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Sunday, April 22, 2012

हालीवूड के नक्शेकदम पर बॉलीवुड! भारतीय सिनेमा के पूरे हुए सौ वर्ष!

हालीवूड के नक्शेकदम पर बॉलीवुड! भारतीय सिनेमा के पूरे हुए सौ वर्ष!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

भारतीय सिनेमा के पूरे हुए सौ वर्ष! परंपरागत भारतीय सिनेमा अब हाशिये पर है। खुली अर्थ व्यवस्था सबसे पहले संसकृति और परंपरा का सत्यानाश करती है।ऐसा करने से ही बाजार में मनचाहा माल परोसा जा सकता है।भारत में खेल हो या सिनेमा, हमारे तमाम लोकप्रिय आइकन विज्ञापन के माडल बन गये हैं। कैटरिना और करीना की विज्ञापनों से रोजाना कमाई एक एक करोड़ बतायी जाती है। सचिन और धोनी का बाजार भाव खेल के मैदान में मारे गये लंबे से लंबे छक्के की पहुंच से बाहर​ ​ है। अब चाहे जहर पीना पड़े. सेलिब्रेटी की कोई जिम्मेवारी तो होती नहीं है। कला और माध्यम में जो बेसिक प्रतिबद्धता, जो आदमी के आदमी और औरत के औरत होने की शायद अनिवार्य शर्त है , बाजार में गैर जरूरी है। इसलिए  थिएटर से आने वाले मजबूत, बेहतरीन कलाकारों की जगह माडलों की​ ​ जय जयकार होने लगी है। खराब मुद्रा सबको चलन से बाहर कर देती है।जिस सिनेमा को बाहरगांव में गरीबी, रजवाड़ों, झोपड़पट्टियों और मदारियों के खेल तमाशों से शोहरत मिली, वो हिंदुस्तानी सिनेमा अब रा वन, रोबोट और कोचादईयान की वजह से विदेश में जाना जा रहा है। पाथेर पांचाली, मेघे ढाका तारा, सुजाता, देवदास, मुगल ए आजम, मदर इंडिया का जमाना अब गया, अब सिनेमा दबंग, वांटेड, सिंघम और सिंह इज किंग हो गया है।

कारपोरेट वर्चस्व के चलते जिस तेजी से बालीवूड हालीवूड की राह पर दौड़ने लगा है, इससे खतरा यह है कि भारतीय फिल्मों में भारत के अलावा बाकी सबकुछ होगा। यह मामला महज विपणन, स्पेशल इफेक्ट और तकनीक या आउटडोर शूटिंग तक नहीं है। फिल्म माध्यम का व्याकरण तेजी से बदलने लगा है। ताजा फिल्में जिस तरह आ रही हैं, उन्हें सार्वजनिक देकने की हिम्मत करने वाले लोग शायद उत्तर आधुनिक ही होंगे। हालात यह है कि कोई पाओली दाम या पिर सन्नी लिओन बालीवूड की पहचान बन जायेंगी और धरी की धरी रह जायेंगी हमारी सुनहरी परंपरा। यह निश्चय ही अशनि संकेत है। क्या अपनी पहचान, अपना वजूद मिटाकर बाजार की मांग बन जाना ही अब भारतीय फिल्म की नियति है या पिर उसके कोई सरोकार भी हैं।क्या हमें अतीत से पीछा छुड़ाकर ग्लोबल बनते हुए हालीवूड में ही समाहित हो जाना चाहिए या कास्मेटिक सर्जरी से पहले अपने चेहरे का कुछ चुनिंदा हिस्सा सहेज कर रखना चाहिए, अब यह बहस होनी ही चाहिए। आईपीएल के मुकाबले  हालिया जो फिल्में प्रदर्शित हुई हैं, और जिनके प्रदर्शन की तैयारी है, उन्हें जेहन में रखें, तो अपना कहने लायक शायद कुछ भी नहीं बचेगा।अच्छा कारोबार करने वाली फिल्म खाली दिमाग फिल्म कैसे हो सकती है? आजकल टेलीविजन की वजह से लोग बहुत जागरूक हो चुके हैं, वे दुनिया भर की फिल्में देखते हैं। वे पूछते हैं कि डॉन वैसी क्यों नहीं बनी, जैसी डाई-हार्ड थी? ल फिल्म 'हेट स्टोरी' एक इरॉटिक फिल्म है, इसीलिए यह फिल्म केवल वयस्कों के लिए है। ऐसी कुछ बातों के साथ इस फिल्म को पिछले काफी समय से प्रमोट किया जा रहा था, लेकिन फिल्म देख ऐसा लगता है कि निर्माता इस बात से बच भी सकते थे, क्योंकि जिस हिसाब से इस फिल्म में सेक्स दिखाया गया है, उस पर फिल्म की कहानी कहीं ज्यादा हावी दिखाई देती है। सेक्स इस फिल्म का एक अहम पहलू हो सकता है, लेकिन ऐसी जरूरत नहीं, जिसके बिना गुजारा ही न चल सके।

विद्या बालन स्टारर 'डर्टी पिक्चर' के बाद अब बड़े पर्दे पर विक्रम भट्ट की 'हेट स्टोरी' रिलीज हो गई है।विक्रम भट्ट द्वारा निर्मित और विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित फिल्म 'हेट स्टोरी' कामुकता और थ्रिलर का पैकेज है। जिसे केवल एक ही क्लास यानी एडल्ड्स ही देख सकते हैं।  फिल्म ने अपने बोल्ड सीन्स वाले प्रोमो और पोस्टर के चलते पहले ही सुर्खियां बटोर ली थीं। फेसबुक यही नहीं कलकत्ता हाईकोर्ट ने फिल्म 'हेट स्टोरी' के पोस्टर में अभिनेत्री पाओली की अर्धनग्न तस्वीरों को नीले रंग से पेंट करने का आदेश दे दिया था।
कॉमेडी और एक्शन के बाद बॉलीवुड में अब बोल्ड फिल्मों का दौर दिख रहा है। गर्मी के इस मौसम में अगर पाउली दाम और नथालिया कौर नए चेहरे के रूप में बोल्ड सीन देने से गुरेज नहीं कर सकती तो दर्शकों को देखने से भला कौन रोक सकता है? वैसे विक्रम भट्ट की नई पेशकश 'हेट स्टोरी' में हेट से अधिक लाइक करने लायक कुछ भी ज्यादा नहीं है।बॉलीवुड में विक्रम भट्ट ने रोमांस , लव स्टोरी , ऐक्शन से लेकर हॉरर फिल्में बनाई। अब बारी ऐसी बोल्ड फिल्म की है जो हिंदी सिनेमा में शायद अब तक की सबसे ज्यादा सेक्सी और बोल्ड सीन वाली फिल्म है। सेक्सी सीन के मामले में हिंदी सिनेमा में विवेक की यह फिल्म बरसों बाद भी बोल्ड सींस की वजह से जानी जाएगी।2012 की 'हेट स्टोरी' की कहानी 1992 में बनी 'बेसिक इंस्टिंक्ट' की कहानी से भले ना मिलती जुलती हों। लेकिन, 'हेट स्टोरी' की पाओली  दाम का पोज और कैरेक्टर का नेचर, 'बेसिक इंस्टिंक्ट' के शैरोन स्टोन से बहुत मिलता जुलता लग रहा है।वाइल्ड सेक्स के सीन्स से भरे 'हेट स्टोरी' के प्रोमो को देखकर पहले ही फिल्म पंडितों को अंदाजा लग गया था कि यह बॉलीवुड की बेसिक इंस्टिंक्ट साबित होने वाली है। जिस तरह शैरोन स्टोन बेसिक इंस्टिंक्ट में अपने जिस्म और सेक्स को लेकर बिंदास, बेलौस और सारी वर्जनाओं से परे दिखी थीं। हेट स्टोरी में भी पाओली  दाम कुछ वैसी ही दिख रही हैं।फिल्म हेट स्टोरी सिर्फ एक उत्तेजक, कामुक और थ्रिलर का मेल है जिसमें जिस्म की नुमाइश सब पर हावी है। कहानी भी ज्यादा समझने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि विक्रम भट्ट ने सेक्स सीन और कामुकता को सब पर हावी कर दिया है। फिल्म में काव्या ( पाउली दाम ) एक पत्रकार हैं जो सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ स्टिंग आपरेशन करने के बाद ऐसा लेख लिखती है , जिसके छपने के बाद कंपनी की को बाजार से झटका लगता है। सीमेंट कंपनी के मालिक का बेटा सिद्धार्थ (गुलशन देवेया ) काव्या को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर छोड़ देता है।अपनी कंपनी को इस तरह देख बदला लेने के मकसद से सिद्धार्थ ऐसा करता है। इसके बाद काव्या को पता चलता है कि वह गर्भवती है और यह सिद्धार्थ की औलाद है, तब वह उसे एक बार फिर से मिलती है। यह बात भी बताती है कि अब वह उसकी आधी जायदाद लेकर रहेगी। मगर सिद्धार्थ इस बार काव्या के बच्चे को खत्म करवा देता है और उसे इस हालत में कर देता है कि वह कभी मां ना बन सके।इसी का इंतकाम लेने के लिए काव्या कॉल गर्ल बनती है और रईसों को अपने जाल में फंसा बदले के भाव से आगे बढ़ती है। पूरी फिल्म में कहानी पर काम हावी है और अत्यधिक लगती है। काव्या का किरदार थोड़ा मजेदार लग सकता है पर कमजोर स्क्रीनप्ले की वजह से सब अर्थहीन लगता हैं| सिर्फ सेक्स से बदला लेने की कहानी है 'हेट स्टोरी'। अगर आप सिर्फ व्यस्कों वाली फिल्मों के शौकीन हैं तो अकेले जाकर मजे लीजिए।

सबसे मजेदार खबर यह आ रही है कि पूनम पांडे की आनेवाली फिल्म दिसंबर में सन्नी लियोन की जिस्म 2 के साथ ही रिलीज की जाएगी। अब, सिल्वर स्क्रीन पर दर्शकों को एक साथ दो सेक्सी स्टार्स की जंग देखने को मिलेगी। रिपोर्टों के अनुसार, पूनम पांडे ने इस फिल्म के लिए एक करोड़ लिए हैं। हॉट मॉडल से एक्ट्रेस बनी पूनम अपनी फिल्म की सफलता के लिए कॉन्फिडेंट हैं। वह सन्नी लियोन की फिल्म से टक्कर लेने की तैयारी में हैं। फिल्म के बारे में पूछे जाने पर पूनम का कहना था,'मैं उनके साथ कम्पीट नहीं कर रही हूं। वह अपना काम कर रही हैं और मैं अपना। मेरी फिल्म को जिस्म 2 के साथ रिलीज करने का फैसला सोच-समझकर लिया गया है। मैं जानती हूं कि सबको मेरी फिल्म अच्छी लगेगी।'


पूनम की फिल्म की प्रोडक्शन कंपनी ईगल होम एंटरटेनमेंट के नेशनल मार्केटिंग हेड आदित्य भाटिया का कहना है कि हमें पूनम पर पूरा भरोसा है। इसलिए इतना पैसा इस फिल्म में इन्वेस्ट कर रहे हैं। हमने उनको एक करोड़ दिया है। इस फिल्म की बजट 7 से 8 करोड़ है। अमित सक्सेना, जिन्होंने जिस्म को डायरेक्ट किया था, वही इस फिल्म की डायरेक्टर हैं। जिस्म 2 की प्रोड्यूसर-डायरेक्टर पूजा भट्ट को सन्नी लियोन और पूनम पांडे के फिल्म के इस क्लैश के बारे में जानकारी नहीं थी और जब उनको इस बारे में कहा गया तो उन्होंने कहा कि मैं पूनम पांडे की फिल्म के बारे में नहीं जानती हूं। लेकिन मैं उनको आल द बेस्ट कहती हूं। इस इंडस्ट्री में किसी को भी अपनी फिल्म को कभी भी रिलीज करने की आजादी है।

इस बीच भारतीय फिल्म उद्योग का राजस्व पिछले साल के 8,190 करोड़ रुपये की तुलना में 56 फीसदी बढ़कर 2015 तक 12,800 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। उद्योग चैंबर ऐसौचैम के अनुसार, इस सेक्टर के बढ़ते डिजिटलीकरण के कारण ऐसा संभव हो पाएगा।ऐसौचैम ने कहा कि भारत में डिजिटल क्रांति स्पष्ट तरीके से फिल्मों के वितरण (डिस्ट्रिब्यूशन) एवं प्रदर्शन को प्रभावित कर रही है और जब भारतीय फिल्म उद्योग 100 वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तो 2015 तक इसके राजस्व के 12,800 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने के आसार हैं।चैंबर ने कहा कि देश में 12,000 थिएटर स्क्रीन, 400 प्रॉडक्शन हाउसेज तथा विशाल दर्शक संख्या है। बनाई जाने वाली फिल्मों की संख्या तथा टिकट साइज के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है। चैंबर ने कहा कि देश में हर साल 20 से अधिक भाषाओं में 1,000 से भी ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं।भट्ट कैंप की लगभग हर दूसरी हिट फिल्म का सीक्वेल बन रहा है और निर्माता मुकेश भट्ट का कहना है कि फिल्म वितरण का कारोबार बहुत आकर्षक और फायदे का है। उनके अनुसार फिल्म वितरण हर फिल्म उद्योग में कारोबार के लिहाज से आकर्षक रहा है और इस वजह से इस क्षेत्र में उतरा जा सकता है।जहां भट्ट कैंप इस समय दो सीक्वल फिल्मों जन्नत 2 और राज 3 बना रहा है। वहीं आशिकी 2 की शूटिंग भी जल्द ही शुरू होने वाली है और जिस्म 2 एवं मर्डर 3 फिल्मों के निर्माण की योजनाएं भी बन रही हैं।

साल 1913 महीना अप्रैल और स्थान मुम्बई का ओलंपिया थियेटर 100 वर्ष पहले दादा साहब फाल्के ने जब अपनी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का प्रदर्शन किया तब शायद ही किसी को यकीन हो रहा था कि ब्लैक एंड व्हाइट पर्दे पर अभिव्यक्ति के इस मूक प्रदर्शन के साथ भारत में स्वदेशी चलचित्र निर्माण की शुरुआत हो चुकी है।
   
दादा साहब फाल्के की 'राजा हरिश्चंद्र' मूक फिल्म थी। फिल्म निर्माण में कोलकाता स्थित मदन टॉकिज के बैनर तले ए ईरानी ने महत्वपूर्ण पहल करते हुए पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' बनायी। इस फिल्म की शूटिंग रेलवे लाइन के पास की गई थी इसलिए इसके अधिकांश दश्य रात के हैं। रात के समय जब ट्रेनों का चलना बंद हो जाता था तब इस फिल्म की शूटिंग की जाती थी।
   
जाने माने फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल ने कहा कि भारतीय सिनेमा की शुरूआत बातचीत के माध्यम से नहीं बल्कि गानों के माध्यम से हुई। यही कारण है कि आज भी बिना गानों के फिल्में अधूरी मानी जाती हैं।
   
वाडिया मूवी टोन की 80 हजार रूपये की लागत से निर्मित साल 1935 की फिल्म 'हंटरवाली' ने उस जमाने में लोगों के सामने गहरी छाप छोड़ी और अभिनेत्री नाडिया की पोशाक और पहनावे को महिलाओं ने फैशन ट्रेंड के रूप में अपनाया।
   
गुजरे जमाने के अभिनेता मनोज कुमार ने कहा कि 40 और 50 का दशक हिन्दी सिनेमा के लिहाज से शानदार रहा। 1949 में राजकपूर की फिल्म 'बरसात' ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई। इस फिल्म को उस जमाने में 'ए' सर्टिफिकेट दिया गया था क्योंकि अभिनेत्री नरगिस और निम्मी ने दुपट्टा नहीं ओढ़ा था।
   
बिमल राय ने 'दो बीघा जमीन' के माध्यम से देश में किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण किया। फिल्म में अभिनेता बलराज साहनी का डायलॉग जमीन चले जाने पर किसानों का सत्यानाश हो जाता है, आज भी भूमि अधिग्रहण की मार झेल रहे किसानों की पीड़ा को सटीक तरीके से अभिव्यक्त करता हैं। यह पहली भारतीय फिल्म थी जिसे कॉन फिल्म समारोह में पुरस्कार प्राप्त हुआ।

कुमार ने कहा कि 50 के दशक में सामाजिक विषयों पर आधारित व्यवसायिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। वी शांताराम की 1957 में बनी फिल्म 'दो आंखे बारह हाथ' में पुणे के खुला जेल प्रयोग को दर्शाया गया। लता मंगेशकर ने इस फिल्म के गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' को आध्यात्मिक उंचाइयों तक पहुंचाया।
    
फणीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म 'तीसरी कसम' हिन्दी सिनेमा में कथानक और अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण है। ऐसी फिल्मों में 'बदनाम बस्ती', 'आषाढ़ का दिन', 'सूरज का सातवां घोड़ा', 'एक था चंदर एक थी सुधा', 'सत्ताईस डाउन', 'रजनीगंधा', 'सारा आकाश', 'नदिया के पार' आदि प्रमुख है।
    
'धरती के लाल' और 'नीचा नगर' के माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिला और अपनी माटी की सोंधी सुगन्ध, मुल्क की समस्याओं एवं विभीषिकाओं के बारे में लोगों की आंखें खुली। 'देवदास', 'बन्दिनी', 'सुजाता' और 'परख' जैसी फिल्में उस समय बॉक्स ऑफिस पर उतनी सफल नहीं रहने के बावजूद ये फिल्मों के भारतीय इतिहास के नये युग की प्रवर्तक मानी जाती हैं।  
    
महबूब खान की साल 1957 में बनी फिल्म 'मदर इंडिया' हिन्दी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। सत्यजीत रे की फिल्म 'पाथेर पांचाली' और 'शम्भू मित्रा' की फिल्म जागते रहो फिल्म निर्माण और कथानक का शानदार उदाहरण थी। इस सीरीज को स्टर्लिंग इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड के बैनर तले निर्माता निर्देशक के आसिफ ने मुगले आजम के माध्यम से नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया।
त्रिलोक जेतली ने गोदान के निर्माता निर्देशक के रूप में जिस प्रकार आर्थिक नुकसान का ख्याल किये बिना प्रेमचंद की आत्मा को सामने रखा, वह आज भी आदर्श है। गोदान के बाद ही साहित्यिक कतियों पर फिल्म बनाने का सिलसिला शुरू हुआ।
    
प्रयोगवाद की बात करें तो गुरूदत्त की फिल्में 'प्यासा', 'कागज के फूल' तथा 'साहब बीबी' और 'गुलाम' को कौन भूल सकता है। मुजफ्फर अली की 'गमन' और 'विनोद पांडे' की एक बार फिर ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया।
    
रमेश सिप्पी की 1975 में बनी फिल्म 'शोले' ने हिन्दी फिल्म निर्माण को नई दिशा दी। यह अभिनेता अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन के रूप में उभरने का दौर था।। हालांकि 80 के दशक में बेसिर पैर की ढेरों फिल्में भी बनीं, जिनमें न कहानी थी न विषय। वैसे यह दौर कलर टेलीविजन का था जब हर घर धीरे धीरे थियेटर का रूप ले रहा था।
    
60 और 70 का दशक हिंदी फिल्मों के सुरीले दशक के रूप में स्थापित हुआ तो 80 और 90 के दशक में हिन्दी सिनेमा बॉलीवुड बनकर उभरा। हालांकि 90 के दशक में फिल्मी गीत डिस्को की शक्ल ले चुके थे। इसी दशक में आमिर, शाहरूख और सलमान का प्रवेश हुआ।
मनोज कुमार ने कहा कि आज हिन्दी फिल्मों में सशक्त कथानक का अभाव पाया जा रहा है और फिल्में एक खास वर्ग और अप्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर बनायी जा रही है, जिसके कारण लोग सिनेमाघरों से दूर हो रहे हैं क्योंकि इन फिल्मों से वे अपने आप को नहीं जोड़ पा रहे हैं।       
   
पुराने जमाने में 'तीसरी कसम' से लेकर 'भुवन शोम' और 'अंकुर', अनुभव और अविष्कार तक फिल्मों का समानान्तर आंदोलन चला। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर आधारित कथावस्तु को देखा परखा और उनकी सशक्त अभिव्यक्तियों से प्रभावित भी हुए।
   
नए दौर में विजय दानदेथा की कहानी पर आधारित फिल्म पहेली श्याम बेनेगल की 'वेलकम टू सज्जनपुर' और 'वेलडन अब्बा', आशुतोष गोवारिकर की 'लगान', 'स्वदेश', आमिर खान अभिनीत 'थ्री इडियटस', अमिताभ बच्चन अभिनीत 'पा' और 'ब्लैक', शाहरूख खान अभिनीत 'माई नेम इज खान' जैसे कुछ नाम ही सामने आते हैं जो कथानक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सशक्त माने जाते है।
   
कुमार ने कहा कि फिल्मों के नाम पर वनस्पति छाप मुस्कान, प्लास्टिक के चेहरों की भोंडी नुमाइश हो रही है, जिसके कारण सिनेमाघरों (खासतौर पर छोटे शहरों में) दर्शकों की भीड़ काफी कम हो गई है। आज फिल्में मल्टीप्लेक्सों तक सिमट कर रह गई हैं।
   
इस सबके बीच एक वाक्य में कहें तो 'राजा हरिश्चंद्र' की मूक अभिव्यक्ति से हिन्दी सिनेमा 'रा वन' की उच्च प्रौद्योगिकी क्षमता के स्तर तक पहुंच चुका है।

बीते साल के सिनेमाई कारोबार पर नजर डालें, तो हिंदी की डेढ़ सौ से ज्यादा मूल और लगभग 90 डब फिल्मों ने दर्शकों को लुभाने की कोशिश की। लेकिन अफसोस और हैरानी की बात यह है कि पिछले साल जिन फिल्मों ने कामयाबी का डंका बजाया, उनमें ऎसा कुछ भी नहीं था, जो हमारे सिनेमा को समृद्ध बनाता और उसे बुलंदियों पर ले जाता।

कमाई के लिहाज से निर्देशक शंकर की डब फिल्म "रोबोट" को सबसे आगे रखा जा सकता है। इस साइंस फिक्शन फिल्म के स्पेशल इफैक्ट्स हॉलीवुड की फिल्मों को टक्कर देने वाले थे। फिल्म में रजनीकांत का जादू तो देखने लायक था ही, साथ में ऎश्वर्या राय ने भी अपनी दिलकश अदाओं और दमदार अभिनय के जरिए दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। दूसरी तरफ, "दबंग" और "गोलमाल 3" जैसी फिल्मों को दर्शकों ने चटखारे लेकर देखा, उनमें सिवाय तेज मसालों के कुछ भी नहीं था।

मणिरत्नम (रावण), रामगोपाल वर्मा (रण, रक्तचरित्र), राज कंवर (सदियां), प्रियदर्शन (आक्रोश, खट्टा मीठा), आशुतोष गोवारीकर (खेलें हम जी जान से), सतीश कौशिक (कजरारे) जैसे सिद्धहस्त फिल्मकार भी अपनी फिल्मों में न तो मनोरंजन परोस पाए और न ही अपनी बात को सही तरह से कह पाए। अनुराग बसु ने भी "काइट्स" में बुरी तरह निराश किया। उधर श्याम बेनेगल की "वैलडन अब्बा", निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले संजय पूरणसिंह चौहान की "लाहौर", विक्रम मोटवानी की "उड़ान" जैसी फिल्मों ने अलग और दमदार थीम के साथ कुछ कहना चाहा, तो उन्हें दर्शकों का ज्यादा प्यार नहीं मिल पाया। फिर भी इस भीड़ में "गुजारिश", "पीपली (लाइव)", "माई नेम इज खान", "इश्किया", "तेरे बिन लादेन" और "फंस गए रे ओबामा" जैसी फिल्मों ने उम्मीद जगाए रखी कि अब भी कुछ समर्पित फिल्मकार हैं, जो हमारे सिनेमा को बुलंदियों तक ले जाने का दमखम रखते हैं।

डर्टी पिक्चर की निर्देशक और बालाजी टेलीफिल्म्स की संयुक्त प्रबंध निदेशक एकता कपूर का कहना है, 'मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन के दर्शकों ने इस फिल्म को बड़ी शिद्दत के साथ देखा है क्योंकि उन्हें इस फिल्म में आम लोगों की कहानी और ऐसे हालात नजर आते हैं जो उनके आसपास घटित होते रहते हैं।'

इस फिल्म की सफलता की वजह से कपूर ने अपनी लागत की पूरी भरपाई कर ली है। ऐसी चर्चा है कि कपूर ने अपनी फिल्म को वितरक कुंदन थडानी की ए ए फिल्म को करीबन 19 करोड़ रुपये में बेचा था। इस फिल्म के सैटेलाइट अधिकार सोनी को 8 करोड़ रुपये में बेचे गए थे और संगीत अधिकार 2 करोड़ रुपये में टी सीरीज ने हासिल किया था। स्वतंत्र फिल्म वितरक और यूटीवी के पूर्व वितरक प्रमुख सुनील वाधवा का कहना है कि ऐसे विषयों से फिल्म की नई शैली विकसित हो रही है। उनका कहना है, 'इस साल चार फिल्मों में महिलाओं की जोरदार भूमिका देखने को मिली है।'

अगर बीते साल की फिल्मों पर नजर डालें तो मशहूर मॉडल जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित फिल्म 'नो वन किल्ड जेसिका' को समीक्षकों ने सराहा और इस फिल्म को कारोबारी सफलता भी मिली। इस फिल्म में कोई भी मशहूर हीरो नहीं था और यह पूरी तरह से मशहूर अभिनेत्रियाँ विद्या बालन और रानी मुखर्जी पर आधारित थी। इस फिल्म का निर्माण यूटीवी ने किया था और यह फिल्म 35 करोड़ रुपये की कमाई करने में कामयाब रही।

ब्लैक फ्राइडे, पांच, देव डी और गुलाल जैसी फिल्मों से मशहूर हुए निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं, भारतीय सिनेमा की कोई एक पहचान नहीं है। हॉलीवुड फिल्मों की बात चलते ही हम कह देते हैं कि वहां सिनेमा तकनीक से चलता है। हमारे यहां तकनीक अभी उतनी सुलभ नहीं है। हर निर्माता सिर्फ तकनीक को सोचकर सिनेमा नहीं बना सकता। भारतीय सिनेमा की एक पहचान जो पिछले सौ साल में बनी है, उसमें मुझे एक बात ही समझ आती है और वो है इसकी सच्चाई। सिनेमा और सच्चाई का नाता भारतीय सिनेमा में शुरू से रहा है। बस बदलते दौर के साथ ये सच्चाई भी बदलती रही है और बदलते दौर के सिनेकार जब इस सच्चाई को परदे पर लाने की सच्ची कोशिश करते हैं, तो बवाल शुरू हो जाता है। अनुराग की फिल्मों के सहारे भारतीय सिनेमा के पिछले बीस पचीस साल के विकास को भी समझा जा सकता है। अनुराग कश्यप भले अपने संघर्ष के दिनों को पीछे छोड़ आए हों और अपनी तरह के सिनेमा की पहचान भी बना चुके हों, लेकिन उनका सिनेमा पारिवारिक मनोरंजन के उस दायरे से बाहर का सिनेमा है, जिसे देखने के लिए कभी हफ्तों पहले से तैयारियां हुआ करती थीं। एडवांस बुकिंग कराई जाती थीं और सिनेमा देखना किसी जश्न से कम नहीं होता था। अब सिनेमा किसी मॉल में शॉपिंग सरीखा हो चला है। विंडो शॉपिंग करते करते कब ग्राहक शोरूम के भीतर पहुंचकर भुगतान करने लग जाता है, खुद वो नहीं समझ पाता। जाहिर है सिनेमा बस एक और उत्पाद भर बन जाएगा तो दिक्कत होगी ही।

इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसिएशन के सचिव बलविंदर सिंह ने कहा, 'ज्यादातर फिल्म निर्माता आउटडोर शूटिंग को तरजीह देते हैं। स्टूडियो मालिक पहले से इन्हें बेच रहे हैं, क्योंकि यह कारोबार अब फायदेमंद नहीं रह गया है।


एसौचैम के अनुसार, फिल्म वितरण का डिजिटलीकरण और मूवीज ऑन डिमाड जैसी वैल्यू एडेड सर्विसेज के कारण इस क्षेत्र में राजस्व के नए स्रोत खुलने तथा नए बिजनेस मॉडल के वजूद में आने के पूरे चांसेज हैंं। चैंबर ने कहा कि वर्तमान में बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कुल फिल्म राजस्व में लगभग 80 फीसदी का योगदान देता है।ऐसौचैम ने कहा कि डिजिटलीकरण, नेक्स्ट जेनरेशन नेटवक्र्स की शुरूआत तथा मीडिया तक पहुंच के लिए आधुनिक डिवाइसेज की उपलब्धता एंसिलियरी रेवेन्यू के बढ़ते हिस्से में लगातार योगदान दे रहे हैं।

चैंबर के अनुसार, हालांकि मल्टीप्लेक्सों की संख्या में इजाफा हो रहा है, लेकिन भारत में स्क्रीन की औसत संख्या अब भी बेहद कम है। भारत में स्क्रीन की संख्या प्रति 10 लाख की आबादी पर 12 स्क्रीन की है जबकि अमेरिका में स्क्रीन की संख्या प्रति 10 लाख की आबादी पर 117 स्क्रीन की है। फिल्म उद्योग को हर साल पायरेसी के कारण 300 से 400 करोड़ रुपये का नुकसान हो जाता है। भारत में फिल्म एवं मीडिया  ट्रेनिंग सुलभ कराने के लिए विश्व स्तरीय संस्थानों का भी अभाव है।

अगर कोई फिल्म कामयाब हो जाती है, तो वह आठ-नौ नाकाम फिल्मों की भरपाई कर देती है, क्योंकि वह संगीत, होम वीडियो और टीवी, सभी जगहों पर फायदा देती है। यहां की व्यवस्था स्टार से चलती है। अगर आपका बड़ा बजट और बड़े सितारे हैं, तो शुरुआती हफ्ते में ही आपका पैसा आपके पास आ जाता है। और अगर फिल्म अच्छी हुई, तो फिर कहना ही क्या। अगर बड़े बजट की फिल्म में नए सितारे हैं, तो दर्शक उसे देखने से हिचकते हैं, क्योंकि मल्टीप्लेक्स के टिकट काफी महंगे होते हैं। वे पूरे परिवार को ऐसी फिल्म दिखाने पर 1,500 रुपये क्यों खर्च करेंगे, जिसमें नए सितारे हों? अगर रेडी में नए सितारे होते, तो पहले हफ्ते में वह वैसा कमाल नहीं करती, जैसा उसने कर दिखाया।

दूसरी ओर लाखों मोबाइल सेटों को नन्हें पर्दे के रूप में रचनात्मकता का जरिया बनाया जा सकता है। लेकिन क्या इन नन्हें पर्दों को बड़े पर्दों के लिए प्रचार के काम में लगाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोग कुछ इस तरह के नए रास्तों की खोज में लगे हुए हैं।

कैलिफॉर्निया की पटकथा लेखक रैक्स वीनर ने बताया कि मोबाइल फोन के माध्यम से उपभोक्ताओं तक फिल्म की पूरी तारीफ निःशुल्क उपलब्ध कराई जा सकती है। भारतीय विशेषज्ञों की एक टीम ने इस मुद्दे की संभावना भी टटोली। उल्लेखनीय है कि गुरुवार को भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के अवसर पर ही इन संभावनाओं की तलाश जारी की गई।

'टाटा टेली सर्विसेज' के उपाध्यक्ष पंकज सेठी ने बताया कि मोबाइल पर तीन घंटे की फिल्म देखना काफी कठिन है। लेकिन खासतौर पर फिल्मों के बारे में उपभोक्ताओं को आकर्षक दृश्य दिखाना लाभदायक सिद्घ हो सकता है।

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#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

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