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Thursday, August 11, 2011

जनगणना में जाति की गिनती को खारिज करने के लिए बड़े जोर शोर से आधार कार्ड बनाने का काम नन्दन निलेकणी की अगुवाई में गैरकानूनी ढंग से निजी कंपनियों के जरिए कराया जा रहा है। संसद में अभी कानून पास नहीं हुआ। बायोमेट्रिक पहचान के लिए जनरगणना के तीसरे दौर म

जनगणना में जाति की गिनती को खारिज करने के लिए बड़े जोर शोर से आधार कार्ड बनाने का काम नन्दन निलेकणी की अगुवाई में गैरकानूनी ढंग से निजी कंपनियों के जरिए कराया जा रहा है। संसद में अभी कानून पास नहीं हुआ। बायोमेट्रिक पहचान के लिए जनरगणना के तीसरे दौर में प्रावधान है। दोहराव की हालत में ऐसा पहचान पत्र खारिज हो जाना है। फिर भी गैर कानूनी ढंग से आधार कार्ड अलग से बनाने के काम के बहाने हजारों करोड़ का न्यारा वारा हो रहा है। भ्रष्टाचारविरोधी मुहिम को कारपोरेट कोरप्शन के खिलाफ कुछ नहीं कहना क्योंकि यह तो कुद कोरपोरेट प्रायोजित है। संसद में जाति की गिनती जलगणना में करने के मसले पर कोटे से चुने गए सांसद तक खामोश है। दूसरी ओर आधार परियोजना के जरिए मूलनिवासियों की नागरिकता खत्म करने का अभियान जोरों से चल रहा है। कारपोरेट एलपीजी माफिया के लिए सभी संसाधनों की खुली लूट का पूरा इंतजाम करने खातिर। मंदी के बहाने आर्थिक सुधार के नाम पर विदेशी कारपोरेट पूंजी का राज कायम हो रहा है और भारत में लंदन जैसा ग्लोबेलाइजेशन दंगों के आसार बन गये हैं। मूलनिवासी बहुजनों को आखिरकार प्रतिरोध के लिए कब तक राजनीतिक वैचारिक अगुवाई का इंतजार करना होगा?

पलाश विश्वास

जनगणना में जाति की गिनती को खारिज करने के लिए बड़े जोर शोर से आधार कार्ड बनाने का काम नन्दन निलेकणी की अगुवाई में गैरकानूनी ढंग से निजी कंपनियों के जरिए कराया जा रहा है। संसद में अभी कानून पास नहीं हुआ। बायोमेट्रिक पहचान के लिए जनरगणना के तीसरे दौर में प्रावधान है। दोहराव की हालत में ऐसा पहचान पत्र खारिज हो जाना है। फिर भी गैर कानूनी ढंग से आधार कार्ड अलग से बनाने के काम के बहाने हजारों करोड़ का न्यारा वारा हो रहा है। भ्रष्टाचारविरोधी मुहिम को कारपोरेट कोरप्शन के खिलाफ कुछ नहीं कहना क्योंकि यह तो कुद कोरपोरेट प्रायोजित है। संसद में जाति की गिनती जलगणना में करने के मसले पर कोटे से चुने गए सांसद तक खामोश है। दूसरी ओर आधार परियोजना के जरिए मूलनिवासियों की नागरिकता खत्म करने का अभियान जोरों से चल रहा है। कारपोरेट एलपीजी माफिया के लिए सभी संसाधनों की खुली लूट का पूरा इंतजाम करने खातिर। मंदी के बहाने आर्थिक सुधार के नाम पर विदेशी कारपोरेट पूंजी का राज कायम हो रहा है और भारत में लंदन जैसा ग्लोबेलाइजेशन दंगों के आसार बन गये हैं। मूलनिवासी बहुजनों को आखिरकार प्रतिरोध के लिए कब तक राजनीतिक वैचारिक अगुवाई का इंतजार करना होगा?

जाति गणना के तौर तरीकों पर आपत्ति

Aug 11, 12:14 pm

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नई दिल्ली। लोकसभा में गुरुवार को भाजपा, जदयू, सपा, बसपा, द्रमुक समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने सरकार के जाति आधारित जनगणना के तौर तरीकों पर आपत्ति व्यक्त की।
उनका कहना था कि अलग-अलग स्तर पर गणना कराने की बजाए जनगणना के माध्यम से गरीबी रेख से नीचे गुजर बसर करने वाले और पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या का ब्यौरा तैयार किया जाए। सरकार की ओर से वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सदस्यों को आश्वस्त किया कि उनकी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए इसे दूर करने के उपाए किए जा रहे हैं। सदन की कार्यवाही शुरू होने पर जद यू अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि जाति आधारित जनगणना कराने पर सदन में चर्चा हुई और सदन ने एक राय से इस प्रकार से जनगणना कराने की राय दी, लेकिन अब इसे तीन स्तरों पर गणना कराई जा रही है।
इसके तहत जहा राज्यों से भी गिनती कराने को कहा गया है, वहीं ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय से भी गणना कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि देश में पेड़ पौधो, नदी पहाड़ों की गिनती की जाती है लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गाधी और प्रणब मुखर्जी के आश्वासन के बावजूद इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई गई है जो कभी सफल नहीं होगी। लोकसभा में भाजपा के उपनेता गोपीनाथ मुंडे ने कहा कि 1931 के बाद जाति आधारित गणना कभी नहीं हुई, जबकि संसद ने इससे जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया।
मुंडे ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों ने लिखित रूप में सरकार को जाति आधारित गणना के पक्ष में राय दी, लेकिन अभी जो प्रक्रिया अपनाई गई है, वह जाति आधारित गणना नहीं है। सदन के नेता एवं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि इस विषय के सभी आयामों पर विचार करने के बाद इस पर मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया।
शरद यादव ने जाति आधारित गणना का जो प्रारूप दिया था, उसे अधिकारियों को दिया गया है। समस्या इसे लागू करने को लेकर आई है। इसे दूर कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मैंने इस विषय पर सत्र शुरू होने से पहले गौर किया था। गृह मंत्री ने कहा था कि जो प्रारूप शरद यादव ने दिया था, उसे ही आगे बढ़ाया गया है। आपने कहा कि इसे लागू नहीं किया गया है। हम इसे देख रहे हैं।
इससे पहले, सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सदन ने एकराय से जाति जनगणना के पक्ष में राय व्यक्त की और मुझे मालूम हुआ है कि कैबिनेट में भी बहुमत की इसके पक्ष में राय थी। प्रधानमंत्री ने इसके बारे में आश्वस्त किया था, लेकिन बीच में क्या बात हुई कि यह अटक गया। बसपा के दारा सिंह चौहान ने कहा कि जाति देश की सचाई है और जाति गणना के लिए पूरा देश एकमत है, लेकिन यह मूल भावना के अनुरूप क्यो नहीं बढ़ रही है।
द्रमुक के टी आर बालू ने कहा कि पूरे सदन ने एकमत से जाति आधारित गणना के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसके अभाव में गरीबों के लिए बनाई जा रही योजनाओं पर अमल करने में भारी कठिनाई पेश आएंगी।
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/Objection-practices-caste-census_5_2_6271852.html


पहचान को रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए अब विभिन्न विभागों से डाक्यूमेंटरी प्रूफ लेने की जरूरत नहीं है। आधार के नाम से बनने वाले यूनीक आईडी में दर्ज होने के बाद हर विभाग में डाक्यूमेंटरी प्रूफ के लिए कागज जुटाने की मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।

अमेरिका से सावधान पुनश्च सात नागरिक ...

globalphenomenonaddressed.blogspot.com/.../blog-post_06.html - संचित
6 सितं 2010 – उन लोगों ने हमें परेशानी से बचाने के लिए ऐसा किया होगा। पर जिस दिन हमें इस हादसे की.... पिछले विधानसभा चुनाव में २३ लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से भरते का नागरिक न होने के आरोप... यह किसी से छुपा नहीं है कि अनोखी पहचान की आधार योजना एक कारपोरेट उपक्रम है । ... भारत केविशिष्ट पहचान प्राधिकार (यूआईडीएआई) के अध्यक्ष नंदन निलेकणी के अनुसार विशिष्ट . ...
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  37. इसके लिए अनुवादित अंग्रेज़ी परिणाम देखें:

  38. आधार कार्ड (Base card)





यूनीक आईडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) ने आधार के नाम से भारत के हर नागरिक के लिए आधार कार्ड लांच किया था। जिसको बनाने की जिम्मेदारी ओरिएटंल बैंक ऑफ कामर्स (ओबीसी) ने ली हुई है। हलांकि कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियां भी आम लोगों को पहचान देने वाले इस आईडी का लाभ मिल सके। केंद्र सरकार द्वारा बनाए जा रहे इस आईकार्ड का धारक अपनी पहचान के लिए प्रयोग कर सकता है। वहीं पासपोर्ट, ड्राईविंग लाईसेंस, मतदाता पहचान पत्र के साथ ही अन्य पहचान के लिए प्रयोग किए जाने वाले डाक्यूमेंट बनवाने में आईडी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।


लोगों को जानकारी न होने की वजह से इस ओर ध्यान नहीं जाता। वहीं गलत तरीकों से डाक्यूमेंट जुटा कर लोग पहचान पत्र बनवाने में लगे रहते हैं।

क्या है आधार -बारह अंकों का पहचान नंबर कार्ड-सोहल सूचनाएं होंगी इसमें अंकित-हर व्यक्ति के लिए अलग,बच्चों के लिए भी -व्यक्ति का डेमोग्राफिक और बायोमीट्रिक रिकार्ड होगा इसमें दर्ज-यूनीक आईडी अंतरराष्ट्रीय पहचान देगा,जैसे राशन कार्ड,डीएल आदि से अधिक प्रमाणिक-किसी भी विभाग द्वारा व्यक्ति की जानकारी मिलना होगा आसान

आधार कैसे है सबसे बेहतर-केंद्र सरकार द्वारा जारी किए जाने से हर राज्य में होगा मान्य-सरकारी और गैर सरकारी संगठन द्वारा भी होगा मान्य-इससे गरीब और अनपढ़ तबके को मिलेगी पहचान उनकी सही जानकारी का डाटा होगा तैयार- बैंक और निजी क्षेत्र की कंपनियों के पार्टनर बनने से हर जगह चलेगा कार्डकिस-किस जगह हो रहा है प्रयोग-बैंक अकाउंट खुलवाने में - डीएल बनवाने में -पॉलिसी लेने या फिर डीमैट अकाउंट खुलवाने में -पहचान पत्र के लिए महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट में हो सकेगा प्रयोग- लोन लेने या फिर बैंक से कार्ड आदि लेने में आधार कार्ड बनवानें में दिक्कत कोई नहीं-इसको बनवाने में सिर्फ 27 मामूली डाक्यूमेंट में से देना होगा -बैंक या फिर निजी कंपनियों में रजिस्ट्रेशन है बिलकुल मुफ्त- कौन प्रमाण पत्र दे सकतें हैं आपको 'आधार'-पासपोर्ट-राशन कार्ड-वोटर कार्ड-ड्राइविंग लाइसेंस-एम.जी. रोजगार गारंटी कार्ड-शस्त्र लाइसेंस-क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट-बैंक स्टेटमेंट/पासबुक-स्वतंत्रता सेनानी कार्ड-किसान पासबुक-सीजीएचएस/ईसीएसएस कार्ड-डाक विभाग द्वारा जारी आवास प्रमाण पत्र-लेटरहेड पर संसद सदस्य या वर्ग 'अ' गजटेड अफसर द्वारा फोटो युक्त जारी किया गया आवास प्रमाणपत्र-पेंशनर कार्ड- करेंट पानी का बिल- करेंट बिजली का बिल- करेंट लैंडलाइन बिल -संपत्ति कर की रसीद-बीमा पॉलिसी-लेटरहेड पर बैंक द्वारा जारी हस्ताक्षरित पत्र-लेटरहेड पर रजिस्टर्ड कंपनी द्वारा फोटोयुक्त हस्ताक्षरित पत्र-लेटरहेड पर मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान द्वारा जारी फोटोयुक्त पत्र-गांव सरपंच या उसके समान अधिकार वाले प्रतिनिधि द्वारा जारी आवास प्रमाण पत्र-इनकम टैक्स रिटर्न-वाहन की आरसी-रजिस्टर्ड सेल/लीज/रेंट एग्रीमेंट-राज्य सरकार द्वारा जारी जाति और निवास प्रमाण पत्र-पोस्ट ऑफिस अकाउंट स्टेटमेंट/पासबुकपहचान प्रमाण पत्र के लिए ऊपर दिए गए डाक्यूमेंट के अलावा यह भी हो सकते हैं प्रयोग-पैन कार्ड-सरकारी आईडेंटिटी कार्ड-मान्यता प्राप्त संस्थान द्वारा फोटो आईडी कार्ड शहर में ओबीसी की लोहिया नगर राहुल पैलेस और मेवार इंस्टीटय़ूट में आधार के लिए किया जा रहा है रजिस्ट्रेशन। यूनीक आईडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा अभी दी गईं मशीनों को इन्हीं ब्रांच में लगाया गया है। अथॉरिटी को और मशीनों की डिमांड की गई है। जिनके आते ही अन्य जगहों पर भी यह सेवा शुरू की जाएगी। बैंक फार्म जमा कर डाटा अथॉरिटी को भेज देता है। वहां से रस्ट्रिेशन के दौरान दिए गए पते पर कार्ड डिस्पैच किया जाता है। इसके लिए बैंक द्वारा उपभोक्ता से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

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  40. *
  41. दैनिक भास्कर


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    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देना कड़वी सच्चई है। सामान्य वर्ग के छात्रों को इसे समझना होगा। जस्टिस आरवी रवींद्रन और एके पटनायक की बेंच ने कहा, 'हमें पता है कि सामान्य श्रेणी के छात्र क्या महसूस करते हैं। हम जानते हैं कि जब वे आरक्षित श्रेणी के छात्रों को कम अंकों पर दाखिला लेते देखते हैं तो उनका खून खौल जाता है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि आरक्षण कड़वी सच्चई है।'

    बेंच ने ये टिप्पणी तब की जब आरक्षण विरोधी समूह के वकील ने कहा कि आरक्षित वर्ग की सीटों पर अगर अयोग्य छात्रों को दाखिला दिया गया तो शिक्षा की गुणवत्ता खत्म हो जाएगी। बेंच ने इसी के साथ मामले को चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया को सौंप दिया। ताकि वे एक उचित बेंच गठित कर करें जो 27 प्रतिशत ओबीसी कोटा देने वाले कानून में इस्तेमाल किए गए 'कट-ऑफ' टर्म पर पैदा भ्रम को खत्म कर सके।

    आरक्षण विरोधी समूह की ओर से वरिष्ठ वकील पीपी राव पेश हुए । उन्होंने कहा, मामले की सुनवाई कर रही बेंच में जस्टिस दलवीर भंडारी को शामिल किया जाना चाहिए। वे पांच सदस्यीय बेंच के सदस्य थे। इसी बेंच ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को कुछ शर्तो के साथ हरी झंडी दी थी। राव ने कहा कि जस्टिस भंडारी ने ही अपने फैसले में 'कट-ऑफ' टर्म का इस्तेमाल किया था।

    ऐसे में वे ही स्पष्ट कर सकते हैं कि फैसले में इसका क्या मतलब है। वकील ने कहा कि जस्टिस भंडारी को या तो जस्टिस रवींद्र के नेतृत्व वाली बेंच में शामिल किया जाए। अन्यथा संवैधानिक बेंच गठित किए जाने पर उसमें रखा जाए। इसके बाद बेंच ने एक उचित बेंच बनाने का मामला चीफ जस्टिस को सौंप दिया।
    पश्चिम बंगाल सरकार राज्य में मुस्लिमों के लिए आरक्षणबढ़ाने और समुदाय के विकास के मद्देनजर तीन महीनों के अंदर विधानसभा में एक विधेयक लाएगी।

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि सरकार पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार के प्रयासों पर नए सिरे से विचार करेगी। तत्कालीन सरकार राज्यपाल से सहमति पाने में विफल रही थी।

    ममता ने जज सच्चर के साथ विचार विमर्श करने के बाद कहा,'पूर्ववर्ती सरकार ने जल्दबाजी में काम किया और वह उचित तरीके से विधेयक को नहीं रख पायी। वह राज्यपाल से सहमति पाने में नाकाम रही। हम इस पर नए सिरे से विचार करेंगे और तीन महीने के अंदर विधानसभा में इसे पेश करेंगे।'

    उल्लेखनीय है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पिछले साल फरवरी में ओबीसी कोटा में मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की घोषणा की थी।

    सीएम ममता ने कहा कि विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं ताकि पूर्व की गलतियों को दूर कर और नए प्रावधान शामिल करते हुए विधेयक तैयार किया जा सके।

    ओबीसी को 27 फीसदी कोटा मिलना चाहिए

    SATURDAY, 23 JULY 2011 00:58
    HITS: 57

    नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और अन्य केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के मानक की बहस नए आयामों पर पहुंच गई है।
    सुप्रीम कोर्ट ने जहां प्रवेश में ओबीसी छात्रों को 27 फीसदी निश्चित कोटा दिए जाने की बात कही, वहीं यह भी पूछा कि क्या सामान्य वरीयता सूची में स्थान पाने वाले ओबीसी छात्रों को 27 फीसदी कोटा की गिनती में शामिल किया जा सकता है। इस मामले में अगली सुनवाई मंगलवार को होगी। न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन और न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ ने ये सवाल जेएनयू एवं अन्य केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को प्रवेश दिए जाने के मानक तय करने के संबंध में सुनवाई के दौरान की।
    सुप्रीम कोर्ट से यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि ओबीसी को दाखिला देने में दस अंकों की छूट का मानक क्या होगा। यह छूट सामान्य श्रेणी के अंतिम प्रवेश पाने वाले छात्र के कट ऑफ अंक से मानी जाएगी या फिर सामान्य श्रेणी में प्रवेश की पात्रता के लिए तय अंक सीमा से। यह सवाल उठाया है मद्रास आईआईटी के पूर्व निदेशक पीवी इंद्रेशन ने। बृहस्पतिवार को बहस के दौरान इंद्रेशन के वकील केके वेणुगोपाल ने कहा कि संविधान पीठ के फैसले के मुताबिक ओबीसी को प्रवेश में दस अंकों की छूट कट-ऑफ से
    मानी जाएगी।
    यानि सामान्य वर्ग के अंतिम छात्र के प्रवेश अंक से दस अंक कम। जबकि ओबीसी छात्रों की पैरवी कर रहे वकील एवं केंद्र सरकार के वकील इस दलील से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि ओबीसी छात्रों के लिए दस अंकों की छूट सामान्य वर्ग के लिए प्रवेश पात्रता अंक से दस अंक कम होगी ना कि कट ऑफ से। पीठ ने कहा कि कानून में ओबीसी छात्रों को 27 फीसदी आरक्षण देने का मतलब वास्तव में उन्हें सहूलियतें देकर बराबरी पर लाना है। उन छात्रों को फाइनल परीक्षा में किसी तरह की छूट नहीं मिलती, इसलिए उन्हें थोड़ा सहारा देकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि उन्हें 27 फीसदी आरक्षण मिलना ही चाहिए जैसा कि कानून का मंतव्य है। पीठ ने कहा कि अगर कट ऑफ को सीमा रेखा माना जाएगा, तो आरक्षण का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा, क्योंकि ओबीसी छात्र उस स्तर तक मुकाबला नहीं कर पाएंगे। पीठ ने कहा कि ओबीसी आरक्षण का मसला एससी-एसटी आरक्षण से भिन्न है। पीठ ने पूछा कि क्या सामान्य वरीयता सूची में स्थान पाने वाले ओबीसी छात्रों को 27 फीसदी कोटे की गिनती करते समय कुल संख्या में शामिल किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इन सभी पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है। जब कोर्ट के सामने जेएनयू में प्रवेश के पिछले तीन साल के आंकड़े पेश किए गए तो पीठ ने कहा कि वरीयता सूची के ओबीसी छात्रों को मिलाने के बाद भी आंकड़ा 27 फीसदी नहीं पहुंच रहा है।
    http://pratahkal.com/2010-12-19-03-02-19/2010-12-19-03-04-47/13171---27----.html

    अजा आयोग को 'आरक्षण' पर एतराज

    THURSDAY, 11 AUGUST 2011 07:59
    HITS: 14
    नई दिल्ली। सेंसर बोर्ड ने आखिरकार अनुसूचित जाति आयोग को विवादित फिल्म ''आरक्षणÓÓ दिखा ही दी और आयोग की राय में प्रकाश झा की इस फिल्म में कई जगह आपत्तिजनक संवाद और दृश्य हैं जिन्हें हटाया जाना चाहिए। एससी आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने बताया कि हमने आयोग के सभी सदस्यों के साथ मंगलवार को यह फिल्म देख ली है। इसमें कई ऐसे संवाद हैं, जो अनुसूचित जाति के लिए अपमानजनक हैं। हमने सेंसर बोर्ड से कहा है कि इन संवादों को फिल्म से हटाकर रिलीज किया जाए। अमिताभ बच्चन, मनोज बाजपेयी, सैफ अली खान, प्रतीक बब्बर और दीपिका पादुकोण अभिनीत यह फिल्म 12 अगस्त को देशभर के सिनेमाघरों में उतरेगी। पुनिया ने उदाहरण के तौर पर बताया कि फिल्म में एक जगह कैंटीन
    में लिखा होता है ''आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैÓÓ, इस बारे में कहा गया कि इसकी जगह यह लिखो कि ''आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध खैरात हैÓÓ, इस तरह से आरक्षण का मजाक उड़ाया गया है। इस कांग्रेसी नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और संविधान कह चुका है कि आरक्षण सही है फिर भी फिल्म में इसे गलत तरीके से दिखाया गया है।
    उन्होंने कहा कि यह फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण के खिलाफ है, अनुसूचित जाति को अधिकार दिलाने को लेकर जो भूमिका है उसे अमिताभ बच्चन ने निभाया है, लेकिन जो संवाद है वह अनुसूचित जाति के लिए अपमानजनक है जो पूरे समाज की समरसता के लिए घातक है। यह पूछे जाने पर कि इन आपत्तिजनक संवादों और दृश्यों को हटाए बगैर ही यदि यह फिल्म रिलीज होती है तो आयोग का क्या कदम होगा, पुनिया ने कहा कि हमारा काम (सिफारिश करने का) यहां पूरा हो जाता है। हम झगड़ा तो करने नहीं जा रहे। संवैधानिक संस्था होने के नाते यह हमारा दायित्व था और अनुच्छेद 338 के तहत यह हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है।

    जनगणना में जातियों की गिनती के पक्ष में हम क्यों हैं?

    22 MAY 2010 26 COMMENTS

    देश में 80 साल बाद एक बार फिर से जाति-आधारित जनगणना की संभावना बन रही है। संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की अंतिम बैठकों में जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समुदायों की तरह अन्य जातियों की भी गणना किये जाने की पुरजोर ढंग से मांग उठी। बहस के दौरान इस पर सदन में लगभग सर्वानुमति सी बन गयी, जिसकी सरकार ने कल्पना तक नहीं की थी। सभी प्रमुख दलों के सांसदों ने माना कि जाति भारतीय समाज की एक ऐसी सच्चाई है, जिससे भागकर या नजरें चुराकर जातिवाद जैसी बुराई का खात्मा नहीं किया जा सकता है। सामाजिक न्‍याय, एफर्मेटिव एक्शन और सामाजिक समरसता के लिए जाति-समुदायों से जुड़े ठोस आंकड़ों और सही कार्यक्रमों की जरूरत है। यह तभी संभव होगा, जब जनगणना के दौरान जातियों की स्थिति के सही और अद्यतन आंकड़े सामने आएं।
    पता नहीं क्यों, ससंद और उसके बाहर सरकार द्वारा इस बाबत दिये सकारात्मक आश्वासन और संकेतों के बाद कुछ लोगों, समूहों और मीडिया के एक हिस्से में जाति-आधारित जनगणना की धारणा का विरोध शुरू हो गया। हम ऐसे लोगों और समूहों के विरोध-आलोचना का निरादर नहीं करते। लोकतंत्र में सबको अपनी आवाज रखने का अधिकार है। पर ऐसे मसलों पर सार्थक बहस होनी चाहिए, ठोस तर्क आने चाहिए। किसी संभावित प्रक्रिया के बारे में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने और फतवे देने का सिलसिला हमारे लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा। सरकार पर एकतरफा ढंग से दबाव बनाने की ऐसी कोशिश जनता के व्यापक हिस्से और संसद में उभरी सर्वानुमति का भी निषेध करती है। बहरहाल, हम जाति-आधारित जनगणना पर हर बहस के लिए तैयार हैं। अब तक उठे सवालों की रोशनी में जाति-गणना से जुड़े कुछ उलझे सवालों पर हम संक्षेप में अपनी बात रख रहे हैं -
    (1) जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक-समूहों की गिनती हमेशा से होती आ रही है। सन 1931 और उससे पहले की जनगणनाओं में हर जाति-समुदाय की गिनती होती थी। सन 1941 में दूसरे विश्वयुद्ध के चलते भारतीय जनगणना व्यापक पैमाने पर नहीं करायी जा सकी और इस तरह जातियों की व्यापक-गणना का सिलसिला टूट गया। आजादी के बाद भारत सरकार ने तय किया कि अनुसूजित जाति-जनजाति के अलावा अन्य जातियों की गणना न करायी जाए। पिछली जनगणना में भी ऐसा ही हुआ, सिर्फ एससी-एसटी और प्रमुख धार्मिक समुदायों की गणना की गयी थी। पर इसके लिए कोई ठोस तर्क नहीं दिया गया कि अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समूहों की गणना के साथ अन्य जातियों की गिनती कराने में क्या समस्या है। हमें लगता है कि आज संसद में बनी व्यापक सहमति के बाद वह वक्त आ गया है, जब जनगणना के दौरान फिर से सभी जातियों-समुदायों की गिनती करायी जाए। सिर्फ ओबीसी नहीं, अन्य सभी समुदायों को भी इस गणना में शामिल किया जाए। भारतीय समाज के समाजशास्त्रीय-नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन के सिलसिले में भी जनगणना से उभरी सूचनाएं बेहद कारगर और मददगार साबित होंगी।
    (2) समाज को बेहतर, सामाजिक-आर्थिक रूप से उन्नत और खुशहाल बनाने के लिए शासन की तरफ से सामाजिक न्याय, समरसता और एफर्मेटिव-एक्शन की जरूरत पर लगातार बल दिया जा रहा है। ऐसे में सामाजिक समूहों, जातियों और विभिन्न समुदायों के बारे में अद्यतन आंकड़े और अन्य सूचनाएं भी जरूरी हैं। जातियों की स्थिति को भुलाने या उनके मौजूदा सामाजिक-अस्तित्व को इंकार करने से किसी मसले का समाधान नहीं होने वाला है।
    (3) कुछेक लोगों और टिप्पणीकारों ने आशंका प्रकट की है कि जाति-गणना से समाज में जातिवाद और समुदायों के बीच परस्पर विद्वेष बढ़ जाएगा। यह आशंका इसलिए निराधार है कि अब तक अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समूहों की गिनती होती आ रही है, पर इस वजह से देश के किसी भी कोने में जातिगत-विद्वेष या धार्मिक-सांप्रदायिक दंगे भड़कने का कोई मामला सामने नहीं आया। जातिवाद और सांप्रदायिक दंगों के लिए अन्य कारण और कारक जिम्मेदार रहे हैं, जिसकी समाजशास्त्रियों, मीडिया और अन्य संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों ने लगातार शिनाख्त की है।
    (4) जनगणना की प्रक्रिया और पद्धति पर सवाल उठाते हुए कुछेक क्षेत्रों में सवाल उठाये गये हैं कि आमतौर पर जनगणना में शिक्षक भाग लेते हैं। ऐसे में वे जाति की गणना में गलतियां कर सकते हैं। यह बेहद लचर तर्क है। जनगणना में आमतौर पर जो शिक्षक भाग लेते हैं, वे स्थानीय होते हैं। जाति-समाज के बारे में उनसे बेहतर कौन जानेगा।
    (5) कुछेक टिप्पणीकारों ने यह तक कह दिया कि दुनिया के किसी भी विकसित या विकासशील देश में जाति, समुदाय, नस्ल या सामाजिक-धार्मिक समूहों की गणना नहीं की जाती। अब इस अज्ञानता पर क्या कहें। पहली बात तो यह कि भारत जैसी जाति-व्यवस्था दुनिया के अन्य विकसित देशों में नहीं है। पर अलग-अलग ढंग के सामाजिक समूह, एथनिक ग्रुप और धार्मिक भाषाई आधार पर बने जातीय-समूह दुनिया भर में हैं। ज्यादातर देशों की जनगणना में बाकायदा उनकी गिनती की जाती है। अमेरिका की जनगणना में अश्वेत, हिस्पैनिक, नैटिव इंडियन और एशियन जैसे समूहों की गणना की जाती है। विकास कार्यक्रमों के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल भी किया
    जाता है। यूरोप के भी अनेक देशों में ऐसा होता है।
    (6) एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि जनगणना तो अब शुरू हो गयी है, ऐसे में जाति की गणना इस बार संभव नहीं हो सकेगी। मीडिया के एक हिस्से में भी इस तरह की बातें कही गयीं। पर इस तरह के तर्क जनगणना संबंधी बुनियादी सूचना के अभाव में या लोगों के बीच भ्रम फैलाने के मकसद से दिये जा रहे हैं। जनगणना कार्यक्रम के मौजूदा दौर में अभी मकानों-भवनों आदि के बारे में सूचना एकत्र की जा रही है। आबादी के स्वरूप और संख्या आदि की गणना तो अगले साल यानी 2011 के पहले तिमाही में पूरी की जानी है। इसके लिए फरवरी-मार्च के बीच का समय तय किया गया है। ऐसे में जाति-गणना की तैयारी के लिए अभी पर्याप्त वक्त है।
    (7) जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समुदायों की गणना पहले से होती आ रही है। इस बार से अन्य सभी जातियों, समुदायों और धार्मिक समूहों की गणना हो। इससे जरूरी आंकड़े सामने आएंगे। इन सूचनाओं से समाज को बेहतर, संतुलित और समरस बनाने के प्रयासों को मदद मिलेगी।

    (प्रो डी प्रेमपति, मस्तराम कपूर, राजकिशोर, उर्मिलेश, प्रो चमनलाल, नागेंदर शर्मा, जयशंकर गुप्ता, डा निशात कैसर, श्रीकांत और दिलीप मंडल द्वारा जारी आलेख)


    http://mohallalive.com/2010/05/22/caste-and-the-census/

    बुद्धिजीवियों ने दी जाति की गिनती से जुड़ी कुछ हिदायतें

    27 MAY 2011 2 COMMENTS
    देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों, लेखकों संपादकों की मांग
    जाति की गिनती पर सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करे
    जातियों से जुड़े शैक्षणिक और आर्थिक आंकड़ों का संकलन आवश्यक
    जनगणना कानून के तहत हो गिनती
    केंद्र सरकार ने बीपीएल सर्वे के साथ जातियों की गणना करने का जो फैसला किया है, उससे भ्रम पैदा हो गया है। इसे तत्काल दूर किया जाना चाहिए। सरकार ने संसद को वचन दिया था कि जनगणना में जाति का सवाल पूछने पर संसद में बनी आम सहमति का खयाल रखा जाएगा। लेकिन इस वादे को पूरा नहीं किया गया। अब कहा जा रहा है कि जून से दिसंबर 2011 के बीच जाति की गिनती की जाएगी।
    अगर यह गणना जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत नहीं करायी जाती है, तो इस तरह मिले आंकड़ों की न कोई विश्वसनीयता होगी, न आधिकारिक महत्व। साथ ही जनगणना अधिनियम का इस्तेमाल न करने की स्थिति में सरकारी शिक्षकों को इस काम में नहीं लगाया जा सकेगा। अगर यह काम बीपीएल सर्वे के तहत कराया जाता है, तो यह पूरी आबादी को भी नहीं समेटेगा, क्योंकि जो परिवार बीपीएल के दायरे में नहीं आते, वे इस गणना से बाहर रह जाएंगे। सरकार को इस बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए। यह खबर बेहद चिंताजनक है कि सरकार इस काम में आंगनबाड़ी कर्मियों और महात्मा गांधी नरेगा के मजदूरों को भी लगाना चाहती है।
    सरकार को इस बात का खंडन करना चाहिए कि उसका ऐसा कोई इरादा है। यह काम सरकारी स्कूलों के शिक्षक ही कर सकते हैं क्योंकि उन्हें जनगणना कार्य का अनुभव है और इसकी पेचीदगियों को वे बेहतर समझ सकते हैं। जनगणना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है। सरकार ने जाति संबंधी आंकड़ा संग्रह की अपनी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर टाल दी है। ऐसा करने से पहले राज्य सरकारों से पूछा भी नहीं गया है।
    हर 10 साल पर होने वाली जनगणना लगभग एक साल की व्यापक और व्यवस्थित तैयारियों के बाद होती है। वहीं जाति गणना की तैयारी करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को सिर्फ एक महीने का समय दिया है। राज्य सरकारों को जनगणना कर्मियों को काम में लगाने, उन्हें प्रशिक्षण देने, फॉर्म तैयार करने, निर्देश पत्रिका छापने आदि के लिए कोई समय नहीं दिया गया है। जून से यह काम शुरू करने की घोषणा के पीछे मकसद सिर्फ यह बताना है कि सरकार ने जून, 2011 से जाति गणना शुरू कराने का अपना वादा पूरा कर दिया है। इस बात की पूरी आशंका है कि जब यह निरर्थक कवायद पूरी होगी, उसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आंकड़ों की सत्यता को लेकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाएंगे।
    पूरा देश इस बात को लेकर सहमत था कि 2011 में पूरी आबादी से जुड़े जाति संबंधी आंकड़े और शैक्षणिक आर्थिक सूचनाएं आ जानी चाहिए। गृह मंत्रालय ने देश को निराश किया है। जाति गणना का जो तरीका अभी चुना गया है, उसके पीछे कोई दृष्टि या योजना नहीं है और इसका असफल होना तय है। इसमें आम जनता का अरबों रुपया खर्च होगा। यह राष्ट्रीय बर्बादी होगी क्योंकि इससे कोई काम का आंकड़ा नहीं मिल पाएगा।
    अब सरकार ने स्थिति को जहां पहुंचा दिया गया है, उसमें बेहतर विकल्प यह है कि सरकार संसद में घोषणा करे कि 2021 की जनगणना में एक साथ ही जाति संबंधी आंकड़े जुटाये जाएंगे। 2011 की जाति गणना के संबंध में हम मांग करते हैं कि :
    [1] इस साल जून से दिसंबर के बीच होने वाली गणना में जातियों की शैक्षणिक स्थिति और रोजगार तथा नौकरी संबंधी विश्वसनीय आंकड़े जुटाये जाएं। सरकारी नौकरियों से जुड़ा संवर्गवार (क्लास वन, क्लास टू आदि) ब्यौरे जुटाना आवश्यक है। इन आंकड़ों से यह पता चलेगा कि आजादी के बाद छह दशक में कौन-सी जातियां शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में पीछे रह गयी हैं।
    [2] सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, जीवन स्तर, रोजगार, जमीन का स्वामित्व, विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों से मिलने वाले लाभ आदि के पैमाने पर तमाम जातियों और धर्मों से जुड़े आंकड़े जुटाये जाएं। 2011 की दसवार्षिक जनगणना में पूछे गये तमाम सवाल इस गिनती के लिए भी प्रासंगिक हैं।
    [3] सभी जातियों से जुड़े आंकड़े जुटाये जाएं। कई धर्मों और समुदायों में जाति भेद अलग शक्लों में मौजूद है। उनका ब्यौरा भी इस गिनती में जुटाया जाए। कोई भी जाति या जाति समूह इसके दायरे से बाहर नहीं होना चाहिए। कोई गैर हिंदू धार्मिक समूह अगर अपनी जाति पहचान बताना चाहता है (जैसे पसमांदा या अशराफ, अजलाफ या अरजाल/दलित मुस्लिम, दलित इसाई, दलित बौद्ध, मजहबी सिख), तो उसे उसी रूप में लिखा जाए।
    [4] जातियों की गिनती जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत करायी जाए।
    हस्ताक्षरकर्ता
    1. गेल ऑम्वेट, चेयर प्रोफेसर, बीआर आंबेडकर चेयर फॉर सोशल चेंज एंड डेपलपमेंट, इग्नू
    2. एम विजयनउन्नी, भारत के पूर्व जनगणना आयुक्त
    3. आर के नायक, रिटायर्ड आईएएस और पूर्व सांसद
    4. प्रोफेसर कांचा इलैया, डायरेक्टर, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोशल चेंज एंड इनक्लूसिव पॉलिसी, मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
    5. मस्तराम कपूर, लेखक और संपादक, लोहिया समग्र
    6. डॉक्टर वासंती रमन, सीनियर फेलो, सेंटर फॉर वीमंस डेवलपमेंट स्टडीज, दिल्ली
    7. कौशलेंद्र यादव, संस्थापक, सोशल ब्रेनवाश पत्रिका
    8. जॉन दयाल, सदस्य, राष्ट्रीय एकता परिषद और महासचिव, ऑल इंडिया क्रिश्चियन कौंसिल
    9. आईवन कोस्का, प्रधान संपादक, फॉरवर्ड प्रेस
    10. एचएल दुसाध, चेयरमैन, बहुजन डायवर्सिटी मिशन
    11. आरिज मोहम्मद, निदेशक, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, हैदराबाद
    12. गंगा सहाय मीणा, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
    13. जी करुणानिधि, महासचिव, ओबीसी कर्मचारियों का राष्ट्रीय महासंघ
    14. राजनारायण, संयोजक, जनहित अभियान
    15. दिलीप मंडल, स्‍तंभ लेखक और पत्रकार
    16. सिंथिया स्टीफन, स्वतंत्र शोधकर्ता और लेखक
    17. ब्रज रंजन मणि, लेखक और चिंतक
    18. अफलातून, राजनीतिक कार्यकर्ता और पूर्व अध्यक्ष, बीएचयू छात्र संघ
    19. विद्या भूषण रावत, मानवाधिकार कार्यकर्ता
    20. अश्विनी पंकज, संपादक, जोहार सहिया
    http://mohallalive.com/2011/05/27/government-should-clarify-position-on-caste-enumeration/

    Thursday, June 2, 2011

    जाति जनगणना की त्रासदी और प्रहसन

    दिलीप मंडल
    (जनसत्ता में 2 मई को प्रकाशित)
    आखिर जिसका अंदेशा था, वही हुआ। पिछले साल लगभग यही समय था, जब लोकसभा में जातिवार जनगणना पर बहस हुई थी। और यादव-त्रयी ने ही नहीं, जैसा कि आम तौर पर प्रचारित किया जाता है, बल्कि देश के तमाम राजनीतिक दल इस बात के लिए सहमत हो गए थे कि जनगणना में भारत की सामाजिक संरचना का लेखाजोखा होना चाहिए और इसके लिए जनगणना में जाति को शामिल किया जाना चाहिए। इस व्यापक सहमति में कांग्रेस और भाजपा से लेकर वाम दल और शिवसेना से लेकर तमाम क्षेत्रीय दल शामिल थे। इस प्रस्ताव का विरोध किसी भी पक्ष ने नहीं किया। ऐसा व्यापक आम सहमति के मौके संसदीय इतिहास में विरल होते हैं। इसे देखकर प्रधानमंत्री ने यह घोषणा भी कर दी कि सरकार सदन की भावना से अवगत है और कैबिनेट इस बारे में जल्द फैसला करेगी।
    लोकसभा इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है। देश की लोकतांत्रिक सत्ता की सबसे बड़ी पीठ। ऐसा कहा और माना जाता है कि लोकसभा में जो तय होता है, जैसा तय होता है, देश और सरकार उसी हिसाब से चलती है। जनगणना को लेकर लोकसभा में चर्चा मई, 2010 में हुई थी। एक साल बाद अब अगर देखें कि उस आम सहमति और प्रधानमंत्री के वादे का क्या हुआ, तो बेहद त्रासद तस्वीर सामने आती है। आज देखें स्थिति क्या है? हर दस साल पर होने वाली जनगणना 2011 की फरवरी में जाति संबंधी आंकड़े जुटाए बगैर संपन्न हो गई। इस जनगणना के लिए 25 लाख सरकारी शिक्षक देश में दरवाजे-दरवाजे गए। तमाम तरह के सवाल उन्होंने पूछे, लेकिन वह सवाल नहीं पूछा, जिसे पूछना लोकसभा में तय हुआ था। इस सवाल का जवाब अब किसी के पास नहीं है कि 2011 की जनगणना में जाति का कॉलम क्यों नहीं जोड़ा गया।
    पीछे जाना तो संभव नहीं है, लेकिन बेहतर होता कि सरकार ने 2011 की फरवरी में ही जाति संबंधी आंकड़े जुटा लिए होते। इसकी कई वजहें हैं। भारत में जनगणना का काम जनगणना अधिनियम,1948 के तहत होता है। इस अधिनियम के तहत होने की वजह से जनगणना के काम में किसी भी सरकारी कर्मचारी अधिकारी को लगाने का वैधानिक अधिकार सरकार के पास होता है। इस कानून के तहत गलत सूचना देना अपराध है। हर दस साल पर होने वाली जनगणना के काम में सरकारी शिक्षकों को लगाया जा सकता है। लेकिन किसी और सर्वे के लिए उन्हें नहीं लगाया जा सकता। शिक्षा के अधिकार कानून के तहत भी यह प्रावधान है कि सरकारी शिक्षकों को चुनाव और जनगणना के अलावा किसी सरकारी काम में नहीं लगाया जा सकता। साथ ही जनगणना कानून की वजह से कोई व्यक्ति जनगणना के फॉर्म पर जो जानकारी देता है, उसकी व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रखी जाती है। आंकड़ा संकलन में ही इस जानकारी का इस्तेमाल होता है, इस वजह से कोई व्यक्ति सहजता से खुद से जुड़ी जानकारियां जनगणना कर्मचारी को दे देता है। संसद में जब इस बारे में सवाल पूछा गया कि अलग से जातिवार गणना कराने का क्या फायदा है तो सरकार इसका कोई जवाब नहीं दे पाई।
    अब क्या होने वाला है, इस पर विचार करें तो यह पाएंगे कि जाति संबंधी जानकारी इकट्ठा करने पर लोकसभा में बनी सहमति का सरकार ने पूरी तरह मजाक बना दिया है। कैबिनेट ने इस काम को जिस तरह से कराने का फैसला किया है, उस पर बिंदुवार विचार करने की जरूरत है।
    इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पहलू है, सरकार की घोषणा का समय। प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना के बारे में घोषणा संसद में की थी। लेकिन अब कैबिनेट ने ऐसे समय में जाति की गिनती का फैसला किया है, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा है। सरकार ने कहा है कि यह गणना जून से दिसंबर 2011 के बीच कराई जाएगी। यानी जब संसद का मानसून सत्र शुरू होगा तब तक जाति के आंकड़े जुटाने का काम शुरू हो चुका होगा। यानी संसद के पास कैबिनेट के इस फैसले पर विचार करने का अवसर नहीं होगा। समय का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फरवरी 2011 की जनगणना से जाति को बाहर करने का फैसला 9 सितंबर, 2010 को आया था। संसद का सत्र उस समय भी नहीं चल रहा था और सितंबर की घोषणा के एक पखवाड़े के अंदर देश के उन जिलों में जनगणना शुरू कर दी गई, जहां सर्दियों में बर्फ गिरती है। यानी सरकार के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए संसद को कोई मौका ही नहीं मिला, क्योंकि शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही जनगणना शुरू हो चुकी थी। उचित यह होता कि सरकार मानसून सत्र में संसद को यह बताती कि जाति की गिनती वह किस तरह कराना चाहती है, ताकि संसद में इस पर विचार-विमर्श होता और लोकतांत्रिक तरीके का पालन किया जाता। उम्मीद की जा सकती है कि मानसून सत्र में इस मसले पर संसद में जमकर बहस होगी और जाति गणना कुछ महीनों बाद ही सही, पर सलीके से संपन्न होगी।
    सरकार की ताजा घोषणा में एक और पेंच यह है कि जाति गणना के काम को जनगणना अधिनियम से बाहर रखा गया है। इस वजह से जनगणना की प्रक्रिया को प्राप्त कानूनगत और प्रशासन संबंधी सुविधाएं प्राप्त नहीं होंगी। सरकार ने इसी वजह से कहा है कि जनगणना के काम में शिक्षकों को नहीं लगाया जाएगा। यह काम राज्य सरकारों के हवाले छोड़ दिया गया है। राज्य सरकारें इसमें अपने कर्मचारियों से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तथा महात्मा गांधी नरेगा के मजदूरों का इस्तेमाल करेगी। अप्रशिक्षित लोगों को आंकड़ा संग्रह में लगाए जाने की वजह से इस प्रक्रिया में मिले आंकड़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी। दूसरी प्रक्रियागत खामी यह है कि लोग जो जानकारी देंगे, उसे कागज पर नहीं भरा जाएगा। इस जानकारी को एक कंप्यूटरनुमा मशीन पर दर्ज करके तहसील स्तर पर कंप्यूटर सर्वर में डाला जाएगा। एक तो इतनी बड़ी संख्या में मशीन उपलब्ध कराना और फिर लोगों को प्रशिक्षित करना बेहद मुश्किल काम होगा। दूसरे, मशीन से आंकड़ा संग्रह करने के कारण इन आंकड़ों की दोबारा जांच की संभावना भी खत्म हो जाएगी।
    सरकार जिस तरह से जाति गणना के साथ गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का आंकड़ा जुटा रही है, उससे इस प्रक्रिया को लेकर सरकार की नीयत पर संदेह होता है। जाति जनगणना के साथ यह जरूरी है कि शिक्षा, रोजगार, सभी स्तरों की सरकारी नौकरियों और आर्थिक स्थिति से संबंधित जानकारियां जुटाई जाएं। अभी सरकार ने जो बताया है उसके हिसाब से इस तरह की जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी। अगर सात महीने तक जाति गणना करने के बाद भी यह न मालूम हो कि देश में किस जाति में किस स्तर तक पढ़ाई करने वाले कितने लोग हैं और किन जातियों के लोग सरकारी नौकरियों में कम या ज्यादा हैं तथा अलग अलग वर्ग की नौकरियों में किन किन जातियों के लोग कितनी संख्या में हैं, तो इस कवायद का खास मतलब नहीं रह जाएगा। हजारों करोड़ रुपए खर्च करके सरकार जब आंकड़ा संग्रह करा रही है तो देश की सामाजिक सच्चाई पूरी विविधता के साथ सामने आनी चाहिए।
    संसद में सभी दलों के सांसदों ने जातियों से संबंधित आर्थिक शैक्षणिक आंकड़े जुटाने की मांग की थी। इसका आदर किया जाना चाहिए। गरीबी रेखा को लेकर केंद्र सरकार की हमेशा शिकायत रही है कि राज्य सरकारें गरीबों की संख्या बढ़ाकर दिखाती है, ताकि केंद्र से ज्यादा आर्थिक मदद मिल सके। इसलिए सरकार गरीबों से संबंधित आंकड़ा जुटाना चाहती है। लेकिन इस काम को जाति जनगणना से साथ जोड़ना सही नहीं है। इसके लिए सरकार को अलग से एक आयोग बनाकर आंकड़े जुटाने चाहिए।
    अब सरकार ने पूरे मामले को जहां पहुंचा दिया है उसमें यही हो सकता है कि वह 2021 की जनगणना में जाति को शामिल करने के बारे में अधिनियम पारित करे ताकि जाति के आंकड़े अलग से जुटाने में होने वाले खर्च और मुश्किलों से बचा जा सका। सरकार को इस संबंध में सारी आशंकाओं का जवाब देना चाहिए। फिलहाल सरकार यह कर सकती है कि अगले साल यानी 2012 की फरवरी में जाति जनगणना कराने की घोषणा करे। इस जनगणना में सामान्य जनगणना के तमाम सवालों के साथ ही जाति, शैक्षिक स्तर और विभिन्न वर्गों की नौकरियों के बारे में सवाल पूछे जाएं। यह काम जनगणना अधिनियम के तहत जनगणना आयुक्त के माध्यम से ही कराया जाए और इसमें सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ही आंकड़ा संग्रह करने के लिए लगाया जाए। इस वजह से विद्यार्थियों और शिक्षकों को होने वाली दिक्कतों के लिए सरकार को उनसे क्षमायाचना करनी चाहिए क्योंकि यही काम फरवरी 2011 में आसानी से पूरा हो सकता था। सरकार की मंशा इस मामले में शुरू से ही टालमटोल वाली रही है। कभी वह जाति का आंकड़ा जुटाने में होने वाली दिक्कतों की बात करती है तो कभी बायोमैट्रिक पहचान संख्या देने के क्रम में अगले कई सालों में जाति के आंकड़े जुटाने की बात करती है।
    आजादी मिलने से पहले, 1941 में देश में जाति की आखिरी बार गिनती तो हुई थी, लेकिन विश्वयुद्ध की वजह से आंकड़ों का संकलन नहीं किया जा सका था। 1931 की जनगणना के जातिवार आंकड़ों के आधार पर देश में अब भी नीतियां बनती हैं, योजनाओं के लिए पैसे दिए जाते हैं। आजादी मिलने के समय देश में यह भावना जरूर रही होगी कि आधुनिक भारत में जाति का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। इसलिए 1951 की जनगणना में जाति की गिनती नहीं हुई। लेकिन यह सपना हकीकत में तब्दील नहीं हो पाया। जाति को लेकर आंख मूंदने से जाति खत्म होने की जगह मजबूत ही हुई है। इसलिए अब इस बात की जरूरत है कि जाति की हकीकत को स्वीकार किया जाए। इससे संबंधित आंकड़े जुटाए जाएं और नीति निर्माण में उन आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाए। जाति को गिना जाए, ताकि जाति को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। आंख बंद करने से यह दुश्मन पीछा छोड़ने वाला नहीं है। इसकी आंखों में आंखें डालकर इसे चुनौती देनी होगी। तभी जातिमुक्त भारत का महान सपना साकार हो पाएगा। सरकार को अब यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए.
    http://rejectmaal.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
    1. जातिगत जनगणना को लेकर अभी ... - Salaam India News

    2. salaamindialive.tv/news.php?news_id=254 - संचित
    3. 1 जून 2011 – देश में पहली बार होने वाली जातिगत जनगणना को लेकर अब इसका समर्थन करने वाले संगठन ... इन संगठनों का मानना है कि जनगणना कानून 1948 के तहत ही जातियों की गिनती कीजानी चाहिये। ...
    4. जाति जनगणना में पर्दादारी

    5. www.samaylive.com/article-analysis-in.../race-census-india.html - संचित
    6. 26 मई 2011 – इस जनगणना में जातियों की गिनती व्यक्तिगत घोषणा पत्रों के आधार पर होगी और जाति साबित करने के लिए लोगों से कोई प्रमाणपत्र पेश करने को नहीं कहा जाएगा. इसमें ग्राम सभाओं ...
    7. जनगणना में जात ही पूछो जनता की

    8. www.patrika.com/article.aspx?id=18166 - संचित
    9. आजाद हिंदुस्तान में जाति की गिनती का काम पहली बार हो रहा है। इससे पहले 1931 में जातियों कीगणना जनगणना में की गई थी जब अंग्रेजों की सरकार थी। उस वक्त भी तब के जनगणना कमिश्नर जेएच...
    10. जनगणना में जाति-आधारित गिनती का ...

    11. www.srijangatha.com/bloggatha-69_2k10 - संचित
    12. 29 जुलाई 2010 – आखिर सच क्या है, इसके लिए जनगणना में जातियों की गिनती की जरुरत नहीं है? विश्वसनीय आंकड़ों से हम परहेज क्यों करें।़ जहां तक जाति-निरपेक्षता और धर्म-निरपेक्षता का सवाल ...
    13. जनगणना में जाति बताएगी हैसियत ...

    14. www.facenfacts.com/.../govt-nod-to-caste-religion-poverty-based-... - संचित
    15. 19 मई 2011 – जनगणना में जाति बताएगी हैसियत, मंत्रिमंडल की मंजूरी नई दिल्ली: देश में लोगों की गिनती और उनकी आर्थिक, सामाजिक हैसियत की जानकारी में जाति के महत्त्व को स्वीकारते हुए ...
    16. जातिवार जनगणना की गंभीर खामियां ...

    17. samatavadi.wordpress.com/2011/05/21/castewise_census/ - संचित
    18. 21 मई 2011 – जनगणना कानून, 1948 के तहत हो जातियों की गिनती। नई दिल्ली: हम इस बात का स्वागत करते हैं कि ... 6 और 7 मई, 2010 को लोकसभा में इस बात पर सहमति बन गई थी कि 2011 की जनगणना में जाति को
    1. उसका सच: जनगणना में जातियों की गिनती ...

    2. uskasach.blogspot.com/2010/05/blog-post_1925.html - संचित

    3. 26 मई 2010 – चुकी अभी देश में हाऊसिंग सेन्सस किया जा रहा है और फिर तुरंत बाद जनगणना किया जायेगा... लिहाजा सवाल यह उठाया जा रहा है कि जनगणना में हम जातियों की गिनती के पक्ष में क्यों...

    4. जन की जाति गणना

    5. raviwar.com/.../329_caste-religion-census-asgar-ali-engineer.shtml - संचित

    6. प्रश्न यह है कि भारत के नागरिकों की गिनती करते समय, उनकी जाति का पता लगाना क्या आवश्यक है?जाति के अलावा, धर्म को भी जनगणना के फार्म में स्थान न देने से अल्पसंख्यकों के मानस में ...

    7. जाति आधारित जनगणना कितनी सही लोकमंच ...

    8. hindi.lokmanch.com/2011/05/.../jati-aadharit-janganana-kitni-sahi/ - संचित

    9. 31 मई 2011 – वर्तमान में देश की आबादी 121 करोड़ है. यह बात भारत की हाल ही में हुई जनगणना मेंसामने आई है. ... शहरों और 6.40 लाख गावों में कराये गए सर्वेक्षण में लगभग तीन करोड़ घरों की गिनतीका कार्य किया गया. ... लेकिन जनगणना में जाति पूछने से संविधान की आत्मा को चोट पहुँचती है. ...

    10. जातियों की गिनती के खतरे - Jagran Yahoo! India

    11. in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_6452918.html - संचित

    12. 30 मई 2002 – दस वर्षाे के अंतराल के बाद देश की जनगणना फिर शुरू हो गई है। इसके शुरू होते ही इस मांग ने जोर पकड़ लिया है कि इस बार की जनगणना में जातियों की भी गिनती की जानी चाहिए। ...

    13. जाति गिनती की नई समस्या - nayaindia | nayaindia

    14. www.nayaindia.net/जाति-गिनती-की-नई-समस्या/ - संचित

    15. मनमोहन सरकार के मंत्री समूह ने इस बार की जनगणना में जातियों की गिनती को हरी झडी दे दी है। पर एक नई समस्या खड़ी हो गई है। सवाल है जातियों की गिनती का क्या सिस्टम बने ताकि सही ...

    16. वर्ष 2011 में जाति आधारित जनगणना नहीं ...

    17. livehindustan.com/news/desh/.../article1-story-39-39-99600.html - संचित

    18. 7 मार्च 2010 – पीएमके, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड तथा कुछ अन्य पार्टियों ने अगलीजनगणना में जाति के आधार पर भी लोगों की गिनती करने की मांग की थी। पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा...

    19. जाति जनगणना में पर्दादारी - होम

    20. www.swatantravaarttha.com/editorial/article-9197 - संचित

    21. 7 जून 2011 – इस जनगणना में जातियों की गिनती व्यक्तिगत घोषणा पत्रों के आधार पर होगी और जाति साबित करने के लिए लोगों से कोई प्रमाणपत्र पेश करने को नहीं कहा जाएगा। ...

    22. visfot.com । विस्फोट.कॉम - जाति की जनगणना ...

    23. www.visfot.com/index.php/newsnetwork/3523.html - संचित

    24. 28 मई 2010 – देश की जनता की प्रतिनिधि संस्था लोकसभा जब लगभग आम राय से यह कह चुकी है कि 2011 की जनगणना में सभी जातियों के लोगों की गिनती होनी चाहिए, तो इस सवाल पर अब और ज्यादा ...

    25. अस्सी साल बाद होगी देश में जाति की ...

    26. www.arthkaam.com/caste-cesus-gets-ok-from-cabinet/4577/ - संचित

    27. 9 सितं 2010 – अस्सी साल बाद होगी देश में जाति की गिनती, कैबिनेट ने दी मंजूरी. Posted by अनिल रघुराज at ... इससे पहले देश में आखिरी जाति-आधारित जनगणना अंग्रेजों के शासन में 1931 में की गई थी। ...

    28. जनगणना 2011 : देश की आबादी को जोड़ने की ...

    29. thatshindi.oneindia.inसमाचारदेश - संचित

    30. 9 फ़र 2011 – इस माह के मध्य तक जब सभी विश्व कप क्रिकेट की खुमारी में डूबे होंगे, देश के हर हिस्से में... यह लहर जनगणना के दूसरे चरण की होगी। यह जनगणना 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की गिनती कर उन्हें ... इसमें शहरी और ग्रामीण आबादी को अलग-अलग रखते हुए व्यवसाय, शिक्षा, धर्म, जाति, ...




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मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

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Save the Universities!

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जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

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Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

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http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

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