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Wednesday, April 4, 2012

म्यांमा की उम्मीद और अंदेशे

म्यांमा की उम्मीद और अंदेशे


Wednesday, 04 April 2012 11:35

पुष्परंजन 
जनसत्ता 4 अप्रैल, 2012: सिगार जल चुका/ सूरज सिंदूरी हो चुका/ क्या कोई मुझे मेरे घर ले जाएगा? म्यांमा के बहुचर्चित कवि थिन मो की तीन पंक्तियों की इस कविता में पता नहीं कितना दम था कि वहां की सैनिक सरकार ने उन्हें पांच साल के लिए कैद में डाल दिया। जेल से छूटने के बाद थिन मो कैलिफोर्निया में निर्वासित जीवन जी रहे थे। पांच साल पहले वे लोकतंत्र वापसी के अपने अधूरे सपने के साथ सिधार गए। म्यांमा अब भी पूरी तरह बदला नहीं। साहित्य पर इतनी सख्ती चिली के विश्वविख्यात कवि पाब्लो नेरुदा के जमाने में भी नहीं थी। नेरुदा 1927 में राजनयिक बन कर म्यांमा आए थे।
म्यांमा में अब भी कुछ लिखने से पहले वहां के सैनिक शासन से अनुमति लेनी पड़ती है। सैनिक शासन का प्रचार विभाग पहले उसे पढेÞगा, फिर उसे छपने या सार्वजनिक रूप से वाचन की अनुमति देगा। 2012 दो कारणों से ऐतिहासिक है। दो मार्च को म्यांमा में सैनिक शासन के पचास साल पूरे हो गए। दूसरा कारण अप्रैल के आरंभ से सू की और उनकी पार्टी का संसद में पहुंचना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि म्यांमा से सेना का प्रभुत्व समाप्त हो जाएगा।
पचास साल से इस देश में सैनिक सरकार के टिके रहने का कमोबेश कारण प्रकृति की कृपा है। विश्व में सागौन की लकड़ी का सबसे बड़ा निर्यातक म्यांमा है। स्फटिक, माणिक, नीलम और मोती की बेहतरीन किस्में यहां मिलती हैं। तेल और गैस का भंडार इतना है कि चीन-भारत, रूस और फ्रांस तक म्यांमा के सैनिक शासकों को सलाम बजाते हैं। भ्रष्ट जनरलों के अरबों डॉलर बाहर के बैंकों में हैं। 
यूरोपीय संघ में म्यांमा पर कडेÞ प्रतिबंध लगाने के कई प्रयास हुए, लेकिन फ्रांस हर बार विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर इसे विफल करता रहा। 12 जनवरी 2007 को संयुक्त राष्ट्र में रूस और चीन ने म्यांमा के पक्ष में वीटो का इस्तेमाल कर ऐसी ही भक्ति दिखाई। तेल, गैस और जवाहरातों के लालच में लोकतंत्र से मुंह फेरने की ये छोटी मिसालें रही हैं। और अब म्यांमा में लोकतंत्र की बयार का श्रेय लेने का सिलसिला शुरू हो चुका है। आसियान ने मान लिया कि चुनाव में धांधली नहीं हुई। अमेरिकी विदेशमंत्री गदगद हैं। मनमोहन सिंह अगले महीने म्यांमा जा रहे हैं। पर यह अफसोस की बात है कि भारत के किसी राजनेता ने अब तक म्यांमा के शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजने का सवाल गंभीरता से नहीं उठाया। मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश की 1624 किलोमीटर सीमाएं म्यांमा को छूती हैं। 1960 से ही सैनिक शासन द्वारा सताए लोगों ने म्यांमा से पलायन आरंभ किया। इसका खमियाजा पड़ोसी देशों को भुगतना पड़ा। 
आज की तारीख में कोई एक से सवा लाख बर्मी शरणार्थी भारत में हैं। म्यांमा में चीन नामक प्रांत से सबसे अधिक पलायन भारत में हुआ है और मिजोरम में इन शरणार्थियों की संख्या कोई अस्सी हजार है। पंद्रह हजार बर्मी शरणार्थी मणिपुर में हैं। नगालैंड, अरुणाचल में भी कोई सत्रह हजार बर्मी शरणार्थी वहां की आबादी में घुल-मिल गए हैं। ईसाई धर्म मानने वाले 'चीन शरणार्थी' बौद्ध-बहुल म्यांमा को पलायन के लिए दोषी मानते हैं। 
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) भारत में रह रहे सिर्फ साढेÞ सात हजार बर्मी शरणार्थियों को आर्थिक सहयोग देती है। यूएनएचसीआर के अनुसार, 2011 के अंत तक आठ हजार आठ सौ बर्मी नागरिकों ने भारत में शरण लेने के लिए आवेदन कर रखा था। 
कहां हम भारत में रह रहे सवा लाख बर्मी शरणार्थियों की बात कर रहे थे, और कहां संयुक्त राष्ट्र की यह एजेंसी सिर्फ सवा सोलह हजार की संख्या स्वीकार कर रही है। सितंबर-अक्तूबर 1994 में एक हजार बर्मी शरणार्थी उनके देश भारत सरकार द्वारा भेजे गए। तब से अब तक दस हजार बर्मी शरणार्थियों का निर्वासन हो चुका है। लेकिन सवा लाख बर्मी शरणार्थियों को वापस भेजना, नहीं लगता कि भारत में किसी भी सरकार के बस में है।
इसका एक छोटा-सा उदाहरण दिल्ली के शिवनगर का म्यांमा स्टोर है। इस स्टोर को किरण नामक एक बर्मी महिला चलाती है। म्यांमा से सूखी मछली और बहुत सारी चीजेंं मंगा कर किरण यहां बेचती हैं। उनके पति पंजाबी सरदार हैं। और अब अपना नाम किरण चावला बताती हैं। क्या आप म्यांमा वापस जाना पसंद करेंगी? इस प्रश्न पर वे कहती हैं, 'अब तो भारत में ही जीना और मरना है।' बर्मी स्टोर की किरण चावला जैसी हजारों कहानियां भारत में रच-बस चुके शरणार्थी समाज में हैं।
नाभिकीय शक्ति के रूप में म्यांमा को विकसित करने की तैयारी लंबे समय से है। म्यांमा, परमाणु अप्रसार संधि पर 1992 में हस्ताक्षर कर चुका है। 1957 से ही म्यांमा अंतरराष्ट्र्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का सदस्य है। सितंबर 2000 में म्यांमा के सैनिक शासकों ने आईएईए को सूचित किया था कि वे 'मे म्यो' में परमाणु केंद्र बना रहे हैं। 
दस जुलाई 2010 को 'टाइम' पत्रिका की एक रिपोर्ट आई, जिसमें बताया गया कि रूस में म्यांमा के जो छह सौ साठ छात्र पढ़ रहे हैं, उनमें से पैंसठ छात्र नाभिकीय शोध पर काम कर रहे हैं। यह रिपोर्ट बर्मी मेजर शाई थिन विन के एक वृत्तचित्र के आधार पर लिखी गई है, जिसमें दावा किया गया है कि पिछले एक दशक में कोई तीन हजार बर्मी सैनिक रूस में नाभिकीय हथियारों के संचालन का प्रशिक्षण ले चुके हैं। 

इससे अलग भारत और चीन द्वारा सैन्य   सहयोग की एक लंबी सूची है, जिससे यह पता चलता है कि हमारे खाने और दिखाने वाले दांत कूटनीति के भी काम आ रहे हैं। म्यांमा के सैनिक शासकों को नाराज न करने की बहुत सारी वजहें भारत सरकार के पास हैं: हमें म्यांमा के बरास्ते पूर्वी एशिया से जुड़ना है, ऊर्जा जरूरतें भी कमोबेश म्यांमा से पूरी होनी है। 
चीन, लाओस, थाईलैंड, बांग्लादेश और भारत जैसे पड़ोसियों घिरे इस देश में चार जून 1948 को ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्ति के बाद 1951-52, 1956, 1960 में चुनाव हुए। 1962 में जनरल ने-विन ने तख्ता पलट कर छब्बीस साल तक सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखी। 1988 में एक दूसरे जनरल सॉ माउंग ने राज्य कानून-व्यवस्था पुनर्स्थापना परिषद 'स्लोर्क' बना कर जनरल ने-विन की सत्ता पलट दी। 
सन 1989 में 'सोशलिस्ट रिपब्लिक यूनियन आॅफ म्यांमा' से इसका नाम बदल कर 'यूनियन आॅफ म्यांमा' रख दिया गया, लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कुछ देशों ने इस नए नाम को मान्यता नहीं दी। ये देश अब भी इसे म्यांमा ही बोलते हैं। नवंबर 2005 में नैप्यीदो (बर्मी भाषा में इसे राजाओं का नगर कहते हैं) को राजधानी घोषित कर दिया गया। 
मई 1990 में एक बार फिर म्यांमा में चुनाव हुआ। तीस साल बाद चुनाव में आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने निचले सदन 'पिथ्यू ह्लूताओ' की 489 सीटों (अब 440) में से 392 पर जीत हासिल की। 'स्लोर्क' ने इसे चुनाव नहीं माना और एनएलडी को सत्ता नहीं सौंपी। 
दूसरी ओर, जनरल सॉ माउंग थक चुके थे। 23 अप्रैल 1992 को माउंग ने जनरल थान श्वे को अपनी गद्दी सौंप दी। थान श्वे ने 'स्लोर्क' का नाम बदल कर 'एसपीडीसी' यानी राज्य शांति एवं विकास परिषद रख दिया। 23 जून 1997 को म्यांमा को आसियान की सदस्यता दी गई। उसी साल पेट्रोल की बढ़ी कीमत के विरोध में हुए प्रदर्शनों को बड़ी बर्बरता से कुचला, जिसमें तेरह लोग मारे गए। 
लगभग छह करोड़ की आबादी वाले म्यांमा में चालीस प्रतिशत लोग एक सौ तीस जनजातीय समूहों से संबंध रखते हैं। 4 लाख 88 हजार की ताकत वाली सेना के तीनों कमान के विरोध में कोई पैंतालीस हजार अलगाववादी बंदूक ताने खड़े थे, जिन्हें सैनिक सरकार ने धीरे-धीरे नरम करना शुरू किया है। थाईलैंड सीमा पर जमे कारेन, मुसलिम रोहिंग्या विद्रोही पूरी तरह झुके नहीं हैं। कारेन नेशनल यूनियन (केएनयू) से भी ताकतवर 'वा देश' की मांग करने वाली 'यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी' है, जिनकी संख्या बीस हजार बताई जाती है। 1989 में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ म्यांमा के पतन के बाद 'यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी' का गठन हुआ था। ये चीन की सीमा पर सक्रिय हैं। हेरोइन और हथियार की तस्करी के लिए कुख्यात 'वा' अतिवादियों के अलावा काचिन इंडिपेंडेंट आर्गनाइजेशन, म्यांमा नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी और शान स्टेट आर्मी, सैनिक शासकों और लोकतंत्र की चाह रखने वालों के लिए स्थायी सिरदर्द हैं। 
ऐसा नहीं कि पड़ोस की आतंकी गतिविधियों का असर भारत पर नहीं पड़ता। पूर्वोत्तर के आतंकियों के लिए बांग्लादेश, भूटान और म्यांमा पनाहगाह का काम करते रहे हैं। संभव है म्यांमा में लोकतंत्र की पूरी बहाली के बाद, आतंक की तस्वीर बदले।
खैर, 2010 के चुनाव में तैंतीस दलों को मान्यता दी गई थी। इनमें काचिन, कारेन, मों, शान, पाओ और पालुंग समुदायों के वे विद्रोही नेता भी शामिल थे, जिन्होंने सैनिक शासन के आगे घुटने टेक दिए थे। इनमें सबसे बड़ी काचिन स्टेट प्रोग्रेसिव पार्टी (केएसपीपी) को आगे बढ़ाने का काम भी सैनिक शासकों ने किया। लेकिन बाद में पश्चिमी देशों का दबाव बना कि सू की की पार्टी को संसद में जैसे भी आने देना है। उसके लिए 2012 का उपचुनाव ही विकल्प था। 
उम्मीद कर सकते हैं कि इस उपचुनाव में जीत हासिल कर चुकीं सू की चालीस सांसदों के साथ एक आवाज बन कर उभरेंगी। दिल्ली विश्वविद्यालय से आॅक्सफोर्ड तक पढ़ाई कर चुकी सू की अपने दिवंगत विदेशी पति के कारण शासनाध्यक्ष बनने से वंचित ही रहेंगी। क्योंकि म्यांमा के सैनिक शासकों ने कानून बना रखा है कि विदेशी से विवाह करने वालों को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी न दी जाए। शायद सू की के लिए राष्ट्र्रपति बनने का रास्ता प्रशस्त हो। सू की के दोनों बच्चे विदेश में हैं। राजनीति से अब तक उनका लेना-देना नहीं रहा है। फिर भी तमाम भ्रम और अटकलों को पालने से अच्छा तो यही है कि हम 2015 के आम चुनाव का इंतजार करें। इन तीन वर्षों में म्यांमा के मामले में भारतीय कूटनीति की करवट भी देखने लायक होगी!

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ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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