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Wednesday, June 13, 2012

भ्रष्टाचार और अदालत की गति

भ्रष्टाचार और अदालत की गति


Wednesday, 13 June 2012 10:11

सुरेंद्र किशोर 
जनसत्ता 13 जून, 2012: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के मुकदमों की त्वरित सुनवाई के लिए देश का प्रत्येक हाईकोर्ट अपने यहां विशेष पीठ का गठन करे। माननीय मुख्य न्यायाधीश भ्रष्टाचार के मुकदमों की सुनवाई में भारी देरी से चिंतित हैं। देर से किया गया न्याय, न्याय नहीं होता। अदालतों की कार्यशैली में बेहतरी लाने के उद्देश्य से न्यायमूर्ति कपाड़िया ने पिछले साल नवंबर में ही सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखा था। इस पत्र का विवरण सूचनाधिकार के तहत हाल में हासिल किया गया है। यह सूचना सुभाष अग्रवाल ने हासिल की। पत्र के अनुसार मुख्य न्यायाधीश यह भी चाहते हैं कि निचली अदालत के जो जज भ्रष्टाचार के मामले समय पर निपटा देते हैं, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए। न्यायमूर्ति कपाड़िया ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि भ्रष्टाचार-मुक्त समाज बनाने के लिए न्यायपालिका की ओर से कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। भ्रष्टाचार से संबंधित मुकदमों के निपटारे में देरी होने से इस बुराई पर काबू पाने के प्रयासों को धक्का पहुंचता है।
मुख्य न्यायाधीश यह भी चाहते हैं कि इस मामले में उच्च न्यायालय निचली अदालतों के कामों की निगरानी करें। इससे पहले यह भी खबर आई थी कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल चार नवंबर को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को एक ऐसे ही  मामले में नोटिस जारी किया था। नोटिस उन 162 सांसदों के बारे में था जिनके खिलाफ देश के विभिन्न न्यायालयों में आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। न्यायमूर्ति पी.सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सरकारों से इस आग्रह पर उनकी राय मांगी थी कि इन मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए त्वरित अदालतें गठित की जाएं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह और कुछ अन्य प्रमुख नागरिकों की ओर से दायर की गई जनहित याचिका पर अदालत ने नोटिस जारी किया था। एक महीने के भीतर जवाब मांगा था। याचिका में कहा गया था कि चुने गए विधायक और सांसद मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनते हैं। वे नीतियां और कानून बनाते हैं। अगर इनकी पृष्ठभूमि आपराधिक होगी तो इसका असर सरकार की नीतियों पर भी पडेÞगा। इसलिए इनके मामलों की सुनवाई त्वरित अदालतों के जरिए होनी चाहिए। इस पर सरकारों ने अदालत को क्या बताया यह तो पता नहीं चला है, पर त्वरित अदालतों के गठन की कोई सूचना अभी नहीं मिल रही है।
आज भ्रष्टाचार के मामले में देश की जो स्थिति है उससे आजिज आकर सुप्रीम कोर्ट को ऐसे निर्देश देने पड़ रहे हैं। जो काम शासन को करने चाहिए थे वे काम सुप्रीम कोर्ट करने को मजबूर है। यह इस देश के लोकतंत्र के लिए कोई अच्छी बात नहीं है। मगर आखिर कानून के शासन और संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर भी तो है। इसका उसे अहसास भी है। इसीलिए उसने अपनी भूमिका नहीं छोड़ी है। आज इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही खतरा पैदा हो चुका है। इस देश के भ्रष्ट नेता, अफसर, व्यापारी और तरह-तरह के माफिया ने मिल कर शासन को असरहीन बना दिया है, जिस गठजोड़ की ओर वोहरा आयोग ने देश का ध्यान 1993 में ही आकृष्ट किया था। आज तो कानून के शासन के सामने और भी भारी चुनौती है।
सोलह नवंबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दोराई स्वामी और अरिजित पसायत की खंडपीठ ने स्थिति से ऊब कर कहा था कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून अपने उद््देश्य की प्राप्ति में विफल रहा है। क्योंकि इन कानूनों से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता दिखाई नहीं पड़ रहा है।
वैसे एक बात अलग से कही जाती है कि चाहे कितने भी अच्छे कानून बना दो, पर उसे लागू करने वाले लोग ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नहीं होंगे, तब तक उन कानूनों का कोई फायदा नहीं मिलेगा।
पर यह भी देखा जा रहा है कि जिस केस में अदालत सीबीआइ के कामों की निगरानी करती है उन मामलों में यही सीबीआइ अच्छा नतीजा देती है। पर अन्य मामलों में सीबीआइ केंद्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री के रुख की ओर देख कर ही अपने कदम आगे बढ़ाती है। इसलिए लगता है कि भ्रष्टाचार के मुकदमों की सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय स्तर पर सिर्फ विशेष पीठ ही जरूरी नहीं है, बल्कि जांच एजेंसी के कामों पर अदालत की सतत निगरानी भी उतनी ही जरूरी जान पड़ती है। अगर ऐसा हुआ तो भ्रष्टाचार-मुक्त समाज बनाने में न्यायपालिका की भूमिका और भी बेहतर और कारगर होगी और न्यायप्रिय जनता इसके लिए अदालतों के प्रति आभारी रहेगी। तब एक दिन अगली पीढ़ियां यह कहेंगी कि जब चारों तरफ अंधेरा छा रहा था, तो न्यायपालिका और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने देश की बेहतरी के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया।  
यह अच्छी बात है कि अण्णा समूह और स्वामी रामदेव के आंदोलन के समांतर सुप्रीम कोर्ट भी भ्रष्टाचार की बुराई को समाप्त करने के लिए अपने स्तर पर सक्रिय और गंभीर रहा है।
भ्रष्टाचार के मामलों को जल्द निपटाने के प्रयास में पटना हाइकोर्ट का एक ताजा फैसला भी कारगर साबित हो सकता है, अगर उसे कड़ाई से लागू किया जाए। पटना हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने इस साल मार्च में यह निर्णय दिया कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 के तहत दायर किसी मुकदमे की सुनवाई को बीच में ही कोई अदालत किसी भी बहाने स्थगित नहीं कर सकती। इस संबंध में उन्होंने सत्यनारायण शर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सन 2001 के एक फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि भ्रष्टाचार के मुकदमे की   कार्यवाही को बीच में ही नहीं रोका जा सकता।

पर इसके विपरीत देश भर की अदालतों से अक्सर ऐसी सूचनाएं मिलती रहती हैं कि अगर भ्रष्टाचार का मुकदमा किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ चल रहा होता है तो उसकी सुनवाई तरह-तरह के बहाने बना कर बीच-बीच में रुकवा दी जाती है। नतीजतन मुकदमों की सुनवाई में काफी समय लगता है। इस बीच वे नेता बार-बार चुनाव जीत कर देश को लूटते रहते हैं।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के मामले में अपनी चिंता जाहिर करता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अगर 2-जी स्पेक्ट्रम जैसे मामले में पहल न की होती तो क्या होता इस देश का? भ्रष्टाचार के एक मामले की अनदेखी इस देश में दूसरे और बडेÞ घोटाले की प्रेरणा देती रही है। इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की चिंता और पहल से न्यायप्रिय लोगों को खुशी होती है।
वीवीआइपी मामलों की सुनवाई में देरी के प्रति सुप्रीम कोर्ट की पहल से लोगों में एक उम्मीद बनी है। पर मुकदमों की सुनवाई में देरी के पीछे सिर्फ अदालतों की अपनी कछुआ चाल जिम्मेवार नहीं है। कई अन्य  कारण भी हैं। उसके लिए सरकारें  और अभियोजन पक्ष भी जिम्मेदार हैं।
इनके अलावा देश की अदालतों में ढांचागत सुविधाओं की भारी कमी है। विभिन्न स्तरों पर न्यायाधीशों की संख्या जरूरत के मुकाबले कम है। देश की मुख्य अभियोजन संस्था सीबीआइ में भी अधिकारियों-कर्मचारियों की भारी कमी है। सीबीआइ में इन दिनों 855 पद रिक्त हैं। इनमें विधिक अधिकारियों के इकसठ खाली पद शामिल हैं। कुल रिक्त पदों में 626 पद तो कार्यपालक स्तर के हैं। एक तरफ जहां सीबीआइ पर काम के बढ़ते बोझ को देखते हुए मौजूदा स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है, मगर दूसरी ओर मौजूदा स्वीकृत पदों में से भी बड़ी संख्या में पद खाली रखे गए हैं। इससे भ्रष्टाचार से निपटने के प्रति सरकार में गंभीरता की कमी का पता चलता है।
गवाहों को अदालतों तक पहुंचाने के मामले में भी सीबीआइ अक्सर लचर साबित होती है। गवाहों की सुरक्षा का कोई संस्थागत प्रबंध नहीं है। साथ ही गवाहों का दैनिक भत्ता हास्यास्पद रूप से कम है। सीबीआइ के केस में गवाह को मात्र 275 रुपए दैनिक भत्ते के रूप में दिया जाता है। अगर किसी गवाह को कहीं दूर से ट्रेन या विमान से चल कर गवाही देने आना है तो उसके लिए उसको खुद अपनी जेब से खर्च करना होता है। कितने गवाह चाहेंगे कि इस काम में उनका अपना पैसा लगे? इस कारण गवाह अदालत में उपस्थित होने से अक्सर टालमटोल करते हैं।
हालांकि इसके बावजूद पिछले साल सीबीआइ के इकहत्तर प्रतिशत मामलों में अदालतों ने सजा सुनाई थी। भले सजा मिलने में देर होती है। पर अगर सीबीआइ की ढांचागत बेहतरी की दिशा में ठोस काम हों तो नतीजे और भी त्वरित और बेहतर होंगे।
यानी कुल मिला कर स्थिति यह है कि प्रभावशाली लोगों को शीघ्र सजा दिलाने के रास्ते में सिर्फ अदालतों के स्तर पर देरी नहीं होती, बल्कि ऐसे मामलों के घिसटते रहने के कई अन्य कारण भी हैं जिनकी ओर अन्य पक्षों को भी सोच-विचार करना होगा। देश की पूरी राजनीति और नौकरशाही को भी यह महसूस करना होगा कि भ्रष्टाचार से ही देश में अन्य अनेक तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। कई जानकार लोग और प्रमुख नेतागण भी यह कह चुके हैं कि माओवादियों के मजबूत होते जाने के पीछे सरकारी भ्रष्टाचार प्रमुख कारण है।
लोक सेवकों पर मुकदमे चलाने के लिए उनके ऊपर के अधिकारी से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है। ऐसी कानूनी बाध्यता है। पर यह अनुमति देने में मनमानी देरी की जाती है। पर्याप्त सबूत जुटा लेने के बाद भी जांच एजेंसियां मुकदमा चलाने के लिए इजाजत मिलने की बाट जोहती रहती हैं। 
पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा के केस में हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामले में सरकार तीन महीने के भीतर यह निर्णय कर ले कि वह किसी व्यक्ति पर मुुकदमा चलाने की अनुमति दे रही है या नहीं। अगर किसी मामले में सरकार महाधिवक्ता से सलाह लेना चाहती है तो वह एक महीना और समय ले सकती है। पर उससे अधिक नहीं। इसके बावजूद अब भी अनेक मामले अभियोजन की स्वीकृति के लिए विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं। केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें इन मामलों में गंभीरता दिखातीं तो अण्णा आंदोलन की जरूरत ही क्या रहती?

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