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Friday, December 5, 2025

बसंतीपुर के बच्चे

#प्रेरणा_अंशु के साथ #बसंतीपुर के सारे बच्चे। आज बसंतीपुर के बच्चों ने प्रेरणा अंशु के बाल विशेषांक नवंबर अंक के साथ कविता पथ का सिलसिला जारी रहेगा।दिसम्बर का बाल विशेषांक भी आ गया।इस अंक के साथ भी हमारे बच्चे कविता पथ करेंगे। हमारे सबसे पुराने बचपन के मित्र और बसंतीपुर को सांस्कृतिक गतिविधियां में अग्रणी बनाने वाले Nityanand Mandal ने गांव के सभी बच्चों को भाषा, साहित्य, प्रेरणा अंशु और सांस्कृतिक गतिविधियां से जोड़ने का बीड़ा उठा लिया है।हर गांव में उनके जैसे युवा साथी सक्रिय हो जाएं तो निश्चित ही पढ़ने लिखने की संस्कृति बहाल होगी। बच्चे डिजिटल दुनिया के गहरे असर में हैं और हम? बच्चों को भाषा,साहित्य, संस्कृति, लोक और विरासत से जोड़ने के लिए हम आखिर कर ही रहे हैं? छोटी पहल से पड़ी शुरुआत हो सकती है। आज चार छोटे बच्चों ने कविता पाठ किया। काव्य विश्वास, शिवन्या विश्वास, परी और तृषा साना चारों छोटी कक्षाओं में पढ़ती हैं। उनका जज्बा देखिए। कल जो वीडियो हमने जारी किए थे, उनमें सबसे छोटा कौशिक मंडल, फिर जया मंडल और सबसे बड़ी प्रतिभा मंडल ने कविता पाठ किया था। ये सारे वीडियो हमारे सबसे पुराने मित्र Nityanand Mandal ने तैयार कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम और वीडियो दूसरे बच्चों के साथ भी जारी करेंगे। इनमें कौशिक सबसे छोटा है,पत्रिका हाथ में लेकर जो कविताएं उसे कंठस्थ है,सुना डाली कैमरे के सामने।यह कम नहीं है। प्रतियां चूंकि दसवीं में पढ़ती है,उसने प्रेरणा अंशु से कविता पथ किया है। आज काव्या,तृषा, शिवन्या और परी चारों छोटी हैं। इन बच्चों का उत्साह वरदान करें।वीडियो को लाइक और शेयर करके।अपने बच्चों के कविता पाठ की रील और वीडियो जरूर शेयर करें।तभी बात दूर तलक जाएगी। प्रेरणा अंशु हो या बाल साहित्य, इसकी रील या वीडियो बनाना क्या बहुत मुश्किल है? पढ़ने लिखने की संस्कृति बहाल करने के लिए इन्हीं बच्चों का आंदोलन इसी तरह उन्हें कविता पाठ से जोड़कर शुरू किया जा सकता है। हर गांव में,हर मोहल्ले में। सिर्फ बच्चों से संवाद जरूरी है।मोबाइल फोन तो हर हाथ में है। जिन साथियों को प्रेरणा अंशु की प्रति मिल रही है, बाल विशेषांक में प्रकाशित कविताओं का पाठ वे अपने बच्चों से करवाकर कृपया रील और वीडियो पोस्ट करें। यह हमारा सबसे सार्थक समर्थन और सहयोग होगा। 1952 में जब तराई के घने जंगलों में दलदल से चारों तरफ घिरा यह गांव बसा, बाघ भालू जंगली सूअर भेड़िया हाथी जैसे जनावर बड़ी संख्या में थे जंगल में।गांव के बाहर जंगल था, आज जहां काली मंदिर, नेताजी की प्रतिमा और सांस्कृतिक मंच, प्राइमरी विद्यालय है गांव के बीचोंबीच मैदान में, वहां भी जंगल हुआ करता था हमारे बचपन में। हिरण और खरगोश भी इस जंगल में आ जाते थे। इस गांव का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया था उदयनगर और पंचाननपुर के साथ तो 1954 में तीनों गांव के लोगों ने आंदोलन किया।रजिस्ट्रेशन बहाल हुआ तो दस परिवारों की जमीन अमरपुर गांव के देखो के नाम कर दिया गया बंगाली और सिख विस्थापितों के नाम। आपस में लड़ाई से बचते हुए बसंतीपुर के लोगों ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर अपनी जमीन वापस ली। फिर 1956 में पुनर्वास के लिए रुद्रपुर के ऐतिहासिक आंदोलन में भाग लिया। भारत विभाजन के फलस्वरूप स्थानांतरण, विभाजन की त्रासदी, परिवार के कट फट टूट बिखर जाने, रिफ्यूजी कैंप की नर्क यंत्रणा और पुनर्वास की लड़ाई में पूर्वी बंगाल में दो सौ साल के शिक्षा आंदोलन की विरासत से अलग होकर कम से कम दो पीढ़ियां शिक्षा से वंचित हो गई। इस गांव के पुरखों को विस्थापित होने से भी बड़ा दुख अपढ़ अधपढ़ होने का था।हर लड़ाई में शिक्षा और कानूनी लड़ाई जरूरी होती है ,इसलिए गांव के बच्चों को शिक्षित करना उनका मिशन था।शिक्षा के लिए सांस्कृतिक गतिविधियां तेज किया उन्होंने। उन्हीं का मिशन था कि एक रिफ्यूजी कॉलोनी का दलित बच्चा मैं देश के सबसे बड़े अखबारों के संपादकीय में चार दशक तक कम कर सके। कितने दलित बड़े अखबारों के संपादकीय में हैं? नित्यानंद मंडल, दिवंगत कृष्णपद मंडल,विवेक दास, विधु भूषण अधिकारी, दिवंगत कार्तिक साना के नेतृत्व में बसंतीपुर में हर साल स्वतंत्रता सेनानियों की मौजूदगी में नेताजी जयंती मनाई जाने लगी, जो उत्तराखंड का प्रमुख कार्यक्रम है। बसंतीपुर की सांस्कृतिक टीम ने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में धूम मचाई है। इन गतिविधियों में नित्यानंद मंडल की प्रमुख भूमिका है। घर वापसी की शायद सबसे बड़ी उपलब्धि बचपन की इस दोस्ती की निरंतरता का बने रहना है। नित्यानंद उर्फ tekka बचपन में हमारे हीरो थे और आज बुढ़ापे ने भी हीरो है।

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