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Thursday, July 1, 2010

आज नकद कल फसाद-1,2

मुखपृष्ठ | तहक़ीक़ात | आज नकद कल फसाद-1

आज नकद कल फसाद-1


मुखपृष्ठ | सम्पादकीय

सम्पादकीय

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कितनी लंबी यात्रा

हर तरह के संघर्षों के बावजूद सरोकारी पत्रकारिता का एक विचार आज भी सांसें ले रहा है
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कृतज्ञता और आक्रोश

नेताओं और सैन्य अधिकारियों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले ऑपरेशन वेस्ट एंड की सबसे भारी कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी उनका इस ऑपरेशन से कोई लेना-देना ही नहीं था...
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छाया वीर

इतिहास आखिरकार मनमोहन सिंह का फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया बल्कि ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या हालात उभरे...
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जाग स्वयं में लीन कुलीन

ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है....
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कब जागेंगे हम?

जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. ...
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http://www.tehelkahindi.com/investigation/index.1.html

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आप श्री राम सेना से कभी भी और कहीं भी दंगे करवा सकते हैं बस आपके पास सही कीमत अदा करने की कुव्वत होनी चाहिए. पुष्प शर्मा की तहकीकात. लेखिका संजना

' मंगलौर पब अटैक ' इस वाक्य को यूट्यूब पर टाइप करने पर 133 वीडियो परिणाम मिलते हैं. पहले वीडियो को अब तक तकरीबन तीन लाख लोग देख चुके हैं. यही वाक्य गूगल सर्च पर लिखा जाए तो 69 हजार वेबसाइटों का संदर्भ मिलता है. संबंधित घटना 24 जनवरी, 2009 की है. उस दिन मंगलौर के एक पब में तकरीबन 35-40 लोगों ने जबर्दस्ती घुसकर महिलाओं पर हमला बोल दिया था. मारपीट की इस घटना को एक दक्षिणपंथी संगठन  श्री राम सेना, जिसे इससे पहले तक शायद ही कोई जानता हो, के सदस्यों ने अंजाम दिया था. संगठन के कैडरों का कहना था कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं का शराब पीना 'असभ्य आचरण' की श्रेणी में आता है और यह 'हिंदू संस्कृति और परंपराओं' का अपमान है. इस घटना के दो दिन बाद ही भारतीय गणतंत्र की साठवीं सालगिरह थी. 26 जनवरी को पूरे दिन राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर पब से निकलकर दौड़ती, गिरती-पड़ती और पिटती महिलाओं का वीडियो फुटेज दिखाया जाता रहा (यह वीडियो फुटेज टीवी चैनलों को सिर्फ इसलिए मिल पाया था कि पब पर हमला करने के आधा घंटा पहले सेना ने खुद ही पत्रकारों को इसकी सूचना दी थी). टीवी चैनलों पर दिखाए जाने के बाद यह घटना हर जगह चर्चा का विषय बन गई. फ्रांस, रूस और जर्मनी तक के पत्रकारों ने इस घटना की रिपोर्टिंग की. इस तरह दो दिनों में ही श्री राम सेना घर-घर में जाना जाने वाला नाम बन गया.

" मैं इसमें सीधे शामिल नहीं हो सकता. मेरी एक छवि है, समाज में कुछ प्रतिष्ठा है. लोग मुझे सिद्घांतों वाले व्यक्‍ति के रूप में देखते हैं, एक आदर्शवादी और ‌हिंदुत्ववादी के रूप में देखते हैं "

प्रमोद मुतालिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राम सेना

एक संगठन के रूप में सेना ने हमेशा खुद को एक उग्र हिंदूवादी संगठन साबित करने की कोशिश की है. सेना के नेता यह दावा करते रहे हैं कि वे हिंदू धर्म और संस्कृति के झंडाबरदार हैं और उनके कार्यकर्ता इस काम में लगे हुए कर्मठ सिपाही. उनके खुद के शब्दों में, अपने हिंदूवादी एजेंडे को लागू करने के लिए उन्हें लोगों से मारपीट करने, संपत्तियों और कलाकृतियों को नष्ट करने और धर्म से बाहर जाकर जोड़ी बनाने वालों को अलग करने में कोई झिझक नहीं. कुल मिलाकर इस संगठन का पहचानपत्र हिंसा है, नैतिकता और संस्कृति की आड़ में की जाने वाली हिंसा.

हालांकि इस संगठन और उसकी कारगुजारियों के बारे में तहलका की छह सप्ताह तक चली तहकीकात बताती है कि सेना के संस्कृति और नैतिकता की रक्षा के दावे किस तरह एक पाखंड भर हैं. 'धर्म रक्षा' के लिए तात्कालिक हिंसक प्रतिक्रिया करना श्री राम सेना के कार्यकर्ताओं का सिर्फ एक घृणित चेहरा है. असल में तो यह संगठन सनकी और आवारागर्द लोगों का एक ऐसा झुंड है जिसे पैसे देकर भी अपना काम कराया जा सकता है. 'दंगे के लिए ठेका' लेने वाले इस संगठन की असलियत उजागर करने वाली तहलका की तहकीकात बताती है कि इससे तोड़फोड़ करवाने के लिए बस आपको कुछ कीमत चुकाने के लिए तैयार होना है. श्री राम सेना के इस चेहरे को सामने लाने के लिए एक तहलका संवाददाता ने खुद को कलाकार बताकर श्री राम सेना के अध्यक्ष प्रमोद मुथालिक से मुलाकात की. उसके सामने एक प्रस्ताव और तर्क रखा. तर्क यह था कि नकारात्मक प्रचार भी आखिर प्रचार ही होता है, प्रस्ताव यह था कि श्री राम सेना कलाकार के चित्रों की प्रदर्शनी पर हमला करे जिससे देश-दुनिया में सभी लोगों  का ध्यान उसके चित्रों की ओर चला जाए और वह बाद में ऊंचे दामों पर इन्हें बेच सके (मुथालिक को यह भी बताया गया कि ये चित्र हिंदू-मुसलिम सद्भाव से संबंधित हैं और इनमें खासकर हिंदू-मुसलिम शादियों का चित्रण है). बदले में मुथालिक और सेना को वह प्रचार तो मिलता ही जो मंगलौर पब पर हमले के बाद मिला था, साथ ही इस उपद्रव को आयोजित करने का मेहनताना भी मिलता. इस प्रस्ताव पर मुथालिक की प्रतिक्रिया में गुस्सा या डर कतई नहीं था. उसने तुरंत तहलका संवाददाता को सेना के कई सदस्यों के फोन नंबर दे दिए और फिर एक के बाद एक ऐसे कई आपराधिक चेहरे सामने आते गए जो पेशेवराना अंदाज़ में अराजकता फैलाने के उस्ताद थे. इस पूरी कहानी को जानने से पहले शायद श्री राम सेना और इसके संस्थापक के अतीत के बारे में जानना बेहतर रहेगा.

" श्री राम सेना के पास एक बहुत बढ़िया टीम है, जो भी आप करवाना चाहते हैं कर देंगे. हमारे पास हर चीज की सेटिंग है. सिर्फ एक ही प्रॉब्लम है- मनी प्रॉब्लम " 

कुमार, मंगलौर में श्री राम सेना का एक सदस्य

श्री राम सेना की शुरुआत 2007 में प्रमोद मुथालिक ने की थी जो अब भी इसका राष्ट्रीय अध्यक्ष है. उत्तर कर्नाटक के बगलकोट में जन्मे मुथालिक ने अपने शुरुआती दिन हिंदू दक्षिणपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ गुजारे. वह 13 साल की उम्र से ही शाखा जाने लगा था. 1996 में आरएसएस में उसके सीनियरों ने मुथालिक को अपने सहयोगी संगठन बजरंग दल में भेज दिया. दल का दक्षिण भारत का संयोजक बनने में मुथालिक को एक साल से भी कम समय लगा. मुथालिक को जानने वाले उसे महत्वाकांक्षी, समर्पित और तीखा वक्ता कहते हैं. आरएसएस और इसके दूसरे संगठनों के साथ अपने 23 साल के जुड़ाव में मुथालिक का कई बार कानून से आमना-सामना हुआ और अपने ऊपर लगे भड़काऊ भाषण देने के आरोपों के चलते उसे कई बार जेल भी जाना पड़ा.

हिंदुत्व के प्रति उसके तथाकथित समर्पण का  जब उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला तो 2004 में उसने आरएसएस से अपना नाता तोड़ लिया. उसने दावा किया कि आरएसएस और इससे जुड़े अन्य संगठन पर्याप्त सख्ती न अपनाकर हिंदू हितों से गद्दारी कर रहे हैं. इसके बाद यह अपेक्षित ही था कि 2007 में स्थापना के बाद से ही अत्यंत कट्टर हिंदुत्व की राजनीति श्री राम सेना की पहचान बन गई. मुथालिक कहते हैं कि हिंसा ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है. राजनीति के केंद्रीय रंगमंच पर आने की कोशिश में 2008 में मुथालिक ने राष्ट्रीय हिंदुत्व सेना का गठन किया, जो श्री राम सेना का राजनीतिक धड़ा है. लेकिन यह बुरी तरह से नाकाम रही. चुनाव लड़ने वाला इसका कोई भी उम्मीदवार अपनी मौजूदगी तक दर्ज नहीं करा सका. तहलका से बात करते हुए मुथालिक ने कैमरे के सामने यह स्वीकार किया कि उसके उम्मीदवार राज्य चुनाव इसलिए हार गए क्योंकि 'हमें कामयाब होने के लिए पैसा, धर्म और ठगों की जरूरत है. हमें यह पता नहीं था. आज की राजनीतिक स्थिति बदतर हो गई है.'

चुनावी राजनीति में फिर से लौटने की कोशिश  के फेर में मुथालिक और सेना ने और अधिक कट्टर रुख अपनाते हुए 'हिंदू' पहचान को मजबूती देने की योजनाओं के एक सिलसिले की शुरुआत की. हालांकि इस संगठन का मजबूत आधार तटीय और उत्तर कर्नाटक के कुछ इलाकों में है, लेकिन इसकी गतिविधियां इन्हीं इलाकों तक सीमित नहीं हैं. 24 अगस्त, 2008 को दिल्ली में श्री राम सेना के कुछ सदस्य सहमत नामक एनजीओ द्वारा आयोजित एक कला प्रदर्शनी में घुस गए और एमएफ हुसैन की अनेक तसवीरों को नष्ट कर दिया. एक माह बाद सितंबर में मंगलौर में एक सार्वजनिक सभा में बोलते हुए मुथालिक ने बंेगलुरु बम धमाकों का जिक्र किया, जो एक हफ्ता पहले हुए थे और यह घोषणा की कि सेना के 700 सदस्य आत्मघाती हमले करने के लिए प्रशिक्षण ले रहे थे. उसने घोषणा की, 'अब हमारे पास और धैर्य नहीं है. हिंदुत्व को बचाने के लिए जैसे को तैसा का ही एकमात्र मंत्र हमारे पास बचा है. अगर हिंदुओं के धार्मिक महत्व के स्थलों को निशाना बनाया गया तो विरोधियों को कुचल दिया जाएगा. अगर हिंदू लड़कियों का दूसरे धर्म के लड़कों द्वारा इस्तेमाल किया जाएगा तो अन्य धर्मों की दोगुनी लड़कियों को निशाना बनाया जाएगा.'

" मैंने पहले 1996 में आरएसएस में काम किया. फिर बजरंग दल में. मैं उस मुख्य टीम में शामिल था जिसने मंगलौर पब में हमला किया था. मगर पुलिस ने जो मामला दर्ज किया है उसमें मेरा नाम नहीं है. मैं कभी गिरफ्तार नहीं हुआ "

सुधीर पुजारी , मंगलौर में श्री राम सेना का एक सदस्य

कुछ महीनों बाद कर्नाटक पुलिस ने राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान हुबली में हुए धमाकों के संबंध में जनवरी, 2009 में नौ लोगों को गिरफ्तार किया. उनका मुखिया नागराज जंबागी सेना सदस्य और मुथालिक का नजदीकी सहयोगी था- इसे तब खुद मुथालिक ने स्वीकार किया था. जुलाई, 2009 में जंबागी की बगलकोट जेल में ही हत्या हो गई. मंगलौर पब हमले के दौरान अपने कैडरों को उकसाने के लिए गिरफ्तार किए जाने के कुछ मिनट पहले मुथालिक ने पत्रकारों से कहा था कि वे इन हमलों को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहे हैं. उसने कहा था- 'हम अपनी हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए यह कदम उठा रहे हैं और उन लड़कियों को सजा दे रहे हैं जो पबों में जाकर इस संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश कर रही थीं. जो कोई भी मर्यादा की सीमा से बाहर जाएगा हम उसे बरदाश्त नहीं करेंगे.'

मुथालिक  के सुझाए 'मर्यादा' में रहने के ये तौर-तरीके आज भी तटीय कर्नाटक में अनेक प्रकार से लागू किए जा रहे हैं. मंगलौर में सेना के कैडर 15 जुलाई, 2009 को एक हिंदू शादी के समारोह में घुस गए और वहां मौजूद एक मुसलिम मेहमान के साथ मारपीट की. पूरे इलाके में मुसलिम लड़के महज हिंदू लड़कियों से बात करने के लिए ही पीट दिए जाते हैं. लव जिहाद (हिंदू लड़कियों को कथित तौर पर मुसलिम लड़कों द्वारा शादी का प्रस्ताव देकर अपने धर्म में शामिल करने की साजिश) के नाम पर स्थानीय लोगों की भावनाओं को भड़काने की भी जमकर कोशिश की जा रही है.

इस तरह अपनी पड़ताल के लिए तहलका के पत्रकार ने खुद को एक कलाकार के रूप में पेश किया और घोषणा की कि उसकी अगली प्रदर्शनी लव जिहाद की सकारात्मक छवि पर होगी. लेकिन इसके बावजूद मुथालिक या सेना के किसी सदस्य पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता दिखा कि वे जिस चीज़ का सैद्धांतिक रूप से विरोध करने का दावा करते हैं उससे संबंधित चित्रों की बिक्री उनके विरोध से बढ़ जाने वाली है.

पेश है तहलका की मुथालिक से मुलाकात का सिलसिलेवार ब्योरा.

 

तहलका की मुथालिक से पहली भेंट हुबली स्थित सेना के दफ्तर में हुई. कला प्रदर्शनी पर पूर्वनियोजित तरीके से हमले का प्रस्ताव रखने से पहले यह कहते हुए कि 'हिंदुत्व के लिए हम भी कुछ करें', नकद 10 हजार रुपए दान के रूप में दिए गए. मुथालिक ने झट से पैसे लिए और उन्हें अपनी जेब में रख लिया. उसने मना करने का दिखावा करने तक की जहमत नहीं उठाई.
बातचीत के क्रम में एक ऐसा प्रस्ताव सुझाया गया जो दोनों पक्षों के लिए लाभकारी था.  मुथालिक के चेहरे पर हमने किसी तरह की हैरानी या अचंभे का भाव नहीं देखा - तब भी नहीं जब तहलका संवाददाता ने यह सुझाया कि प्रदर्शनी बंेगलुरु के एक मुसलिम बहुल इलाके में होनी चाहिए ताकि हमले का अधिकतम असर हो. इस सुझाव पर मुथालिक की एकमात्र प्रतिक्रिय़ा थी - 'हां. हम ऐसा कर सकते हैं. मंगलौर में भी कर सकते हैं.' इस तरह एक दूसरे शहर मंगलौर, जहां हमला किया जा सकता था, पर भी बात पक्की हो गई. अगले पांच मिनटों के भीतर मुथालिक ने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें दो सेना नेताओं- बेंगलुरु शहर अध्यक्ष वसंतकुमार भवानी और सेना के उपाध्यक्ष प्रसाद अवतार से मिलने का सुझाव दिया जो मंगलौर में रहते हैं.

 

" मैं आपको बताऊंगा कितना पैसा लगेगा. यह मंगलौर पब अटैक की तरह होगा, बल्कि उससे भी बेहतर होगा.आपको पूरा नेशनल मीडिया कवरेज मिलेगा. मैं आपके लिए सब सेटिंग कर दूंगा "

प्रसाद अत्तावर , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, श्री राम सेना

तहलकाः
मैं चाहता हूं सर मुझे पॉपुलेरिटी मिले और पॉपुलेरिटी मिलेगी तो मेरा बिजनेस भी बढ़ जाएगा... अगर आप कहें तो मैं... आप मुझे एक दायरा बता दें... कि इतना खर्चा आ गया... इतने लड़के होंगे... इतना एडवो... मतलब वकीलों का... हम लोग तो कंप्लेंट ही नहीं करेंगे... क्योंकि वो तो हमारी अंडरस्टेंडिंग है... तो सर लेकिन ये है कि आप मुझे जो बताएंगे मैं एडवांस आपके यहां छोड़ करके जाऊंगा उसके बाद आपको कहूंगा कि ये सर पूरा आ गया है अब सर काम कर दो...

मुथालिकः मंगलौर में कर सकते हैं... बंगलौर.


तहलकाः बंगलौर में शिवाजी नगर वाले एरिया में मुझे पॉपुलेरिटी ज्यादा मिल जाएगी्... क्योंकि वो पूरा एरिया उन्हीं का है... मुसलिम का ही. आपने अगर प्रेस में एक वक्तव्य भी दे दिया और आपके दस कार्यकर्ता भी पहुंच गए... हम तो उसे बंद कर देंगे न... हमें क्या है... लेकिन उसे ये ही ना पॉपुलेरिटी तो मिल ही जाएगी...

मुथालिकः हां कर सकते हैं...

तहलकाः तो सर मुझे एक सीधा बता दीजिए... या मेरे को दो-चार दिन बाद आने को बता दीजिए... आप पूरा बताइए कि पुष्प ये मेरा खर्चा आ रहा है... तुम इतना कर दो... तो सर मैं पूरा करके उसको प्लान कर देता हूं.

मुथालिकः मैं क्या बता रहा हूं... वहां के हमारे प्रेसिडेंट हैं.

तहलकाः बंगलौर के?

मुथालिकः बंगलौर के... वो भी बहुत स्ट्रांग हैं... उनसे बात करके... आप मैं और वो तीनों बैठकर प्लान करेंगे क्या-क्या करना है... फिर करेंगे... डेफिनेट करेंगे

घंटे भर चली बातचीत गालियों, मुसलमानों के प्रति नफरत भरे संवादों और 'उनके द्वारा देश को बांटने की योजना' के इर्द-गिर्द घूमती है. मुथालिक तहलका से कहता है कि लव जेहाद के जरिए मुसलमान अपनी तादाद बढ़ाकर हिंदुओं को पीछे छोड़ना चाहते हैं. वह आगे बताता है कि मुसलमान ब्राह्मण और जैन लड़कियों को निशाना बना रहे हैं ताकि उनके बच्चों में इन जातियों जैसी तेज अक्ल आ जाए जिससे उनके मकसद को मदद मिलेगी. उसके मुताबिक मुसलमानों की यह साजिश पूरे देश में चल रही है और इसकी रफ्तार भी बढ़ रही है. जब हम उससे पूछते हैं कि हिंदू लड़के भी यह काम क्यों नहीं करते तो मुथालिक का जवाब आता है कि श्री राम सेना अब हिंदू युवाओं को भी इस बात के लिए प्रेरित कर रही है.

बातचीत के दौरान हम बार-बार उसके सामने अपना प्रस्ताव दोहराते हैं. मुथालिक को यह प्रस्ताव ठुकराने के कई मौके भी देते हैं. लेकिन  ऐसा करने की बजाय वह अपने दूसरे सहयोगियों को इस बारे में बताने की पेशकश करता है जो इस योजना को लागू करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे. अगली मुलाकात की तारीख तय होती है. निजी फोन नंबरों का आदान-प्रदान होता है और मुथालिक हमें एक हफ्ते बाद आने को कहता है.

सेना का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते मुथालिक  का रुख इसे लेकर साफ है कि अगर इस योजना में उसकी भूमिका सामने आती है तो उसके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी, लिहाजा वह कहता है कि योजना के महत्वपूर्ण पहलुओं पर वह अपने सहयोगियों प्रसाद अत्तावर, वसंतकुमार भवानी और जीतेश से बातचीत करेगा और फिर उन्हें तहलका से संपर्क करने को कहेगा. पूरी बातचीत के दौरान कभी भी इस बात को लेकर संशय नहीं पैदा होता कि मुथालिक ही मुखिया है और अंतिम निर्णय का अधिकार उसी के हाथ में है.

मुथालिक के हस्तक्षेप के बावजूद श्री राम सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रसाद अत्तावर से संपर्क करना आसान नहीं रहा. अत्तावर हर व्यक्ति को संदेह की निगाह से देखता है और फोन करने पर मोबाइल नहीं उठाता. इसलिए तहलका को उससे मिलने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. मुथालिक के विश्वस्त सहयोगी माने जाने वाले अत्तावर को मंगलौर के पब में हुई घटना का सूत्रधार माना जाता है. 2007 में श्री राम सेना  की शुरुआत से ही अत्तावर इससे जुड़ा हुआ है और संगठन के कार्यकर्ता उसकेे एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. अत्तावर मंगलौर में सेना के एक अन्य कार्यकर्ता के साथ मिलकर अपनी एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता है. बाकी लोगों की तरह वह वित्तीय मदद के लिए सेना पर निर्भर नहीं है. जनवरी, 2009 में अत्तावर ने खुलेआम मंगलौर के पब में हुई घटना की जिम्मेदारी ली थी. उस वक्त तहलका के एक रिपोर्टर ने जब एक खबर के सिलसिले में उससे संपर्क किया था तो उसने हमले की योजना बनाने का भी दावा किया था. घटनास्थल पर मीडिया को भी उसने ही फोन करके बुलाया था. कुछ दिनों बाद मुथालिक और अत्तावर समेत 27 लोगों को पब में हुई घटना के संबंध में गिरफ्तार किया गया था. एक हफ्ते बाद जब मजिस्ट्रेट ने उन्हें जमानत दी तो उन सभी का नायकों की तरह स्वागत किया गया था.

अत्तावर के साथ आखिरकार मुलाकात तय हो जाने के बाद सेना के एक कार्यकर्ता जीतेश को तहलका को लेने के लिए भेजा गया. मंगलौर के एक साधारण-से होटल में मुलाकात तय हुई. कुछ मिनट की बातचीत में साफ होने लगा कि वह अपनी गिरफ्तारी से बचने की कोशिश में है और रवि पुजारी गैंग के लिए काम करने के आरोप में पुलिस ने उसके खिलाफ वारंट जारी किया था.  पुजारी के बारे में कहा जाता है कि अपना आपराधिक साम्राज्य खड़ा करने से पहले उसने अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम के साथ काम किया है. पर्यटन और होटल उद्योग के अलावा कथित तौर पर पुजारी की दिलचस्पी कर्नाटक के रियल एस्टेट उद्योग में भी है. अत्तावर पर पुजारी के इशारे पर कर्नाटक के तटीय इलाके के व्यापारियों और बिल्डरों को धमकाने का आरोप है.

" कासरगोड दंगे के लिए मुझपर आईपीसी की धारा 307 के तहत आरोप लगा था. हाफ मर्डर का. मैंने दो या तीन लोगों को तलवार से हत्या कर दी थी. उन्होंने हमारे दो लोगों पर हमला किया था इसलिए हमने उनके दो लोगों को निपटा दिया "
 
जीतेश , श्री राम सेना की उडुपी इकाई का अध्यक्ष 

मुथालिक ने अत्तावर को सब समझा दिया है. इसलिए जब हम उससे मिलते हैं तो उसे ज्यादा कुछ बताने की जरूरत नहीं होती. उसके सुझाव बिल्कुल ठोस और बिंदुवार होते हैं. वह हमें कर्नाटक के बाहर भी प्रदर्शनी आयोजित करने और वहां पर हमला करने का प्रस्ताव देता है. वह कहता है, 'हम ऐसा मुंबई, कोलकाता या उड़ीसा कहीं भी कर सकते हैं.' जब तहलका राय देता है कि कलाकार पर हमले का असर काफी बढ़ जाएगा अगर वह अपने सहयोगी रवि पुजारी से कहकर कोई धमकी जारी करवा दे तो अत्तावर सहमति जताते हुए कहता है कि यह हो सकता है. इससे रवि पुजारी के साथ उसका संबंध साबित होता है. एक मिनट बाद ही वह बताने लगता है कि किस तरह पुलिस को भरोसे में लेना होगा, उन्हें सेट करना होगा. इसके अलावा वह यह भी कहता है कि जो लड़के हमले में हिस्सा लेंगे वे मंगलौर से बाहर के होंगे.

तहलकाः हमने तो पुलिस में जाना नहीं है हमने कोई केस भी नहीं करना... तो अगर पुलिस केस डालेगा तो केस रहेगा नहीं क्योंकि कोई पार्टी नहीं है सामने... हम लोग आइडेंटिफाई नहीं करेंगे...

अत्तावरः वो डिपार्टमेंट सेटिंग करके करेगा ना वो मैं करेगा...

तहलका से मुलाकात के छह दिन बाद अत्तावर को मंगलौर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उसे पहले मंगलौर जेल ले जाया गया और फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. उसे बेल्लारी जेल में रखा गया था जिसे कर्नाटक की सबसे कड़ी सुरक्षा वाली जेलों में से एक कहा जाता है. बावजूद इसके वह यहां से लगातार तहलका के संपर्क में रहा. तहलका, मंगलौर और बेल्लारी जेलों में भी अत्तावर से मिलने में सफल रहा. मंगलौर जेल में मुलाकात के दौरान जब तहलका ने उससे पूछा कि दो शहरों में दंगे करवाने के लिए क्या 50 लाख रुपए काफी होंगे तो उसका जवाब था, 'मैं फाइनल अमाउंट कैलकुलेट करके आपको बता दूंगा.'  सारी बातचीत 'फाइनल अमाउंट' के इर्द-गिर्द घूमती रही. पर प्रस्ताव का एक बार भी विरोध नहीं हुआ.

प्रसादः क्या क्या करना है... होटल का अरेंजमेंट करना है?

तहलकाः नहीं वो हम करेगा... आपका सिर्फ टीम लगेगा और बाकी सब...

तहलकाः दंगा करना है... मारकाट करना है? 50 लाख खर्चा कर रहा है दो शहर के लिए.

प्रसादः मंगलौर में...

तहलकाः हां, दो सौ कार्यकर्ता करीब-करीब हों वहां पर... एक्जीबीशन के टाइम पर.

प्रसादः हां...

महज 2,500 रुपए जेल के कुछ वार्डनों और बेल्लारी जेल के सुपिरटेंडेंट एसएन हुल्लर को देकर हमें अत्तावर के साथ एक अलग कमरे में मुलाकात करने की छूट मिल जाती है. अत्तावर कहता है कि उसकी जेब बिल्कुल खाली है और वह हमसे कुछ रुपए मांगता है. हम 3,000 रुपए दे देते हैं. इस मुलाकात के बाद अत्तावर अक्सर हमें एसएमएस कर फोन करने के लिए कहता है. हाई ‌सिक्योरिटी जेल में मोबाइल और उसकी कनेक्टिविटी अत्तावर के लिए बहुत आसान चीजें लगती है. बाद में उसके वकील संजय सोलंकी  ने हमें बताया कि इसके लिए जेल के सुपिरटेंडेंट को मोटी घूस दी जाती है.

मुथालिक से मुलाकात के कुछ दिनों बाद ही तहलका ने सेना के बेंगलुरु शहर प्रमुख वसंतकुमार भवानी से संपर्क किया. भवानी सेना का जनसंपर्क अधिकारी भी है. अंग्रेजी और हिंदी में धाराप्रवाह बोलने वाला यह शख्स मंगलौर के पब में हुई घटना के तुरंत बाद ही हरकत में आ गया था और एक के बाद दूसरे टीवी चैनलों के स्टूडियो जाकर सेना की कारगुजारी और उसकी विचारधारा का बचाव कर रहा था. रियल एस्टेट व्यवसायी भवानी पैसे वाला व्यक्ति है और अत्तावर की तरह ही वह भी पैसे के लिए सेना पर निर्भर नहीं है. बंगलुरू में सेना कैडरों की संख्या के बारे में पूछने पर वह कहता है, 'प्रमोद (मुथालिक) भी मुझसे यह सवाल नहीं पूछते. संख्या बतानी जरूरी नहीं. अगर हमारी असली ताकत के बारे में पुलिस को पता चल गया तो मेरे लड़के मुसीबत में पड़ जाएंगे.' (इस साल फरवरी में जब सेना ने वैलेंटाइन डे के विरोध की घोषणा की तो पुलिस ने एहतियाती उपाय के तहत 400 लोगों को गिरफ्तार किया था).

तहलका से मुलाकात के एक पखवाड़े पूर्व ही भवानी ने मुथालिक के अपमान के विरोध में बंेगलुरू में सेना का एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था (उन्हीं की भाषा में जवाब देने वाली एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कर्नाटक यूथ कांग्रेस के सदस्यों ने वैलेंटाइन डे पर आयोजित एक टीवी चर्चा के दौरान मुथालिक के मुंह पर कालिख पोत दी थी. इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे भवानी और तमाम दूसरे सेना कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार किया था).

तहलका से मुलाकात के दौरान बातचीत बेंगलुरू में हमले की संभावनाओं, इसके निष्कर्षों और इसके असर को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के आसपास घूमती रहती है. ये रहे भवानी के सुझावः

" अगर हम एक निश्‍चित रकम पर सहमत हो जाएं तो फिर मैं अपने बॉस, मुथालिक से बात करूंगा. वे ही हमें एक्‍शन के लिए ग्रीन सिग्नल देते हैं. उनके पास स्क्रिप्ट तैयार है. आप अपने ऑफर के बारे में सोचिए " 

वसंत कुमार भवानी, बैंगलुरु में श्री राम सेना  का अध्यक्ष
 

भवानीः
ये रवीन्द्र कलाक्षेत्र मालूम है न आपको.

तहलकाः हां, हां.

भवानीः उसके पीछे एक खुला स्टेज है.

तहलकाः कितना क्राउड आ सकता है उसमें?

भवानीः टू थाउजेंड...

तहलकाः टू थाउजेंड... लेकिन वे कम्यूनल वाइज तो सेंसिटिव है न?

भवानीः कम्यूनल वाइज भी सेंसिटिव है... बोले तो उधर से मार्केट बहुत नजदीक है...

तहलकाः सिटी मार्केट?

भवानीः सिटी मार्केट...

तहलकाः हां फिर तो उधर मुसलिम एरिया है...

भवानीः इसलिए वो जगह बहुत अच्छा है आपके लिए... शिवाजी नगर से वहां बहुत अच्छा स्कोप है क्योंकि वहां भागल में मुसलिम पॉपुलेशन भी बहुत ज्यादा भी है.

तहलकाः हां, सिटी मार्केट में तो है... लेकिन उधर कमर्शियल एरिया ज्यादा पड़ जाता है उधर?

भवानीः आपका जो थिंकिंग है ना उसके लिए सूट हो जाता है उधर...

तहलकाः हमारी जो प्रोफाइल है उसको सूट करता है.

भवानीः उसको सूट करता है... शिवाजी नगर से ज्यादा सूट है... शिवाजी नगर एक रिमोट एरिया हो गया ये फ्लोटिंग ज्यादा है.

तहलकाः शिवाजी नगर किया तो वहां पर ये लगेगा वहां पर एजूकेटिड क्लास नहीं है तो वहां क्यूं कर रहा है... सिटी मार्केट किया तो...

भवानीः आपके आइडिया के लिए और इस कॉन्सेप्ट के लिए ये मैच हो रहा है... क्योंकि इलिटरेट आके आपका गैलरी तो देखने वाला नहीं है... देखेगा तो ये आपका... अपर क्लास... मिडिल क्लास.

तहलकाः एलीट क्लास...

भवानीः अपर क्लास ही ज्यादा देखेगा...तो अपर क्लास... आप शिवाजी नगर में रखेंगे तो कौन आएगा... ये प्रि-प्लांड लगेगा सबको...

तहलकाः हम्म...

भवानीः अगर शिवाजी नगर किया तो... हां ये अगर एक डाइरेक्शन से सोचेंगे तो सही बात ही... लेकिन उसको ज्यादा हवा नहीं मिलेगा...

तहलकाः हां लोगों को कहीं लग सकता है... कहीं अंडर टेबल एलाइंस है...

भवानीः लग सकता है...

घटनास्थल को लेकर सहमति बन जाने के बाद तारीख को लेकर चर्चा होती है. अपने फोन पर कैलेंडर की तारीखें दिखाते हुए भवानी हमसे सुविधाजनक तारीख के बारे में पूछता है. सप्ताह के कामकाजी दिन या फिर हफ्ते के आखिर में? उसकी राय है कि दूसरा विकल्प ठीक रहेगा क्योंकि उस समय ज्यादा लोग कला प्रदर्शनियां देखने जाते हैं. स्थान और तारीख के बाद वह विरोध की योजना पर आ जाता है. जब हम पूछते हैं कि अगर प्रदर्शनी का उद्घाटन मुसलिम समुदाय के किसी नेता से करवाने पर हमले का असर और भी बढ़ जाएगा तो भवानी न सिर्फ रजामंदी जताता है बल्कि कुछ सुझाव भी दे देता है.

तहलकाः इस प्रोग्राम में, वसंत जी, मुझे पब्लिक बीटिंग जरूर चाहिए... क्योंकि आपका जो ट्रेडमार्क है और मैं चाह रहा इसके अंदर किसी मुसलिम लीडर को बुलाना इनेगुरेशन के लिए... तो मुसलिम कम्युनिटी कुछ न कुछ तो रहेगी... प्रोफेसर हुजरा हैं यहां आईआईएम के अंदर...

भवानीः मुमताज अली को ही बुलाइए न...

तहलकाः किसको...

भवानीः मुमताज अली खान...

तहलकाः ये कौन हैं...

भवानीः वक्फ बोर्ड का मिनिस्टर है न... अभी

तहलकाः कर्नाटक से?

भवानीः हां.

तहलकाः आ जाएगा वो तो... कितना एज होगा मुमताज अली का?

भवानीः फिफ्टी के ऊपर हैं...

तहलकाः फिफ्टी प्लस... ये एमएलसी हैं या एमएलए हैं?

भवानीः एमएलसी होके... बैक डोर एंट्री है... मिनिस्टर हैं वो... हज कमिटी और वक्फ बोर्ड...

तहलकाः उसके अलावा एक और था ना जो बाद में रेल मंत्रा भी बना...

भवानीः सीके जाफर...

तहलकाः जाफर शरीफ...

भवानीः वो उमर हो गया उसके तो...

भवानी कुछ और जरूरी तैयारियों का भी सुझाव देता है मसलन घटनास्थल पर एंबुलेंस-

भवानीः जैसे आप हुसेन का ही नाम रख लेंगे तो अच्छा है... उसे एक दम पॉप्युलर...

तहलकाः नहीं अगर हुसेन का रख दिया तो उससे मेरे को 'माइलेज' नहीं मिलेगा हुसेन साहब को 'माइलेज' मिल जाएगा...

भवानीः उसको माइलेज जाएगा...मैं इसका एश्योरेंस नहीं दे सकता... आपका डेमेज कितना होगा... डेमेज तो होगा... लेकिन कितना होगा ये गारंटी नहीं ले सकता... क्योंकि हमारे लड़के बहुत फेरोशियस लड़के हैं... वो आगे-पीछे नहीं देखते...

तहलकाः एक बार किया तो किया...

भवानीः किया...मैं उनको अवॉइड भी नहीं कर सकता क्योंकि मेरे ऊपर भड़क जाएंगे...जब नेता ही फेरोशस है तो उनके फॉलोअर्स भी फेरोशस होंगे...इतना तो मैं आपको बोलना चाहता हूं...डैमेज तो होगा लेकिन कितना ये बोल नहीं सकता हूं

तहलकाः पब्लिक बीटिंग्स हो सकती हैं

भवानीः हो सकती हैं...उधर आके जो भी आके उनको...क्योंकि ये सब भी कर देते हैं हमारे लड़के

तहलकाः भीड़ वगैरह आई तो फिर कंट्रोल नहीं होता है...

भवानीः कंट्रोल नहीं होता है...

तहलकाः एंबुलेंस तैयार रखना पड़ेगा ?

भवानीः बिलकुल... वो भी हो सकता है... वो फिर मेरे लोग हैं... जब लेते हैं न कुछ... तो... फिर उनको समझाना पड़ता है... बोलना पड़ता है... केस ज्यादा हो जाएगा... पहले से ज्यादा केस हैं... कंट्रोल करो सिर्फ जो ये डिस्पले है उसको थोड़ा ये...

तहलकाः डेमेज करो...

भवानीः इतना तो मैं समझा दूंगा लेकिन... बोल नहीं सकता न... ऐसे सिरफिरे लोग हैं...

तहलकाः मतलब एंबुलेंस पहले से तैयार रखना पड़ेगा... माइंड में रखकर चलें...

दंगों और तोड़फोड़ के लिए सेना की तैयारियों के और भी सबूत हैं. हमले के बाद की स्थितियों पर बातचीत के दौरान जब हम उनके सामने प्रस्ताव रखते हैं कि हम सेना के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेंगे तो भवानी तत्काल इस सुझाव को खारिज कर देता है. 'अगर हमलावरों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवाए जाएंगे तो लोगों के मन में शंका होगी कि हमला पूर्व नियोजित था.' वह कहता है कि उन्हें कोर्ट-कचहरी से कोई फर्क नहीं पड़ता और हमें उनसे कैसे निपटना है, इसके निर्देश हमें मिल जाएंगे.

तहलकाः हमारी तरफ से गैलरी वाले प्रोग्राम के अंदर... आर्ट गैलरी में हम लोगों को कोई केस नहीं करना है... जब कोई राइवल पार्टी ही नहीं है...

वसंतः आपको केस करना पड़ेगा...

(इस बातचीत के बाद अत्तावर की चर्चा के दौरान एक नया सुझाव सामने आता है)

तहलकाः तो केस डालें.

वसंतः डालना पड़ेगा... अगर आप लोग गलती करेंगे तो केस करना पड़ेगा ना हमको.

तहलकाः आपको नहीं लगता कि इसमें मुश्किलें आएंगी?

वसंतः दिक्कत होगी तभी तो परपस पूरा होगा... पानी में उतर गया तो...

तहलकाः ठीक है आप जैसा आदेश करते हैं... लेकिन लगातार डेट पर आना कोर्ट में खड़ा होना... ये शायद किसी भी आदमी के लिए थ्री थाउजेंट किमी से आना टेक्नीकली शायद बहुत-बहुत मुश्किल होगा...

वसंतः उसके लिए रास्ता हम दे देगें न... एक बार आपका ये सक्सेस होने के बाद बैठ के मैं समझा दूंगा... क्या करना है कैसा करना है...

तहलकाः कोई भी लोकल वकील सेट कर दिया वो डेट एक्सटेंड... होती रहेगी...

वसंतः मैं बोल दूंगा आपको... समझा दूंगा... समझा दूंगा कैसा करना है क्या करना है...

तहलकाः ठीक है...

वसंतः लेकिन आप मेंटली प्रिपेयर रहना...

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आज नकद कल फसाद-2

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कुछ ही मिनट बाद भवानी तहलका से पैसों की बातचीत करने लगता है. 'मुझे एक आंकड़ा बताओ ताकि मैं सर (मुथालिक) से बात कर सकूं,' भवानी कहता है. हम एक कागज पर 70 लाख लिखकर भवानी की तरफ बढ़ाते हैं. अगली प्रतिक्रिया में वह पूछता है कि अत्तावर (सेना का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष) को कितनी पेशकश की गई थी.

जब उसे बताया जाता है कि अत्तावर को भी इतनी ही पेशकश की गई थी तो भवानी यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा देता है, 'अतावर इतने पर कभी राजी नहीं होगा.' वह कहता है कि पुलिस को निपटाने के लिए हमें कुछ और पैसों का अलग से इंतजाम करके रखना चाहिए.
तहलकाः उन्होंने मुझे दो लाइन बोला था... संगठन के लिए अलग... कार्यकर्ता के लिए अलग... तो मैंने संगठन के लिए 5 लाख कहा... तो बोले देखेंगे... कार्यकर्ताओं के लेवल पे ये तो जायेगा कि केस वगैरह पड़ गया तो ठीक है... कार्यकर्ताओं के लिए 50 हजार... कुछ उसको मिल जाएगा कुछ उसकेे केस में यूज हो जाएगा... दस लड़का आ गया तो 5 लाख... उन्होंने मुझे बोला यूं... संगठन का आप क्या करते हो वो मुथालिक जी के साथ है... और लड़का... वो मैं आपको खुद दूंगा... पुलिस का जो सेटिंग है... वो भी करके दूंगा... कि वो भी करना पड़ेगा.

भवानीः पुलिस का सेटिंग भी करना पड़ेगा... बिना उसका तो नहीं होगा...

तहलकाः नहीं... होगा... तो वहां पर 3 फेज में जा रहा है..थ्री डाइमेंशनल.. संगठन का अलग... कार्यकर्ताओं का अलग...और पुलिस का अलग...

भवानीः पुलिस का अलग...

इसके बाद इस पर चर्चा होती है कि लेन-देन कैसे होगा. हम पूछते हैं कि क्या दंगों के लिए दी जाने वाली राशि नगद की बजाय चेक से दी जा सकती है. भवानी फौरन मना कर देता है. स्वाभाविक है कि दंगे के कारोबार में लेन-देन कानूनी तरीकों से नहीं हो सकता.
तहलका के प्रस्ताव पर श्री राम सेना के कार्यकर्ताओं का रवैया जितना सुनियोजित था उसे देखते हुए इस बात की संभावना बनती है कि संगठन पूर्व में भी इस तरह की गतिविधि में शामिल रहा है. इसमें कानून और पुलिस से निपटने और हिंसक गतिविधियों के बाद कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बच नकलने की सेना की कुशलता भी जाहिर होती है.

उडुपी और मंगलौर में सेना के कार्यकर्ताओं से बातचीत में यह बात और मजबूती से सामने आई. काफी कोशिशों के बाद अत्तावर और जीतेश (सेना की उडुपी इकाई का प्रमुख) हमें उन कार्यकर्ताओं से मिलवाने के लिए तैयार हो गए जिन्हें हमले को अंजाम देना था. कुमार और सुधीर पुजारी नाम के ऐसे दो युवा कार्यकर्ता खुलेआम इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि वे मंगलौर के पब सहित सेना के कई हिंसक प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं. जीतेश, पुजारी और कुमार, तीनों पब हमले में शामिल होने के बावजूद पुलिस की गिरफ्त से बचने में कामयाब रहे. ये तीनों कई साल तक आरएसएस और बजरंग दल में भी रह चुके हैं.

कुछ मिनट की बातचीत के बाद वे बड़बोलेपन में बताते हैं कि किस तरह से उन्होंने पुलिस को चकमा दिया. कुमार एक और घटना के बारे में बताता है जिसमें आठ मुसलमान घायल हुए थे. वह कहता है, 'हमारे हमले के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था.' जीतेश के पास इस तरह की तमाम कहानियां हैं. एक दिन पूर्व तहलका से मुलाकात में उसने हमें बताया था कि 2007 में उसने अपने दो साथियों के साथ मिलकर एक चर्च पर हमला किया था. उसके मुताबिक तीन या चार पादरियों को अस्पताल ले जाना पड़ा था जबकि जीतेश और उसके साथियों को जेल की हवा खानी पड़ी थी.

फिर जीतेश इससे भी ज्यादा वीभत्स एक दूसरी घटना का जिक्र करता है. वह उस वक्त केरल के कासरगोड़ में रहता था और बजरंग दल का सक्रिय कार्यकर्ता था. वह एक मस्जिद पर हुए हमले में शामिल था. वह बताता है कि किस तरह से उसने एक मौलवी पर तलवार से हमला किया था. मौलवी की मौत हो गई थी और जीतेश पर हत्या का आरोप लगा था. वह कहता है कि चार महीने जेल में रहने के बाद उसे जमानत मिल गई. उसके मुताबिक इस दौरान बजरंग दल ने उसकी काफी मदद की- वकील नियुक्त करने से लेकर जमानत के आवेदन तक. जेल से छूटने के बाद वह उडुपी आ गया. कुछ साल बाद जब मुथालिक ने श्री राम सेना बनाई तो वह उसमें शामिल हो गया.
हमारे साथ थोड़ा और सहज होने के बाद जीतेश ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी. 2006 में उसने 100 दूसरे कार्यकर्ताओं के साथ एक हथियार प्रशिक्षण कैंप में हिस्सा लिया था जिसे श्री राम सेना ने आयोजित किया था. जिन हथियारों का इस्तेमाल उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान किया था उनमें ज्यादातर गैरलाइसेंसी थे. इससे ज्यादा जानकारी देने के लिए वह तैयार नहीं था. एक दिन बाद अत्तावर से मुलाकात के दौरान वह हमारे साथ था और मंगलौर में प्रस्तावित हमले की  योजना में शामिल होने की तैयारी कर रहा था.

अत्तावर और भवानी से मुलाकात के बाद- जिसमें वे बैंगलुरु, मंगलौर या मैसूर में हमला करने के लिए राजी थे- तहलका एक बार फिर से मुथालिक से मिला. एक चीज जो अभी भी तय करनी रह गई थी वह थी पैसे का आंकड़ा. मंगलौर जेल में अत्तावर से मुलाकात के दौरान रकम 50 से 60 लाख रुपए के बीच थी जबकि भवानी से 70 लाख पर सौदेबाजी हुई. तहलका ने मुथालिक से पूछा कि क्या यह रकम काफी है.

तहलकाः सर, क्या ये ठीक होगा कि मैं फोन पर प्रसाद जी के संपर्क मंे रहूं? क्योंकि फोन पर बात करने से परहेज करता हूं

मुथालिकः हां...हां...

तहलकाः प्रसाद जी तो ठीक है...लेकिन एक बार मैं आपसे कनफर्म करना चाहता था, हो सकता हैै शर्मा जी को यह ठीक न लगे लेकिन मैं पैसे के बारे में साफ बात करना चाहता हूं...क्याेंकि मुझसे तीन जगहों के लिए 60 लाख रुपए की बात कही गई थी

मुथालिकः हां

तहलकाः 60 लाख रुपए...आपकी तरफ से यह है ना?

मुथालिकः इस बारे में आपसे किसने कहा?

तहलकाः वसंत जी ने कहा था...

मुथालिकः हां...हां...

तहलकाः इसलिए मैंने सोचा कि एक बार और कनफर्म कर लूं...

मुथालिकः हां...हां...मैं पैसे के बारे में नहीं बता सकता...यह उनका काम है ये वही कर सकते है.

इस खबर के प्रेस में जाने तक अत्तावर और उसके वकील संजय सोलंकी हमले की रूपरेखा और रकम तय करने के लिए तहलका के संपर्क में थे. सोलंकी ने तहलका को आश्वासन दिया कि सौदा पक्का करने और रकम का आंकड़ा तय करने के लिए अत्तावर के साथ हमारी बातचीत बहुत जल्दी संभव होगी.
मगर हमें इसकी जरूरत नहीं थी.

(के आशीष के सहयोग के साथ)

झूठे सपनों का सौदागर

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भारत में हजारों करोड़ रुपए के गैरकानूनी लॉटरी व्यवसाय के बारे में तो बहुत से लोग जानते हैं लेकिन इसे चलाता कौन है यह कम ही लोगों को मालूम होगा. सैंटियागो मार्टिन नाम के इस शख्स और उसके अवैध कारोबार की पड़ताल कर रहे हैं शांतनु गुहा रेइस धंधे से जुड़े लोगों का मानना है कि अवैध लॉटरी कारोबार चलाना इस कारोबार को कानूनी तरीके से चलाने की तुलना में ज्यादा आसान है. प्रवर्तन निदेशालय की शाखा फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू) के वरिष्ठ अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि लॉटरी टिकटों की अवैध बिक्री से मिले पैसे को हवाला के जरिए दूसरे देशों में भेज दिया जाता है 

देर रात का वक्त है. बाकी दुनिया भले ही गहरी नींद की गिरफ्त में हो मगर कोलकाता की कूरियर कंपनियों के लिए ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों को दो पल की भी फुर्सत नहीं. तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के गुमनाम-से कस्बों के रेलवे प्लेटफॉर्मों पर खड़े ये लोग कई थैलों को जल्दी-जल्दी ट्रेन के डिब्बों से बाहर खींचने में व्यस्त हैं. जूट के इन थैलों में कोई मामूली चीज नहीं. इनमें भरी हैं आम आदमी को तुरत-फुरत बड़ा आदमी बनाने के सपने दिखाने वाली कागज की लाखों पर्चियां, यानी करोड़ों रुपए कीमत के लॉटरी टिकट. जल्दी ही प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहे लड़कों के झुंड इन थैलों से टिकटों के बंडल निकालकर आपस में बांट लेते हैं. इसके बाद साइकिलों पर सवार होकर वे इन बंडलों को सुबह होते-होते उन जगहों तक पहुंचा देते हैं जहां अपनी किस्मत बदलने की उम्मीद लगाए लोग इनका इंतजार कर रहे हैं. इसके साथ ही करोड़ों रुपए के अवैध लॉटरी टिकटों की बिक्री का धंधा शुरू हो जाता है.

और यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं है. ऐसा रोज होता है. देश में 12 राज्यों और पांच केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर बाकी जगहों पर लॉटरी कारोबार प्रतिबंधित है. लेकिन रोक के बावजूद इन जगहों पर लॉटरी टिकटों की अवैध बिक्री धड़ल्ले से होती है. यहां इन्हें चाय की गुमटियों, पान-सिगरेट की दुकानों और अखबारों के वेंडरों से खरीदा जा सकता है.  दिलचस्प है कि भारत में हर साल लॉटरी टिकट खरीदने के लिए औसतन जो 13,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं उनका 60 फीसदी हिस्सा यानी करीब 7,200 करोड़ रुपया इसी तरह की अवैध बिक्री से आता है.

हजारों करोड़ रुपए के इस अवैध लेकिन संगठित कारोबार के बारे में सबसे पहला और स्वाभाविक सवाल यही उठता है कि आखिर इसके पीछे है कौन? लोगों को बड़ा आदमी बनने के झूठे सपने दिखाने वाले इस सौदागर का नाम है सैंटियागो मार्टिन. 42 साल के इस म्यांमार निवासी का लॉटरी से उतना ही पुराना रिश्ता है जितनी उसकी उम्र. रंगून में जिस दिन मार्टिन का जन्म हुआ, उसी दिन उसके मां-बाप की एक हजार डॉलर की लॉटरी लगी थी. मार्टिन के साथ अरुणाचल प्रदेश में काम कर चुके टी अरुमयागम इस बारे में कहते हैं, 'यह इस बात का सबूत था कि वह अपने मां-बाप के लिए भाग्यशाली है.' फिलहाल कोयंबटूर मे रह रहे अरुमयागम आगे बताते हैं, 'मार्टिन आज का रॉबिन हुड है. सिर्फ इन तीन राज्यों (तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक) में जहां लॉटरी प्रतिबंधित है उन्होंने दो हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है.' कोयंबटूर में उनके टी स्टाल को मार्टिन के आदमी अकसर इस तरह के अवैध लॉटरी टिकट बेचने के लिए इस्तेमाल करते हैं. जब हम अरुमयागम से कहते हैं कि यह गैरकानूनी है? तो वे कहते हैं, 'वे दुकान के नजदीक टिकट बेचते हैं, दुकान के भीतर नहीं.'

अरुमयागम का जवाब बताता है कि वे खुद को सुरक्षित मानते हैं. ऐसा ही कुछ 7,200 करोड़ रुपए के अवैध लॉटरी रैकेट के बारे में भी माना जाता है. दरअसल, इस धंधे से जुड़े लोगों का मानना है कि अवैध लॉटरी कारोबार चलाना इस कारोबार को कानूनी तरीके से चलाने की तुलना में ज्यादा आसान है. प्रवर्तन निदेशालय की शाखा फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू) के वरिष्ठ अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि लॉटरी टिकटों की अवैध बिक्री से मिले पैसे को हवाला के जरिए दूसरे देशों में भेज दिया जाता है. विडंबना देखिए कि किसी जमाने में लॉटरी का अवैध कारोबार 'सिर्फ' 300 करोड़ रुपए का ही था. मगर जसे-जसे कई राज्य इसपर रोक लगाते गए यह आंकड़ा भी तेजी से बढ़ता गया. यानी लोगों से लॉटरी की लत छुड़ाने के मकसद से लगाई गई रोक का कोई फायदा नहीं हुआ.

एफआईयू अधिकारियों के मुताबिक मार्टिन के अवैध कारोबार से जुड़ा एक और पहलू यह है कि साप्ताहिक टिकट पर पैसा जीतने वालों की रकम का एक बड़ा हिस्सा वह खुद हड़प लेता है. पहले विजेताओं को जीत की रकम का 75 फीसदी हिस्सा मिलता था, मगर अब यह आंकड़ा 55 फीसदी हो गया है. लेकिन मार्टिन के माफिया से संबंधों के चलते कोई विजेता इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाता है. सूत्रों का कहना है कि मार्टिन की अगली योजना अब अमेरिकी पासपोर्ट लेने और देश छोड़कर वहां बसने की है.

पहले विजेताओं को जीत की रकम का 75 फीसदी हिस्सा मिलता था, मगर अब यह आंकड़ा 55 फीसदी हो गया है. लेकिन मार्टिन के माफिया से संबंधों के चलते कोई विजेता इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा पाता हैलॉटरी कारोबार के इस बादशाह के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि उसे देखने का दावा कोई नहीं करता. हालांकि कहा जाता है कि एक बार चेन्नई के गोल्फकोर्स में टहलते हुए उसकी फोटो खींची गई थी. उस समय वह अपने साथी सुरेश के साथ था. सुरेश के बारे में कहा जाता है कि वह मार्टिन के पैसे का लेन-देन देखता है. मार्टिन ने लॉटरी के अवैध कारोबार की शुरुआत म्यांमार से की थी. वह अपने भाई के साथ रंगून और उसके आसपास के इलाकों में दो अंकों वाले लॉटरी टिकट बेचा करता था. यहां उसके ग्राहक इन दो अंकों को किस्मत पलटने की शुरुआत मानकर छोटे-छोटे दांव खेला करते थे. 1980 के दशक में म्यांमार में अवैध लॉटरी राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया. नतीजतन दोनों भाईयों को देश छोड़ना पड़ा. इसके बाद मार्टिन अपने परिवार के साथ स्थायी रूप से भारत आ गया. उसने अरुणाचल प्रदेश से अपना लॉटरी कारोबार फिर शुरू किया. यहां मार्टिन ने धीरे-धीरे पुलिस और आयकर विभाग में निचले और मध्य स्तर के अधिकारियों में पैठ बनानी शुरू की.

सरकारी अधिकारियों से अपने संबंधों के दम पर मार्टिन ने जल्दी ही सातों उत्तर-पूर्वी राज्यों में अपना कारोबार फैला लिया. भारत में पंजाब, केरल, सिक्किम और महाराष्ट्र की तरह इन राज्यों में भी लॉटरी वैध है. इसके बाद मार्टिन किन्हीं अज्ञात वजहों से कोयंबटूर आ गया. तमिलनाडु पुलिस के मुताबिक उसने यहां अपने जीजा और सबसे भरोसेमंद साथी जॉन ब्रिट्टो के साथ मिलकर काम शुरू किया. ब्रिट्टो मार्टिन के लिए बेहद काम का आदमी साबित हुआ. उसने लॉटरी से मिले अवैध पैसे को हवाला के जरिए विदेशी बाजार में निवेश करना शुरू कर दिया. मार्टिन का अवैध कारोबार इस समय बेरोक-टोक चल रहा था. लेकिन लॉटरी का यह सम्राट अपनी छवि को बदलना चाहता था. पहचान और सम्मान पाने के लिए मार्टिन ने अब तमिलनाडु और पड़ोसी राज्यों की राजनीतिक पार्टियों से मेल-जोल शुरू कर दिया. मगर 2005 में सीपीएम के एक अखबार देशाभिमानी के बारे में जब एक दूसरे अखबार ने दावा किया कि मार्टिन ने इसे दो करोड़ रुपए दिए हैं और इससे विवाद खड़ा होने लगा तो उसके बाद से मार्टिन लगभग अज्ञातवास में चला गया.

वैसे यह पहली घटना नहीं थी जब ऐसी कोशिशों पर मार्टिन को अपने कदम वापस खींचने पड़े हों. इससे पहले उसने जब दक्षिण भारत में संगीत के लोकप्रिय टीवी चैनल एसएस म्यूजिक को खरीदा था तब भी अखबारों में उसकी पृष्ठभूमि से जुड़ी कई खबरें आई थीं. इनमें कहा गया था कि तमिलनाडु में अवैध लॉटरी टिकट बिक्री के मामले में सीआईडी और चेन्नई अपराध शाखा ने मार्टिन से गहन पूछताछ की है. इस मामले में चेन्नई में एक एफआईआर भी दर्ज की गई थी जो बताती है कि मार्टिन और उसके साथियों ने सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया था. इस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने चेन्नई पुलिस से मार्टिन और उनके सहयोगियों पर कार्रवाई करने को कहा था.

लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था. दरअसल, तब तक मार्टिन कुछ राजनीतिक पार्टियों में शीर्ष स्तर के लोगों से संपर्क बना चुका था. आखिरकार वह मद्रास उच्च न्यायालय से 25 लाख रुपए के मुचलके पर जमानत हासिल करने में कामयाब रहा. सार्वजनिक पहचान पाने की दिशा में मार्टिन की कोशिशें भले ही विफल रही हों मगर राजनीतिक गलियारों में उसके संपर्क कायम हो चुके हैं. पिछले दिसंबर वह चेन्नई में आयोजित एक बैठक में हिस्सा लेने आया हुआ था. यह बैठक सत्ताधारी डीमके ने बुलाई थी जो चाहती थी कि इस साल अगस्त में होने वाली वर्ल्ड तमिल कॉन्फ्रेंस की स्वागत कमेटी में मार्टिन भी हो. तहलका से बातचीत में डीएमके के एक वरिष्ठ नेता का कहना था, 'दक्षिण भारत के राजनीतिक गलियारों में स्वीकार्यता पाने की यह एक और कोशिश थी, वैसे नई दिल्ली स्थित एक प्रभावशाली कांग्रेस नेता से भी मार्टिन के सीधे संबंध हैं.' दिलचस्प तथ्य यह भी है कि मार्टिन ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ लॉटरी ट्रेड एंड अलाइड इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण सदस्य है. यह संस्था फिक्की से संबद्ध है.

'लॉटरी टिकट कहां और कैसे पहुंचते हैं यह पता लगाना बेहद मुश्किल काम है, हमारे पास इस बात के रिकॉर्ड हैं कि टिकट फर्जी लोगों को फर्जी पतों पर भेजे जाते हैं. जब तमिलनाडु और कर्नाटक में लॉटरी वैध थी तब मार्टिन यहां लॉटरी का सबसे बड़ा कारोबारी था. बाद में जब लॉटरी पर रोक लगी तो वह अवैध रूप से काम करने लगा'

कई लोगों का मानना है कि मार्टिन की ये कोशिशें उन मुसीबतों से बचने की जुगत हैं जिनका उसे कदम-कदम पर सामना करना पड़ता है. लेकिन जैसा कि हर अवैध कारोबार से जुड़े व्यक्ति के संबंध में होता है, मार्टिन के वकील श्री रामालू अपने मुवक्किल को ऐसा निर्दोष व्यक्ति बताते हैं जो लोगों की भलाई के लिए पैसा खर्च करता है. रामालू कहते हैं कि मार्टिन का काम तो बस दूसरे राज्यों के एजेंटों को लॉटरी टिकट बेचना है और यह पूरी तरह से कानूनी तरीके से होता है.

मार्टिन का अवैध लॉटरी कारोबार जिस चतुराई से संचालित होता है वह किसी को भी हैरत में डाल सकती है. ईटानगर में यह बियानी ट्रेडर्स के नाम से चलता है. इस नाम की वजह से कई लोग मजाक में यह भी कहते हैं कि यदि मार्टिन रिटेल कारोबार के क्षेत्र में काम करता तो वह जाने-माने रिटेलर किशोर बियानी (बिग बाजार, पैंटालून और मेगामार्ट के संचालक) को कब का पीछे छोड़ देता. बियानी ट्रेडर्स के पास उन राज्यों के लिए लॉटरी टिकट छापने का लाइसेंस है जहां पर ये वैध हैं. अवैध लॉटरी का कारोबार यहीं से शुरू होता है. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि बियानी ट्रेडर्स इस लाइसेंस की आड़ में उन राज्यों के लिए लॉटरी टिकट छापता है जहां ये अवैध हैं. ये टिकटें हैदराबाद (श्रीनिधी सिक्योरिटी प्रिंटर्स और केएल हाई टेक सिक्योर प्रिंटर्स), पटाखों के लिए मशहूर शिवकाशी (महालक्ष्मी प्रिंटर्स), बेंगलुरु (साई सिक्योरिटी प्रिंटर्स), चेन्नई (वराम पिंट्रर्स) और दिल्ली (साई सिक्योरिटी प्रिंटर्स और न्यू टेक प्रिंटर्स) में छापे जाते हैं. इसके बाद टिकट कूरियर से कोलकाता भेजे जाते हैं जहां लॉटरी वैध है. लेकिन इनका एक छोटा सा हिस्सा ही अधिकारियों और एजेंटों को मिलता है. ज्यादातर टिकट उन राज्यों में भेज दिए जाते हैं जहां लॉटरी पर रोक है.

इस बारे में बात करते हुए नई दिल्ली अपराध शाखा के एक वरिष्ठ अधिकारी अशोक के. सिंह कहते हैं, 'लॉटरी टिकट कहां और कैसे पहुंचते हैं यह पता लगाना बेहद मुश्किल काम है, हमारे पास इस बात के रिकॉर्ड हैं कि टिकट फर्जी लोगों को फर्जी पतों पर भेजे जाते हैं. जब तमिलनाडु और कर्नाटक में लॉटरी वैध थी तब मार्टिन यहां लॉटरी का सबसे बड़ा कारोबारी था. बाद में जब लॉटरी पर रोक लगी तो वह अवैध रूप से काम करने लगा.'

अवैध लॉटरी कारोबार से जुड़े स्याह पहलू और भी हैं. जिसे लत होती है वह लॉटरी का टिकट किसी भी तरह खरीदना चाहता है. इसलिए 1, 2, 10 या 25 रुपए के टिकट 10 से 15 गुने दाम पर बेचे जाते हैं. इसके बाद यदि कोई इनाम जीत भी जाए तो उसे पूरी रकम कभी नहीं मिलती. अभी तक कई लोग इन टिकटों के चक्कर में बर्बाद हो चुके हैं. ऐसे ही लोगों के लिए कर्नाटक में स्वयं सहायता समूह चलाने वाले आर अशोकन कहते हैं, 'फिर भी लोग टिकट खरीदते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे बड़ी रकम जीतेंगे और फिर उनकी सारी मुसीबतें पलभर में गायब हो जाएंगी.' अशोकन आगे बताते हैं कि बड़ी रकम जीतने वालों को मार्टिन और उसके आदमी पुलिस वालों की मिली भगत से अकसर बेवकूफ बना देते हैं.

पं बंगाल, जहां मार्टिन का रैकेट सबसे मजबूत है, में पुलिस उसके कारोबार को लेकर हाल ही में सतर्क हुई है. पिछले दिनों आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के कुछ अधिकारियों ने राज्य भर में मार्टिन के कार्यालयों पर छापे मारे थे. लेकिन छापों में क्या मिला अभी तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. कोलकाता में हमसे बात करते हुए एक वरिष्ठ आयकर अधिकारी बस इतना ही कहते हैं, 'हम अभी ज्यादा जानकारी नहीं दे सकते.' कहा जाता है कि 2007 में जब प. बंगाल पुलिस मार्टिन के रैकेट की कड़ी निगरानी करने लगी तो वह सिलीगुड़ी के रास्ते भूटान भाग गया था. हालांकि इस दौरान मार्टिन कोलकाता आता-जाता रहा. पं बंगाल सीआईडी के अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं  कि 2008  में वह कोलकाता के ईडन गार्डंस में आयोजित एक आईपीएल मैच देखने आया था. इस बारे में बात करते हुए नाम न छापने की शर्त पर सीआईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'उसका एक और मुखौटा है : लॉटरी कंपनियों का प्रतिनिधि, वह कानून से बचने के लिए अकसर इस पहचान का इस्तेमाल करता है.'

एफआईयू अधिकारियों के मुताबिक मार्टिन हर दिन तकरीबन 1.45 करोड़ टिकट बेचता है. वह 28 सिक्किम, 17 तमिलनाडु और 6 अरुणाचल लॉटरियों का डिस्ट्रीब्यूटर है. प. बंगाल और पूवरेत्तर राज्यों में मार्टिन सबसे ज्यादा सक्रिय है. हाल ही में भूटान ने भारत में अपनी बंपर लॉटरी बेचने के लिए मार्टिन लॉटरी एजेंसी लिमिटेड को सब-डिस्ट्रीब्यूटर बनाया है. अवैध लॉटरी के बढ़ते कारोबार की शिकायतें मिलने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में प. बंगाल सरकार को आदेश दिया था कि छपाई से लेकर वैध गंतव्य तक पहुंचने तक लॉटरी टिकटों की कड़ी निगरानी की जाए. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जिन राज्यों में लॉटरी वैध है वहां बिना बिकी टिकटों का हिसाब रखा जाए. भारत में लॉटरी नियमों के मुताबिक बिना बिकी टिकटों पर इनाम निकालना अवैध है और हर बार ड्रॉ निकलने के पहले एजेंटों का ये टिकटें जमा करना अनिवार्य है. हालांकि होता इसका उलटा है, बिना बिके टिकट कभी वापस नहीं होते और इनाम अकसर इन्हीं टिकटों पर निकलते हैं. जिसका मतलब है इनाम मार्टिन और उसके साथियों के पास जमा टिकटों पर मिलता है. प. बंगाल सीआईडी के डीआईजी और स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल अनुज शर्मा कहते हैं, 'हमें तकरीबन हर दिन ऐसी शिकायतें मिलती हैं कि इनाम का नंबर बिना बिकी टिकटों में निकला. इसके अलावा जाली टिकटों के मामले भी होते हैं: जब लॉटरी विजेता इनाम लेने जाता है तो उसे पता चलता है उसका इनाम कोई और लेकर चला गया.' शर्मा कहते हैं कि विजेताओं को पूरा पैसा न मिलने की खबरें मिलती रहती हैं मगर कोई भी मार्टिन और उसके गुर्गो के डर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराता.'

मार्टिन की गतिविधियों से परेशान प. बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने हाल ही में एक राज्य कैबिनेट को बताया था कि कैसे इन रैकेटों की वजह से सरकार द्वारा चलाई जा रही लॉटरियों को चपत लग रही है. दासगुप्ता कहते हैं, 'हमने सतर्कता आयोग से इस मामले में रिपोर्ट मांगी है.'  वैसे भारत में लॉटरियों में धोखाधड़ी के आरोप कोई नई बात नहीं हैं. पिछले साल अरुणाचल प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री गेगोंग अपांग पर स्वतंत्रता दिवस को हुए लॉटरी ड्रॉ में हेराफेरी के आरोप लगने के बाद राज्य में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे.

अब सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? सबूतों की बात करें तो कम से कम कागजों पर तो मार्टिन के खिलाफ ढेरों सबूत हैं. उसके खिलाफ लॉटरी टिकटों की अवैध बिक्री, कर चोरी और हवाला से जुड़े 61 मामले हैं. इसके बावजूद वह आज भी कानून के घेरे से बाहर है. असम से कांग्रेसी सांसद और लॉटरी कारोबार के एक और दिग्गज मणि कुमार सुब्बा से मार्टिन के संबंध जग जाहिर हैं. हालांकि मार्टिन के सहयोगियों का दावा है कि इस कारोबार में वह सुब्बा से मीलों आगे है. वैसे सुब्बा की फर्म एमएस असोसिएट्स पर भी गैरकानूनी गतिविधियों के आरोप हैं. भारतीय महालेखा परीक्षक और नियंत्रक का एमएस असोसिएट्स पर आरोप है कि वह 25 हजार करोड़ के मेघालय लॉटरी घोटाले और नागालैंड लॉटरी घोटाले जिसमें विजेताओं को मिलने वाली पांच हजार करोड़ की रकम गायब कर दी गई थी, में शामिल है. अनुज शर्मा कहते हैं, 'मार्टिन भी इसी तरह काम करता है, लेकिन सुब्बा के उलट उसका कारोबार पूरे देश में है.'

यह अवैध कारोबार अब दूसरे राज्यों की पुलिस की नजरों में भी आ रहा है. पिछले महीने पंजाब में अपराध जांच एजेंसी (सीआईए) ने पंजाब लॉटरी की बजाय अवैध लॉटरी टिकटें बेचने वाली दो दुकानों पर छापे मारे थे.  अवैध लॉटरी टिकटों की बिक्री हो रही थी. इनपर पं बंगाल का पता छपा था. अखबार द ट्रिब्यून से बात करते हुए मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर का कहना था, 'वे गैरकानूनी टिकट बेच रहे थे. सरकारी खजाने को हर महीने लाखों का चूना लग रहा था. छापे पड़ने के बाद वैध लॉटरी की बिक्री बढ़ गई. 2008 में जहां हर महीने 8.9 करोड़ रुपए के टिकट बिक रहे थे वहीं 2009 में यह आंकड़ा 23 करोड़ को पार कर गया.' भाजपा महासचिव और दिल्ली में 'सिंगल डिजिट लॉटरी' पर प्रतिबंध लगवाने में अहम भूमिका निभाने वाले विजय गोयल कहते हैं, 'कांग्रेस लॉटरी बिक्री के पक्ष में थी क्योंकि इससे उन्हें कर मिलता था. अब प्रतिबंध लगने के बाद पूरे भारत में अवैध लॉटरी टिकटों की बिक्री में तेजी आ गई है.'

गोयल मानते हैं कि इसका सिर्फ एक समाधान है कि संसद में लॉटरी प्रतिबंधित करने वाला विधेयक लाया जाए. जब तक यह नहीं होता तब तक दूसरों की बेवकूफी, लालच और तयशुदा बदकिस्मती से मार्टिन की दुनिया आबाद रहेगी.

संस्कृति के नाम पर

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत बच्चों को मेघालय से कर्नाटक लाया जा रहा है और उन्हें उनकी मूल संस्कृति से काटकर हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई जा रही है. संजना की तहकीकात. सभी फोटो: एस राधाकृष्णा 

कर्नाटक के 35 स्कूलों और मेघालय के चार जिलों में की गई तीन महीने की गहन पड़ताल के दौरान तहलका ने पाया कि साल 2001 से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सोशल इंजीनियरिंग की एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहा है जिसके तहत अब तक मेघालय के कम से कम 1600 बच्चों को कर्नाटक में लाकर उन्हें कन्नड़ और तथाकथित भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाया जा रहा है. मेघालय से लाए जाने वाले इन बच्चों के नवीनतम बैच में कुल 160 बच्चे थे जिन्हें संघ के करीब 30 कार्यकर्ताओं द्वारा सात जून को 50 घंटे का सफर तय करके बंगलुरु लाया गया था.

संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है 

इस परियोजना के मुख्य संचालक संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है. उनका कहना था, 'संघ ने इलाके में अपने विस्तार और ईसाई मिशनरी समूहों से निपटने के मकसद से एक दीर्घकालिक योजना बनाई है. ये बच्चे इसी का एक हिस्सा हैं. आने वाले समय में ये बच्चे हमारे मूल्यों का अपने परिवार के सदस्यों में प्रसार करेंगे.' बचपन से ही संघ से जुड़े रहे शेट्टी कर्नाटक के दक्षिण कन्नडा जिले से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने अपने जीवन के तकरीबन आठ वर्ष मेघालय में, वहां की भौगौलिक स्थिति और संस्कृति का अध्ययन करने में बिताए हैं.

अगर मेघालय की बात की जाए तो ये देश के उन गिने-चुने राज्यों में है जहां ईसाई समुदाय कुल जनसंख्या का करीब 70 फीसदी होकर बहुसंख्यक समुदाय की भूमिका में है. बाकी 30 फीसदी में करीब 13 फीसदी हिंदू हैं और 11.5 फीसदी यहां के मूल आदिवासी हैं. सबसे पहली बार ईसाई मिशनरी यहां उन्नीसवीं सदी के मध्य में आए थे. व्यापक स्तर पर धर्मातरण के बावजूद आदिवासियों की एक बड़ी आबादी अभी भी अपने मूल धर्मों से जुड़ी हुई है और इसमें कहीं न कहीं धर्म परिवर्तन करने वालों के प्रति नाराजगी भी है. संघ, आदिवासियों की इसी नाराजगी का फायदा उठाना चाहता है और जैसा कि शेट्टी मानते हैं कि बच्चे और उनकी शिक्षा इसकी शुरुआत है.

बंगलुरु से करीब 500 किलोमीटर दूर उप्पूर में स्थित थिंकबेट्टू हायर प्राइमरी एंड सेकंडरी स्कूल उन 35 स्कूलों में से है जहां इन बच्चों को पढ़ाया जा रहा है. 2008 में छह से सात साल की उम्र के 17 बच्चों को मेघालय से यहां लाया गया था. स्कूल के प्रधानाध्यापक के कहने पर ये बच्चे एक-एक कर खड़े होते हैं और अपना परिचय स्थानीय कन्नड भाषा में देते हैं. मगर अध्यापक महोदय खुद अपना परिचय देने से ये कह कर इनकार कर देते हैं कि 'आप बच्चों को देखने आए हैं, वे आपके सामने हैं. अगर मैं आपको अपना नाम बताऊंगा तो आप उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल करेंगीं.' बस इतना पता चल पाता है कि वो एक पूर्व बैंक कर्मचारी हैं और कोने में खड़ी निर्मला नाम की महिला उनकी पत्नी है.

इसके बाद बच्चों से हाल ही में याद किया गया एक श्लोक सुनाने को कहा जाता है. घुटे सिर वाले ये बच्चे अध्यापक के सम्मान में गुरुर्बृह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:.. का पाठ करने लगते हैं. जिस हॉल में ये सब हो रहा है दरअसल वही इनके शयन, अध्ययन और भोजन, तीनों कक्षों का काम करता है. मेघालय के चार जिलों - रिभोई, वेस्ट खासी हिल्स, ईस्ट खासी हिल्स और जंतिया हिल्स से कर्नाटक में संघ से जुड़े विभिन्न स्कूलों में लाए गए ये बच्चे मूलत: खासी और जंतिया आदिवासी समुदायों से संबंध रखते हैं. परंपरागत रूप से खासी आदिवासी सेंग खासी और जंतिया आदिवासी नियाम्त्रे धर्म को मानते हैं.

जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैंमंद्य जिले के बीजी नगर में स्थित श्री आदिचुंचनगिरी हायर प्राइमरी स्कूल के प्रधानाचार्य मंजे गौड़ा कहते हैं, 'अगर ये बच्चे मेघालय में ही रहते तो ये अब तक तो ईसाई बन चुके होते. संघ इन्हें बचाने का प्रयास कर रहा है. जो शिक्षा बच्चे यहां प्राप्त करते हैं उसमें मजबूत सांस्कृतिक मूल्य स्थापित करना शामिल होता है. जब ये यहां से वापस अपने घर जाएंगे तो इन संस्कारों का अपने परिवारों में प्रसार करेंगे.' जिन सांस्कृतिक मूल्यों की बात गौड़ा कर रहे हैं उनमें धार्मिक मंत्रोच्चार, हिंदू तीज त्यौहारों का ज्ञान और मांसाहारी भोजन, जो कि मेघालय में अत्यधिक प्रचलित है, से इन बच्चों को दूर रखना शामिल है.

मगर इससे होगा क्या? शेट्टी तहलका को बताते हैं कि छोटी उम्र में भारत के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ाव और अनुशासन तो दरअसल पहला कदम है. 'यह महत्वपूर्ण है कि ये बच्चे इन मूल्यों को कच्ची उम्र में आत्मसात करें. ये इन्हें हमारे और नजदीक और ईसाइयों की जीवन पद्धति से और दूर ले जाएगा. हम उन्हें श्लोक सिखाते हैं जिससे कि वे ईसाई धर्मगीतों को न गाएं. हम उन्हें मांस से दूर कर देते हैं ताकि वे अपने धर्म में रची-बसी जीव-बलि की परंपरा से घृणा करने लगें' वे कहते हैं, 'अंतत: जब संघ उनसे कहेगा कि गाय एक पवित्र जीव है और जो इसे मारकर खाते हैं उनका समाज में कोई स्थान नहीं है तो तो ये बो उसे मानेंगे.' क्या इन बच्चों को आरएसएस के भावी झंडाबरदारों की भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है, इस सवाल पर शेट्टी केवल इतना कहते हैं कि वे किसी न किसी रूप में 'परिवार' का हिस्सा रहेंगे और इस बारे में समय ही बताएगा.

तहलका ने कई स्कूलों का दौरा किया और पाया कि विभिन्न स्कूलों में सिखाये जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों में तो कोई खास फर्क नहीं है मगर आरएसएस की विचारधारा में कोई कितनी गहरी डुबकी लगाएगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि वह बच्चा पढ़ता कौन से स्कूल में है. जो बच्चे मजबूत आर्थिक स्थिति वाले परिवारों से संबंध रखते हैं वे ऐसे स्कूलों में रहते हैं जहां पढ़ने और रहने की समुचित व्यवस्था होती है क्योंकि उनके परिवार इसका खर्च उठाने की स्थिति में होते है. इन अपेक्षाकृत सुविधासंपन्न स्कूलों में अनुशासन उतना कड़ा नहीं होता. मगर उत्तर-पूर्वी राज्य से आए इन बच्चों में से जितनों से हमने मुलाकात की उनमें से करीब 60 फीसदी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले थे जो उप्पूर के थिंकबेट्टू जैसे नाम-मात्र की सुविधाओं और कड़े अनुशासन वाली व्यवस्था में रहते हैं.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है. इनमें से कुछ स्थान हैं पुत्तूर, कल्लाड्का, कॉप, कोल्लुर, उप्पूर, डेरालाकट्टे, दक्षिण कन्नडा में मूदबिद्री और उडुपी और चिकमंगलूर जिले. इनके अलावा बच्चों को प्रभावशाली आश्रमों द्वारा चलाए जा रहे सुत्तूर के जेएसएस मठ, मांड्या के आदिचुंचनगिरी और चित्रगुड़ा के मुरुगराजेंद्र जसे स्कूलों में भी रखा गया है.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है

मगर मेघालय के ये नन्हे-मुन्ने हजारों किलोमीटर दूर कर्नाटक में कैसे आ जाते हैं? इन्हें वहां से लाने का तरीका क्या है? तहलका ने जिस भी बच्चे या उसके माता-पिता से बात की सबका कहना था कि ये सब किये जाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ तुकाराम शेट्टी का है.

आरएसएस से संबद्ध संस्था सेवा भारती के पूर्व कार्यकर्ता शेट्टी जंतिया हिल्स के जोवाई में स्थित ले सिन्शर कल्चरल सोसाइटी के सर्वेसर्वा हैं. हालांकि इस संगठन को तो कोई इसके मुख्यालय से बाहर ही नहीं जानता है किंतु तुकाराम या बह राम - मेघालय में शेट्टी इस नाम से भी जाने जाते हैं - का नाम यहां बच्चा-बच्चा जानता है. साफ है कि संगठन तो आरएसएस से जरूरी दूरी प्रदर्शित करने का जरिया भर है. राजधानी शिलॉंग से लेकर दूरदराज के गांव तक सभी जानते हैं कि बच्चों को कर्नाटक ले जाने वाला असल संगठन संघ ही है. इस संस्था के जंतिया हिल्स जिले में तीन दफ्तर हैं - जोवाई, नरतियांग और शॉंगपॉंग. इसके अलावा सेवा भारती और कल्याण आश्रम जैसे संगठन भी हैं जो बच्चों की पहचान करने और उन्हें कर्नाटक भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

स्थानीय सेंग खासी स्कूल में अध्यापक और कल्याण आश्रम में रहने वाले योलिन खरूमिनी कहते हैं, 'हमसे उन परिवारों की पहचान करने के लिए कहा जाता है जो ईसाई नहीं बने हैं और जिनका अपने मूल धर्म से काफी जुड़ाव है. साधारणत: ये परिवार ईसाइयों के बारे में अच्छा नहीं सोचते. इनके सामने बच्चों को कर्नाटक में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा जाता है. हम उन्हें हमेशा ये भी बताते हैं कि उनके बच्चों को सेंग खासी या नियाम्त्रे की परंपराओं के मुताबिक ही शिक्षा दी जाएगी.' खरूमिनी की खुद की भतीजी कर्डमोन खरूमिनी भी कर्नाटक के मंगला नर्सिंग स्कूल में पढ़ती है.

कॉप (जिला उडुपी) के विद्यानिकेतन स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ रही खतबियांग रिम्बाई विस्तार से बताती है कि कैसे 200 बच्चों को विभिन्न गांवों से बंगलुरु लेकर आया गया था. 'हमें कई समूहों में बांटकर बड़े बच्चों को उनका इंचार्ज बना दिया गया. फिर शिलॉंग से हमें टाटा सूमो में बिठाकर ट्रेन पकड़ने के लिए गुवाहाटी ले जाया गया' वो कहती है. बंगलुरु में उन्हें विभिन्न स्कूलों में भेजने से पहले आरएसएस के कार्यालय ले जाया गया था.

एक चौंकाने वाली बात तहलका को शिलॉंग के एक संघ कार्यकर्ता प्रफुल्ल कोच और थिकबेट्टू स्कूल के प्रमुख ने ये बतायी कि इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाता है कि एक ही परिवार के दो बच्चों को हमेशा अलग-अलग स्कूलों में भर्ती किया जाए. 'अगर वे साथ नहीं हैं तो उन्हें अनुशासित करना आसान होता है. अगर हमें उन्हें बदलना है तो उन पर नियंत्रण रखना ही होगा. उनका घर से जितना कम संपर्क रहे उतना ही बढ़िया.'

बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है

तहलका को एक ही परिवार के ऐसे कई बच्चे अलग-अलग स्कूलों में मिले - खतबियांग का भाई सप्लीबियांग रिंबाई केरल के कासरगॉड में स्थित प्रशांति विद्या निकेतन में पढ़ता है जबकि वो कर्नाटक में विद्या निकेतन स्कूल में पढ़ रही है. विद्यानिकेतन के ही एक और छात्र रीन्बॉर्न तेरियांग की बहन मैसूर के जेएसएस मठ स्कूल में पढ़ रही है. मंद्य के अभिनव भारती बॉइज हॉस्टल के बेद सिंपली की बहन विद्यानिकेतन में पढ़ती है. मंद्य जिले के आदिचुंचनगिरी स्कूल में पढ़ने वाले इवानरोई लांगबांग की भी बहन डायमोन्लांकी शिमोगा के वनश्री स्कूल में पढ़ती है. यहां ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें एक ही परिवार के दो या ज्यादा बच्चों को एक साथ पढ़ने दिया जा रहा हो. ऐसा क्यों किया जा रहा है पूछने पर ये बच्चे कुछ बोल ही नहीं पाते.

जब तहलका ने बच्चों के परिवारवालों से पूछा कि वे अपने बच्चों को अलग-अलग क्यों रख रहे हैं तो उनका जवाब था कि इस बारे में उन्हें काफी बाद में जाकर पता लगा. खतबियांग और सप्लीबियांग की बड़ी बहन क्लिस रिंबाई बताती हैं, 'जब वे गए थे तो हमें बस इतना पता था कि वे बंगलुरु जा रहे हैं. हमें स्कूल के बारे में कुछ पता ही नहीं था. ये तो काफी बाद में हमें पता लगा कि वे अलग कर दिये गए हैं और बंगलुरू में नहीं है. खतबियांग ने हमें ये भी बताया कि वो फिर से कक्षा सात में ही पढ़ रही है.' जंतिया हिल्स में रहने वाला रिंबाई परिवार काफी समृद्ध है और बच्चों के पिता कोरेन चिरमांग आरएसएस से सहानुभूति रखने वालों में से हैं जिन्होंने अपने बच्चों के अलावा और भी कई बच्चों को कर्नाटक भेजने में अहम भूमिका निभाई है. 'वे पहले काफी सक्रिय रहा करते थे मगर हाल ही में काफी बीमार होने की वजह से आरएसएस के साथ दूसरे गांवों में नहीं जा पा रहे हैं.' क्लिस कहती हैं.

अपने भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान और वातावरण से दूर रहने का इन छोटे-छोटे बच्चों पर अलग-अलग तरीके से असर पड़ रहा है. जिन स्कूलों में भी तहलका गया वहां के हॉस्टल वॉर्डन, अध्यापकों और स्वयं बच्चों ने ये स्वीकारा कि मेघालय के उनके गांव और कर्नाटक के उनके स्कूलों की हवा-पानी में काफी अंतर होने की वजह से बच्चों को तरह-तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. चमराजनगर के दीनबंधु चिल्ड्रंस होम के सचिव जीएस जयदेव के मुताबिक मेघालय से आए छ: साल के तीन बच्चों - शाइनिंग लामो, सिबिनरिंगखेल्म और स्पिड खोंगसेइ - के शरीर पर कर्नाटक की भीषण गर्मी की वजह से लंबे समय तक जबर्दस्त चकत्ते रहे. थिंकबेट्टू स्कूल में भी कई बच्चे हमें ऐसे मिले जिनकी त्वचा पर कई महीनों से वहां रहने के बावजूद जलने के निशान साफ देखे जा सकते थे. नागमंगला में आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा चलाए जाने वाले संस्कृत कॉलेज में पढ़ने वाले मेघालय के 11 बच्चों में से सबसे बड़े आयोहिदाहुन रैबोन ने तहलका को बताया कि मेघालय से आने वाले तीन छोटे बच्चे पिछले काफी समय से बीमार चल रहे हैं क्योंकि उन्हें स्कूल में दिया जाने वाला खाना रास नहीं आ रहा है.

इन बच्चों के ऊपर उन्हें अपने घरों से यहां लाए जाने का जबर्दस्त मानसिक प्रभाव भी पड़ रहा है. जिन भी स्कूलों में तहलका जा सका उनमें स्कूल के अधिकारियों ने बच्चों को बुलाकर उन्हें कन्नड में अपना परिचय देने का आदेश दिया. स्कूल के संचालकों के लिए तो ये बड़े गर्व की बात थी कि बाहर से आए ये बच्चे उनकी भाषा को इतने अच्छे तरीके से बोल पा रहे हैं. किंतु बच्चों पर अब तक सीखा सब कुछ भूलने का क्या असर हो रहा है इसकी शायद किसी को कोई परवाह नहीं. विभिन्न स्कूलों के अधिकारियों का दावा है कि मेघालय से आए बच्चे दूसरे बच्चों के साथ अच्छे से घुल-मिल गए हैं मगर सच तो ये है कि ऐसा हो नहीं रहा है. बच्चों से कुछ मिनटों की बातचीत में ही हमें पता लगता है कि कैसे स्थानीय बच्चे उनके अलग तरह के नाम और शक्लों को लेकर उनका मजाक बनाते हैं और इसलिए वे अपने जैसे बच्चों के साथ ही रहना पसंद करते हैं.

हमने एक कक्षा में पाया कि जहां स्थानीय बच्चे एक बेंच पर चार के अनुपात में बैठे हुए थे वहीं मेघालय से आए छ-सात बच्चे एक-दूसरे के साथ बैठने की कोशिश में बस किसी तरह बेंच पर अटके हुए थे. जहां इन बच्चों की संख्या काफी कम है वहां ये अपने में ही गुम रहने लगे हैं. बड़े बच्चों के लिए स्कूल की भौगोलिक स्थिति भी काफी निराश करने वाली है. बंगलुरु से करीब 150 किमी दूर नागमंगला में नवीं कक्षा में पड़ रहा इवानरोई लांगबांग अपनी निराशा कुछ इस तरह व्यक्त करता है, 'हमें बताया गया था कि में बंगलुरु में पढ़ूंगा. ये तो यहां आने के बाद मुझे पता चला कि ये बंगलुरु से काफी दूर है. यहां हम चाहरदीवारी से बाहर नहीं जा सकते और अगर कभी चले भी जाएं तो उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि बाहर वैसे भी कुछ है ही नहीं.'

इन बच्चों को मेघालय से लाकर पूरी तरह से कन्नड़ भाषी माहौल में डुबो देने का नतीजा छमराजनगर में स्थित दीनबंधु चिल्ड्रन होम में देखा जा सकता है. यहां की केयरटेकर छह साल के एक बच्चे की प्रगति को बयान करते हुए कहती है, 'सिबिन को यहां रहते हुए अभी दो ही महीने हुए हैं पर उसने काफी कन्नड़ सीख ली है. एक बार उसके घर से फोन आया तो उसने सवालों के जवाब कन्नड़ में देने शुरू कर दिए जो कि जाहिर है कि घरवालों की समझ में बिल्कुल नहीं आई.' असंवेदनहीना देखिए कि इसके बाद केयरटेकर इतनी जोर से हंसती है जैसे कि यह कोई मजाक की बात हो.

फिर वह कहती है, '45 मिनट तक वह महिला जो कि शायद उसकी मां होगी, कोशिश करती रही. सिबिन के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि वह अपनी भाषा भूल गया था.' इसके बाद वह सिबिन को बताने लगती है कि रात के भोजन को कन्नड़ में क्या कहते हैं.

इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चे जो शारीरिक और मानसिक नुकसान झेल रहे हैं वह सामान्य बोर्डिंग स्कूलों के बच्चों से अलग है. इन बच्चों को यहां लाने के पीछे का उद्देश्य कहीं बड़ा है यह कोच जैसे संघ कार्यकर्ता भी मानते हैं. सवाल उठता है कि इतनी छोटी उम्र के बच्चों को इनके मां-बाप आखिर क्यों इतनी दूर भेज रहे हैं? मेघालय के आठ गांवों की अपनी यात्रा के दौरान तहलका ने पाया कि ऐसे लोगों में से ज्यादातर गरीब हैं जो इस उम्मीद में अपने बच्चों को संघ को सौंप देते हैं कि उनकी देखभाल अच्छी तरह से हो सकेगी. इसका उनसे वादा भी किया जाता है. अक्सर ऐसे बच्चों का कोई बड़ा भाई या बहन पहले ही इस तरह के स्कूलों में पढ़ रहा होता है.

बारीकी से पड़ताल करने पर पता चलता है कि इस समूची प्रक्रिया में झूठ के कई ताने-बाने हैं. इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

मां-बाप ने लिखित रूप में अपनी सहमति दे दी है

जब तहलका ने कर्नाटक के इन स्कूलों का दौरा कर उनसे वे कागजात मांगे जो ये साबित कर सकें कि इन बच्चों का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण कानूनी है तो हमें गांव के मुखिया रैंगबा शनांग द्वारा हस्ताक्षरित पत्र दिखाए गए जिसमें लिखा गया था कि इनके परिवारों की माली हालत बहुत खराब है. इसके साथ ही हमें बच्चों के जन्म और जाति प्रमाणपत्र भी दिखाए गए. मगर किसी भी स्कूल ने कोई ऐसा पत्र नहीं दिखाया जिस पर बच्चे के मां-बाप के दस्तखत हों और जिसमें साफ तौर पर जिक्र हो कि बच्चे को किस स्कूल के सुपुर्द किया जा रहा है. मेघालय में भी तहलका जिन लोगों से मिला उनमें से भी किसी के पास इस तरह के हस्ताक्षरित सहमति पत्र की कॉपी नहीं थी. बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चों की तस्करी जैसा है.

स्कूलों में सेंग खासी और नियाम्त्रे धर्मों की शिक्षा दी जाती है

खासी और जंतिया जनजाति में ईसाई धर्म अपना चुके लोगों और बाकियों के बीच तनातनी रहती है. संघ द्वारा ध्यान से ऐसे बच्चों को चुना जाता है जो गरीब घरों से हैं और अब तक ईसाई नहीं बने हैं. स्वेर गांव की बिए नांगरूम कहती हैं, 'मुझसे कहा गया कि अपनी बेटी को धर्म परिवर्तन से बचाने का एक ही रास्ता है कि उसे बाहर भेज दो. अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो चर्च मेरे बच्चों को ले जाएगा और उन्हें पादरी और नन बना देगा. मैं बहुत डरी हुई थी इसलिए मैं अपनी बेटी को वहां भेजने के लिए राजी हो गई.' छह साल बीत चुके हैं मगर बिए को अब भी उस स्कूल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है जहां उसकी बेटी पढ़ रही है. उसके पास कुछ है तो बस बेटी की कक्षा का एक फोटो. वह कहती है, 'अगर मुझे पता चल भी जाए कि वह कहां है तो मेरे पास उस तक पहुंचने और उसे वापस लाने लायक पैसा नहीं है. पर मैं दूसरे बच्चे को कभी भी वहां नहीं भेजूंगी.'

बिए का टूटा-फूटा घर, जिसमें वह अपनी मां और तीन दूसरे बच्चों के साथ रहती है, उसकी गरीबी की कहानी कह देता है. इससे ये भी संकेत मिलता है कि आखिर क्यों लोग चाहकर भी अपने बच्चों को वापस नहीं ला पाते. दरअसल उनके पास इतना भी पैसा नहीं होता. कई लोगों का तहलका से कहना था कि उनके बच्चे संघ के जिन स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहां उनके धर्म की शिक्षाएं दी जाती हैं. मोखेप गांव के जेल चिरमांग के घर में तहलका को फ्रेम में लगी एक फोटो दिखी. इसमें जेल की बेटी रानी चिरमांग को उसके स्कूल के संरक्षक संत श्री बालगंगाधरनाथ सम्मानित करते हुए नजर आ रहे थे. हमने जेल से पूछा कि भगवा चोले में नजर आ रहे ये संत कौन हैं तो उसका जवाब था कि वे एक सेंग खासी संत हैं जो उस स्कूल को चलाते हैं. उसकी आवाज में जरा भी शंका नहीं थी. बाद में पता चला कि उसका पति डेनिस सिहांगशे संघ का कार्यकर्ता है जिसने माना कि अपनी बेटी का उदाहरण देकर उसने कई दूसरे लोगों को अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने के लिए राजी किया है. डेनिस के शब्दों में 'लोगों की संघ के बारे में गलत धारणा है. मैं हमेशा उन्हें यही कहता हूं कि संघ उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कृति देगा.'

ज्यादातर मां-बाप इससे अनजान होते हैं कि इन स्कूलों में उनकी संस्कृति के बजाय किसी और ही चीज की घुट्टी पिलाई जा रही है. जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैं. जेएसएस स्कूल की लाइब्रेरी भारतीय संस्कृति प्रकाशन से छपकर आईं उन किताबों से भरी पड़ी है जो संघ की विचारधारा पर आधारित हैं. इनमें सेंग खासी या नियाम्त्रे धर्म की शिक्षाओं का कोई अंश नजर नहीं आता.

बच्चे निराश्रित और असहाय हैं

गैरआदिवासी समाज में पिता के परिवार को छोड़ देने से परिवार को निराश्रित माना जाता है. मगर मेघालय के आदिवासी समाज में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि पुरुष किसी दूसरी स्त्री के साथ रहने लगते हैं और बच्चों की जिम्मेदारी मां संभालती है. अगर मां की मौत हो जाती है तो बच्चे को रिश्तेदार पालते हैं.

बच्चों को खुद को अच्छी तरह से नए माहौल के मुताबिक ढाल लिया है

जब बच्चे मेघालय छोड़ रहे होते हैं तो न तो उन्हें और न ही उनके मां-बाप को ये पता होता है कि उन्हें आखिरकार कहां ले जाया जाएगा. कमजोर आर्थिक हालत और स्कूलों में सुविधाओं के अभाव के चलते मां-बाप का बच्चों से सीधा संपर्क नहीं हो पाता. संघ मां-बाप को बताता है कि उनके बच्चे खुश हैं और नए माहौल में काफी अच्छी तरह से ढल गए हैं. मगर हकीकत कुछ और ही होती है. विद्या निकेतन में छठवीं का छात्र रापलांग्की ढकार इंतजार कर रहा है कि उसके चाचा आएंगे और उसे घर ले जाएंगे. वह कहता है, 'हम तभी वापस जा सकते हैं जब हमारे घर से लोग यहां आएं और हमें अपने साथ ले जाएं. हर साल जब पढ़ाई खत्म होती है तो हम सुनते हैं कि हमें वापस ले जाया जाएगा. मगर दो साल हो गए हैं.'

तहलका जिन बच्चों से मिला उनमें से सिर्फ दो ही ऐसे थे जिन्हें घर लौटने का मौका मिला था. रापलांग्की के कस्बे रालिआंग में जब तहलका ने उसके चाचा से पूछा कि वे अपने भतीजे को लेने क्यों नहीं गए तो वे हैरान हो गए. उनका कहना था, 'मुझे तो इसमें जरा भी शंका नहीं थी कि मेरा भतीजा अच्छी तरह से वहां रम गया है. जोवाई में संघ की हर बैठक में हमें आश्वस्त किया जाता है कि बच्चे खुश और स्वस्थ हैं.'

बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच सीधा संपर्क यानी फोन कॉल अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है. अगर मां-बाप बच्चे की पढ़ाई का खर्चा उठाने में असमर्थ हों तो बच्चों को मठों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे स्कूलों में रखा जाता है जिनकी तुलना किसी अनाथाश्रम से की जा सकती है. यहां फोन की कोई सुविधा नहीं होती जैसा कि श्री आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा संचालित हॉस्टल में देखने को मिलता है.

मगर संघ को इससे कोई मतलब नहीं. उसके लिए यह सब एक बड़े उद्देश्य के लिए चलाई जा रही प्रक्रिया का हिस्सा है. एक ऐसी प्रक्रिया जो न सिर्फ बच्चों के लिए शारीरिक और मानसिक यातना पैदा कर रही है बल्कि मेघालय की एक पीढ़ी को उसकी मूल संस्कृति से दूर भी ले जा रही है.   
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आतंक के मोहरे या बलि के बकरे ?

image फोटो: शैलेंद्र पांडेय

अहमदाबाद धमाकों के बाद एक मौलाना की संदिग्ध गिरफ्तारी तो केवल बानगी भर है. तीन महीने की गहन पड़ताल के बाद ऐसे ही तमाम मामलों पर रोशनी डालती अजित साही की रिपोर्ट.

हर शुक्रवार की तरह 25 जुलाई को भी मौलाना अब्दुल हलीम ने अपना गला साफ करते हुए मस्जिद में जमा लोगों को संबोधित करना शुरू किया. करीब दो बजे का वक्त था और इस मृदुभाषी आलिम (इस्लामिक विद्वान) ने अभी-अभी अहमदाबाद की एक मस्जिद में सैकड़ों लोगों को जुमे की नमाज पढ़वाई थी. अब वो खुतबा (धर्मोपदेश) पढ़ रहे थे जो पड़ोसियों के प्रति सच्चे मुसलमान की जिम्मेदारी के बारे में था. गंभीर स्वर में हलीम कहते हैं, "अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा हो तो तुम भी अपना पेट नहीं भर सकते. तुम अपने पड़ोसी के साथ हिंदू-मुसलमान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते."

तीस घंटे बाद, शनिवार को 53 लोगों की मौत का कारण बने अहमदाबाद बम धमाकों के कुछ मिनटों के भीतर ही पुलिस मस्जिद से सटे हलीम के घर में घुस गई और भौचक्के पड़ोसियों के बीच उन्हें घसीटते हुए बाहर ले आई. पुलिस का दावा था कि हलीम धमाकों की एक अहम कड़ी हैं और उनसे पूछताछ के जरिये पता चल सकता है कि आतंक की इस कार्रवाई को किस तरह अंजाम दिया गया. पुलिस के इस दावे के आधार पर एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने उन्हें दो हफ्ते के लिए अपराध शाखा की हिरासत में भेज दिया.

त्रासदी और आतंक के समय हर कोई जवाब चाहता है. हर कोई चाहता है कि गुनाहगार पकड़े जाएं और उन्हें सजा मिले. ऐसे में चुनौती ये होती है कि दबाव में आकर बलि के बकरे न ढूंढे जाएं. मगर दुर्भाग्य से सरकार इस चुनौती पर हर बार असफल साबित होती रही है. उदाहरण के लिए जब भी धमाके होते हैं सरकारी प्रतिक्रिया में सिमी यानी स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया का नाम अक्सर सुनने को मिलता है. ज्यादातर लोगों के लिए सिमी एक डरावना संगठन है जो घातक आतंकी कार्रवाइयों के जरिये देश को बर्बाद करना चाहता है.

मगर सवाल उठता है कि ये आरोप कितने सही हैं?

एक न्यायसंगत और सुरक्षित समाज बनाने के संघर्ष में ये अहम है कि असल दोषियों और सही जवाबों तक पहुंचा जाए और ईमानदारी से कानून का पालन किया जाए. इसके लिए ये भी जरूरी है कि झूठे पूर्वाग्रहों और बनी-बनाई धारणाओं के परे जाकर पड़ताल की जाए. इसीलिए तहलका ने पिछले तीन महीने के दौरान भारत के 12 शहरों में अपनी तहकीकात की. तहकीकात की इस श्रंखला की ये पहली कड़ी है.

हमने पाया कि आतंकवाद से संबंधित मामलों में, और खासकर जो प्रतिबंधित सिमी से संबंधित हैं, ज्यादातर बेबुनियाद या फिर फर्जी सबूतों पर आधारित हैं. हमने पाया कि ये मामले कानून और सामान्य बुद्धि दोनों का मजाक उड़ाते हैं.

इस तहकीकात में हमने पाया कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के पूर्वाग्रह, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और सनसनी का भूखा व आतंकवाद के मामले पर पुलिस की हर कहानी को आंख मूंद कर आगे बढ़ा देने वाला मीडिया, ये सारे मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जो सैकड़ों निर्दोष लोगों पर आतंकी होने का लेबल चस्पा कर देता है. इनमें से लगभग सारे मुसलमान हैं और सारे ही गरीब भी.
 हलीम का परिवार

हलीम का परिवार

अहमदाबाद के सिविल अस्पताल, जहां हुए दो धमाकों ने सबसे ज्यादा जानें लीं, का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना था, "हम इस चुनौती का मुकाबला करेंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि हम इन ताकतों को हराने में कामयाब होंगे." उन्होंने राजनीतिक पार्टियों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों का आह्वान किया कि वे सामाजिक ताने-बाने और सांप्रदायिक सद्भावना को तहस-नहस करने के लिए की गई इस कार्रवाई के खिलाफ मिलकर काम करें. मगर निर्दोषों के खिलाफ झूठे मामलों के चौंकाने वाले रिकॉर्ड को देखते हुए लगता है कि अक्षम पुलिस और खुफिया एजेंसियां कर बिल्कुल इसका उल्टा रही हैं. मौलाना अब्दुल हलीम की कहानी इसका सुलगता हुआ उदाहरण है.

पिछले रविवार से ही मीडिया में जो खबरें आ रही हैं उनमें पुलिस के हवाले से हलीम को सिमी का सदस्य बताया जा रहा है जिसके संबंध पाकिस्तान और बांग्लादेश स्थित आतंकवादियों से हैं.  गुजरात सरकार के वकील ने मजिस्ट्रेट को बताया कि आतंकवादी बनने का प्रशिक्षण देने के लिए हलीम मुसलमान नौजवानों को अहमदाबाद से उत्तर प्रदेश भेजा करते थे और इस कवायद का मकसद 2002 के नरसंहार का बदला लेना था. वकील के मुताबिक इन तथाकथित आतंकवादियों ने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई दूसरे नेताओं को मारने की योजना बनाई थी. पुलिस का कहना था कि इस मामले में आरोपी नामित होने के बाद हलीम 2002 से ही फरार चल रहे थे.

इस मौलाना की गिरफ्तारी के बाद तहलका ने अहमदाबाद में जो तहकीकात की उसमें कई अकाट्य साक्ष्य निकलकर सामने आए हैं. ये बताते हैं कि फरार होने के बजाय हलीम कई सालों से अपने घर में ही रह रहे थे. उस घर में जो स्थानीय पुलिस थाने से एक किलोमीटर दूर भी नहीं था. वे एक सार्वजनिक जीवन जी रहे थे. मुसलमानों को आतंकवाद का प्रशिक्षण देने के लिए भेजने का जो संदिग्ध आरोप उन पर लगाया गया है उसका आधार उनके द्वारा लिखी गई एक चिट्ठी है. एक ऐसी चिट्ठी जिसकी विषयवस्तु का दूर-दूर तक आतंकवाद से कोई लेना-देना नजर नहीं आता.

दिलचस्प ये भी है कि शनिवार को हुए बम धमाकों से पहले अहमदाबाद पुलिस ने कभी भी हलीम को सिमी का सदस्य नहीं कहा था. ये बात जरूर है कि वह कई सालों से 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों के पीड़ितों की मदद में उनकी भूमिका के लिए उन्हें परेशान करती रही है. हलीम के परिजन और अनुयायी ये बात बताते हैं. इस साल 27 मई को पुलिस थाने से एक इंस्पेक्टर ने हलीम को गुजराती में एक पेज का हस्तलिखित नोटिस भेजा. इसके शब्द थे, "मरकज-अहले-हदीस (इस्लामी पंथ जिसे हलीम और उनके अनुयायी मानते हैं) ट्रस्ट का एक दफ्तर आलीशान शॉपिंग सेंटर की दुकान नंबर चार में खोला गया है. आप इसके अध्यक्ष हैं...इसमें कई सदस्यों की नियुक्ति की गई है. आपको निर्देश दिया जाता है कि उनके नाम, पते और फोन नंबरों की सूची जमा करें."

कानूनी नियमों के हिसाब से बनाए गए एक ट्रस्ट, जिसके खिलाफ कोई आपराधिक आरोप न हों, से की गई ऐसी मांग अवैध तो है ही, साथ ही इस चिट्ठी से ये भी साबित होता है कि पुलिस को दो महीने पहले तक भी सलीम के ठिकाने का पता था और वह उनसे संपर्क में थी. नोटिस में हलीम के घर—2, देवी पार्क सोसायटी का पता भी दर्ज है. तो फिर उनके फरार होने का सवाल कहां से आया. हलीम के परिवार के पास इस बात का सबूत है कि पुलिस को अगले ही दिन हलीम का जवाब मिल गया था.

एक महीने बाद 29 जून को हलीम ने गुजरात के पुलिस महानिदेशक और अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त को एक टेलीग्राम भेजा. उनका कहना था कि उसी दिन पुलिस जबर्दस्ती उनके घर में घुस गई थी और उनकी गैरमौजूदगी में उनकी पत्नी और बच्चों को तंग किया गया. हिंदी में लिखे गए इस टेलीग्राम के शब्द थे,"हम शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं और किसी अवैध गतिविधि में शामिल नहीं रहे हैं. पुलिस गैरकानूनी तरीके से बेवजह मुझे और मेरे बीवी-बच्चों को तंग कर रही है. ये हमारे नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है."

जैसा कि संभावित था, उन्हें इसका कोई जवाब नहीं मिला. अप्रैल में जब सोशल यूनिटी एंड पीस फोरम नाम के एक संगठन, जिसके सदस्य हिंदू और मुसलमान दोनों हैं, ने एक बैठक का आयोजन किया तो लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की इजाजत के लिए संगठन ने पुलिस को चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में भी साफ जिक्र किया गया था कि बैठक में हलीम मुख्य वक्ता होंगे. ये साबित करने के लिए कि हलीम इस दौरान एक सामान्य जीवन जीते रहे हैं, उनका परिवार उनका वो ड्राइविंग लाइसेंस भी दिखाता है जिसका अहमदाबाद ट्रांसपोर्ट ऑफिस द्वारा 28 दिसंबर, 2006 को नवीनीकरण किया गया था. तीन साल पहले पांच जुलाई 2005 को दिव्य भास्कर नाम के एक गुजराती अखबार ने उत्तर प्रदेश के एक गांव की महिला इमराना के साथ उसके ससुर द्वारा किए गए बलात्कार के बारे में हलीम का बयान उनकी फोटो के साथ छापा था.

हलीम की रिहाई के लिए गुजरात के राज्यपाल से अपील करने वाले उनके मित्र हनीफ शेख कहते हैं, "ये आश्चर्य की बात है कि हमें मौलाना हलीम की बेगुनाही साबित करनी है."  नाजिर, जिनके मकान में हलीम अपने परिवार के साथ किराये पर रहा करते थे, कहते हैं, "मैं मौलाना को सबसे करीब से जानता हूं. वे धार्मिक व्यक्ति हैं और उनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं रहा है."  हलीम की पत्नी भी कहती हैं कि उनके पति आतंकवादी नहीं हैं और उन्हें फंसाया जा रहा है.

हलीम को जानने वालों में उनकी गिरफ्तारी को लेकर हैरत और क्षोभ है. 27 वर्षीय अहसान-उल-हक कहते हैं, "मौलाना हलीम ने सैकड़ों लोगों को सब्र करना और हौसला रखना सिखाया है." ये साबित करने के लिए कि हलीम फरार नहीं थे, हक अपना निकाहनामा दिखाते हैं जो हलीम की मौजूदगी में बना था और जिस पर उनके हस्ताक्षर भी हैं.
 

यासिर की पत्नी सोफिया

उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले 43 वर्षीय अब्दुल हलीम 1988 से अहमदाबाद में रह रहे हैं. वे अहले हदीस नामक एक इस्लामी संप्रदाय के प्रचारक हैं जो इस उपमहाद्वीप में 180 साल पहले अस्तित्व में आया था. ये संप्रदाय कुरान के अलावा पैगंबर मोहम्मद द्वारा दी गई शिक्षाओं यानी हदीस को भी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शक मानता है. सुन्नी कट्टरपंथियों से इसका टकराव होता रहा है.  मीडिया में लंबे समय से खबरें फैलाई जाती रही हैं कि अहले-हदीस एक आंतकी संगठन है जिसके लश्कर-ए-तैयबा से संबंध हैं. पुलिस दावा करती है कि इसके सदस्य 2006 में मुंबई में हुए ट्रेन धमाकों सहित कई आतंकी घटनाओं में आरोपी हैं. करीब तीन करोड़ अनुयायियों वाला ये संप्रदाय इन आरोपों से इनकार करता है और बताता है कि दो साल पहले जब इसने दिल्ली में अपनी राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी तो गृह मंत्री शिवराज पाटिल इसमें बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे.

14 साल तक अहमदाबाद में अहले हदीस के 5000 अनुयायियों का नेतृत्व करने के बाद हलीम तीन साल पहले इस्तीफा देकर एक छोटी सी मस्जिद के इमाम हो गए. अपनी पत्नी और सात बच्चों के परिवार को पालने के लिए उन्हें नियमित आय की दरकार थी और इसलिए उन्होंने कबाड़ का व्यवसाय शुरू किया.

हलीम की मुश्किलें 2002 की मुस्लिम विरोधी हिंसा के बाद तब शुरू हुईं जब वे हजारों मुस्लिम शरणार्थियों के लिए चलाए जा रहे राहत कार्यों में  शामिल हुए. उस दौरान शाहिद बख्शी नाम का एक शख्स दो दूसरे मुस्लिम व्यक्तियों के साथ उनसे मिलने आया था. कुवैत में रह रहा शाहिद अहमदाबाद का ही निवासी था. उसके साथ आए दोनों व्यक्ति उत्तर प्रदेश के थे जिनमें से एक फरहान अली अहमद कुवैत में रह रहा था. दूसरा व्यक्ति हाफिज़ मुहम्मद ताहिर मुरादाबाद का एक छोटा सा व्यापारी था. ये तीनों लोग 2002 की हिंसा में अनाथ हुए बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और देखभाल का इंतजाम कर उनकी मदद करना चाहते थे. इसलिए हलीम उन्हें चार शरणार्थी कैंपों में ले गए. एक हफ्ते बाद एक कैंप से जवाब आया कि उसने ऐसे 34 बच्चों को खोज निकाला है जिन्हें इस तरह की देखभाल की जरूरत है. हलीम ने फरहान अली अहमद को फोन किया जो उस समय मुरादाबाद में ही था और उसे इस संबंध में एक चिट्ठी भी लिखी. मगर लंबे समय तक कोई जवाब नहीं आया और योजना शुरू ही नहीं हो पाई. महत्वपूर्ण ये भी है कि किसी भी बच्चे को कभी भी मुरादाबाद नहीं भेजा गया.

तीन महीने बाद अगस्त 2002 में दिल्ली पुलिस ने शाहिद और उसके दूसरे साथी को कथित तौर पर साढ़े चार किलो आरडीएक्स के साथ गिरफ्तार किया. मुरादाबाद के व्यापारी को भी वहीं से गिरफ्तार किया गया और तीनों पर आतंकी कार्रवाई की साजिश के लिए पोटा के तहत आरोप लगाए गए. दिल्ली पुलिस को इनसे हलीम की चिट्ठी मिली. चूंकि बख्शी और हलीम दोनों ही अहमदाबाद से थे इसलिए वहां की पुलिस को इस बारे में सूचित किया गया. तत्काल ही अहमदाबाद पुलिस के अधिकारी डी जी वंजारा(जो अब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल में हैं) ने हलीम को बुलाया और उन्हें अवैध रूप से हिरासत में ले लिया. घबराये परिवार ने उनकी रिहाई के लिए गुजरात हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. उनके परिवार के वकील हाशिम कुरैशी याद करते हैं, "जज ने पुलिस को आदेश दिया कि वह दो घंटे के भीतर हलीम को कोर्ट में लाए." पुलिस ने फौरन हलीम को रिहा कर दिया. वे सीधा कोर्ट गए और अवैध हिरासत पर उनका बयान दर्ज किया गया जो अब आधिकारिक दस्तावेजों का हिस्सा है.

जहां दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश के दोनों व्यक्तियों और शाहिद बख्शी के खिलाफ आरडीएक्स रखने का मामला दर्ज किया वहीं अहमदाबाद पुलिस ने  इन तीनों के खिलाफ मुस्लिम युवाओं को मुरादाबाद में आतंकी प्रशिक्षण देने के लिए फुसलाने का मामला बनाया. अहमदाबाद के धमाकों के बाद पुलिस और मीडिया इसी मामले का हवाला देकर हलीम पर मुस्लिम नौजवानों को आतंकी प्रशिक्षण देने का आरोप लगा रहे हैं. हलीम द्वारा तीस नौजवानों को प्रशिक्षण के लिए मुरादाबाद भेजने की बात कहते वक्त गुजरात सरकार के वकील सफेद झूठ बोल रहे थे. जबकि मामले में दाखिल आरोपपत्र भी किसी को अहमदाबाद से मुरादाबाद भेजने की बात नहीं करता.

दिल्ली में दर्ज मामले में जहां हलीम को गवाह नामित किया गया तो वहीं अहमदाबाद के आतंकी प्रशिक्षण वाले मामले में उन्हें आरोपी बनाकर कहा गया कि वो भगोड़े हैं. कानून कहता है कि किसी को भगोड़ा साबित करने की एक निश्चित प्रक्रिया होती है. इसमें गवाहों के सामने घर और दफ्तर की तलाशी ली जाती है और पड़ोसियों के बयान दर्ज किए जाते हैं जो बताते हैं कि संबंधित व्यक्ति काफी समय से देखा नहीं गया है. मगर अहमदाबाद पुलिस ने ऐसा कुछ नहीं किया. हलीम के खिलाफ पूरा मामला उस पत्र पर आधारित है जो उन्होंने सात अगस्त 2002 को फरहान को लिखा था. इस पत्र में गैरकानूनी जैसा कुछ भी नहीं है. ये एक जगह कहता है, "आप यहां एक अहम मकसद से आए थे."  कल्पना की उड़ान भर पुलिस ने दावा कर डाला कि ये अहम मकसद आतंकी प्रशिक्षण देना था. हलीम ने ये भी लिखा था कि कुल बच्चों में से छह अनाथ हैं और बाकी गरीब हैं. पत्र ये कहते हुए समाप्त किया गया था, "मुझे यकीन है कि अल्लाह के फज़ल से आप यकीनन इस्लाम को फैलाने के इस शैक्षिक और रचनात्मक अभियान में मेरी मदद करेंगे."  आरडीएक्स मामले में दिल्ली की एक अदालत के सामने हलीम ने कहा था कि उनसे कहा गया था कि मुरादाबाद में बच्चों को अच्छी तालीम और जिंदगी दी जाएगी. उन्हें ये पता नहीं था कि बख्शी और दूसरे लोग बच्चों को आतंकी प्रशिक्षण देने की सोच रहे हैं.

पिछले साल दिल्ली की एक अदालत ने "आरडीएक्स मामले" में बख्शी और फ़रहान को दोषी करार दिया और उन्हें सात-सात साल कैद की सज़ा सुनाई. बावजूद इसके कि तथाकथित आरडीएक्स की बरामदगी के चश्मदीद सिर्फ पुलिस वाले ही थे, कोर्ट ने पुलिस के ही आरोपों को सही माना. फरहान का दावा था कि उसे हवाई अड्डे से तब गिरफ्तार किया गया था जब वो कुवैत की उड़ान पकड़ने जा रहा था और उसके पास इसके सबूत के तौर पर टिकट भी थे. लेकिन अदालत ने इसकी अनदेखी की.
 

यासिर 

बख्शी और फरहान ने इस सज़ा के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की जिसने निचली अदालत द्वारा दोषी करार देने के बावजूद उन्हें ज़मानत दे दी. वहीं गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें "आतंकी प्रशिक्षण" मामले में  ज़मानत देने से इनकार कर दिया जबकि उन पर आरोप सिद्ध भी नहीं हुआ था. गुजरात क्राइम ब्रांच भी ये मानती है कि इस मामले में उनका अपराध सिर्फ षडयंत्र रचने तक ही सीमित हो सकता है.

सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता. मुरादाबाद के ताहिर को आरडीएक्स मामले में बरी कर दिया गया था. वो एक बार फिर तब भाग्यशाली रहा जब गुजरात हाई कोर्ट ने जून 2004 में उसे आतंकवाद प्रशिक्षण मामले में ज़मानत दे दी. अदालत का कहना था, "वर्तमान आरोपी के खिलाफ कुल मिलाकर सिर्फ इतना ही प्रमाण है कि वो अहमदाबाद आया था और कैंप का चक्कर भी लगाया था, ताकि उन बच्चों की पहचान कर सके और उनकी देख रेख अच्छे तरीके से हो सके और इसे किसी तरह का अपराध नहीं माना जा सकता."

बख्शी और फरहान पर भी बिल्कुल यही आरोप थे, लिहाजा ये तर्क उन पर भी लागू होना चाहिए. लेकिन गुजरात हाई कोर्ट के एक अन्य जज ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया और दोनों को जेल में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस बीच ताहिर अहमदाबाद आकर रहने लगा क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने उसकी ज़मानत के फैसले में ये आदेश दिया था कि उसे हर रविवार को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ऑफिस में हाजिरी देनी होगी. 26 जुलाई को हुए धमाकों के बाद अगली सुबह रविवार के दिन डरा सहमा ताहिर अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के ऑफिस पहुंचा. ताहिर ने तहलका को बताया, "उन्होंने चार घंटे तक मुझसे धमाके के संबंध में सवाल जवाब किए. उस वक्त मुझे बहुत खुशी हुई जब उन्होंने मुझे जाने के लिए कहा." आतंकी प्रशिक्षण मामले की सुनवाई लगभग खत्म हो चुकी है. अब जबकि हलीम भगोड़े नहीं रहे तो ये बात देखने वाली होगी कि उसके खिलाफ इस मामले में अलग से सुनवाई होती है या नहीं. इस बीच हलीम के परिवार को खाने और अगले महीने घर के 2500 रूपए किराए की चिंता सता रही है। हलीम की पत्नी बताती है है कि उनके पास कोई बचत नहीं है. हलीम की कबाड़ की दुकान उनका नौकर चला रहा है.

दुखद बात ये है कि मौलाना अब्दुल हलीम की कहानी कोई अकेली नहीं है. 15 जुलाई की रात हैदराबाद में अपने पिता के वर्कशॉप से काम करके वापस लौट रहे मोहम्मद मुकीमुद्दीन यासिर को सिपाहियों के एक दल ने गिरफ्तार कर लिया. दस दिन बाद 25 जुलाई को जब बंगलोर में सीरियल धमाके हुए, जिनमें दो लोगों की मौत हो गई, तो हैदराबाद के पुलिस आयुक्त प्रसन्ना राव ने हिंदुस्तान टाइम्स को एक नयी बात बताई. उनके मुताबिक पूछताछ के दौरान यासिर ने ये बात स्वीकारी थी कि गिरफ्तारी से पहले वो आतंकियों को कर्नाटक ले गया था और वहां पर उसने उनके लिए सुरक्षित ठिकाने की व्यवस्था की थी. मगर जेल में उससे मिलकर लौटीं उसकी मां यासिर के हवाले से तहलका को बताती हैं कि पुलिस झूठ बोल रही है, और पुलिस आयुक्त जिसे पूछताछ कह रहे हैं असल में उसके दौरान उनके बेटे को कठोर यातनाएं दी गईं. वो कहती हैं, "उसे उल्टा लटका कर पीटा जा रहा था."

हालांकि पुलिस के सामने दिये गए बयान की कोई अहमियत नहीं फिर भी अगर इसे सच मान भी लें तो ये हैदराबाद पुलिस के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा होगा. आखिर यासिर सिमी का पूर्व सदस्य था, उसके पिता और एक भाई आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद हैं. उसके पिता की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट तक से खारिज हो चुकी है. ये जानते हुए कि उसके भाई और बाप खतरनाक आतंकवादी हैं हैदराबाद पुलिस को हर वक्त उसकी निगरानी करनी चाहिए थी, और जैसे ही वो आतंकियों के संपर्क में आया उसे गिरफ्तार करना चाहिए था.

पुलिस ने न तो यासिर के बयान पर कोई ज़रूरी कार्रवाई की जिससे बैंगलुरु का हमला रोका जा सकता और न ही वो यासिर द्वारा कर्नाटक में आतंकियों को उपलब्ध करवाया गया सुरक्षित ठिकाना ही ढूंढ़ सकी. इसकी वजह शायद ये रही कि उसने ऐसा कुछ किया ही नहीं था. तहलका संवाददाता ने हैदराबाद में यासिर की गिरफ्तारी के एक महीने पहले 12 जून को उससे मुलाकात की थी. उस वक्त यासिर अपने पिता द्वारा स्थापित वर्कशॉप में काम कर रहा था. उसका कहना था, "मेरे पिता और भाई को फंसाया गया है."

ऐसा लगता है कि अंतर्मुखी यासिर फर्जी मामलों का शिकार हुआ है. 27 सितंबर 2001 को सिमी पर प्रतिबंध लगाए जाने के वक्त वो सिमी का सदस्य था. (तमाम सरकारी प्रचार के बावजूद देश की किसी अदालत ने अभी तक एक संगठन के रूप में सिमी को आंतकवाद से जुड़ा घोषित नहीं किया है) यासिर ने देश भर में फैले उन कई लोगों की बातों को ही दोहराया जिनसे तहलका ने मुलाकात की थी. उसने कहा कि सिमी एक माध्यम था जो धर्म में गहरी आस्था और आत्मशुद्धि का प्रशिक्षण देता था और इसका आतंकवाद या फिर भारत विरोधी साजिशों से कोई नाता नहीं था। "सिमी चेचन्या से लेकर कश्मीर तक मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की बात करता था", यासिर ने बताया. "उसने कभी भी बाबरी मस्जिद का मुद्दा नही छेड़ा और इसी चीज़ ने हमें सिमी की तरफ आकर्षित किया", वो आगे कहता है.
 

मौलाना नसीरुद्दीन

सिमी पर जिस दिन प्रतिबंध लगाया गया था उसी रात हैदराबाद में यासिर और सिमी के कई प्रतिनिधियों को ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. अगले दिन उन्हें ज़मानत मिल गई. एक दिन बाद ही पुलिस ने तीन लोगों को सरकार के खिलाफ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. दो लोगों को फरार घोषित कर दिया गया जिनमें यासिर भी शामिल था. उन्होंने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और उन्हें जेल भेज दिया गया. यहां यासिर को 29 दिनों बाद ज़मानत मिली. इस मामले में सात साल बीत चुके हैं, लेकिन सुनवाई शुरू होनी अभी बाकी है.

यासिर के पिता की किस्मत और भी खराब है. इस तेज़ तर्रार मौलाना की पहचान सरकार के खिलाफ ज़हर उगलने वाले के रूप में थी, विशेषकर बाबरी मस्जिद और 2002 के गुजरात दंगो के मुद्दे पर इनके भाषण काफी तीखे होते थे. तमाम फर्जी मामलों में फंसाए गए मौलाना को हैदराबाद पुलिस ने नियमित रूप से हाजिरी देने का आदेश दिया था.

इसी तरह अक्टूबर 2004 को जब मौलाना पुलिस में हाजिरी देने पहुंचे तो अहमदाबाद से आयी एक पुलिस टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर गुजरात में आतंकवादी साजिश रचने और साथ ही 2003 में गुजरात के गृह मंत्री हरेन पांड्या की हत्या की साजिश रचने का आरोप था।

मौलाना के साथ पुलिस स्टेशन गए स्थानीय मुसलमानों ने वहीं पर इसका विरोध करना शुरू कर दिया। इस पर गुजरात पुलिस के अधिकारी नरेंद्र अमीन ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाल कर फायर कर दिया जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। इसके बाद तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। नसीरुद्दीन के समर्थकों ने अमीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर मृत शरीर को वहां से ले जाने से इनकार कर दिया। अंतत: हैदराबाद पुलिस ने दो एफआईआर दर्ज कीं। एक तो मौलाना की गिरफ्तारी का विरोध करने वालों के खिलाफ और दूसरी अमीन के खिलाफ।

अमीन के खिलाफ दर्ज हुआ मामला चार साल में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। हैदराबाद पुलिस को उनकी रिवॉल्वर जब्त कर मृतक के शरीर से बरामद हुई गोली के साथ फॉरेंसिक जांच के लिए भेजना चाहिए था। उन्हें अमीन को गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सम्मुख पेश करना चाहिए था। अगर गोली का मिलान उनके रिवॉल्वर से हो जाता तो इतने गवाहों की गवाही के बाद ये मामला उसी समय खत्म हो जाता। पर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

अमीन, मौलाना नसीरुद्दीन को साथ लेकर अहमदाबाद चले गए और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर फाइलों में दब कर रह गई। अमीन ही वो पुलिस अधिकारी हैं जिनके ऊपर कौसर बी की हत्या का आरोप है। कौसर बी गुजरात के व्यापारी सोहराबुद्दीन की बीवी थी जिसकी हत्या के आरोप में गुजरात पुलिस के अधिकारी वंजारा जेल में है। अमीन भी अब जेल में हैं।

इस बीच अमीन के खिलाफ हैदराबाद शूटआउट मामले में शिकायत दर्ज करने वाले नासिर के साथ हादसा हो गया। नासिर मौलाना नसीरुद्दीन का सबसे छोटा बेटा और यासिर का छोटा भाई है। इसी साल 11 जनवरी को कर्नाटक पुलिस ने नासिर को उसके एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया। जिस मोटरसाइकिल पर वो सवार थे वो चोरी की थी। पुलिस के मुताबिक उनके पास से एक चाकू भी बरामद हुआ था। पुलिस ने उनके ऊपर 'देशद्रोह' का मामला दर्ज किया।

आश्चर्यजनक रूप से पुलिस ने अगले 18 दिनों में दोनों के 7 कबूलनामें अदालत में पेश किए। इनमें से एक में भी इस बात का जिक्र नहीं था कि वो सिमी के सदस्य थे। इसके बाद पुलिस ने आठवां कबूलनामा कोर्ट में पेश किया जिसमें कथित रूप से उन्होंने सिमी का सदस्य होना और आतंकवाद संबंधित आरोपों को स्वीकार किया था। 90 दिनों तक जब पुलिस उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने में नाकाम रही तो नासिर का वकील मजिस्ट्रेट के घर पहुंच गया, इसके बाद क़ानून के मुताबिक उसे ज़मानत देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। लेकिन तब तक पुलिस ने नासिर के खिलाफ षडयंत्र का एक और मामला दर्ज कर दिया और इस तरह से उसकी हिरासत जारी रही। इस दौरान यातनाएं देने का आरोप लगाते हुए उसने पुलिस द्वारा पेश किए गए कबूलनामों से इनकार कर दिया।

दोनों को पुलिस हिरासत में भेजने वाले मजिस्ट्रेट बी जिनाराल्कर ने तहलका को एक साक्षात्कार में बताया:

"जब मैं उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए जरूरी कागजात पर दस्तखत कर रहा था तभी अब्दुल्ला (दूसरा आरोपी) मेरे पास आकर मुझसे बात करने की विनती करने लगा।" उसने मुझे बताया कि पुलिस उसे खाना और पानी नहीं देती है और बार-बार पीटती है। वो नासिर के शरीर पर चोटों के निशान दिखाने के लिए बढ़ा। दोनों लगातार मानवाधिकारों की बात कर रहे थे और चिकित्सकीय सुविधा मांग रहे थे"।

"मुझे तीन बातों से बड़ी हैरानी हुई—वो अपने मूल अधिकारों की बात बहुत ज़ोर देकर कर रहे थे। वो अंग्रेज़ी बोल रहे थे और इस बात को मान रहे थे कि उन्होंने बाइक चुराई थी। मेरा अनुभव बताता है कि ज्यादातर चोर ऐसा नहीं करते हैं।"

जब एक पुलिस सब इंस्पेक्टर ने मजिस्ट्रेट को फोन करके उन्हें न्यायिक हिरासत में न भेजने की चेतावनी दी तब उन्होंने सबसे पहले सबूत अपने घर पर पेश करने को कहा। "उन्होंने मेरे सामने जो सबूत पेश किए उनमें फर्जी पहचान पत्र, एक डिजाइनर चाकू, दक्षिण भारत का नक्शा जिसमें उडुपी और गोवा को चिन्हित किया गया था, कुछ अमेरिकी डॉलर, कागज के दो टुकड़े थे जिनमें एक पर www.com और दूसरे पर 'जंगल किंग बिहाइंड बैक मी' लिखा हुआ था।

जब मैंने इतने सारे सामानों को एक साथ देखा तो मुझे लगा कि ये सिर्फ बाइक चोर नहीं हो सकते। बाइक चोर को फर्जी पहचान पत्र और दक्षिण भारत के नक्शे की क्या जरूरत? उनके पास मौजूद अमेरिकी डॉलर से संकेत मिल रहा था कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्क हैं। कागज पर www.com से मुझे लगा कि वे तकनीकी रूप से दक्ष भी हैं। दूसरे कागज पर लिखा संदेश मुझे कोई कूट संकेत लगा जिसका अर्थ समझने में मैं नाकाम रहा। इसके अलावा जब मैंने दक्षिण भारत के नक्शे का मुआयना शुरू किया तो उडुपी को लाल रंग से चिन्हित किया गया था। शायद उनकी योजना एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान उडुपी में हमले की रही हो।"

"मुझे लगा कि इतने सारे प्रमाण नासिर और अब्दुल्ला को पुलिस हिरासत जांच को आगे बढ़ाने के वास्ते हिरासत में भेजने के लिए पर्याप्त हैं।"

तो क्या मौलाना हलीम, मुकीमुद्दीन यासिर, मौलाना नसीरुद्दीन, और रियासुद्दीन नासिर के लिए कोई उम्मीद है?  यासिर और नासिर की मां को कोई उम्मीद नहीं है। वे गुस्से में कहती हैं, "क्यों नहीं पुलिस हम सबको एक साथ जेल में डाल देती है।" फिर गुस्से से ही कंपकपाती आवाज़ कहती है, "और फिर वो हम सबको गोली मार कर मौत के घाट उतार दें।"


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Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

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Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

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Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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