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Thursday, June 7, 2012

औरतों की गुलामी का संविधान है पौराणिक संविधान : मैत्रेयी पुष्पा

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औरतों की गुलामी का संविधान है पौराणिक संविधान : मैत्रेयी पुष्पा

औरतों की गुलामी का संविधान है पौराणिक संविधान : मैत्रेयी पुष्पा

By  | May 26, 2012 at 9:45 pm | No comments | मुठभेड़

मैत्रेयी पुष्पा

कलावती चाची और सारंग जैसे महिला चरित्रों ने मैत्रेयी पुष्पा को एक समय चर्चा के शिखर पर बिठा दिया था। आज भी उस की गूंज गई नहीं है। मैत्रेयी की बात चलती है तो कलावती और सारंग साथ हो लेती हैं। अनायास। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास 'चाक' में एक स्त्री, एक पुरुष के भीतर पुंसत्व जगाने के लिए देह समर्पण करती है और दूसरे संदर्भ में एक स्त्री अपने संघर्ष के सहचर मित्र के घायल होने पर अचानक इस हद तक आसक्ति अनुभव करती है कि उस के प्रति समर्पित हो जाती है। यानी दोनों प्रसंग यौन शुचिता की बनी बनाई धारणा को तोड़ते हैं। यह दोनों स्त्रियां क्रमश: 'चाक' की कलावती चाची और सारंग हैं। 'चाक' में एक संवाद है कि 'हम जाट स्त्री बिछुआ अपने जेब में रखती हैं। जब चाहती हैं पहन लेती हैं जब चाहती हैं उतार देती हैं।' इस संवाद के बहाने मैत्रेयी स्त्री में बगावत के बीज बोना चाहती हैं।

दरअसल बीते कुछेक वर्षों में ही मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी कथा साहित्य में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। 'इदन्नमम' और 'चाक' उनके दो उपन्यासों से वह लगातार चर्चा बनी हुई हैं। 'चाक' में एक बहुत पिछड़े गांव की स्त्री सारंग व्यक्तिगत संघर्ष को पूरी दृष्टि के साथ सामाजिक संघर्ष में बदलती है और स्त्री की मुक्ति का एक अनोखा दर्शन प्रस्तुत करती है। पुरुष प्रधान सामंती समाज के विरुद्ध खड़े होने पर जो साहस वह दिखाती है वह स्त्री मुक्ति पर नए सामाजिक रक्षण के रूप में देखने लायक है। वास्तव में मैत्रेयी पुष्पा आंचलिकता की उसी ज़मीन पर खड़ी हैं जिस पर रेणु खड़े मिलते हैं, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा रेणु से भी आगे हैं तो इस लिए कि उन के यहां उन की अंतर्वस्तु बहुत अग्रगामी और क्रांतिकारी नज़र आती है। अब तो अल्मा कबूतरी, इसुरी फाग जैसे उपन्यास और उन की आत्मकथा कस्तूरी कुंडल बसे भी आ कर चर्चा में आ चुकी हैं। राजेंद्र यादव से उन का जुडाव भी खूब चर्चा में आया। तब और जब उन्हों ने मैत्रेयी को एक बार मरी हुई गाय कह दिया। अभी बीते दिनों नया ज्ञानोदय को दिए गए एक इंटरव्यू में जब विभूति नारायन राय ने लेखिकाओं को छिनाल शब्द से नवाज़ा, तो मैत्रेयी ने विभूति नारायन राय समेत नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और उन की मंडली को जिस तरह अकेलेदम दौड़ा लिया, और बहुत दूर तक। वह भी हैरतंगेज़ था। मंज़र यह हो गया कि जैसे शिकारी ही शिकार से भागने लगा। और भागते-भागते हांफने लगा हो। अंतत: विभूति नारायन राय और रवींद्र कालिया को आफ़िशियली, सार्वजनिक रुप से इस के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी। मैत्रेयी जैसे विजयी नायिका बन कर उभरीं। और मैं समझता हूं कि इस पूरे विवाद की खुमारी हिंदी समाज के मन से अभी भी उतरी नहीं है। खैर, १९९७ में कथाक्रम की एक गोष्ठी में भाग लेने वह लखनऊ आई थीं। दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए तभी उन से यह बात-चीत की थी। पेश है उन से बातचीत के अंश -

पहले आप के बारे में ही जानें?
अलीगढ़ के एक गांव सिकुर्रा में 30 नवंबर 1944 में पैदा हुई। प्राइमरी पढ़ाई भी वहीं की। पिता के निधन के बाद मां के साथ झांसी के खिल्ली गांव आ गई। पिता खेती करते थे पर मां ने नौकरी शुरु की। फिर एक यादव परिवार में मेरी परवरिश शुरु हुई। मेरा पालन पोषण और पढ़ाई-लिखाई यादव परिवार में ही हुआ।

लिखना कब से शुरू किया?
कालेज के समय से ही। कविताएं। फिर शादी हो गई तो लिखना बंद हो गया। शादी तो बीच पढ़ाई में हो गई थी। बच्चों को संभालने में लग गई। जब बच्चे बड़े हो गए तो लिखना शुरू किया।

बच्चे कितने हैं?
तीन बेटियां हैं और तीनों डाक्टर हैं। पति डा. आर सी शर्मा भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में एडिशनल डरायरेक्टर जनरल हैं। वह भी डाक्टर रहे हैं। अलीगढ़ से ही वह भी हैं।

कभी आप ने भी नौकरी की?
मैं ने कभी नौकरी नहीं की। लिखने के अलावा कुछ नहीं किया।

बाकायदा कब से लिखना शुरू किया? 
1985 से। चिन्हार, ललमनिया और गोमा हंसती है तीन कहानी संग्रह और 4 उपन्यास स्मृति दंश, बेतवा बहती रही, इदन्नम और चाक हैं।

पर चर्चा इदन्नमम से शुरू हुई?
हां।

लगातार चर्चा में बने रहने से क्या महसूस करती हैं?
एक लेखक के इतना चर्चित होने का मतलब अपने चर्चित रहने से नहीं, हां किताब लोगों तक पहुंची तो!

यह जो एक साथ आपने दलित और स्त्री दोनों का विमर्श शुरू किया तो क्या यह सब कुछ नियोजित कर के किया?
नियोजित नहीं किया।

फिर?
स्वभाविक रूप से दलित एक साथ होगा। आप ने देखा होगा कि अगर घर में दो नौकर होते हैं तो एक हो जाते हैं। गुलामी उन्हें आपस में जोड़ देती है और आज़ाद होने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

लेकिन अमूमन घरों में नौकर इन दिनों गुलाम नहीं होते। वह जीविका के लिए नौकर बने होते हैं। तो यहां उन की आज़ादी से क्या मतलब?
नौकर वाली बात आप छोड़ दीजिए। दास मान लीजिए और जो भी दास होगा, जिस के ऊपर दासता थोपी जाएगी वही अपने को शोषित पाएगा। अपने ही से मिलेगा। किसी मालिक से तो मिलेगा नहीं।

औरतों को आप भी शोषित और दासता के फ्रेम में बांधती हैं?
पांच हज़ार साल का पौराणिक संविधान औरतों की गुलामी का संविधान है।

और आज का संविधान?
आज के संविधान में लिखित रूप में तो औरतो को हक है, व्यवहारिक रूप में नहीं। गांव की औरत आज भी अपने मन से वोट तक डालने नहीं जाती। तो यह दोगली नीति हुई कि नहीं!

यह जो फ़ेमिनिस्ट औरतें हैं उन की भी वकालत करना चाहेंगी?
नहीं। पर मैं औरतों को खाने में बांट कर नहीं देखती। हां, वुमेनिज़्म जब नारेबाजी में आ जाती है तो इस को मैं नहीं मानती। क्यों कि किसी आंदोलन के लिए संघर्ष ज़रूरी होता है नारा नहीं। फ़ेमिनिस्ट स्त्री भी, कहीं भी हो जब तक मानसिक गुलामी से नहीं छूटती, आज़ाद नहीं होगी। चाहे वह कितने भी नारे लगाए।

आप अपनी स्त्री को संघर्ष के भीतर पाती हैं?
मैं अपनी स्त्री को संघर्ष के भीतर पाती हूं।

तो आप भी दासता में जी रही हैं? आजाद नहीं हैं?
अगर आजादी पा ली होती तो क्यों लिखती? क्यों किसी त्रासदी की बात करती? तब तो जद्दोजहद खत्म हो गई होती।

यह बताइए कि कलावती चाची और सारंग एडाप्टेड करेक्टर हैं कि क्रिएटेड। 
कलावती चाची तो एडाप्टेड करेक्टर हैं पर सारंग क्रिएटेड।

कलावती चाची इस समय किस स्थिति में हैं?
अपनी ही स्थितियों में।

कलावती चाची को मालूम है क्या अपने इस चरित्र के बाबत कि वह 'चाक' में किस तरह उपस्थित हैं?
कलावती पढ़ी लिखी नहीं है। पर जब कलावती चाची यह जानेंगी तो मेरी गरदन काट लेंगी।

तो कब तक बची रहेगी आप की गरदन?
नहीं बचेगी। गांव में तो लोग पूछते रहते हैं चाक के बारे में कि कब छपेगी किताब, लेकिन मैं टाल जाती हूं।

क्या ओरिजिनल कलावती चाची भी ऐसी ही हैं जैसी चाक में उपस्थित हैं?
हां।

कि किसी पुरूष का पुसंत्व जगाने के लिए देह समर्पित कर दें?
उन का स्वभाव यही है।

कलावती का चरित्र फ्रेम करते समय क्या जैनेंद्र कुमार की सुनीता भी कहीं आप के जेहन में थी?
नहीं। क्यों?

इस लिए कि सुनीता की नायिका भी एक क्रांतिकारी के सोए क्रांतिकारी को जगाने खातिर एक निर्जन जगह अचानक निर्वस्त्र हो जाती है और आप की स्थिति थोड़ी अलग है कि पुंसत्व जगाने के लिए स्त्री समर्पित हो जाती है!
नहीं मेरे जेहन में यह नहीं था। सुनीता की याद भी नहीं है। पर यह सब परिस्थितियों की डिमांड है। सारंग का संसर्ग या कलावती का संसर्ग। फिर वह बिछुआ वाला संवाद भी इसी अर्थ में है कि हम जाट स्त्री बिछुआ अपनी जेब में रखती हैं। जब चाहती हैं पहन लेती हैं, जब चाहती हैं उतार लेती हैं।

संदेश क्या देना चाहती हैं इस संवाद से?
यह कि सुहाग चिह्न पुरूष को क्यों नहीं दिए? क्यों स्त्री को ही दिए, उसे वह संस्कार दे दिए कि वह सजने संवरने लगती है। क्यों ?

तो क्या आप चाहती हैं कि पुरुषों को भी सुहाग चिह्न दिया जाना चाहिए?
नहीं। किसी को भी सुहाग चिह्न नहीं दिया जाना चाहिए।

आप को नहीं लगता कि कलावती चाची और सारंग जैसे चरित्रों के चलते ही आप चर्चा में छा गईं?
आप इस बहाने अश्लीलता का आरोप मढ़ना चाहते हैं?

नहीं। शील-अश्लील की बात नहीं। पर यह तो हो ही गया है कि कई महिला लेखिकाओं के लिए आप एक बैरियर रेखा बन कर उभरी हैं। सब की चिंता यही है कि इस मैत्रेयी पुष्पा बैरियर से बड़ा बैरियर कैसे गढ़ें?
इस की तरफ तो मैं ने नहीं सोचा पर यह बात ज़रुर है कि गांव की स्त्री पहली बार इस रुप में आई है तो इस से किसी को परेशानी होती है या बैरियर दिखता है तो मैं क्या करूं?

गांव पर ही लिखती रहेंगी या?
गांव को समस्या छोड़ेगी नहीं तो कैसे छोड़ सकती हूं गांव पर लिखना!

गांव अब भी जाती हैं?
हर महीने गांव जाती हूं।

बरसों से अब आप शहर में रह रही हैं। किसी शहरी प्लॉट पर लिखने का मन नहीं होता?
मैं शहरी नहीं बन पाई।

क्यों?
यह व्यक्तिगत बात है। क्यों कि गांव से ही मानसिक स्तर पर जुड़ी हुई हूं। आज भी।

इस्मत चुगताई, महाश्वेता देवी, मृदुला गर्ग और मैत्रेयी पुष्पा इन चार बिंदुओं को मिलाना हो किसी रेखा द्वारा तो कैसे मिलाएंगी आप?
मैं नहीं मिलाना चाहूंगी।

आप एक तरफ दलितों, दासों की बात करती हैं दूसरी तरफ 'बोल्ड' हो जाती हैं, इसलिए भी इस रेखा की अर्थवत्ता और इयत्ता बनती है!
फिर भी मैं कुछ नहीं कहूंगी।

अच्छा महाश्वेता देवी से आप अपने को कितना करीब या कितना दूर पाती हैं?
अगर किसी के करीब हूं तो रेणु और महाश्वेता के। महाश्वेता के बहुत करीब पाती हूं। दूर का सवाल कहां उठता है वहां जहां शोषण हो!

मैत्रेयी पुष्पा आपका मूल नाम है?
मैत्रेयी मेरा मूल नाम है। पुष्पा बोलने का।

जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि को आप ने बताया उसमें मैत्रेयी नाम कैसे?
पत्रा और पंडित के अनुसार राशि का यही नाम निकला था। और आप यह बताइए कि गांव में विद्वान मनुष्य होना क्या आप को आश्चर्य में डाल रहा है?

नहीं मैं भी गांव का हूं। चलिए बताइए कि आप की अरेंज्ड मैरेज थी या?
अरेंज्ड!

सरोकार नामा

दयानंद पांडेय

दयानंद पांडेय ,लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एम.ए. करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्रकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नही पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह 'एक जीनियस की विवादास्पद मौत' पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब 'माई आइडल्स' का हिंदी अनुवाद 'मेरे प्रिय खिलाड़ी' नाम से प्रकाशित। उनका ब्लाग है- सरोकारनामा

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मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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