THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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Monday, January 11, 2016

ब्राह्मणवादी अहंकार: आनंद तेलतुंबड़े

ब्राह्मणवादी अहंकार: आनंद तेलतुंबड़े


आज जबकि दक्षिणपंथी शासक परिवार में आंबेडकर के लिए बेपनाह प्यार उमड़ रहा है और वह अथाह भक्ति दिखा रहा है, ऐसे में आंबेडकर के प्रति बेधड़क अपमानों की बौछार करते हुए किसी ऐसे इंसान को सुनना दिलचस्प है, जिसको हिंदू संस्कृति और परंपरा की महानता के सिद्धांत बघारने के लिए जाना जाता रहा है. एस.एन. बालगंगाधर की हालिया ब्राह्मणवादी करतूतों के बारे में बता रहे हैं आनंद तेलतुंबड़े. अनुवाद: रेयाज उल हक


इंडिया टुडे के वेब संस्करण डेलियो.इन पर 27 नवंबर को बेल्जियम के घेंट यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर एस.एन. बालगंगाधर का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था "व्हिच इनटॉलरेंस इज ग्रोइंग इन इंडिया?". यह उस गुस्से के जवाब में लिखा गया था, जो हैदराबाद में इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज यूनिवर्सिटी (एफ्लु) में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर के प्रति अपमानजनक बातें कहने पर उनके खिलाफ पैदा हुआ था. अपनी बातों पर माफी मांगने के बजाए उन्होंने आंबेडकर के प्रति अपनी अवमानना को जायज ठहराया और यह कहते हुए उसको दोहराया कि 'उनकी समझदारी आलिया भट्ट से भी बदतर है.' ऐसा घटिया अपमान और बदसलूकी आंबेडकर के लिए नई नहीं है, लेकिन इसके पहले कभी भी किसी सार्वजनकि बौद्धिक मंच पर किसी ने उनके लिए ऐसी गंदी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था. आज जबकि दक्षिणपंथी शासक परिवार में आंबेडकर के लिए बेपनाह प्यार उमड़ रहा है और वह अथाह भक्ति दिखा रहा है, ऐसे में आंबेडकर के प्रति बेधड़क अपमानों की बौछार करते हुए किसी ऐसे इंसान को सुनना दिलचस्प है, जिसको हिंदू संस्कृति और परंपरा की महानता के सिद्धांत बघारने के लिए जाना जाता रहा है.

बालगंगाधर शायद कभी भी संघ परिवार से अपने जुड़ाव को स्वीकार नहीं करें जैसा कि उनके जैसे अनेक लोग करते हैं, लेकिन वे बार बार अपने ब्राह्मण होने की बात को कबूल करते हैं और एक बेकार के घमंड के साथ इसे दोहराते हैं. इसके पहले अरुण शौरी ने – और यह बात कहनी पड़ेगी कि बेवकूफी में वे गंगाधर से कमतर ही हैं – अपनी किताब वर्शिपिंग फाल्स गॉड में अपने घटिया तथ्यों को नई खोज के आभामंडल के साथ पेश किया था, कि आंबेडकर भारत के संविधान के निर्माता नहीं. उन्हें और दलितों के बीच उनके अनेक आलोचकों को यह बात समझ में नहीं आई कि इस नुक्ते पर इतनी मेहनत करके वे हवा में तलवार भांज रहे थे, क्योंकि खुद आंबेडकर ने ही इस संविधान को नकार दिया था और खुद को एक किराए के लेखक (हैक) के रूप में इस्तेमाल करने की ब्राह्मणवादी साजिश को उजागर किया था. शौरी ने यह भी कहा कि उनका संघ परिवार से कोई रिश्ता नहीं था लेकिन यह तथ्य अपनी जगह कायम रहा कि उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में भाजपा की पहली कैबिनेट में सबसे ज्यादा सक्रिय मंत्रालयों में से एक का मुखिया चुना गया था. बालगंगाधर भी संघ परिवार से अपना कोई जुड़ाव नहीं होने का दावा करेंगे, लेकिन वे जिस जुबान में बोल रहे हैं और जो दलीलें वे पेश कर रहे हैं, वे अनजाने में ही इस सच्चाई को उजागर कर रही हैं कि वे भी उसी गिरोह से ताल्लुक रखते हैं, जो अपने हिंदुत्व को धर्मनिरपेक्ष मुल्लम्मे में छिपा कर रखता है. भाजपाई कुनबा आंबेडकर का गुणगान करने के उल्लास में जो ज्यादतियां कर रहा है, उस दौर में यह घटना ब्राह्मणवादी खेमे में आंबेडकर के प्रति गहराई तक जड़ें जमा कर बैठी नफरत पर से परदा उठाती है.

बालगंगाधर की करतूतें

बालगंगाधर जिस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे, वह 'देरिदा के धर्म अध्ययन में कानून की ताकत और ताकत के कानून' पर था और इस तरह आंबेडकर या आंबेडकरी लोग इस सम्मेलन का विषय नहीं थे, सिवाय इसके कि शायद उन्हें देरिदा के नकारात्मक धर्मविज्ञान की मिसाल बताया जाता. दूसरे वक्ताओं ने उनका कोई जिक्र नहीं किया. लेकिन बालगंगाधर पर तो उन्माद सवार हो गया, उन्होंने आंबेडकर को बेवकूफ कहा और इस पर हैरानी जताई कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने कैसे उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री दे दी. संयोग से उन्हें उतने ही प्रतिष्ठित एक दूसरे संस्थान लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के बारे में याद दिलाने की जरूरत है, जिसने आंबेडकर को डॉक्टर ऑफ साइंस की डिग्री दी थी, जो इत्तेफाक से किसी भारतीय को दी गई पहली डिग्री थी. उन्होंने एक और इंसान को बेवकूफ कहा (उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन लोगों ने अंदाजा लगा लिया कि ये नरेंद्र जाधव के बारे में था, जिन्होंने आंबेडकर की प्रमुख रचनाओं को तीन खंडों में संपादित किया है). खैर, ऐसा हो सकता है कि आंबेडकर की किताबों को संपादन के नाम पर बहुतायत में गैरपेशेवर रूप से फिर से पेश करना एक दोषमुक्त बौद्धिक काम न हो. फिर उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत पर अपमानजनक टिप्पणियां कीं. उनके भाषण में गाली-गलौज वाली टिप्पणियों की भरमार थी, वह उस विद्वत्ता से खाली था, जो सम्मेलन के विषय और रुतबे के लिए जरूरी थी. मिसाल के लिए वे हर उस चीज के लिए 'बुलशिट' (बकवास) शब्द का इस्तेमाल करते रहे, जिसे आम तौर पर लोगों द्वारा पवित्र माना जाता है, शायद ऐसा वे देरिदा के नकारवाद (अपोफेटिशिज्म) को समझाने के लिए ऐसा कर रहे हों. उन्होंने मेजबान एफ्लू तक को नहीं बख्शा और उसे पागलखाना कह दिया, जाहिर है कि उनके हमले का निशाना यह था कि एफ्लू के फैकल्टी और छात्रों में गैर-ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से बेहतर है. अगले दिन, जब कुछ वरिष्ठ प्रोफेसरों ने जाति और छुआछूत के उनके हवालों पर टोका, तो उन्होंने सीधे सीधे उन पर तीखा हमला बोल दिया और टिप्पणी की कि छात्रों को ऐसे में अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए, जब 'जाति प्रमाणपत्र वाले' नाकाबिल, बेवकूफ 'गधे' उन्हें पढ़ा रहे हों. जाहिर है कि उनका इशारा दलित, आदिवासी और ओबीसी की तरफ था. इसी तरह, उन्होंने मुस्लिम फैकल्टी द्वारा किए गए एक सवाल का जवाब देते वक्त यह कहते हुए अपनी नफरत उगली कि वे (मुस्लिम फैकल्टी) आतंक फैला रहे थे.

सुनने वाले छात्र और फैकल्टी दोनों ही उनके इस खुलेआम जातिवादी और सांप्रदायिक बयानों से बेचैन थे. बालगंगाधर बेशर्मी से यह दोहराते रहे कि वे एक ब्राह्मण हैं. खास तौर से हैदराबाद जैसी जगह में ऐसी बात कहना बड़ा दुस्साहस भरा था, जो अपने ऐसे कैंपसों के लिए जाना जाता है जहां दलित प्रतिरोधों का एक इतिहास रहा है. उनका पूरा व्याख्यान आरक्षित श्रेणी के छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ न सिर्फ हतोत्साहित कर देने वाली टिप्पणियों से भरा हुआ था, बल्कि वह आईपीसी की 295 (ए), 154 (ए) और 298 धाराओं और उत्पीड़न (निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सजा के काबिल भी है. हालांकि एफ्लु प्रशासन की तरफ से कोई सवाल नहीं किया गया, जिसने उनके अपराधों पर उन्हें रोका नहीं और न ही उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की. दूसरों की प्रतिक्रियाएं भी खासी देरी से, आयोजन के एक हफ्ते से भी ज्यादा देरी से आईं, जिसमें 11 नवंबर को एफ्लु के फैकल्टी सदस्यों द्वारा उप कुलपति के नाम एक याचिका दी गई. हालांकि डेक्कन हेराल्ड ने 6 नवंबर को ही एक छोटी सी खबर छापी थी कि उस्मानिया के छात्र बालगंगाधर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करने पर विचार कर रहे थे. गुस्सा बढ़ रहा था और इसी के जवाब में बालगंगाधर ने वह लेख लिखा, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है, जिसमें उन्होंने अपने उद्दंडता भरे बयानों के लिए आंबेडकरियों द्वारा नाराजगी जताए जाने पर शिकायत की थी. इसको असहिष्णुता कहते हुए उन्हें यह बात समझ में नहीं आई कि अगर दलित असहिष्णु रहे होते तो उन्होंने उन पर मौके पर ही हमला कर दिया होता.

असहिष्णुता नहीं, आतंकवाद

सबसे पहले तो डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और डॉ. कलबुर्गी की हत्याओं को या फिर आम नागरिकों के खिलाफ हिंसा और जानलेवा हमलों को (जैसे कि उत्तर प्रदेश के दादरी और जम्मू-कश्मीर के उधमपुर वगैरह जगहों पर हुए हैं) असहिष्णुता कहना गलत है और उनकी गंभीरता को घटा कर देखना है. इसके लिए सही शब्द आतंकवाद है. क्योंकि संगठित गिरोहों द्वारा की गई इस सामाजिक हिंसा में, जिसमें राज्य की मिलीभगत है, कुछेक व्यक्तियों या समूहों के व्यवहार की विशेषता नहीं है, जिसमें वे अपने से भिन्न विचारों के खिलाफ असहिष्णुता दिखा रहे हैं, बल्कि यह उनका विरोध करने का साहस दिखाने वालों के खिलाफ एक आतंकी कार्रवाई है. बालगंगाधर ने अपनी अति-समझदारी की झलक देते हुए दादरी में पीट पीट कर की गई हत्याओं को जायज ठहराया, जिसमें इन मनगढ़ंत तथ्यों का उपयोग किया गया था एक दूसरे आदमी की गोशाला से एक गाय चुराने के लिए मोहम्मद अखलाक को पीट पीट कर मार डाला गया और उनके बेटे दानिश को क्रूरता से पीटा गया था. वे इसी के लायक थे, क्योंकि प्राचीन यूरोप और अमेरिका में मवेशी चुराने के लिए लोगों को पीट पीट कर मार दिया जाता था. बालगंगाधर ने ऐसी ही बेवकूफी भरी टिप्पणी कलबुर्गी के बारे में की, कि वे खुद ही एक असहिष्णु आदमी थे. बालगंगाधर ने उनकी 'नैतिक और बौद्धिक ईमानदारी' पर सवाल उठाए, उनके मुताबिक जिनके आचरण से 'मिथकीय छोटा राजन भी शर्मिंदा' हो जाएगा. उन्होंने यह तोहमत भी लगाई कि कलबुर्गी की हत्या के पीछे उनके ये कथित दुराचार भी हो सकते हैं. हम पाते हैं कि यहां उनकी समझदारी की बानगियों में दिख रही उनकी उपमाओं की गुणवत्ता और कुल मिला कर उनकी दलीलें पुख्ता तरीके से उन्हें एक बेवकूफ के रूप में स्थापित कर रही हैं. अगर नहीं तो फिर जिन सैकड़ों बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों ने प्रतीकात्मक विरोध करते हुए इन करतूतों में मिलीभगत के खिलाफ सरकार को अवार्ड लौटाए, वे बेवकूफ थे, वे ऐसे अनाड़ी थे जो 'इंसानी इतिहास की भारी अज्ञानता' को जाहिर कर रहे थे. कहा जाए तो 135 से अधिक वैज्ञानिक भी बेवकूफ हैं, जिन्होंने भारी तबाही की तस्वीर खींची है और कहा है कि देश में शांति और मेल-जोल को 'हाल में बढ़ गई संकीर्णतावादी और धर्मांध कार्रवाइयों के एक सिलसिले ने खतरे में डाल दिया है'! ज्ञान की गठरी तो सिर्फ बालगंगाधर के ब्राह्मण के पास ही है!

'क्या भारत में कोई जाति व्यवस्था है?' जैसे बेवकूफी भरे सवाल उठाने और 'वर्ल्ड्स विदाउट व्यूज एंड व्यूज विदाउट वर्ल्ड्स' (यह उनकी पीएच.डी. थीसिस का शीर्षक है) की लफ्फाजी करने से आगे उनमें ऐसी कौन सी समझदारी पाई जाती है, जिसमें परंपरागत रूप से ब्राह्मण माहिर बताए जाते हैं. जाति के सवाल पर, उनका जवाब नकारात्मक था और उन्होंने ब्रिटिश मिशनरियों पर इल्जाम लगाया कि वे अपने साथ भ्रष्ट पुरोहितों और कैथोलिक धर्म की दूसरी बुराइयों में सराबोर ईसाई धर्मशास्त्र और खास कर प्रोटेस्टेंट धर्मशास्त्र ले आए, जिसने भारत के समाज की व्याख्या एक जातीय समाज के रूप में की. यानी पूरी श्रमण परंपरा ने जिस जाति के खिलाफ विद्रोह किया और हिंदू धर्मशास्त्रों की बहुसंख्या ने जिसको जोरदार तरीके से बचाव किया, वह ईसाई पुरोहितों की मनगढ़ंत और कपोल कल्पना थी, जिसको पता नहीं क्यों हम सबने सच मान लिया! उन्होंने ऐसी बकवास शिमोगा के कुवेंपु यूनिवर्सिटी स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ लोकल कल्चर्स के जरिए फैलाई, जहां के वे निदेशक थे. उनके 'शोध' के छुपे हुए ब्राह्मणवादी मंसूबे को अनेक लोगों ने उजागर किया है. उनके द्वारा और उन पर लिखे गए अनेक लेखों पर महज एक सरसरी निगाह भी इस बात को उजागर कर देगी कि उनका ताल्लुक 'सनातन धर्म अमर रहे गिरोह' से है. वे इस बात के लिए पर्याप्त शातिर हैं कि अपनी बातों का मकड़जाल बुनकर पश्चिम को बेवकूफ बना सकें जो बैठ कर उनकी बातें सुने और उनको एक प्रकांड विद्वान समझकर उन पर गौर करे. लेकिन गलती मत कीजिए; वे परिवार के नकली विद्वानों में से हैं, जो अपनी पतनशील परियोजना को बौद्धिकता का जामा पहना रहे हैं.

आंबेडकर की बात

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे एक आदमी के लिए आंबेडकर तो एक अभिशाप ही होंगे, जिन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी. आंबेडकर बेकार की लफ्फाजियों को विद्वत्ता के रूप में पेश करने के फेर में कभी नहीं पड़े. उन्होंने इस दुनिया के बालगंगाधरों की बैठे-ठाले की पुरोहिती के उलट, आजादी, बराबरी और भाईचारे पर आधारित एक समाज की स्थापना के मकसद की दिशा में सिद्धांत और व्यवहार को एक साथ मिलाते हुए मानवता के बुनियादी मुद्दों पर गौर किया. एक इंसान के रूप में आंबेडकर गलत हो सकते हैं, वे बहुत गलत भी हो सकते हैं. लेकिन उन्हें बेवकूफ कहना खुद सिर्फ और सिर्फ अपनी बेवकूफी को ही जाहिर करना है. आंबेडकर पर टिप्पणी करने के लिए किसी के पास ऊंची बौद्धिक ईमानदारी और सच्चाई होना जरूरी है, जो जाहिर है कि बालगंगाधर में नहीं है. वे 'जाति प्रमाणपत्र वाले गधे' कह कर अपनी नफरत दिखा सकते हैं, लेकिन उनमें यह समझने की साधारण बुद्धि भी नहीं है कि प्रतिभा (मेरिट) की यह घिसी-पिटी दलील अपने पैरवीकारों पर ही पलट कर भारी पड़ती रही है. जबकि आरक्षण का समर्थन नहीं है, जिसको हमेशा मैंने ठोस अर्थ में दलितों के लिए नुकसानदेह माना है, लेकिन गुलामी का इतिहास प्रतिभा की इस दलील के पुर्जे पुर्जे बिखेर देता है, जो प्राकृतिक संपदा से भरपूर इस उपमहाद्वीप में कथित (ऊंची जाति के) प्रतिभावान लोगों की देन था. उन्हें अपने इस अतीत पर शर्मिंदा होना चाहिए, न कि अपनी हिंदुत्व परियोजना के जरिए उसको फिर से रचने की कोशिश करनी चाहिए.

यह सिर्फ एक बदजुबान बालगंगाधर से निबटने का मामला नहीं है, जिससे एक आम दलित भी आसानी से निबट सकता है. यह इस बात को जानने का मामला है कि पूरा हिंदुत्व गिरोह सचमुच में किस बात का प्रतिनिधित्व करता है. एक तरफ तो यह उन सभी जगहों पर स्मारक बना-बना कर आंबेडकर की पूजा शुरू करना चाहता है, जहां जहां उन्होंने पांव रखे थे, लेकिन वहीं दूसरी तरफ यह उनकी बौद्धिकता को नकार कर, उन्हें बौद्धिक रूप से मामूली इंसान बना देना चाहता है. असल में यह हिंदुत्व का यह बुनियादी चरित्र है जिसे बालगंगाधर ने अनजाने में ही उजागर कर दिया है, जिसकी आम तौर पर जनता के लिए और खास तौर से दलितों के लिए अहमियत है. हजार सिरों वाला यह गिरोह ऐसे अनेक बालगंगाधरों को बेलगाम छोड़ देगा ताकि वे अपने भड़काऊ बयानों से हमारे सब्र का इम्तहान लें और फिर इसके नतीजों से खुद को दूर कर लेगा. यह भारत में अवर्णों को मिथ्या और औपनिवेशिक साजिश बता कर पूरी आंबेडकरी परियोजना को ही नाकाम कर देना चाहता है. यह विद्वत्ता नहीं है, यह गोएबल्स की वह बदनाम तरकीब है कि बड़े बड़े झूठों को बार बार दोहराते रहो जब तक वे सच न लगने लगें और आखिर में जनता द्वारा सच्चाई के रूप में कबूल कर लिए जाएं.

(जरूरी सामग्री मुहैया कराने के लिए मैं एफ्लु के शोधार्थी कार्थिक नवयान का शुक्रिया कहना चाहूंगा.)


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