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Saturday, July 14, 2012

वामपंथी फिर एक बार आम आदमी की पीठ पर छुरा भोंकने को तैयार!

वामपंथी फिर एक बार आम आदमी की पीठ पर छुरा भोंकने को तैयार!

पलाश विश्वास

वामपंथी विश्वासघात का लंबा इतिहास है। अब भारतीय वामपंथी एक बार फिर आम आदमी की पीठ पर छुरा भोंकने को तैयार हैं। मल्टी ब्रांड रीटेल एफडीआई, विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश, भूमि अधिग्रहण कानून, पेंशन बिल, वाया बाजार से संबंधित विधेयक और तमाम दूसरे सुधार एक अकेली ममता बनर्जी ने कुल जमा बाइसेक सांसदों के दम पर रोक दिये, जबकि वामपंथियों के इकसठ सांसदों की मौजूदगी के बावजूद ​​मनमोहन सिंह की पहली यूपीए सरकार को आर्थिक सुधार से लेकर भारत अमेरिकी परमाणु संधि को अंजाम देने में कोई खास दिक्कत ​​नहीं हुई। माकपा के रस्मी विरोध और अनास्था प्रस्ताव के बावजूद। पिछले लोकसभा चुनाव में इसीलिए हिंदुत्व ताकतें और कारपोरेट इंडिया लामबंद होकर जनमत को मनमोहनी बनाने में कामयाब हो गये। लिकिन दूसरे कार्यकाल में ज्यादा सांसदों के चुलकर आने के बाद आर्थिक सुधार लागू करने में यूपीएसरकार को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं। बाजार पूरी तरह खुल नहीं पा रहा है अमेरिका के निरंतर दबाव के  बावजूद। वैश्विक पूंजी औरकारपोरेट इंडिया दोनों नाराज हैं। टाइम ने अंडर एचीवर करार दिया तो अपना मीडिया लगातार राजनीतिक बाध्यताओं के हवाले इस सरकार के नीति निर्धारण तंत्र को पंगु बता दिया। भंद गली में सर पटकने के बजाय अब मनमोहन और सोनिया गांधी ने आखिरी दांव खेला है,​​ वामपंथी सहयोगियों को फिर आजमाने के लिए। इसीलिए ममता बनर्जी और शरद पवार जैसों के एतराज को हाशिये पर रखकर वामपंथी​ ​ प्रत्याशी हमीद अंसारी को सर्वपल्ली डा राधाकृष्णन के बाद पहलीबार उपराष्ट्रपति पद पर दूसरे कार्यकाल के लिए कांग्रेस ने चुन लिया। ​​वामपंथी जनविरोधी प्रणव का समर्थन करके इस समझते की पृष्ठभूमि तैयार कर ही चुके हैं। अब प्काश कारत का कहना है कि राहुल गांधी अगर कोई समाजवादी कार्यक्रम घोषित करे तो अगले चुनाव में यूपीए को वामपंथियों का समर्थन संभव है। लेकिन समाजवादी इंदिरा के खिलाफ थी माकपा और भाकपा से उसके रिश्ते लबे समय तक नहीं रहे सिर्फ इसलिए कि उसने पातकाल में भी इंदिरा का साथ नहीं छोड़ा था। इसी इतिहास की वजह से इसबार सावधानी बरतते हुए बाकपा ने प्रणव का समर्थन न करने का फैसला किया है। अपने हित साधने के लिए भारतीय वामपंथी सुभीधे के हिसाब से सिद्दांत गढ़ लेने में माहिर हैं। तेलंगाना विद्रोह के साथ दगा इसलिए किया कि नेहरु समाजवादी थे। ढिमरी ब्लाक से लेकर नक्सलाबाड़ी और मरीटझांपी तक का लंबा इतिहास है। जाहिर है कि संसद के मानसूनऔर शीतकालीन सत्र में अपने कब्जे वाली ट्रेड यूनियनों के सहारे रस्मी विरोध जताकर हिंदुत्व की बढ़ती हुई ताकत के प्रतिरोध के बहाने एकाधिकारवादी साम्राज्यवादी आक्रमण के सहयोगी बन जाने में वामपंथ को कोई विचारधारा अब नहीं रोकने वाला। केरल और बंगाल में सत्ता से बाहर होने के बाद अब चाहे जो हो, कांग्रेस और नवउदारवादी नीतियों को समर्थन की कीमत पर भी सत्ता के अंतिम लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं वामपंथी। क्रांति उनका लक्ष्य न कभी था और न होगा।सत्ता वर्ग और ​​वर्चस्ववादी समाज के हितों के संरक्षण में भारतीय वामपंथ हीरावल दस्ता बन गया है। कांग्रेस को भाजपा की बढ़ती हुई ताकत के मद्देनजर अगला लोकसभा चुनाव जीतने के लिए और बाकी कार्यकाल में कारपोरेट इंडिया की आस्था हासिल करने के लिए वामपंथियों से ज्यादा विश्वसनीय सहयोगी कौन हो सकते हैं?

वामपंथियों की दलील रही है,"कांग्रेस ने देश की जनता के साथ विश्वासघात किया है। उसने नेहरू युग की विदेश नीति के साथ विश्वासघात किया है। उसने परमाणु समझौता कर न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ विश्वासघात किया है।"अब उस दलील का क्या?फिर न हो देश के साथ विश्वासघात. ... यह स्थिति अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार के विरोध में वामपंथी दलों द्वारा सरकार से समर्थन वापसी के कारण बनी थी। वामदलों के अलग हो जाने के बावजूद सरकार का वजूद कायम रहा!

यूपीए ने हामिद अंसारी को उपराष्ट्रपति पद के लिए दूसरी बार उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है।जाहिर है कि वामपंथियों को पटाने के लिए कांग्रेस पहले से ही हामिद अंसारी के नाम पर मुहर लगा चुकी थी, यूपीए की बैठक के बाद उनके नाम का महज औपचारिक एलान किया गया।अंसारी ने भी इस प्रस्ताव को कबूल कर लिया है। संप्रग को बाहर से समर्थन दे रहे सपा और बसपा ने भी अंसारी को समर्थन का एलान कर दिया है। वामदलों में पहले से ही उनके नाम पर सहमति है।प्रधानमंत्री निवास पर शनिवार शाम को हुई बैठक के बाद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हामिद अंसारी के नाम का औपचारिक ऐलान किया। अंसारी को फिलहाल टीएमसी छोड़कर यूपीए के तमाम घटक दलों के समर्थन के साथ-साथ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और लेफ्ट के समर्थन का भरोसा भी हासिल है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शनिवार को साफ कर दिया कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के उम्मीदवार वर्तमान उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी के लिए मैदान खाली नहीं छोड़ेगी. पार्टी ने हालांकि उम्मीदवार का नाम तय नहीं किया है. इसके लिए 16 जुलाई को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की बैठक बुलाई गई है। अंसारी यदि उपराष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल कर लेते हैं तो लगातार दो बार इस शीर्ष संवैधानिक पद पर आसीन होने वाले वह दूसरे व्यक्ति बन जाएंगे। इससे पहले सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ही लगातार दूसरी बार उपराष्ट्रपति बने थे।

इस बीच, प्रधानमंत्री ममता बनर्जी को मनाने में जुट गए हैं। वे फोन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने मुलायम सिंह यादव और मायावती को फोन कर उनसे बात की है। लेफ्ट उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के मुद्दे पर सोमवार को बैठक में फैसला करेगा। दूसरी ओर, राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर माकपा एक बार फिर कांग्रेस के करीब आई है। माकपा की सर्वोच्च नीति निर्धारण कमेटी पोलित ब्यूरो ने भले ही संप्रग के राष्ट्रपति पद उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने का निर्णय लिया है, लेकिन इस मुद्दे पर सहयोगी उसके साथ नहीं हैं। भाकपा और आरएसपी ने राष्ट्रपति चुनाव में तटस्थ रहने का निर्णय किया है, जबकि फारवर्ड ब्लॉक प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव प्रकाश कारत ने कहा है कि राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में वाम दलों द्वारा अलग-अलग रुख अपनाए जाने के कारण वाम एकजुटता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कारत ने पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डैमोक्रेसी' के आगामी अंक में प्रकाशित होने वाले एक लेख में कहा है कि आर्थिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर वाम दलों की एक ही सोच है और इन्हीं मुद्दों के आधार पर ये दल खाद्य सुरक्षा एवं व्यापक सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मांग को लेकर 2 जुलाई से संयुक्त आंदोलन चला रहे हैं। गौरतलब है कि माकपा एवं अखिल भारतीय फारवर्ड ब्लॉक ने राष्ट्रपति चुनाव में  यू.पी.ए. के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के समर्थन का फैसला किया है, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और आर.एस.पी. ने मतदान में भाग नहीं लेने का फैसला किया है। कारत ने यू.पी.ए. प्रत्याशी मुखर्जी को समर्थन देने को जायज ठहराया और कहा कि अगर चुनाव में माकपा गैर हाजिर होने का फैसला लेती तो इसका मतलब था कि वह भी तृणमूल कांग्रेस की राह पर चल रही है।पूर्व मुख्यमंत्री व माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने कहा है कि इस बार राष्ट्रपति चुनाव में नीति नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष का मुद्दा है। भंट्टाचार्य के कहने का मतलब बंगाल से पहली बार कोई व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर जा रहा है। इसमें माकपा बाधक बनकर बंगाल की जनता को नाराज नहीं कर सकती। कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करने के पीछे तृणमूल व कांग्रेस में फूट डालने की माकपा की रणनीति भी काम कर रही है।

गौरतलब है कि मई २००९ में ही वामपंथियों के प्रति नरम रुख अख्तियार करते हुए राहुल ने कहा, "मैं नहीं समझता कि वामपंथी पार्टियां परमाणु समझौते को विश्वासघात के रूप में लेती होंगी। यह अलग बात है कि उनके अपने विचार हैं और हमारे अपने विचार हैं।"

तब लोकसभा चुनाव से ऐन पहले  कोलकाता के एक समाचार पत्र आनंद बाजार पत्रिका के साथ एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य को अपना निजी मित्र बताया।उन्होंने कहा, "सरकार गठन को लेकर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के साथ कोई समझौता हो सकता है। राजनीति में स्थायी मित्र और शत्रु नहीं होते।"

और अब आजतक की इस खबर पर भी गौर करें:

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी :माकपा: के महासचिव प्रकाश करात ने कहा है कि जबतक राहुल गांधी अपने आप को समाजवादी घोषित नहीं करते, अगले चुनाव के बाद तक कांग्रेस को समर्थन करने की कोई संभावना नहीं है.
करात ने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा, 'जबतक राहुल गांधी खुद को समाजवादी घोषित नहीं करते और नया आर्थिक घोषणापत्र नहीं लाते तबतक कांग्रेस को समर्थन देने की संभावना नहीं है.'

इस पत्रिका की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार करात इस प्रश्न का उत्तर दे रहे थे कि यदि वर्ष 2014 में आम चुनाव में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आती है तो क्या माकपा 'धर्मनिरपेक्षता' के सिद्धांत पर कांग्रेस का समर्थन करेगी.

उल्लेखनीय है कि माकपा की अगुवाई में वामदलों ने वर्ष 2008 में भारत अमेरिका परमाणु करार के मुद्दे पर संप्रग प्रथम सराकर से समर्थन वापस ले लिया था.

करात का साक्षात्कार ऐसे समय में आया है जब माकपा ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में संप्रग उम्मीदवार के रूप में प्रणब मुखर्जी के नाम पर मुहर लगायी है और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को फिर से इस पद के लिए नामित किये के पक्ष में सहजता का संकेत दिया है.

जब करात से मुलायम सिंह यादव के हाल के राजनीतिक कदमों के बारे में पूछा गया तब उन्होंने मजाक में कहा, 'उन्हें लगता है कि इसकी प्रबल संभावना है कि वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं.' उन्होंने वामदलों द्वारा तीसरे या चौथे मोर्चे बनाने के किसी प्रयास से इनकार किया.

उन्होंने कहा, 'हम क्षेत्रीय दलों के विकास को सकारात्मक घटनाक्रम के रूप में देखते हैं. लेकिन उसी के साथ सुसंगत अखिल भारतीय मोर्चा का गठन करना कठिन है. यही वजह है कि हमें इसमें रूचि नहीं है.'

माकपा नेता ने यह भी कहा, 'जरूरत तो है लेकिन तीसरा मोर्चा के बारे में सोचना हकीकत से परे है.'



(और भी... http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/702658/9/76/Support-to-Congress-ruled-out-unless-Rahul-Gandhi-declares-himself-a-socialist-CPM.html)

राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव में भी संप्रग के घटक दलों में एक राय नहीं देखी गई। राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का विरोध करने वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस चुनाव में भी डा. अंसारी के नाम पर मुहर नहीं लगाई है। उसने अपनी ओर से दो नाम सुझाए जिसे खारिज कर दिया गया और अंसारी के नाम की घोषणा की गई।लेकिन चिदम्बरम ने दावा किया कि अंसारी को नामित किए जाने के फैसले को बैठक में मौजूद सभी नेताओं ने स्वीकार किया और तृणमूल कांग्रेस सहित सभी दलों ने इसका स्वागत भी किया।चिदम्बरम ने कहा कि बैठक के दौरान कुछ और नाम भी सुझाए गए थे लेकिन अंसारी के नाम पर सर्वसम्मति बनी।चिदंबरम ने यह भी बताया कि एसपी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और बीएसपी प्रमुख मायावती ने अंसारी के नाम पर सहमति जताई है।लेकिन इसके साथ ही यूपीए का संकट शुरू हो गया है। कैबिनेट में एके एंटनी को 'दूसरा नंबर' का अनौपचारिक ओहदा मिलने से एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार नाराज हो गए हैं। यही वजह है कि एनसीपी की ओर से न तो वे न ही प्रफुल्ल पटेल शनिवार की बैठक में शामिल हुए। बताया जा रहा है कि पवार ने पटेल को मुंबई में ही रोक दिया।   

वहीं, यूपीएम में शामिल तृणमूल कांग्रेस ने हामिद अंसारी के नाम पर असहमति जताते हुए अपनी तरफ से दो उम्मीदवारों के नाम बैठक में पेश किया। इनमें गोपाल कृष्ण गांधी और कृष्णा बोस शामिल हैं। गोपाल कृष्ण गांधी महात्मा गांधी के पौत्र और कृष्णा बोस सुभाष चंद्र बोस के भतीजे की पत्नी हैं। बैठक के बाद मीडिया से मुखातिब केंद्रीय रेल मंत्री और तृणमूल के वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय ने कहा कि अभी अंसारी को लेकर उनकी पार्टी का क्या रुख है, वह नहीं बता सकते हैं। रॉय ने कहा कि वे बैठक के बारे में अपनी नेता ममता बनर्जी को जानकारी देंगे। उसके बाद ही हामिद अंसारी को समर्थन देने या न देने पर फैसला लिया जाएगा। न्होंने कहा, हमने अपने नाम सुझाए। उन्होंने अपने नाम बताए। मैं पार्टी को इससे अवगत कराऊंगा। पार्टी ही अंतिम फैसला लेगी।रॉय ने बताया कि बैठक में कुछ और नाम भी सामने आए लेकिन वे टिक नहीं सके।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में भी अंसारी का नाम प्रणब मुखर्जी के साथ चर्चा में आया था लेकिन तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने दोनों नामों को खारिज करते हुए अपनी ओर से पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम सुझाया था। हालांकि कांग्रेस ने इन सभी तीनों नामों को खारिज कर दिया था।

बहरहाल, संप्रग द्वारा अपनी पसंद खारिज किए जाने के बाद तृणमूल ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। तृणमूल कांग्रेस 17 जुलाई को होने वाली अपनी बैठक में राष्ट्रपति चुनाव के साथ-साथ उपराष्ट्रपति चुनाव पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेगी।


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आधिकारिक आवास पर हुई संप्रग के सभी घटक दलों की बैठक में शनिवार को अंसारी की उम्मीदवारी की घोषणा की।

सोनिया ने कहा, अंसारी ने बड़ी गरिमा के साथ राज्यसभा के सभापति के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए दूसरी बार नामित कर संप्रग गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

अंसारी की उम्मीदवारी की घोषणा के तत्काल बाद मनमोहन और सोनिया ने उन्हें फोन कर बधाई दी।

अपनी उम्मीदवारी घोषित किए जाने के बाद डा. हामिद अंसारी ने कहा कि उन्होंने विनम्रता के साथ अपनी उम्मीदवारी स्वीकार कर ली है। साथ ही उन्होंने उन सभी राजनीतिक दलों का शुक्रिया अदा किया जिन्होंने उन्हें समर्थन दिया।75 वर्षीय अंसारी ने अपने कैरियर की शुरूआत भारतीय विदेश सेवा के एक नौकरशाह के रूप में 1961 में शुरू की थी और अलीगढ़ मुस्लिम विविद्यालय के कुलपति के रूप में भी काम किया।

केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल के साथ मीडियाकर्मियों से बातचीत में अंसारी ने कहा कि वह खुद पर भरोसा जताने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बहुत धन्यवाद करते हैं।

अंसारी ने कहा, मैं इस सम्मान को बड़ी ही विनम्रता से स्वीकार करता हूं। मैं प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष तथा मेरा समर्थन करने और मुझ पर विश्वास जताने के लिए समर्थन करने वाले सभी राजनीतिक दलों का शुक्रिया अदा करता हूं।

अंसारी इससे पहले वर्ष 2007 में उपराष्ट्रपति पद के लिए चुने गए थे। उनका कार्यकाल 10 अगस्त को समाप्त हो रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि अंसारी को सर्वसम्मति से संप्रग का उम्मीदवार बनाया गया है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के नेता मुकुल रॉय ने कहा कि उनकी पार्टी ने उपराष्ट्रपति पद के लिए पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी और पूर्व सांसद कृष्णा बोस का नाम सुझाया है।

चिदम्बरम ने बताया कि प्रधानमंत्री ने अंसारी के नाम पर सहमति बनाने के लिए संप्रग की बैठक के पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से भी बात की थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती से भी बात की। दोनों नेताओं ने अंसारी को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले का स्वागत किया।

मनमोहन सिंह ने मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव प्रकाश करात से भी इस सिलसिले में बात की थी।


इस बीच, भाजपा ने साफ कर दिया कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में अंसारी के लिए मैदान खाली नहीं छोड़ेगी। पार्टी ने हालांकि उम्मीदवार का नाम तय नहीं किया है। इसके लिए 16 जुलाई को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की बैठक बुलाई गई है।

भाजपा कोर ग्रुप की बैठक के बाद महासचिव अनंत कुमार ने कहा, हमने उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ना तय किया है। उन्होंने हालांकि यह नहीं बताया कि पार्टी का उम्मीदवार कौन होगा। आगामी 16 जुलाई को राजग की बैठक बुलाई गई है, जिसमें उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम पर चर्चा होगी।

कुमार ने कहा, हम इस मसले पर 16 जुलाई को राजग की बैठक में चर्चा करेंगे। हम अन्य राजनीतिक दलों से भी बात करेंगे।

उपराष्ट्रपति पद के लिए सात अगस्त को मतदान होना है। नामांकन करने की आखिरी तारीख 20 जुलाई है।

09 जुलाई 2008 को भारत-अमेरिकी परमाणु करार के विरोध में चार वामदलों द्वारा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (संप्रग) से समर्थन वापसी के संबंध में एक वक्तव्य जारी किया गया। इस वक्तव्य पर माकपा महासचिव प्रकाश करात, भाकपा महासचिव एबी. वर्द्धन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव टीजे. चंद्रचूडन और अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक के महासचिव देवव्रत विश्वास के हस्तक्षर हैं।

कृपया उस बयान को दोबारा पढ़ें और बतायें कि हालात कितने बदल गये कि वामपंथियों को आज कांग्रेस का समर्थन करना जरूरी लगता है!
वामदलों का वक्तव्य-

वामपंथी पार्टियों ने संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर वामपंथी पार्टियों के समर्थन से 2004 में संप्रग सरकार बनी थी। लक्ष्य यह था कि सांप्रदायिक ताकतों का मुकाबला किया जाए और सत्ता में रहने के अपने दौर में उन्होंने भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया था, उसे अनकिया किया जाए। इसके लिए जरूरत थी ऐसी परस्परसंबद्ध नीतियों की, जिनसे जनता को राहत मिले, देश की अखंडता की रक्षा हो और एक स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण किया जाए। उस समय जबकि महंगाई के बोझ तले जनता पिस रही है और मुद्रास्फीति छलांगे लगाकर ऊपर चढ़ रही है, नाभिकीय सौदे को आगे बढ़ाकर मनमोहन सिंह की सरकार ने स्पष्ट रूप से दिखा दिया है कि उसे भारत की जनता के साथ किए गए अपने वादे पूरे करने की नहीं, बुश प्रशासन से अपने वादे पूरे करने की ही ज्यादा चिंता है।

भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा भारत के महत्वपूर्ण हितों के खिलाफ है। कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार ने, अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन को गले से लगाया है। राष्ट्रपति बुश के साथ किया गया यह संदिग्ध सौदा, अनेक दूसरे समझौतों के केन्द्र में है, जैसे सैन्य गठबंधन और खुदरा क्षेत्र, शिक्षा आदि के क्षेत्र में अमेरिकी पूंजी के लिए रिआयतें आदि।

नाभिकीय समझौते से भारत को ऊर्जा सुरक्षा हासिल नहीं होगी। चूंकि यह अमेरिकी कानून 'हाइड एक्ट' पर टिका हुआ है, इससे स्वतंत्र विदेश नीति में बाधा पड़ेगी और हमारी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित होगी।

मनमोहन सिंह सरकार साझा न्यूनतम कार्यक्रम के घोर उल्लंघन की दोषी है। इस कार्यक्रम में अमेरिका के साथ रणनीतिक गठजोड़ का कोई प्रावधान नहीं है।

वामपंथी पार्टियां, ऐसे रास्ते का समर्थन नहीं कर सकती हैं जो जनता के लिए तथा देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदेह है।

1) प्रधानमंत्री ने 2006 के अगस्त में संसद में परमाणु समझौते में भारत के हितों की रखवाली किए जाने के आश्वासन दिए थे। इन आश्वासनों को 2006 के दिसंबर में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित 'हाइड एक्ट' ने नकार दिया।

2) इसके बावजूद प्रधानमंत्री, वामपंथ तथा अन्य राजनीतिक हलकों के कड़े विरोध के बावजूद '123 समझौते' पर वार्ताओं पर बजिद रहे। वैज्ञानिक समुदाय के भी अच्छे-खासे हिस्से ने इस सौदे का विरोध किया था1

3) 2007 के दिसंबर में, संसद के दोनों सदनों में हुई बहस से सामने आए बहुमत के स्पष्ट विचारों को अनदेखा कर, प्रधानमंत्री ने संसद के प्रति निरादर का ही प्रदर्शन किया है।

4) अब सरकार तथाकथित- 'भारत निगरानी (सेफगार्ड्स) समझौते' के संबंध मे देश को अंधेरे में रखना चाहती है और इस पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के बोर्ड ऑफ गर्वर्नर्स का अनुमोदन हासिल करने के लिए आगे बढ़ना चाहती है।

5) कांग्रेस के नेतृत्व ने 2007 के नवंबर में वामपंथी पार्टियों के साथ बनी समझदारी का उल्लंघन किया है, जिसके अनुसार आईएईए सेक्रेटेरियट के साथ वार्ताओं के फल को, नाभिकीय समझौते पर बनी संप्रग-वामपंथी कमेटी के सामने रखा जाना था।

6) निगरानी (सेफगार्ड्स) समझौते का मसौदा अध्ययन के लिए कमेटी के सामने रखा ही नहीं गया। इसलिए, कमेटी किन्हीं नतीजों पर पहुंच ही नहीं सकती है जिनके आधार पर सरकार आगे बढ़ सकती हो।

प्रधानमंत्री जापान में हो रहे जी-8 शिखर सम्मेलन में गए हैं और राष्ट्रपति बुश से मुलाकात करने से पहले उन्होंने इसका एलान किया है कि सरकार बहुत जल्दी आईएईए बोर्ड के सामने जाने वाली है। लेकिन, इस संबंध में वामपंथी पार्टियों तथा जनता को कुछ नहीं बताया गया था। यह पूरे देश के सामने स्पष्ट हो गया है कि हमारे यहां ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनकी प्राथमिकता राष्ट्रपति बुश से किए अपने वादे पूरे करना है। जनता तथा देश के सामने खड़ी समस्याएं इंतजार करती रही सकती हैं।

कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार को वामपंथी पार्टियों ने इसकी वचनबद्धता के आधार पर अपना समर्थन दिया था कि भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार के अमेरिका परस्त रुख के विपरीत, यह सरकार एक स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण करेगी। उस वचनबद्धता का उल्लंघन किया गया है। इसलिए वामपंथी पार्टियों को इस सरकार से खुद को अलग करना होगा।

आम आदमी के साथ विश्वासघात-

कांग्रेस के नेतृत्व ने आम आदमी की दशा में सुधार का वादा किया था। संप्रग सरकार के शासन के चार साल बाद जनता अभूतपूर्व महंगाई के बोझ तले कराह रही है। चावल, गेंहू, खाने के तेल, दाल, सब्जियां तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आकाश छू रही हैं। मिसाल के तौर पर 2004 से 2008 के बीच, चावल की खुदरा कीमत में 46 से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, गेहूं की कीमत में 62 फीसदी, सरसों के तेल की कीमत में 42 फीसदी, चना दाल की कीमत में 47 फीसदी और यहां तक कि नमक की कीमत में भी 42 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

पिछले चार साल में सरकार ने पेट्रोल तथा डीजल के दाम में सात बार बढ़ोतरी की है। 2004 से 2008 के बीच पैट्रोल के दाम में 50 फीसदी, डीजल के दाम में 60 फीसद और रसोई गैस के सिलेंडर के दाम में 58 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

सरकार ने वामपंथी पार्टियों की इन मांगों को नामंजूर कर दिया है कि-

1) सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौम बनाया जाए, जिसमें सबका राशन कार्ड हो।

2) आवश्यक वस्तुओं में वायदा कारोबार को रोका जाए।

3) जमाखोरी तथा सट्टाबाजारी पर रोक लगाई जाए।

4) पैट्रोलियम उत्पादों पर कर का बोझ घटाया जाए।

5) और निजी रिफाइनरियों के छप्पर-फाड़ मुनाफों पर कर लगाया जाए।

एक नव-उदारवादी एजेंडा अपनाकर कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार, पिछली भाजपा सरकार की जैसी ही नीतियों पर चल रही है। यही नीतियां इस दर्दनाक दृश्य के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं। जहां खेती संकट में है, किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, वहीं अरबपतियों और खरबपतियों के आंकड़े में अश्लील बढ़ोतरी हो रही है।

कांग्रेस विदेश नीति तथा घरेलू नीति दोनों में और दक्षिणपंथी बदलाव लाने पर तुली हुई है। यह स्थिति सांप्रदायिक ताकतों को उपजाऊ जमीन मुहैया करा रही है।

चूंकि कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार जान-बूझकर साझा न्यूनतम कार्यक्रम की अनदेखी कर रही है, वामपंथी पार्टियों ने ऐसी जनविरोधी सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला लिया है।

संसद का सामना करो-

वामपंथी पार्टियों के समर्थन वापस लेने के साथ ही सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है और वैधता गंवा दी है। प्रधानमंत्री को लोकसभा का सामना करना चाहिए और विश्वास मत हासिल करना चाहिए।

वामपंथियों के इतिहास पर बीबीसी की इस रपट पर भी गौर करें!

पिछली सदी में 20 के दशक में भारत में शुरू हुए कम्युनिस्ट आंदोलन ने कई पड़ाव तय किए हैं.
1951-52 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने जहाँ 16 सीटें जीती थीं वहीं पिछले लोकसभा चुनाव में वामपंथी दलों की कुल सीटों की संख्या बढ़कर 61 पहुँच गई थी.

इसमें अकेले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के 43 सदस्य थे.

1957 में कम्युनिस्टों ने पहली बार केरल में विधानसभा चुनाव जीता था. ये पहला मौक़ा था जब दुनिया में कोई भी कम्युनिस्ट सरकार मतदान द्वारा चुनकर सत्ता में आई थीं.

ईएमएस नंबूदरीपाद वहाँ के मुख्यमंत्री बने. ये अलग बात है कि दो साल बाद 1959 में इस सरकार को केंद्र ने बर्ख़ास्त कर दिया.

वामपंथी दलों के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट 1962 में आया जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया.

जहाँ सोवियत संघ का समर्थन करने वाले वामपंथी नेताओं ने भारत सरकार का समर्थन किया, लेकिन कुछ कम्युनिस्ट नेताओं जैसे ईएमएस नम्बूदरीपाद और बीटी रणदिवे ने इसे समाजवादी और पूँजीवादी राष्ट्र के बीच संघर्ष करार दिया.

1964 के आते-आते कम्युनिस्ट पार्टी में औपचारिक विभाजन हो गया. 1970 से 1977 के बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने काँग्रेस का समर्थन किया.

केरल में उसने काँग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अच्युत मेनन वहाँ के मुख्यमंत्री बने.

1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पश्चिम बंगाल में सत्ता में आई और तभी से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भी काँग्रेस से मोह भंग शुरू हो गया.

1989 के लोकसभा चुनाव के बाद वामपंथी दलों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की जनता दल सरकार को बाहर से समर्थन दिया.

दिलचस्प बात यह कि इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी भी बाहर से समर्थन दे रही थी.

1996 में जब काँग्रेस की हार हुई तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने में वामपंथी दलों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही.

'ऐतिहासिक भूल'

एक समय तो ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाए जाने पर लगभग सहमति बन गई थी.



सुरजीत समीकरणों को साधने की कला में निपुण माने जाते हैं

लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें ये पेशकश स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी. बाद में स्वयं ज्योति बसु ने इसे एक 'ऐतिहासिक भूल' बताया और कहा कि इसका कारण था पोलित ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी के सदस्यों में उपयुक्त राजनीतिक समझ का अभाव.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने ज़रूर तीसरे मोर्चे की सरकार में शिरकत की और इंद्रजीत गुप्त भारत के गृह मंत्री बने.

आठ साल बाद जब वामपंथियों के पास एक बार फिर सरकार में शामिल होने का मौक़ा आया, तो इतिहास ने एक बार फिर अपने आप को दोहराया.

उन्हें केंद्र सरकार में भागीदारी कर किसानों, मज़दूरों, निम्न मध्यमवर्ग के लिए कुछ कर पाने और दक्षिणपंथियों द्वारा सत्ता व्यवस्था में कथित रूप से की गई घुसपैठ की सफ़ाई से ज़्यादा चिंता पश्चिम बंगाल और केरल के अपने किले को बचाए रखने की हुई.

मज़ेदार बात ये है कि 1967 और 1969 में कम्युनिस्टों ने ही अजय मुखर्जी के नेतृत्ववाली काँग्रेस की सरकार में शामिल होकर पश्चिम बंगाल में अपना असर बढ़ाया था.

सत्ता में शामिल हुए बग़ैर बंगाल में उनके द्वारा लाए गए भूमि सुधार के कार्यक्रम सफ़ल हो पाते इसमें काफ़ी संदेह है.

ज़िम्मेदारी से आनाकानी

वामपंथियों के ख़िलाफ़ ये टिप्पणी भी की जाती रही हैं कि वे सरकार की सफलताओँ का श्रेय तो लेना चाहते हैं लेकिन कमज़ोरियों, विफलताओं, गड़बड़ियों की पूरी ज़िम्मेदारी सरकार पर ही डालना चाहते हैं.

वे इसका जवाब ये कहकर देते हैं कि जिस गठबंधन का नेतृत्व वामपंथियों के हाथ में न हो, उसकी नीतियों को भी एक सीमा से अधिक नहीं प्रभावित किया जा सकता.

वैश्वीकरण और उदारीकरण की काँग्रेस की नीतियों को अगर वे गरीबों के पक्ष में नहीं मोड़ पाते हैं तो जनअसंतोष के दंड का भागीदार भी वामपंथियों को बनना पड़ेगा.

केरल और पश्चिम बंगाल के बारे में उनकी दलील है कि दोनों राज्यों में काँग्रेस की नीतियों का विरोध कर ही वाम मोर्चे ने भारी विजय पाई है और उन्हीं नीतियों से भागीदारी दिखाना अलगे वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में उनके लिए भारी पड़ जाएगा.

लेकिन सरकार से बाहर रहते हुए भी कई मुद्दों पर उन्होंने सरकार का हाथ मरोड़ा है.

हाल में संसद में पास हुआ पेटेंट बिल और पेंशन बिल का स्थाई समिति को भेजा जाना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.

कहा जाता है कि दुनिया भर में कम्युनिस्ट नेता कभी रिटायर नहीं होते-चाहे वो माओ हों, लियोनिद ब्रेझनेव हों या फिर फ़ीडेल कास्ट्रो हों.

लेकिन मार्क्सवादी पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता हरकिशन सिंह सुरजीत अगली पीढ़ी को पार्टी का नेतृत्व सौंपने के बारे में सोच रहे हैं.

सुरजीत 1992 से पार्टी के महासचिव हैं और छह अप्रैल से शुरू होने वाली पार्टी काँग्रेस में नई केंद्रीय समिति का चयन होगा और नई केंद्रीय समिति नए महासचिव का चुनाव करेगी.

सबकी आँखें पोलित ब्यूरो के अपेक्षाकृत युवा चेहरे प्रकाश करात पर हैं जिन्हें वामपंथी हलकों में कट्टरपंथी माना जाता है.

इस पद के दूसरे दावेदार सीताराम येचुरी हैं जोकि गठबंधन राजनीति में पार्टी के रूख़ को सामने रखने के लिए जाने जाते हैं.

पार्टी की पिछली काँग्रेस में भी नेतृत्व परिवर्तन की बात आई थी और कहा गया था कि सुरजीत किसी युवा चेहरे को नेतृत्व की बागडोर सौंपना चाहते हैं.

लेकिन उन्होंने अंततः पद न छोड़ने का फ़ैसला किया था.
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2005/03/050329_left_rehan.shtml

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হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

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अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

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Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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