THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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Friday, October 23, 2015

सपनों के सरोकार: वेणु गोपाल को याद करते हुए

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/23/2015 02:19:00 PM


वेणु गोपाल को याद करते हुए रुबीना सैफी का लेख. समयांतर (अक्तूबर, 2015) से साभार. 

किसी भी रचना या रचनाकार के सामने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो दो सवाल हमेशा मौजूद होते हैं वे हैं क्यों, और किसके लिए? नक्सलबाड़ी आंदोलन ने न केवल भारतीय राजनीति में इन सवालों को जगह दिलाई बल्कि भारतीय कला, साहित्य और सांस्कृतिक में भी इन सवालों को नए सिरे से सामने रखा। यही वजह है कि वेणु गोपाल की कविता न सिर्फ भारतीय राजनीति को नए सिरे से देखती है बल्कि कविता को भी परिभाषित करने की कोशिश करती है। 'क्यों लिखूं? किसके लिए लिखूं?' का सवाल हमेशा उनके सामने बना रहता है। वे कविता की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं, उसकी रचना प्रक्रिया, उसकी जरूरत पर सवाल उठाते हैं। 

वेणु गोपाल के काव्य संग्रह और ज्यादा सपने में कविता के नए प्रतिमानों के बनने की छटपटाहट साफ जाहिर है। वेणु गोपाल कविता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचते हुए दिखते हैं। कविता क्या कर सकती है और क्या नहीं? उसकी क्या संभावनाएं हैं या सीमाएं? उसकी दशा क्या है और दिशा क्या होनी चाहिए? इस काव्य संग्रह की ज्यादातर कविताओं के केन्द्र में यह सवाल मौजूद हैं। इस काव्य संग्रह से अलग एक जगह वह अपनी कविता में कहते हैं-

सोचता कोई नहीं कोई नहीं सोचता मेरी 
ओर से
कि खून की लकीर नहीं खींच सकती मेरी कलम
और स्याही से कभी कोई बात साफ नहीं होती

कवि कलम की सीमाओं से वाकिफ है। वो जानता है कि उसकी कविता 'कुरसी और मेज के बीच समन्दर खोद कर/बादलों के जन्म की प्रतीक्षा' की तरह उम्मीद और हकीकत की बारीक लकीर पर खड़ी है। जिसके फर्क को समझना कवि के लिए जरूरी है। वह जानता है कि कविता में आना स्याही की लकीरों के बीच बंधना भी है। वह कहता है कि 'चारदीवारी में शेर देखो/मेरी कविता में/मुझे देखो'। और जैसे ही कवि इन स्याही की लकीरों को पार कर हकीकत की दुनिया के बीचोबीच पहुंच जाता है कविताई उससे छिन जाती है। 'फिर यह छलांग देखो.../कि मैं दुनिया के बीचोबीच/ऐसा मेरा आना देखो/कविताई का जाना देखो।' एक राजनीति कविता के इस अंतरद्वंद्व से कवि वाकिफ है। वह लगातार इस सवाल से जूझता है कि कवि प्रथम दृष्टा नहीं रहा खबरों से आते हुए तथ्य, घटनाएं, दुर्घटनाएं उस तक पहुंचते हैं और वह उन पर कविता लिखता है। उसकी कविता में जगह पाते हैं। वह जिसे कविता में दर्ज करता है वह उस जिन्दगी का भोक्ता नहीं है बल्कि सिर्फ श्रोता है, पाठक है-

अखबारों को 
पंखों की तरह फड़फड़ाते हुए
हम
उड़ते हैं और पहुंचते हैं
एक भागलपुर
से दूसरे भागलपुर तक

इसलिए कवि के मन में सवाल आता है -

कवि कविता लिखता है
लेकिन उससे पहले अखबार पढ़ता है
...
तो अखबार छपता है
इसलिए कवि
कविता लिखता है

वेणु गोपाल की कविताओं में उभरे यह सवाल उस वक्त के पैदा किए गए सवाल हैं जब कविता और जनता के बीच की दूरी की माप से कविता का वज़न तय किया जाता था। जो कविता जनता की जिन्दगी के जितनी करीब है वो कविता उतनी ही बेहतर कविता है। नक्सलबाड़ी ने पूरे देश में साहित्य खासकर कविता और जनता के बीच की दूरी को कम किया। इसलिए इन सवालों के बावजूद कि -

या तो कविता लिखूं
या फिर न लिखूं
इस तिलिस्म से बाहर
निकल पाने का 
रास्ता
यह भी नहीं!
वह भी नहीं!

कवि कविता का ही रास्ता चुनता है। और वह कहता है कि 'यह होता रहेगा वह होता रहेग/लेकिन मैं फिर भी कविता लिखता रहूँगा।'

हिंदी की समकालीन कविता में भी हम इस प्रवृत्ति को देख सकते हैं, जहां इस आन्दोलन के बाद जनवादी कविता एक मुख्य प्रवृत्ति के रूप में स्थापित हुई। अब तक कविता जिन विषयों पर विचार कर रही थी वे तो बदले ही कविता की अन्तर्वस्तु में भी बदलाव आये। 

जनता और खासकर किसानों, मजदूरों और मध्य वर्ग का जीवन, उसके सुख-दुख उनके सपने और आकांक्षाएं, उनके हित और उद्देश्य बेहतर जीवन के लिए उनके संघर्ष आदि कविता के विषय बने। अब तक जीवन के जो पहलू, रूप और बिंब कविता से बाहर थे वे कविता में दखिल हुए-

'हर हाल में उसे उगना है
कि वह बीज है
और वह जानता है
कि वह बीज है'

नक्सलबाड़ी के दौर की कविता अपनी भूमिका को तय करने के दौरान कभी वक्त के दस्तावेज़ों को पाठकों के सामने रखती है तो कभी उनकी लड़ाई में साथ खड़ी होती है। इसलिए वेणु गोपाल को अपनी कविता 'कई बार दस्तावेज़ सी लगती है' तो कई बार 'भीतरी-बाहरी लड़ाई की रपट सी'। वेणु गोपाल की कविताओं को समझना दरअसल उस वक्त को समझना भी है जिसने आजादी के नाम पर दिए विकल्प के समानान्तर एक विकल्प को खड़ा किया जो ज्यादा पारदर्शी था, जो ज्यादा जनता की उम्मीदों के साथ था। जो किसी पूंजीपति घराने के दिमाग की उपज नहीं था बल्कि यह विकल्प उन्होंने खुद गढ़ा था। इस विकल्प ने न केवल राजनीति में बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति में भी एक समानान्तर धारा खड़ी की। इसमें वेणु गोपाल, कुमार विकल, आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय की बड़ी भूमिका है। महेश्वर, विजेन्द्र अनिल, रमाकांत द्विवेदी 'रमता' भी इसी नक्सलबाड़ी आन्दोलन की देन हैं। 

कवियों की यह वो जमात है जिसने कविता में उम्मीद, सृजन और भविष्य के निर्माण की एक दिशा को तब स्थापित किया, जब (सत्ता हस्तांतरण के बाद) के दौर में धीरे धीरे कविता मोहभंग, निराशा और विकल्पहीनता विचारों से भर गई थी. ये वो कवि थे, जिन्होंने सिर्फ आलोचना नहीं की, जैसी कि धूमिल कर रहे थे और न ही रूमानी आशाओं पर उनकी कविता टिकी हुई थी. वेणु गोपाल समेत ये वो कवि थे, जिन्होंने पहली बार हिंदी कविता को जनता के संघर्षों का आधार दिया. हालांकि उनमें इसको व्यक्त करने के तरीके में स्पष्ट अंतर देखा जा सकता है. आलोकधन्वा इस दौर के सबसे चर्चित और उद्धृत कवि हैं, लेकिन उनमें संघर्षों से एक भौतिक अलगाव को साफ महसूस किया जा सकता है, जो उनकी कविताओं को एक भाषाई कारीगरी से लैस करता है. वेणु गोपाल में जवाब के बजाए सवाल ज्यादा हैं, शंकाएं हैं, संदेह हैं, बहस है. इस संग्रह की कविताओं में जनता भी उतनी नहीं है, जितनी आलोकधन्वा की कविताओं में है. यहां कवि 'मैं', 'तुम' और 'वह' की बहस में है. लेकिन यह भी उतना ही साफ है कि कवि जिस जमीन पर खड़ा है, वह ठोस है, उसके सवाल सृजन के सवाल हैं, उसकी शंकाएं रास्ते की ओर बढ़ने की कोशिश का हिस्सा हैं, उसकी बहस हालात को और साफ-साफ देख पाने की चिंता से जुड़ी बहस है. इस मायने में, वेणु गोपाल की कविताएं नक्सलबाड़ी की परिपक्व कविताएं हैं, जिन्हें सीधे सीधे पोस्टरों और बैनरों में इस्तेमाल करना शायद आसान न हो, लेकिन जनता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए जिन पर बैठ कर सोचना जरूरी है. 

नक्सलबाड़ी के दौर के हिंदी कवियों की पहली पीढ़ी में अकेले वेणु गोपाल ही हैं, जो इस नए आंदोलन की संगति में एक नई सौंदर्यदृष्टि को विकसित करने की चिंता करते दिखाई देते हैं. आलोकधन्वा में जो एक सहज आकर्षण है, वह इसलिए है कि वे लीक को और पैना बनाते हुए, उसे साधते हुए कविता रचते हैं. जबकि वेणु गोपाल का सरोकार इससे दिखता है कि वे एक ऐसी दृष्टि को विकसित करें, जो न सिर्फ लेखकों और पाठकों को इस आंदोलन के वैचारिक सरोकारों के करीब ले जाए, बल्कि उसके नजरिए से दुनिया को देखने का चलन भी शुरू करे. उदाहरण के लिए उनकी कविता जड़ें देखिएः

हवा 
पत्तों की
उपलब्धि है। खूबसूरती
तो सारी जड़ों की है।

यह नक्सलबाड़ी के दौर के पहले हिंदी कवियों में वेणु गोपाल के ही सरोकार हैं, जो आगे चल कर गोरख पाण्डेय के रचनात्मक सरोकारों से गहराई से जुड़े हुए दिखते हैं. यह वेणु गोपाल की कविताओं का द्वंद्व और उनकी विडंबना है, जो गोरख में और ज्यादा मुखर होकर सामने आई. उदाहरण के लिए वेणु गोपाल अपनी कविता 'दुर्घटना' में जिन्दगी और मौत के फर्क को पेश करते हैं। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना ही जिन्दा होने की निशानी है। वे कहते हैं:

उस 
अकेले की मुट्ठी खुल गयी थी
रेत ही रेत
बिखर गयी थी
सब तरफ-लेकिन
कई कई मुट्ठियां
और ज्यादा
मज़बूती से
बन्द हो गयी थीं
सड़क पर

इन लड़ाइयों में भी कवि कलम की मशाल के बल पर खुद से भी बराबर लड़ता है। अपने भीतर के 'मैं' से बराबर लड़ता है। उसके भीतर का 'मैं' जो बराबर 'तुम' की तलाश में है। 'तुम' के इंतजार में है-

रोशनियाँ
मजबूत सलाखें हैं
जिनके भीतर
कै़द 
कवि
अंधेरे के वजूद से
इन्कार करता हुआ
और ज्यादा 
भीतरी कोनों की तरफ
जा रहा है
कलम को मशाल की तरह
थामे।

इस कविता संग्रह में कई प्रेम कविताएं भी हैं। वेणु गोपाल की प्रेम कविताएं एक स्त्री की संवेदना तक पहुंचने की कोशिश भर हैं, वे कोई दावा नहीं करतीं। वेणु गोपाल प्रेम और स्त्रियों को लेकर कोई दावा नहीं करते, वे इसकी कोशिश करते हैं कि उन्हें सही से समझ सकें. 

सारी कैदें टूट जाती हैं
हम आकाश हो जाते हैं

लैंगिक प्रश्नों पर वे एक सही जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं, इसलिए यहां भी, उनके पास सवाल ही ज्यादा हैं. लेकिन ये सवाल, ऐसे सही सवाल हैं, जो सही जवाब तक पहुंचने में मदद करते हैं. जैसे कि उनकी कविता 'वह'

यों वह बेहद शर्मीली है
लेकिन
इस वक्त कितनी
बेखबर है...
अपने स्तन के उघड़े होने से...
वह घूरती सी देख रही है
गोदी में लेटे बच्चे को...
आखिर
वह क्या ढूंढ़ रही है?
वह क्या पा रही है?

नक्सलबाड़ी के दौर की कविताओं को नारेबाजी कहकर खारिज करने का एक आम चलन रहा है. वेणु गोपाल कविता को एक जारी प्रक्रिया की तरह देखते हैं, जिसमें बदलते हुए समय के साथ कविता बदलती है और उसे अपने दौर की आवाज बनना पड़ता है. वे इस युग की पहचान एक ऐसे दौर के रूप में करते हैं, जिसमें 'बिना शब्द शब्द में आरडीएक्स का/जखीरा बनाए/नहीं लिखी जा सकती कविता आज'।


वह मानते हैं कि जिस दौर में यह कविता लिखी जा रही थी उस दौर में ऐसी ही कविता लिखी जा सकती थी। कोई भी प्रगतिशील विधा अपनी समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदल लेती है। कविता इस मायने में सबसे लचीली रही है। इस दौर में कविता नारे भी बनी है और चीखें भी। कवि को इस बात से कोई इंकार नहीं, वह खुद कहते हैं कि -

टापों की आवाजों के 
समानांतर
ये चीखें हैं - मेरी कविताएं

वे मानते हैं कि कविता कब क्या रूप लेगी इसका निर्णायक पाठक होगा 'वह पाठक जो लड़ता भी है आखिरी साँस तक/बढ़ता भी है जहाँ तक हो सकता है/ चढ़ता भी उतना जितना मुमकिन हो' वही 'पाठक निर्णायक' होगा।

वेणु गोपाल परंपरा और वर्तमान के द्वंद्व से अपनी कविता को विकसित करते चलते हैं। इस कविता संग्रह के सारे सवाल, सारे ख्याल 'और ज्यादा सपने' को हकीकत की जमीन पर खींचकर लाने की जद्दोजहद है। वो सारे सवाल, वो सारे ख्याल वो सारे सपने जो एक आंदोलन ने पैदा किए थे जो न केवल आज के वक्त के लिए, बल्कि भविष्य के लिए भी उतने ही जरूरी हैं जितने उस दौर के लिए थे।

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