस्ववादी कुलीनत्व।
यही ऋत्विक घटक का अपराध है।
इसकी सजा को उन्होंने आजीवन भोगा।
इन फिल्मों के पात्र परिचय और कलात्मक पक्ष को हम इस लेख में छू नहीं सके।इस पर लगातार चर्चा होती रही। जिसकी कभी चर्चा नहीं हो सकी, या चर्चा नहीं होने दी, हमने सिर्फ वही लिखा
कृपया बच्चों को बच्चा बने रहने दें
कृपया बच्चों को बच्चा बने रहने दें। जल्दी बड़ा और कामयाब बनाने के चक्कर में उनका बचपन न छीनें। उनकी जिज्ञासाओं का अंत नहीं है।उनके सवालों का सही जवाब देने का प्रयास करें। उन्हें प्रश्न करने से रोके नहीं। अगर बच्चा पढ़ने लिखने के बजाय खेलकूद, चित्रकला, संगीत और नृत्य में रुचि ज्यादा लें, तो पढ़ाई के नाम उसकी रचनात्मकता और प्रतिभा पर अंकुश कृपया न लगाएं।
निजी तौर पर बच्चों के प्रश्नों, उनके देखने और कहने के नजरिए से, उनके निश्छल प्रेम से रोज सीखता हूं। पृथ्वी, प्रकृति और सारी चीजों को देखने का उनका तरीका मौलिक और अप्रत्याशित होता है, जिसमें उनकी रचनात्मकता होती है।
मैं घर में, गांव में स्कूल में या आते जाते हुए हर बच्चे से दोस्ती करने की कोशिश करता हूं। उनका प्यार निस्वार्थ होता है। उनके संवाद में हिंसा और नफरत नहीं होती। वे रोज अपनी पृथ्वी को अपनी स्मृति और कल्पना में रचते हैं,जो हमारी पृथ्वी से सुंदर और बेहतर होती है। मुझे उनसे प्रेरणा, शिक्षा और ऊर्जा मिलती है।
क्रिसमस से पहले डोडो ने हमसे सांता क्लॉज की ड्रेस लाने को कहा था। हमने ला दी। सांता बनते ही डोडो ने देखा,उसकी ड्रेस के साथ एक छोटा सा थैला है।
फौरन उसने कहा, मुझे टॉफी चाहिए।
हमने कहा, आपके दांतों में दर्द होता है।टॉफी नहीं कुछ और के लीजिए।
वह बोला, सांता तो सबको गिफ्ट बांटता है। हम टॉफी नहीं बांट सकते।
लिहाजा ढेर सारी टॉफी खरीदी गई।
शिवन्या इन दिनों खूब साइकिल चलाती है।
डोडो ने कहा, दीदी, आप सांता की हिरण बन जाओ।
फिर क्या था? शिवन्या साइकिल चला रही थी और डोडो गांव भर के बच्चों और बड़ों को भी टॉफी बांटता रहा।
मैं अक्सर भूलने लगा हूं।रात को गैस वाले से गैस देने के लिए कहा था। सुबह सात बजे गैस वाला रुद्रपुर से गैस लाए।गाड़ी हमारे घर के सामने खड़ी करके दरवाजे पर दस्तक देते रहे। मुझे गैस की याद नहीं थी।सविता जी भी भूल गई थी।बहुत घना कोहरा था।ठंड काफी ज्यादा थी।इससे ज्यादा गहरी नींद थी। खुली नहीं।
फिर गैस वाले को फोन किया। अगली सुबह छह बजे सड़क पर जाकर खड़ा हो गया। कोहरा था।ठंड भी थी। गलन और ओस अलग थी।खुले में खड़े नहीं हो सकते थे। मंदिर और स्कूल के पीछे दुकान के बरामदे में जाकर खड़ा हुआ।तब तक घर से कोई नहीं निकला था।
तभी मैने देखा कि डोडो का दोस्त नर्सरी में पढ़ने वाला सिद्धार्थ सौ डेढ़ सौ मीटर की दूरी से अपने घर से बाहर निकला। मैं सामने खड़ा हो गया।
पूछा,इतनी ठंड में,इतनी सुबह कहां जा रहे हैं आप।
उसने कहा,मंदिर।
काली मंदिर सुनसान था। मैंने सोचा, शायद उसकी मन या दादी वहां होंगी।
पांच मिनट में सिद्धार्थ वहां से लौट आया। मंदिर में कोई नहीं था।उसके हाथ में कुछ था।
मैंने पूछा, क्या ले जा रहे हो।
उसने कहा, माटी।
मैंने पूछा,क्यों?
मेरे दादाजी को बुखार आ गया है।इस माटी से वे ठीक हो जाएंगे।
यह आस्था या संस्कार का मामला नहीं, बिल्कुल विशुद्ध प्रेम का मामला है।
दादाजी को ठीक करने की लिए इस कड़ाके की सर्दी में बिस्तर और नींद से निकलकर वह मंदिर से माटी ले गया।
मैं कतई धार्मिक नहीं हूं। दैवीय चमत्कार में मेरी आस्था नहीं है। लेकिन किसी देवी चमत्कार से ज्यादा बड़ा चमत्कार सिद्धार्थ के प्रेम में है। मुझे पक्का यकीन है।
सांता की ड्रेस डोडो को देने पर टुसू ने कहा था, डोडो को यह ड्रेस क्यों दे रहे हैं? देख नहीं रहे, क्रिसमस के खिलाफ पूरे देश में क्या हो रहा और हमारे लोग भी कितने बदल गए हैं?
सांता बनकर जब डोडो गांव में घर घर निकला, सिर्फ बच्चे ही नहीं, सारे लोग खुश हुए।
धर्म से बहुत बड़ा है प्रेम
और सबसे बड़ा है बच्चे का प्रेम।
पलाश विश्वास
Saturday, December 20, 2025
नैनीताल में हिमपात, हिंसा और घृणा की कार्पोरेट संस्कृति ने सबकुछ बदल दिया
#नैनीताल में #सत्तर के दशक का #हिमपात और अब?
#तराई में शीत लहर के हालत हैं। घना कुहासा है या फिर आसमान में गगन घटा गहरानी। सूरज के दर्शन नहीं हो रहे हैं इन दिनों। सर्द हवाओं से मौसम नैनीताल का है। अब सर्द हवाएं नैनीताल से हम तक पहुंचती हैं,लेकिन घर लौटे नौ साल हो गए,नैनीताल जाना न हो सका।
ऐसा तब भी हुआ था, जब डीएसबी कॉलेज में अग्निकांड में आर्ट्स ब्लॉक,लाइब्रेरी, रीडिंग रूम, केमिस्ट्री लैब जलकर राख हो गए थे।अपनी सबसे सुनहरी स्मृतियों की राख को देखने की हिम्मत नहीं हुई थी एक दशक तक।
अब नैनीताल जाने से डरता हूं।वे लोग नहीं हैं, जो हमारे नैनीताल में थे। वह नैनीताल भी नहीं है।
इन्हीं दिनों सत्तर के दशक में नैनीताल बर्फ से लकदक हुआ करता था। नवंबर के घने कुहासे से आजादी मिलती थी दिसंबर के हिमपात में।
बीस दिसंबर को जाड़ों की छुट्टियां शुरू हो जाती थी।लेकिन दिसंबर शुरू होते न होते हिमपात शुरू हो जाता था। तापमान भले शून्य से नीचे हो इस तस्वीर की जैसी बर्फबारी के बाद खिलखिलाती धूप और नीली झील के सान्निध्य में देह मन में इतनी ऊष्मा भर जाती थी कि रात रात भर हम लोग झुंड बनाकर साहित्य,संस्कृति, फिल्म और देश दुनिया पर मालरोड पर टहलते हुए रात रात भर चर्चा करते थे हिमपात के मध्य।
यह तस्वीर Abhay Kumar Gupta जी की स्मृतियों की है।वे भी हमारी तरह सत्तर के दशक में डीएसबी के छात्र हुआ करते थे।
इस साल नैनीताल में अभी तक हिमपात नहीं हुआ। होगा तो पर्यटकों के लिए होगा और हम पर्यटक नहीं हैं।
तराई में बहुत सर्दी हो गई। आज सुबह Rupesh Kumar Singh ने अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz के दफ्तर को निकलने से पहले अचानक कहा, चश्मा और मोबाइल उठाओ।चलो।
कार सीधे चौराहे पर एक शो रूम के सामने रुकी। दुकानदार को उसने इशारा किया तो मेरे सामने जैकेट का ढेर लग गया। एक जैकेट उसने पसंद किया, मैंने हां कर दी।लेखनी कहा,बहुत महंगा होगा। वह बोलो, पहन लो और टुक टुक पकड़कर दफ्तर चले जाओ।
रूपेश जब भी पैसे होते हैं कुछ न कुछ हम सभी के लिए करते रहते हैं। खर्च बहुत बढ़ गया है। प्रेरणा अंशु नियमित निकालना हम सबके लिए बड़ी चुनौती है। अनसुनी आवाज़ की टीम के लिए रोज मौके से रट दिन रिपोर्टिंग करने के खर्चे भी लगातार बढ़ रहे हैं।
फिरभी रूपेश सबकी जरूरत समझते हैं और इसी तरह अचानक कुछ करते रहते हैं। इससे खर्च भले हो, भावना के स्तर पर टीम बहुत मजबूत हो जाती थी।
हमारे बचपन में रूपेश जैसे लोग नहीं थे।गर्म कपड़े होते नहीं थे। फिरभी कुछ करने का जज्बा मौजूद था।
जाड़ों में घर लौटकर खेती बाड़ी के कामकाज में जुटने के बावजूद, रत दिन अध्ययन के बावजूद तराई के गांवों में आवाजाही लगी रहती थी।सभी समुदायों में मुहब्बत बहुत थी।पहाड़ और मौदान दिलों से जुड़े हुए थे। न अलगाव था और न अलगाव की राजनीति थी।
बाकी समय पहाड़ में होते तो मौसम चाहे जैसा हो, झोला उठाकर कहीं भी निकल जाते थे।
अब हिमपात के मध्य चलना नहीं होता।
अब हिमपात देखना भी नहीं होता।
सत्तर का दशक बहुत पीछे छूट गया। एक एक करके स्थित बिछड़ते जा रहे हैं। गिर्दा,देवीदत्त पंत, खड्ग सिंह वाल्दिया, विपिन त्रिपाठी, कमल जोशी, चंद्रेश शास्त्री,वीरेन डंगवाल, मोहन उप्रेती, लेनिन पंत, हिमांशु जोशी, परमार, पर्वतीय के संपादक उनियाल जी, रणजीत विश्वकर्मा, शमशेर सिंह बिष्ट, सखा दाजू, निर्मल जोशी, निर्मल पांडे और अब राजा बहुगुणा भी चले गए।
राजा बहुगुण कामरेड थे,लेकिन सत्तर के दशक के सहपाठी, मित्र और साथी।लाल सलाम कहकर हमेशा के लिए विदा करने के बावजूद स्मृतियां बनी हुई हैं।
जिस बंगाल होटल में डेरा था, हमारे अभिभावक उस होटल के मलिक सदानंद गुहा मजूमदार भी नहीं रहे।
मल्लीताल के वैष्णव होटल में हम रोज खाना खाते थे।वे शर्मा जी भी नहीं रहे।
जीआईसी नैनीताल में जब हमने 1973 में दाखिला लिया डीएसबी परिसर में, हमारे स्थानीय अभिभावक थे ढिमरी ब्लॉक किसान विरोध में पिताजी #पुलिनबाबू के सहौद्द।पहाड़,तराई और भाबर में विस्थापन के विरुद्ध पुनर्वास की लड़ाई में जो उनके सहयोद्ध थे, उनमें से कोई नहीं है।
दिनेशपुर और बसंतीपुर समेत तराई में तराई को बसने वाले हमारे पुरखे और स्वतंत्रता सेनानी,आंदोलनों में पिताजी के सहयोद्धाओं में से कोई नहीं है।वे स्त्रियां भी नहीं हैं, जिनके स्नेह प्रेम ने हमें हमेशा मजबूती दी।
कितने ही लोग अब नैनीताल में कभी नहीं मिलेंगे।
इसलिए सर्दी सहने की शक्ति भी खत्म सी है।
जो लोग बचे हैं, उनका ऐसा कायाकल्प हो गया कि पहचान में नहीं आते।
घृणा और हिंसा की ग्लोबल,कॉरपोरेट नई संस्कृति ने सारी परिभाषाएं, अवधारणाएं और शब्दों के असहाय बदल दिए हैं।लोकछवियां सिरे से अनुपस्थित है। सिर्फ बाजार शेष है। चेहरे और दिल ओ दिमागबदल गए हैं।वैचारिकी बदल गई है।
न समाज और सामुदायिक जीवन बचा है और न ही हमारा साझा चूल्हा।
इसलिए मौसम और जलवायु भी बदल गए हैं। धुआं धुआं आसमान है। हवाएं बहुत सर्द हैं। खेत खलिहान नहीं रहे। सिर्फ विकास का शोर है, उन्माद है और बाजार है। इसमें रिश्ते, नाते और मित्रता की गुंजाइश है?
Wednesday, December 17, 2025
जलपुरुष और अरावली संकट
जलपुरुष Waterman Rajendra Singh के साथ एकबार फिर #अरावली_संकट के विरुद्ध हम सभी मोर्चे पर हैं।जलपुरुष के साथ लंबे समय से,दशकों से हम सभी पृथ्वी, पर्यावरण, मनुष्यता और सभ्यता बचाओ कार्यकर्ता हैं।
#अरावली को ध्वस्त करके #कार्पोरेट कब्जे के खिलाफ लड़े में एकबार फिर साथ आने का मौका है।
अरावली राजस्थान और मध्य भारत, पश्चिमी भारत और अरब सागर की स्वतंत्रता का प्रतीक है। विदेशी हमलों के विरुद्ध प्रतिरोध की इस प्राचीन तम दीवार को बचाने की सख्त जरूरत है।
नदी बचाओ अभियान के तहत #जागेश्वर से #कोसी नदी के संगम, #अल्मोड़ा तक पैदल यात्रा में हम, Rupesh Kumar Singh और अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz,#प्रेरणा_अंशु की टीम साथ साथ चले हैं। लेकिन तस्वीरें नहीं मिल रही हैं।
#जलपुरुष' (Waterman of India) राजेंद्र सिंह हैं, जो जल संरक्षण के लिए जाने जाते हैं, और पलाश विश्वास एक पत्रकार और लेखक हैं, जो #पर्यावरण, #सामाजिक_न्याय और #हिमालयी मुद्दों पर लिखते हैं, और उन्होंने 'जलपुरुष' राजेंद्र सिंह के कार्यों पर भी लिखा है; दोनों का काम जल और पर्यावरण से जुड़ा है, लेकिन राजेंद्र सिंह #जल_संरक्षण के जमीनी कार्यकर्ता हैं जबकि पलाश विश्वास #पत्रकार के रूप में उनके काम और अन्य सामाजिक मुद्दों को उजागर करते हैं.
राजेंद्र सिंह (जलपुरुष):
पहचान: इन्हें 'भारत का जलपुरुष' कहा जाता है.
कार्य: #राजस्थान में जल संरक्षण के लिए 'जोहड़' (मिट्टी के बांध) बनाकर और नदियों (जैसे रूपारेल नदी) को पुनर्जीवित करने के लिए जाने जाते हैं.
पुरस्कार: #सामुदायिक नेतृत्व के लिए #रेमन_मैगसेसे पुरस्कार (2001) से सम्मानित.
पलाश विश्वास:
पहचान: एक जाने-माने पत्रकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्हें #उत्तराखंड और #झारखंड में 'पलाश दा' के नाम से जाना जाता है.
कार्य: #दलित अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक असमानता और #हिमालयी संघर्षों पर लिखते हैं.
योगदान: पत्रकारिता के माध्यम से #समाजवाद, #अंबेडकरवादी विचारों और #अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं.
हर सूरत में, हर कीमत पर हम जनता के पक्ष में, जनता के साथ
हम निरपेक्ष नहीं हैं।
हम हर सूरत में, हर कीमत में जनता के साथ हैं।
हम हर सूरत में जनता के पक्ष में है।
चाहे जनता के विपक्ष में कोई हो,
हम जनता के साथ, जनता के मोर्चे पर लामबंद,
रात दिन पूरी टीम के साथ जनता की लड़ाई में शामिल हैं।शामिल रहेंगे।
अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz बुलंद करते रहेंगे।
#प्रेरणा_अंशु में जनता के सवालों को उठाते रहेंगे।
हम जनता के पक्ष में हैं,इसलिए जनता के विपक्ष में हर ताकत के मुकाबले हम मोर्चा हैं।
हम निरपेक्ष नहीं है।
यही हमारी विचारधारा है।
Saturday, December 13, 2025
पुआल और अलाव
पुआल बहुत कम की चीज है।इससे गर्म कोई चीज नहीं है। एड्रियन में तो सबसे कम की चीज।जिनका रहने का ठिकाना नहीं होता सर्दियों में अलाव ही सहारा है।
बचपन में हम मिट्टी और फूस की झोपड़ियों में रहते थे। फर्श और दीवारें मिट्टी की होती थी।चारपाई या तख्त हमने तब देखे नहीं थे।
फर्श पर पुआल बिछाने पर झोपडी एयरकंडीशंड हो जाती थी। बाद में नैनीताल पढ़ने गए तो वहां बेड तो थे ही,हेयर का इस्तेमाल भी होता था।
बारात से तब रात को लौटने का इंतजाम नहीं था और न रात में ओढ़ने बिछाने का इंतजाम।बचपन में गांवों में बारात में जाने पर हम सबसे पहले पुआल का ढेर खोजते थे और नींद आने पर उसमें सोकर रात बीतते थे।
जड़ों की छुट्टियों में जब 20 दिसंबर को घर आते थे तो पहाड़ों में हिमपात की वजह से कड़ाके की सर्दी हो जाती थी।गर्म कपड़े भी खास होते नहीं थे। चादर या कम्बल का सहारा होता था।
कथरी और लिहाफ से भी अगहन पूस की रात बिताने के लिए अलाव और पुआल का सहारा था।
कोहरा और पाला खूब घना और बिजली नहीं।दिया और लालटेन से रोशनी होती थी।
पुआल के बिस्तर पर दिया की रोशनी में जितनी जितना तल्लीन होकर पढ़ा, फिर कभी उतनी एकाग्रता नहीं हुई।
पिताजी घर होते तो स्टोव पर रात को और भोर चार बजे चाय बनाकर पिलाते थे।
यह हमारे लिए बूस्टर थे।धोती चादर में सर्दी का बेफिक्री से उन्हें मुकाबला करते देखकर नैनीताल में शून्य डिग्री तापमान के नीचे भी मुझे पुआल की गर्मी महसूस होती थी।
Thursday, December 11, 2025
घुसपैठिए कहकर दंडकारण्य पुनर्वास योजना के तहत बसे बंगाली विस्थापितों को आदिवासियों से लड़ाने का मकसद क्या है?
मैं मानता हूं कि मेरा खून आदिवासी है, मिजाज योद्धा का है और अंतरात्मा स्त्री है।
आदिवासी हमसे अलग नहीं है।
धर्म और जाति के तंत्र में हम फंसे हुए हैं ,आदिवासी नहीं।
मीडिया में ओड़िशा के मलकानगिरी में दंडकारण्य प्रोजेक्ट के तहत बसाए गए विभाजन पीड़ित विस्थापितों को बांग्लादेशी बताया जाना बहुत भ्रामक और आपत्तिजनक है।
मलकानगिरी में उपद्रव दो गांवों का मामला है।एक आदिवासी स्त्री की हत्या से यह गुस्सा भड़का।पुलिस ने अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया है और वहां स्थिति अब नियंत्रित है। कृपया इसे आदिवासी बंगाली दंगा के रूप में प्रचारित करने से बाज आएं।
घटना का तथ्यात्मक ब्यौरा बीबीसी ने दिया है। गलत बयानी और गलत रिपोर्टिंग से पहले इसे जरूर पढ़ें।
1960 में भारत विभाजन के बाद आए विस्थापितों को विभिन्न कैंपों से लाकर मलकानगिरी के 250 गांवों, पाखनजोड़ कांकेर,छत्तीसगढ़ में नब्बे और ओडिशा के नवरंगपुर जिले के 85 गांवों में भारत सरकार की पुनर्वास योजना के तहत बसाया गया।इसके अलावा ओडिशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र और तेलंगाना में भी विभाजन पीड़ित बंगाली विस्थापित 1960 में बसाए गए उन्हें बांग्लादेशी हिंदू कहना सरासर गलत है।
यह एक आपराधिक कृत्य के खिलाफ एक गांव के लोगों का दूसरे गांव के खिलाफ भड़के गुस्से से फैली हिस्सा है। इसे बांग्लादेश हिंदुओं पर आदिवासियों का हमला कहना,प्रचारित करना और इस पर राजनीति करना भी बेहद गलत है।
जिन साथियों को इस बारे में कुछ मालूम नहीं है, वे कृपया Rupesh Kumar Singh की लिखी बंगाली विस्थापितों की आपबीती की किताब #छिन्नमूल और इस महादेश में सभी समुदायों के विस्थापन और पुनर्वास की लड़ाई पर केंद्रित मेरी किताब #पुलिनबाबू जरूर पढ़ें।
#बीबीसी की रपट इस प्रकार है:
ओडिशा के मलकानगिरी में हिंसाइमेज स्रोत,Subrat Kumar Pati
इमेज कैप्शन,पुलिस ने कहा है कि स्थिति उनके नियंत्रण में है
मामले की गंभीरता को देखते हुए डीजीपी योगेश बहादुर खुरानिया ने घटनास्थल का दौरा कर स्थिति की समीक्षा की. घटनास्थल पर भारी पुलिस बल तैनात है.
ओडिशा के गृह विभाग की ओर से जारी एक आदेश में कहा गया कि असामाजिक तत्व स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए ग़लत सूचना न फैलाएं, इसलिए इंटरनेट सेवा बंद की गई है.
मलकानगिरी के एसपी विनोद पाटिल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि स्थिति नियंत्रण में है. इंटरनेट सेवा बंद है, ज़रूरत पड़ने पर आगे भी इसे बंद रखा जाएगा.
उन्होंने बताया कि पुलिस की मौजूदगी में मंगलवार को मृत महिला का अंतिम संस्कार किया जाएगा. एसपी विनोद पाटिल के मुताबिक़ इस मामले की उच्च स्तरीय जांच जारी है.
#BBC_News_हिन्दी
Wednesday, December 10, 2025
लिखोगे तो बचोगे। चेहरा एक सा नहीं रहता।
एक प्रिय बेटी के लिए
बहुत बहुत आभार।आप जितना अच्छा बोलती हैं ,उतना ही अच्छा लिखती हैं।
विजुअल मीडिया में लोकप्रियता जल्दी मिलती है और व्यस्तता बढ़ जाती है।लिखना आहिस्ते आहिस्ते छूट जाता है।
बहुतों के साथ ऐसा होता रहा है। मुझे इसकी चिंता थी आपको लेकर।
नब्बे के दशक में कोलकाता में जब न्यूज चैनल नए नए खुल रहे थे, अंग्रेजी,बांग्ला और हिंदी में कोलकाता में बोलने वाले कम लोग थे।हर चैनल से मुझे बहुत अच्छे ऑफर मिले।
सविताजी ने veto लगा दिया।कहा, जब तक चेहरा दिखेगा,अच्छा आकर्षक नजर आएगा, जब तक पर्दे पर बने रहोगे, सबकी नजर तुम पर रहेगी।फिर लोग भूल जाएंगे।कोई रिकॉर्ड भी नहीं बचेगा।
इंडियन एक्सप्रेस छोड़कर कहां जाओगे?
लिखोगे तो आज नहीं तो कल,सौ दो सौ या पांच सौ साल बाद लोग पढ़ेंगे जरूर।
विश्व पुस्तक मेले में पुलिनबाबू
#पुलिनबाबू:#विस्थापन_का_यथार्थ, #पुनर्वास_की_लड़ाई
विस्थापन इस महादेश ही नहीं, पूरी दुनिया की समस्या है।आधी दुनिया विस्थापितों की हैं। वे अलगाव, वंचना,उत्पीड़न और अन्य के शिकार नागरिकता, मातृभाषा, इतिहास,भूगोल, जल जंगल जमीन, विरासत, संस्कृति, अस्मिता, पहचान के संकट से जूझते हुए अपना अपना फिलिस्ती जी रहे है।
अपने पिता पुलिनबाबू की सरहदों के आर पार पुनर्वास, नागरिक और मानवाधिकार के संघर्ष और संवाद के बहाने आंदोलनकारी पुरखों के गांव बसंतीपुर को आधार बनाकर अपने तीन वर्षीय पोते की स्मृति की निरंतरता में विस्थापन का यथार्थ जीते हुए अपने पचास साल की पत्रकारिता की दृष्टि से इस महादेश में विस्थापन की समस्या को समग्रता से देखते हुए मैंने पुनर्वास की लड़ाई पर किताब लिखी है।
सत्तर साल की जिंदगी में पढ़ने लिखने के अलावा कुछ नहीं किया।बड़े अखबारों में चार दशक तक संपादकीय में कम किया और पांच दशक तक हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी में निरंतर लिखा है,बोला है जनता के ज्वलंत मुद्दों पर।
फिरभी मैं एक रिटायर्ड श्रमजीवी पत्रकार हूं। मैंने न सत्ता के गलियारे से संबंध रखा और न अपने संबंधों को भुनाया। हमेशा कार्पोरेट राज और मुक्त बाजार की विषमता के विरुद्ध समता और न्याय के लिए लिखा है। मैं कोई साहित्यकार नहीं हूं।सदा आम सामाजिक कार्यकर्ता हूं। रिटायर हुए एक दशक बीत गया।कोई जमा पूंजी नहीं है।अपने घर और गांव में हूं तो राशन पानी का तात्कालिक संकट नहीं है। मेरे सामाजिक कम को देशभर से समर्थन मिलता है। देशभर के लोगों का प्यार मिलता है।इतना काफी है पूंजी बतौर मेरी बची खुची जिंदगी के लिए।
अब मैं किताबें खरीद नहीं सकता।अपनी किताब भी नहीं। अपनी किताब की भी मेरे पास कोई प्रति नहीं है।चर्चा के लिए, समीक्षा के लिए या मित्रों के लिए किताब खरीदने की मेरी हैसियत नहीं है।
खासकर देशभर में विभिन्न भाषाओं के उन मित्रों से माफी चाहता हूं जो पिछले पांच दशकों से मुझे अपनी किताबें भेजते रहे हैं। अपनी किताब मैं उन्हें भेज नहीं सकता। यह किताब अमेजन या प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से ही खरीदकर पढ़ सकते हैं आप अगर यह किताब आपको जरूरी लगती है।
दिल्ली पुस्तक मेले में जो मित्र या साथी जाएंगे, वे चाहें तो न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल से यह किताब प्राप्त कर सकते हैं।
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Tuesday, December 9, 2025
हम जन इतिहास और पीड़ित जनता की आपबीती भी दर्ज करते हैं।
देवरिया, उत्तर प्रदेश में प्रेरणा अंशु
योगेन्द्र पांडेय पत्रिका के साथ।
तमाम मुश्किलात के बावजूद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम,बंगाल,महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में भी प्रेरणा अंशु पहुंच रही है।
झारखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान,मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सर्वत्र आपकी पत्रिका पहुंच रही है। हिमालय से लेकर हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी से लेकर अरब सागर, कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी, पूर्वोत्तर से लेकर कच्छ के रण और जैसलमेर जोधपुर बीकानेर के मरुस्थल तक।
हमें आर्थिक सहयोग के अलावा प्रासंगिक, जनता के ज्वलंत सवालों पर मजबूत कंटेंट की सख्त जरूरत है। कथा रिपोर्ताज, जमीनी रपट और तथ्यात्मक आलेख सबसे जरूरी है।सभी विधाओं में अप्रकाशित मौलिक रचनाएं सिर्फ मेल से आमंत्रित हैं।
हम रात दिन जनता के बीच हैं।
हम रात दिन जनता के मोर्चे पर है।
हम रात दिन जनता की अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz बुलंद कर रहे हैं।
फेसबुक पर अनसुनी आवाज़ के पचास हजार और यूट्यूब पर 35 फॉलोअर हैं,जिनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है।
हमें आपके समर्थन, प्यार और सहयोग चाहिए।
हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हाशिए के लोगों और उपेक्षित भूगोल को है। हम हर कीमत पर संसाधन सीमित होने के बावजूद प्रेरणा अंशु हर महीने नियमित और निरंतर निकाल रहे हैं और जन इतिहास और पीड़ितों की आपबीती भी दर्ज कर रहे हैं।
Sunday, December 7, 2025
मुक्त,आत्मनिर्भर,सुखी, समृद्ध हो हमारी बेटियां, बहुएं, बहनें और सभी स्त्रियां
#मुक्त,#सशक्त, #सुखी,#समृद्ध हों #हमारी_बेटियां,#बहुएं और #सभी_स्त्रियां
#प्रेरणा_अंशु के #किशोरी_केंद्रित #स्त्री_विशेषांक के लिए 15 जनवरी तक सभी विधाओं में रचनाएं आमंत्रित।
मेरी मां बसंती देवी के बन पर मेरे गांव का नाम बसंतीपुर पड़ा। आंदोलनकारियों का गांव है यह। इस गांव से मां को इतनी मुहब्बत थी कि चालीस साल हम बाहर रहे, मां एक दिन के लिए भी हमारे डेरे पर कहीं नहीं गई। मायके भी नहीं। पिताजी सड़क के आदमी थे।सड़क और संसद की लड़ाई में वे मां के लिए या परिवार के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सके।सिर्फ हमारे पढ़ने लिखने और मनुष्य होने पर उन्होंने सबकुछ दांव पर लगा दिया।
मेरे परिवार,मेरे गांव और तराई के लोगों ने मेरी मां को इतना सम्मान दिया कि उन्हें जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं थी।जीवनभर वे दूसरों का ख्याल रखती गई।
मेरी ताई हेमलता हरिचांद गुरुचांद ठाकुर की वंशज और उनके आंदोलन की बारिश थीं। घर में वे सर्वेसर्वा थीं। मेरे ताऊजी अनिल विश्वास खेती और संगीत में व्यस्त रहते थे। स्त्रियों का सम्मान करना मैने उनसे सीखा।
मेरी चाची ऊषा देवी को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था। उनसे इसलिए हमारी निकटता ज्यादा थी। उनका बेटा सुभाष मुझसे दो साल छोटा है। वह धनबाद और कोलकाता में भी पत्रकारिता करता रहा।चाची इसलिए मृत्यु तक हमारे साथ थीं। उन्होंने कैंसर से 1994 में कोलकाता में दम तोड़ा। ताई जी 1991 में और मां 2006 में चली गईं। लेकिन तीनों हमारे साथ हमेशा मौजूद हैं।
बसंतीपुर ही नहीं, दिनेशपुर की रिफ्यूजी बंगाली कॉलोनियां ही नहीं, तराई और पहाड़ में भी मुझे सभी स्त्रियों का इतना प्यार मिला है कि उनका ऋण और मेरा उनके प्रति फर्ज का बोझ बहुत बड़ा है।
प्रेरणा अंशु के दफ्तर में जाम मैं रोज काम करता हूं,मास्टर प्रताप सिंह का घर है। इस घर में भी मेरी तीन बेटियां हैं। Samajotthan School- English Medium Co-Ed School Dineshpur की एमडी Babita Rani Rathour , Shalini Singh और Priya Rathour , ये तीनों और गीता जी मेरी मां की तरह मेरा ख्याल रखती हैं। इनके अलावा दोनों स्कॉलों की शिक्षिकाएं मेरी बेटियां हैं।
जाहिर है कि जिनसे जिंदगी जीने लायक हो गई है, उनके अधिकारों की लड़ाई में भी हमें शामिल जरूर होना चाहिए।विभाजन पीड़ित स्त्रियों की कथा व्यथा सिर्फ #मेघे_ढाका_तारा, #कोमल_गांधार,
#सुवर्ण_रेखा,
#तमस
#गर्म_हवा या #पिंजर तक सीमाबद्ध नहीं है।
यह हमारी देखी भोगी जिंदगी है।
करोड़ों स्त्रियों के संघर्ष और जिजीविषा के कारण हमारा वजूद है।इसलिए स्त्री मुक्ति हमारे लिए कोई विमर्श, नारा या विचार तक सीमित नहीं है। यह हमारी जिंदगी का मकसद है।
इसलिए हमने हमेशा कोशिश की है कि सविता जी को कोई तक़लीफ न हो,कोई तनाव न हो, उनकी भावनाओं को को कोई आघात न हो।हम कुछ कर सके या नहीं, उन्हें हर सूरत में सुखी होना चाहिए।
हमारी अपनी कोई बेटी नहीं है। लेकिन इस महादेश के कोने कोने में पहाड़, मैदान,मरुस्थल, रण और द्वीपों में हमारी असंख्य बेटियां हैं।
घर में फिलहाल बहू बनकर एक बेटी Gaytri Biswas आई हैं। जो खुद मेरी ताई की तरह मतुआ परिवार से आई है। जो सिर्फ बेटी नहीं, सिर्फ डोडो और शिवन्या की मां नहीं,हमारी भी मां है।मेरी ताई की तरह वह भी घर में सर्वेसर्वा हैं। जो भी बेटी इस घर में आएगी भविष्य में उसे भी हम पलक पांवड़े पर बैठाएंगे।
हम अपने मरने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बेटी, बहू, मां, बहन या कोई स्त्री जहां भी हो, वह मुक्त आत्म निर्भर, सशक्त, सुखी और समृद्ध हो।
यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा मकसद है क्योंकि हमने स्त्रियों को जितना कष्ट, दुख और यातना,उत्पादन का सामना करते देखा है, वे परिस्थितियां आज भी मौजूद हैं। क्योंकि पितृसत्ता, धर्मसत्ता, राजसत्ता और कॉरपोरेट राज एकाकार है और स्त्री के विरुद्ध है।
#प्रेरणा_अंशु का #स्त्री_विशेषांक
*प्रेरणा अंशु का मार्च 2026 अंक स्त्री विशेषांक होगा।*
इस अंक की अतिथि संपादक होंगी *अध्यापिका, कथाकार, चिंतक डॉ ऋचा पाठक जी।* रचनाओं पर अंतिम निर्णय उनका ही होगा। उन्हें सीधे मेल से रचनाएं भेज सकते हैं।
उनका मेल:
dr.richapathak5@gmail.com
हमें कैसी सामग्री चाहिए और आपको क्या लिखना है इस पर ऋचा जी से कृपया सीधे उनके मोबाइल नंबर
+91 89232 03995 पर बात की जा सकती है।
आप हमें भी मेल कर सकते हैं।
हमारा mail- prernaanshu@gmail.com
रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 है।
यह अंक सभी तबके की स्त्रियों और विशेष तौर पर किशोरी कन्याओं की समस्याओं और उनके संघर्ष पर केंद्रित होगा।
कथा रिपोर्ताज को प्राथमिकता दी जाएगी। लघुकथा, कहानी, ग़ज़ल और काव्य विधाओं में रचनाएं आमंत्रित हैं। आलेख की शब्दसीमा डेढ़ हजार शब्द है।
स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं की रचनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। वे अपने स्कूल कॉलेज, कक्षा का उल्लेख जरूर करें।
पुरुष रचनाकारों की रचनाओं का भी इन मुद्दों पर स्वागत है। अस्मिता, स्त्रीवाद, स्त्री विमर्श के अलावा स्त्रियों की जो व्यवहारिक समस्याएं, मुद्दे और उनकी रचनात्मकता है,उसकी गहन पड़ताल के लिए आप सभी का स्वागत है।
कृपया सहयोग बनाए रखें।
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक
प्रेरणा अंशु,
दिनेशपुर, उत्तराखंड
Friday, December 5, 2025
SIR के बाद इन्हें मंगल ग्रह भेज देंगे?
SIR के बाद आप हम नागरिक माने नहीं गए तो चिंता न करें ,गगनयान हैं, मंगल ग्रह भेज दिए जाएंगे।
वहां से किसी और ग्रह में घुसपैठ कर भी लें तो क्या खंडित अखंड भारत के भूगोल इतिहास में लौटने की संभावना नहीं है।
शायद लोकेशन गलत हो, 15 अगस्त,1947 के बाद अखंड भारत के करोड़ों नागरिक पीढी दर पीढ़ी मंगलग्रह पर हैं और उन्हें इस पृथ्वी का कोई अधिकार नहीं है।
इससे पहले भी वे कहां थे पृथ्वी पर?
पृथिवी के पांच तत्व उनके लिए निषिद्ध थे क्योंकि वे अशुद्ध थे और उनके अधिकार नहीं थे कोई।
इन दिनों मंगल ग्रह और आकाशगंगाओं में जीवन होने की संभावनाओं को पुष्ट करने वाले तथ्य,प्रमाण और संकेत बताते हैं कि इस महादेश के विभाजन पीड़ित करोड़ों विस्थापित दरअसल मंगल ग्रह या किसी ब्लैक होल के नागरिक हैं।
क्या पता कि रहस्यमय ब्लैक मैटर ही हों।
इस महादेश में
Black never mattered
Would never be mattered
विशुद्ध रक्त की नदियां बह रही हैं
अनंत वध स्थल से अनंत काल
अनंत कुएं की अनंत गहराइयों में
जीवन यापन रक्तमय
इसीलिए तो लावारिश लहू की शिनाख्त नहीं होती।
लेकिन ब्लैक मैटर की मृत्यु नहीं होती और ब्लैक होल से कोई नहीं बचता।
बसंतीपुर के बच्चे
#प्रेरणा_अंशु के साथ #बसंतीपुर के सारे बच्चे।
आज बसंतीपुर के बच्चों ने प्रेरणा अंशु के बाल विशेषांक नवंबर अंक के साथ कविता पथ का सिलसिला जारी रहेगा।दिसम्बर का बाल विशेषांक भी आ गया।इस अंक के साथ भी हमारे बच्चे कविता पथ करेंगे।
हमारे सबसे पुराने बचपन के मित्र और बसंतीपुर को सांस्कृतिक गतिविधियां में अग्रणी बनाने वाले Nityanand Mandal ने गांव के सभी बच्चों को भाषा, साहित्य, प्रेरणा अंशु और सांस्कृतिक गतिविधियां से जोड़ने का बीड़ा उठा लिया है।हर गांव में उनके जैसे युवा साथी सक्रिय हो जाएं तो निश्चित ही पढ़ने लिखने की संस्कृति बहाल होगी।
बच्चे डिजिटल दुनिया के गहरे असर में हैं और हम?
बच्चों को भाषा,साहित्य, संस्कृति, लोक और विरासत से जोड़ने के लिए हम आखिर कर ही रहे हैं?
छोटी पहल से पड़ी शुरुआत हो सकती है।
आज चार छोटे बच्चों ने कविता पाठ किया।
काव्य विश्वास, शिवन्या विश्वास, परी और तृषा साना चारों छोटी कक्षाओं में पढ़ती हैं। उनका जज्बा देखिए।
कल जो वीडियो हमने जारी किए थे, उनमें सबसे छोटा कौशिक मंडल, फिर जया मंडल और सबसे बड़ी प्रतिभा मंडल ने कविता पाठ किया था। ये सारे वीडियो हमारे सबसे पुराने मित्र Nityanand Mandal ने तैयार कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम और वीडियो दूसरे बच्चों के साथ भी जारी करेंगे।
इनमें कौशिक सबसे छोटा है,पत्रिका हाथ में लेकर जो कविताएं उसे कंठस्थ है,सुना डाली कैमरे के सामने।यह कम नहीं है। प्रतियां चूंकि दसवीं में पढ़ती है,उसने प्रेरणा अंशु से कविता पथ किया है।
आज काव्या,तृषा, शिवन्या और परी चारों छोटी हैं।
इन बच्चों का उत्साह वरदान करें।वीडियो को लाइक और शेयर करके।अपने बच्चों के कविता पाठ की रील और वीडियो जरूर शेयर करें।तभी बात दूर तलक जाएगी।
प्रेरणा अंशु हो या बाल साहित्य, इसकी रील या वीडियो बनाना क्या बहुत मुश्किल है?
पढ़ने लिखने की संस्कृति बहाल करने के लिए इन्हीं बच्चों का आंदोलन इसी तरह उन्हें कविता पाठ से जोड़कर शुरू किया जा सकता है। हर गांव में,हर मोहल्ले में। सिर्फ बच्चों से संवाद जरूरी है।मोबाइल फोन तो हर हाथ में है।
जिन साथियों को प्रेरणा अंशु की प्रति मिल रही है, बाल विशेषांक में प्रकाशित कविताओं का पाठ वे अपने बच्चों से करवाकर कृपया रील और वीडियो पोस्ट करें।
यह हमारा सबसे सार्थक समर्थन और सहयोग होगा।
1952 में जब तराई के घने जंगलों में दलदल से चारों तरफ घिरा यह गांव बसा, बाघ भालू जंगली सूअर भेड़िया हाथी जैसे जनावर बड़ी संख्या में थे जंगल में।गांव के बाहर जंगल था, आज जहां काली मंदिर, नेताजी की प्रतिमा और सांस्कृतिक मंच, प्राइमरी विद्यालय है गांव के बीचोंबीच मैदान में, वहां भी जंगल हुआ करता था हमारे बचपन में। हिरण और खरगोश भी इस जंगल में आ जाते थे।
इस गांव का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया था उदयनगर और पंचाननपुर के साथ तो 1954 में तीनों गांव के लोगों ने आंदोलन किया।रजिस्ट्रेशन बहाल हुआ तो दस परिवारों की जमीन अमरपुर गांव के देखो के नाम कर दिया गया बंगाली और सिख विस्थापितों के नाम। आपस में लड़ाई से बचते हुए बसंतीपुर के लोगों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर अपनी जमीन वापस ली। फिर 1956 में पुनर्वास के लिए रुद्रपुर के ऐतिहासिक आंदोलन में भाग लिया।
भारत विभाजन के फलस्वरूप स्थानांतरण, विभाजन की त्रासदी, परिवार के कट फट टूट बिखर जाने, रिफ्यूजी कैंप की नर्क यंत्रणा और पुनर्वास की लड़ाई में पूर्वी बंगाल में दो सौ साल के शिक्षा आंदोलन की विरासत से अलग होकर कम से कम दो पीढ़ियां शिक्षा से वंचित हो गई।
इस गांव के पुरखों को विस्थापित होने से भी बड़ा दुख अपढ़ अधपढ़ होने का था।हर लड़ाई में शिक्षा और कानूनी लड़ाई जरूरी होती है ,इसलिए गांव के बच्चों को शिक्षित करना उनका मिशन था।शिक्षा के लिए सांस्कृतिक गतिविधियां तेज किया उन्होंने।
उन्हीं का मिशन था कि एक रिफ्यूजी कॉलोनी का दलित बच्चा मैं देश के सबसे बड़े अखबारों के संपादकीय में चार दशक तक कम कर सके। कितने दलित बड़े अखबारों के संपादकीय में हैं?
नित्यानंद मंडल, दिवंगत कृष्णपद मंडल,विवेक दास, विधु भूषण अधिकारी, दिवंगत कार्तिक साना के नेतृत्व में बसंतीपुर में हर साल स्वतंत्रता सेनानियों की मौजूदगी में नेताजी जयंती मनाई जाने लगी, जो उत्तराखंड का प्रमुख कार्यक्रम है। बसंतीपुर की सांस्कृतिक टीम ने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में धूम मचाई है।
इन गतिविधियों में नित्यानंद मंडल की प्रमुख भूमिका है। घर वापसी की शायद सबसे बड़ी उपलब्धि बचपन की इस दोस्ती की निरंतरता का बने रहना है।
नित्यानंद उर्फ tekka बचपन में हमारे हीरो थे और आज बुढ़ापे ने भी हीरो है।
Tuesday, December 2, 2025
मेरा खून आदिवासी का है,मिजाज से मैं योद्धा हूं और मेरी अंतरात्मा स्त्री है
मेरे पिताजी पुलिनबाबू को बेहद अफसोस था कि इस महादेश के करोड़ों वंचितों की आपबीती कहीं दर्ज नहीं होती।
उन्हें अफसोस था कि उन्हें पढ़ने लिखने का मौका नहीं मिला। भारत विभाजन के बाद दो सौ साल का वंचितों का अखंड अनवरत शिक्षा आंदोलन खंडित हो गया।
विस्थापन के अलावाआजादी की यह भी बड़ी भारी कीमत हमारे लोगों ने चुकाई कि विषम अमानवीय परिस्थितियों में सिर्फ जैविक रूप में जीने के लिए हम पीढ़ी दर पीढ़ी वजूद के लिए लड़ते रहे।
पीढ़ी दर पीढ़ी हम मातृभाषा से वंचित रहे।
वे कहते थे कि मनुस्मृति राज में वंचितों को पढ़ने लिखने का हक नहीं था। जो हक हमने दो सौ सालों की निरंतर लड़ाई से हासिल किया वह खंडित हो गया।
वे कहते थे कि दो सौ साल हीं नहीं, हजारों साल के महासंग्राम के बाद हम फिर इतिहास, भूगोल,भाषा, साहित्य,कला संस्कृति ,विरासत और मनुष्यता से से बेदखल छिन्नमूल मूक जनता है।
यही विभाजन विभीषिका है कि हमें आदिम अंधकार में फिर धकेल कर नामानुष बना दिया गया।
#पुलिनबाबू कहते थे कि हमारे करोड़ों लोगों की आवाज बुलंद करने के लिए भाषा,साहित्य, संस्कृति,विरासत, हक हकूक और सभ्यता मनुष्यता की बहाली के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है ताकि हम अपने करोड़ों वंचित छिन्नमूल लोगों की अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz
बुलंद कर सके।
हमारे पास कुछ नहीं था। फिरभी उन्होंने सबकुछ दांव पर लगाकर मुझे उच्च शिक्षा के लिए नैनीताल में रखकर पढ़ाया। ताकि उनकी लड़ाई जारी रख सकूं।
हम क्या कर सके! क्या हम वह कर पा रहे हैं जो वे चाहते थे?
वे चाहते थे कि जो हमारे लोग हजारों साल से लिख न सके,उसे हम डंके की चोट की तरह लिख दूं।
मेरे पिता सड़क पर रहे हमेशा। धोती और चादर उनकी संपत्ति थी।
मैं भले ही सड़क पर नहीं हूं। लेकिन जमीन कीचड़ पानी में अब भी धंसे हैं मेरे पांव। अब भी मैं खुले आसमान के नीचे हूं। मेरा कोई दांव नहीं है। जैसे मेरे पिता के लिए खोने को कुछ नहीं था। मेरे पास भी खोने को कुछ नहीं है।
हम किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखते पढ़ते। हम सिर्फ मनुष्यता की अनसुनी आवाज़ बुलंद करते हैं।
वैसे भी मेरा खून आदिवासी का है।
मेरा मिजाज योद्धा का है।
मेरी अंतरात्मा स्त्री है।
सविताजी ने गृहस्थी जमा रखी है। उन्हीं के कारण सभ्य, पढ़ा लिखा मनुष्य जैसा दिखता हूं।
मैं फिर पिता की तरह सड़क पर आ गया या हमारे पुरखों की तरह लड़ते हुए खेत हो गए, तो इतिहास भूगोल और मनुष्यता को क्या फर्क पड़ेगा?
हमारे पुरखे शिक्षा से वंचित लोग थे।
इसीलिए हम पढ़ने लिखने की संस्कृति की बहाली को सबसे जरूरी मानते हैं।
क्या आप हमारे साथ हैं?
सड़क पर आपका भी स्वागत है।मेरा खून आदिवासी का है,मिजाज से योद्धा जिन और मेरी अंतरात्मा स्त्री है
बच्चों को उनका साहित्य क्यों नहीं देते?
नमस्कार।
प्रेरणा अंशु का बाल विशेषांक दो, दिसंबर अंक प्रकाशित हो गया है। रचनाकारों और देशभर के सहयोगियों को स्पीड पोस्ट से पत्रिका भेज दी जाएगी। रचनात्मक सहयोग के लिए रचनाकारों का आभार।
विशेष तौर पर अतिथि संपादक Shiv Mohan Yadav और आवरण चित्रकार #राजकुमार_घोष का बहुत बहुत आभार।
बड़ी संख्या में देश के कोने कोने से रचनाएं आईं हैं।दोनों अंकों में सौ से ज्यादा नए पुराने बाल साहित्यकारों के लिए हम जगह बना सके।सीमित संसाधनों के कारण हम मोटे विशेषांक नहीं निकाल सकते। आप सभी के आर्थिक सहयोग से ही पत्रिका निकलती है। सबको मुद्रित प्रति भी नियमित भेज नहीं सकते। पीडीएफ भी अब सबको भेजना संभव नहीं है।
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*प्रेरणा अंशु का मार्च 2026 अंक स्त्री विशेषांक होगा।*
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रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 है।
यह अंक सभी तबके की स्त्रियों और विशेष तौर पर किशोरी कन्याओं की समस्याओं और उनके संघर्ष पर केंद्रित होगा।
कथा रिपोर्ताज को प्राथमिकता दी जाएगी। लघुकथा, कहानी, ग़ज़ल और काव्य विधाओं में रचनाएं आमंत्रित हैं। आलेख की शब्दसीमा डेढ़ हजार शब्द है।
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कृपया सहयोग बनाए रखें।
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक
प्रेरणा अंशु,
दिनेशपुर, उत्तराखंड













