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Sunday, March 11, 2012

परिसर और परिवेश

परिसर और परिवेश

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/13933-2012-03-11-11-41-53 

Sunday, 11 March 2012 17:11

मणींद्र नाथ ठाकुर 
जनसत्ता 11 मार्च, 2012: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। विभिन्न तकनीकी संस्थानों से आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि आधुनिक ज्ञान के इन विशिष्ट केंद्रों में कठिन पढ़ाई और परीक्षा के कारण छात्रों पर मानसिक दबाव बना रहता है। कई बार छात्रों की जातीय पृष्ठभूमि को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है। थोराट समिति ने इस बात की पड़ताल भी की है। लेकिन इस घटना के पीछे बताया जा रहा है कि आत्महत्या करने वाले छात्र को अंग्रेजी में व्याख्यान समझ नहीं आते थे। नतीजतन, परीक्षा में खराब अंक आए। शायद यही आत्महत्या का कारण बना। 
यह समझना कठिन नहीं है कि जाति, भाषा और अंक के मसले भी आपस में जुड़े हुए हैं। जो छात्र ग्रामीण इलाके से आते हैं उनमें सांस्कृतिक पिछड़ेपन की भावना रहती है। संभव है, पिछले कुछ वर्षों में उनकी संख्या कम हो गई हो। इन संस्थाओं में प्रवेश पाने के लिए जैसी स्कूली शिक्षा और कोचिंग की जरूरत है, उससे उनका वर्गीय चरित्र भी तय हो जाता है। संस्कृति और जाति से उपजी हीनता-ग्रंथि को और भी मजबूत करती है भाषायी अक्षमता। शायद भाषा का शक्तिके साथ इतना गंभीर रिश्ता केवल भारत जैसे औपनिवेशिक देशों में हो सकता है। 
इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भाषा का सवाल केवल इतना नहीं है कि छात्रों को आयुर्विज्ञान का ज्ञान अंग्रेजी में समझ आता है या नहीं। मसला है इस ज्ञान के इर्द-गिर्द पली-बढ़ी संस्कृति का, जिसका जातीय और वर्गीय चरित्र आधुनिक ज्ञान के इन केंद्रों में शैक्षणिक स्वतंत्रता और रचनात्मक ज्ञान की संभावना, दोनों को समाप्त कर देता है। 
ऐसा ही कुछ महसूस किया जा रहा है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी, जहां विज्ञान की जगह समाजशास्त्र के विषयों की प्रधानता है। शायद पहली बार वामपंथी छात्रसंघ ने भाषा का प्रश्न उठाना शुरू किया है। इस विश्वविद्यालय में देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र आते हैं। किसी समय में दक्षिणी प्रांतों से बड़ी संख्या में छात्र आते थे, हाल के दिनों में पूर्वोत्तर के राज्यों से आने वाले छात्रों की संख्या काफी बढ़ी है। इस विश्वविद्यालय के प्रवेश नियमों के अनुसार व्यक्तिगत और सामूहिक आधार पर पिछड़ेपन को लेकर कुछ अंक दिए जाते हैं। इसलिए अलग-अलग प्रांतों के निम्न मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार के बहुत से छात्र भी आ पाते हैं। जाहिर है, वे आमतौर पर स्थानीय मेधा को परिलक्षित करते हैं। 
लेकिन यहां आने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी समस्या होती है भाषा की। अपने-अपने राज्यों की भाषा में बारहवीं तक की पढ़ाई करने वाले ये छात्र विश्वविद्यालय में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा से आतंकित हो जाते हैं। बहुत से छात्रों में कुंठा पैदा हो जाती है। यहां भारतीय भाषाओं में प्रवेश परीक्षा देने की सुविधा तो दी गई है, लेकिन मूल्यांकन के समय उनके साथ न्याय की संभावना कम ही होती है। 
अब नए छात्रसंघ ने सर्वोच्च न्यायालय के एक मुकदमे का हवाला देते हुए मांग की है कि नामांकन में साक्षात्कार का अंक तीस प्रतिशत की जगह केवल पंद्रह प्रतिशत होना चाहिए। छात्रों की दूसरी मांग भारतीय विश्वविद्यालयों के भाषा-संकट के एक समाधान-सा है। अस्सी के दशक में प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा के सवाल को बड़े जोर-शोर से उठाया गया था। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा को लेकर वहीं के एक छात्र ने लगभग तीन सप्ताह तक अनशन किया था। उसका तर्क था कि सत्तानवे फीसद छात्र भारतीय भाषाओं में बारहवीं पास करते हैं, जिनमें से केवल तीन प्रतिशत यहां प्रवेश पाते हैं, जबकि तीन प्रतिशत छात्र अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हैं और उनमें से सत्तानवे प्रतिशत प्रवेश पाते हैं। उसकी मांग थी कि प्रवेश के समय उन्हें बराबरी का मौका दिया जाए, ताकि अपनी भाषा में वे अपनी मेधा का परिचय दे सकें। प्रवेश के बाद उन्हें बेशक काम के लायक अंग्रेजी भाषा का ज्ञान करा दिया जाए। 

मगर सवाल अब केवल प्रवेश परीक्षा का नहीं है। छात्र संगठन का सुझाव है कि विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम में शैक्षणिक कार्य से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन छात्रों को अध्ययन सामग्री उनकी भाषा में भी उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि उनके लिए अपनी समझ बनाने में भाषा की समस्या आड़े न आए। इसके लिए उनका सुझाव है कि विश्वविद्यालय में एक अनुवाद केंद्र खोला जाए, जिसका काम अलग-अलग विषयों में पढ़ाए जाने वाले महत्त्वपूर्ण लेखों और पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना हो। अनुवादों के उपलब्ध होने से छात्रों को पाठ्य सामग्री के तथ्य को समझने में आसानी होगी और इससे कक्षा में चल रही बहस में उनकी हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। काम के लायक अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रहने पर भी उनकी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी। यह एक तरह से समान अवसर प्रदान करने के सिद्धांत के अनुकूल है, जिसका जाप आधुनिक ज्ञान-संस्थाएं किया करती हैं। 
भारतीय विश्वविद्यालयों के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि उच्च शिक्षा में नए प्रवेशार्थी की क्षमता का भरपूर विकास और उपयोग कैसे हो। भारत के सामने यह चुनौती ज्यादा बड़ी है। क्योंकि यहां उनके बीच का अंतर केवल वर्गीय न होकर भाषा और संस्कृति का भी है। भारत अपने युवा जनसंख्या का फायदा तभी ले पाएगा जब विश्वविद्यालय इस चुनौती का ठीक से सामना करें। इस मायने में छात्र संगठन की मांग जायज है। 
हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के छात्रों को बड़ी संख्या में फेल किए   जाने की घटना पर न्यायालय ने विश्वविद्यालय को पुस्तकों के हिंदी में अनुवाद और हिंदी की कक्षाएं चलाने का निर्देश दिया। अक्सर अंग्रेजी के पक्षधर भाषा विवाद की जटिलता के नाम पर इसे टाल देते हैं। अब शायद  इसे और टालना संभव नहीं होगा। अगर विश्वविद्यालय इस मांग को मान कर ऐसे केंद्र की स्थापना करता है तो हिंदुस्तान की कई भाषाओं में पाठ्य सामग्री उपलब्ध हो जाएगी। इससे देश के बौद्धिक विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। हमारे छात्र केवल अंग्रेजी दुनिया में चल रही बहस से परिचित नहीं होंगे, बल्कि फें्रच और जर्मन जैसी भाषाओं के ज्ञान का भी लाभ ले पाएंगे। 
भाषा का संबंध अब राष्ट्रवाद से उतना नहीं है, जितना सामाजिक न्याय, समान अवसर और सम्मान से। गौरतलब है कि साठ के दशक में भाषा के सवाल को मूल रूप से राष्ट्रवाद से जोड़ कर देखा जाता था। एक राष्ट्रभाषा का होना राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक माना जाता था। इस चक्कर में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। लेकिन इससे हिंदी ज्ञान की भाषा बनने से चूक गई। राष्ट्रभाषा के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अन्य भाषाओं को समुचित सम्मान नहीं मिल पाया। इससे भाषा की समस्या ज्यादा जटिल हो गई। दक्षिणपंथी राजनीति ने जिस प्रकार भाषा को धर्म और राजनीति से जोड़ दिया, उससे यह समस्या और भी बढ़ गई। 
हालांकि पिछले कुछ दशकों में सिनेमा जगत के प्रभाव से हिंदी जनभाषा और संपर्क भाषा के रूप में स्थापित तो हो गई, लेकिन ज्ञान की भाषा के तौर पर अब भी इसे लंबी यात्रा तय करनी है। इस यात्रा में देश की दूसरी भाषाओं के साथ इसे सहभागिता का संबंध बनाना पड़ेगा। राज्य द्वारा स्थापित शक्ति-संबंध से बाहर निकल कर जनमानस की भाषा के तौर पर स्वीकृत होना होगा। 
भाषा को वर्गीय चरित्र से मुक्तकर ज्ञान के संवाहक के रूप में स्थापित करने की पहल सामाजिक न्याय के लिए एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है। इसलिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की घटना को इसके बहुआयामी संदर्भ में समझना जरूरी है। समझना जरूरी है कि भाषा, वर्चस्व, जाति और संस्कृति के प्रश्न आपस में जुड़े हैं। एक मुक्तसमाज की स्थापना का सपना देखने वाले छात्र समुदाय को परिवर्तन के नए व्याकरण की खोज करनी होगी।

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