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Sunday, December 7, 2025
मुक्त,आत्मनिर्भर,सुखी, समृद्ध हो हमारी बेटियां, बहुएं, बहनें और सभी स्त्रियां
#मुक्त,#सशक्त, #सुखी,#समृद्ध हों #हमारी_बेटियां,#बहुएं और #सभी_स्त्रियां
#प्रेरणा_अंशु के #किशोरी_केंद्रित #स्त्री_विशेषांक के लिए 15 जनवरी तक सभी विधाओं में रचनाएं आमंत्रित।
मेरी मां बसंती देवी के बन पर मेरे गांव का नाम बसंतीपुर पड़ा। आंदोलनकारियों का गांव है यह। इस गांव से मां को इतनी मुहब्बत थी कि चालीस साल हम बाहर रहे, मां एक दिन के लिए भी हमारे डेरे पर कहीं नहीं गई। मायके भी नहीं। पिताजी सड़क के आदमी थे।सड़क और संसद की लड़ाई में वे मां के लिए या परिवार के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सके।सिर्फ हमारे पढ़ने लिखने और मनुष्य होने पर उन्होंने सबकुछ दांव पर लगा दिया।
मेरे परिवार,मेरे गांव और तराई के लोगों ने मेरी मां को इतना सम्मान दिया कि उन्हें जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं थी।जीवनभर वे दूसरों का ख्याल रखती गई।
मेरी ताई हेमलता हरिचांद गुरुचांद ठाकुर की वंशज और उनके आंदोलन की बारिश थीं। घर में वे सर्वेसर्वा थीं। मेरे ताऊजी अनिल विश्वास खेती और संगीत में व्यस्त रहते थे। स्त्रियों का सम्मान करना मैने उनसे सीखा।
मेरी चाची ऊषा देवी को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था। उनसे इसलिए हमारी निकटता ज्यादा थी। उनका बेटा सुभाष मुझसे दो साल छोटा है। वह धनबाद और कोलकाता में भी पत्रकारिता करता रहा।चाची इसलिए मृत्यु तक हमारे साथ थीं। उन्होंने कैंसर से 1994 में कोलकाता में दम तोड़ा। ताई जी 1991 में और मां 2006 में चली गईं। लेकिन तीनों हमारे साथ हमेशा मौजूद हैं।
बसंतीपुर ही नहीं, दिनेशपुर की रिफ्यूजी बंगाली कॉलोनियां ही नहीं, तराई और पहाड़ में भी मुझे सभी स्त्रियों का इतना प्यार मिला है कि उनका ऋण और मेरा उनके प्रति फर्ज का बोझ बहुत बड़ा है।
प्रेरणा अंशु के दफ्तर में जाम मैं रोज काम करता हूं,मास्टर प्रताप सिंह का घर है। इस घर में भी मेरी तीन बेटियां हैं। Samajotthan School- English Medium Co-Ed School Dineshpur की एमडी Babita Rani Rathour , Shalini Singh और Priya Rathour , ये तीनों और गीता जी मेरी मां की तरह मेरा ख्याल रखती हैं। इनके अलावा दोनों स्कॉलों की शिक्षिकाएं मेरी बेटियां हैं।
जाहिर है कि जिनसे जिंदगी जीने लायक हो गई है, उनके अधिकारों की लड़ाई में भी हमें शामिल जरूर होना चाहिए।विभाजन पीड़ित स्त्रियों की कथा व्यथा सिर्फ #मेघे_ढाका_तारा, #कोमल_गांधार,
#सुवर्ण_रेखा,
#तमस
#गर्म_हवा या #पिंजर तक सीमाबद्ध नहीं है।
यह हमारी देखी भोगी जिंदगी है।
करोड़ों स्त्रियों के संघर्ष और जिजीविषा के कारण हमारा वजूद है।इसलिए स्त्री मुक्ति हमारे लिए कोई विमर्श, नारा या विचार तक सीमित नहीं है। यह हमारी जिंदगी का मकसद है।
इसलिए हमने हमेशा कोशिश की है कि सविता जी को कोई तक़लीफ न हो,कोई तनाव न हो, उनकी भावनाओं को को कोई आघात न हो।हम कुछ कर सके या नहीं, उन्हें हर सूरत में सुखी होना चाहिए।
हमारी अपनी कोई बेटी नहीं है। लेकिन इस महादेश के कोने कोने में पहाड़, मैदान,मरुस्थल, रण और द्वीपों में हमारी असंख्य बेटियां हैं।
घर में फिलहाल बहू बनकर एक बेटी Gaytri Biswas आई हैं। जो खुद मेरी ताई की तरह मतुआ परिवार से आई है। जो सिर्फ बेटी नहीं, सिर्फ डोडो और शिवन्या की मां नहीं,हमारी भी मां है।मेरी ताई की तरह वह भी घर में सर्वेसर्वा हैं। जो भी बेटी इस घर में आएगी भविष्य में उसे भी हम पलक पांवड़े पर बैठाएंगे।
हम अपने मरने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बेटी, बहू, मां, बहन या कोई स्त्री जहां भी हो, वह मुक्त आत्म निर्भर, सशक्त, सुखी और समृद्ध हो।
यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा मकसद है क्योंकि हमने स्त्रियों को जितना कष्ट, दुख और यातना,उत्पादन का सामना करते देखा है, वे परिस्थितियां आज भी मौजूद हैं। क्योंकि पितृसत्ता, धर्मसत्ता, राजसत्ता और कॉरपोरेट राज एकाकार है और स्त्री के विरुद्ध है।
#प्रेरणा_अंशु का #स्त्री_विशेषांक
*प्रेरणा अंशु का मार्च 2026 अंक स्त्री विशेषांक होगा।*
इस अंक की अतिथि संपादक होंगी *अध्यापिका, कथाकार, चिंतक डॉ ऋचा पाठक जी।* रचनाओं पर अंतिम निर्णय उनका ही होगा। उन्हें सीधे मेल से रचनाएं भेज सकते हैं।
उनका मेल:
dr.richapathak5@gmail.com
हमें कैसी सामग्री चाहिए और आपको क्या लिखना है इस पर ऋचा जी से कृपया सीधे उनके मोबाइल नंबर
+91 89232 03995 पर बात की जा सकती है।
आप हमें भी मेल कर सकते हैं।
हमारा mail- prernaanshu@gmail.com
रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 है।
यह अंक सभी तबके की स्त्रियों और विशेष तौर पर किशोरी कन्याओं की समस्याओं और उनके संघर्ष पर केंद्रित होगा।
कथा रिपोर्ताज को प्राथमिकता दी जाएगी। लघुकथा, कहानी, ग़ज़ल और काव्य विधाओं में रचनाएं आमंत्रित हैं। आलेख की शब्दसीमा डेढ़ हजार शब्द है।
स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं की रचनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। वे अपने स्कूल कॉलेज, कक्षा का उल्लेख जरूर करें।
पुरुष रचनाकारों की रचनाओं का भी इन मुद्दों पर स्वागत है। अस्मिता, स्त्रीवाद, स्त्री विमर्श के अलावा स्त्रियों की जो व्यवहारिक समस्याएं, मुद्दे और उनकी रचनात्मकता है,उसकी गहन पड़ताल के लिए आप सभी का स्वागत है।
कृपया सहयोग बनाए रखें।
पलाश विश्वास
कार्यकारी संपादक
प्रेरणा अंशु,
दिनेशपुर, उत्तराखंड

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