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Tuesday, November 12, 2013

सिंगुर में ही नैनो परियोजना का दूसरा चरण,जमीन नहीं छोड़ेगा टाटा समूह সিঙ্গুরে এখনও কারখানায় আগ্রহী টাটা Tata Motors keen to retain Singur land, wants to return with Nano project .. अब राज्य सरकार और टाटा समूह दोनों पक्षों के पास अगली सुनवाई से पहले पूरे छह महीने हैं कि नया समझौता करके सिंगुर में किसानों की समस्या सुलझाते हुए नैनो कारखाना का पुनर्जीवन कर दें। फिर अगली सुनवाई के वक्त सर्वोच्च अदालत को सूचित कर दें।अदालत से बाहर समझौते का यह अभूतपूर्व सुनहरा मौका है।

सिंगुर में ही नैनो परियोजना का दूसरा चरण,जमीन नहीं छोड़ेगा टाटा समूह

সিঙ্গুরে এখনও কারখানায় আগ্রহী টাটা



Tata Motors keen to retain Singur land, wants to return with Nano project ..




अब राज्य सरकार और टाटा समूह दोनों पक्षों के पास अगली सुनवाई से पहले पूरे छह महीने हैं कि नया समझौता करके सिंगुर में किसानों की समस्या सुलझाते हुए नैनो कारखाना का पुनर्जीवन कर दें। फिर अगली सुनवाई के वक्त सर्वोच्च अदालत को सूचित कर दें।अदालत से बाहर समझौते का यह अभूतपूर्व सुनहरा मौका है।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


टाटा मोटर्स के वकील हरीश साल्वे और मुकुल रोहजगी ने सिंगुर जमीन विवाद के सिलसिले में हाईकोर्ट के  अनिच्छुक किसानों को जमीन वापस करने के लिए सिंगुर  में प्रस्तावित नैनो कारकाना की जमीन के अधिग्रहण को निरसत् करने के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान साफ साफ शब्दों में कह दिया कि टाटा मोटर्स ने सिंगुर में नैनो कारखाना लगाने का इरादा नहीं छोड़ा है।खास परिस्थितियों में कारखाने का कामकाज बाधित हो जाने के कारण गुजरात के सानंद से नैनोका उत्रपादन जरुर शुरु हुआ,लेकिन कंपनी उत्पादन का दूसरा चरण सिंगुर में ही पूरा करना चाहती है।इसलिए समूह नैनो कारखाने के लिए अधिग्रहित जमीन पर अपना दावा कतई नहीं छोड़ेगी।टाटा मोटर्स के वकीलों ने माना कि फिलहाल विवादित जमीन उनके कब्जे में नहीं है,लेकिन उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि सिंगुर में कारखाना चलाने लायक माहौल बनते ही समूह नये सिरे से पुनर्जीवन का काम शुरु कर देगा और इसके लिए वह नये सिरे से राज्य सरकार को आवेदन करने को भी तैयार है।


पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित सिंगूर जमीन मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास अधिनियम को असंवैधानिक करार दिया है।

जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष और जस्टिस मृणल कांति चौधरी की खंडपीठ ने इस अधिनियम को खारिज करते हुए कहा कि इसमें राष्ट्रपति की सहमति नहीं ली गई थी।

टाटा ने इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के ही एक सदस्यीय बेंच के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने सितंबर , 2011 में इस अधिनियम को सही ठहराया था।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद पिछले साल जून में ये अधिनियम पारित किया था।

इस विधेयक के तहत सिंगूर में टाटा के साथ हुए समझौते को रद्द करते हुए ज़मीन किसानों को वापस दी जानी थी।





तृणमूल के अंदरूनी तंत्र में मांग उठ रही है कि सिंगुर में टाटा समूह के साथ चल रहे विवाद को खत्म किया जाए। कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि अदालत के बाहर सिंगुर मसले का समाधान निकालने की दिशा में राज्य सरकार की ओर से प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसे नेताओं में सिंगुर के विधायक व मंत्री  रवींद्र नाथ भट्टाचार्य भी शामिल हैं।इस सिलसिले में पिछले दिनों में खड़गपुर में टाटा हिताची के कार्यक्रम में हाजिर होकर राज्य के उद्योगमंत्री ने सकारात्मक संदेसश ही दिया है।इससे पहले किसानों के विरोध के बावजूद हुडको की जमीन पर राजारहाट में टाटा की परियोजना को तृणमूल काग्रेस ने हरिझंडी भी दे दी है।जाहिर है कि पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी की हरी झंडी के तहत ही यह प्रगति हुई।


जिन लोगों को देर सवेर दोनों पक्षों की शुभबुद्धि के मुताबिक बंगाल में कारोबार,उद्योग और निवेश का माहौल सुधरने के लिए अदालत के बाहर फैसला हो जाने का भरोसा है,उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दोनों पक्षों के वकीलों की सिंगुर की विवादित जमीन के मामले  की सुनवाई के दौरान हुई नोंक झोंक से निराशा हो सकती है।


लेकिन सिंगुर के बदले सानंद से नैनो कार निकालने के बाद पहलीबार टाटा समूह ने खुलकर घोषणा की है कि उसने सिंगुर में कारखाना लगाने की परियोजना खत्म नहीं की है। इसके एक कदम आगे बढ़कर टाटा समूह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में ही  घोषणा हो गयी है कि नैनो परियोजना का दूसरा चरण सिंगुर में ही पूरा होगा।


इसके अलावा टाटासमूह के वकील ने राज्य सरकार की  दलील को सिरे से खारिज करते कह दिया  कि किसी भी स्तर पर उसने राज्य सरकार से नहीं कहा कि उसने सिंगुर परियोजना का पटाक्षेप कर दिया है।


अब टाटा समूह  गेंद सीधे तौर पर राज्य सरकार के पाले में डाल दिया है और साफ कर दिया है कि वह सिंगुर में कारखाना शुरु करने के लिए नये सिरे से आवेदन करने को तैयार है। बशर्ते कि राज्य सरकार इसके लिए तैयार हो।


जाहिर है कि सिंगुर की उलझन से निकलने और सिंगुर के अनिच्छुक किसानों के साथ ही बागाल में सबसे ज्यादा दांव लगाने वाले उद्योगपतियों, कारोबारियों और निवेसकों की जमीन संबंदी हिचकिचाहट दूर करने का बेहतरीन मौका है दीदी के सामने ।क्योंकि नये सिरे से आवेदन का मतलब यह हुआ कि वाम जमाने में हुए समझौते से इतर राज्य सरकार की शर्तों के मुताबिक सिंगुर कारखाने का पुनर्जीवन। ले देकर अदालत से बाहर समझौता करके दोनों पक्ष इस आत्मघाती विवाद से निजात पा सकते हैं और सिंगुर में अनिच्छुक किसानों की जायज मांगो को सुलझाकर बंगाल में औद्यगीकरम की नयी पहल कर सकते हैं।


अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने टाटा मोटर्स से पूछा था कि अगर सिंगुर में उसे कारखाना लगाना नहीं है तो वह जमीन क्यों नहीं छोड़ देता।टाटा मोटर्स के वकील हरीश साल्वे ने सर्वोच्च स्तर का हवाला देते हुए कहा कि सिंगुर में नैनो का कारखाना हर हालत में लगाना चाहता है टाटा समूह।इस सफाई को मानते हुए न्यायालय ने अपना सवाल वापस ले लिया है और कह दिया है कि इस सिलसिले में आगे चर्चा नहीं होगी।


अब राज्य सरकार और टाटा समूह दोनों पक्षों के पास अगली सुनवाई से पहले पूरे छह महीने हैं कि नया समझौता करके सिंगुर में किसानों की समस्या सुलझाते हुए नैनो कारखाना का पुनर्जीवन कर दें। फिर अगली सुनवाई के वक्त सर्वोच्च अदालत को सूचित कर दें।अदालत से बाहर समझौते का यह अभूतपूर्व सुनहरा मौका है।


खास तौर पर यह ध्यान में रखने की बात है कि टाटा समूह  के वकील हरीश साल्वे ने अदालत में सुनवाई के दौरान यह माना है कि उसे इतनी अच्छी जमीन एक मुश्त अन्यत्र मिल नहीं सकती।समझ में आने वाली बात है कि आंदोलन के कारम टाटासमूह की वापसी के बाद से अब तक जमीन की कीमतों में सौ सौ गुणा वृद्धि हो गयी है।नये भूमि अधिग्रहण कानून के मुताबिक कहीं भी कारखाना लगाने के लिए बाजार भाव के मुताबिक जमीन की कीमत के अलावा किसानों सके साथ ही उस जमीन से आजीविका चलाने वाले तमाम लोगों को मुआवजा देने का प्रावधान है।नयी जगह जमीन खोजने के बजाय राज्य सरकार की शर्तों के मुताबिक किसानों की समस्याएं दूर करके सिंगुर में ही कारखाना लगाना टाटा समूह के लिए फायदे का सौदा है।इसे समझकर बातचीत की टेबिल पर एक बेहतर नये समझौते को अंजाम देने में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रशासनिक दक्षता की अग्नि परीक्षा का समय है यह।


वैसे भी सत्तादल भूमि आंदोलन के दौरान जो शेर की सवारी कर रही थी और शेर की पीठ से उतरने का उसे जो मौका नहीं मिल रहा है,इस चक्रवाती तूफान से निकलने का यह स्वर्णिम अवसर है।


गौरतलब है कि बॉम्बे हाउस के  साइरस मिस्त्री के साथ नई पारी की शुरुआत किये अरसा बीत गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार को भी टाटा समूह के नए मुखिया से खासी उम्मीदें रही हैं। राज्य सरकार को साइरस से शुरु से  उम्मीद रही  है कि आने वाले दिनों में टाटा समूह के नए नेतृत्व के साथ उनके संबंध सुधरेंगे और सिंगुर परियोजना के लेकर लंबे समय से चल रहा मुनमुटाव जल्द खत्म होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि संबंध सुधरे हैं वरना टाटा के कार्यक्रम में पार्थ चटर्जी फोटो न खिंचवा रहे होते।


पश्चिम बंगाल के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने पहले ही कहा है, 'हम किसी उद्योग समूह के खिलाफ नहीं हैं। टाटा समूह के प्रबंधन में शीर्ष स्तर पर बदलाव होने जा रहा है। अब हमें देखना है कि आगे क्या होता है।' हालांकि उनसे जब यह पूछा गया कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार साइरस मिस्त्री के नेतृत्व वाले टाटा समूह के साथ अदालत के बाहर सिंगुर भूमि विवाद के निपटारे को लेकर पहल करेगी, तो उन्होंने इस पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।


अब परिस्थितियां किंतु अदालत से बाहर समझौते की परिपक्व हैं।


अब ऐसा भी लगता है कि टाटा समूह को लेकर राज्य सरकार के विचारों में बदलाव आ गया है। वास्तव में तृणमूल कांग्रेस के कई लोगों का मानना है कि सिंगुर में 'जबरन भूमि अधिग्रहण' के खिलाफ ममता बनर्जी के आंदोलन को पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार ने इसे रतन टाटा के खिलाफ लड़ाई बना दिया था। हालांकि वर्ष 2008 में सिंगुर आंदोलन के दौरान खुद बनर्जी ने कई बार टाटा पर निशाना साधा था। उन्होंने टाटा पर सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के लिए राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टाचार्य के साथ 'मिलीभगत' का आरोप लगाया था। तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि टाटा ने भी बनर्जी पर व्यक्तिगत हमले किए थे। टाटा ने बनर्जी को 'बुरा एम' की संज्ञा दी थी जबकि 'अच्छा एम' का आशय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से था क्योंकि सिंगुर विवाद के बाद उन्होंने टाटा परियोजना के लिए गुजरात के साणंद में रातों-रात जमीन उपलब्ध करा दी थी।


সিঙ্গুরে ন্যানো প্রকল্পের পরবর্তী পর্যায়ের কাজ করার সম্ভাবনা উস্কে দিল টাটা। সিঙ্গুর মামলার শুনানিতে এদিন, সুপ্রিম কোর্টে একথা জানিয়েছেন টাটার আইনজীবী হরিশ সালভে। টাটার শীর্ষ আধিকারিকদের সঙ্গে কথা বলেই তিনি এমন মন্তব্য করেছেন।


শীর্ষ আদালতে জানানো হয়েছে, টাটার ন্যানো কারখানার প্রথম পর্যায়ের কাজ গুজরাতে হয়েছে। ন্যানো প্রকল্প নিয়ে টাটাদের আরও পরিকল্পনা রয়েছে। সেই পরিকল্পনার কাজ সিঙ্গুরকে ঘিরেও আছে । সিঙ্গুর মামলার পরবর্তী শুনানি ধার্য করা হয়েছে আগামী বছরের এপ্রিল মাসে।

Tata wants to retain Singur land, keen on returning to West Bengal

Tuesday, Nov 12, 2013, 20:25 IST | Place: New Delhi | Agency: PTI

Tata Motors on Tuesday told the Supreme Court that it wanted to keep the leasehold rights over the 997 acre land, allotted by the Left Front government at Singur in West Bengal as it is keen on returning to the state with next phase of expansion of the Nano car project.

"I have instructions from the highest level to submit that we are keen to return there (West Bengal)," senior advocate Harish Salve told a bench comprising justices H L Dattu and Ranjana Prakash Desai.

The automobile firm's response came in reply to an earlier specific query of the apex court asking it to make its stand clear over the allotted land in the wake of changed scenario as the company had already moved its car plant to Gujarat.

"The land was acquired for establishing a car manufacturing plant at Singur. Now the purpose is no more there as you have already moved out. Now you cannot say that you still have interests in the land in question," the bench had said.

"The land should move back to the agriculturists and we may ask West Bengal government to file an affidavit on the issue of giving the money back to you which you had paid at the time of land acquisition," it had said.

Responding to Tata's stand, the counsel for West Bengal government said it would urge that the land be returned to farmers.

Taking note of the submisisons, the bench said since the company wanted to retain the land, it will have to decide on the state's plea on merits and fixed the case for final hearing in April next year.

The court was hearing a special leave petition filed by West Bengal government challenging the quashing of the Singur Land Acquisition Act by the Calcutta High Court.

The state government had moved the apex court against the Calcutta high court order which had struck down the Singur Land Rehabilitation and Development Act 2011 that allowed it to reclaim the 400 acres of land given to Tata Motors.

The high court had on June 22, last year, ruled that the legislation enacted by West Bengal government to recover the land leased to Tata Motors in Singur for its Nano small car project was constitutionally invalid as the President's assent had not been taken for the Act.

The high court's order had come on an appeal by Tata Motors Ltd against a decision of its single-judge bench which had held the Act to be constitutional.

Tata Motors was given 997 acre on lease for 90 years at Singur in Hooghly district by the previous Left Front government. After controversy and sustained street protests spearheaded by Trinamool Congress, the company had moved the Nano factory to Sanand in Gujarat but kept possession of the land.

Trinamool Congress had demanded return of 400 acre to farmers who were unwilling to give land for the project.

After coming to power, the Trinamool Congress government in West Bengal got the Singur Land Rehabilitation and Development Act, 2011 in the assembly to facilitate the return of a portion of the land to farmers.

  1. Call to expedite Singur case - The Telegraph

  2. www.telegraphindia.com/1130903/jsp/bengal/story_17305313.jsp

  3. Sep 3, 2013 - New Delhi, Sept. 2: The Mamata Banerjee government and Tata Motors today urged the Supreme Court to expedite the hearing in the Singur ...

  4. Singur land-return suggestion - The Telegraph

  5. www.telegraphindia.com/1130711/jsp/frontpage/story_17105053.jsp

  6. Jul 11, 2013 - The Singur land law was upheld by a single bench of Calcutta High ... do not agree to the suggestion, the court can hear the case on its merit.

  7. Singur: Latest News, Videos, Photos | Times of India

  8. timesofindia.indiatimes.comTopics

  9. The High Court will decide on the fate of the Singur case today. The state government had passed the Singur land development and rehabilitation act 2010 and ...

  10. Singur Case: Latest News, Photos, Videos on Singur ... - NDTV.com

  11. www.ndtv.comTopic

  12. Video : Singur case: Mamata Banerjee welcomes Supreme Court's stay order ... Plea for contempt case against West Bengal minister over Singur verdict remark.

  13. Singur case: Mamata Banerjee welcomes Supreme Court's stay ...

  14. www.ndtv.comAll India

  15. Aug 24, 2012 - The Supreme Court today stayed a Calcutta High Court judgement and issued a notice to the Mamata Banerjee-led West Bengal government ...

  16. Singur land should be returned to farmers: Supreme Court to Tata ...

  17. www.ndtv.comAll India

  18. Jul 10, 2013 - Singur case: Mamata Banerjee welcomes Supreme Court's stay order. 0:56. Singur case: Mamata Banerjee welcom... Post your comments ...

  19. All India Trinamool Congress :: Singur Movement: The full story

  20. www.aitmc.org/singurstory.php

  21. CBI has no doubt that hers is a case of premeditated murder. Those who burnt theSingur anti-land acquisition activist alive were goons on hire, brought from ...

  22. Apex court asks Tata Motors to clear stand on Singur | Business ...

  23. www.business-standard.com/.../apex-court-asks-tata-motors-to-clear-stan...

  24. Jul 11, 2013 - The next hearing for the case has been fixed for August 13. ... There is a provision in the Singur Act for compensation, which is to be decided by ...

  25. Make your stand clear over Singur land: Supreme Court to Tata Motors

  26. www.indianexpress.com/news/make-your-stand...singur.../1140024/

  27. Jul 10, 2013 - ... to make its stand clear on its leasehold rights over the Singur land in the ... Coalgate case: After 'caged parrot' fiasco, CBI wants to share info ...



सिंगुर भूमि पुनर्वास विकास अधिनियम, 2011 संवैधानिक व वैध: कलकत्ता उच्च न्यायालय


कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सिंगुर भूमि पुनर्वास विकास अधिनियम, 2011 को संवैधानिक व वैध करार दिया. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने टाटा मोटर्स की सिंगुर भूमि पुनर्वास विकास अधिनियम, 2011 को असंवैधानिक बताने वाली याचिका खारिज कर दी.


कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंद्रप्रसन्न मुखर्जी ने 28 सितंबर 2011 को अपने निर्णय में टाटा मोटर्स को दो माह के भीतर सिंगुर से सारा सामान हटा लेने का आदेश दिया. इसके साथ ही निर्णय में यह भी बताया गया कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बनाया गया कानून तथा इसके तहत उठाए गए कदम संवैधानिक है तथा सिंगुर भूमि पुनर्वास विकास अधिनियम, 2011 में इस प्रकार के अधिग्रहण के लिए पर्याप्त जनहित का ध्यान रखा गया.


कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंद्रप्रसन्न मुखर्जी ने अपने निर्णय पर 2 नवंबर 2011 तक बिना शर्त रोक लगा दी ताकि पीड़ित पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकें. कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा हुगली जिले के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को टाटा से राज्य सरकार को सुगमता के साथ भूमि हस्तांतरण हेतु विशेष अधिकारी नियुक्त किया गया.


ज्ञातव्य हो कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद सिंगुर भूमि पुनर्वास विकास अधिनियम, 2011 पारित किया गया था और 21 जून 2011 को सिंगुर की पूरी जमीन राज्य सरकार द्वारा कब्जे में ले ली गई थी. टाटा मोटर्स ने 22 जून 2011 को कलकत्ता उच्च न्यायालय में नए कानून को चुनौती दी थी कि यह असंवैधानिक है क्योंकि 600 एकड़ भूमि उसे दी गई थी जिसका हस्तांतरण किया जाना गलत है.


এখন সিঙ্গুরে জমির কি প্রয়োজন? টাটাকে প্রশ্ন সুপ্রিম কোর্টের

July 10, 2013

সিঙ্গুর মামলায় জমি সংক্রান্ত বিষয়ে টাটা মোটর্সকে প্রশ্ন করল সুপ্রিম কোর্ট। আজ সর্বোচ্চ আদালতে টাটা মোটর্সের আইনজীবীকে প্রশ্ন করা হয়। শীর্ষ আদালতের বক্তব্য, টাটা মোটর্স সিঙ্গুরের জমি ছেড়ে চলে গিয়েছে। গুজরাটে তাদের নতুন কারখানাও হয়েছে। তাহলে এখন সিঙ্গুরের জমির কী প্রয়োজন রয়েছে? টাটা মোটর্সের আইনজীবীর কাছে আজ এপ্রশ্নই রেখেছে আদালত। ১৩ অগাস্ট এই মামলার পরবর্তী শুনানি হবে।



সিঙ্গুরে এখনও কারখানায় আগ্রহী টাটা

নয়াদিল্লি: সিঙ্গুরের জমিতে এখনও কারখানা গড়তে আগ্রহী টাটা গোষ্ঠী৷ মঙ্গলবার সুপ্রিম কোর্টে সাফ জানিয়ে দিলেন টাটার আইনজীবী হরিশ সালভে এবং মুকুল রোহতাগি৷ এদিন আদালতে তাঁরা বলেন, আমরা জমি ছেড়ে দিইনি৷ এটা কারখানার জমি৷ আমরা প্রকল্প সম্প্রসারণ করছি৷ প্রথম পর্যায়ে গুজরাতে প্রকল্প শুরু হয়েছে৷ পরের পর্যায়ে প্রকল্পের সম্প্রসারণ হবে৷ সিঙ্গুরে প্রকল্প গড়তে আমরা অত্যন্ত আগ্রহী৷ সিঙ্গুরে আমাদের অনুসারী শিল্প সংস্থাগুলিও রয়েছে৷ এরকম জমি আমরা আর কোথায় পাব? টাটা গোষ্ঠীর সর্বোচ্চ পর্যায়ে কথা বলেই আমরা এই সওয়াল করছি৷ হয়তো জমি এখন আমাদের দখলে নেই, কিন্তু, কলকাতা হাইকোর্ট আমাদের পক্ষেই রায় দিয়েছে৷ সিঙ্গুরে শান্তিপূর্ণ পরিবেশ থাকলে, আমরা প্রকল্প চালিয়ে যাব৷

কল্যাণ বন্দ্যোপাধ্যায় সহ রাজ্য সরকারের আইনজীবীরা তখন পাল্টা বলেন, টাটা মোটর্স চিঠি দিয়ে জানায়, তারা সিঙ্গুর প্রকল্প পরিত্যক্ত ঘোষণা করে কারখানা গুজরাতের সানন্দে সরিয়ে নিয়ে যাচ্ছে৷

এরপরই টাটার আইনজীবীরা বলেন, আমরা বাধ্য হয়ে কাজ বন্ধ করি৷ কারণ, সিঙ্গুরের পরিস্থিতি শান্তিপূর্ণ ছিল না৷ আমরা কি কাজ শুরুর প্রস্তাব দিয়ে রাজ্য সরকারকে এখন চিঠি দিতে পারি? আমরা যদি প্রস্তাব পাঠাই, তাহলে সরকার তা বিবেচনা করবে

কি না, আদালতে তাহলে তা জানাক৷

এরপরই বিচারপতিরা জানান, টাটাদের অবস্থান স্পষ্ট৷ তাহলে এবার আদালত মূল প্রশ্নের ফয়সালা করবে৷ অর্থাত্ সিঙ্গুর আইন সাংবিধানিক নাকি অসাংবিধানিক, কলকাতা হাইকোর্টের রায় ঠিক না ভুল৷ পাঁচ মাস পর অর্থাত্ আগামী বছর এপ্রিল মাসে এই মামলার পরবর্তী শুনানি৷ আদালতের এই সিদ্ধান্ত জানার পরই শুনানির দিন এগিয়ে আনার জন্য বিচারপতিদের অনুরোধ করেন সরকারি আইনজীবী কল্যাণ বন্দ্যোপাধ্যায়৷ কিন্তু, বিচারপতিরা সেই আর্জি খারিজ করে দেন৷

http://www.abpananda.newsbullet.in/state/34-more/43465-2013-11-12-10-16-11

পশ্চিমবঙ্গে সিঙ্গুর জমি আইন অবৈধ

অমিতাভ ভট্টশালী

বিবিসি বাংলা, কলকাতা

বামফ্রন্ট সরকারের আমলে সিঙ্গুরে ন্যানো গাড়ি তৈরির কারাখানার জন্য টাটা গোষ্ঠী জমি অধিগ্রহণ করে

ভারতে পশ্চিমবঙ্গের সিঙ্গুরে টাটা গোষ্ঠীর ন্যানো গাড়ি কারখানার জমি পুনরায় অধিগ্রহণ করতে পশ্চিমবঙ্গ সরকার যে আইন করেছিল, তাকে কলকাতা হাইকোর্ট আজ (শুক্রবার) অসাংবিধানিক ও অবৈধ বলে রায় দিয়েছে৻

দুই সদস্যের ডিভিশন বেঞ্জ আইনটি খারিজ করে দেওয়ার কথা বললেও দুমাসের জন্য এতে স্থগিতাদেশ দিয়েছে যাতে সর্বোচ্চ আদালতে আপিল করা যেতে পারে৻

রায় ঘোষণার পরে সরকার বলেছে যে তারা সুপ্রিম কোর্টে আপিল করবে।

অন্যদিকে টাটা গোষ্ঠী আজকের রায়কে স্বাগত জানিয়েছে৻

কলকাতা হাইকোর্টের দুই সদস্যবিশিষ্ট ডিভিশন বেঞ্চ তার রায়ে বলেছে যে সিঙ্গুরের টাটা কারখানার জমি পুনরায় অধিগ্রহন করে অনিচ্ছুক কৃষকদের মধ্যে তা বিলি করার জন্য তৈরি আইনটি অসাংবিধানিক৻

জমি দিতে অনিচ্ছুক কৃষকদের পক্ষে দীর্ঘদিন ধরে তাঁরা লড়াই চালিয়েছেন এখনও তাঁদের পাশেই থাকবেন তাঁরা৻

পার্থ চ্যাটার্জী, শিল্প মন্ত্রী

কারণ ব্যাখ্যা করতে গিয়ে বিচারপতিরা বলেছেন যে রাজ্য সরকারের তৈরি ওই আইনটির কয়েকটি ধারার সঙ্গে ১৮৯৪ সালের জমি অধিগ্রহণ আইনের বিরোধ আছে৻ কোনও রাজ্য সরকার যদি কেন্দ্রীয় আইনের সঙ্গে অসঙ্গতিপূর্ণ কোনও আইন তৈরি করে, তাহলে কেন্দ্রীয় মন্ত্রিসভা আর রাষ্ট্রপতির অনুমোদন প্রয়োজন৻

এক্ষেত্রে পশ্চিমবঙ্গ সরকার সেইসব অনুমোদন নেয় নি৻ তাই আইনটি অবৈধ বলে রায় দেয় পিনাকী চন্দ্র ঘোষ আর মৃণাল কান্তি চৌধুরীর ডিভিশন বেঞ্চ৻

রায়ের পরে সরকার পক্ষের অন্যতম আইনজীবী ও তৃণমূল কংগ্রেস দলের সাংসদ কল্যাণ ব্যানার্জী মন্তব্য করেন, "হাইকোর্টের এক সদস্য বিশিষ্ট বেঞ্চে আমরা আগে জিতেছি, ডিভিশন বেঞ্চের রায় টাটাদের পক্ষে গেছে৻ ফলাফল এক এক হয়েছে৻ এবার ফাইনাল বাকি রয়েছে৻"

রায় ঘোষণার পরে সরকার জানিয়েছে যে তারা সুপ্রিম কোর্টে আপিল করবে৻

শিল্পমন্ত্রী পার্থ চ্যাটার্জী জানান, "জমি দিতে অনিচ্ছুক কৃষকদের পক্ষে দীর্ঘদিন ধরে তাঁরা লড়াই চালিয়েছেন এখনও তাঁদের পাশেই থাকবেন তাঁরা৻"

আমরা বার বার বলেছি যে ইচ্ছুক আর অনিচ্ছুক কৃষকদের মধ্যে ফারাক করা উচিত নয়৻ আরও বলেছিলাম, আইনত রাষ্ট্রপতির সম্মতি দরকার৻ তাও নেওয়া হয় নি৻

সূর্যকান্ত মিশ্র, বিরোধী দলনেতা

অন্যদিকে রাজ্যের বিরোধী দলনেতা সূর্যকান্ত মিশ্রের কথায়, "মানুষ তাঁদের পক্ষে রায় দিয়েছে৻ জমি ফেরত দিতেই পারেন – তাতে আমাদের আপত্তি ছিল না৻ কিন্তু আমরা বার বার বলেছি যে ইচ্ছুক আর অনিচ্ছুক কৃষকদের মধ্যে ফারাক করা উচিত নয়৻ আরও বলেছিলাম, আইনত রাষ্ট্রপতির সম্মতি দরকার৻ তাও নেওয়া হয় নি৻ আমরা জানতাম যে এই পদ্ধতিতে তৈরি আইন অসাংবিধানিক বলে প্রমাণিত হবে৻"

২০০৬ সালে পূর্বতন বামফ্রন্ট সরকার সিঙ্গুরে প্রায় এক হাজার একর জমি টাটা গোষ্ঠীকে দিয়েছিল পৃথিবীর সব থেকে সস্তা গাড়ী ন্যানো-র কারখানা তৈরি করতে৻

জমি অধিগ্রহণের বিরুদ্ধে ব্যাপক আন্দোলন শুরু হয় তৃণমূল কংগ্রেসের নেতৃত্বে৻

শেষ পর্যন্ত ২০০৮ সালে টাটা গোষ্ঠী কারখানাটি গুজরাতে সরিয়ে নিয়ে যান৻ কিন্তু কারখানার জন্য নেওয়া জমির স্বত্ত্ব তাঁরা ছাড়েন নি৻

মমতা ব্যানার্জীর দাবি ছিল যেসব কৃষকের জমি তাঁদের ইচ্ছার বিরুদ্ধে অধিগ্রহণ করা হয়েছে, তাঁদের ৪০০ একর জমি ফিরিয়ে দিতে হবে৻

গতবছর ক্ষমতায় আসার পরেই তৃণমূল কংগ্রেসের সরকার আইন করে ওই জমিটি টাটাদের কাছ থেকে নিয়ে নেয়৻

টাটা গোষ্ঠী ওই আইনের বৈধতাকে চ্যালেঞ্জ করে হাইকোর্টে মামলা করেছিল৻ আজ সেই মামলারই রায় ঘোষিত হল৻

রাজনৈতিক বিশ্লেষকরা বলছেন সিঙ্গুর জমি অধিগ্রহণ আইনটি অবৈধ ও অসাংবিধানিক বলে ঘোষিত হওয়ায় মমতা ব্যানার্জী এবং তাঁর সরকার এক বড়সড় ধাক্কা খেল কারণ গত কয়েক বছর ধরে তাঁর আন্দোলনগুলির কেন্দ্রবিন্দুতে থেকেছে সিঙ্গুরের অনিচ্ছুক কৃষকদের জমি ফিরিয়ে দেওয়ার দাবিতে আন্দোলনের বিষয়টি ৻

http://www.bbc.co.uk/bengali/news/2012/06/120622_mb_singur_tmc.shtml

সিঙ্গুরে এখনও প্রকল্প গড়ার আগ্রহ আছে, সুপ্রিম কোর্টে জানাল টাটা কর্তৃপক্ষসিঙ্গুরে জমি ছাড়তে নারাজ টাটারা। সিঙ্গুরে এখনও কারখানা গড়তে আগ্রহী টাটা গোষ্ঠী৷ আজ সুপ্রিম কোর্টে এমন কথাই জানালেন টাটার আইনজীবী হরিশ সালভে৷ ওই জমিতে প্রকল্প গড়ার পরিকল্পনা রয়েছে টাটাদের। শীর্ষ আদালতে জানানো হয়েছে, ন্যানো কারখানার প্রথম পর্বের কাজ হয়েছে গুজরাটে। পরের পর্যায়ে আরও পরিকল্পনা রয়েছে। সিঙ্গুরকে ঘিরে আরও পরিকল্পনা আছে বলে জানিয়েছে টাটারা। সিঙ্গুর মামলার পরবর্তী শুনানির দিন ধার্য হয়েছে ২০১৪ সালের এপ্রিলে।


এদিন সুপ্রিম কোর্টের বিচারপতি টাটার আইনজীবীর কাছে জানতে চান, তিনি কি সংস্থার আধিকারিকদের সঙ্গে ভবিষ্যতে সিঙ্গুরেও প্রকল্প গড়ার বিষয়ে কথা বলেছেন? হরিশ সালভে তখন জানান, টাটার শীর্ষ আধিকারিকদের সঙ্গে কথা বলেই, তিনি এই মতামত জানিয়েছেন৷

Singur Tata Nano controversy

From Wikipedia, the free encyclopedia

Tata Nano Singur Controversy refers to the controversy generated by land acquisition of the proposed Nano factory of Tata Motors atSingur in Hooghly district, West Bengal, India.

Singur gained international media attention since Tata Motors started constructing a factory to manufacture their $2,500 car, the Tata Nano at Singur. The small car was scheduled to roll out of the factory by 2008.[1]

The state government of West Bengal facilitated the controversy by using 1894 land acquisition act rule to conduct an eminent domaintakeover of 997 acres (4.03 km2) of farmland to have Tata build its factory.[2] The rule is meant for public improvement projects, and the West Bengal government wanted Tata to build in its state. The project was opposed by activists and opposition parties in Bengal.

Contents

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Small car manufacturing facility[edit]

The choice of Singur was made by the company among six sites offered by the state government. The project faced massive opposition from displaced farmers. The unwilling farmers were given political support by West Bengal's opposition leader Mamata Banerjee. Banerjee's "Save Farmland" movement was supported by environmental activists like Medha Patkar, Anuradha Talwar and Arundhati Roy. Banerjee's movement against displacement of farmers was also supported by several Kolkata based intellectuals like Aparna Sen, Kaushik Sen, Shaonli Mitra and Suvaprasanna. Leftist activists also shared the platform with Banerjee's Trinamool Party. The Tatas finally decided to move out of Singur on 3 October 2008. Ratan Tata blamed agitation by Banerjee and her supporters for the pullout decision. On 7 October 2008, the Tatas announced that they would be setting up the Tata Nano plant in Sanand, Gujarat.

Background[edit]

The rapid rise in the population of West Bengal has not been accompanied by significant economic growth. Key indicators such asunemployment rates, poverty rates, infant mortality rates, job growth rates, per capita income, mobile phone penetration rates lag the more industrialized states of India. Local politicians gained power by promising agricultural land to landless farmers, but given West Bengal's population density, the land-holdings are small and the yields are insufficient to sustain poor families. While the shift from agriculture to industrial jobs requires re-training, given India's economic growth, it provides an opportunity for earning higher income.

Several other states had offered land to Tata Motors for the project.

The people staying in the proposed land were forced to evacuate by the government. The compensation given was considered inadequate and the new housing facilities offered were delayed. This led to the protest of the peasants backed by opposition political parties.

The company had made substantial promises. According to their claims, Singur would become a mini-auto city and approximately 70 vendors would set up shop along with the factory. The total investment planned is to the tune of Rs 1,000 crore.[3] The project had, however, generated controversy right from the start, particularly on the question of state acquisition of fertile agricultural land for private enterprise.

The land acquisition controversy[edit]

On 23 September 2008, Tatas decided to leave Singur in West Bengal, the decision is reported to have been made by the Tata management and the Bengal government had been informed. On 3 October it became official that TATA will leave Singur (WB) when Ratan Tata announced it in a press conference in Kolkata.

While the ruling party has gone all out[4] for acquisition of 997 acres (4.03 km2) [2] of multi-crop land required for the car factory, questions have been raised about the party forcible acquisition which was made under the colonial Land Acquisition Act of 1894.[2]Others say the provisions of this act were allegedly not been met.[5]

The law has provisions for state taking over privately held land for public purposes but not for developing private businesses. The illegality of the acquisition has been substantially conceded by the Kolkata High Court.

The Tata Motors site is the most fertile one in the whole of the Singur, and the Singur block, in turn, is among the most highly fertile in West Bengal. Consequently, almost the entire local population depends on agriculture with approximately 15000 making their livelihood directly from it.[6] With the number of direct jobs to be created no more than about 1,000, many of which are expected to go to outsiders, the local populace felt threatened for their livelihood.[7] Environmental degradation is also feared.

Chief protesters include the opposition parties spearheaded by the Trinamool Congress under Mamata Banerjee and Socialist Unity Centre of India. The movement has received widespread support from civil rights and human rights groups, legal bodies, social activists like Medha Patkar and Anuradha Talwar, Booker prize-winning author Arundhati Roy and Magsaysay and Jnanpith Award-winning author Mahasweta Devi.[8] Other intellectuals, writers like the poet Ruchit Shah, artists like Suvaprasanna, theatre and film personalities like Saonli Mitra, Aparna Sen etc. have pitched in. The state police force has been used to restrict their access to the area.[9] TheNobel Laureate Amartya Sen supported the idea of factory but he however opposed forcible acquisition of land.[10]

The protesters have been attacked, verbally by the Communist Party of India (Marxist) (CPI(M)) leaders and physically by the party's supporters. Benoy Konar, member of the party's state committee, famously declared that protesting intellectuals would be greeted by women supporters of the party by showing their behinds [3].

Preliminary surveys by officials of the state and Tata Motors faced protests, and manhandling on one occasion, from the villagers organized under the Save Singur Farmland Committee with Trinamool Congress forming its chief component.[11] It is reported that Naxalite elements hold sway over the direction the agitation takes and the Trinamool Congress chief Mamata Banerjee takes no decisions without consulting them.[12]

The state government imposed the prohibitory Section 144 of the Indian Penal Code for initially a month and then extended it indefinitely. The imposition has been declared illegal by the Kolkata High Court [13]

While landless peasants and share-croppers fear losing out entirely, sections of the locals, particularly those owing allegiance to the CPI(M) have welcomed the factory. These count chiefly among the owners of bigger portions of the land even as discrimination in the compensation has been alleged.[14]

A section of those promised jobs at the factory have boycotted classes while training in protest against the alleged going back on the promise.[15]

In the 2011 state assembly elections, while the sitting Trinamool Congress MLA, Rabindranath Bhattacharya retained the Singur seat,Becharam Manna, the convener of Krishi Jami Raksha Samiti, won the adjoining Haripal seat [16][17]

Fencing off the land[edit]

The land earmarked for the project was taken control of by the state administration amidst protests and fencing off commenced on December 1, 2006. Mamata Banerjee, who was prevented from entering Singur by the state police, called a statewide bandh in protest while legislators belonging to her party turned violent in the legislative assembly causing damage to furniture. [4] Later, she went on a 25-day hunger strike [5].During this period she presented affidavits of farmers apparently unwilling to part with their land.[18]

The fenced off area has been regularly guarded, besides large contingents of policemen, by cadres of the CPI(M) party. They were accused of the multiple rape followed by burning to death of teenage villager Tapasi Malik who was active in the protests, on December 18, 2006.[19] Negligence and political interference in the probe into her death have been alleged.[20] Later, CPI(M) activist Debu Malikand based on his statement, CPI(M) zonal committee secretary Suhrid Dutta were arrested by the Central Bureau of Investigation in connection with the crime.[21]

Intermittent attacks by villagers have since continued on the fence. However, continuing agitations against the project appeared to have proved ineffective and a farmer who lost land committed suicide[22]

On the other hand the pro-factory villagers siding with the CPI(M) have made accusations against the Naxalite faction of the 'Save Singur Farmland Committee' of threats and violence against them.[23]

Construction of plant[edit]

Tatas ceremonially initiated the construction of the plant on 21 January 2007.[24] The Tata Group announced on October 3, 2008 that they are pulling out of Singur due to the political unrest and agitation.

Procedural lacunae[edit]

Other aspects of the process of setting up the factory that have come under severe criticism are the government's secrecy on the details of the deal and the chief minister's furnishing of false information, including in the legislative assembly Vidhan Sabha. In particular, the concessions being given to Tata Motors have not been publicly revealed. The falsehoods of the chief minister chiefly pertain to claims made by him of having acquired 912 acres (3.69 km2) [25] through voluntary consent of the owners without the use of force.

The Kolkata High Court declared the acquisition prima facie legal.[26] The air seemed to have cleared somewhat when the High Court ordered the state government to submit correct figures following which an affidavit but was not satisfied with the result [6]. In a fresh affidavit filed later in June 2007, the government admitted to 30 per cent of the land was acquired from farmers without consent.[27] The affidavit remains unclear on whether the lack of consent is based on insufficiency of the compensation or refusal to sell altogether.[28]

Business houses' role[edit]

The critics of the government's industrialization policy have argued on the other hand that while India is moving towards a "free market" economy, government has been acting as a broker for the private sector by forcing private citizens to give up their property at throw away prices.[who?]

Tata pulls out[edit]

On October 3, 2008, after a brief meeting with the Chief Minister, Ratan Tata declared his decision to move the Nano Project out of West Bengal. Tata mentioned his frustration with the opposition movement at Singur Project led by Trinamool Congress chief Ms. Mamata Banerjee. Ms Banerjee responded by referring to actions by Tatas and the state government.[29][30]

The CM of Gujarat, Narendra Modi then sent an SMS to Mr. Ratan Tata, which simply said "Suswagatham", to persuade him to relocate the Nano factory to Gujarat.[31]

It took 14 months to build a new factory in Sanand, Gujarat compared with 28 months for the Singur factory.[31]

References[edit]


सिंगूर में किसी के हित के खिलाफ काम नहीं करेंगे: टाटा

भाषा | Aug 11, 2012, 05.02AM IST

मुम्बई।। सिंगूर मुद्दे पर पश्चिम बंगाल सरकार के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के दो दिन बाद आज टाटा ग्रूप के अध्यक्ष रतन टाटा ने कहा कि जबतक किसी का हित कानून के दायरे में है, उनकी कंपनी उसके खिलाफ कोई कार्य नहीं करेगी।


पश्चिम बंगाल सरकार सात अगस्त को कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय चली गई जिसमें सिंगूर जमीन अधिनियम को खारिज कर दिया गया था। इस अधिनियम में राज्य सरकार को टाटा मोटर्स को दी गयी 400 एकड़ जमीन पर फिर से दावा करने की अनुमति दी गयी थी। टाटा ने कहा, 'हम हम किसी के हित के खिलाफ तबतक कार्य नहीं करते जबतक वह हमारे कानूनों के खिलाफ नहीं होता।'


टाटा ग्रुप के अध्यक्ष रतन टाटा ने कहा कि महिंद्रा के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है लेकिन बाजार की घुड़दौड़ में एम ऐंड एम टाटा मोटर्स से आगे निकल गया है उससे उन्हें उदासी और शर्म महसूस हो रहा है। उन्होंने कहा, ''महिंद्रा ऐंड महिंद्रा जो कर पाया है, उसे लेकर मेरे मन में गहरा सम्मान है। लेकिन मेरे मन में कुछ हद तक उदासी और शर्म है कि हमने ऐसा होने दिया।'


सिंगूर के किसानों की जमीन टाटा को वापस कर देनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

टाटा मोटर्स को सिंगूर के किसानों की जमीन वापस करने के निर्देश।


भाषा | Jul 10, 2013, 01.58PM IST

नई दिल्ली।। सुप्रीम कोर्ट ने बदले हुए हालात में सिंगूर में भूमि के पट्टे पर अधिकार के बारे में टाटा मोटर्स को अपनी स्थिति साफ करने का निर्देश दिया है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में भारी राजनीतिक विवाद और हिंसा के बीच इस ऑटोमोबाइल कंपनी को लखटकिया कार प्लांट नैनो गुजरात में ले जाने का फैसला करना पड़ा था।


जस्टिस एच. एल. दत्तू और जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, 'सिंगूर में कार निर्माण प्लांट लगाने के लिए यह जमीन अधिग्रहीत की गई थी। अब यह मकसद तो रहा नहीं क्योंकि आप पहले ही यहां से चले गए हैं। आप अब यह नहीं कह सकते कि इस जमीन में आपकी अभी भी दिलचस्पी है।'


जजों ने कहा, 'यह जमीन अब किसानों को वापस दी जानी चाहिए और हम पश्चिम बंगाल सरकार से भूमि अधिग्रहण के समय आपके द्वारा किए गए भुगतान की रकम लौटाने के लिए इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के लिए कह सकते हैं। न्याय के हित में हम समझते हैं कि यह ठीक रहेगा।'

जजों ने कहा कि वैसे भी कोर्ट को यह कहने का हक है कि पट्टे का उद्देश्य निरर्थक हो चुका है। कोर्ट ने इसके साथ ही टाटा मोटर्स को बदली हुई परिस्थितियों में इस जमीन पर अधिकार के बारे में स्थिति साफ करते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।


सुप्रीम कोर्ट सिंगूर भूमि अधिग्रहण कानून रद्द करने के कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की अपील पर सुनवाई कर रहा है। हाई कोर्ट ने पिछले साल 22 जून को सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास कानून, 2011 रद्द करते हुए टाटा मोटर्स को 400 एकड़ भूमि पर दावा करने की अनुमति दे दी थी। हाई कोर्ट ने टाटा मोटर्स की याचिका पर अपने फैसले में कहा था कि नैनो कार परियोजना के लिए टाटा मोटर्स को सिंगूर में पट्टे पर दी गई भूमि वापस लेने संबंधी कानून अवैध हैं क्योंकि इस पर राष्ट्रपति की संस्तुति नहीं दी गई थी।


टाटा से बोला कोर्ट, अब क्या करोगे जमीन का

भाषा | Jul 10, 2013, 09.21PM IST

नई दिल्ली।। उच्चतम न्यायालय ने बदले हुए हालात में सिंगूर में भूमि के पट्टे पर अधिकार के बारे में टाटा मोटर्स को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है क्योंकि यह ऑटोमोबाइल कंपनी पहले ही अपना प्लांट दूसरी जगह ले जा चुकी है।


जस्टिस एच. एल. दत्तू और जस्टिस दीपक मिश्रा की डिविजन बेंच ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि सिंगूर में कार बनाने का प्लांट लगाने के लिए यह जमीन अधिग्रहीत की गई थी। अब यह मकसद तो रहा नहीं क्योंकि आप पहले ही यहां से चले गए हैं। आप अब यह नहीं कह सकते कि इस जमीन में आपकी अभी भी दिलचस्पी है। यह जमीन अब किसानों को वापस दी जानी चाहिए और हम पश्चिम बंगाल सरकार से भूमि अधिग्रहण के समय आपकी ओर से दी गई रकम लौटाने के लिए इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के लिए कह सकते हैं। न्याय के हित में हम समझते हैं कि यह ठीक रहेगा।


जजों ने कहा कि वैसे भी कोर्ट को यह कहने का अधिकार है कि पट्टे का मकसद बेकार हो चुका है। कोर्ट ने इसके साथ ही टाटा मोटर्स को बदली हुई परिस्थितियों में इस जमीन पर अधिकार के बारे में स्थिति स्पष्ट करते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट सिंगूर भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त करने के कोलकाता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की अपील पर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने पिछले साल 22 जून को सिंगूर भूमि पुनर्वास एवं विकास कानून, 2011 निरस्त करते हुए टाटा मोटर्स को 400 एकड़ भूमि पर दावा करने की अनुमति दे दी थी।


हाई कोर्ट ने टाटा मोटर्स की याचिका पर अपने फैसले में कहा था कि नैनो कार परियोजना के लिए टाटा मोटर्स को सिंगूर में पट्टे पर दी गई भूमि वापस लेने संबंधी कानून अवैध है क्योंकि इस पर राष्ट्रपति की संस्तुति नहीं दी गई थी।


बंगाल से कभी नहीं जाएगा टाटा ग्रुप: मिस्त्री

इकनॉमिक टाइम्स | Jul 16, 2013, 12.05PM IST


ईटी ब्यूरो

कोलकाता।। टाटा ग्रुप को पश्चिम बंगाल के सिंगूर में लीज पर दी गई 997 एकड़ जमीन को अक्वायर करने की राज्य सरकार की कोशिशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला चलने के बावजूद टाटा संस के नए चेयरमैन सायरस मिस्त्री ने राज्य को लेकर अपने पक्के इरादे दोहराए हैं। उन्होंने सोमवार को टाटा ग्लोबल बेवरेजेज की 50वीं एजीएम में कहा, 'हमने बंगाल को कभी नहीं छोड़ा और हम बंगाल से कभी नहीं जाएंगे।'


सोमवार को ही सिंगूर में पंचायत चुनाव के लिए भी वोट डाले गए। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने 2011 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सिंगूर की जमीन वापसी के मुद्दे का इस्तेमाल किया था।


बनर्जी की अगुवाई में हुए भारी विरोध की वजह से टाटा मोटर्स को अपना नैनो प्लांट 3 अक्टूबर 2008 को बंगाल से शिफ्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। बनर्जी ने डिमांड की थी कि तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार को वह 400 एकड़ जमीन लौटानी चाहिए जो उसने कथित तौर पर बल का इस्तेमाल कर किसानों की मर्जी के बगैर ली है। मई 2011 में राज्य की कमान संभालने के बाद बनर्जी ने सिंगूर लैंड रीहैबिलिटेशन ऐंड डिवेलपमेंट बिल 2011 पास कर सिंगूर में 997 एकड़ जमीन अक्वायर कर ली थी। इसके बाद टाटा ग्रुप ने राज्य सरकार के इस कदम को कोर्ट में चुनौती दी थी। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और इसकी अगली सुनवाई 6 अगस्त को होने की उम्मीद है।


पिछले सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट से टाटा ग्रुप से पूछा था कि क्या वह जमीन वापस करने पर विचार करेगा। मिस्त्री ने इन प्रश्नों का सीधा जवाब नहीं दिया कि क्या टाटा ग्रुप सिंगूर में बना रहेगा या पश्चिम बंगाल सरकार से मुआवजे के लिए कहेगा। उनका कहना था, 'मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता। मामला अदालत में है।' उन्होंने इस बारे में भी नहीं बताया कि राज्य में इन्वेस्टमेंट लाने के लिए 1 अगस्त को मुंबई में होने जा रही बिजनस मीट में हिस्सा लेने का उन्हें निमंत्रण मिला है या नहीं।

Singur – A Case Study

By Saibal Bishnu

19 September, 2008

Countercurrents.org

The Singur issue refuses to die down. The issue has become like a fresh air to the ones who are against the ruling communists in Bengal, and a pain in the neck for the ones who prefers to call themselves pro progress, both in the left and the right sides of the fence. Whatever be the outcome of the Tata Small Car Factory at Singur, this issue would remain a major case study for the left in India.

The so called grand alliance against the Singur plant does not have a homogeneous nature, which itself is the biggest success of the opposition. The opposition to this Singur plant is so broad-based that it could accommodate a large variety of stains of politics, opinions, beliefs, and ideas under it. The opposition could successfully accumulate the support of large mass of people from different walks of life, as the opposition itself was multi dimensional. Let us try to examine the major strains of the opposition.

Trinamool Congress led by Mamata Banerjee has no doubt played the leaders role. Trinamool all these years have been the strongest voice in Bengal against the so called de-industrialization process here. One of their MPs once opined they are ready to admit that the West Bengal government is serious about industrialization only if the Tatas build a factory here. Their opposition does not stem from any ideological moorings; they would like to carry out exactly the same process of industrialization if in governance. But they do not want to be left in the lurch, and let the CPI(M) led Left Front government take all the credits of industrialization of the state. One of the views hints the Trinamool's opposition to Singur project is at the behest of the corporate interest of the rivals of Tata Nano, it gained grounds specially since no one challenged the accusation once Ratan Tata made, "Let me just say it is not just political, because I happen to know that some of our competitors are also fuelling some of this fire… they would be very happy if the project got delayed," in an interview to the NDTV.

The traditional support base of Trinamool, a break-away fraction of the Congress, has been the erstwhile zamindars, jotedars and other parasite classes in the rural Bengal, traders and urban middle class in the cities and towns. They reinvented their whole strategy after a defeat in the 2006 assembly elections. The new strategy can be best symbolized by their new found catch phrase, ma-mati-manush (mother-earth-human), vowing to protect the lives and livelihoods of the rural peasants, which instantly caught the imagination of many. In the urban areas, the campaigns took a bit different route. To give an example, the Trinamool has been organizing squads, street corners, posters, and wall graffiti protesting against the policy of providing licenses to set up foreign liquor shops in the localities. The middle class Bengal also started identifying with the cause instantly. The campaign was cleverly manufactured against the backdrop of the same ma-mati-manush by playing on the sentiments, that the Left Front government is providing a lot of sops to the already rich Tatas to setup their factory at Singur, and to balance the budget the government is providing few thousands of licenses and plans to earn revenues, thus endangering the future of generation next.

Interestingly the symbolisms they have started using of late are reminiscent of the erstwhile communist movements in Bengal, which people can easily relate to. Starting with Tebhaga to Operation Barga the right to land to the tillers has been the crux, which was immaculately re-invented by the Trinamool by organizing peasants unwilling to part with their lands for industrialization. The campaign strategists have been using the slogans, revolutionary poems by Sukanta Bhattacharya and other poets, revolutionary songs of Salil Chowdhury which were once used during the Tebhaga movement, the symbols which the people can easily identify as the symbol of protest. Some of the speakers even address the gathering in front as 'comrades' and the whole campaign is aimed at putting across the point that the Communist Party of India (Marxist) has changed after enjoying 'power' for 30 years, have become anti-farmer, and the leaders of the party now symbolize state authority whereas it is Mamata Banerjee who is the real messiah of the rural poor and the middle class Bengal. This emotional play is bearing some fruits no doubt, which is evident by the fact that many prominent cult personalities in Bengal from music, literature, theatre and cinema have been moved, and openly voiced dissent against the course of industrialization by the Left Front government. This whole movement of Trinamool gained a lot of credence and popularity because of the open dissent by the cult personalities. But most importantly, it is the ultra lefts and their participation in the movement with Trinamool which changed the face of the movements. The 26-day hunger strike by Mamata Banerjee in 2006 to occupation movement in Nandigram in 2007 to the blockade in Singur in 2008, the face of the movements have turned from a Gandhian one to a pure agitation movement which the communists can easily identify with. There is a distinct possibility of agitations of more anarchic nature in future.

The ultra lefts have their own ideology to align with Trinamool. According to the Maoists, SUCI, and some other strains of the ultra lefts, Trinamool represents the national bourgeoisie and urban petty bourgeois, who are vacillating ally during revolution; whereas the Tatas are comprador bourgeoisie and the CPI(M) is playing as an agent of the comprador bourgeoisie. So, according to their analysis of the Indian capitalism and stage of revolution, allying with the Trinamool Congress against the CPI(M) is their organizational task, by following a policy of unity-struggle-unity. It is very interesting to note here that, all these strains of ultra lefts are compelled to organize movements with the help of some bourgeois political party and play a second fiddle to Trinamool, as they do not have mass support of their own, but they still continue to ignore participation in the democratic setup of India. Probably they have lessons to learn from the Maoists of Nepal, but that is entirely a different story beyond the scope of this case study. Some strains of the ultra lefts found a common cause with Trinamool as they feel it is the CPI(M) which is implementing neo-liberal agenda in the state, and it is important to ally with Trinamool to fight against this process. In addition to the ultra lefts of different strains and colors, the environmentalists found in the small car Nano a major violation to environment on two counts. Nano being a low cost car can sell in huge number clogging the roads and polluting the environment, and moreover acres of land are getting transformed from agricultural to industrial land. Neo-Luddites like Medha Patkar finds industries themselves to be against progress, but didn't find it difficult to ally with Mamata, who still calls herself a champion of industry in public, and probably mutters in her mind, if only the industry is built on thin air! Lastly after the sudden volte face on N-Deal Amar Singh found in Mamata Banerjee an ally and an 'ex-classmate,' to pin down the Left Front government and thus the CPI(M). Though it is public domain news that this same Amar Singh extended a red carpet to the Tatas to build the Nano factory in Uttar Pradesh in 2006, while he was heading the Uttar Pradesh state's Industrial Development Council. Strange are the bed fellows, but more striking is the way the broadest possible coalition could be stitched together against a common enemy, the cleverly crafted imagery of an authoritarian CPI(M) rule.

Some Congress leaders also jumped on this bandwagon, finding it an opportune moment to remain relevant and gain some television coverage. Seven-time Congress MLA from Sealdah, Somen Mitra found his political career in jeopardy when he realized that his safe seat will cease to exist and would merge with Manicktala constituency. For him the next best opportunity is to contest from the North Kolkata Loksabha seat as the Trinamool candidate and former MP Ajit Panja is ailing and away to USA for treatment. Interestingly this same Somen Mitra has been found to have bought agricultural land in Singur itself to build a resort, which was under construction while he was sitting at the Dharna to protect agricultural land. The ex Trinamool Mayor of Calcutta Corporation and INTUC leader Subrata Mukherjee in a desperate attempt to find relevance in Bengal politics, after the drubbing he received in the last election, has joined this protest. Although he is a labor union leader by profession and his political career ceases to have any significance without industry and labor.

This movement would not have gained a critical mass, unless the fundamentalists played a crucial role in it. Jamait-e-Ulema-I-Hind leader Siddikulla Chowdhury, once a Congressman, campaigned among the Muslims in the rural Bengal, especially in the areas where some development projects were planned and land acquisition was imminent. The campaign gained huge momentum when it fueled a primal fear among the Muslim community that the minority population is the target of the CPI(M) led Left Front government, and the land acquisition means giving up on whatever they held dearest, the small tract of land they cultivate, the small cottages they call home, the village mosques they pray in, and the nearby cemetery they bury their near and dear ones. The propaganda was orchestrated underground with video CDs distributed throughout the rural Bengal. Clerics from foreign countries started visiting the village mosques just before the recent Panchayat polls. The target was again the common enemy, the cleverly crafted image of an authoritarian CPI(M) rule.

This political strategy was a success story, as equating the CPI(M) with the state government, and thus with state power and authority was easy and Singur provided a golden opportunity. The West Bengal state government was desperate to attract investments to setup manufacturing industries. The victory with a huge margin in terms of number of seats in the 2006 assembly polls was taken by CPI(M) as a landslide mandate to industrialize the state at a very fast pace. At this time the Tatas were planning to setup their Nano factory at Pantnagar, as they were getting 100% outright excise duty exemption for a period of 10 years, with 100% income tax exemption for the first 5 years and then 30% for the next five. This kind of incentives possibly help to bring down the real cost of the small car by a few thousands rupees. This also helps the investors to recover the investment much faster. In order to attract the Tata Nano Factory the Left Front government tried to match these incentives and signed an agreement with them. Other than the financial incentives, the Tatas were given a choice to choose the site for their project. They chose Singur, which has been a fertile land, but at the same time probably the best location logistically to setup this project of small car. Also the low operating cost in Bengal was a major factor for the Tatas to decide in favor of Singur as this is a very cost sensitive project. The expectation of the government was again two fold, generating employment and earning tax revenues after few years to the tune of estimated 500 crores per year, which can then be spent on the social sector facing crunch in budgetary allocation. This project was also seen as a harbinger for fast industrialization and building up investor confidence. The resistance movement at Singur germinated almost from the very beginning of the land acquisition notification, and this became a melting pot for all those strains of political colors. The government offered a good price for the land acquired and the compensation for the first time in India included Bargadars, but the resistance movement could organize a good number of people who did not collect the compensation money, and thus can be termed 'unwilling.' More transparency from the government could have avoided this situation too some extent but there were several confusions and questions in the air on the fertility of the land acquired, the cost benefit analysis of the project, question of rehabilitation etc. The use of police force during the land acquisition added fire to the fuel and strengthened this protest movement, the broad-based coalition was achieved and led to the incidents in Nandigram. The success of the movement at Nandigram were two folds, the government had to roll back its plans for the chemical hub and the defeats of CPI(M) candidates in the Panchayat polls there. This success story further encouraged the movement to go in for a stronger agitation which led to the siege at the Singur project site. The government recently declared an unprecedented rehabilitation package (http://www.wbidc.com/images/pdf/ad1.pdf) which can be attributed to this movement to a great extent.

The state government was in a peculiar situation, with the fiscal crunch it is facing under neo-liberal agenda of our country, it was very difficult for the government to protect the gains it has achieved through land reforms and Panchayat decentralization. The social sectors like health and education were getting neglected as avenues to raise resources were becoming increasingly limited. According to a document of CPI(M), rapid industrialization was the only way forward, it stated, "there is constant fragmentation and division of land holdings and a high proportion of rural population dependent on agriculture along with a high proportion of landlessness, it is essential that this population dependent on agriculture finds avenues for employment which will be mainly provided by industrial development." Accordingly, the idea of industrialization was to generate alternate employment opportunities to the surplus labor in agriculture so that dependency on land decreases, considering the crisis agriculture is facing because of economic liberalization. The idea was also to earn tax revenues so that priority social sector spending can be achieved.

The CPI(M) and its mass organizations were supposed to play a very important role here. The government and its agenda of industrialization had the potential to displace farmers from land and destroy livelihoods for many, especially at the Singur project site. They were caught in the middle of the contradiction between the aspirations of the middle class to gain employment through industrialization and the farmers who were getting dispossessed from their land precisely because of this. The educated middle class is more enthusiastic about the industrialization since the modern industry provides good scope of employment for them, whereas the poor peasants being dispossessed are not that excited, as there is not a direct relation between their own employment and this kind of industrialization. It was absolutely necessary that the Left take up the issues of the peasants, understand their sentiments, and organize movements on behalf of the land losers. It was thought impossible for the ruling party to organize movements against its own government. As a result the peasants found in Mamata Banerjee their leader to protest against the acquisition.

Here the distinction and a dialectical relation between the party and its government was ignored and in reality the party with its mass organizations was used to drive down the administrative agenda of land acquisition in the drive for industrialization. This alienated a large mass of people, including a part of the intelligentsia. The support base of the party eroded even among its long time ally, the peasantry. The combination of the two features, withdrawal of the CPI(M) from the forefront of struggle on behalf of the peasants, and well timed propaganda by this broad based alliance created a huge turmoil in the political scene in Bengal, not seen in the last few decades. The situation has led to such a paranoia that the infrastructural projects like building a thermal power station at Katwa is facing protests. People are protesting against any kind of land issues and even erecting high tension electric posts in the rural Bengal has almost stopped, and progress of rural electrification has become a question. An anarchic Bengal is not impossibility in future if this continues and the trouble with Gorkhaland increases.

There are both ideological and social reasons for the CPI(M) not to play the desired role as expected by the people. Ideologically for them the accent is on delivering an alternate policy and governance with relief to people of Bengal, which includes employment generation, and thus industrialization. At the same time fiscal squeeze through neo-liberalism has restricted the scope for state governments, where delivering alternate policies has become increasingly difficult. The only possible way out is inviting private and even foreign capital with huge sops, a case study being Singur, and then earn from the tax revenues to spend on social sector. They didn't try to go back to people educating them on the limitations, the difficulties, costs and pains of industrialization. Even after the government Tata agreement, the peasant front organization didn't take up the issues of the peasants to the government. The long-time allies were left in the lurch and the grand alliance happily grabbed the opportunity.

Thus Singur will remain a case study for the left in India, on how to go about deciding and implementing policies under a restricted condition, also the dialectical relation between the party and its government would have to be sorted out in cases of these contradictions. As long as the CPI(M) continues to promote the political line of providing relief by participating in state governments as a tactics to build the left democratic front towards revolution, continuation of the government will remain a primary aim, and with the constraints increasing, implementing alternate policies will be an increasing challenge. The idea of using the Left Front government as an icon of the left's politics and policies of alternative to attract masses to build the proposed left democratic front is still not being questioned even under increasing fiscal squeeze under neo-liberalism, so situations like these might happen again. For the opposition of the left this was a case study on how to stitch a grand alliance and wean away a part of the core support base of the left. Both have learned, next time these lessons will again be implemented with much more finesse here or elsewhere, possibly there will be more situations like this as the contradictions are indeed sharpening.

Saibal Bishnu is Working in the IT industry, Kolkata, India and keen observer of left politics.



सिंगुर में सुनाई दे रही हैं सिसकियाँ

पीएम तिवारी

सिंगुर से बीबीसी हिंदी के लिए

रविवार, 24 जून, 2012 को 04:51 IST तक के समाचार


जिस कानून के सहारे वे अपनी 12 कट्ठा जमीन वापस पाने के सपने देख रहे थे, कलकत्ता हाईकोर्ट ने उसे असंवैधानिक करार दे दिया है.

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हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद से ही सिंगुर और उसके आसपास के गांवों में नाउम्मीदी और हताशा पसरी है.

"हम तो गंदी राजनीति का शिकार हो गए. जमीन तो हाथ से गई ही, मेरे इकलौते बेटे का भविष्य भी अंधेरे में डूब गया"

रेखा दास, सिंगुर निवासी

टाटा के संयंत्र की चारदीवारी से सटे दोबंदी गांव की लीना दास कहती है,"अब तो सिंगुर में हमारे टूटे सपनों की मौन सिसकियों की आवाजें ही गूंज रही है. अदालत के फैसले ने एक बार फिर हमारे सपनों को तोड़ दिया है."

देबू और लीना की कहानी से मलती-जुलती हजारों कहानियों टाटा के इस संयंत्र के चारों और फिजाँ में तैर रही हैं जिस संयंत्र के सहारे स्थानीय लोगों की आंखों ने कभी सतरंगी सपने देखे थे.

लेकिन यह सपना इतनी बार टूट चुका है कि अब लोगों में सपने देखने की भी हिम्मत नहीं बची.

राजनीति के शिकार

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, कोई 2400 ऐसे किसान हैं जिनसे उस परियोजना के लिए जबरन जमीन ली गई थी.

इन अनिच्छुक किसानों की जमीन लौटाने के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था कि टाटा को कारोबार समेट कर गुजरात जाना पड़ा.

हमें हर महीने एक हजार रुपए की आर्थिक सहायता मिल रही है लेकिन मेरे पति की दवाओं पर ही पांच सौ खर्च हो जाते हैं. बाकी पांच सौ में जीवन कैसे चलेगा - श्यामली देवी

अब रेखा दास कहती है,"हम तो गंदी राजनीति का शिकार हो गए. जमीन तो हाथ से गई ही, मेरे इकलौते बेटे का भविष्य भी अंधेरे में डूब गया."

उज्जवल पाखिरा ने कोई बड़ा सपना नहीं देखा था.

वर्ष 2004 में जब उसे टाटा की परियोजना की जानकारी मिली तो भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसने संयंत्र के पास नेशनल हाइवे पर खाने-पीने की चीजों की एक दुकान खोल ली थी.

उसने सोचा था कि चार-पांच साल में फैक्टरी खुल जाने पर दुकान को पक्का बनवा लेगा.

लेकिन न तो फैक्टरी खुली और न ही दुकान चली. उस बियाबान में भला उसकी दुकान पर खाने के लिए कौन आता? अब वह पड़ोसी हावड़ा जिले में निमार्णाधीन एक बहुमंजिली इमारत में मजदूरी कर परिवार का खर्च चलाता है.

सिंगुर के देवब्रत दास कहते हैं,"हमें ममता बनर्जी सरकार से काफी उम्मीदें थीं. सरकार तो प्रयास कर ही रही है. लेकिन हमारे पास न तो जमीन है और न ही उसके बदले कोई मुआवजा मिला. हम तो न घर के रहे न घाट के."

उनकी पत्नी श्यामली दास कहती हैं,"मुख्यमंत्री हमें हर महीने एक हजार रुपए की आर्थिक सहायता दे रही हैं और दो रुपए किलो की दर से चावल भी मिल रहा है. लेकिन मेरे पति की दवाओं पर ही पांच सौ रुपए खर्च हो जाते हैं. आखिर बाकी पांच सौ में जीवन कैसे चलेगा?"

सिंगुर में नैनो संयंत्र के आसपास खामोशी पसरी है. संयंत्र के मुख्यद्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मियों के अलावा वहां कोई नजर नहीं आता. गांव वाले दूर से ही इसकी चारदीवारी को देखते हुए आहें भरते नजर आते हैं.

लंबा इंतज़ार"किसानों की किस्मत का फैसला हो चुका है. उनका जीवन तो टाटा के नैनो संयंत्र की तरह धीरे-धीरे खंडहर में बदल रहा है"

शंकर मल्लिक, सिंगुर निवासी

सिंगुर में वे लोग भी निराश हैं जिन्होंने अपनी इच्छा से टाटा के संयंत्र के लिए जमीन दी थी. ऐसे ही एक युवक सुभाष पात्र को उम्मीद है कि टाटा अगर इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहा है तो देर-सबेर वह सिंगुर जरूर लौटेगा.

लेकिन आखिर कब ? उसके और उसके पड़ोसियों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है. वह कहता है कि अब सुप्रीम कोर्ट में पता नहीं कब तक मामला चलेगा?

सिंगुर में अधिग्रहण आंदोलन चलाने वाले तृणमूल कांग्रेस के नेता भी भारी दबाव में हैं.

स्थानीय तृणमूल नेता मानिक चंद्र दास कहते हैं,"यहां के लोगों को बेहद लुभावने सपने दिखाए गए थे. लेकिन अब उनके पैरों तले की जमीन भी खिसक रही है. अब हमारे पास खोने को कुछ नहीं है. अब हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना होगा."

सिंगुर टाउन में तो लोग इस मुद्दे से इतने आजिज आ चुके हैं कि वे इस पर ज्यादा बात तक नहीं करना चाहते.

चाय दुकान चलाने वाले शंकर मल्लिक कहते हैं,"अब यहाँ फैक्टरी के लिए जमीन देने वाले किसानों की किस्मत का फैसला हो चुका है. उनका जीवन तो टाटा के नैनो संयंत्र की तरह धीरे-धीरे खंडहर में बदल रहा है."

शायद आज की तारीख में सिंगुर का सच भी यही है.

सिंगूर की जमीन किसानों को वापस मिलेगी: ममता

शुक्रवार, 22 जून, 2012 को 17:36 IST तक के समाचार

पश्चिम बंगाल सरकार के सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास अधिनियम को कलकत्ता हाईकोर्ट की ओर से असंवैधानिक करार देने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दोहराया है कि सरकार किसानों की जमीनें उन्हें लौटाने को प्रतिबद्ध है.

ममता बनर्जी ने कोलकाता में पत्रकारों से कहा, "सिंगूर के जो किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते उन्हें उनकी जमीन वापस मिल जाएगी. सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है."

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ये जमीन टाटा कंपनी को नैनो कार बनाने के लिए तत्कालीन वामपंथी सरकार की ओर से ही लीज पर दी गई थी. लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में कुछ किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद टाटा ने नैनो कार के लिए संयंत्र को गुजरात ले जाने का फ़ैसला किया था.

इसके बाद सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार ने पिछले वर्ष जून में एक अधिनियम के जरिए सिंगूर में टाटा के साथ हुए समझौते को रद्द करते हुए ज़मीन किसानों को वापस देने का प्रावधान किया था.

लेकिन शुक्रवार को हाईकोर्ट ने इस अधिनियम को यह कहकर खारिज कर दिया कि इस अधिनियम के लिए राष्ट्रपति से अनुमति नहीं ली गई थी.

'किसानों के साथ हैं'

"हम कहते रहे हैं कि ये अधिनियम असंवैधानिक है और हमने सरकार को कई सुझाव भी दिए थे कि इस मामले से किस तरह से निपटा जाना चाहिए"

सूर्यकांत मिश्रा, नेता प्रतिपक्ष

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, "हम किसानों के साथ हैं और आगे भी उनके साथ रहेंगे. आखिर में उनकी जीत होगी."

ममता बनर्जी ने हालांकि हाईकोर्ट के फ़ैसले पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

टाटा ने इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के ही एक सदस्यीय बेंच के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने पिछले वर्ष इस अधिनियम को सही ठहराया था.

कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ममता सरकार दो महीने के अंदर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है.

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और सीपीएम के नेता सूर्याकांत मिश्रा ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे उनकी पार्टी की बात सही साबित हुई है.

उनका कहना था, "हम कहते रहे हैं कि ये अधिनियम असंवैधानिक है और हमने सरकार को कई सुझाव भी दिए थे कि इस मामले से किस तरह से निपटा जाना चाहिए."

फिलहाल सिंगूर की जमीन टाटा के पास ही है और कंपनी ने इसे वापस लौटाने से इनकार कर दिया है.

सिंगूर: मायूसी पर उम्मीद क़ायम

अमिताभ भट्टासाली

बीबीसी संवाददाता, सिंगुर

सिंगूर का विकास खंड कार्यालय, जहाँ पिछ्ले कई दिनों से ज़मीन वापस पाने की आस रखे किसान अपने ज़मीन के कागज़ जमा करा रहे थे वहाँ सर्वोच्च अदालत का स्थगन आदेश आते ही मायूसी छा गई.

कई किसान जो बरसते पानी और कीचड़ के बीच अपने ज़मीन के कागज़ों को प्लास्टिक के लिफाफों में संभाल कर लाए थे वो इस आदेश के बाद हतप्रभ खड़े हो गए.

यूँ तो कार्यालय में किसानों के कागज़ स्वीकार किया जाना बदस्तूर जारी है, लेकिन किसान परेशान हैं और वो ये जानना चाहते हैं कि अब इस आदेश के बाद उन्हें उनकी ज़मीन कब मिलेगी.

कई किसान अधिक जानकारी के लिए स्थानीय तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की तलाश कर रहे हैं.

'अदालत ने किसानों की अनदेखी की'

ये तय है कि ये आदेश किसानों के ख़िलाफ़ गया है. हमें लगा था कि सर्वोच्च अदालत किसानों की परेशानी ध्यान में रखेगी पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन ज़मीन हमारी है और हम उसे हर हाल में लेकर रहेगें

महादेव दास, तृणमूल कांग्रेस नेता

तृणमूल के नेता महादेव दास कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास कालीघाट पर फ़ोन लगा कर सारे मामले को समझना चाहते हैं. दास पार्टी की तरफ से किसानों को ज़मीन लौटाने के काम की देख रेख कर रहे हैं.

महादेव दास ने का कहना था कि उनके पास तो सर्वोच्च अदालत के स्थगन आदेश की कोई कॉपी नहीं है इसलिए सिंगूर में काम जारी है.

उन्होंने आगे कहा, "ये तय है कि ये आदेश किसानों के ख़िलाफ़ गया है. हमें लगा था कि सर्वोच्च अदालत किसानों की परेशानी ध्यान में रखेगी पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन ज़मीन हमारी है और हम उसे हर हाल में लेकर रहेगें."


सिंगूर थाना क्षेत्र में कई गाँवों की ज़मीन टाटा कंपनी के नैनो कार के कारखाने और उसके सहायक कारखानों के लिए अधिग्रहित की गई थी. इस क्षेत्र को बंगाल में धान और आलू उत्पादन के केंद्र के रूप में जाना जाता है.

प्रभावित किसानों और ऐसे भूमिहीन मज़दूरों जिनकी आजीविका अधिग्रहित ज़मीन से ही चलती थी, उनकी तादाद हज़ारों में है.

किसान नाउम्मीद नहीं

बुधवार सुबह पास के एक गाँव गोपाल नगर के एक किसान मधुसूदन कोले के घर पर त्यौहार जैसा माहौल था. उन्होंने और उनके परिवार ने ज़मीन पर डालने के लिए बीज जमा कर रखे हैं, ताकि ज़मीन वापस मिलते ही वो अपना काम शुरू कर दें.

स्थगन ही तो आया है को कोई आदेश हमारे खिलाफ़ नहीं है. हमने पांच साल तक अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए लड़ाई लड़ी है और हम आगे भी लड़ेगें. चाहे जो हो हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेगें

राजकुमार धारा, किसान

उनके पड़ोसी किसान ने अपने ट्रैक्टर को रंग रोगन करा कर तैयार रखा है और उनसे आस-पास के किसान उनका ट्रैक्टर किराए पर लेने की बात करने भी पिछले दो चार-रोज़ से आ रहे हैं.

दिल्ली से अदालत के स्थगन आदेश के आने बाद ये किसान दुखी और परेशान हो गए और ज़्यादा जानकारी जुटाने के लिए दौड़ भाग करने लगे.

यूँ तो एक हज़ार एकड़ में ज़मीन अधिग्रहण से क़रीब 13000 किसानों की ज़मीनें गई थीं, लेकिन ज़्यादतर ने ज़मीन का मुआवज़ा ले लिया था. क़रीब 3000 किसानों ने अपनी ज़मीन के बदले में कुछ भी लेने से इनकार कर दिया था और ऐसे किसानों ने ही ममता बनर्जी के आंदोलन को जीवित रखा था.

इन 3000 किसानों में से क़रीब 900 किसान अब तक अपनी अधिग्रहित ज़मीन के कागज़ ला कर विकास खंड कार्यालय में जमा करा चुके हैं.

गोपाल नगर गाँव के एक किसान राजकुमार धारा ने कहा कि वो सर्वोच्च अदालत के स्थगन आदेश से थोड़ा मायूस हैं.

वो आगे कहते हैं कि स्थगन ही तो आया है, कोई आदेश उनके खिलाफ़ नहीं है. उन्होंने पांच साल तक अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए लड़ाई लड़ी है और वे आगे भी लड़ेगें. चाहे जो हो वे अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेगें.


सुप्रीम कोर्ट पहुँचा टाटा मोटर्स

टाटा मोटर्स ने कोलकता हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके तहत पश्चिम बंगाल में सिंगूर के किसानों को उनकी ज़मीन लौटाने की प्रक्रिया को स्थगित करने से इनकार कर दिया गया था.

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को की जाएगी. अपनी याचिका में टाटा मोटर्स ने मांग की है कि सिंगूर भूमि-अधिग्रहण मामले में वो किसी तीसरे पक्ष को बीच में न आने दे.

सिंगूर में कार फ़ैक्टरी लगाना चाह रही टाटा मोटर्स कंपनी ने इससे पहले राज्य विधान सभा में पारित किए गए उस क़ानून को चुनौती दी थी जिसके मुताबिक़ सिंगूर के किसानों को उनकी अधिग्रहित की गई 400 एक़ड़ ज़मीन वापस दी जानी है.

लेकिन कोलकाता हाई कोर्ट ने इस अर्ज़ी को सोमवार को खारिज कर दिया था और ज़मीन लौटाने की प्रक्रिया को स्थगित करने से इनकार कर दिया था.

इस बीच राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किसानों को ज़मीनें लौटाने की प्रक्रिया शुरू भी कर दी है.

किसानों को आवेदन पत्र बांट दिए गए हैं और उन्हें कहा गया है कि अगर वो अपनी ज़मीने वापस लेना चाहते हैं तो आवेदन पत्र में ऐसा लिखकर उसे जमा करवाएँ.

टाटा मोटर्स ने अपनी याचिका में आशंका जताई थी कि इस प्रक्रिया के तहत उन किसानों को भी भूमि दे दी जाएगी, जिन्हें उनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ मुआवज़ा दिया जा चुका है.

विवाद

दरअसल सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास विधेयक 14 जून को पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित किया गया था.

किसानों को ज़मीन लौटाने के लिए राज्य सरकार ने पहले अध्यादेश के ज़रिए टाटा से ज़मीन वापस लेने की घोषणा की थी.

लेकिन अध्यादेश के संवैधानिक आधार पर निरस्त होने के बाद सरकार ने 24 जून से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र को पहले बुलाने का फ़ैसला लिया और ये विधेयक पेश किया.

पश्चिम बंगाल में जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चे की सरकार थी, तो टाटा को सिंगूर में कार बनाने का कारख़ाना लगाने के लिए एक हज़ार एकड़ ज़मीन आबंटित की गई थी.

यहाँ एक लाख रुपए वाली नैनो कार बनाई जानी थी. लेकिन किसानों के आंदोलन के कारण परियोजना परवान नहीं चढ़ पाई और 2008 में टाटा ने परियोजना को हटाने का फ़ैसला कर लिया.

चार सौ एकड़ ज़मीन किसानों को दिए जाने के बाद बची हुई 600 एकड़ ज़मीन पर राज्य सरकार उद्योग लगाने की पक्षधर है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि अगर टाटा कंपनी चाहे तो वहाँ उद्योग लगा सकती है.

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/06/110628_tata_supreme_court_sy.shtml

सिंगूर मामले में टाटा को सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका

NDTVIndia, Last Updated: अगस्त 24, 2012 12:36 PM IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सिंगूर मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने टाटा को नोटिस भी जारी किया है।


कलकत्ता हाईकोर्ट ने टाटा से जमीन वापस लेने के लिए बने नए कानून को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटिशन दायर की थी, दरअसल पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार के समय टाटा को नैनो का कारखाना लगाने के लिए जमीन दी गई थी, लेकिन ममता ने सत्ता में आने के बाद नया कानून पास करके टाटा से वह जमीन वापस लौटाने को कहा। चुनावों से पहले ममता ने सिंगूर के किसानों से वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर उनकी जमीनें लौटा देंगी।

सीएम बनते ही बदलीं ममता, सिंगूर में टाटा को न्योता

आईबीएन-7 | May 20, 2011 at 09:40pm

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी ने शुक्रवार को राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के बतौर पद और गोपनीयता की शपथ ली। इसी के साथ उन्होंने अपना विद्रोही बाना उतार दिया। अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में ममता ने टाटा को राज्य में वापस आने का न्योता दे डाला। साथ ही दावा किया कि नक्सल और गोरखालैंड समस्या को तीन महीने में हल कर लिया जाएगा।

शुक्रवार को कोलकाता की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। 34 साल के वाममोर्चा शासन का खात्मा और ममता के मुख्यमंत्री बनने की खुशी ने कोलकाता के आसमान को हरा कर दिया। इतिहास रचने में कामयाब हुईं ममता ने राजभवन में ठीक एक बजकर एक मिनट पर शपथ ली और बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं। उनके साथ तृणमूल के 35 और कांग्रेस के 7 विधायकों ने भी मंत्रिपद की शपथ ली। समारोह में केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, गृहमंत्री पी.चिदंबरम और निर्वतमान मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य समेत तीन हजार से ज्यादा अतिथि मौजूद थे।

शपथ ग्रहण के बाद वे पैदल ही राइटर्स बिल्डिंग यानी मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर चल पड़ीं। एक बार फिर उनके साथ समर्थकों का सैलाब था। कार्यालय पहुंचकर उन्होंने कैबिनेट के साथ बैठक की और फिर पत्रकारों से मुखातिब हुईं। ममता ने पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में साफ कर दिया कि विपक्षी नेता की विद्रोही मुद्रा से वे मुक्त हो चुकी हैं। खासतौर पर जब उन्होंने टाटा को फिर से सिंगूर में कारखाना लगाने का न्योता दिया। उन्होंने कहा कि टाटा अगर 600 एकड़ जमीन पर कारखाना बनाएं तो स्वागत है।

ये वही ममता हैं जिन्होंने कभी टाटा को बंगाल से खदेड़े जाने को जनता की जीत बताया था। जिनकी सफलता की गाथा का पहला अध्याय सिंगूर में टाटा के खिलाफ आंदोलन करते लिखा गया था लेकिन अब ममता हकीकत की जमीन पर हैं। इसलिए उन्होंने मेलजोल के रास्ते पर चलने का फैसला किया है। उन्होंने एलान किया कि सिंगूर में अधिग्रहीत 997 एकड़ में से 400 एकड़ जमीन किसानों को वापस की जाएगी। साथ ही जंगलमहाल क्षेत्र में जड़ जमा चुकी नक्सली समस्या और गोरखालैंड की समस्या को तीन महीने में दूर किया जाएगा। सिंगूर और नंदीग्राम में ग्रामीणों पर हुए अत्याचार की जांच के लिए सेवानिवृत्त जजों की एक कमेटी बनाई जाएगी। साथ ही राजनीतिक कैदियों की रिहाई पर भी विचार किया जाएगा।

जाहिर है, एक बदली हुई ममता लोगों के सामने है, जिससे बंगाल को ही नहीं पूरे देश को काफी उम्मीदें हैं। तृणमूल समर्थक का जश्न तो आसमान छू रहा है। उन्होंने बंगाल का रंग लाल से हटाकर हरा कर दिया है लेकिन असल सवाल तो बंगाल के हर कोने में हरियाली लाने का है, यही तय करेगा कि तृणमूल के आगे का सफर सुहाना होगा या नहीं।





रतन टाटा : सिंगूर से साणंद तक













-महेन्द्र तिवार

साल 2008 के पूरे 365 दिनों की इत्मीनान से खैर-खबर लेने पर पता चलता है वर्षभर इसकी नब्ज ज्यादा अच्छी नहीं चली। कुछ उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दें तो आर्थिक मंदी के खूँखार पंजों के निशान तकरीबन हरतबके पर नजर आए। इनमें भी कुछ औद्योगिक घराने ऐसे रहे, जिन्हें मंदी के साथ-साथ अन्य मुसीबतों से भी दो-चार होना पड़ा।


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टाटा समूह के चेयरमैन और मध्यम वर्ग के सपनों को पंख देने वाले रतन टाटा इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर रहे। नैनो को लेकर सिंगूर ने उनकी नाक में दम कर दिया, वहीं साल के आखिर में मुंबई के आतंकवादी हमले सेक्षतिग्रस्त हुए ताज होटल और जमशेदपुर स्टीलप्लांट की बार-बार की बंदी व घटते उत्पादनने उनके माथे की सिलवटें कम नहीं होने दीं।


ताजमहल होटल को तो फिर कुछ ही दिनों में सँवार लिया गया, लेकिन जमशेदपुर प्लांट को इस बीच कई बार लंबी बंदी का सामना करनापड़ा। इस सबके बावजूद आम आदमी के आँगन में तय वक्त में कार खड़ी करने का वादा टाटा कभी नहीं भूले। शायद यही वजह थी कि सिंगूर में विरोध की अति होती देख बिना कोई देर किए वे साणंद के लिए कूच कर गए। सिंगूर से साणंद तक का 'टाटा सफर' किस कदर संघर्षपूर्ण और चुनौतियों से घिरा रहा, इसकी बानगी सिलसिलेवार घटनाक्रम से समझी जा सकती है।


आम आदमी का सपना : हमेशा रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहदमें डूबे रहने वाले मध्यम वर्ग के अरमानों ने उस समय परवाजभरी, जब देश के अग्रणी औद्योगिक समूह टाटा ने विश्व की सबसे सस्ती कार (1 लाख रुपए) बनाने का ऐलान किया। टाटा की इस घोषणा केबाद आम आदमी न केवल कार की सवारी को अपनी जद में देखनेलगा, बल्कि टाटा भी कहीं न कहीं मध्य वर्ग के दिलों में घरकरने वाले पहले उद्योगपति बन गए।


कार का प्लांट लगाने के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के हुबली जिले के सिंगूर को चुना। राज्य में हिंदुस्तान मोटर्स के बाद ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में यह दूसरा बड़ा निवेश था। राज्य सरकार ने इसके लिए 997 एकड़ जमीन टाटा समूह को सौंपी। परियोजना पर 15 अरब रुपए (1500 करोड़) लगाने का निर्णय लिया गया। सिंगूर प्लांट में 7 जनवरी 2007 से काम शुरू हो गया, लेकिन परियोजना पूरी तरह आकार लेती, उससे पहले ही विरोध के स्वर मुखर हो गए।


विरोध की वजह : टाटा को पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने नैनो कार परियोजना के लिए 997.11 एकड़ जमीन दी। प्रोजेक्ट को लेकर विवाद उस समय शुरू हुआ, जब सिंगूर के किसानों ने यह आरोप लगाया कि सरकार ने उनकी कृषि जमीन उनसे जबरन ले ली है।


टाटा को दी गई जमीन में से करीब 400 एकड़ के अधिग्रहण को किसानों ने अवैध बताया। ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस ने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया। उसका कहना था किसानों को उनकी जमीन वापस दी जाए। इस दौरान हिंसक विरोध प्रदर्शन के कई दौर चले और समूचा सिंगूर संग्राम में बदल गया।


यही वह वक्त था, जब नैनो पर नियति ने निगाहें टेड़ी कर लीं। लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के चलते 28 अगस्त 2008 के बाद से प्लांट पर कोई काम नहीं हो पाया। प्रदर्शनकारियों ने उन सभी रास्तों को बंद कर दिया, जो फैक्टरी तक जाते थे।


तृणमूल कांग्रेस 2006 से ही इस परियोजना के खिलाफ खड़ी हो गई। राज्य सरकार ने सुलह-सफाई की कई कोशिशें की, लेकिन मुकम्मल नतीजा नहीं निकल सका।


7 सितंबर, 2008 को आखिरकार राज्यपाल गोपालकृष्ण गाँधी की पहल पर सरकार ने किसानों को जमीन के बदले जमीन देने की बात मान ली और विवाद का पटाक्षेप हो गया और ममता ने 26 दिनों से जारी अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी।


क्या था समझौता : ममता बनर्जी और सरकार के बीच हुए करार के मुताबिक उन किसानों को समुचित मुआवजा देना तय हुआ, जो अपना सही हक नहीं पा सके थे। इसके लिए एक कमेटी बनाने पर सहमति बनी। करार के मुताबिक किसानों को दी जाने वाली जमीन का ज्यादातर हिस्सा टाटा मोटर्स की फैक्ट्री परियोजना क्षेत्र के अंदर का होगा। शेष हिस्सा पास का होगा।


टाटा नहीं थे खुश : बार-बार के विरोध प्रदर्शनों से आहत रतन टाटा समझौते के बाद भी संतुष्ट नहीं थे। उनका कहना था करार में स्पष्टता की कमी है, लिहाजा जब तक यह भरोसा नहीं हो जाता कि आंदोलनकारी दोबारा अवरोध पैदा नहीं बनेंगे, ईकाई दोबारा शुरू नहीं की जाएगी।


और टाटा छोड़ गए सिंगूर : विवाद को लेकर सरकार से सुरक्षा का सौप्रतिशत आश्वासन न मिलता देख टाटा मोटर्स ने सिंगूर छोड़न का मनबना लिया और वे 3 अक्टूबर 2008 को बंगाल से रुखसत हो गए।


मनाने में मोदी हुए कामयाब : परियोजना के अगले पड़ाव के लिए टाटा कोकर्नाटक, उत्तरांचल, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश समेत कई सूबों ने बुलावाभेजा, लेकिन मनाने में कामयाब हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्रमोदी। मोदी ने गुजरात से जुड़ी जड़ों का वास्ता देते हुए टाटाको आसानी से अपना बना लिया। इसे देशभर में मोदी सरकारकी बड़ी कामयाबी के रूप में भी देखा गया।

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