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Saturday, December 20, 2025

नैनीताल में हिमपात, हिंसा और घृणा की कार्पोरेट संस्कृति ने सबकुछ बदल दिया

#नैनीताल में #सत्तर के दशक का #हिमपात और अब? #तराई में शीत लहर के हालत हैं। घना कुहासा है या फिर आसमान में गगन घटा गहरानी। सूरज के दर्शन नहीं हो रहे हैं इन दिनों। सर्द हवाओं से मौसम नैनीताल का है। अब सर्द हवाएं नैनीताल से हम तक पहुंचती हैं,लेकिन घर लौटे नौ साल हो गए,नैनीताल जाना न हो सका। ऐसा तब भी हुआ था, जब डीएसबी कॉलेज में अग्निकांड में आर्ट्स ब्लॉक,लाइब्रेरी, रीडिंग रूम, केमिस्ट्री लैब जलकर राख हो गए थे।अपनी सबसे सुनहरी स्मृतियों की राख को देखने की हिम्मत नहीं हुई थी एक दशक तक। अब नैनीताल जाने से डरता हूं।वे लोग नहीं हैं, जो हमारे नैनीताल में थे। वह नैनीताल भी नहीं है। इन्हीं दिनों सत्तर के दशक में नैनीताल बर्फ से लकदक हुआ करता था। नवंबर के घने कुहासे से आजादी मिलती थी दिसंबर के हिमपात में। बीस दिसंबर को जाड़ों की छुट्टियां शुरू हो जाती थी।लेकिन दिसंबर शुरू होते न होते हिमपात शुरू हो जाता था। तापमान भले शून्य से नीचे हो इस तस्वीर की जैसी बर्फबारी के बाद खिलखिलाती धूप और नीली झील के सान्निध्य में देह मन में इतनी ऊष्मा भर जाती थी कि रात रात भर हम लोग झुंड बनाकर साहित्य,संस्कृति, फिल्म और देश दुनिया पर मालरोड पर टहलते हुए रात रात भर चर्चा करते थे हिमपात के मध्य। यह तस्वीर Abhay Kumar Gupta जी की स्मृतियों की है।वे भी हमारी तरह सत्तर के दशक में डीएसबी के छात्र हुआ करते थे। इस साल नैनीताल में अभी तक हिमपात नहीं हुआ। होगा तो पर्यटकों के लिए होगा और हम पर्यटक नहीं हैं। तराई में बहुत सर्दी हो गई। आज सुबह Rupesh Kumar Singh ने अनसुनी आवाज़ Ansuni Awaaz के दफ्तर को निकलने से पहले अचानक कहा, चश्मा और मोबाइल उठाओ।चलो। कार सीधे चौराहे पर एक शो रूम के सामने रुकी। दुकानदार को उसने इशारा किया तो मेरे सामने जैकेट का ढेर लग गया। एक जैकेट उसने पसंद किया, मैंने हां कर दी।लेखनी कहा,बहुत महंगा होगा। वह बोलो, पहन लो और टुक टुक पकड़कर दफ्तर चले जाओ। रूपेश जब भी पैसे होते हैं कुछ न कुछ हम सभी के लिए करते रहते हैं। खर्च बहुत बढ़ गया है। प्रेरणा अंशु नियमित निकालना हम सबके लिए बड़ी चुनौती है। अनसुनी आवाज़ की टीम के लिए रोज मौके से रट दिन रिपोर्टिंग करने के खर्चे भी लगातार बढ़ रहे हैं। फिरभी रूपेश सबकी जरूरत समझते हैं और इसी तरह अचानक कुछ करते रहते हैं। इससे खर्च भले हो, भावना के स्तर पर टीम बहुत मजबूत हो जाती थी। हमारे बचपन में रूपेश जैसे लोग नहीं थे।गर्म कपड़े होते नहीं थे। फिरभी कुछ करने का जज्बा मौजूद था। जाड़ों में घर लौटकर खेती बाड़ी के कामकाज में जुटने के बावजूद, रत दिन अध्ययन के बावजूद तराई के गांवों में आवाजाही लगी रहती थी।सभी समुदायों में मुहब्बत बहुत थी।पहाड़ और मौदान दिलों से जुड़े हुए थे। न अलगाव था और न अलगाव की राजनीति थी। बाकी समय पहाड़ में होते तो मौसम चाहे जैसा हो, झोला उठाकर कहीं भी निकल जाते थे। अब हिमपात के मध्य चलना नहीं होता। अब हिमपात देखना भी नहीं होता। सत्तर का दशक बहुत पीछे छूट गया। एक एक करके स्थित बिछड़ते जा रहे हैं। गिर्दा,देवीदत्त पंत, खड्ग सिंह वाल्दिया, विपिन त्रिपाठी, कमल जोशी, चंद्रेश शास्त्री,वीरेन डंगवाल, मोहन उप्रेती, लेनिन पंत, हिमांशु जोशी, परमार, पर्वतीय के संपादक उनियाल जी, रणजीत विश्वकर्मा, शमशेर सिंह बिष्ट, सखा दाजू, निर्मल जोशी, निर्मल पांडे और अब राजा बहुगुणा भी चले गए। राजा बहुगुण कामरेड थे,लेकिन सत्तर के दशक के सहपाठी, मित्र और साथी।लाल सलाम कहकर हमेशा के लिए विदा करने के बावजूद स्मृतियां बनी हुई हैं। जिस बंगाल होटल में डेरा था, हमारे अभिभावक उस होटल के मलिक सदानंद गुहा मजूमदार भी नहीं रहे। मल्लीताल के वैष्णव होटल में हम रोज खाना खाते थे।वे शर्मा जी भी नहीं रहे। जीआईसी नैनीताल में जब हमने 1973 में दाखिला लिया डीएसबी परिसर में, हमारे स्थानीय अभिभावक थे ढिमरी ब्लॉक किसान विरोध में पिताजी #पुलिनबाबू के सहौद्द।पहाड़,तराई और भाबर में विस्थापन के विरुद्ध पुनर्वास की लड़ाई में जो उनके सहयोद्ध थे, उनमें से कोई नहीं है। दिनेशपुर और बसंतीपुर समेत तराई में तराई को बसने वाले हमारे पुरखे और स्वतंत्रता सेनानी,आंदोलनों में पिताजी के सहयोद्धाओं में से कोई नहीं है।वे स्त्रियां भी नहीं हैं, जिनके स्नेह प्रेम ने हमें हमेशा मजबूती दी। कितने ही लोग अब नैनीताल में कभी नहीं मिलेंगे। इसलिए सर्दी सहने की शक्ति भी खत्म सी है। जो लोग बचे हैं, उनका ऐसा कायाकल्प हो गया कि पहचान में नहीं आते। घृणा और हिंसा की ग्लोबल,कॉरपोरेट नई संस्कृति ने सारी परिभाषाएं, अवधारणाएं और शब्दों के असहाय बदल दिए हैं।लोकछवियां सिरे से अनुपस्थित है। सिर्फ बाजार शेष है। चेहरे और दिल ओ दिमागबदल गए हैं।वैचारिकी बदल गई है। न समाज और सामुदायिक जीवन बचा है और न ही हमारा साझा चूल्हा। इसलिए मौसम और जलवायु भी बदल गए हैं। धुआं धुआं आसमान है। हवाएं बहुत सर्द हैं। खेत खलिहान नहीं रहे। सिर्फ विकास का शोर है, उन्माद है और बाजार है। इसमें रिश्ते, नाते और मित्रता की गुंजाइश है?

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