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Tuesday, March 13, 2012

मधुमेह के इलाज पर बाजार का दबाव, इंसुलिन होगा मंहगा!


मधुमेह के इलाज पर बाजार का दबाव, इंसुलिन होगा मंहगा!

मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण हो जाने के बाद से इलाज महंगा हुआ है और दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगी है।। मरीजों की जेब में डाका डाल रहीं हैं दवा कंपनियां।  मधुमेह के मरीजों के लिए इंसुलिन लाइफलाइन है पर बाजार में गलाकाटू कारोबारी प्रतियोगिता से इस लाइफलाइन के कटते रहने का अंदेशा है। अब इंसुलिन की कीमत पर बाजार का दबाव बढ़ने लगा है। पिछले साल मार्च में जिन दवाओं के दाम बढ़ाए गए हैं, उनमें ज्यादातर देश में निर्मित इंसुलिन हैं। दाम  और बढ़ने का अंदेशा है क्योंकि बायोकॉन और फाइजर  के बीच बायोसिमिलर इंसुलिन प्रोडक्ट्स के लिए हुआ करार टूट गया है।फाइजर के साथ बायोसिमिलर इंसुलिन प्रोडक्ट्स के लिए करार टूटने से बायोकॉन के शेयरों में 6 फीसदी की गिरावट है। वहीं, फाइजर के शेयरों में हल्की तेजी है। बायोकॉन और फाइजर के बीच अक्टूबर 2010 में ये करार हुआ था। अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर और भारतीय जैव प्रौद्योगिकी कंपनी बायोकॉन ने इंसुलिन तथा इंसुलिन एनालॉग उत्पादों की बिक्री के लिए 35 करोड़ डॉलर के वैश्विक गठजोड़ को खत्म करने की घोषणा की।दोनों कंपनियों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि बायोकॉन के इंसुलिन तथा इंसुलन एनालॉग उत्पादों के बायोसिमिलर संस्करणों की बिक्री के लिए किया गया गठबंधन खत्म करने पर दोनों कंपनियां सहमत हुई हैं। स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना दोनों कंपनियों के हित में है।अभी अधिकतर इंसुलिन विदेशों से आ रहा है। देश तैयार होने वाले इंसुलिन में उपयोग की जाने सामग्री भी विदेशों से आती है। देश में तेजी से डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इस समय देशभर में करीब पांच करोड़ डायबिटीज के मरीज हैं, जिस कारण भारत को डायबिटीज की राजधानी भी कहा जाता है।ही मधुमेह यानी डायबिटीज के मरीजों को पहले से ही महंगी मिल रही दवाओं की और अधिक कीमत चुकानी प़ड सकती है। दुनिया का हर पाचवां डायबिटीज का रोगी भारतीय है। 2011 में ही देश में 10 लाख से अधिक लोग डायबिटीज से मौत का शिकार हुए है।सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण करने के लिए यह पहल की है। इनका अभी सूचीकरण किया जा रहा है। कीमतें नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने तय कर दी हैं।

भारत के इंसुलिन मार्केट के दो तिहाई हिस्से पर इंडियानापोलिस की इलि लिली, डेनमार्क की नोवो नोर्डिस्क और फ्रांस की सनोफी एवेंटिस का कब्जा है। नोवो नॉर्डिस्क ने एनपीपीए के आदेश का विरोध किया था और अपने इंसुलिन ब्रांड पर उसके आदेश की समीक्षा के लिए सरकार के फार्मा डिपार्टमेंट को पत्र लिखा था। उल्लेखनीय है कि एनपीपीए ने घरेलू कंपनियों, बायोकॉन और वोकहार्ट को अपने इंसुलिन की कीमतों में 18 फीसदी तक की बढ़ोतरी करने की मंजूरी दी है।एनपीपीए यदि विदेशी दवाओं के दाम बढ़ाता है तो इसका घरेलू दवा बाजार पर व्यापक असर होगा।देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की आसमान छूती कीमतों पर चिंता जताते हुए गुरूवार को कहा कि दवाओं की कीमतें अब और अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति एस.के.मुखोपाध्याय की खण्डपीठ ने सरकार की प्रस्तावित औषधि मूल्य निर्धारण नीति को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार को मशविरा दिया कि देश में वैसे भी दवाओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं इन्हें और बढ़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। ढेर सारे गैर सरकारी संगठनों के समूह ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क ने सरकार की दवा मूल्य निर्धारण नीति को चुनौती दी थी। केंद्र सरकार ने ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर 1995 के तहत वर्ष 2006 में नोटिफिकेशन जारी कर दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने का फार्मूला निर्धारित किया था। लेकिन दवा कंपनियां नोटिफिकेशन व कानून के खिलाफ मर्जी से दवा की कीमतें निर्धारित कर मुनाफा कमा रही हैं।  उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद यूपीए सरकार ने दवाओं की कीमतें काबू में रखने के लिए राष्ट्रीय दवा मूल्य नियंत्रण नीति (एनपीपीपी)-2011 पेश की है। एनपीपीपी के मसविदे के मुताबिक 'जरूरी दवाओं की राष्ट्रीय सूची' (एनएलईएम) में शामिल सभी 348 दवाएं नए कानून के दायरे में आएंगी। फिलहाल एनएलईएम सूची की केवल चौहत्तर दवाओं के मूल्य पर सरकार नियंत्रण रखती है। सीधे शब्दों में कहें तो इस समय देश में बिकने वाली दवाओं में से बीस फीसद की ही कीमतों पर सरकार का नियंत्रण है और नई नीति लागू होने के बाद साठ फीसद दवाओं की कीमतें सरकार के हाथ में आ जाएंगी। सरसरी तौर पर यह फैसला बेहद कारगर लगता है, मगर नई नीति की पड़ताल करने पर दवा कंपनियों के लालच की कालिख नजर आती है।दवाओं के दाम नीचे रखने का भुलावा लंबे समय से दिया जाता रहा है। सबसे पहले 1975 में जयसुख लाल हाथी समिति ने जरूरी दवाओं के दाम कम रखने, सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीद बढ़ाने और दवा वितरण तंत्र मजबूत करने जैसे कई अहम सुझाव दिए थे। चार साल बाद, 1979 में हाथी समिति की सिफारिशें आधे-अधूरे ढंग से लागू करते समय पहली बार दवा नियंत्रण प्रणाली लागू की गई। इस कवायद से जनता को थोड़ी-बहुत राहत मिली, मगर 1987 और 1995 में सरकार ने कई बदलाव करके मूल्य नियंत्रण कानून को कागजी शेर में तब्दील कर दिया। 1995 में लागू किए गए दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीए) ने भारतीय दवा उद्योग की तस्वीर ही बदल कर रख दी। सरकार ने खुदरा दवा बाजार को खुला छोड़ दिया और महज चौहत्तर जरूरी दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने का फैसला किया। दवाओं के मूल्य पर नियंत्रण रखने की हमारी नीति पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है। जरूरी दवाओं के दाम आसमान छूते जा रहे हैं, वहीं सेक्स-क्षमता और शारीरिक बदलावों से जुड़ी दवाएं भ्रामक प्रचार के सहारे पूरे बाजार पर कब्जा कर चुकी हैं। मूल्य नियंत्रण के सरकारी आदेश दवाओं के लागत-मूल्य के बजाय बाजार-मूल्य के आधार पर दवा कीमतें तय करते हैं।

उल्लेखनीय है कि बायोकॉन द्वारा तैयार इंसुलिन तथा इंसुलिन एनालॉग उत्पादों के बायोसिमिलर संस्करणों की दुनियाभर में बिक्री करने के लिए दोनों कंपनियों ने अक्टूबर, 2010 में एक रणनीतिक गठजोड़ किया था।बयान में कहा गया कि 12 मार्च, 2012 को फाइजर को दिए गए सभी अधिकार बायोकॉन के पास वापस आ जाएंगे और यूनीविया टीएम और ग्लैरविया टीएम ब्रांड नाम से सभी इंसुलिन व्यावसायिक बिक्री के लिए केवल बायोकान की ओर से उपलब्ध कराए जाएंगे और विनिर्माण, आपूर्ति, विपणन आदि केवल बायोकान द्वारा किया जाएगा।

इस सौदे के लिए फाइजर ने बायोकॉन को 900 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया था। हालांकि बायोकॉन के पास यूनिविया, ग्लैर्विया के एक्सक्लूसिव अधिकार कायम रहेंगे। हालांकि फार्माएशियान्यूज डॉट कॉम के विकास दांडेकर का कहना है कि करार टूटने से बायोकॉन को बड़ा झटका लगेगा। लिहाजा बायोकॉन को नए साझेदार की तलाश करनी होगी।

बायोकॉन की मैनेजिंग डायरेक्टर किरण मजूमदार शॉ का कहना है कि फाइजर के साथ करार टूटने का असर चौथी तिमाही के नतीजों पर देखने को मिल सकता है। फाइजर से मिली रकम बायोकॉन के पास ही रहेगी। बायोकॉन को फाइजर 20 करोड़ डॉलर का अग्रिम भुगतान नहीं लौटाना पड़ेगा।

किरण मजूमदार शॉ के मुताबिक फाइजर से करार टूटने के बाद बायोकॉन को अतिरिक्त पैसा मिलेगा। करार टूटने की वजह से छोटी अवधि में बायोकॉन या फाइजर के राजस्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फाइजर की कारोबारी प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण दोनों कंपनियों ने आपसी सहमति के साथ करार तोड़ा है।

किरण मजूमदार शॉ का मानना है कि आगे भी बायोकॉन के लिए इंसुलिन का बाजार पहली प्राथमिकता के तौर पर बना रहेगा। फाइजर के साथ करार टूटने के बाद अब घरेलू फार्मा कंपनियों के साथ हाथ मिलाने पर विचार किया जाएगा। इंसुलिन कारोबार को स्वतंत्र तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।

मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या दुनिया भर में मधुमेह दवा बाजार के लिए एक वरदान साबित हो रही है। डायबिटीज एक ऐसा रोग है जो शरीर में कई बीमारियों को पैदा करता है। एक बार होने से सारी उमर छाया की तरह हमारा जीवन साथी बन कर साथ निभाता है।मधुमेह या चीनी की बीमारी एक खतरनाक रोग है। यह बीमारी में हमारे शरीर में अग्नाशय द्वारा इंसुलिन का स्त्राव कम हो जाने के कारण होती है।रक्त ग्लूकोज स्तर बढ़ जाता है, साथ ही इन मरीजों में रक्त कोलेस्ट्रॉल, वसा के अवयव भी असामान्य हो जाते हैं। धमनियों में बदलाव होते हैं। इन मरीजों में आँखों, गुर्दों, स्नायु, मस्तिष्क, हृदय के क्षतिग्रस्त होने से इनके गंभीर, जटिल, घातक रोग का खतरा बढ़ जाता है।  मधुमेह जब ४० वर्ष के लगभग हो तो उसे टाइप-२ मधुमेह कहते हैं। भारत के ९५%-९८%रोगी टाइप-२ के ही हैं। बचपन में होने वाले मधुमेह को टाइप-१ कहते हैं। टाइप वन में अग्नाशय में इन्सुलिन स्त्रावित करने वाली बीटा कोशिकाएं पूर्णतः बर्बाद हो जाती हैं। इन रोगियों को बिना इन्सुलीन की सूई के कोई दूसरा चारा नहीं हैं। टाइप-२ के रोगियों में बीटा कोशिकाएं कुछ-कुछ बची रहती है और दवाइयों द्वारा उन्हें झकझोर कर इन्सुलिन स्त्रावित करने को बाध्य किया जाता है, किन्तु इस तरह बीटा कोशिकाओं को झकझोरने की भी एक सीमा होती हैं, और अन्ततः एक समय आता है जब वह थेथर हो जाता है और तब दवाइयां असर नहीं करतीं। इंसुलिन एक आवश्यक दवा है और वह एनपीपीए के कीमत नियंत्रण के तहत आती है। वोकहार्ट और बायोकॉन ने अपने ब्रांड नाम के तहत बाजार में ग्लैरजीन फॉर्मूलेशन को पेश किया है, लेकिन इसका आधारभूत फॉर्मूला इंसुलिन ग्लैरजीन है। इस कारण उन्हें इन दवाओं की कीमत को लेकर हर-हालत में एनपीपीए से अनुमति लेनी पड़ेगी।अनुमान के अनुसार भारत में इंसुलिन का का बाजार करीब 600 करोड़ रुपए का है और यह सालाना 30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। एनालॉग इंसुलिन बाजार करीब 127 करोड़ रुपए का है और यह सालाना 23 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। एनपीपीए के अधिकारियों ने इस बात पर जोर देकर कहा है कि किसी भी रूप में इंसुलिन दवा कीमत नियंत्रण के तहत आता है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों जैसे एलाय लिली, नोवो नॉरडिस्क और सैनोफी-एवेंटिस ने अपने ब्रांडों के लिए कीमत की अनुमति मांगी थी। अधिकारी ने बताया कि उपभोक्ताओं से 'अधिक कीमत' वसूलने के मामले में जल्द ही एनपीपीए वोकहार्ट और बायोकॉन के खिलाफ कदम उठाएगी। दुनिया भर में सरकारों की पहल दवा वितरण तकनीक में सुधार करने के लिए विभिन्न अनुसंधान और विकास परियोजनाओं पर ले जा रहे हैं। यह भारत और चीन जैसे विकासशील देशों में बढ़ती उपभोक्ता आधार के रूप में फायदेमंद हो सकता है। वर्तमान बाजार की मुख्य आवश्यकता कम लागत पर कुशल वितरण विधियों का विकास करना है और इस उद्योग के परिदृश्य को बदल सकते हैं। एनपीपीए उन दवाओं का एमआरपी तय करता है, जिनमें प्राइस कंट्रोल के दायरे में 74 बल्क ड्रग्स का इस्तेमाल होता है। इन दवाओं की एमआरपी कंपनियों द्वारा घोषित लैंडेड प्राइस के ऊपर 50 फीसदी तक मार्जिन पर तय होती है।


एनपीपीए (नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी) ने घरेलू कंपनियों को राहत देने के मकसद से 62 दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं। जिन दवाओं के दाम बढ़ाए गए हैं, उनमें ज्यादातर देश में निर्मित इंसुलिन हैं। जिन दवाओं के दाम बढ़ाए गए हैं, उनमें से ज्यादातर का उपयोग डायबिटीज और टीबी के इलाज में किया जाता है। एनपीपीए के चेयरमैन एस एम झारवाल ने समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट से कहा, ''हमें संतुलित कदम उठाने हैं और स्वदेशी कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। इंसुलिन के कुल घरेलू बाजार में घरेलू कंपनियों का योगदान करीब 10 फीसदी है।'' बहरहाल, उन्होंने यह भी कहा कि कीमत वृद्धि के बावजूद इन कंपनियों की दवा सस्ती रहेगी।

चिकित्सकों को भारी भरकम पैकेज देकर उनसे मनमानी दवा लिखवाकर मुनाफा कमाने से नहीं चूक रही हैं दवा कंपनिया। अनेक दवा कंपनियां तो चिकित्सकों के घर का पूरा खर्च तक उठा रही हैं। चिकित्सक भी जेनरिक दवाओं के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। एक दवा बाजार में अगर आठ पैसे की है तो वही दवा नामी कंपनी की होकर अस्सी रूपए की हो जाती है।एमसीआई कोड के अनुसार चिकित्सक और उसके परिजन अब दवा कंपनियों के खर्चे पर सेमीनार, वर्कशाप, कांफ्रेंस आदि में नहीं जा सकेंगे। कल तक अगर चिकित्सक एसा करते थे, तब भी वे उजागर तौर पर तो किसी को यह बात नहीं ही बताते थे। इसके अलावा दवा कंपनियों के द्वारा चिकित्सकों को छुट्टियां बिताने देश विदेश की सैर कराना प्रतिबंधित हो जाएगा। चिकित्सक किसी भी फार्मा कंपनी के सलाहकार नहीं बन पाएंगे तथा मान्य संस्थाओं की मंजूरी के उपरांत ही शोध अथवा अध्ययन के लिए अनुदान या पैसे ले सकेंगे।

झारवाल ने कहा, ''हालांकि घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलित की कीमत में 5 से 18 फीसदी की वृद्धि की गयी है लेकिन इसके बावजूद यह आयातित इंसुलिन के मुकाबले करीब 15 फीसदी सस्ती होंगी।'' फिलहाल, बायोकॉन और वोकहार्ड दो ही प्रमुख कंपनियां है जो बड़े पैमाने पर इंसुलिन बनाती हैं।

एनपीपीए की समीक्षा बैठक में डायबिटीज, एलर्जी, मलेरिया, डायरिया, अस्थमा और हाइपर टेंशन के साथ एंटीसेप्टिक दवाओं की कीमत की समीक्षा की गई। एनपीपीए ने कहा कि कच्चे माल के अलावा अन्य मदों में होने वाले खर्च में वृद्धि को देखते हुए कीमतें बढ़ानी जरूरी थी। कीमतों में संशोधन से प्रभावित होनेवाली कंपनियों में इली लिली, फाइजर, नोवार्तिस, सनोफी एवेन्टिस, जीएसके, बायोकॉन, वोकहार्ड, ल्यूपिन और सिप्ला शामिल हैं।


रक्त में अत्यधिक सर्करा बढ़ने पर इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ सकता है।इंसुलिन के प्राथमिक संरचना की खोज ब्रिटिश आण्विक जीवशास्त्री फ्रेड्रिक सैंगर ने की थी। यह प्रथम प्रोटीन था जिसकी शृंखला ज्ञात हो पायी थी। इस कार्य के लिए उन्हें १९५८ में रासायनिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अग्नाशय स्थित आइलैंड्स ऑफ लैंगरहैंड्स अग्न्याशय का केवल एक प्रतिशत भाग ही होता है। इंसुलिन की सन् 1921 में हुई खोज से सन् 1980 तक इंसुलिन को पशुओं के पेनक्रियाज से निकाला जाता था। पशुओं से निकला यह इंसुलिन मानव इंसुलिन से थोड़ा भिन्न होता था। सन् 1980 के बाद से रिकॉम्बिनेंट जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक से इंसुलिन बनाया जाने लगा। इसे ह्यूमन इंसुलिन कहा जाता है क्योंकि इसकी संरचना हमारे शरीर में बनने वाले इंसुलिन के समान ही होती है।इंसुलिन एक प्रोटीन हार्मोन है एवं रिकॉम्बिनेंट जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक में किसी भी प्रोटीन को कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है। हर प्रोटीन छोटी-छोटी इकाइयों से बना होता है जिन्हें अमीनो एसिड कहते हैं। किसी भी प्रोटीन में अमीनो एसिड्स की एक निर्धारित संख्या एवं एक निर्धारित क्रम होता है। प्रोटीन का निर्माण जीन्स के निर्देशन में होता है। हमारे शरीर की सेल्स में जीन्स होते हैं एवं एक विशेष जीन इंसुलिन की प्रोटीन संरचना के लिए बना है। बीटा सेल्स में ही यह जीन सक्रिय होता है। अत: बीटा सेल्स ही इंसुलिन बना पाती है।यदि इंसुलिन जीन को कृत्रिम रूप से बनाकर यीस्ट या बैक्टीरिया में प्रवेश करा दिया जाए तो बैक्टीरिया/यीस्ट में इंसुलिन बनने लगते हैं एवं बैक्टीरिया/यीस्ट की ये सेल्स इंसुलिन की फैक्टरी में बदल जाती है। इस तरह से बने इंसुलिन को रिकॉम्बिनेंट इंसुलिन कहते हैं। इंसुलिन (रासायनिक सूत्र:C45H69O14N11S.3H2O) अग्न्याशय यानि पैंक्रियाज़ के अन्तःस्रावी भाग लैंगरहैन्स की द्विपिकाओं की बीटा कोशिकाओं से स्रावित होने वाला एक जन्तु हार्मोन है। रासायनिक संरचना की दृष्टि से यह एक पेप्टाइड हार्मोन है जिसकी रचना ५१ अमीनो अम्ल से होती है। यह शरीर में ग्लूकोज़ के उपापचय को नियंत्रित करता है। पैंक्रियाज यानी अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रन्थि है जो आमाशय के नीचे कुछ पीछे की ओर स्थित होती है। भोजन के कार्बोहइड्रेट अंश के पाचन के पश्चातग्लूकोज का निर्माण होता हैं। आंतो से अवशोषित होकर यह ग्लूकोज रक्त के माध्यम से शरीर के सभी भागों में पहुंचता है। शरीर की सभी सजीव कोशिकाओं में कोशिकीय श्वसन की क्रिया होती है जिसमें ग्लूकोज के विघटन से ऊर्जा उत्पन्न होती है जिसका जीवधारी विभिन्न कार्यों में प्रयोग करते हैं।

इंसुलिन एक ग्लूकोज को रक्त के माध्यम से शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश देता है। इसकी अनुपस्थिति में मधुमेह रोग हो जाता है। इसके इंजेक्शन से रक्त शर्करा की मात्रा घट जाती है। अतएव इंसुलिन की आवश्यकता शरीर को ऊर्जा प्राप्त करने हेतु ग्लूकोज का प्रयोग करने के लिए होती है। मधुमेह रोगियों में इंसुलिन के स्राव की मात्रा स्वस्थ व्यक्तियों की अपेक्षा कम होती है या स्रवित इंसुलिन ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाता है। शरीर में रक्त नलिकाएं ग्लूकोज एवं इंसुलिन को एक साथ लेकर चलती हैं एवं यदि शरीर में पर्याप्त इंसुलिन उपलब्ध नहीं होता है तो ग्लूकोज केवल रक्त में ही सीमित रह जाता है, और कोशिकाओं को नहीं मिल पाता है, जिससे शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं मिल पाती और यही ग्लूकोज़ मूत्र के रास्ते बाहर निकल जाती है। इंसुलिन पेनक्रियाज में मौजूद बीटा सेल्स द्वारा बनाया जाता है। एक व्यक्ति में लगभग 15 करोड़ बीटा सेल्स होती हैं। जैसे ही भोजन आंतों में पहुंचता है, बीटा सेल्स को यह पता चल जाता है कि आंतों में कितना भोजन पहुंचा और इसके लिए कितने इंसुलिन की जरूरत पड़ेगी। अब जैसे-जैसे ग्लूकोज रक्त में आता है, बीटा सेल्स जरूरत अनुसार इंसुलिन स्रावित करती रहती है। यह इंसुलिन ग्लूकोज को शरीर की सेल्स के भीतर पहुंचा देता है। इस तरह बीटा सेल्स जन्म से मृत्यु तक सतत कार्य करती है जिसके फलस्वरूप भोजन की मात्रा कितनी भी हो, शुगर का लेवल जीवनभर 60 से 140 मि.ग्रा. के बीच बना रहता है।यदि बीटा सेल्स आवश्यक मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाए या इंसुलिन सेल्स पर ठीक से कार्य नहीं कर पाए तो ग्लूकोज रक्त में इकट्ठा होने लगता है और यही डायबिटीज  या मधुमेह है।  इस बीमारी का मुख्य लक्षण अत्यधिक प्यास लगना, बहुमूत्रता, अत्यधिक भूख लगना एवं कमजोरी है। इस बीमारी पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। रक्त में अत्यधिक शर्करा बढ़ जाने से लकवा, अंधत्व, दिल का दौरा, गुर्दे की खराबी एवं नपुंसकता जैसी भयानक बीमारियां उत्पन्न हो जाती है।एक सामान्य अग्न्याशय में एक लाख से अधिक आइलैंड्स होते हैं और प्रत्येक आइलैंड में ८०-१०० बीटा कोशिकाएं होती हैं। ये कोशिकाएं प्रति १० सैकेंड में २ मिलीग्राम प्रतिशत की दर से ब्लड ग्लूकोज को नापती रहती हैं। एक या डेढ मिनट में बीटा कोशिकाएं रक्त शर्करा स्तर को सामान्य बनाए रखने के लिए आवश्यक इंसुलिन की मात्रा उपलब्ध करा देती हैं।जब मधुमेह नही होती है तो रक्त-शर्करा के स्तर को अत्यधिक ऊपर उठाना लगभग असंभव रहता है। अतएव इंसुलिन की आपूर्ति लगभग कभी खत्म ही नही होती। इसके अलावा अग्न्याशय में एल्फा नामक कोशिकाएं भी होती हैं जो ग्लूकागॉन नामक तत्व निर्मित करती हैं। ग्लूकागॉन इंसुलिन के प्रभावों को संतुलित करके रक्त-शर्करा स्तर को सामान्य बनाए रखता है। अग्न्याशय की डेल्टा कोशिकाएं सोमाटोस्टेन नामक एक तत्व बनाती हैं जो इंसुलिन और ग्लूकागॉन के बीच संचार का कार्य करता है।

वैज्ञानिकों ने ऐसे सबूत मिलने का दावा किया है कि मधुमेह संभवत: आंतों से जन्म लेता है । इस खोज से इस बीमारी के इलाज में आगे जाकर काफी मदद मिलने की उम्मीद जगी है । वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल आफ मेडिसिन के एक दल का कहना है कि रक्त शर्करा को नियंत्रित करने संबंधी समस्या संभवत: आंत से शुरू होती है । अपने शोध में वैज्ञानिकों ने चूहों का अध्ययन किया जो आंत में फैटी एसिड सिंथेस  बनाने में सक्षम नहीं होते हैं ।

एफएएस एक एंजाइम होता है जो लिपिड्स के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । एफएएस को इंसुलिन द्वारा नियंत्रित किया जाता है और जो लोग मधुमेह की बीमारी से पीड़ित होते हैं उनका एफएएस विकृत होता है । चूहों की आंतों में इस एंजाइम के बिना भयंकर जलन शुरू हो गयी जो मधुमेह का शक्तिशाली संकेत है ।

प्रमुख शोधकर्ता क्ले सीमनकोविच ने कहा कि मधुमेह की शुरूआत संभवत: आंत से होती है । जब लोगों में इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है तो एफएएस उचित ढंग से काम नहीं कर पाता और इससे जलन होती है और उसके बदले में मधुमेह उत्पन्न हो जाता है । इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता वजन बढ़ने पर होती है ।

अक्टूबर में नैशनल फार्मा पॉलिसी 2011 का मसौदा संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया के लिए पेश किया गया था। इस नीति के तहत 348 जीवन रक्षक दवाओं और उनके कॉम्बिनेशन के दाम की सीमा तय करने की योजना है। इन दवाओं के दाम की सीमा सेगमेंट विशेष के तीन शीर्ष ब्रांड के औसत दाम के बराबर होगी। करीब 60,000 करोड़ रुपए के घरेलू फार्मा बाजार में कुल बिक्री का 60 फीसदी हिस्सा इन जीवन रक्षक दवाओं का है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा, 'शीर्ष तीन ब्रांड के औसत को किसी दवा विशेष का उच्चतम दाम तय करने का मतलब है दवा का ऊंचा दाम रखना।' डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा कि इस कदम से दवाओं की कीमत में और इजाफा होगा। डब्ल्यूएचओ ने कहा कि दवाओं का दाम तय करने के लिए अंतरराष्ट्रीय इकाई आईएमएस हेल्थ डाटा की मदद ली जाएगी, लेकिन इस डाटा की कुछ सीमाएं हैं क्योंकि मुंबई की फर्म की ओर से किए गए अध्ययन में स्टॉकिस्टों और केमिस्टों को डिस्काउंट और एकसाथ दिए जाने वाले ऑफर का ध्यान नहीं रखा गया।

स्वास्थ्य मामलों पर संसद की स्थायी समिति की सदस्य ज्योति मिर्धा ने कीमत तय करने के इस फॉर्मूले को खारिज कर दिया, क्योंकि 'नया फॉर्मूला वैश्विक स्तर पर स्वीकृत फॉर्मूला और लागत-आधारित प्राइसिंग के फॉर्मूला से काफी अलग है।' ज्योति ने कहा, 'कीमत तय करने के ऐसे फॉर्मूले को महज तीन ब्रांड तक सीमित करने की कोई तुक नहीं बनती। कम से कम 10 ब्रांड के औसत दाम का पैमाना क्यों नहीं चुना जा सकता?'

उन्होंने कहा, 'दोबारा विश्लेषण किया जाना चाहिए और उसके मुताबिक नया ड्राफ्ट तैयार किया जाना चाहिए।' मिर्धा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, स्वास्थ्य मंत्री और रसायन एवं उर्वरक मंत्री को पत्र लिखकर भी इस बारे में चिंता जाहिर की है।

दवा सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञ भी ऐसी ही राय रखते हैं। एआईडीएएन नाम का एनजीओ पहले ही इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुका है। एनजीओ की दलील है कि दवाओं की कीमत तय करने के फॉर्मूला से जुड़ा सरकार का प्रस्ताव 'ओवरप्राइसिंग को वैध करार देता है' और साथ ही 'अत्यधिक मुनाफे' को उचित साबित करता है।

देश की दिग्गज दवा कंपनियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय फार्मा अलायंस (आईपीए) ने दवाओं के दाम तय करने वाले पुराने लागत आधारित सिद्धांत को खत्म कर नई कीमत निर्धारण नीति अपनाने के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन आईपीए ने कहा है कि नई नीति का दायरा जरूरी दवाओं के कॉम्बिनेशनंस की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) तक नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। आईपीए ने कहा है कि अगर नई कीमत निर्धारण नीति लागू होती है तो कीमत नियंत्रित दवाओं का कवरेज चार गुना बढ़ जाएगा लेकिन टैक्स से पहले के मुनाफे में करीब 3,000 करोड़ की कमी होगी।

वैश्विक दवा निर्माताओं के लॉबी ग्रुप ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्युटिकल प्रड्यूसर्स ऑफ इंडिया (ओपीपीआई) ने सरकार से आयातित दवाओं की उच्चतम कीमत तय करने के लिए अलग फॉर्मूले की मांग की है क्योंकि समान दवाओं को देश के बाहर तैयार करना ज्यादा महंगा पड़ता है।
 

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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

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