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Tuesday, December 2, 2025
मेरा खून आदिवासी का है,मिजाज से मैं योद्धा हूं और मेरी अंतरात्मा स्त्री है
मेरे पिताजी पुलिनबाबू को बेहद अफसोस था कि इस महादेश के करोड़ों वंचितों की आपबीती कहीं दर्ज नहीं होती।
उन्हें अफसोस था कि उन्हें पढ़ने लिखने का मौका नहीं मिला। भारत विभाजन के बाद दो सौ साल का वंचितों का अखंड अनवरत शिक्षा आंदोलन खंडित हो गया।
विस्थापन के अलावाआजादी की यह भी बड़ी भारी कीमत हमारे लोगों ने चुकाई कि विषम अमानवीय परिस्थितियों में सिर्फ जैविक रूप में जीने के लिए हम पीढ़ी दर पीढ़ी वजूद के लिए लड़ते रहे।
पीढ़ी दर पीढ़ी हम मातृभाषा से वंचित रहे।
वे कहते थे कि मनुस्मृति राज में वंचितों को पढ़ने लिखने का हक नहीं था। जो हक हमने दो सौ सालों की निरंतर लड़ाई से हासिल किया वह खंडित हो गया।
वे कहते थे कि दो सौ साल हीं नहीं, हजारों साल के महासंग्राम के बाद हम फिर इतिहास, भूगोल,भाषा, साहित्य,कला संस्कृति ,विरासत और मनुष्यता से से बेदखल छिन्नमूल मूक जनता है।
यही विभाजन विभीषिका है कि हमें आदिम अंधकार में फिर धकेल कर नामानुष बना दिया गया।
#पुलिनबाबू कहते थे कि हमारे करोड़ों लोगों की आवाज बुलंद करने के लिए भाषा,साहित्य, संस्कृति,विरासत, हक हकूक और सभ्यता मनुष्यता की बहाली के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है ताकि हम अपने करोड़ों वंचित छिन्नमूल लोगों की अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz
बुलंद कर सके।
हमारे पास कुछ नहीं था। फिरभी उन्होंने सबकुछ दांव पर लगाकर मुझे उच्च शिक्षा के लिए नैनीताल में रखकर पढ़ाया। ताकि उनकी लड़ाई जारी रख सकूं।
हम क्या कर सके! क्या हम वह कर पा रहे हैं जो वे चाहते थे?
वे चाहते थे कि जो हमारे लोग हजारों साल से लिख न सके,उसे हम डंके की चोट की तरह लिख दूं।
मेरे पिता सड़क पर रहे हमेशा। धोती और चादर उनकी संपत्ति थी।
मैं भले ही सड़क पर नहीं हूं। लेकिन जमीन कीचड़ पानी में अब भी धंसे हैं मेरे पांव। अब भी मैं खुले आसमान के नीचे हूं। मेरा कोई दांव नहीं है। जैसे मेरे पिता के लिए खोने को कुछ नहीं था। मेरे पास भी खोने को कुछ नहीं है।
हम किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखते पढ़ते। हम सिर्फ मनुष्यता की अनसुनी आवाज़ बुलंद करते हैं।
वैसे भी मेरा खून आदिवासी का है।
मेरा मिजाज योद्धा का है।
मेरी अंतरात्मा स्त्री है।
सविताजी ने गृहस्थी जमा रखी है। उन्हीं के कारण सभ्य, पढ़ा लिखा मनुष्य जैसा दिखता हूं।
मैं फिर पिता की तरह सड़क पर आ गया या हमारे पुरखों की तरह लड़ते हुए खेत हो गए, तो इतिहास भूगोल और मनुष्यता को क्या फर्क पड़ेगा?
हमारे पुरखे शिक्षा से वंचित लोग थे।
इसीलिए हम पढ़ने लिखने की संस्कृति की बहाली को सबसे जरूरी मानते हैं।
क्या आप हमारे साथ हैं?
सड़क पर आपका भी स्वागत है।मेरा खून आदिवासी का है,मिजाज से योद्धा जिन और मेरी अंतरात्मा स्त्री है

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