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Tuesday, March 13, 2012

अखिलेश की जीत का अर्थ

अखिलेश की जीत का अर्थ 


Tuesday, 13 March 2012 09:46

कुमार प्रशांत 
जनसत्ता 13 मार्च, 2012: उत्तर प्रदेश का चुनाव अगर सच में किसी ने जीता है तो अखिलेश यादव ने। वे भारतीय राजनीति का नया चेहरा हैं। यह चेहरा कितना असली, कितना टिकाऊ है यह बताना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन यह कहना जरूरी है कि अपनी पार्टी और उसकी सूरत को संवारने की दिशा में अखिलेश ने जो काम किया और जिस तरह किया है, उसे राजनीतिक अजूबा माना जा सकता है। 
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में आज कुछ भी समाजवादी नहीं बचा है। राज्य से लेकर केंद्र तक सत्ता के खेल में अपनी जगह बनाने की इतनी लंबी यात्रा के क्रम में मुलायम सिंह ने अगर कुछ उतार फेंका तो वह था समाजवाद और जो संभाल कर रख लिया वह था जोड़-तोड़ का मूल्यविहीन समीकरण। अमर सिंह, कल्याण सिंह से लेकर कितने ही फिल्मी सितारे और धनपति जब समाजवाद की अगवानी करने लगे तब कहने के लिए बाकी भी क्या रहा! फिर भी उनकी एक ताकत बची रही- जातीय ताकत! ऐसी ताकत के आधार पर राजनीति करना कितना और कैसा समाजवाद है यह तो समाजवाद के पंडित ही बता सकते हैं, लेकिन यही आधार रहा है जिसके बल पर मुलायम सिंह राजनीति में अब तक बने रहे हैं। इसलिए कहें तो मुलायम सिंह और मायावती के राजनीतिक आधारों और इसलिए दोनों की राजनीति में भी कोई खास फर्क नहीं है। दोनों विभिन्न गठजोड़ों के सहारे मुख्यमंत्री बनते रहे और यही साबित करते रहे कि जहां तक दिशा और दशा का सवाल है, हम एक ही नाव पर सवार हैं। 
मुलायम सिंह ने अपनी पार्टी का दूसरा आधार अपराधी तत्त्वों को जमा कर तैयार किया। कभी किसी ने राजनीति की परिभाषा करते हुए कहा था कि राजनीति अपराधी और गुंडा तत्त्वों की अंतिम पनाहगाह है। मुलायम सिंह ने इसे सही साबित करने में कुछ भी उठा नहीं रखा। उत्तर प्रदेश की राजनीति अपराध का सबसे बड़ा गढ़ बनी हुई है तो इसकी जिम्मेवारी से मुलायम सिंह बच नहीं सकते! जाति का मजबूत समर्थन और अपराधियों की ताकत का सहारा- मुलायम सिंह ने यह समीकरण बनाया। यह समझने की बात है कि जब आप ऐसे आधार पर अपना सार्वजनिक काम करते हैं तब पारिवारिक लोग ही आपको सबसे अधिक विश्वसनीय लगते हैं। मुलायम सिंह ने भी ऐसा ही किया और उनकी पार्टी, उनके परिवार के आधार पर खड़ी हुई। मुलायम सिंह के पास जो भी थोड़ा-बहुत समाजवादी संस्कार था, परिवार के दूसरों के पास तो वह भी नहीं था। इसलिए पार्टी का साइनबोर्ड कुछ रहा और पार्टी कुछ रही।  
आज यह सब याद करना जरूरी है ताकि अखिलेश ने जो जीत हासिल की है, उसका सही अर्थ समाजवादी पार्टी के दूसरे आका भी समझ सकें और पिता मुलायम सिंह भी! इसे समझना जरूरी है, क्योंकि अखिलेश ने जो रास्ता पकड़ने की कोशिश की है उसमें उसे आगे आंतरिक समर्थन की बहुत जरूरत होगी। अखिलेश हमारी उस युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जो दलीय राजनीति के विकल्प आदि जैसी जटिल बातों में नहीं पड़ता, बल्कि राजनीति का चेहरा सुधार कर काम करना चाहता है। यह बहुत कुछ राहुल गांधी के सोच जैसा ही है। लेकिन अखिलेश को इस अर्थ में राहुल गांधी से ज्यादा सुविधाजनक स्थिति मिली है कि उन्हें मजबूत जातीय आधार वाली एक ऐसी पार्टी मिली जिसकी जड़ें नीचे तक फैली हुई हैं, जिसने राज्य में सत्ता का स्वाद चखा है और जिसे अपने बाहुबलियों की ताकत पर भरोसा भी है। 
इस बार उन्हें चुनौती मायावती को देनी थी। उन्हें चुनौती भी मायावती से ही मिल रही थी, लेकिन ये वे मायावती थीं जो चुनाव शुरू होते ही हार गई थीं। ऐसा नहीं था कि मायावती का दलित आधार कहीं खिसक गया था और न ऐसा ही था कि राजनीतिक नेत्री के तौर पर वे किसी से कम पड़ रही थीं। लेकिन उनकी परेशानी दो स्तरों पर थी- उनके पास कोई अखिलेश यादव नहीं था और न अपने शासनकाल की उपलब्धि के तौर पर दिखाने को कुछ खास था। 
मगर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी में किसी दलित अखिलेश को उभरने नहीं दिया है। ऐसा शायद इसलिए भी कि मायावती का अपना राजनीतिक सफर अभी लंबा चलने वाला है। वे तो अभी अपना उत्तराधिकार ही संभाल रही हैं, उत्तराधिकारी तैयार नहीं कर रहीं। इसलिए इस चुनाव में वे अपनी ही छवि की बंदी बन कर, बेहद अकेली रह गई थीं।
जब आप राजनीतिक तौर पर कमजोर पड़ जाते हैं तब दूसरी ताकतें भी साथ छोड़ देती हैं। दलित समाज के तमाम नेताओं ने, जिन्हें मायावती अपने पास फटकने नहीं देती थीं, इसी वक्त में अपना दामन झाड़ लिया। दलित भी मायावती से टूटे! अब अखिलेश को अपेक्षया एक कमजोर मायावती से लड़ना था। मायावती किनारे लगीं तब अखिलेश ने समझ लिया कि अब राहुल से सीधे जूझ पड़ने की जरूरत है। उन्होंने यह काम बखूबी किया। भारतीय राजनीति का यह सच अब तक सबको समझ में आ गया है कि हमारे समाज का गठन ऐसा है कि किसी एक धर्म या जाति के ध्रुवीकरण से आप निर्णायक राजनीतिक सत्ता हासिल नहीं कर सकते। 
भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी अपनी-अपनी तरह से यह पाठ पढ़ लिया है और अपनी सफलता के नए समीकरण बनाए हैं। राजनीतिक भ्रष्टाचार से पैसा बनाने की शुरुआत मायावती ने की और जब सब ऐसा करने लगे तो वे चुनाव से ठीक पहले नैतिकता का आधार खोजने लगीं। ऐसा ही दलितों से अलग अपना समर्थन खड़ा करने के मामले में भी हुआ। दूसरे दलित नेता उसी हथियार से मायावती को पीटने लगे, जिससे वे आज तक सवर्णों को पीटती आई थीं।   मायावती जल्दी ही समझ गर्इं कि बाजी उनके हाथ से निकल चुकी है। 

सपा के लिए यह आसान स्थिति थी। लेकिन अगर अखिलेश नहीं होते तो थके और उम्र की मार झेलते मुलायम सिंह के पास था कौन- आजम खान, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव! इनकी दूसरी विशेषताओं को छोड़ दें तो भी ये कभी पार्टी का नेतृत्व करने वाली ताकत नहीं रहे हैं। बहुत हुआ तो नेताजी के दुमछल्ले रहे हैं! अखिलेश ने समय रहते यह समझ लिया कि पार्टी अगर पिता के सहारे रही तो डूब जाएगी। उन्होंने पार्टी को अपने हाथ में ले लिया, लेकिन कोई शोर नहीं मचाया। वे एक-एक कर पार्टी में अपना आधार मजबूत करते रहे और चाचाओं-मामाओं को किनारे करते गए। 
दूसरी तरफ उन्होंने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की जमीनी भागदौड़ देखी तो इस चुनौती को समझा और इसके जवाब में अपनी जमीनी भागदौड़ शुरू कर दी। उन्होंने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत की और पार्टी को लोगों में भी पहुंचाया। ऐसी योजनाबद्धता से काम करना मुलायम सिंह की फितरत नहीं है। 
इसके दो परिणाम तुरंत आए- पार्टी के पुराने चेहरे पीछे छूटते गए और नई ताकतें जड़ जमाती गर्इं। संयत भाषा और अपनी कमजोरियों से छुटकारा पाने की कोशिश भी अखिलेश के काम आई। राजनीतिक सार्वजनिक जीवन में से भद्रता और शालीनता को हमने जिस तरह विदा कर दिया है, अखिलेश ने उसे किसी हद तक वापस किया है। उनका चुनाव प्रचार अभद्र आक्रामकता और बड़बोलेपन से अलग रहा। यह शालीनता सबको भाई। चुनाव परिणाम जैसे-जैसे शक्ल लेने लगे, राहुल गांधी का धैर्य छूटने लगा था। वे नाराज युवा कम, सिर नोचते, परेशानहाल नेता ज्यादा लगने लगे थे। 
सपा के घोषणापत्र जैसा कोई कागज फाड़ कर हवा में उड़ाने का उनका तेवर भी अखिलेश ने यह कह कर पचा लिया कि सावधान रहें कांग्रेस वाले, कहीं राहुल गांधी अपनी पराजय निश्चित जान कर मंच से नीचे छलांग न लगा दें। यह मौका था कि अखिलेश उन पर तीखे हमले करते, लेकिन दो-एक टिप्पणियों से अधिक अखिलेश ने कुछ नहीं कहा। वे किसी भी व्यक्तिगत आक्षेप से बचते रहे। 
अखिलेश ने अपनी पार्टी के साथ जुड़े समाजवादी विशेषण नहीं छोड़े, लेकिन यह भी सावधानी रखी कि समाजवाद के घटाटोप में न फंसें। इसलिए अंग्रेजी, कंप्यूटर आदि के सवाल पर जैसी खिचड़ी मुलायम सिंह ने पका रखी थी, अखिलेश ने उस बारे में कुछ भी कहे बिना पार्टी को उससे अलग कर लिया। आज समाजवाद के बारे में शायद यही सबसे समझदारी भरा कदम है। 
अखिलेश ने अपने साथी खड़े किए, अपने युवा कार्यकर्ताओं की फौज बनाई और उन्हें साधन-संपन्न किया। बसों, हेलिकॉप्टरों की कमी नहीं थी तो साइकिल पर निकलने वालों की भी नहीं। आइपॉड लेकर साइकिल चलाने वाला यह युवा उत्तर प्रदेश के समाज की कई आकांक्षाओं को एक साथ जोड़ सका। आठ हजार किलोमीटर की क्रांति-रथ यात्रा और ढाई सौ किलोमीटर की साइकिल यात्रा ने अखिलेश को दूसरे सारे लोगों से आगे खड़ा कर दिया। 
राहुल और अखिलेश के व्यक्तित्व में जो फर्क है वही उनके राजनीतिक कर्म में भी है। नेहरू खानदान इस भ्रम में रहता है कि उसे देखने भर से लोग वोट दे देते हैं। लेकिन यह जवाहरलाल नेहरू के वक्त में तो कुछ सच भी था, अब नहीं। इसलिए राहुल लोगों को, कार्यकर्ताओं को जितना कम वक्त देते थे उसमें दर्शन देने का भाव ज्यादा रहता था, राजनीतिक पहल का कम! प्रियंका ने इसे आसमानी उपस्थिति वाली स्थिति को और भी उभार दिया। जब आपकी पार्टी का आधार मजबूत हो तब ऐसी आसमानी शैली भी काम कर जाती है, लेकिन जब पार्टी की बुनियाद ही नहीं है तब यह शैली भला से ज्यादा बुरा कर जाती है। राहुल अब इसे समझ पा रहे हों शायद। 
अपने साथियों, पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए अखिलेश सहज उपलब्ध रहे। वे मुलायम सिंह यादव के बेटे की तरह नहीं, सपा के मुख्य चुनाव प्रचारक की तरह मैदान में थे। वे मुद्दों के बारे में राहुल गांधी की तरह स्पष्ट नहीं थे और अपनी पार्टी के अलावा दूसरे सवालों पर ज्यादा कुछ कहते भी नहीं थे। यह ऐसी कमजोरी थी, जिसे राहुल निशाने पर ले सकते थे, लेकिन राहुल की दिक्कत यह थी कि वे उत्तर प्रदेश में दिल्ली की लड़ाई लड़ रहे थे, जबकि अखिलेश उत्तर प्रदेश में लखनऊ की लड़ाई लड़ रहे थे। स्वाभाविक था कि वे मतदाताओं, युवकों को ज्यादा अपने लगे। 
अब, जब अखिलेश राजनीति में अपनी दूसरी भूमिका निभाने को हैं, उन्हें पता चलेगा कि जो वादे उन्होंने किए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए उन्हें भी किसी स्तर पर मायावती बनना पड़ेगा। एक अनुमान के मुताबिक जितने वादे सपा ने किए हैं उन्हें पूरा करने में उसे छियासठ हजार करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। उत्तर प्रदेश का खजाना मायावती ने खाली कर रखा है। अब अखिलेश को बताना है कि इतने पैसे कहां से आएंगे! फिर यह भी देखना है कि अखिलेश में पार्टी और प्रशासन को नाथने की क्षमता कितनी है। 
उत्तर प्रदेश को गुंडागर्दी, अव्यवस्था, दिशाहीन प्रशासन और राजनीतिक फिजूलखर्ची से तुरंत छुटकारा चाहिए। मुलायम सिंह और मायावती ने अपने शासन-काल में इन सभी स्तरों पर उत्तर प्रदेश को एकदम खोखला कर दिया है। प्रशासन का निम्न-स्तरीय राजनीतिकरण हुआ है। मुलायम सिंह की सपा इसी शैली में काम करने की अभ्यस्त रही है। अखिलेश की सपा चाहे तो बड़ी आसानी से इसी शैली में काम कर सकती है। मगर ऐसा करने के साथ ही सपा और अखिलेश की संभावनाएं बिखर जाएंगी।

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