Welcome

Website counter
website hit counter
website hit counters

Monday, May 27, 2013

लोकतंत्र की हत्या के दोषी जितने माओवादी हैं, उससे कम दोषी नहीं है धर्मान्ध राष्ट्रवाद और वर्चस्ववादी सत्तावर्ग के शिकंजे में कैद सैन्य पारमाणविक राष्ट्र भी!


लोकतंत्र की हत्या के दोषी जितने माओवादी हैं, उससे कम दोषी नहीं है धर्मान्ध राष्ट्रवाद और वर्चस्ववादी सत्तावर्ग के शिकंजे में कैद सैन्य पारमाणविक राष्ट्र भी!


पलाश विश्वास


सुकमा के जंगल में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला करके माओवादियों ने छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व का जो सफाया किया है, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसकी सबसे बड़ी वजह बतौर सुरक्षा इंतजाम में खामी को चिन्हित किया है।यह अत्यंत ही गंभीर मसला है। एऩआईए की जांच की केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी है तो रमण सिंह की सरकार ने भी न्यायिक जांच कराने की कवायद शुरु कर दी है। कोई शक नहीं है कि माओवादी हमले की, आंदोलन को आतंकवाद का पर्याय बना देने ओर आदिवासियों को राष्ट्र की मुख्यधारा से काटने का अपराध अक्षम्य है।माओवादियों ने बाकायदा जनयुद्ध तेज करने के मकसद को अंजाम देते हुए इस हमले के जरिये राष्ट्र को सैन्यदमन का न्यौता दिया है और विडंबना देखिये कि भारत सरकार और उसकी एजंसियां इसी बारुदी सुंरंग की चपेट में हैं।सशस्त्र माओवादियों ने शनिवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कांगे्रस के नेताओं के काफिले पर हमला किया था। इसमें प्रदेश कांग्रेस प्रमुख, उनके बेटे, कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा और पूर्व विधायक मुदलियार सहित 30 लोग मारे गए थे। इसके अलावा पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल के साथ 32 लोग घायल हुए हैं।


सबसे जरुरी है आदिवासियों का अलगाव खत्म करके उन्हें राष्ट्र की मुख्यदारा में शामिल करना। सबसे जरुरी है आदिवासी इलाकों में भारत का संविधान लागू करना और कानून का राज कायम करने के साथ वहां लोकतंत्र की बहाली करना। सबसे जरुरी है जल जंगल जमीन आजीविका और  नागरिकता से आदिवासियों की बेदखली अभियान तुरंत रोककर संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक पांचवी और छठीं अनुसूचियों को लागू करने के साथ संविधान की धारा 39 बी और सी के तहत उनके हक हकूक को लागू करना। इसके बिना दमन से माओवाद खत्म होने के बजाय बढ़ता ही जायेगा।


बिना ऐसे किये राजनेताओं की मांग के मुताबिक दमनचक्र तेज करने से हालात और बिगड़ने के आसार हैं।लेकिन असली समस्या को संबोधित किये बिना सरकारी आपरेशन की दिशा दशा दमन से शुरु होती है और दमन में ही खत्म होती है और जिसकी परिणति होती है निरंकुश सरकारी हंसा य फिर माओवादी हिंसा। लहूलुहान होते रहना आजिवासी आबादी की नियति बन गयी है आजाद भारत में। मसलन छत्तीसगढ़ में जिस स्थान पर नक्सली हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा समेत कम से कम 30 लोग मारे गए, वहां नक्सलियों की धरपकड़ एवं तलाशी तथा उस स्थान को नियंत्रण में लेने के लिए कोबरा कमांडो समेत 600 से अधिक सीआपीएफ जवान भेजे गए हैं।केंद्र ने इन सीआरपीएफ जवानों को न केवल उस क्षेत्र को नियंत्रण में लेने के लिए बल्कि तलाशी अभियान एवं बचाव अभियान के लिए भी भेजा है क्योंकि ऐसा संदेह है कि कुछ लोग समीप के जंगलों में छिपे हो सकते हैं।आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि नक्सल विरोधी अभियानों के लिए तैनात बल के शीर्ष अधिकारी कल मुठभेड़ स्थल पर जाएंगे।सीआरपीएफ ने दक्षिणी बस्तर में घातक हमले की पृष्ठभूमि में राज्य में अपनी सभी इकाइयों से अतिरिक्त चौकन्ना रहने को कहा है।


माओवादी नृशंसता की वजह से सलवा जुड़ुम के पाप धुल नहीं जाते। यह सच मिथ्या में बदल नहीं जाता कि देशभर में आदिवासी इलाकों में न भारतीय लोकतंत्र का कोई वजूद है और न कहीं कानून का राज है। इस हमले से पहले छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाकों में माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सुरक्षा बलों ने निरपराध निहत्था आदिवासियों के गांव के गांव फूंकने और उन्हें चांदमारी का निशाना बनाने की असंख्य घटनाओं को अंजाम दिया है। सलवा जुड़ुम के तहत न सिर्फ आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ हथियारबंद युद्ध में झोंककर पूरे मध्यभारत को गृहयुद्ध  की  आग में भुना जाता रहा है बल्कि इसके माद्यम से हिटलर के यातना शिविरों को शर्मिंदा करने वाले कार्य होते रहे हैं। जिसकी जिम्मेदार भाजपा और कांग्रेस दोनों हैं। केंद्र और राज्य सरकार दोनों।


पूरे छत्तीसगढ़ ही नहीं अकूत खनिज संपदा और प्रकृतिक संसाधनों से समृद्ध आदिवासी बहुल राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओड़ीशा, झारखंड समेत जिन राज्यों में आदिवासियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है,मसलन बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र, तमिलनाडु, असम, बंगाल के आदिवासी इलाकों में खुल्ला कारपोरेट राज है। एक तरफ सत्तापक्ष का कारपोरेट अश्वमेध अभियान और दूसरी तरफ निरंकुश माओवादी हिसा की दोहरी पाट में पिस रही है देश की आदिवासी आबादी।


सुकमा कांड सलवाजुड़ुम की ही तार्किक परिणति है और ऐसे कांड बंगा,. उड़ीशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से लेकर असम, त्रिपुरा, गुजरात और राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक में होने की आशंका है।


लोकतंत्र की हत्या हुई है, चीख चीखकर राजनीति के तमाम रथी महारथी और मीडिया दिग्गज माओवादियों के सफाये का आवाहन करते हुए दरअसल इस देश की आदिवासी आबादी के खिलाफ ही युद्ध घोषणा कर रहे हैं और भूल रहे हैं कि इस आत्मघाती हिंसक अराजकता के पीछे मुख्य कारक कारपोरेट राज है और लोकतंत्र की हत्या के दोषी जितने माओवादी हैं, उससे कम दोषी नहीं है धर्मान्ध राष्ट्रवाद और वर्चस्ववादी सत्तावर्ग के शिकंजे में कैद सैन्य पारमाणविक राष्ट्र भी।


छत्तीसगढ़ के सुकमा में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर जो माओवादी हमला हुआ, उसकी निंदा और भर्त्सना के लिए कोई भाषा पर्याप्त नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से अब माओवादप्रभावित इलाकों में सघन सैन्य कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन जैसे कि हमेशा होता रहा है , माओवादी हमले के बाद आतंकवादियों की तरह मौके से गायब हो जाते हैं। नतीजतन इस वारदात का खामियाजा उन निहत्था और​  निर्दोष आदिवासियों को ही भुगतना ​​पड़ेगा, जिनकी लड़ाई लड़ने का दावा माओवादी करते हैं।


जिसतरह पूरे प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व का माओवादियों ने सफाया कर दिया और पूर्व केंद्रीय मंत्री व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल और​​ छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी पर हमले हुए, अभी शुक्ल की हालत नाजुक बनी हुई है, उससे नक्सलप्रभावित अत्यंत संवेदनशील इलाकों में परिवर्तन यात्रा के सुरक्षा इंतजाम और रमण सिंह सरकार के राजकाज पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं। सलवा जुड़ुम की वजह से छत्तीसगढ़ में जो विस्फोटक हालत बनी हुई है, उसका महाविस्फोट हो गया है।


माओवादी इस देश के संविधान और कानून व्यवस्था में कोई आस्था नहीं रखते। इस ताजा हमले में तो वे आतंकवादियों के साथ खड़े हो गये हैं। लेकिन इस समस्या से निपटने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि माओवादी अपने ढाल बतौर आदिवासी आबादी को सामने रखते हुए खुद बच निकलते हैं।आदिवासियों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है। उनकी न्यायोचित मांगों को लेकर लोकतांत्रिक लड़ाई माओवादी लड़ने को तैयार नहीं हैं,  और न वे आदिवासी इलाकों में लोकतांत्रिक प्रणाली की बहाली या विकास योजनाओं की इजाजत देते हैं।


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नेताओं के काफिले पर माओवादियों की ओर से किए गए घातक हमले की घटना की जांच (एनआईए) आज से शुरू कर देगी। केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह ने बताया कि इस हमले की जांच एनआईए को औपचारिक रूप से सौंपे जाने का आधिकारिक आदेश शीघ्र ही जारी किया जाएगा।सिंह ने  संवाददाताओं से कहा, ''हम एनआईए जांच के आदेश जारी करेंगे। एनआईए की टीम छत्तीसगढ़ भी जाएगी।''


गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कल कहा था कि कांग्रेसी नेताओं पर माओवादी हमले की जांच एनआईए से कराई जाएगी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह इसके लिए राजी हैं।



जल्द ही होने वाली माओवादी कांग्रेस की दसवीं बैठक को लेकर चर्चा गरम है। खासकर सुरक्षा बलों की इसमें खासी दिलचस्पी है। मध्य और पूर्वी भारत के माओवादी संघर्ष वाले इलाकों में मानसून की दस्तक के बाद यह कांग्रेस होगी। दरअसल, यही वह समय होता है, जब माओवादियों का जमीनी-ऑपरेशन और उनके खिलाफ सशस्त्र बलों की सक्रियता, दोनों थम-से जाते हैं। दोनों को ही फिर से सूखे मौसम का इंतजार करने के लिए कुदरत एक तरह का टाइम आउट देती है। क्या इस बैठक को माओवादियों के लिए आपसी विश्वास बहाली और आगे की रणनीति तय करने के अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए या फिर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) पर इस वक्त जबर्दस्त दबाव है और इसी के चलते वह यह आयोजन कर रही है?


शायद, यह माओवादियों की बढ़ती परेशानियों का संकेत भी है। फिलहाल, भारतीय माओवादी प्रचार   मशीनरी का ध्यान सबसे अधिक 'ओपलान बायानिहान' नाम से फिलीपींस में चल रहे ऑपरेशन पर केंद्रित है। इस ऑपरेशन में वहां की सरकार वामपंथी विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चला रही है। इसकी तुलना में भारत में चला माओवादी-विरोधी ऑपरेशन थोड़ा हल्का जान पड़ता है। 17 मई के एक ऑपरेशन के दौरान छत्तीसगढ़ के दक्षिणी हिस्से में सात गांव वाले मारे गए। हिन्दुस्तान टाइम्स समेत कुछ अन्य अखबारों की खबर के अनुसार ये मौतें सुरक्षा बलों व विद्रोहियों के बीच गोलीबारी में हुईं। इन हत्याओं के खिलाफ जो गुस्सा भड़का, वह स्थानीय ज्यादा था। इनमें घटनास्थल पर प्रभावित समुदाय के लोग एवं माओवादियों व शासन के कृपापात्र थे। बदलाव के तौर पर छत्तीसगढ़ और नई दिल्ली, दोनों ही सरकारों ने गलती मानने में देरी नहीं दिखाई और मृतक के परिजनों को मुआवजा देने की घोषणाएं की गईं। सरकार ने लगभग एक साल पहले की तरह चुप्पी नहीं साधी, जब छत्तीसगढ़ में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के ऑपरेशन में 17 आम नागरिक मारे गए थे।


दूसरी ओर, इस मामले में माओवादियों ने एक नपा-तुला जाल फेंका, जिसमें फंसकर सरकार ने गलत कदम उठाए। वैसे ही, नई दिल्ली में एक माओवादी संगठन के सदस्यों ने दिल्ली विश्वविद्यालय में डिग्री की पढ़ाई एक साल बढ़ाने के विरोध में सड़क पर प्रदर्शन को तरजीह दी। मानो माओवादी तंत्र यह चाहता है कि उस पर से सरकार का ध्यान हट जाए। दरअसल, माओवादी गुट तीन साल में अपने नेताओं, काडरों और वर्चस्व-क्षेत्रों में आई तेज कमी को लेकर परेशान है। यह रुझान सभी माओवाद प्रभावित राज्यों में कमोबेश एक जैसा है। हाल के दिनों में माओवादी गुट और कमजोर हुए हैं। लगता है कि अप्रैल के शुरू से उनका प्रभाव जबर्दस्त घटा है, तब  दस माओ-विद्रोहियों की हत्या झारखंड में हुई थी और महाराष्ट्र में  विशेष पुलिस बल की कार्रवाई में छह माओवादी मारे गए थे। तब सीपीआई (माओ) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने विरोध में 24 घंटे के बंद का आह्वान किया था। यह कमेटी विद्रोहियों का दिमाग है और यह ऑपरेशनों को भी संचालित करती है। इसके मुताबिक, यह विशेष रूप से झारखंड में सबसे कठोर कार्रवाई थी। कमेटी ने कहा, 'इस भीषण जनसंहार के लिए खून के प्यासे विजय कुमार जिम्मेदार हैं, जो पहले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के मुखिया थे और फिलहाल झारखंड के राज्यपाल के सलाहकार हैं, जिन्हें सोनिया-मनमोहन-शिंदे-चिंदबरम-जयराम रमेश का मौन समर्थन प्राप्त है।'



छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है और केंद्र में कांग्रेस की।ताजा हमलों में दोनो सरकार के बीच तालमेल का अभाव भी प्रकट हो गया है।अब माओवादी आतंक से निपटते हुए आदिवासी इलाकों में कानून के राज और लोकतंत्र की बहाली के लिए दोनों सरकारों को आपसी समन्वय से बड़ी सावधानी से​​  काम करना होगा। माओवाद विराधी अभियान माओवादियों के विरुद्ध कठोरता के साथ चलना चाहिए, लेकिन यह सावधानी और संयम जरुर बरतने की जरुरत है कि माओवादी फिर दमन का शिकार आदिवासियों को बनाकर आदिवासी इलाकों में राष्ट्र के विरुद्ध गृहयुद्ध की स्थिति पैदा न कर दें।


छत्तीसगढ़ में नक्सल हमले से स्तब्ध राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रविवार को कहा कि देश न तो इस तरह के हमलों से आतंकित होगा और न ही इस तरह के कृत्यों से डरेगा।


अपने संदेश में राष्ट्रपति ने कहा,'मैं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं को ले जा रहे वाहनों के काफिले पर नक्सलियों द्वारा की गई अनियंत्रित हिंसा से बेहद निराश और स्तब्ध हूं।' उन्होंने कहा, 'मैं कड़े शब्दों में इस घटना की निंदा करता हूं और इस बात को दोहराना चाहूंगा कि हमारी लोकतांत्रिक राजनीति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। देश इस तरह की कार्रवाई से न तो आतंकित होगा और न ही डरेगा।'



छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में शनिवार को कांग्रेस नेताओं के काफिले पर माओवादियों के हमले की कई बुद्धिजीवियों ने निंदा की है। रविवार को जारी बयान में इन बुद्धिजीवियों ने हमले में मारे गए कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों के परिवार के प्रति संवेदना जताई है।


बयान में कहा गया है कि राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की माओवादी हमले में हुई हत्या बर्बर और निंदनीय है। उन्होंने कहा कि यह कृत्य हिरासत में कैदी की नृशंस हत्या के समान और गृह युद्ध या अंतरराष्ट्रीय युद्ध के मानकों के खिलाफ है। बुद्धिजीवियों ने कहा है कि माओवादियों की ओर से एक राजनीतिक पार्टी को इस तरह निशाना बनाना निराशाजनक है।


बयान में कहा गया है कि इस माओवादी हमले से उस इलाके में राज्य का दमन और बढ़ेगा। बुद्धिजीवियों ने कहा है कि लगता है कि हमले के लिए जिम्मेदार भाकपा (माओवादी) के नेतृत्व ने इस बात का गलत अनुमान लगा लिया कि दमन बढ़ने से उनकी संख्या बढ़ेगी और आंदोलन का विस्तार होगा। अगर मामला यही है तो, उनकी राजनीति शैतान की तरह है, ऐसे में शांति और न्याय के लिए राजनीति संघर्ष में लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करने वालों को उनसे किनारा कर लेना चाहिए।   

बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस, राज्य और केंद्र सरकार से अपील की है कि वह माओवादी हिंसा के  खिलाफ अपनी प्रतिक्रिया में संयम बरतें। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके में हिंसा तेजी से बढ़ रही है और इसमें अनगिनत लोगों की जान जा चुकी है।


इस बयान पर दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कालेज की एसोसिएट प्रोफेसर आभा देव हबीब, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद, बंगलूर के सूचना प्रौद्योगिकी इंजीनियर अनिवर अरविंद, पटना के सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल, शिक्षाविद दीलिप सिमोन, बंगलूर के मजदूर नेता जगदीश, पीयूसीएल राजस्थान की कविता श्रीवास्तव, पत्रकार सत्या शिवरामन (नई दिल्ली), अनहद की शबनम हाशमी और शिक्षाविद विनोद रैना शामिल हैं।





माओवाद (1960-70 के दशक के दौरान ) चरमपंथी अतिवादी माने जा रहे बुद्धिजीवी वर्ग का या उत्तेजित जनसमूह की सहज प्रतिक्रियावादी सिद्धांत है। माओवादी राजनैतिक रूप से सचेत सक्रिय और योजनाबद्ध काम करने वाले दल के रूप में काम करते है। उनका तथा मुख्यधारा के राजनैतिक दलों में यह प्रमुख भेद है कि जहाँ मुख्य धारा के दल वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही काम करना चाहते है वही माओवादी समूचे तंत्र को हिंसक तरीके से उखाड़ के अपनी विचारधारा के अनुरूप नयी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं। वे माओ के इन दो प्रसिद्द सूत्रों पे काम करते हैं :

1. राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है। 2. राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।

भारतीय राजनीति के पटल पर माओवादियों का एक दल के रूप में उदय होने से पहले यह आन्दोलन एक विचारधारा की शक्ल में सामने आया था पहले पहल हैदराबाद रियासत के विलय के समय फिर 1960-70 के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के रूप में वे सामने आए।

भारत में माओवाद असल में नक्सलबाड़ी के आंदोलन के साथ पनपा और पूरे देश में फैल गया। राजनीतिक रुप से मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टी में जब विभेद हुये तो एक धड़ा भाकपा मार्क्सवादी के रुप में सामने आया और एक धड़ा कम्युनिस्ट पार्टी के रुप में. इनसे भी अलग हो कर एक धड़ा सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चलते हुये पड़ोसी देश चीन के माओवादी सिद्धांत में चलने लगा। भारत में माओवादी सिद्धांत के तहत पहली बार हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले चारु मजूमदार के बेटे अभिजित मजूमदार के अनुसार चारू मजूमदार जब 70 के दशक में सशस्त्र संग्राम की बात कर रहे थे, तो उनके पास एक पूरी विरासत थी। 1950 से देखा जाय तो भारतीय किसान, संघर्ष की केवल एक ही भाषा समझते थे, वह थी हथियार की भाषा। जिन्होंने जमींदारों के खिलाफ, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हथियार उठाया था। 1919 में चौराचौरी में 22 पुलिस वालों को जलाया गया था, उसमें भी सबसे बड़ी भागीदारी किसानों की थी। उसके बाद ही तो गांधीजी ने असहयोग और अहिंसक आंदोलन की घोषणा की थी। लेकिन किसानों ने तो अपने तरीके से अपने आंदोलन की भाषा समझी थी और उसका इस्तेमाल भी किया था।


विकास की बड़ी योजनाएँ भी अनेक लोगों को विस्थापित कर रही है अतीत में ये बड़े बाँध थे और आज सेज बन गए है ,पुनर्वास की कोई भी योजना आज तक सफल नही मानी गयी है इससे जनता में रोष बढ़ता ही जाता है इसी रोष को लक्षित कर माओवादी पार्टी ने अपने पिछले सम्मेलन में साफ़ रूप से कहा था कि वो इस प्रकार की विकास परियोजनओं का विरूद्ध करेंगे तथा विस्थापितों का साथ भी देंगे यदि वे ऐसा करते है तो निश्चित रूप से एक राज्य के रूप में हमारा देश नैतिक अधिकार खो बैठैगा और उनके प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि अपने आप ही हो जायेगी। अगर आर्थिक कारणों को देखा जाए तो वे भी माओवाद के प्रसार के लिए काफी सीमा तक जिम्मेदार है यधपि पिछले 30 सालों में निर्धनता उन्मूलन के प्रयासों को भारी सफलता मिली है लेकिन यह भी माना ही जाता रहा कि ये योजनाएँ भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता का गढ़ रही है तथा निर्धनता उन्मूलन के आंकड़े बहुत भरोसे के लायक नहीं माने जा सकते है आबादी का बड़ा हिस्सा निर्धनता की रेखा से जरा सा ही ऊपर है ,तकनीकी रूप से भले ही वो निर्धन नहीं हो लेकिन व्यवहार में है और अर्थव्यवस्था में आया थोडा सा बदलाव भी उन्हें वापिस रेखा से नीचे धकेल देने के लिए काफी होता है. फ़िर जिस अनुपात में कीमतें बढ़ जाती है उसी अनुपात में निर्धनता के मापदंड नहीं बदले जाते है इस से बड़ी संख्या में लोग निर्धनता के चक्र में पिसते रहते है ;फ़िर क्या लोग इस चीज से संतोष कर ल;ऐ कि अब वो गरीब रेखा से ऊपर आ गए है ?जबकि अमीर उनकी आँखों के सामने और अमीर बनते जा रहे है फ़िर वो लोग ही क्यो उसी हाल में बने रहे ?

भारत के आंतरिक क्षेत्र जो विकास से दूर है तथा इलाके जो आज माओवाद से ग्रस्त है वे इसी निर्धनता से ग्रस्त है.बेरोजगारी भी अनेक समस्याओं को जन्म देती है इसके चलते विकास रूका रहता है ,निर्धनता बनी रहती है तथा लोग असंतुष्ट बने रहते है ,यह लोगों को रोजगार की तलाश में प्रवासी बना देती है ,पंजाब के खेतों में काम करते बिहारी मजदूर इसका सबसे अच्छा उदाहरण माने जा सकते है.


भूमि सुधार कानून जो 1949 - 1974 तक एक श्रृंखला के रूप में निकले थे ,विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी हुआ लेकिन आज भी देश में भूमि का न्यायपूर्ण वितरण भूमिहीनों तथा छोटे किसानों के बीच न्यायपूर्ण तरीक से नही हुआ है। पुराने जमींदारों ने कई चालों के जरिये अपनी जमीन बचा ली और वक्त के साथ साथ जमींदारों की नई नस्ल सामने आ गयी जो बेनामी जमीन रखती है और गरीब उतना ही लाचार है जितना पहले था

अनुसूचित जनजाति और जाति के लोग भारत में लंबे समय तक हाशिये पे धकेले हुए रहे हैं वैसे मानव भले ही स्वभाव से सामाजिक प्राणी रहा हो जो हिंसा नही करता लेकिन जब एक बड़े वर्ग को समाज किसी कारण से हाशिये पे धकेल देता हैं और पीढी दर पीढी उनका दमन चलता रहता हैं।

भारत में एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय की हैं लेकिन इसे मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर आज तक नही मिला हैं आज भी सबसे धनी संसाधनों वाली धरती झारखंड तथा उडीसा के जनजातीय समुदाय के लोग निर्धनता और एकाकीपन के पाश में बंधे हुए हैं।



इस मामले को समझने के लिए प्रधानमंत्री को संबोधित समाजकर्मी हिमांशु कुमार के खुले पत्र पर गौर किया जाना चाहिए। पेश है हिमांशु जी के फेसबुक वाल से वह अति महत्वपूर्ण पत्र भी।




Himanshu Kumar

Yesterday


आदरणीय मनमोहन सिंह जी के नाम खुला पत्र!कि देश के


आदिवासी इलाकों को युद्ध में झोंकने के लिए कौन जिम्मेदार


है!


आदरणीय मनमोहन सिंह जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय मनमोहन सिंह जी,


मैं आपको ये खुला पत्र इसलिए लिख रहा हूँ ताकि देश को यह पता चल जाये कि देश के आदिवासी इलाकों को युद्ध में झोंकने के लिए कौन जिम्मेदार है! और आपने इस मामले में देश के साथ क्या क्या धोखा किया है | जब जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार व नक्सलियों के बीच शांति स्थापना की कोशिश की तो हर बार किस तरह आपने उसे नष्ट किया ? आपकी सरकार के गृह मंत्री पी० चिदम्बरम जो अनेकों व्यापारिक समूहों के पक्ष में सरकार के विरुद्ध मुकदमें लड़ते रहे और वेदांता नामक बदनाम कम्पनी के बोर्ड मेम्बर थे | इन्ही पी० चिदम्बरम ने नवम्बर २००९ में तहलका नामक पत्रिका में एक इंटरव्यू में कहा था कि "हाँ अगर कोई संस्था दंतेवाडा में जन सुनवाई का आयोजन करती है तो मैं वहाँ आदिवासियों की तकलीफें सुनने के लिए दंतेवाडा जाने को तैयार हूँ |" पी चिदम्बरम की इस घोषणा के बाद मैं, श्री चिदम्बरम से नवम्बर २००९ में दिल्ली में उनके निवास पर मिला, जहां हमारी लगभग ४५ मिनट अकेले में बातचीत हुई | इस बातचीत में चिदम्बरम ने मुझसे वादा किया मैं दंतेवाडा में सात जनवरी २०१० को एक जन सुनवाई का आयोजन करूँगा, जिसमें हिंसा से पीड़ित आदिवासी आयेंगे और श्री पी चिदम्बरम उसमें शामिल होकर आदिवासियों की तकलीफें सुनेंगे | मैंने इस मुलाकात में श्री चिदम्बरम को एक सी.डी. सौंपी थी जिसमें पुलिसकर्मियों द्वारा किये गये सामूहिक बलात्कार पीड़ित लड़कियों के बयान थे तथा सी आर पी एफ द्वारा डेढ़ साल के हाथ कटे बच्चे का चित्र व उसकी दादी द्वारा दिया गया घटना का विवरण भी था |


इसके बाद मैंने चिदम्बरम से कहा कि आप अपने आने का एक पत्र हमें भेज दे ताकि आपका कार्यक्रम पक्का मान लिया जाये | श्री चिदम्बरम ने मेरे हर फोन पर मुझे आश्वस्त किया कि वो ज़रूर आयेंगे ! लेकिन उन्होंने कोई औपचारिक पत्र नहीं भेजा | इसी दौरान सरकार ने हमारे संस्था के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कोपा कुंजाम को जेल में डाल दिया, क्योंकि वे गांव-गांव जाकर इस जन सुनवाई में आने के लिए आदिवासियों को सूचित कर रहे थे | उसके बाद पुलिस ने उन बलात्कार पीड़ित लड़कियों एवं उस हाथ कटे हुए डेढ़ साल के बच्चे का भी अपहरण कर लिया, जिसका हाथ सी आर पी एफ के कोबरा बटालियन ने काट दिया था और जिनके बारे में सी.डी. मैंने चिदम्बरम को दी थी |


मैं आज तक नहीं समझ पा रहा हूँ कि पुलिस ने उन्हीं पीडितों का ही अपहरण क्यों किया जिनके बारे में सिर्फ चिदम्बरम जानते थे कि इन लोगों को जन सुनवाई में मेरे द्वारा पेश किया जाएगा | उन्हीं पीड़ितों का अपहरण किसके निर्देश पर किया गया? इन बलात्कार पीड़ित लड़कियों का मुकदमा अदालत में चल रहा था | सरकार अदालत में झूठ बोल रही थी कि ये पुलिस वाले फरार हैं | जब कि ये पुलिस वाले तब से आज तक दोरनापाल थाने में ही रह रहे हैं और सरकार इन्हें नियमित पगार देती है | इन्हीं अपराधी बलात्कारी पुलिस वालों ने ने ४०० अन्य पुलिस बल के साथ अर्थात पूरी राज्य सत्ता के सहयोग से जन सुनवाई से दो सप्ताह पहले इन लड़कियों का अपहरण कर लिया और दोरनापाल थाने में ले जाकर बलात्कार के मामले को अदालत में ले जाने और पुलिस के खिलाफ मुंह खोलने की सजा के तौर पर पांच दिन थाने में भूखा रखकर इन आदिवासी लड़कियों की पिटाई करी | मैंने इस भयानक घटना की सुचना इस देश के गृह सचिव श्री जी के पिल्लई, देश के गृह मंत्री श्री पी.चिदम्बरम, छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव पी जाय उमेन, छत्तीसगढ़ के डी जी पी श्री विश्वरंजन, दंतेवाड़ा में कलेक्टर रीना कंगाले व एस.पी. अमरेश मिश्रा सभी को दी | परन्तु किसी ने उन लड़कियों की कोई मदद नहीं की | पांच दिन थाने में पीटने के बाद इन बलात्कारी पुलिस वालों द्वारा इन चारों लड़कियों को उनके गांव में लाकर गांव के चौराहे पर फेंक दिया गया और गांव वालों को चेतावनी दी गई कि अब अगर उन्होंने दोबारा हिमाँशु से बात करने की जुर्रत भी की तो उनका गांव पूरी तरह जला दिया जाएगा |


याद रखिये इस अत्याचार के चार महीने बाद ही इसी क्षेत्र में छिहत्तर सी आर पी एफ के जवानों को मार डाला गया था | अगर आप कारण और परिणाम की व्याख्या कर सकें तो आपको शायद समझ में आ जाये कि जब हम लोगों को कमज़ोर समझ कर उनके साथ अन्याय करते हैं और उनके लिए न्याय के सारे दरवाजे बंद कर देते हैं तो उसका परिणाम कितना भयानक हो सकता है? खैर इसके बाद समाचार पत्रों में छपा कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने आपको पत्र लिखा है कि आप चिदम्बरम को हमारी जन सुनवाई के लिये दंतेवाड़ा आने से रोकें | फिर इन्डियन एक्सप्रेस में छपा कि आपने चिदम्बरम को इस जन सुनवाई में आने से मना कर दिया है | इसी बीच मैंने चिदम्बरम को फोन करके पूछा कि वे अपने आने के विषय में कोई लिखित सूचना क्यों नहीं दे रहें हैं और उन्होंने कहा कि बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में उनका आना असंभव है | इसी दौरान राज्य शासन ने हमारी संस्था के अधिकांश कार्यकर्ताओं के घर पर जाकर संस्था का काम बंद करने के लिये धमकी देनी शुरू कर दी | और उन आदिवासियों को जेल में डालना शुरू कर दिया जिनके मामले हमने कोर्ट में दायर किये हुए थे | मेरे चारों तरफ पुलिस ने घेरा डाल दिया | न मैं किसी आदिवासी से मिल सकता था, न कोई मेरे पास आ सकता था | अन्त में एक आदिवासी महिला सोडी सम्बो जिसके पैर में सी आर पी एफ के कोबरा बटालियन ने गोली मार दी थी, हम उसे २ जनवरी २०१० को जब दंतेवाडा से दिल्ली सर्वोच्च न्यायालय ला रहे थे तो रास्ते में उस महिला का अपहरण पुलिस ने कर लिया और उसके अपहरण का केस मेरे ऊपर लगा दिया | मैं समझ गया कि इन परिस्थितियों में अब मैं आदिवासियों के लिए कुछ नहीं कर पाऊंगा | और इस तरह राज्य शासन के इस दमन चक्र को उजागर करने के लिए मुझे छत्तीसगढ़ से बाहर आना पड़ा | इस तरह ये स्पष्ट है कि भारत सरकार को हमने ये मौका दिया था कि वो सरकार से नाराज और नक्सलियों के साथ चले गये आदिवासियों से बातचीत कर, उनकी तकलीफें सुनकर, उनका दिल व दिमाग जीतकर उनकी आस्था भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में पैदा करे | परन्तु आपके गृह मंत्री और आपने मिलकर वह अंतिम अवसर गंवा दिया | अब आप कितनी भी कोशिश कर ले, सरकार से नाराज आदिवासी आपके साथ कभी बात नहीं करेंगे, क्योंकि उन आदिवासियों तक पँहुचने का अंतिम पुल बस्तर में हम ही थे जिसे आपने अपने हाथों से तोड़ दिया |


नक्सलियों के पास दो तरह की रणनीति होती है | सैन्य रणनीति और शांति काल की रणनीति | उनके एक कंधे पर बंदूक होती है और दूसरे कंधे पर माओ और मार्क्स की किताबें | जब शत्रु सामने होता है तो वे बंदूक उतार लेते हैं और शत्रु का सामना करते हैं | और जब शांति होती है तो वे दूसरे कंधे से झोला उतार कर जनता को मार्क्सवाद और माओवाद की वैचारिक ट्रेनिंग देते हैं और उन्हें विचार पूर्वक अपने साथ जोड़ते हैं | मैंने चिदम्बरम से कहा था कि भारत सरकार के पास सिर्फ सैन्य रणनीति है | वैचारिक रणनीति नहीं है | आप बस गोली चलाना जानते हैं | आदिवासी का दिल जीतकर सरकार की तरफ कैसे लाया जाय, ये रणनीति आपके पास है ही नहीं | हमने प्रस्ताव दिया था कि आइये भारत शासन के लिए ये करने का अवसर हम आपको देते हैं | इन आदिवासियों की तकलीफें सुनिये, इन्हें न्याय दे दीजिये,इन्हें ये विश्वास दिला दीजिये कि भारत सरकार इन्हें न्याय दे सकती है | परन्तु अफ़सोस, आपने वो अवसर गवां दिया | आपने आदिवासियों को संदेश दिया कि भारत सरकार पीड़ित आदिवासी की तरफ नहीं है | वह बलात्कारी पुलिसवालों के साथ है | वह डेढ़ साल के बच्चे का हाथ काटने वाली सी आर पी एफ के साथ है | आदिवासी आपके दिल को और आपको ठीक से समझ गया है| लेकिन इस देश के शहरी मध्यमवर्ग को भी समझ में आ जाना चाहिए कि इस देश में अशांति के जिम्मेदार नक्सलवादी नहीं बल्कि ये सरकार है और वर्तमान में चिदम्बरम और मनमोहन सिंह हैं |


आपने सिर्फ मेरे मामले में ही धोखाघड़ी नहीं की बल्कि आपकी सरकार ने सी.पी.आई.(माओइस्ट) के प्रवक्ता आजाद को भी स्वामी अग्निवेश के माध्यम से शांतिवार्ता के लिए बुलाकर धोखाघड़ी करके उनकी हत्या की | अभी किशनजी को भी शांतिवार्ता के जाल में उलझाकर मार डाला गया | इस बात का फ़ैसला तो इतिहास करेगा कि इस संघर्ष में सही कौन था और गलत कौन | परन्तु इस देश को ये तो कम से कम जान ही लेना चाहिए कि देश को इस गृह युद्ध में धकेलने का कार्य आपने ही किया था |

देश में मेहनतकश लोग भुखमरी और बेआवाजी की हालत में हैं | पर ये आपकी चिन्ता का विषय नहीं है | आपकी चिन्ता जी.डी.पी. का आंकड़ा है | अरे जी.डी.पी. तो खनिजों को विदेशियों को बेचकर भी बढ़ाई जा सकती है, परन्तु उससे गरीब की स्थिति में कोई सुधार नहीं होता | आप इस देश को लगातार जी.डी.पी. की दर का झांसा देकर आदिवासी इलाकों में गृह युद्ध की ज्यादा से ज्यादा भड़का रहे हैं |


यह विश्वास करना कठिन है कि आपको ये नहीं मालूम है कि कैमूर क्षेत्र में पन्द्रह हजार आदिवासी और दलित महिलाओं को जेलों ठूंस दिया गया है | क्या आपको ये नहीं मालूम कि लंदन की कम्पनी वेदांता के लिए ज़मीन हथियाने के मकसद से नियमगिरी की पहाड़ी पर रहने वाले लगभग दस हजार आदिवासियों में से लगभग प्रत्येक पर पुलिस ने फर्जी केस लगा दिये गये हैं ताकि ये लोग डर कर कभी जंगल से बाहर ही न निकल पायें और जंगल में ही इलाज के बिना मर जायें | क्या आपको यह नहीं पता कि उड़ीसा में जगातिन्घपुर में दक्षिण कोरिया की कम्पनी पोस्को के लिये गांव वालों की जमीन छीनने के लिये भेजी गई पुलिस को रोकने के लिये औरतें और बच्चे गर्म रेत पर लेटे रहे और आज भी उन तीन गावों के हर स्त्री पुरुष पर पुलिस ने फर्जी केस दर्ज कर दिये गये हैं और वहाँ की महिलाएं बच्चे के प्रसव के लिये भी अस्पताल नहीं जा सकतीं | और आपको यह भी ज़रूर मालूम होगा कि सलवा जुडूम के नाम पर भारत के आदिवासियों का सबसे बड़ा नरसंहार आप ही के शासनकाल में किया गया ! क्या यही आजादी है ? क्या शहीदों नें कल्पना भी की होगी कि जिस देश को वो एक ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी से मुक्त कराने के लिये फांसी पर चढ़ रहे हैं, वह देश आजादी के ६४ साल के भीतर ही अनेकों विदेशी कम्पनियों का गुलाम हो जायेगा ? लोगों के सामने इंसाफ पाने और अपनी बात कहने के सारे रास्ते बंद हैं | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के साफ़ साफ़ मामले हैं, वो कहता है कि "कभी कभी फर्जी मुठभेड़ जरूरी है |" राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को डेढ़ साल के बच्चे का हाथ सरकारी सुरक्षा बलों द्वारा काट दिया जाना बाल अधिकारों का हनन लगता ही नहीं ! सोनी सोरी नाम की आदिवासी शिक्षिका के गुप्तांगो में एक जिले का एस पी पत्थर भर देता है लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग के कान पर जूँ भी नहीं रेंगती ?


जिस देश में करोड़ों मेहनतकश लोग भुखमरी की हालत में जी रहे हों और जहां आराम से बैठकर अमीरों का एक छोटा सा तबका बेशर्म और अश्लील अमीरी में रह रहा हो | वहीं आपने इन करोड़ों भूख से मरते मेहनतकश लोगों के लिए आवाज उठाने को अपराध घोषित कर दिया है | आज देश में तकलीफ में कौन है? मेहनत करनेवाला मजदूर, खून पसीना बहाने वाला किसान, सारा उत्पादक काम करनेवाले दलित | जंगलों में रहने वाले आदिवासी | याद रखिये ये लोग इसलिये गरीब नहीं हैं क्योंकि ये मेहनत नहीं करते बल्कि ये इसलिये गरीब हैं क्योंकि देश की राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था उन्हें गरीब रखती है | और जो लोग इस अन्यायपूर्ण और उल्टी व्यवस्था की ठीक करने और उसे सीधा करने का कार्य कर रहे हैं, वो क्रांतिकारी लोग अपराधी हैं? देश की जेलें समाज में फैले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों से भरी पड़ी हैं | ये एक भयानक दौर है | देश के करोडों कमजोर लोगों के जीवन के संसाधन छीन कर आप अंतर्राष्ट्रीय अमीरों को देने के सौदे कर रहे हैं और इस लूट का विरोध करने वाले गरीबों को बर्बर तरीकों से कुचलने के लिए देश के उन सुरक्षा बलों को लगातार गरीबों के गावों में भेजते जा रहे हैं, जिन्हें संविधान के द्वारा दरअसल इन गरीबों की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था |

यह स्तिथी लंबे समय तक नहीं चलेगी ! कुछ लोगों की अय्याशी के लिये करोड़ों लोगों को तिल तिल कर मरने के लिये मजबूर कर देने वाली इस व्यवस्था को लोग हमला कर के नष्ट कर देंगे ! और ऐसा करना उनका नैसर्गिक कर्तव्य भी है ! चाहे इसे अमीरों द्वारा बनाये गये कितने भी आभिजात्य क़ानूनों के द्वारा कितना भी बड़ा अपराध घोषित कर दिया जाए !


इसी सिलसिले में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इस दस्तावेज को भी पढ़ लिया जाना चाहिए।


भारत का मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन अतीत के सबक, वर्तमान समय की सम्भावनाएँ तथा चुनौतियाँ

August 8th, 2012 by Admin

- सुखविन्दर

पीडीएफ़ का लिंक : भारत का मजदूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आन्दोलन

"इतिहास अपने लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में मनुष्य की गतिविधि के सिवा कुछ नहीं है।"

- कार्ल मार्क्‍स, पवित्र परिवार

द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में उपस्थित साथियो,

जब मनुष्य अपने लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रयत्न करता है तो इस प्रक्रिया में अतीत के प्रयोगों की शिक्षा की रोशनी में आगे बढ़ते हुए कई भूलें करता है, कभी सफल होता है तो कभी असफल। और अपने इन प्रयासों की नकारात्मक तथा सकारात्मक शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है।

भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास लगभग नब्बे साल पुराना है। भारतीय मजदूर वर्ग इसके करीब चार दशक पहले से ही पूँजीवादी शोषण के विरुध्द संगठित संघर्षों की शुरुआत कर चुका था। मजदूर वर्ग के संघर्षों के जुझारूपन और कम्युनिस्टों की कुर्बानी, वीरता और त्याग पर शायद ही कोई सवाल उठा सकता है। लेकिन व्यापक सर्वहारा आबादी को नये सिरे से आर्थिक-राजनीतिक संघर्षों के लिए संगठित करने तथा उनके बीच मजदूर क्रान्ति के ऐतिहासिक मिशन का प्रचार करने की समस्याओं से जूझते हुए जब हम इतिहास का पुनरावलोकन करते हैं तो मजदूर आन्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टी के काम को लेकर बहुत सारे प्रश्नचिह्न उठ खड़े होते हें।

यह लेनिनवाद की बुनियादी सर्वमान्य प्रस्थापना है कि उजरती ग़ुलामी के विरुध्द स्वत: उठ खड़ा होने वाला मजदूर आन्दोलन अपने आप, अपनी स्वतन्त्र गति से, समाजवाद के लिए संघर्ष नहीं बन जाता। इस सोच को लेनिन ने अर्थवादी, स्वत:स्फूर्ततावादी और संघाधिपत्यवादी सोच बताया था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि (1) आर्थिक संघर्ष स्वयंस्फूर्त गति से राजनीतिक संघर्ष नहीं बना जाता, (2) कम्युनिस्टों को आर्थिक संघर्ष के साथ-साथ राजनीतिक माँगों के संघर्ष को आगे बढ़ाना और उन्नततर धरातल पर ले जाना होता है तथा साथ-साथ मजदूर वर्ग के बीच राजनीतिक शिक्षा एवं प्रचार की कार्रवाई चलानी होती है (यानी मजदूर आन्दोलन में वैज्ञानिक समाजवाद का विचार स्वत: नहीं पैदा हो जाता, बल्कि बाहर से डालना पड़ता है, (3) वर्ग संघर्ष की प्राथमिक पाठशाला के रूप में ट्रेड यूनियनों का महत्व अनिवार्य है, लेकिन एक राजनीतिक अखबार व अन्य माध्यमों से उन्नत चेतना वाले मजदूर तत्वों को मार्क्‍सवादी विचारधारा तक लाना और पार्टी-निर्माण को अंजाम देना सर्वहारा क्रान्ति की दिशा में आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है।

इन बुनियादी लेनिनवादी कसौटियों पर जब हम भरत के मजदूर आन्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टी के काम को देखते हैं तो 1920 से लेकर 1951 तक लगातार हमें ऐसी गम्भीर कमियाँ नजर आती हैं जिन्हें अर्थवादी ट्रेड यूनियनवादी भटकाव कहा जा सकता है। हम 1951 के बाद की कम्युनिस्ट पार्टी की यहाँ बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि तब वह पूर्णत: संशोधनवादी पार्टी बन चुकी थी। आगे इतिहास के पर्यवेक्षण के दौरान हम देखेंगे कि विचारधारात्मक दृष्टि से कमजोर और ढीले-ढाले बोल्शेविक ढाँचे वाली भारत की कम्युस्टि पार्टी ने मजदूरों का जबरदस्त समर्थन हासिल होने के बावजूद उनके बीच व्यवस्थित ढंग से राजनीतिक काम कभी नहीं किया। आश्चर्य नहीं कि ऐसे में राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथों में नहीं आ पाया और मुक्तिकामी जनसमुदाय के बीच सर्वहारा राजनीति का वर्चस्व स्थापित नहीं हो पाया। 1951 से 1967 तक संशोधनवादी भाकपा-माकपा से यह अपेक्षा की नहीं जा सकती थी। फिर नक्सलबाड़ी उभार से जो नयी लहर पैदा हुई वह "वामपन्थी" आतंकवाद के भँवर में जा फँसी। मजदूर वर्ग के बीच पार्टी कार्य व जनकार्य की समस्याओं पर सोचना उसका एजेण्डा बना ही नहीं। इसमें से जो लोग जनदिशा की बात करते हुए अलग धाराओं-उपधाराओं में संगठित हुए, वे भी जनवादी क्रान्ति की गलत समझ के साथ ज्यादातर मालिक किसानों के लागत मूल्य-लाभकारी मूल्य की लड़ाई में उलझकर रह गये और मजदूरों में कहीं कुछ काम भी किया तो वह जुझारू अर्थवाद से अधिक कुछ भी नहीं था। आज जब हम भूमण्डलीकरण की नयी परिस्थितियों में मजदूर वर्ग को नये सिरे से संगठित करने की चुनौतियों पर सोच रहे हैं तो भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन और मजदूर आन्दोलन के सम्बन्ध पर – मजदूरों के बीच आर्थिक कार्य और राजनीतिक कार्य के सम्बन्ध के व्यापक परिप्रेक्ष्य में सोचना-विचारना बेहद जरूरी है। इसी सन्दर्भ में हमने इतिहास पर एक संक्षिप्त पश्चदृष्टि डालने की और जरूरी नतीजे निकालने की एक कोशिश की है।

एक संक्षिप्त ऐतिहासिक सिंहावलोकन और कुछ जरूरी नतीजे

भारत में मजदूर आन्दोलन का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। औपनिवेशिक भारत में हुए पूँजीवादी विकास के चलते भारतीय इतिहास के रंगमंच पर दो नये वर्गों का उदय हुआ। एक ओर जहाँ औद्योगिक पूँजीपति वर्ग का जन्म हुआ वहीं दूसरी तरफ मानव इतिहास का सर्वाधिक क्रान्तिकारी वर्ग औद्योगिक मजदूर वर्ग अस्तित्व में आया। यह वर्ग अतीत के शोषित-उत्पीड़ित क्रान्तिकारी वर्गों – ग़ुलामों तथा किसानों से भिन्न है। यह वर्ग ग़ुलामों तथा किसानों की तरह हजारों साल वर्गीय शोषण-उत्पीड़न झेलने को तैयार नहीं है। यह अस्तित्व में आते ही पूँजीपति वर्ग के खिलाफ युध्द में जुट जाता है। भारत में कई उतार-चढ़ावों से गुजरते, कभी थोड़ी देर के ठहराव के बाद फिर तूफानी गति से आगे बढ़ते मजदूर आन्दोलन का एक अविराम सिलसिला जारी रहा है जो हमेशा पहले औपनिवेशिक तथा 1947 के बाद देशी हुक्मरानों की नींद हराम करता रहा है।

19वीं सदी के मध्य में भारत में आधुनिक उद्योग (नील, चाय, कॉफी आदि) स्थापित हुए। 1850 से, 55 कोयला खदानों की शुरुआत हुई। 1879 में यहाँ 56 सूती मिलें और 1882 में 20 जूट मिलें थीं। 1880 से 1895 के बीच यहाँ 144 सूती मिलें और 29 जूट मिलें और 123 कोयला खदानें थीं। 1913-14 में भारत में सूती मिलों की संख्या बढ़कर 274 तथा जूट मिलों की संख्या 64 हो गयी। कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या उस समय 1,51,273 थी। 1940 में भारत में एक हजार कारखाने थे जिनमें 17 लाख मजदूर काम करते थे। कारखाने चाहे अंग्रेजों के हों या भारतीय पूँजीपतियों के, मजदूर भयंकर गरीबी तथा शोषण-उत्पीड़न के शिकार थे। उन्हें नारकीय परिस्थितियों में काम करना पड़ता था (आज भी मजदूरों के हालात ऐसे ही हैं) और इन नारकीय परिस्थितियों के खिलाफ मजदूर जल्द ही संघर्ष के मैदान में उतर आये। जैसे-जैसे मजदूरों की ताकत बढ़ती गई, मजदूरों के संघर्ष अधिकाधिक उग्र, व्यापक, संगठित तथा योजनाबध्द भी होते गये। भले ही औपनिवेशिक भारत में औद्योगिक मजदूरों की संख्या बहुत कम थी, मगर, मुम्बई, कोलकाता, अहमदाबाद, कानपुर, शोलापुर तथा अन्य बड़े शहरों में उनके संकेद्रण ने उनकी मारक क्षमता को बढ़ाया।

औपनिवेशिक भारत का इतिहास अनेक बड़े मजदूर उभारों का साक्षी रहा है। 19वीं शताब्दी के आठवें दशक से ही स्वत:स्फूर्त मजदूर आन्दोलनों का सिलसिला जोर पकड़ने लगा था। 1882 से 1890 के बीच बाम्बे तथा मद्रास में 25 महत्वपूर्ण हड़तालें हुईं, तथा 1892-93 और 1901 के बीच बाम्बे में कई बड़ी हड़तालें हुईं। (सुमित सरकार, माडर्न इण्डिया½

1905 से 1908 के बीच स्वदेशी तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आन्दोलनों के प्रत्यक्ष प्रभाव से मजदूर आन्दोलन में एक उभार आया। 1908 में भारत के मजदूर आन्दोलन के इतिहास की एक अहम घटना घटी। 1908 में राष्ट्रवादी नेता तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में राजनीतिक हड़तालें करके बम्बई की सूती मिलों के मजदूरों ने अपनी प्रथम राजनीतिक कार्रवाई की थी और राजनीतिक चेतना एवं परिपक्वता का परिचय दिया था। जब 24 जून 1908 को बम्बई में तिलक की गिरफ्तारी हुई, तो न सिर्फ बम्बई में, बल्कि शोलापुर, नागपुर इत्यादि स्थानों पर तुरन्त विरोध का एक तूफान उमड़ पड़ा। तिलक के खिलाफ मुकदमा चलने के दौरान बम्बई के मजदूरों ने विशाल प्रदर्शन और हड़तालें कीं, जिनमें अकसर पुलिस और सेना से झड़पें हो जाती थीं। 18 जुलाई को सड़कों पर हुई एक ऐसी लड़ाई में कई हजार मजदूर घायल हुए और कई मारे गए। अगले दिन करीब 60 मिलों के 65 हजार मजदूरों ने हड़ताल कर दी। 21 जुलाई को गोदी मजदूर भी हड़ताल में शामिल हो गए। 22 जुलाई को तिलक को 6 वर्ष की बामशक्कत कैद की सजा सुनायी गयी और हड़ताली मजदूरों ने 6 दिनों तक बम्बई को युध्द क्षेत्र में बदल दिया। इस संघर्ष का हवाला देते हुए लेनिन ने 5 अगस्त 1908 को कहा था, "एक जनवादी व्यक्ति (अर्थात तिलक) के खिलाफ पूँजीपतियों के पालतू कुत्तों द्वारा की गयी इस प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के फलस्वरूप बम्बई में सड़कों पर प्रदर्शन और हड़ताल भड़क उठी है। भारत में भी सर्वहारा अब सचेत राजनीतिक जनसंघर्ष के स्तर तक विकसित हो चुका है (कलेक्टेड वर्क्‍स, खण्ड 15, पृष्ठ 184)। इसके अलावा इसी समय बंगाल, मद्रास, पंजाब आदि में मजदूरों के अनेकों छोटे-बड़े संघर्ष हुए।

इस समय तक का मजदूर आन्दोलन का इतिहास दर्शाता है कि मजदूर वर्ग ने सिर्फ अपने आर्थिक हितों के लिए ही संघर्ष नहीं लड़ा, बल्कि समग्र रूप से भारतीय जनता के सामान्य राजनीतिक हितों के लिए अधिक वीरतापूर्ण संघर्ष चलाया। मगर इस समय तक या तो मजदूर आन्दोलन स्वयं:स्फूर्त ढंग से हुए या उन पर राष्ट्रवादियों का प्रभाव रहा। मगर 1908 की गर्मियों के बाद मजदूर आन्दोलन में राष्ट्रवादियों की दिलचस्पी अचानक तथा पूरी तरह से खत्म हो गयी, जो कि दुबारा 1919-22 में ही जागृत हो पायी।

1918 में मजदूर हड़तालों की नयी लहर की शुरुआत होती है। अब होने वाली हड़तालों में मजदूरों की भागीदारी और व्यापक हुई। 1918 में भारत के मजदूर आन्दोलन के इतिहास में बम्बई में पहली आम हड़ताल हुई। इस हड़ताल में 120,000 मजदूर शामिल हुए। इस हड़ताल के समर्थन में देश के अन्य हिस्सों में भी मजदूरों ने हड़तालें कीं। इसके पहले भी फैक्ट्रियों में हड़तालें आम बात थीं, मगर ये कभी भी देशव्यापी नहीं बन पायी थीं। मजदूर हड़तालों की यह देशव्यापी लहर 1921 तक जारी रही, जिसमें बम्बई, मद्रास, असम, पंजाब आदि में सैकड़ों छोटी-बड़ी हड़तालें हुईं, जिनमें लाखों मजदूर शामिल हुए।

1918 की हड़ताल लहर से भारत का मजदूर आन्दोलन एक नये चरण में प्रवेश करता है। अब मजदूरों ने खुद को ट्रेड यूनियनों में संगठित करना शुरू कर दिया। ट्रेड यूनियनें भारत के लिए एक नयी चीज थीं। 1918 के पहले इनका अस्तित्व नहीं था, सिर्फ गोरे मजदूरों की ही चन्द यूनियनें मौजूद थीं (अबनी मुखर्जी, द कम्युनिस्ट रिव्यू, सितम्बर 1922, खण्ड 3, अंक 5)। इसी समय पहली बार बम्बई, मद्रास और कुछ अन्य नगरों में मजदूर संघों की स्थापना हुई। 1920 में मजदूर संघों की प्रतिनिधि और देशव्यापी संस्था 'आल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की स्थापना हुई, जिसका नेतृत्व उदारवादी राष्ट्रवादियों के हाथों में था।

जिस समय भारत का मजदूर आन्दोलन नये चरण में प्रवेश कर रहा था, उस समय तक आधुनिक मानव इतिहास को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली घटना घट चुकी थी। वह घटना थी 1917 में रूस में हुई महान अक्तूबर समाजवादी क्रान्ति। इस क्रान्ति ने मानव इतिहास में पहली बार शोषित-उत्पीड़ित जनों को मुक्त किया। संसार में पहला मजदूर राज्य अस्तित्व में आया। अक्तूबर क्रान्ति ने पूरे विश्व को झकझोर दिया। अक्तूबर क्रान्ति की बदौलत मजदूर क्रान्ति के विज्ञान, जो कि अब तक मुख्यत: यूरोपीय (तथा उत्तरी अमेरिकी) परिघटना ही था, का प्रकाश अब तीसरी दुनिया के औपनिवेशिक, अर्ध्दऔपनिवेशिक, तथा नव-औपनिवेशिक देशों में भी फैलने लगा। इन देशों में भी अब कम्युनिस्ट पार्टी या संगठन बनने लगे। इसी प्रक्रिया में 17 अक्तूबर 1920 को ताशकंद में एम.एन. राय के नेतृत्व में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। मगर इस पार्टी की भारत की मेहनतकश जनता के बीच कोई जड़ें न थीं। यह "प्रवासी पार्टी" पत्र व्यवहार, पत्रिकाएँ, घोषणापत्र, तथा दूत व धन भेजकर भारत में कार्यरत राष्ट्रवादियों, मजदूर, किसान नेताओं को अपने प्रभाव में लाने की कोशिश करती रही, जिसमें इसे कोई खास सफलता नहीं मिली। उधर 1921-22 के आसपास इस पार्टी से सर्वथा स्वतन्त्र रूप में भारत में पहले कम्युनिस्ट ग्रुप उभरे जिनमें एस.ए. डांगे के गिर्द बाम्बे ग्रुप, मुजफ्फर अहमद के गिर्द कलकत्ता ग्रुप, सिंगरावेलु एम. चेट्टियार के गिर्द मद्रास ग्रुप, ग़ुलाम हुसैन के गिर्द लाहौर ग्रुप और कानपुर ग्रुप आदि प्रमुख थे।

सत्यभक्त की पहल पर 25-28 दिसम्बर 1925 में कानपुर में "प्रथम कम्युनिस्ट सम्मेलन" आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग सक्रिय कम्युनिस्ट ग्रुप एक पार्टी "भारत की कम्युनिस्ट पार्टी" में एकजुट हुए।

इस सम्मेलन का सकारात्मक पहलू यह था कि इसने देश में बिखरे कम्युनिस्ट ग्रुपों को एकजुट किया। वहीं इसका नकारात्मक पहलू यह था कि यह विचारधारात्मक रूप में अत्यन्त कमजोर थी। (पार्टी की यह कमजोरी बाद के दिनों में भी बनी रही, जिसकी विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे)। "प्रथम भारतीय कम्युनिस्ट सम्मेलन" के आयोजनकर्ता सत्यभक्त कभी भी राष्ट्रवाद से मुक्त नहीं हो पाये। वे खुद को मार्क्‍सवादी नहीं बल्कि राष्ट्रवादी मानते थे। इसीलिए वह पार्टी का नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी रखना चाहते थे। मगर सम्मेलन में वह इस मुद्दे पर किसी का भी समर्थन हासिल नहीं कर सके। अपने इन विचारों के बावजूद वह केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति की सदस्य तथा कानपुर प्रोविंशियल सेंटर के सचिव चुने गये। वे अपने "राष्ट्रवादी कम्युनिज्म" पर अड़े रहे और जल्दी ही सी.पी.आई. से अलग होकर उन्होंने "राष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी" बना ली, जो कुछ ही समय बाद निष्क्रिय हो गयी। दूसरे, इस सम्मेलन ने भारतीय क्रान्ति का कोई सुस्पष्ट कार्यक्रम नहीं अपनाया। तीसरे, इस पार्टी का संगठन लेनिनवादी उसूलों पर आधारित नहीं था। इस मामले में यह पार्टी कुछ ज्यादा ही भारतीय थी। इसी के चलते पार्टी संविधान में "किसी भी सच्चे मजदूर या किसान" को पार्टी की सर्वोच्च संस्था, यानी वार्षिक सम्मेलन में प्रतिनिधि बनने योग्य ठहराया गया (धारा 6), इसमें प्रान्तीय अथवा यहाँ तक कि जिला कमेटियों को भी "सदस्यता की शर्तों को नियमबध्द करने का अधिकार दिया गया" (धारा 5 क) तथा पार्टी से सम्बध्द "मजदूर वर्ग की यूनियनों को" "सी.पी.आई. का अभिन्न अंग" माना गया (धारा 3 घ)।

औपचारिक तौर पर भले ही देश के अलग-अलग कम्युनिस्ट ग्रुप एक पार्टी में एकजुट हो गये थे, मगर इस पार्टी गठन के बाद भी इसका ढाँचा ढीला और संघात्मक बना रहा और लेनिनवादी अर्थों में इसका नेतृत्वकारी निकाय भी संगठित नहीं था। 1933 में जाकर ही पहली बार पूरी पार्टी एक केन्द्रीय कमेटी के तहत संगठित हो सकी।

बहरहाल, हम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के मजदूरों के बीच काम की तरफ लौटते हैं।

1918 से 1921 तक भारत में मजदूर आन्दोलन उफान पर था। 1922 से मजदूर आन्दोलन में उतार का दौर शुरू होता है। लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रह पायी। 1924 से ही फिर से मजदूर आन्दोलन हरकत में आना शुरू होता है। 1924 में बम्बई के टेक्सटाइल मजदूरों का आन्दोलन इसका एक अच्छा उदाहरण है जब यहाँ की 81 मिलों के 1,60,000 मजदूर हड़ताल पर चले गये। 1925 से वर्ग संघर्ष और तीव्र हो गया। मार्च 1925 में उत्तर-पश्चिम रेलवे के मजदूर हड़ताल पर चले गये। इसी वर्ष "बोनस हड़ताल" नाम से विख्यात बम्बई के टेक्सटाइल मजदूरों का ढाई महीने लम्बा आन्दोलन चला जिसमें 56 हजार मजदूर शामिल थे। 1927 से मजदूर आन्दोलन फिर से पूरे उफान पर था। इसी दौरान भारत के मजदूरों में कम्युनिस्टों का काम शुरु होता है।

"प्रवासी" सी.पी.आई. के काम के तौर-तरीकों की चर्चा हम पहले कर आये हैं। जिसमें वह नेशनल कांग्रेस के नेताओं को अथवा सीधे मजदूर व किसानों के समुदायों के पास घोषणापत्र या अपीलें भेजकर उनकी गतिविधियों को प्रभावित करने की कोशिश करती थी जिसमें उसे खास सफलता नहीं मिली।

भारत में काम कर रहे कम्युनिस्टों ने मजदूर वर्ग के आन्दोलन के विषय में अपने विचार सर्वप्रथम मार्च 1923 के 'द सोशलिस्ट' में जाहिर किये थे। "भारत में पूँजीवादी हमला" शीर्षक एक लेख में केवल सुधारवादी श्रमिक नेताओं की दार्शनिक सलाह सुनने के बदले, जिसे गाँधी के अनुयायी मजदूर मोर्चे पर "सबकी भलाई" के रूप में प्रचारित करते थे, मजदूरों से पूँजीवादी हमलों के खिलाफ वर्ग संघर्ष छेड़ने की अपील की गयी थी।

1924 में जब कम्युनिस्टों ने मजदूरों में बाकायदा काम की शुरुआत की तो मजदूरों को संगठित करने में प्रयासरत कम्युनिस्ट नेताओं पर शुरुआत में ब्रिटिश अधिकारियों ने हमला बोल दिया। एस.ए. डांगे, मुज्ज्फ्फर अहमद और शौकत उस्मानी को 1924 में ही कानपुर बोल्शेविक केस के तहत गिरफ्तार किया गया। इस घटना ने मजदूरों को संगठित करने की कम्युनिस्टों की शुरुआती पहलकदमी को बुरी तरह झकझोर दिया।

1926-27 के दौरान भारत के विभिन्न राजनीतिक केन्द्रों – जैसे, कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, और लाहौर – में मजदूर किसान पार्टियों के उदय से कम्युनिस्ट मजदूर नेताओं को मजदूरों को संगठित करने में काफी मदद मिली। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में श्रम-सम्बन्धी सवाल उठाकर कांग्रेसी राजनीति में भी हस्तक्षेप करने की कोशिश की। इसी समय में कम्युनिस्टों ने एटक में भी काम शुरू किया। 1927 में सी.पी.आई. की केन्द्रीय कार्यकारिणी की वर्धित सभा ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में "ट्रेड यूनियन कांग्रेस" पर एक प्रस्ताव स्वीकार किया जिसमें कम्युनिस्ट सदस्यों का आह्वान किया गया कि वे एटक में घुसकर इस संगठन को इसके मौजूदा बुर्जुआ नेतृत्व के हाथों से छीन लें।

जल्द ही कम्युनिस्टों ने एटक में अपना अच्छा-खासा रसूख कायम कर लिया। 26-27 नवम्बर 1927 को कानपुर में आयोजित एटक की आठवीं कांग्रेस में एक सक्रिय वामपन्थी ग्रुप की उपस्थिति विशेष तौर पर गौरतलब थी।

1928 में मजदूर आन्दोलन में एक नया उभार आया। फरवरी में जिस दिन साइमन कमीशन बम्बई पहुँचा वहाँ एक जोरदार प्रदर्शन हुआ। साइमन कमीशन का विरोध करने 20 हजार मजदूर सड़कों पर उतर आए। दूसरी घटना दिसम्बर में कलकत्ता में हुई। बंगाल की मजदूर किसान पार्टी की रहनुमाई में हजारों मजदूर नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन में घुस गए। केन्द्रीय पण्डाल पर कब्जा कर लिया और पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव स्वीकार किया। ये दो घटनाएँ भारतीय मजदूरों की बढ़ती साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी लगातार बढ़ती भागीदारी को चिह्नित करती थीं। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मजदूर आन्दोलनों का यह सिलसिला, थोड़े-थोड़े समय के ठहरावों सहित दूसरे विश्व युध्द के शुरू होने तक लगातार चलता रहा। इस अवधि में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आर्थिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर अनेक छोटे-बड़े मजदूर आन्दोलन हुए जिसमें से शोलापुर के टेक्सटाइल मजदूरों की हड़ताल का जिक़्र यहाँ जरूरी है। 7 मई 1930 को शोलापुर में टेक्सटाइल हड़ताल हुई जो "शोलापुर कम्यून" के नाम से विख्यात हुई। पूरा शोलापुर शहर 7 से 16 मई तक मजदूरों के नियन्त्रण में चला गया। शहर में मार्शल लॉ लगाने के बाद ही स्थिति "सामान्य" हो सकी।

इसी समय में एटक में पहली बार फूट (नवम्बर 1929) तथा फिर एकता (अप्रैल 1935) जैसी घटनाएँ भी हुईं।

1939 में दूसरे विश्व युध्द की शुरुआत हुई। युध्द के दौरान सी.पी.आई. ने अपने इतिहास की सर्वाधिक गम्भीर गलतियों में से एक गलती की। 1941 के उत्तरार्ध्द में रूस पर फासीवादी जर्मनी के हमले के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने फासीवाद विरोधी "जनयुध्द" को पूर्ण समर्थन देने की लाइन अख्तियार की। भले ही उसने स्वतन्त्रता और तत्काल राष्ट्रीय सरकार के गठन की माँग को भी दोहराया, लेकिन इन माँगों पर कोई देशव्यापी आन्दोलन खड़ा करना उसके एजेण्डे पर नहीं था, क्योंकि वह सोवियत संघ के साथ फासीवाद-विरोधी युध्द में खड़े ब्रिटेन के विरुध्द निर्णायक संघर्ष करके फासीवाद-विरोधी विश्वव्यापी मोर्चे को कमजोर नहीं करना चाहती थी। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने विश्वस्तर पर प्रधान अन्तरविरोध को ही राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रधान अन्तरविरोध मान लिया। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी की यह सोच गलत थी। विश्व स्तर के समीकरणों में सोवियत संघ के साथ धुरी शक्तियों के विरुध्द मोर्चा चलाना ब्रिटेन और सभी पश्चिमी साम्राज्यवादियों की मजबूरी थी। आज यह स्थापित सत्य है कि ब्रिटेन और उसके साम्राज्यवादी मित्रों की यह नीति थी कि समाजवाद के सोवियत दुर्ग को फासिज्म की ऑंधी ढहा देगी और इस प्रक्रिया में फासिस्ट ताकतें जब कमजोर पड़ जाएँगी तो उनसे निपट लेंगे। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री चर्चिल का कहना था कि अगर हिटलर जीत की तरफ बढ़ेगा तो हम सोवियत संघ का साथ देंगे और अगर सोवियत संघ जीत की तरफ बढ़ेगा तो हम हिटलर का साथ देंगे। यानी साम्राज्यवादियों की नीति इस लड़ाई में इन दोनों को इतना कमजोर करने की थी कि दोनों से आसानी से निपटा जा सके। हिटलर की 200 डिवीजनों से अकेले सोवियत संघ जूझ रहा था लेकिन बार-बार कहने के बावजूद यूरोप में मोर्चा खोलने में बहुत देर की गयी। ऐसी स्थिति में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए और संविधान सभा के लिए आश्वासन लेने और राष्ट्रीय आन्दोलन के कांग्रेसी नेतृत्व के सामने प्रभावी चुनौती प्रस्तुत करने के साथ ही ब्रिटेन पर पश्चिम में भी युध्द का मोर्चा खोलने का दबाव बना सकती थी। वैसे भी, फासीवाद-विरोधी जनयुध्द को भारतीय कम्युनिस्टों के समर्थन से सोवियत संघ को कोई वास्तविक मदद नहीं मिली। जिस समय कम्युनिस्ट पार्टी फासीवाद-विरोधी मोर्चे को "मजबूत" बनाने की अपनी अव्यावहारिक गतिविधियों में व्यस्त थी, उसी समय भारतीय बुर्जुआ वर्ग की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस के नेता युध्द में ब्रिटेन के उलझे होने का तथा इस समय कम्युनिस्टों द्वारा अंग्रेजों के समर्थन की अवस्थिति का फायदा उठाने के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोच रहे थे। 1942 के मध्य में स्तालिनग्राद में जर्मन सेना के पाँव उखड़ने लगे। 1942 की गर्मियों में भारतीय बुर्जुआ वर्ग के कुशलतम राजनीतिक प्रतिनिधि और रणनीतिकार गाँधी समझ चुके थे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर जनान्दोलन का दबाव बनाकर अधिकतम सम्भव हासिल करने का अनुकूलतम समय आ चुका है। अगस्त 1942 में बम्बई में कांग्रेस के खुले अधिवेशन में गाँधी ने "करो या मरो" और "भारत छोड़ो" का नारा देते हुए स्पष्ट कहा कि स्वाधीनता से कम उन्हें कोई भी चीज – कोई भी रियायत मंजूर नहीं है। निश्चय ही "भारत छोड़ो" आन्दोलन एक देशव्यापी जनउभार था। यह साम्राज्यवाद विरोधी जनभावना की प्रचण्डतम अभिव्यक्ति थी। चोटी के कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी जनसंघर्ष स्वत:स्फूर्त ढंग से जारी रहा और देश के कई अंचलों में महीनों तक आजाद सरकारें काम करती रहीं।

मगर कम्युनिस्ट पार्टी इस प्रचण्ड जनउभार से पूरी तरह कटी रही। मजदूर आन्दोलन के गढ़ बम्बई और कलकत्ता के मजदूर इस आन्दोलन के दौरान काफी हद तक शान्त रहे। कम्युनिस्टों द्वारा इस आन्दोलन के विरोध ने मजदूरों को इस आन्दोलन से दूर रखने में अच्छी-खासी भूमिका निभायी। मजदूर आन्दोलन के इन दो बड़े केन्द्रों में मजदूरों के बीच कम्युनिस्टों का मजबूत आधार था। जहाँ पर कम्युनिस्टों का मजदूरों में प्रभाव नहीं था या कम था, जैसे जमशेदपुर, अहमदाबाद, अहमदनगर, पूना आदि जगहों पर, वहाँ मजदूर बड़े पैमाने पर इस आन्दोलन में कूदे।

1945 के मध्य से मजदूर हड़तालों की एक नयी देशव्यापी लहर आयी। ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक होते जाना इस लहर की विशेषता थी। मजदूर हड़तालें छात्रों और अन्य मेहनतकश समुदायों के राजनीतिक संघर्ष-प्रदर्शनों के साथ जुड़ती जा रही थीं। ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) जनवरी 1945 में मद्रास में हुए 21वें अधिवेशन में ही स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी। 1945 के उत्तरार्ध्द में हड़तालें और प्रदर्शन सेना और पुलिस के साथ सशस्त्र झड़पों और टकरावों की शक्ल लेने लगे थे। 1946 का वर्ष भारत की जनता के चार शौर्यपूर्ण संघर्षों का साक्षी बना। 18 से 23 फरवरी 1946 के बीच बम्बई में नौसेना विद्रोह हुआ, जो राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के इतिहास की एक युगान्तरकारी घटना थी, जिसके वास्तविक महत्व का इतिहासकारों ने अभी तक बहुत कम आकलन किया है। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में सितम्बर 1946 में तेभागा आन्दोलन शुरू हुआ। बंगाल का तेभागा आन्दोलन असामी काश्तकारों और बटाईदारों (बरगादारों और अधियारों का आन्दोलन था।) उनकी माँग थी कि जोतदारों को दिया जाने वाला लगान उपज का एक तिहाई होना चाहिए। जंगल की आग की तरह यह आन्दोलन सितम्बर 1946 में शुरू होकर जल्दी ही बंगाल के 11 जिलों में फैल गया। इसमें भाग लेने वाले किसानों की संख्या 50 लाख तक जा पहुँची।

अक्तूबर 1946 में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में सुप्रसिध्द पुनप्रा-वायलार का किसान आन्दोलन हुआ। पुनप्रा और वायलार उत्तरी-पश्चिमी त्रावणकोर के शेरतलाई-अलेप्पी-अम्बालपुझा क्षेत्र के दो गाँव हैं, जिन्हें शौर्यपूर्ण किसान संघर्षों के दौरान हुई शहादतों ने अमर बना दिया।

जुलाई 1946 से अक्तूबर 1951 के बीच आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा किसान छापामार संघर्ष हुआ। तेलंगाना संघर्ष का फलक तेभागा और पुनप्रा-वायलार से काफी बड़ा था। अपने चरम पर इस सशस्त्र संघर्ष ने कुल 3 हजार गाँवों के 16 हजार वर्गमील क्षेत्र को मुक्त करा लिया था। यहाँ पर एक बार फिर हमें कम्युनिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक चूक देखने को मिलती है। नौसैना विद्रोह की खबर मिलते ही, पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने पहलकदमी लेकर उसे राजनीतिक नेतृत्व देने की कोशिश नहीं की, जबकि लीग और कांग्रेस द्वारा इस विद्रोह के विरोध का रुख देखते हुए हालात अनुकूल थे। इस विद्रोह के समर्थन में केवल बम्बई में हड़ताल से आगे बढ़कर कम्युनिस्ट पार्टी यदि पूरे देश में आम राजनीतिक हड़ताल का आह्नान करती तो स्थितियाँ एक आम बगावत तक जा सकती थीं। यदि यह आम बगावत सफल नहीं होती, तो पीछे हटकर ग्रामीण क्षेत्रों में जनयुध्द की नीति अपनाते हुए किसान संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए पार्टी देशव्यापी विद्रोह के अगले चक्र का इन्तजार कर सकती थी। नौसेना (और सेना-वायुसेना में भी सम्भावित) विद्रोह से उसे जनता को सशस्त्र करने के अनुकूल अवसर मिल सकते थे। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का नेतृत्व कम्युनिस्टों के हाथ में आ जाना लगभग तय था। मगर ऐसा न हो सका। इसी तरह पार्टी तेभागा, पुनप्रा-वायलार-तेलंगाना के किसान संघर्षों को भी दीर्घकालिक जनयुध्द की राह पर आगे नहीं बढ़ा पायी। 1946 से लगभग 1950 तक जारी संक्रमण काल का वह कोई लाभ नहीं उठा सकी। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी की एक के बाद एक चूकों की जड़ इस बात में थी कि यह पार्टी विचारधारात्मक रूप से अत्यन्त कमजोर थी।

यह निर्विवाद है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम में मेहनतकशों की मुख्य भूमिका रही और इन्हीं के दम पर यह लड़ाई लड़ी गयी। ब्रिटिश भारत के दो ही वर्ग ऐतिहासिक तौर पर इस लड़ाई को नेतृत्व देने के योग्य थे – भारतीय पूँजीपति वर्ग और भारतीय सर्वहारा वर्ग। भारतीय पूँजीपति वर्ग ने खुद को सबसे पहले संगठित किया, आजादी की लड़ाई में अपना नेतृत्व स्थापित किया और उसे अन्त तक बनाये रखने में सफल रहा।

ठीक इसके विपरीत सबसे क्रान्तिकारी वर्ग होते भी मजदूर वर्ग अपने को देर से संगठित कर पाया। इसकी पार्टी देर से अस्तित्व में आयी। सर्वाधिक क्रान्तिकारी वर्ग होने के कारण और शोषणविहीन वर्गविहीन समाज की स्थापना के अपने लक्ष्य के चलते इसे ज्यादा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन इसकी असफलता का मुख्य कारण इसकी आत्मगत कमजोरियाँ थीं। इसका नेतृत्व मार्क्‍सवाद को आत्मसात करने और देश की ठोस परिस्थितियों से उसे मिलाने में असफल रहा। इसकी कुछ और चर्चा हम आगे चलकर करेंगे।

बहरहाल, आइए हम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मजदूर वर्ग के बीच काम की अपनी मूल चर्चा पर लौटें। 1923 के बाद से, जब से कम्युनिस्टों ने भारत के मजदूर वर्ग में काम शुरू किया, कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आर्थिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर अनेक छोटे तथा बड़े मजदूर आन्दोलन हुए। इस पूरी अवधि (1951 तक, जब कम्युनिस्ट पार्टी तेलंगाना संघर्ष को वापस लेकर संशोधनवाद की डगर पर चल पड़ी) भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास जुझारू संघर्षों, शौर्य और पराक्रम, त्याग और कुर्बानियों का रक्तरंजित इतिहास रहा है।

वहीं इस स्थिति का दूसरा पहलू यह है कि 1951 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मजदूर वर्ग में काम अर्थवादी भटकाव का शिकार रहा। मजदूर वर्ग में आर्थिक काम और राजनीतिक काम तथा पार्टी कार्य तथा जनकार्य में तालमेल बिठाने में भी समस्याएँ रहीं। पार्टी ने मजदूर वर्ग की राजनीतिक शिक्षा पर पूरा ध्यान नहीं दिया और न ही व्यापक मजदूर आबादी में राजनीतिक-विचारधारात्मक प्रचार-प्रोपेगैंडा के कोई प्रयास किये। उक्त अवधि में पार्टी ने कई पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं जैसे कि अंग्रेजी में 'नेशनल फ्रण्ट', 'न्यू एज', बंगला में 'गणशक्ति', मलयालम में 'प्रभातम', मराठी में 'क्रान्ति', तेलुगू में 'नवशक्ति' और तमिल में 'जनशक्ति'। लेकिन पार्टी ने वर्ग-सचेत मजदूरों को सम्बोधित 'इस्क्रा' जैसा कोई मजदूर अखबार नहीं निकाला, जो मजदूर वर्ग में सीधे मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद का प्रचार करे, मजदूर वर्ग को उसके ऐतिहासिक मिशन से परिचित कराये। "जो विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के सभी रणकौशलात्मक, राजनीतिक और सैध्दान्तिक समस्याओं पर ध्यान दे" (लेनिन), जो मजदूर वर्ग के क्रान्तिकारी शिक्षक, प्रचारक, और आह्नानकर्ता के अतिरिक्त क्रान्तिकारी संगठनकर्ता और आन्दोलनकर्ता की भूमिका निभाये। न ही पार्टी के पास व्यापक मजदूर आबादी को सम्बोधित 'प्रावदा' जैसा ही कोई अखबार था। संक्षेप में कहें तो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने मजदूर वर्ग में काम करने के लिए लेनिनवादी पद्धति का अनुसरण नहीं किया। भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में 'इस्क्रा' जैसे किसी अखबार की अवधारणा तो सिरे से गैरहाजिर थी।

लेनिन कहते हैं, "सामाजिक-जनवाद (यानी कम्युनिज्म) मजदूर आन्दोलन और समाजवाद का मेल है। उसका काम मजदूर आन्दोलन की हर अलग-अलग अवस्था में निष्क्रिय रूप से उसकी सेवा करना नहीं, बल्कि पूरे आन्दोलन के हितों का प्रतिनिधित्व करना, इस आन्दोलन को उसके अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाना तथा उसके राजनीतिक और विचारधारात्मक स्वतन्त्रता की रक्षा करना है। सामाजिक जनवाद से कटकर मजदूर आन्दोलन अनिवार्य रूप में पूँजीवादी बन जाता है।… हमारा मुख्य और मूल काम मजदूर वर्ग के राजनीतिक विकास और राजनीतिक संगठन के कार्य में सहायता पहुँचाना है। इस काम को जो लोग पीछे धकेल देते हैं, जो तमाम विशेष कामों और संघर्ष के विशिष्ट तरीकों को इस मुख्य काम के अधीन बनाने से इनकार करते हैं, वे गलत रास्ते पर चल रहे हैं और आन्दोलन को भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं।" (लेनिन, सम्पूर्ण ग्रन्थावली, खण्ड 4, पृष्ठ 367-69)

मगर हमारे यहाँ पार्टी ने मजदूर आन्दोलन और समाजवाद के संयोजन के कोई प्रयास नहीं किये, मजदूर वर्ग में उसकी विचारधारा मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद का वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास नहीं किये और मजदूर वर्ग में पूँजीवादी विचारधारा के वर्चस्व का रास्ता साफ कर दिया। यही वजह थी कि जहाँ-जहाँ मजदूर वर्ग में कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत आधार था वहाँ भी शत्रु वर्ग मजदूर वर्ग में सेंध लगाने में कामयाब होते रहे और यहाँ तक कि साम्प्रदायिक शक्तियाँ तक मजदूरों को भरमाने, बहकाने, साम्प्रदायिक फसादों में झोंक देने में कामयाब होती रहीं। 1945 में मजदूर आन्दोलन में नया उभार आया और कम्युनिस्ट नेतृत्व में मजदूरों के जुझारू आन्दोलन आगे बढ़ने लगे। इस जुझारू एकता को तोड़ने के लिए साम्राज्यवादी हुक्मरानों ने साम्प्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिशें कीं। कम्युनिस्टों की अगुवाई में मजदूर आन्दोलन के सबसे मजबूत गढ़ बम्बई में वह अपनी कोशिश में कामयाब भी हुए। तेभागा किसान आन्दोलन के समर्थन में सी.पी.आई. ने 28 मार्च 1947 को आम हड़ताल की योजना बनायी थी। मगर इसी समय बंगाल में बँटवारे के लिए हिन्दू महासभा का अभियान भी जोर पकड़ रहा था, 27 मार्च से कलकत्ता में साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो गए, जिसने शहरों में तेभागा आन्दोलन के समर्थन में किसी भी तरह की कार्रवाई की तमाम सम्भावनाएँ खत्म कर दीं।

मजदूरों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी के कामों की जो कमजोरियाँ रही हैं, पार्टी की अन्य तमाम गलतियों-कमजोरियों की तरह उनका मूल कारण भी पार्टी की विचारधारात्मक कमजोरी ही रहा है। इस कमजोरी के कारण ही, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, उस दौर में भी, जबकि वह संशोधनवाद के दलदल में नहीं जा धँसी थी और बुनियादी तौर पर इसका चरित्र सर्वहारा वर्गीय था, कभी भी संगठन के बोल्शेविक उसूलों के अनुरूप इस्पाती साँचे में ढली और जनवादी केन्द्रीयता पर अमल करने वाली पार्टी के रूप में काम नहीं करती रही थी। पार्टी-गठन के बाद लम्बे समय तक इसका ढाँचा ढीला-ढाला था और लेनिनवादी तरीके से इसका नेतृत्वकारी निकाय भी संगठित नहीं था। पहली बार ब्रिटेन, जर्मनी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों के एक संयुक्त पत्र (मई, 1932), "इन्प्रेकोर" में प्रकाशित एक लेख (फरवरी-मार्च, 1933), और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक और पत्र (जुलाई, 1933) द्वारा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के ग्रुपों में बिखरे होने, गैर-बोल्शेविक ढाँचा तथा कार्यप्रणाली विषयक कार्यभारों की उपेक्षा की आलोचना करने और आवश्यक सुझाव दिये जाने के बाद दिसम्बर 1933 में सी.पी.आई. की अस्थाई कमेटी के केन्द्रक का गठन हुआ, जिसे कुछ और लोगों को सहयोजित करने के बाद केन्द्रीय कमेटी का नाम दे दिया गया। इसके बाद ढाई वर्षों तक पार्टी महासचिव का पद कामचलाऊ प्रबन्ध के तहत कोई न कोई सम्भालता रहा। अप्रैल, 1936 में पी.सी. जोशी के महासचिव चुने जाने के बाद यह स्थिति समाप्त हो सकी। लेकिन इसके बाद भी पार्टी के बोल्शेविकीकरण की प्रक्रिया को कभी भी सहज ढंग से अंजाम नहीं दिया गया। पी.सी. जोशी के नेतृत्वकाल वाले दक्षिणपन्थी भटकाव के दौर में, पार्टी सदस्यता की शर्तों, कमेटी व्यवस्था और गुप्त ढाँचे के मामले में बहुत ही अधिक ढिलाई-लापरवाही बरती जाती थी जो 1942 में पार्टी के कानूनी घोषित किये जाने पर और अधिक बढ़ गयी। उल्लेखनीय है कि पार्टी की पहली कांग्रेस भी उसके कानूनी घोषित किए जाने के बाद ही जाकर (23 मई-1 जून, 1943, बम्बई) सम्भव हो सकी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत के कम्युनिस्ट राज्यसत्ता के दमन एवं गैरकानूनी होने की स्थितियों में पार्टी के सुचारु संचालन के लिए बोल्शेविकों और अन्य दक्ष लेनिनवादी पार्टियों की तरह तैयार नहीं थे। 1936 से लेकर 1948 तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी पर इसके महासचिव पी.सी. जोशी की दक्षिणपन्थी लाइन हावी रही। 1948 में जब पी.सी. जोशी की जगह बी.टी. रणदीवे पार्टी के महासचिव बने तो पार्टी का पेण्डुलम दूसरे छोर पर जा पहुँचा और पार्टी पर बी.टी. रणदीवे की "वामपन्थी" दुस्साहसवादी लाइन हावी हो गयी। इन दोनों लाइनों ने भारत के मजदूर आन्दोलन को पर्याप्त नुकसान पहुँचाया। एक जनवादी केन्द्रीयता वाले बोल्शेविक ढाँचे के काफी हद तक अभाव के चलते, दो लाइनों के संघर्षों के सुसंगत संचालन का पार्टी में सदा अभाव रहा। "वामपन्थी" और दक्षिणपन्थी अवसरवादी प्रवृत्तियों का सहअस्तित्व पार्टी में हमेशा बना रहा। कभी एक तो कभी दूसरी लाइन पार्टी पर हावी होती रही और कभी दोनों की विचित्र खिचड़ी पकती रही। संकीर्ण गुटवाद की प्रवृति केन्द्रीय कमेटी के गठन के बाद भी, हर स्तर पर मौजूद रही। दरअसल पार्टी नेतृत्व ने पार्टी निर्माण को कभी एक महत्वपूर्ण कार्यभार माना ही नहीं। कतारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक-व्यावहारिक शिक्षा के जरिये बोल्शेविकीकरण और दोष-निवारण पर कभी जोर नहीं दिया गया।

अपने विचारधारात्मक दिवालियेपन के चलते भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने औपनिवेशिक भारत के उत्पादन-सम्बन्धों और अधिरचना के सभी पहलुओं (जिनमें जाति व्यवस्था, स्त्री प्रश्न और राष्ट्रीयताओं का प्रश्न भी आता है) का ठोस अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण की कोई स्वतन्त्र कोशिश दरअसल की ही नहीं और अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी बिरादर पार्टियों के आकलनों के हिसाब से ही हमेशा निर्णय लेता रहा। ऐसी स्थिति में संयुक्त मोर्चा, मजदूर आन्दोलन और अन्य प्रश्नों पर पार्टी बार-बार दो छोरों के भटकाव का शिकार होती रही। जाहिर है ऐसे में अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में समय-समय पर पैदा होने वाले विचलन और भारत-विषयक गलत या असन्तुलित मूल्यांकन भी भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन को प्रभावित करते रहे।

यह पार्टी की विचारधारात्मक कमजोरी और नेतृत्व की बौध्दिक अक्षमता-विपन्नता ही थी, जिसके कारण भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्‍सवाद की सार्वजनीन सच्चाइयों को भारत की ठोस परिस्थितियों में लागू करने में हमेशा ही विफल रही, बल्कि ऐसा प्रयास तक करने के बजाय हमेशा ही अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी एवं अनुभवी बिरादर पार्टियों का मुँह जोहती रही। ज्यादातर कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के प्रस्तावों-सर्कुलरों, उसके मुखपत्रों में प्रकाशित लेखों, सोवियत पार्टी के लेखों और ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के रजनीपाम दत्त जैसे लोगों के प्रभाव में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी नीतियाँ और रणनीति तय करती रही। इससे अधिक त्रासद विडम्बना भला और क्या हो सकती है कि 1951 तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के पास भारतीय क्रान्ति का कोई कार्यक्रम तक नहीं था, केवल कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल द्वारा प्रवर्तित आम दिशा और दिशा-निर्देशों के अनुरूप लिखे कुछ निबन्ध, प्रस्ताव और रणकौशल एवं नीति-विषयक दस्तावेज मात्र ही थे जो बताते थे कि भारत में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति का कार्यभार सम्पन्न करना है। मुख्यत: भूमि क्रान्ति का कार्यभार होने के बावजूद कोई भूमि कार्यक्रम तैयार करना तो दूर, भूमि-सम्बन्धों की विशिष्टताओं को जानने-समझने के लिए कभी कोई विस्तृत जाँच-पड़ताल तक नहीं की गयी थी। ऐसी स्थिति के होते हुए, यदि पार्टी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की नेतृत्वकारी शक्ति नहीं बन सकी, अनुकूल स्थितियों का लाभ उठाने से बार-बार चूकती रही और जनसंघर्षों में कम्युनिस्ट कतारों की साहसिक भागीदारी और अकूत कुर्बानियाँ व्यर्थ हो गयीं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पहली बार पार्टी नेतृत्व ने, अपने एक प्रतिनिधिमण्डल की स्तालिन और सोवियत पार्टी के अन्य नेताओं से वार्ता के बाद, 1951 में एक कार्यक्रम और नीति-विषयक वक्तव्य तैयार करके जारी किया जिसे अक्तूबर, 1951 में पार्टी के अखिल भारतीय सम्मेलन और फिर दिसम्बर, 1953 में तीसरी पार्टी कांग्रेस में पारित किया गया।

1951 में ही पार्टी संसदवाद, संशोधनवाद की राह की राही हो गयी थी और मुख्यत: और मूलत: मेंशेविक और काउत्स्कीपन्थी यूरोपीय पार्टियों के साँचे में ढल चुकी थी। 1951 से लेकर 1962-63 तक इसमें दो लाइनों का संघर्ष वस्तुत: संसदवाद-अर्थवाद की नरम धारा और रैडिकल धारा के बीच संघर्ष के रूप में मौजूद था। कतारों का बड़ा हिस्सा क्रान्तिकारी आकांक्षाओं और चरित्र वाला था, लेकिन अपनी विचारधारात्मक कमजोरी के कारण रैडिकल संशोधनवादी धड़े को क्रान्तिकारी मानता था। पार्टी में उक्त दो लाइनों के संघर्ष का परिणाम था 1964 की फूट और नयी पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) का गठन। इस फूट का मुख्य मुद्दा विचारधारात्मक-राजनीतिक नहीं था, बल्कि संसदीय राजनीति में अधिक नरम या अधिक गरम नीतियों-रणनीतियों को लेकर था। नवगठित पार्टी सी.पी.आई. (एम) अपने जन्म से ही एक संशोधनवादी पार्टी थी। इस पर और अधिक चर्चा करना वक्त की बर्बादी होगी।

नक्सलबाड़ी का किसान विद्रोह -

भारत में एक नयी कम्युनिस्ट धारा का उदय और बिखराव

मई 1967 में पश्चिम बंगाल के तराई अंचल नक्सलबाड़ी में एक ऐतिहासिक किसान विद्रोह की शुरुआत हुई, जिसने आजाद भारत के नये हुक्मरानों को कँपकँपा दिया। नक्सलबाड़ी से भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन ने एक नये दौर में प्रवेश किया। देश के कोने-कोने में नक्सलबाड़ी का झण्डा बुलन्द करने वाले हजारों कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने खुद को सी.पी.आई. (एम) से अलग कर लिया। इस तरह उन्होंने सी.पी.आई. तथा सी.पी.आई. (एम) के संशोधनवाद तथा नवसंशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद किया। नक्सलबाड़ी ने भारत की शोषित-उत्पीड़ित मेहनतकश जनता के अन्दर मुक्ति की एक नयी आशा का संचार किया।

लेकिन भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन के जन्म से ही जो विचारधारात्मक कमजोरी इसका पीछा करती रही है, नक्सलबाड़ी से पैदा हुई कम्युनिस्टों की नयी धारा भी इस कमजोरी से मुक्त नहीं थी। नक्सलबाड़ी के क्रान्तिकारी भी विचारधारात्मक दिवालियेपन तथा बौध्दिक विपन्नता की परम्परा के बोझ तले दबे हुए थे। भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन की शुरुआत से ही अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर जो निर्भरता बनी रही थी, वह अब भी जारी थी। पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अपने हर छोटे-बड़े फैसले के लिए सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य बड़ी बिरादर पार्टियों का मुँह जोहती थी, अब नक्सलबाड़ी से जो नयी कम्युनिस्ट धारा पैदा हुई वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का मुँह जोहने लगी। नक्सलबाड़ी के क्रान्तिकारियों में चीनी क्रान्ति की हूबहू नकल करने की प्रवृति हावी थी। उन्होंने भारत की ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण किए बिना भारतीय समाज को अर्ध्द-सामन्ती, अर्ध्द-औपनिवेशिक घोषित कर दिया और कहा कि भारतीय क्रान्ति का मार्ग दीर्घकालिक जनयुध्द का मार्ग होगा।

भारतीय समाज का यह "विश्लेषण" उस समय के भारत की जमीनी सच्चाइयों से कोसों दूर था। 1967 तक आते-आते भारतीय समाज पूँजीवादी विकास का दूसरा चरण पूरा कर चुका था (अगर औपनिवेशिक भारत में जो पूँजीवादी विकास हुआ था उसको भारत में पूँजीवादी विकास का पहला चरण मानें तो)। 1947 में सत्ता हस्तान्तरण के बाद भारत की राजनीतिक सत्ता पर यहाँ का बुर्जुआ वर्ग काबिज हुआ। उसने ऊपर से धीमे आर्थिक सुधारों के जरिये भारत में पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। 1967 तक आते-आते भारत के सामाजिक-आर्थिक हालात बहुत ही विविधतापूर्ण थे। कुछ इलाकों में पूँजीवादी विकास काफी आगे बढ़ गया था, कहीं सामन्ती उत्पादन सम्बन्धों की जकड़ बहुत मजबूत थी, कहीं पर सामन्ती अवशेष काफी प्रबल थे। इस विविधतापूर्ण तथा संक्रमणशील सामाजिक यथार्थ को समझना नेतृत्व से बहुत परिपक्वता तथा गहरी विचारधारात्मक समझ की अपेक्षा करता था। लेकिन नक्सलबाड़ी से जो नया कम्युनिस्ट नेतृत्व पैदा हुआ वह ऐसा नहीं था। उसमें परिपक्वता तथा विचारधारात्मक समझदारी का नितान्त अभाव था।

नक्सलबाड़ी का किसान विद्रोह एक जनान्दोलन था जिसके नेता कानू सान्याल, खोकन मजुमदार, कदम मलिक तथा जंगल संथाल आदि थे जिन्होंने जनदिशा पर अमल करते हुए इस आन्दोलन को निर्मित किया था। राजनीतिक तथा विचारधारात्मक मार्गदर्शन के रूप में चारु के आठ दस्तावेजों की भी इस आन्दोलन के निर्माण में एक हद तक की भूमिका रही थी। चारु मजुमदार अपने आठ दस्तावेजों के लेखन के समय से ही एक सुसंगत "वाम" आतंकवादी लाइन के पक्षधर तथा प्रस्तोता थे। जिस समय नक्सलबाड़ी में जनान्दोलन तूफानी गति से आगे बढ रहा था उसी समय चारु की "वाम" आतंकवादी लाइन नक्सलबाड़ी के पास ही के इलाके इसलामपुर-चतरहाट में बुरी तरह पिट चुकी थी। नक्सलबाड़ी का जनान्दोलन जब एक जगह जाकर ठहराव का शिकार हो गया तो इसके नेतृत्व ने अपनी विचारधारात्मक कमजोरियों के चलते चारु की आतंकवादी लाइन के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ ही समय में चारु की आतंकवादी लाइन ने नक्सलबाड़ी के महान जनान्दोलन को तबाह कर दिया। बाद में भी चारु की आतंकवादी लाइन ने कई जनान्दोलनों को तबाह किया जिसमें श्रीकाकुलम के गिरिजनों का आन्दोलन, पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के देबरा और गोपीवल्लभपुर का किसान आन्दोलन, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी अंचल के किसानों का आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले के तराई अंचल के किसानों का आन्दोलन आदि प्रमुख हैं।

नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह के बाद सी.पी.आई. (एम) से बाहर आये कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने खुद को भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी में संगठित किया। इस कमेटी ने अपने आगे अन्य कई कार्यभारों के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण कार्यभार यह रखा कि कमेटी माओ त्से-तुङ विचारधारा की रोशनी में भारतीय परिस्थिति के सुनिश्चित विश्लेषण के आधार पर क्रान्तिकारी कार्यक्रम और रणकौशल तैयार करेगी। मगर तालमेल कमेटी पर चारु की लाइन के हावी होने के कारण भारतीय परिस्थिति के विश्लेषण का काम कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के एजेण्डे पर न आ सका। बाद में चारु मजुमदार ने बेहद नौकरशाहाना तरीके से तालमेल कमेटी से "आन्ध्र प्रदेश कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी" को बाहर निकाल दिया तथा 22 अप्रैल 1969 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) के गठन की घोषणा कर दी।

"वामपन्थी" आतंकवादी लाइन के प्रस्तोता चारु मजुमदार ने कई नायाब सिध्दान्त प्रतिपादित किये। उन्होंने जनता के हर तरह के जनसंगठनों तथा आर्थिक संघर्षों को अर्थवाद, सुधारवाद कहकर क्रान्ति के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि वर्ग-शत्रु का सफाया वर्ग संघर्ष का सर्वोच्च रूप है। चारु की यह "वाम" आतंकवादी लाइन एक के बाद एक जगह बार-बार पिटती रही। लेकिन एक नये प्रयोग के लिए इसे कोई दूसरी जगह मिल जाती थी।

औद्योगिक मजदूरों से इस आतंकवादी लाइन का कुछ लेना-देना नहीं था क्योंकि शहरों तथा अन्य औद्योगिक केन्द्रों पर यह लाइन नहीं चल सकती थी। औद्योगिक मजदूरों के लिए भी इस लाइन पर करने के लिए कुछ खास नहीं था। यह लाइन अपने व्यवहार के लिए सुदूर, दुर्गम पिछड़े इलाकों की तलाश में रहती थी। उस समय भारत में ऐसे कई अंचल मिल जाते थे और भारत के पूँजीवादी विकास के पिछड़ेपन के चलते आज भी ऐसे बेहद पिछड़े कई इलाके मौजूद हैं। आज ऐसी जगहों पर थोड़े फेरबदल के साथ चारु की आतंकवादी लाइन को भाकपा (माओवादी) लागू कर रही है। शहरों में तो पहले से ही इस आतंकवादी लाइन के लागू होने की जमीन नहीं थी, मगर अब पिछले छह दशकों के पूँजीवादी विकास ने ग्रामीण मैदानी इलाकों से भी इस लाइन के व्यवहार की जमीन खत्म कर दी है। इसीलिए आज भाकपा (माओवादी) बेहद पिछड़े जंगली इलाके में सिमटी हुई है जहाँ बेहद पिछड़ी चेतना वाली आदिवासी आबादी में इसका जनाधार बना है, क्योंकि वहीं पर ही ऐसा सम्भव है। यह पार्टी इस जंगली इलाके में मुक्त क्षेत्र बनाने का सपना देख रही है। यह पार्टी सपना देख रही है कि एक दिन इसकी लाल सेना इन जंगलों से बाहर निकलेगी, पहले ग्रामीण मैदानी इलाकों, फिर कस्बों तथा अन्त में बड़े शहरों पर कब्जा करते हुए एक दिन पूरे देश पर कब्जा कर लेगी और क्रान्ति हो जायेगी। आज के भारत में इस सपने के सच हो सकने की सम्भावना पर कोई अहमक ही विश्वास कर सकता है। मगर हमारे देश की मिट्टी को कुछ अजब वरदान है कि ऐसे सपनों में विश्वास रखने वालों की भी यहाँ कमी नहीं है।

जिन कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी ग्रुपों ने चारु की आतंकवादी लाइन का विरोध किया था तथा जनदिशा की वकालत की थी, वे ग्रुप भी लगातार टूट-बिखराव का शिकार रहे हैं। इसमें से कई तो विसर्जित हो चुके हैं। कुछ इसी नियति की ओर अग्रसर हैं। बाकी जो बचे हैं वे पिछले चार दशकों से ग्रामीण मजदूरों तथा किसानों में काम करते आ रहे हैं। ग्रामीण मजदूरों में ये अर्थवादी तरीके से मजदूरों के आर्थिक संघर्ष लड़ने के साथ-साथ, उनमें सम्पत्ति (जमीन) की भूख जगाने के प्रतिक्रियावादी क्रियाकलापों में लिप्त रहते हैं। किसानों में ये फसलों के लाभकारी मूल्य तथा लागत मूल्य में कमी के संघर्ष लड़ते हुए धनी किसानों का मुनाफा बढ़वाने में व्यस्त रहते हैं।

इन ग्रुपों ने नयी जनवादी क्रान्ति को भी कुछ अजीबोगरीब ढंग से समझा है। जब चारु ने यह नारा दिया था कि "चीन का रास्ता हमारा रास्ता" तो वह भूल गये थे कि चीन की क्रान्ति वाम और दक्षिण भटकावों से सतत लड़ते हुए, जनदिशा पर अमल करते हुए कामयाब हुई थी। नक्सलबाड़ी के समय कहा गया था कि कम्युनिस्ट पार्टी ग्राम आधारित पार्टी होगी। नयी जनवादी क्रान्ति को किसानों में काम करने तक घटा दिया गया। जबकि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जिसने अक्तूबर 1949 में अपने देश में सफल नयी जनवादी क्रान्ति की थी, शुरू से ही औद्योगिक मजदूरों में काम करती रही थी तथा बाद के दौरों (1949) तक उसका औद्योगिक मजदूरों में मजबूत आधार बना रहा था।

नयी जनवादी क्रान्ति की इस विकृत समझ के चलते हमारे देश के माले ग्रुपों ने या तो औद्योगिक मजदूरों में काम किया ही नहीं, और अगर कहीं किया भी तो सी.पी.आई., सी.पी.आई. (एम) के अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद के बरक्स उन्होंने जुझारू अर्थवाद तथा जुझारू ट्रेड यूनियनवाद का मॉडल ही प्रस्तुत किया। उन्होंने कहीं भी मजदूरों में लेनिनवादी शैली में काम नहीं किया।

इन ग्रुपों ने दूसरे विश्वयुध्द के बाद देश तथा दुनिया में हुए परिवर्तनों से पूरी तरह ऑंखें मूँद रखी हैं। इनके लिए आज भी दुनिया वहीं खड़ी है जहाँ दूसरे विश्वयुध्द के समय थी। इनके लिए दुनिया 1945 में ही ठहर गयी है। मगर यह तो एक भ्रम है। दरअसल दुनिया आगे बढ़ गई, ये ग्रुप 1945 में ठहर गये हैं।

पिछले छह दशकों में भारत में हुआ पूँजीवादी विकास अब सुस्पष्ट रूपरेखा अख्तियार कर चुका है। मगर इन ग्रुपों के लिए तो भारत अब भी अर्ध्द-सामन्ती, अर्ध्द-औपनिवेशिक है। लेकिन ऐसा भारत केवल इनकी कल्पनाओं में ही बसता है, हकीकत में नहीं। मगर कल्पनाओं का भी तो कोई भौतिक आधार होता है। ये ग्रुप बिना किसी भौतिक आधार के किस तरह कल्पना कर लेते हैं, यह एक गहरा रहस्य है जिसका उद्धाटन सिर्फ ये ग्रुप ही कर सकते हैं।

इन ग्रुपों की नयी जनवादी क्रान्ति की गाँठ कुछ इस कदर उलझ गयी है कि खुल नहीं पा रही है। क्योंकि यह खुल नहीं रही है इसलिए ज्यादातर ग्रुपों ने इसे खोलने की कोशिश ही छोड़ दी है।

भारत में नयी जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम को मानने वाले ग्रुपों में से सबसे बड़ा ग्रुप भाकपा (माओवादी) सुदूर जंगलों में आतंकवादी लाइन लागू कर रहा है। बाकी ग्रुप एकदम खुले ढाँचे वाले संगठन चलाए हुए हैं। जनान्दोलनों के नाम पर कुछ न कुछ अर्थवादी कवायद करते रहते हैं। कुछ ग्रुपों के सांगठनिक ढाँचे तो सी.पी.आई. (एम) के संशोधनवादियों से भी गए-गुजरे हैं।

दूसरे विश्वयुध्द के बाद साम्राज्यवाद की कार्यप्रणाली तथा पूँजीवाद की आन्तरिक सरंचना में बहुत बड़े परिवर्तन आये हैं। आज परिस्थितियाँ बेहद जटिल हो गयी हैं जिन्हें समझकर अब कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को नयी राह खोजनी है। मगर हमारे यहाँ के माले ग्रुप तो बनी-बनायी राह को भी ठीक से नहीं समझ पाये। इनकी तो नयी जनवादी क्रान्ति की भी ठीक समझदारी नहीं बन पायी। आज की जटिल परिस्थितियों को समझने तथा इसमें नयी राह खोजने की तो इनसे उम्मीद ही क्या की जा सकती है। जिनको आज भी भारत में सामन्तवाद नजर आता है, उनसे और कुछ भी देख सकने की उम्मीद नहीं की जा सकती। मगर हमारे ये क्रान्तिकारी बिरादर हैं बहुत जिद्दी। इनकी जिद है कि बदली हुई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की ऐसी की तैसी, हम तो नयी जनवादी क्रान्ति ही करेंगे। इनकी इस जिद को "सलाम" करते हुए इनकी चर्चा यहीं पर छोड़कर आगे बढ़ते हैं।

आज का मजदूर आन्दोलन : नयी चुनौतियाँ, नयी सम्भावनाएँ

विश्व स्तर पर देखें तो पिछली सदी में मजदूर क्रान्तियों को जो पराजय झेलनी पड़ी, उस पछाड़ (सेटबैक) से मजदूर आन्दोलन अभी भी उभर नहीं पाया है। आज भी पूरी दुनिया में क्रान्ति पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है। दूसरे, विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद की कार्यप्रणाली तथा पूँजीवाद की आन्तरिक संरचना में कई बदलाव आए हैं। बीसवीं सदी में मजदूर क्रान्तियों की पराजय के बुनियादी कारणों तथा आज की दुनिया में आए परिवर्तनों को समझे बगैर मजदूर आन्दोलन का अग्रवर्ती विकास नामुमकिन है। आज विश्व सर्वहारा के पास न तो कोई समाजवादी देश ही बचा है न ही कोई अनुभवी, परिपक्व नेतृत्व ही है जिसके चलते मजदूर वर्ग के लिए परिस्थितियाँ अधिक कठिन तथा चुनौतीपूर्ण हो गयी हैं। मगर इस परिस्थिति का दूसरा पहलू यह है कि कम्युनिस्ट सफल क्रान्तियों की नकल करने तथा अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व का मुँह जोहने की प्रवृति से मुक्त हो सकते हैं क्योंकि आज ऐसा नेतृत्व है ही नहीं। इसीलिए अब तो अपनी राह खुद ही बनानी होगी।

मजदूर वर्ग में आज ठेकाकरण, अनौपचारिकीकरण, परिधिकरण (पैरीफेरलाइजेशन) तथा नारीकरण (फेमीनाइजेशन) आदि से मजदूरों को संगठित करने की नयी चुनौतियाँ कम्युनिस्टों के सामने हैं। अब लकीर की फकीरी तथा घिसे-पिटे तौर-तरीकों से काम नहीं चलेगा। अब कम्युनिस्टों को मजदूर वर्ग को संगठित करने के नये तौर-तरीके तथा नये सृजनात्मक रूप ईजाद करने होंगे।

मजदूर आन्दोलन में इन चुनौतियों के साथ-साथ नयी सम्भावनाएँ भी पैदा हुई हैं। 1848 में जब "कम्युनिस्ट घोषणापत्र" में "दुनिया के मजदूरों एक हो" का नारा दिया गया था, तब वस्तुत: पूरी दुनिया में मजदूर थे ही नहीं, क्योंकि दुनिया के बड़े भाग में पूँजीवादी विकास शुरू न होने के चलते अभी मजदूर वर्ग का जन्म ही नहीं हुआ था। मगर अब पूँजीवाद ने दुनिया के हर मुल्क को अपनी लपेट में ले लिया है। आज पूरी दुनिया में मजदूर हैं। आज 'ग्लोबल असेम्बली लाइन' पर दुनिया के मजदूरों का हर हिस्सा भौतिक रूप में भी जुड़ चुका है। दूसरे, संचार तथा आवाजाही के साधनों में अभूतपूर्व तरक्की के कारण, दुनिया भर के मजदूरों के आपसी मेलजोल तथा उन्हें विश्वस्तर पर संगठित करने की भी सम्भावनाएँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ी हैं।

अपने देश के हालात पर नजर दौड़ाएँ तो आज हमारे देश की आधे से अधिक आबादी शहरी तथा ग्रामीण सर्वहारा, अर्ध्द-सर्वहाराओं की है। करोड़ों की आबादी वाले महानगर अस्तित्व में आ चुके हैं, जहाँ कि गन्दी बस्तियों में करोड़ों-करोड़ उजरती सर्वहारा भरे पड़े हैं। और गौरतलब बात यह है कि आज हमारे देश के औद्योगिक मजदूरों में भारी बहुसंख्या युवा मजदूरों की है। यह युवा मजदूर पुरानी पीढ़ी के मजदूरों से भिन्न है। यह गाँवों से पुरानी पीढ़ी के मजदूरों जितना नहीं जुड़ा है। इस युवा मजदूर का सपना गाँव नहीं है। शहरों में भले लाख मुसीबतें हों लेकिन यह युवा मजदूर गाँव के नीरस, ठहरे, कूपमण्डूकी वातावरण में वापिस नहीं जाना चाहता। दूसरी बात यह है कि यह युवा मजदूर पढ़ा-लिखा है। यह पढ़ा-लिखा युवा मजदूर राजनीतिक रूप से आसानी से शिक्षित हो सकता है और सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा आसानी से आत्मसात कर सकता है। यानी भारतीय सर्वहारा वर्ग (ग्राम्शियन शब्दावली में) अपना 'ऑर्गेनिक इण्टेलेक्चुअल' पैदा कर सके, इसके लिए परिस्थितियाँ आज अधिक अनुकूल हैं। यह नया मजदूर भारत के नए मजदूर आन्दोलन का वाहक बनेगा। उम्मीद के उत्स यहीं पर हैं। आज देखा जाए तो मजदूर आन्दोलन के हर पहलू पर निरन्तरता पर परिवर्तन का पहलू हावी है। आज का समय कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए भीषण चुनौतियों तथा बड़ी सम्भावनाओं से भरपूर है। यह समय कम्युनिस्टों से सच्चे वैज्ञानिकों जैसे साहस तथा विवेक की माँग करता है। जरूरत आज इस बात की है कि एक सच्चे वैज्ञानिक के समान आज की देश-दुनिया की बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार किया जाये, उनका अध्ययन-विश्लेषण किया जाये, उन्हें समझा जाये तथा उन्हें बदलने के नये तौर-तरीकों तथा रूपों के बारे में सोचा जाये। और हाँ सिर्फ सोचा ही न जाए, इस सोच-विचार से जो नतीजे निकलें, उन्हें मजदूर आन्दोलन संगठित करने की व्यावहारिक कार्रवाइयों में लागू किया जाये।

- सुखविन्दर

सम्पादक, 'प्रतिबद्ध'

लुधियाना

Tags: Sukhvinder

This entry was posted on Wednesday, August 8th, 2012 at 7:39 pm and is filed underगतिविधियां, मज़दूर आन्‍दोलन. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

http://arvindtrust.org/?p=377


कृपया इस पर भी गौर करें!


माओवादी 'विलय' की आठवीं वर्षगांठ के अवसर पर

Thursday, October 11, 2012,


बीते दिनों के इतिहास पर नज़र डालने से ऐसा प्रतीत होता है कि माओवादियों ने कुछ अधिक ही जल्दबाजी में एकीकृत पार्टी बना ली। इस जल्दबाजी के नतीजे अब सामने आ रहे हैं। माओवादी कार्यकत्र्ता दबी जुबान से यह कहते सुनाई देते हैं कि "विलय" हड़बड़ी में कर लिया गया तथा सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं को खास तरजीह नहीं दी गई। ये लोग आम कार्यकत्र्ता हैं और इन लोगों की, संगठन में खास चलती-बनती नहीं है। लेकिन, कभी-कभी इनके मुंह से भी गम्भीर आशंकाएं उच्चारित होती हैं, जिन पर बाद में सच्चाई भी मुहर लगा देती है।

दो दलों के विलय से आज से आठ वर्षों पूर्व भा.क.पा. (माओवादी) बनी थी, जिनमें एक पीपुल्स वार ग्रूप था और दूसरा एम.सी.सी। इस "विलय" के पहले दो दलों के बीच खूनी संघर्ष का एक लम्बा दौर चला और गोस्वामी तुलसीदास का "बिन भय होंइहें न प्रीत" वाला कथन इस विलय पर बिल्कुल "फिट" बैठता है। अवश्य ही यह एक शोध का विषय है कि कौन किससे भयभीत था। पी.डब्ल्लु.जी., एम.सी.सी से या एम.सी.सी, पी.डब्लु.जी. से या फिर दोनों, लगातार कठोर होती जा रही राजसत्ता से ? तीनों सम्भावनाओं में जान है। सच्चाई के खातिर, इस तथ्य को भी नहीं नकारना चाहिए कि विलय के पहले मोलतोल का एक लम्बा दौर चला, जिसे "सैद्धांतिक विमर्श" का जामा पहनाया गया। ऐसी समझ की गुंजाइश बनती है, चूंकि दोनों संगठन इलाकेवार रकम उगाही पर आश्रित थे, और "विलय" के पहले इन मामलों से निपटना आवश्यक था।

पीपुल्स वार ग्रूप, सी.पी.आई (एम.एल.) (चारु मजूमदार) का अनुसारी और एम.सी.सी, चारु मजूमदार की कार्यशैली का घोर विरोधी। कन्हाई चटर्जी (एम.सी.सी) को चारुबाबू शुरू से ही सैन्यवादी मानते रहे और कन्हाई चटर्जी के अनुसार चारुबाबू गंभीर भटकावों के शिकार थे। यही वजह थी कि चारुबाबू ने जब सी.पी.आई (माक्र्सवादी लेनिनवादी) बनाने की घोषणा की, तब एम.सी.सी ने खुद को उसमें विलीन करना उचित नहीं समझा।

अब इस मतभेद की पृष्ठभूमि में सन् 2004 के 21 सितम्बर को जो विलय हुआ, उसे देखें। इस विलय में प्रसंग में अरिंदम सेन ने अपने आलेख (माओवादी प्रवृत्ति, भारत में उदय और उसकी भूमिका-"समकालीन जनमत" नवम्बर 2009) में जो मन्तव्य दिया है, वह बिल्कुल उचित जान पड़ता है। अरिंदम सेन ने लिखा: "ये दोनों नेता (चारु मजुमदार और कन्हाई चटर्जी) जिन्होंने अपने जीवनकाल में सचेत रूप से और मजबूती के साथ एक ही पार्टी में एकताबद्ध होने से परहेज किया, मरणोपरान्त अपने-अपने अनुयायियों द्वारा ऐसा करने को बाध्य किए गए।" सवाल यह उठता है कि क्या उनके अनुयायियों को ऐसा करने का अधिकार बनता था ?

इस तथाकथित "विलय" के मौके पर इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया गया, जिसके एक हिस्से का शीर्षक है: "दोनों संगठनों के बीच का आपसी संबंध।" इसमें एकीकृत होनेवाली दोनों पार्टियां अपनी आत्म-आलोचना प्रस्तुत की। इन आत्म-आलोचनाओं को पढ़ने से ही एक अजीब यांत्रिकता और गैर-इमानदारी का बोध होता है। नीचे इन आत्म-आलोचनाओं को उद्दृत की जा रही हैः-

एम.सी.सी आई की ओर से प्रस्तुत आत्म-आलोचना:-

1.    आपसी झड़प के दौर में हमने पहले पी.यू और बाद में पी.डब्लु. को भले ही क्रांतिकारी कहते रहे पर व्यवहार में उसे संशोधनवादी एवं प्रतिक्रियावादी ही मानते रहे।

2.    पी.यू, पी.डब्लु को प्रतिपक्ष मानकर हम उनका मुकाबला करने पर बल देते रहे।

3.    विभिन्न प्रकार के कुतर्कों के जरिए हम पी.यू, पी.डब्लु को एक अंतहीन और नतीजे पर न पहुंचनेवाली बहसों के जाल में फंसा देने का प्रयत्न करते रहे।

4.    हमने पी.डब्लु के क्रांतिकारी चरित्र एवं मार्यादा पर ठेस पहुंचाने की भावना से कई कारवाईयाँ की।

5.    हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने से भी कतराते रहे क्योंकि हम समझते थे कि इससे हम छोटे हो जाएंगे।

सी.पी.आई (एम.एल)(पी.डब्लु) की ओर से प्रस्तुत आत्म-आलोचना:-

1.    काले अध्याय के दौर में हमने अपने वर्ग-भाइयों के खिलाफ भातृघाती हमले किए।

2.    90 के दशक की शुरूआत में हमारी ओर से कामरेड सत्यनारायण सिंह की हत्या हमारी राजनीतिक कमजोरियों का परिणाम थी।

3.    "एम.सी.सी को उखाड़ फेंके" का नारा देना हमारी एक गंभीर व घातक गलती थी।

4.    हमारी प्रचार सामग्री की अन्तर्वस्तु एवं लेखन शैली गलत थी। इसका कारण था एम.सी.सी.आई के चरित्र के बारे में हमारा गलत मूल्यांकन।

5.    हम मूल रूप से एम.सी.सी.आई को दोषी ठहराते रहे।

6.    हमने जनता के बीच के अन्तर्विरोध को हल करने के मामले में गैर सर्वहारा दृष्टिकोण अख्तियार किया।

7.    हम कतारों द्वारा पेश किए गए तर्कों के पिछलग्गू बने रहे तथा प्रतिरोधात्मक तौर-तरीकों को प्राथमिकता देते रहे।

एकीकृत होने जा रही दो पार्टियों की आत्म-आलोचनाओं से होकर गुजरने के बाद क्या यह लगता है कि इनमें दिल से उठनेवाली उद्गारों को लिपिबद्ध किए गए हैं ? या फिर यह लगता है कि पहले ही तय कर लिया गया था कि विलय होना है और इस लक्ष्य को सामने रखते हुए आत्म-आलोचनाए गढ़ी गईं। अगर ऐसा नहीं था तब दो पार्टियों के बीच के झड़पों में जो असंख्य लोग मारे गए, उनकी याद में एक शब्द भी क्यों नहीं खर्च किया गया ? इस दस्तावेज को पलटने पर हम पाते हैं कि सिर्फ सरकारी बल द्वारा मार गिराए गए लोगों को ही "शहीद" का दर्जा मिला। पर जो उनकी गलत नीति के चलते काल के गाल में समा गए, उनकी बात कौन करेगा ?


अगर ऐसे लोगों को भी वे शहीद का दर्जा देते, तब हम यह महसूस करते कि इन आत्म-आलोचनाओं में कहीं-न-कहीं, थोड़ी मात्रा में ही सही, मानवीय तत्व मौजूद हैं। सी.पी.आई (एम.एल)(पी.डब्लु) ने खानापूर्ति वाले अंदाज में सत्यनारायण सिंह का नाम लिया और फिर आगे बढ़ते गए। और भी तो लोग आपसी झड़प में मारे गए, जो गरीब के बाल-बच्चे थे और जिन्हें क्रांति का सब्जबाग दिखाकर पार्टी सदस्य बनाया गया और फिर आपसी झड़प की आग में झोंक दिया गया। उनलोगों के लिए, उन लोगों के आश्रितों के लिए दो आंसू बहाना क्या इन "क्रांतिकारियों" का फर्ज नहीं बनता था ?


इस विलय के एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष की ओर अरिंदम सेन ने उसी आलेख में हमारा ध्यान आकर्षित किया है। सन् 2000 में ही माओ-त्से-तुंग विचारधारा की वजह "माओवाद" शब्द को पी.डब्लु.जी ने अपना लिया था। 2003 में पार्टी महाधिवेशन में उसपर स्वीकृति की मुहर भी लग गई। उसके पहले यह शब्द प्रचलन में नहीं था, चूंकि "माओवाद" दरअसल कुछ होता ही नहीं है। माओ-विचारधारा को लोग माक्र्सवाद लेनिनवाद के ही विस्तार के रूप में देखते रहे। लेकिन जन आन्दोलनों से पी.डब्लु.जी की बढ़ती दूरी और फौजी कारवाईयों पर उनका अधिक से अधिक भरोसा इस बदलाव के पीछे की वजहें थीं। एक तरह से देखें तो सैन्यवादी एम.सी.सी (चारु मजूमदार के अनुसार) और पी.डब्लु.जी के बीच विचारधारा के स्तर पर कम ही दूरी बची रह गई थी और यह "विलय" महज एक औपचारिकता थी।


यह विलय दरअसल घोर अवसरवाद का एक नमूना था। दोनों पार्टिया सरकारी पिटाई से त्राहिमाम कर रही थी और एक दूसरे के पीठ पीछे छिपने का प्रयास कर रही थी। दोनों अराजक तथा हत्या को राजनीति समझनेवाली पार्टिया अस्तित्व खो देने की हद तक पहुंच चुकी थी। इसलिए यह "विलय" पी.डब्लु.जी के लिए भी उतना ही आवश्यक था, जितना की एम.सी.सी के लिए।


विलय के बाद 8 वर्ष गुजर गए, यानि 2004 से 2012। इस दौरान एकीकृत माओवादी पार्टी ने अपनी जमीन केवल खोई ही है। उन्हें कोई ठोस प्राप्ति हुई, ऐसा कहीं दिखाई नहीं पड़ता। आंध्रप्रदेश में पार्टी, कांग्रेस को सत्ता दिलाकर वैद्यता प्राप्त करने चली और अपना सफाया करवा ली। यानि कि चैबे गए छब्बे बनने, दूबे होकर आए। अब आंध्रप्रदेश में उनका कोई नामलेवा नहीं रह गया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री के पद पर देखने की चाहत का अन्त किशनजी की मौत में हुआ। हालांकि आदतन लथखोरों जैसा पार्टी अभी भी यह कहते जा रही है कि वह 14 राज्यों में फैल चुकी है, लेकिन अगर उनसे पूछा जाए कि कैसा फैलाव है वह, तब शायद ही उन्हें जबाव सुझे। लब्बोलुबाव यही है कि अब यह पार्टी लेवी वसूलनेवालों, फिरौती लेनेवालों और बलात्कार करनेवालों की जमात है। आम अपराधी माओवादिओं की तुलना में अधिक इमानदार हैं। कम से कम वे "राजनीति" का नाटक नहीं रचते।

मेरे माओवादी मित्र बुरा नहीं मानें, इस विलय का अनुभव भारत की जनता के लिए कोई खास सुखद नहीं रहा।

http://www.biharkhojkhabar.com/archives/16764/2


नक्सलियों के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या


गांव के लोग बीज पंडूम त्योहार मना रहे थे, तभी वहां पुलिसवालों ने धावा बोल दिया और बिना कुछ कहे लोगों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. गोलीबारी में मरने के भय से कुछ लोग जमीन पर लेट गए और 22 लोग गांव छोड़कर भाग गए, जिनका अब तक कोई सुराग नहीं है. . .

संजय स्वदेश


अठारह मई की शाम छत्तीसगढ़ के एक छोर पर मुख्यमंत्री रमन सिंह के गढ़ राजनांदगांव में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश की विकास गाथा का गुणगान कर रहे थे.  केंद्र की यूपीए सरकार को कोस रहे थे.  कह रहे थे कि छत्तीसगढ़ में विकास की रफ्तार देख कर लगता है कि यह प्रदेश गुजरात से भी आगे जाएगा, ठीक उसी रात छत्तीसगढ़ के दूसरे छोर पर स्थित बीजापुर जिले के गंगालुर थाना क्षेत्र के एक गांव में पुलिस ने नक्सलियों को मारने के नाम पर मासूम ग्रामीणों पर गोलियां बरसायीं.

नक्सलियों के नाम पर मारे गये ग्रामीणों की लाशें

कथित मुठभेड़ में जहां तीन मासूम समेत आठ लोग मारे गए, वहीं पांच अन्य ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. घायलों में दो नाबालिग स्कूली बच्चे भी शामिल हैं. पुलिस गोलीबारी के बाद से 22 ग्रामीण लापता बताए जा रहे हैं. लापता 22 ग्रामीणों का भी अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है. इस घटना से आक्रोशित ग्रामीणों एवं महिलाओं ने 19 मई को गंगालूर थाने का घेराव किया.

घेराव के लिए थाने पहुंचे ग्राम प्रमुख तारम लखमू एवं तारम बुधरू ने बताया कि मारे गये लोगों में से कोई भी नक्सली नहीं है. सभी गांव के लोग बीज पंडूम (कृषि से जुड़ा स्थानीय त्योहार) मना रहे थे, तभी वहां पुलिसवालों ने धावा बोल दिया और बिना कुछ कहे हम लोगों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. गोलीबारी में मरने के भय से कुछ लोग जमीन पर लेट गए और 22 लोग गांव छोड़कर भाग गए, जिनका अब तक कोई सुराग नहीं लग सका है.

पुलिस की गोली से ही तीन बच्चों समेत आठ लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. पुलिस की आपसी गोलीबारी में ही एक आरक्षक की भी मौत हुई. ग्राम प्रमुख के मुताबिक पुलिस फायरिंग में दो बालक रैनू उम्र दस वर्ष, पूनम समलू उम्र पंद्रह वर्ष समेत तारम छोटू, तारम आयतू एवं सोनी तारम गंभीर रूप से घायल हो गए हैं, जिन्हें बीजापुर अस्पताल में उपचारार्थ भर्ती करवाया गया है.

ग्राम प्रमुखों ने बताया कि मृतकों में एक को पुलिस अपने साथ उठाकर ले गई, जिसे जबरन नक्सली बताया जा रहा है. मृत समस्त आठों ग्रामीणों का शव पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया है. इधर, पुलिस का दावा है कि उनकी मुठभेड़ नक्सलियों से हुई थी. वे गांव में बैठक कर रहे थे. गोलीबारी में ग्रामीण पांडू, बहादुर, जोगा, कोमू, पूनेम सोमू, लखमू, पांडू एवं कारम मासा मारे गए. इनमें से पुलिस कारम मासा को नक्सली बता रही है.

बीजापुर कलेक्टर मोहम्मद अब्दुल केशर हक ने मामले की दण्डाधिकारी जांच के निर्देश जारी कर दिए हैं. उन्होंने कहा कि जल्द ही सभी बिंदुओं पर जांच प्रक्रिया शुरू होगी.

गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पहले भी पुलिस ने ऐसी ही एक मुठभेड़ में दो बच्चों समेत कुछ ग्रामीणों को मारा था. बच्चे स्कूल ड्रेस में थे. उस मामले की अभी न्यायायिक जांच चल ही रही है. इस नये मामले की जांच के लिए भी मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी है. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने मामले की न्यायिक जांच का ऐलान करते हुए कहा है कि न्यायमूर्ति वीके अग्रवाल को इसका जिम्मा सौंपा गया है. सीएम ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए देने की घोषणा भी की है.संजय स्वदेश समाचार विस्फोट के संपादक हैं.




No comments:

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

Tweet Please

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk