| Wednesday, 13 June 2012 13:58 |
उच्चतम न्यायालय ने आज आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगाने से इंकार कर दिया जिसके तहत उक्त उप कोटे के प्रावधान को रद्द कर दिया गया है। न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की पीठ ने कहा ''हमारा इरादा स्थगन जारी करने का नहीं है।'' पीठ ने कहा ''हम पूछ रहे हैं कि क्या 4.5 फीसदी उप कोटे को संवैधानिक या वैधानिक समर्थन था या नहीं।'' पीठ की राय थी कि अल्पसंख्यकों के उपकोटे का असर अन्य पिछड़ा वर्ग पर पड़ेगा। न्यायालय ने एक बार फिर उप कोटा तय करते समय वैधानिक निकायों जैसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग :एनसीएम: और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग :एनसीबीसी: से परामर्श न करने पर सवाल उठाया। पीठ ने कहा ''आपने एनसीएम और एनसीबीसी की उपेक्षा क्यों की। ये दोनों सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय हैं।'' इससे पहले, न्यायाधीशों ने गौरव बनर्जी से कहा कि उसके समक्ष पेश किए गए यं दस्तावेज उच्च न्यायालय में पेश कियं जाने चाहिए थे । बनर्जी ने कहा कि उच्च न्यायालय को लग रहा था कि यह उप कोटा सभी अल्पसंख्यकों के लिए है। इस पर पीठ ने कहा ''ऐसा इसलिए, क्योंकि यह बात कार्यालय ज्ञापन में थी।'' उन्होंने कहा कि बौद्ध और पारसी जैसे सभी धार्मिक अल्पसंख्यक 4.5 फीसदी उप कोटे की सूची में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण प्राप्त है लेकिन 4.5 फीसदी उप कोटा मुसलमानों के या ईसाई धर्म ग्रहण करने वालों के निचले रैंक को दिया गया है। बनर्जी ने कहा कि 4.5 फीसदी उप कोटे के लिए अल्पसंख्यकों में अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान के लिए पहला आधार यह था वह सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हों तथा धार्मिक अल्पसंख्यक हों। इस पर पीठ ने कहा ''यही मुश्किल है। आप यह आकलन किस तरह कर सकते हैं?'' केंद्र ने कल ही उच्चतम न्यायालय के समक्ष वह ''प्रासंगिक'' सामग्री और दस्तावेज पेश किए थे जिनके आधार पर उसने 4.5 फीसदी उप कोटा तय किया था। उच्चतम न्यायालय ने 11 जून को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अपने समक्ष यह सामग्री और दस्तावेज पेश करने को कहा था। |
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