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Wednesday, December 31, 2025
हमारी बोली हमारी पहचान
#हमारी_बोली_हमारी_पहचान
#शुभ_नववर्ष
सत्तर के दशक में खास तौर पर जीआईसी और डीएसबी नैनीताल के जमाने में कभी सोचा नहीं था कि सत्तर साल जी जाऊंगा और 2026 की सुबह देखूंगा।
लंबी जिंदगी की मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि 1973 से अबतक निरंतर मेरे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी TaraChandra Tripathi जी लगातार मेरे साथ हैं।उनसे संवाद बना हुआ है। जो कुछ मैंने सीखा,उन्हीं से सीखा। वे हैं तो जीने का मतलब है,हमारे वजूद का भी।
आज #नववर्ष की पूर्व संध्या पर फिर उनका फोन आया। वे स्वस्थ, सकुशल और सक्रिय हैं और अपने शिशुओं को भूले नहीं है। दुनिया के किसी भी कोने से उन्होंने हमेशा हम सबसे जवाबतलब किया है।
आज बोले, सबसे जरूरी है कि बच्चों का। अपनी बोली में बोलना सीखना।ध्वनि से बनती हैं भाषाएं, जो एक जैसी होती हैं और लिपि तो ध्वनियों का चित्रों में रूपांतरण है। लोक छवियों के बिना न भाषा बनती है और न संस्कृति। बोलियों का कोई मानक नहीं होता क्योंकि यह लोक है। लोक की विविधता बोलियों में है। अपनी बोली में बोलेंगे तो बच्चे लोक में भी गहरे पैठेंगे।इसके बिना उनकी शिक्षा अधूरी है।
गुरुजी ने अपनी पुस्तक: हमारी बोली हमारी पहचान में इसका शोधात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है।
उन्होंने लिखा है:
कभी-कभी, जब, में पेट की भाषाओं के दबाव तले दम तोड़ती भाषाओं के बारे में चिन्तन करता हूँ तो मुझे घुटन सी होने लगती है. मुझे लगता है कि जिस प्रकार हम अपनी बोलियों की उपेक्षा कर रहे हैं, हमारी बोलियाँ भी अगले बीसपचीस साल में विश्व की अब तक दम तोड़ चुकी उन सैकड़ों भाषाओं और दुदबोलियों में शामिल हो जाएंगी, जिनका आज कोई नाम लेवा भी शेष नहीं है.
(Humari Boli Humari Pahchan)
संसार में जो समाज अपनी मातृभाषाओं या दुदबोलियों के प्रति जागरूक नहीं हैं, उनकी बोलियों को मक्खन लगी रोटी की भाषाएँ निगलती जा रही हैं. आधी दुनियाँ की सैकड़ों बोलियों को स्पेनी निगल चुकी है, अफ्रीकी भाषाएँ स्वहिली भाषा के प्रकोप से मर रही है, रूसी पूर्वी यूरोप की भाषाओं को निगलने के लिए तैयार बैठी है और अंग्रेजी की महामारी आत्मगौरव से सम्पन्न फ्रेंच, जर्मन, जापानी, चीनी जैसी कुछ भाषाओं को छोड़ कर दुनियाँ की सारी बोलियों को उजाड़ देने पर तुली हुई है.
Tara Chandra Tripathi

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