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Saturday, December 13, 2025
पुआल और अलाव
पुआल बहुत कम की चीज है।इससे गर्म कोई चीज नहीं है। एड्रियन में तो सबसे कम की चीज।जिनका रहने का ठिकाना नहीं होता सर्दियों में अलाव ही सहारा है।
बचपन में हम मिट्टी और फूस की झोपड़ियों में रहते थे। फर्श और दीवारें मिट्टी की होती थी।चारपाई या तख्त हमने तब देखे नहीं थे।
फर्श पर पुआल बिछाने पर झोपडी एयरकंडीशंड हो जाती थी। बाद में नैनीताल पढ़ने गए तो वहां बेड तो थे ही,हेयर का इस्तेमाल भी होता था।
बारात से तब रात को लौटने का इंतजाम नहीं था और न रात में ओढ़ने बिछाने का इंतजाम।बचपन में गांवों में बारात में जाने पर हम सबसे पहले पुआल का ढेर खोजते थे और नींद आने पर उसमें सोकर रात बीतते थे।
जड़ों की छुट्टियों में जब 20 दिसंबर को घर आते थे तो पहाड़ों में हिमपात की वजह से कड़ाके की सर्दी हो जाती थी।गर्म कपड़े भी खास होते नहीं थे। चादर या कम्बल का सहारा होता था।
कथरी और लिहाफ से भी अगहन पूस की रात बिताने के लिए अलाव और पुआल का सहारा था।
कोहरा और पाला खूब घना और बिजली नहीं।दिया और लालटेन से रोशनी होती थी।
पुआल के बिस्तर पर दिया की रोशनी में जितनी जितना तल्लीन होकर पढ़ा, फिर कभी उतनी एकाग्रता नहीं हुई।
पिताजी घर होते तो स्टोव पर रात को और भोर चार बजे चाय बनाकर पिलाते थे।
यह हमारे लिए बूस्टर थे।धोती चादर में सर्दी का बेफिक्री से उन्हें मुकाबला करते देखकर नैनीताल में शून्य डिग्री तापमान के नीचे भी मुझे पुआल की गर्मी महसूस होती थी।

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