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Sunday, January 29, 2017

आरएसएस के ट्रंप कार्ड से डरिये! संघ परिवार से नत्थी हिंदुत्व की वानर सेना और उनके सिपाहसालारोंकी आस्था ने उनकी आंखों में पट्टी बांध दी होगी ,लेकिन जो सामाजिक बदलाव के मोर्चे पर स्वंभू मसीहा हैं, वे न राम मंदिर के नये आंदोलन और न मुसलमानों के खिलाफ ,काली दुनिया के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की साझेदारी के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं। बलिहारी उनकी चुनावी सत्ता समीकरण साधने वाली फर्जी


आरएसएस के ट्रंप कार्ड से डरिये!

संघ परिवार से नत्थी हिंदुत्व की वानर सेना और उनके सिपाहसालारोंकी आस्था ने उनकी आंखों में पट्टी बांध दी होगी ,लेकिन जो सामाजिक बदलाव के मोर्चे पर स्वंभू मसीहा हैं, वे न राम मंदिर के नये आंदोलन और  न मुसलमानों के खिलाफ ,काली दुनिया के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की साझेदारी के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं।

बलिहारी उनकी चुनावी सत्ता समीकरण साधने वाली फर्जी धर्मनिरपेक्षता की भी।

पलाश विश्वास

नई विश्वव्यवस्था में भारत अमेरिका के युद्ध में पार्टनर है,हमारी राजनीति, राजनय के साथ साथ आम जनता को भी यह हकीकत याद नहीं है।

नये अमेरिकी राष्ट्रपति डान डोनाल्ड ट्रंप ने बाकायदा दुनियाभर के अश्वेतों और खासतौर पर मुसलमानों के खिलाफ युद्ध घोषणा कर दी है।यह तीसरे विश्ययुद्द की औपचारिक शुरुआत जैसी है।

आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत के उपनिवेश होने की वजह से भारतीय जनता की और भरतीय राष्ट्रीय नेताओं की इजाजत के बिना भारत पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका और ब्रिटेन के साथ युद्ध में शामिल रहा है।

नतीजतन जब नेताजी सुभा, चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़कर सिंगापुर रंगून फतह करने के साथ साथ अंडमान और मणिपुर में भी तिरंगा ध्वज फहरा दिया ,तब आजाद हिंद फौज का समर्थन करने के बजाय भारतीय राजनीति ने ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था और नेताजी को गद्दार बता दिया था।

आज आजाद देश किसका उपनेवेश है कहने और समझाने की कोई जरुरत नहीं है।अब भारत अमेरिका के युद्ध में अहम पार्टनर है और इस युद्ध को आतंकवाद के खिलाफ युद्ध कहा जाता रहा है।

मुसलमानों और शरणार्थियों के लिए दरवाजा बंद करने का डान डोनाल्ड का फैसला भी अमेरिका का आतंक के खिलाफ युद्ध बताया जा रहा है।डान डोनाल्ड के इस एक्शन से एक झटके के साथ इसी उपमहाद्वीप में रोहंगा मुसलमानों के खिलाफ म्यांमार में,तमिलों के खिलाफ श्रीलंका का और हिंदू बौद्ध ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ बांग्लादेश में नरसंहारी बलात्कारी उत्पीड़न की विचारधारा मजबूत हो गयी है।

जाहिर है कि इस युद्ध की परिणति इराक,अफगानिस्तान और सीरिया से ज्यादा भयंकर होगी।दुनिया का श्वेत अश्वेत नस्ली ध्रूवीकरण के तहत जो तीसरा विश्वयुद्ध अश्वेत काली दुनिया के खिलाफ डान डोनाल्ड ने छेड़ दिया है,उस युद्ध में भारत आटोमेटिक शामिल है और और इस युद्ध की परिणति में भी भारत को साझेदार बनकर उसके तमाम नतीजे भुगतना है।

विडंबना है कि ताज्जुब की बात है कि सूचना तकनीक के जरिये रियल टाइम पल पल की जानकारी रखने वाला मीडिया और वैश्विक इशारों के मुताबिक राजनीति और अर्थव्यवस्था चलाने वाले देश के भाग्यविधाता और भारतीय जनता के जनप्रतिनिधि ने इस वैश्विक घटनाक्रम का कोई संज्ञान नहीं लिया है।

धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत और बहुलता विविधता के तमाम बयान दिखाने के और हैं और खाने के और हैं।धर्मनिरपेक्ष ताकतों का स्वर भी भारत में कहीं उस तरह गूंज नहीं रहा है जैसा अमेरिका,यूरोप या दनिया में बाकी जगह हो रहा है।

जाहिर है कि दलितों ,पिछड़ों और आदिवासियों के प्रति वोट की गरज से जितनी सहानुभूति राजनीतिक मीडिया खिलाड़ियों पिलाड़ियों को है,उससे कुछ ज्यादा धर्निरपेक्ष तेवर के बावजूद गैरहिंदुओं से कोई सहानुभूति सत्ता वर्ग के विविध रंगबिरंगे लोगों को उनकी पाखंडीविचारधाराओं के बावजूद नहीं है।उन्हें भी नहीं,जिन्होंने गठबंधन बनाकर यूपी बिहार में संघ परिवार का हिंदुत्व रथ को थामा है। वे तमाम सितारे भी मूक और वधिर बने हुए हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा मुसलमान हैं और भारत में भी बहुसंख्य हिंदुओं के बाद उनकी आबादी सबसे बड़ी है।

मुसलमानों के खिलाफ अमेरिका के खुल्ला युद्ध में भारत के शामिल हो जाने जैसी घटना के बारे में मीडिया और राजनीति की खामोशी हैरतअंगेज है।

खासकर ऐसी परिस्थितियों में जब पांच राज्य के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए डान डोनाल्ड के नक्शेकदम पर मुसलमानों से इतिहास का बदला चुकाने के लिए फिर राममंदिर के लिए बजरंगी वाहिनी और उनके सिपाहसालार नये सिरे से राम की सौौगंध खा रहे हैं।दंगा फसाद की फिजां नये सिरे से तैयार हो रही है।

जिन देशों के मुसलमानों के खिलाफ डान डोनाल्ड की निषेधाज्ञा है,उन सभी एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ भारत के पारंपारिक राजनयिक संबंध हमेशा मजबूत रहे हैं।

अमेरिका परस्त सउदी अरब के खिलाफ या संयुक्त अरब अमीरात यामिस्र के खिलाफ यह निषेधाज्ञा नहीं है।जबकि नािन इलेवेन को ट्विन टावर के विध्वंसे के मामले में सऊदी आतंकबवादी सबसे ज्यादा थे।

इससे साफ जाहिर है कि यह युद्ध आतंकवाद के खिलाफ नहीं है।

जिस इस्लामी देश पाकिस्तान को लेकर भारत को सबसे ज्यादा परेशानी है और जहां भारत विरोधकी फौजी हुकूमत है,उसके खिलाफ भी यह फतवा नहीं है।

सीधे तौर पर यह रंगभेदी हमला है काली दुनिया के खिलाफ,जिसमें हम भी शामिल हैं।मुसलमानों के अलावा लातिन अमेरिका के खिलाफ भी अमेरिका की यह युद्धघोषणा है।इस निषेधाज्ञा के तहत शरणार्थी हिंदुओं की भी शामत आनी है।

फेसबुक और गुगल केजैसे प्रतिष्ठानों के विरोध के बावजूद सूचना तकनीक पर टिकी भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध का क्या असर होना है,यह बात जझोला छाप विशेषज्ञों को भले समझ में नहीं आ रही हो लेकिन बाकी लोगों को क्या सांप सूंघ गया है कि डिजिटल कैशलैस इंडिया की इकोनामी को अमेरिका के इस युद्ध से क्या फर्क पड़ने वाला है,यह समझ में नहीं आ रहा है।

हम बार बार कहते रहे हैं कि भारत में जाति व्यवस्था सीधे तौर पर वर्ण व्यवस्था का रंगभेदी कायाकल्प है।

अमेरिकी डान डोनाल्ड के श्वेत वर्चस्व के अमेरिका फर्स्ट और हिंदुत्व के एजंडे के चोली दामन के साथ बहुजनों के नस्ली नरसंहार का जो तीसरा विश्वयुद्ध शुरु कर दिया गया है,उसके खिलाफ बहुजन भी सत्ता वर्ग की तरह बेपरवाह है,जबकि भारत के बहुजन समाज में भी मुसलमान शामिल है।

अगर मुसलमान बहुजनों में शामिल नहीं हैं,अगर आदिवासी भी मुसलमान में शामिल नहीं है और ओबीसी सत्तावर्ग के साथ हैं तो सिर्फ दलितों की हजारों जातियों में बंटी हुई पहचान से सामाजिक बदलाव का क्या नजारा होने वाला है,उसे भी समझें।

संघ परिवार से नत्थी हिंदुतव की वानर सेना और उनके सिपाहसालारों की आस्था ने उनकी आंखों में पट्टी बांध दी होगी ,लेकिन जो सामाजिक बदलाव के मोर्चे पर स्वंभू मसीहा हैं, वे न राम मंदिर के नये आंदोलन और न मुसलमानों के खिलाफ,काली दुनिया के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत की साझेदारी के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं।

बलिहारी उनकी चुनावी सत्ता समीकरण साधने वाली फर्जी धर्मनिरपेक्षता की भी।

यह सत्ता में भागेदारी का खेल है सत्ता में रहेंगे सत्ता वर्ग के लोग ही।

बीच बीच में सत्ता हस्तांतरण का खेल जारी है।

इसका नमूना उत्तराखंड है,जहां समूचा सत्ता वर्ग हिमालय और तराई के लूटेरा माफियागिरोह से है।वहां शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण की तैयारी है।

जैसे बंगाल में नेतृत्व पर काबिज रहने की गरज से सत्ता वर्ग को ममता बनर्जी की संग नत्थी सत्ता से कोई ऐतराज नहीं है और वे हारने को भी तैयार हैं,लेकिन किसी भी सूरत में वंचित तबकों को न नेतृत्व और न सत्ता सौंपने को तैयार हैं।

उसीतरह उत्तराखंड के कांग्रेसियों को  पूरे पहाड़ और तराई के केसरिया होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है और वे संघ परिवार को वाकओवर दे चुके हैं।

हरीश रावत के खासमखास सलाहकार और सिपाहसालार विजय बहुगुणा से भी ज्यादा फुर्ती से अल्मोड़िया राजनीति के तहत उनका पत्ता साफ करने में लगे हैं।

क्योंकि केसरिया राजकाज में उन्हें अपना भविष्य नजर आता है।

यही किस्सा कुल मिलाकर यूपी और पंजाब का भी है।

यूपी में अखिलेश कदम दर कदम यूपी को केसरिया बनाने में लगे हैं तो पंजाब में अकाली भाजपा सरकार के खिलाफ जो सबसे बड़ा विपक्ष है,उसका संघ परिवार से चोली दामन का साथ है।

आरएसएस के ट्रंप कार्ड से डरिये!



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Saturday, January 28, 2017

एकबार फिर राम वाण के निशाने पर हैं भारतीय जनगण। नोटबंदी को इतना भारी जनसमर्थन है तो नोटबंदी को ही मुद्दा बनाकर यूपी जीतकर दिखायें! जिन्हें संविधान,कायदा कानून की कोई परवाह नहीं है ,वे संवैधानिक तरीके से बनाएंगे राम मंदिर,समझ लीजिये कि आगे क्या अंजाम वाला है! पलाश विश्वास



एकबार फिर राम वाण के निशाने पर हैं भारतीय जनगण।
नोटबंदी को इतना भारी जनसमर्थन है तो नोटबंदी को ही मुद्दा बनाकर यूपी जीतकर दिखायें!
जिन्हें संविधान,कायदा कानून की कोई परवाह नहीं है ,वे संवैधानिक तरीके से बनाएंगे राम मंदिर,समझ लीजिये कि आगे क्या अंजाम वाला है!

पलाश विश्वास
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एकबार फिर राम वाण के निशाने पर हैं भारतीय जनगण।
नोटबंदी को इतना भारी जनसमर्थन है तो नोटबंदी को ही मुद्दा बनाकर यूपी जीतकर दिखायें!मजे की बात तो यह है कि सूत्रवार संघी घोषणापत्र में नोटबंदी की उपलभ्दियों या जडिजिटल इंडिया के कारपोरेट कार्यकर्म को किसी सूत्र में पिरोकर जनादेश जांचने के छप्पन इंच सीना का दम नहीं दिखा है।
फिर रामभरोसे हैं संघ परिवार।
छत्तीस इंच का सीना और मजबूत कंधे पर भरोसा नहीं है संघ परिवार को।
शिवसेना के बाद यूपी में महंत अवैद्यनाथ की बजरंगी सेना के केसरिया अश्वमेध अभियान से अलग हो जाने के बाद एक झटके से संघ परिवार हिंदुत्व एजंडे को गले लगा रही है,ऐसा समझना गलत होगा।
नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक अब वादा कर रहा है कि फरवरी के अंत तक हालात सामान्य होंगे और नकदी की हदबंदी खत्म होगी।पहली फरवरी को बजट पेश करने का दांव भी पलट गया है क्योंकि पांच राज्यों के लिए नोटों की वर्षा पर रोक लग गयी है।
केशव मौर्य ने राम मंदिर की चर्चा सबसे पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश में पांव तले जमीन खिसकते महसूस करके कर दी तो अब शाह सिपाहसालार की हवा खराब है।उत्तर प्रदेश चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कई तरह के विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ वाराणसी दक्षिण से सात बार से विधायक रहे श्याम देव राय चौधरी को टिकट नहीं दिए जाने से परेशान उनके समर्थकों ने हंगामा कर दिया है, जिसे मनाने को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को जाना पड़ा तो दूसरी ओर पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ का संगठन हिंदू युवा वाहिनी ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हिंदू युवा वाहिनी ने तो अपने प्रत्याशी भी घोषित करना शुरू कर दिया है और अब तक 6 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुका है।
पंजाब में दाल गलती नजर नहीं आ रही है और फतह के लिए उत्तराखंड के सिवाय खास कोई दिलासा नहीं है।ऐसे आलम में यूपी में वोटर पटखनी कहीं न दे दें,इस दहशत में विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने का दावा हवा हवाई है और रामरथ निकालने की तैयारी है।
विकास रथ रामरथ में तब्दील है।  डिजिटल कैशलैश इंडिया के तिलिस्म में गांवों देहात के अपढ़  अधपढ़ वोटर अपने तबाह खेत खलिहान और कारोबार काम धंधे को भूलने वाले नहीं है ,यह हकीकत समझ में आने का बाद एकबार फिर राम वाण के निशाने पर हैं भारतीय जनगण।
नोटबंदी की कामयाबी को लेकर मीडिया और संघ परिवार बल्ले बल्ले हैं और दस दिगंत सर्वनाश के माहौल में अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाने के बावजूद दावा है कि आम जनता और समूची उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने के बावजूद बहुत खुश है।
अगर ऐसा है तो संघ परिवार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में नोटबंदी को मुद्दा बनाकर मैदान में उतरने से डर क्यों रही रहा है?
वाशिंगटन में ग्लोबल हिंदुत्व के नये ईश्वर के तुगलकी फरमान से संघ परिवार को राम मंदिर निर्माण का एजंडा अचानक याद आया है क्योंकि मुसलामानों को अमेरिका जाने से रोकने के हुक्मनामे पर ट्रंप महाराज के दस्तखत के बाद उसपर अमल भी शुरु हो गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सात मुस्लिम देशों के नागरिकों के देश में प्रवेश पर प्रतिबंध के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिया है। ये देश यमन, सोमालिया, इराक, ईरान, सीरिया, सूडान, लीबिया हैं। राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद अपने पहले पेंटागन दौरे में ट्रंप ने इस शासकीय आदेश पर हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने कहा, "मैं चरमपंथी इस्लामी आतंकियों को अमेरिका से बाहर रखने के लिए सघन जांच के नए नियम स्थापित कर रहा हूं। हम उन्हें यहां देखना नहीं चाहते।"
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के देश की सीमाओं को अस्थाई रूप से चार महीने के लिए शरणार्थियों के लिए बंद करने के आदेश पर हस्ताक्षर करने के बाद मिस्र की राजधानी काहिरा में इराक़ और यमन के कई लोगों को अमरीका की उड़ान पर जाने से रोक दिया गया है. हालाँकि इन लोगों के पास कथित तौर पर सही वीज़ा दस्तावेज़ थे। इधर, न्यूयॉर्क के जॉन एफ़ कैनेडी हवाई अड्डे पर दो इराक़ी आप्रवासियों को हिरासत में ले लिया गया है। इनमें से एक अपनी पत्नी और बेटे से मिलने पहुंचे थे जो पहले ही अमरीका में बस चुके हैं।
अमेरिकी मीडिया और महिलाओं के अविराम विरोध के बाद आज गुगल और फेसबुक की तरफ से इस नस्ली उन्माद के खिलाफ बयान जारी कर दिया गया है।भारत में मुसलमानों की भारी आबादी के बावजूद भारत की हिंदुत्ववादी सरकार ने इस अमानवीय कृत्य की निंदा नहीं की है और नई दिल्ली व्हाइट हाउस के न्यौते केइंतजार में पलक पांवड़े बिछाये हुए हैं। 
डोनाल्ड ट्रंप के शरणार्थी नीति में बदलाव करने से फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने उनकी आलोचना की है। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रवासियों को कम करने के फैसले से खासा नाराज हैं। उन्होंने ट्रंप के फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि अमेरिका प्रवासियों का देश है और इस पर गर्व होना चाहिए।
बड़े मियां तो बड़े मियां,छोटे मियां  छलांगे दस कोस।
अमेरिका जब मुसलमानों को ऐसे सबक सिखा सकता है तो ग्लोबल इसारों के मुताबिक मुसलमानों से बदला लेने का दांव बहुसंख्यहिंदू वोटरों को वानरसेना में तब्दील करने में बारी मददगार हो सकता है।
इसी के मद्दे नजर यूपी के चुनावी दंगल में आज बीजेपी ने भी अपना दांव चल दिया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी का घोषणापत्र जारी किया बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में राम मंदिर से लेकर फ्री लैपटॉप, महिला सुरक्षा, युवाओं को रोजगार और किसानों की सुविधा से जुड़े 14 बड़े वादे किए। 
मीडिया के मुताबिक भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र के चौदह सूत्र में पहला सूत्र यही है कि संवैधानिक तरीके से बनाएंगे राम मंदिर।यूपी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कमर कस चुकी बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में राम मंदिर का जिक्र किया। सिपाहसालार अमित शाह ने कहा है कि अगर यूपी में बीजेपी की सरकार बनीं तो संवैधानिक तरीके से राम मंदिर बनाएंगे। शाह ने कहा, ''जहां तक राम मंदिर का मामला है तो प्रदेश में बीजेपी की नयी सरकार भी संवैधानिक तरीकों से जल्द से जल्द राम मंदिर बनवाने के लिये प्रयत्नशील रहेगी।''
अगला सूत्र भी मुसलमानों को निशाना बांधकर हिंदुओं के ध्रूवीकरण के मकसद से है।तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं की राय।सिपाहसालार ने फरमाया ने कहा, ''तीन तलाक के मुद्दे पर प्रदेश भर की मुस्लिम महिलाओं की राय लेकर उनके अधिकारों के रक्षा के लिये प्रदेश सरकार पक्षकार बनकर सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखेगी।''
अखिलेश के जबाव में फ्री लैपटॉप और एक साल तक फ्री इंटरनेट देने का दांव।
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के चुनावी वादे की तरह बीजेपी ने भी लैपटॉप वितरण की घोषणा करते हुए कहा कि बीजेपी की सरकार बनने पर लैपटॉप पाने वालों को हर महीने एक जीबी इंटरनेट भी मुफ्त दिया जाएगा।
पश्चिम उत्र पर्देश के किसानों को ललचाने के लिए गन्ना किसानों को तुरंत भुगतान का वायदा भी किया गया है।यह भुगतान नकदी में होना है कि किसानों को कैशलैस डिजिटल ऐप्पस पर भुगतान मिलेगा,इसका खुलासा नहीं किया गया है।बहरहाल घोषणा पत्र जारी करते हुए अमित शाह ने कहा कि अगर यूपी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनीं तो गन्ना किसानों को चीनी मील के बाहर ही गन्ना के मूल्य का चेक दे दिया जाएग।. जो उस दिन से 14 दिन बाद की तारीख का होगा।
किसानों से कर्ज पर ब्याज नहीं,ऐसा बी वायदा है।
घोषणा पत्र में किसानों को लेकर एक और बड़ा वादा ।प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने पर सभी लघु और सीमान्त किसानों का किसी भी बैंक से लिया गया सम्पूर्ण फसली कर्ज माफ किया जाएगा। किसानों से कर्ज पर ब्याज नहीं लिया जाएगा और कृषि मजदूरों को 2 लाख रुपए का बीमा दिया जाएगा।
 हर घर में 24 घंटे बिजली का लालीपाप
इतना ही नहीं सरकार बनने पर बीजेपी ने पांच साल में हर घर में 24 घंटे बिजली पहुंचाने, गरीबों को 100 यूनिट बिजली, 3 रूपये प्रति यूनिट की दर से देने और हर गांव को बसों के जरिए तहसील सेंटर से जोड़ने का वादा भी किया।
अगला सूत्र भी हिंदू मतदाताओं को निशाना साधकर है कि बंद होंगे जानवरों के अवैध कत्लखाने।अमित शाह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने पर सूबे में जानवरों के यांत्रिक कत्लखानों को बंद किया जाएगा।
बेरोजगारी की वजह से पलायन रोकने का रामवाण भी दिलचस्प है। जिलाधिकारी को माना जाएगा पलायन के लिये जिम्मेदार।पलायन के मुद्दे अमित शाह ने कहा कि बीजेपी की सरकार बनने पर संबंधित जिलाधिकारी को पलायन के लिये जिम्मेदार माना जाएगा।एक समिति बनायी जाएगी, जो पलायन ना होना सुनिश्चित करेगी। पार्टी पलायन को लेकर श्वेत-पत्र भी जारी करेगी।
कानून व्यवस्था सुधारने का भी वायदा है।15 मिनट के अंदर घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस।
अमित शाह ने कहा कि कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिये प्रदेश की मौजूदा सरकार द्वारा शुरू की गयी डायल-100 सेवा को हाईटेक करके यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पुलिस 15 मिनट के अंदर घटनास्थल पर पहुंचे।
महिला सुरक्षा के लिए टास्क फोर्स
बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा ऐलान किया। अमित शाह ने कहा कि यूपी में बीजेपी की सरकार बनीं तो महिलाओं के लिए 100 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाएंगे।
लव जिहाद की तर्ज पर 'एंटी रोमियो दल' का गठन
बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि, यूपी में उनकी पार्टी की सरकार बनने पर महिलाओं खासकर कॉलेज जाने वाली छात्राओं से छेड़छाड़ रोकने के लिये 'एंटी रोमियो दल' गठित किये जाएंगे, जो स्कूलों के इर्द-गिर्द सक्रिय रहेंगे।यह एंटी रोमियो दल भी जाहिर है बजरंगी दल होने वाला है।
माफियाओं पर लगाम के लिए अलग-अलग टास्क फोर्स
अमित शाह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी की सरकार बनी तो भूमाफिया, खनन माफिया पर लगाम के लिये अलग-अलग टास्क फोर्स गठित की जाएंगी। अपराधियों पर फौरन ही कार्रवाई की जाएगी औऱ 45 दिन के अंदर अपराधी जेल में जाएंगे।
बुंदेखलण्ड विकास बोर्ड का गठन
बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर बुंदेलखण्ड के विकास के लिये मुख्यमंत्री कार्यालय की निगरानी में बुंदेखलण्ड विकास बोर्ड गठित किया जाएगा। ऐसा ही बोर्ड पूर्वांचल के लिये भी बनाया जाएगा।
लड़कियों को ग्रेजुएशन तक मुफ्त शिक्षा
इसके साथ ही बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में लड़कियों को ग्रेजुएशन तक मुफ्त शिक्षा, कॉलेज में फ्री WiFi और हर युवा को रोजगार देने का वादा भी किया।

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Friday, January 27, 2017

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख अतीक - मुख्तार तो मफिया हैं लेकिन राजा भैया - अभय सिंह साधू, वाह मिस्टर क्लीन

CMs letter to the PM, doom,Cashless, Digital India

Shah Rukh Khans Raees Vs Hrithik Roshans Kaabil,रईस ने काबिल को पछाड़ा

शाहरुख खान की रईस और ऋतिक रोशन की काबिल के बीच जबरदस्त टक्कर देखने को मिल रही है। लेकिन कमाई के मामाले में काबिल को पीछे छोड़ते हुए रईस आगे निकल गई

PM Modi at Jalandhar, Congress is a thing of past, breathing its last


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ट्रंप उपनिवेश में आगे डिजिटल सत्यानाश! पहली को बजट की जिद अर्थतंत्र को बदलने की कवायद और पांच राज्यों को झुनझुना! पीएम को सीएम के खत से बदलेगी नहीं कयामत की फिजां! यूपी वाले अपनी निर्णायक ताकत को समझें और जनादेश को समूचे देश के लिए सामूहिक आत्महत्या बनने न दें,आज सबसे बड़ी चुनौती यही है। पलाश विश्वास

ट्रंप उपनिवेश में आगे डिजिटल सत्यानाश!

पहली को बजट की जिद अर्थतंत्र को बदलने की कवायद और पांच राज्यों को झुनझुना!

पीएम को सीएम के खत से बदलेगी नहीं कयामत की फिजां!

यूपी वाले अपनी  निर्णायक ताकत को समझें और जनादेश को समूचे देश के लिए सामूहिक आत्महत्या बनने न दें,आज सबसे बड़ी चुनौती यही है।

पलाश विश्वास

अक्सर बार बार ठोकर खा्ते जाने के बावजूद संभलकर चलने की आदत बनती नहीं है।आदत नहीं सुधरने का मतलब आगे फिर सत्यानाश है।

हम बामसेफ के आभारी हैं कि बामसेफ से करीब एक दशक तक जुड़े रहने की वजह से अंबेडकरी मिशन के तमाम लोगों से लगातार संवाद करने का मौका मिला है।वह संवाद आज भी कमोबेश जारी है,जिस वजह से हम हवा हवाई बातें नहीं करते लिखते हैं।

बामसेफ के मंचों से देशभर में आर्थिक मुद्दों पर करीब एक दशक तक हम बातें करते रहे हैं, मुंबई में बजट का विश्लेषण करते रहे हैं और हर सेक्टर में जाकर अर्थव्यवस्था की बुनियादी मुद्दों पर संवाद भी करते रहे हैं।

अब हम बरसों से बामसेफ में नहीं हैं और जिन साथियों को लेकर अंबेडकर के आर्थिक विचारों पर हम जमीनी हकीकत और राजकाज,नीति निर्धारण के तहत ग्लोबीकरण ,निजीकरण उदारीकरण पर लगातार संवाद कर रहे थे,वे तमाम साथी भी अब बामसेफ में नहीं हैं।

फिरभी हमारे मुद्दे और सरोकार अब भी वे ही हैं।

बहुसंख्य मेहनतकश जनता के हकूक के मुद्दे,उनकी बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं के मुद्दे ,जल जंगल जमीन आजाविका,पर्यावरण जलवायु, नागरिकता, नागरिक मानवाधिकार कानून का राज,संवैधानिक रक्षा कवच,समता ,न्याय,सबके लिए समान अवसर और संसाधनों पर आम जनता के हक के सवाल और मुक्तबाजार के प्रतिरोध के मुद्दे वे ही हैं,जिन्हें हमने बामसेफ के मार्फत बहुजन आंदोलन के मुद्दे बनाने की कोशिश लगभग एक दशक से करते रहे हैं।जो हम कर नहीं सके हैं।

सिर्फ हम बामसेफ की भाषा का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं,जो यकीनन बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की भाषा भी नहीं रही है।

विमर्श की भाषा बहुजनों की भी भाषा होनी चाहिए।

बाकी तमाम हककूक से वंचित रहने के साथ ज्ञान और शिक्षा के हकहकूक से हजारों साल से मनुस्मृति विधान के चलते अस्पृश्य बने रहने के नर्क से निकलने के लिए मनुस्मृति के मुताबिक अपनी जाति पहचान को मिटाना बेहद जरुरी है और जाति धर्म नस्ल की भाषा में संवाद का मतलब फिर वही मनुस्मृति सौंदर्यशास्त्र और व्याकरण है.जिससे मुक्त होने के लिए जनमजात जिस जुबान में बात करने को हमें अभ्यस्त बनाया गया है,घृणा की उस जुबान से मुक्त होने की जरुरत है जो सीधे तौर पर तथागत गौतम बुद्ध का पंथ है।यही एकमात्र मुक्तिमार्ग है।

धम्म प्रवर्तन की भाषा में हिंसा का वर्जन दरअसल वर्गीय ध्रूवीकरण है,जिसकी कोई काट ब्रांह्मण धर्म और उसके ग्लोबल हिंदुत्व के पास नहीं है और ग्लोबल हिंदुत्व के प्रतिरोध का यही एकमात्र वैकल्पिक ग्लोबल एजंडा संभव है ,जो हमारे इतिहास और लोक की विरासत है।

तथागत गौतम बुद्ध के मुकाबले न कोई कल्कि अवतार है और न कोई डान डोनाल्ड है,इसे समझ लें तो प्रतिरोध की मजमीन अब बी बनायी जा सकती है।

धर्मस्थलों को फिर ज्ञान के केंद्रों में तब्दील करने का तथागत का आंदोलन ही संस्थागत फासिज्म के राजकाज से मुक्त होने का रास्ता है।

पिछले दिनों एक साक्षात्कार में विद्याभूषण रावत ने मुझसे यही पूछा था कि बहुजनों को शिकायत है कि आपकी भाषा अंबेडकरी कम और वामपक्षी ज्यादा लगती है।उस संक्षिप्त बातचीत में तमाम मुद्दों के साथ इसका जवाब पूरा दे नहीं सका था।

अब अंबेडकर के रचना समग्र को उठाकर देख लें, डिप्रेस्ड क्लास के अलावा, ब्राह्मणवाद के अलावा वंचितों के हकहकूक की उनकी विचारधारा में गालीगलौज कितने हैं।जिस भाषा का इस्तेमाल अब अंबेडकरी मिशन के नाम लोग करते अघाते नहीं और जिस भाषा के बूते वे किसी को भी अंबेडकरी तमगा देकर उसके पिछलग्गू बन जाते हैं, यी तर्क और विज्ञान के विमर्श की भाषा में संवाद करने वाले बहुजनों को कम्युनिस्ट बताकर उनका बहिस्कार से हिचकते नहीं हैं,अंबेडकर के विचारों में उस जाति घृणा की कितनी जगह है। तथागत गौतम बुद्ध के पंचशील की भाषा पर भी गौर करें।

गौरतलब है कि अंबेडकर ने डिप्रेस्ड क्लास कहा है,जाति उन्मूलन की बात कही है।उन्होने अस्पृश्यता खत्म करने के लिए पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद,दोनों का पुरजोर विरोध किया है लेकिन कहीं भी जाति बतौर वंचित वर्ग को संबोधित नहीं किया है बल्कि वर्ग संघर्ष की बात करने वाले कामरेड इसके उलट जाति से इंकार करते हुए जाति वर्चस्व के समीकरण में अपनी विचारधारा और वर्ग संघर्ष दोनों को तिलांजलि देकर मनुस्मृति शासन की निरंतरता बनाये रखने का धतकरम किया है।

वर्ग की बात जब अंबेडकर खुद कर रहे थे, जब अंबेडकर ने लड़ाई की शुरुआत ही वर्कर्स पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के साथ अस्पृशयता विरोधी आंदोलन से की थी,तब जाति से नत्थी अंबेडकरी मिशन के औचित्य पर  बहस उसी तरह जरुरी है जैसे वामपक्ष का जाति के यथार्थ से इंकार और बहुसंख्य सर्वहारा से विश्वासघात की चीड़ फाड़ अनिवार्य है।वाम आंदोलन में अंबेडकर की अनुपस्थिति की वजह से वर्गीय ध्रूवीकरण  हुआ नहीं है और जाति व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है,इस सच का सामना भी करें।

आरक्षण पर बहस की गुंजाइश है।जब तक जाति उन्मूलन नहीं होगा,जब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में बहुजनों के खिलाफ नस्ली भेदभाव का सिलिसला जारी रहेगा, आरक्षण के अलावा वंचितों को समान अवसर और न्याय दिलाने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है।हालांकि सत्ता वर्ग ने निजीकरण और मुक्तबाजार के जरिये आरक्षण खत्म करने का चाकचौबंद इंतजाम कर लिया है और मुक्त बाजार का समर्थन करने के आत्मघाती करतबसे अंबेडकरी आंदोलन आरक्षण को तिलांजलि देने में ब्राह्मणतंत्र का सहायक बना है और इस कार्यक्रम में बहुजनों के सारे राम मनुस्मृति के हनुमान बने रहे हैं।

यह भी गौर करने लायक बात है कि वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था के तहत हजारों जातियों में बंटे हुए भारतीय मेहनतकशों को आरक्षण के तहत बाबासाहेब ने सिर्फ तीन वर्गों में संगठित करके  जातियों को उन्ही  संवैधानिक वर्गों में  अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग में संगठित करने का करिश्मा कर दिखाया है।

अब अगर तमाम अनुसूचित और पिछड़े फिरभी जाति में गोलबंद बने रहकर अंबेडकरी मिशन चलाना चाहते हैं,तो यह फिर अस्पृश्यता के मटके और झाड़ु से खुद को नत्थी करने के अलावा और क्या है,हम यह नहीं समझते।भाषा का तेवर भी वहीं है।

बहरहाल महामहिम ट्रंप के 20 जनवरी को राष्ट्रपति बनते ही उनके एक के बाद एक कारनामे से साफ जाहिर है कि अमेरिकी श्वेत बिरादरी और दुनियाभर के उनके भाई बंधु के अलावा बाकी दुनिया और खासकर काली इंसानियत के लिए वे क्या कयामत बरपाने वाले हैं।

हम जो पिछले पच्चीस साल से उत्पादन प्रणाली को अर्थव्यवस्था की बुनियाद बताते हुए भारतीय कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था  का आधार बता रहे थे,उसका मतलब अब शायद समझाने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी।अब भी नहीं समझे तो हिंदुत्व का नर्क, जन्मफल, नियति, देवमंडल,अवातार तिलिस्म,धर्मस्थल और पीठ,तंत्र मंत्र ताबीज यंत्र का विशुध आयुर्वेद योगाभ्यास,लोक परलोक और स्वर्गवास आपको मुबारक।

शिक्षा और शोध को तिलांजलि देकर ज्ञान के बजाय तकनीक को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर हर हाथ में थ्रीजी फोर जी फाइव जी सौंपकर देश को मुक्तबाजार में, कैसलैस डिजिटल इंडिया बनाने की प्रक्रिया में हम जो अमेरिकी उपनिवेश बनते रहे हैं,वह एक झटके से ट्रंप उपनिवेश है।आने वाले दिनों में सरकार आधार को और बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी कर रही है। आधार के जरिए ही अब आप आईटी रिटर्न भी भर सकेंगे। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आज आधार पर आंकड़े जारी करते हुए कहा कि इस समय देश में 111 करोड़ लोग आधार का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश के 99.6 फीसदी युवाओं के पास आधार कार्ड है। आधार के जरिए 4.47 करोड़ बैंक अकाउंट खुले हैं। नोटबंदी के बाद हर दिन नए आधार या उनमें सुधार से जुड़ी 5-6 लाख अर्जिंयां मिल रही हैं। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आधार के चलते पिछले 2 साल में सरकार ने 36 हजार करोड़ रुपये की बचत की है।

प्रकृति,कृषि,पर्यावरण,जल जंगल जमीन और उनसे जुड़े समुदायों के खिलाफ मुक्तबाजारी नरसंहारी अश्वमेध जारी है और रोजगार सृजन तकनीक तक सीमाबद्ध करते जाने के पच्चीस साल इस देश के भविष्य के लिए अंधकार युग में वापसी का हिंदुत्व पुनरुत्थान है।यही फिर ट्रंप के श्वेत वर्चस्व का ग्लोबल हिंदुत्व जायनी है।

बहुजनों को यह राजनीति और अर्थव्यस्था दोनों समझनी चाहिए।

नोटबंदी से एक मुश्त खेती और कारोबार के खत्म होने के बाद  फिर जो डिजिटल सत्यानाश की आपाधापी में यह अग्रिम बजट है,सरकारी खर्च बढाकर इकोनामी का लाटरी में बदलने की कवायद के तहत आम जनता पर सारे टैक्स और वित्तीय घाटे का बोझ डालने के केसरिया हिंदुत्व नस्ली अर्थतंत्र तैयार करने का डिजिटल कैसलैस महोत्सव है,उसका अंजाम डोनाल्ड के कारनामों के मुताबिक समझ लें तो बेहतर।

लोकतंत्र के बारे मेंखास बात यह है किविकसित देशों में लोकतंत्र और तीसरी दुनिया के देशों में लोकतंत्र में बुनियादी फर्क यह है कि यहां वोट न उम्मीदवार की काबिलियत और उसकी पृष्ठभूमि को देखकर गिरते हैं और न चुनाव प्रचार में बुनियादी मुद्दों और मसलों,अर्थव्यवस्था,विदेश नीति और कानून व्यवस्था के साथ सात बुनियादी सेवाओं के हालचाल,कानून व्यवस्था,नागरिक और मानवाधिकार,जल जंगल जमीन आजीविका या पर्यावरण पर किसी तरह की बहस होती है और न विचारधारा के तहत कोई बहस होती है।

जांत पांत धर्म क्षेत्र नस्ल वगैरह वगैरह से जुड़े भावनात्मक मुद्दों पर लोग निर्णायक वोट भावनाओं में बहकर गेर देते हैं।

चुनाव पूर्व लोक लुभावन बजट हो या टैक्स रियायतें हों या आरक्षण या सब्सिडी या कर्ज या पानी बिजली सड़क वगैरह वगैरह स्थानीय मुद्दों को लेकर भी वोट पड़ जाते हैं।नतीजतन जो जनादेश बनता है ,वह दस दिगंत सत्यानाश जो हो सो तो हैं ही,अगले चुनाव तक सर धुनते रहने के अलावा ट्रंप विरोधी महिलाओं के वाशिंगटन मार्च जैसी कोई बगावत के लिए हमारी रीढ़ जबाव देती रही है और इसतरह हमने संविधान और लोकतंत्र को अपने धतकरम से सिरे से फेल कर दिया है।स्यापा करने से मौत का मंजर बदलता नहीं है।

ले मशालें लिखने वाले हमारी तराई के जनकवि बल्ली सिंह चीमा ने लिखा हैः

वोट से पहले सोच जरा

बारी बारी से लूटें इकरार किया है हाथ कमल ने ।

भृष्टाचार में इक दूजे का साथ दिया है हाथ कमल ने।

दारू पीकर जय मत बोल वोट से पहले सोच जरा

पर्वत नदियां जंगल सब बरबाद किया है हाथ कमल ने।

बहरहाल,ऊपरी तौर पर लगता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी जन भावनाओं के उभार की वजह से दक्षिणपंथी श्वेत वर्चस्व के ग्लोबल जायनी हिंदुत्व एजंडा की वजह से यूं ही अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये हैं।

हम बार बार लिखते रहे हैं कि पहले अश्वेत राष्ट्रपति बाराक हुसैन ओबामा अमेरिकी राष्ट्र और जनता को युद्धक अर्थव्यवस्था के शिकंजे से निकल वहीं सके हैं। अमेरिका में लगातार गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है।कानून व्यवस्था के हालात संगीन हैं।

देशभक्ति के हिंदुत्व उन्माद से जहां विविधता और बहुलता सहिष्णुता का इतिहास और विरासत खत्म है तो वहीं पिछले पच्चीस साल में अभूतपूर्व युद्धोन्माद और हथियारों की होड़,ऱक्षा घोटालों और रक्षा आंतरिक सुरक्षा में विनिवेश के माध्यम से हमने सत्ता वर्ग को अपने हितों के लिए भारत लोक गणराज्य को सैन्य राष्ट्र बनाने की छूट दी है।

इस दौरान हमारे महान सैन्यतंत्र ने विदेशी किसी शत्रु के खिलाफ कोई युद्ध नहीं लड़ा है रंगबिरंग सर्जिकल मीडिया ब्लिट्ज के सिवाय।सार युद्ध गृहयुद्ध महाभारत सलवाजुड़ुम बहुजनों के खिलाफ,आदिवासियों के खिलाफ कारपोरेट हित में सलवा जुड़ुम है और बहुजन सितारे इस युद्ध के बारे में,सलवा जुड़ुम के बारे में,मुक्तबाजार के बारे में,यहां तक नोटबंदी के डिजिटल कैसलैस बहुजन सफाया अभियान के बारे में मौन हैं।

हम जो लोग इस तिलिस्म को तोड़ने में लगे हैं,वे आपको दुश्मन नजर आते हैं और सिर्फ ब्राह्मणों को गरियाकर मनुस्मृति के जो सिपाहसालार बने हैं ,उनकी वानर सेना में तब्दील आपको हमारी भाषा भी समझ में नहीं आ रही है।हमें सख्त अफसोस है।

अमेरिकी नागरिकों को सत्ता सौंपने और आप्रवासियों के खिलाफ नस्ली गुस्सा की दुधारी तलवार से पापुलर वोटों से हारने के बावजूद बड़े निर्णायक राज्यों में बहुमत के एकमुश्त वोटों के बहुमत से समुची दुनिया अब ट्रंप महाराज के हवाले हैं।हमारे यहां सिंहासन पर उन्हीं का खड़ाऊं है।

इस जनादेश के बाद अमेरिका का क्या होना है और बाकी दुनिया का क्या होना है,उसे दुनियाभर के विरोध प्रतिरोध से बदल पाने की कोई संभावना नहीं है।

गौरतलब है कि 16 मई ,2014 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था,संसदीय प्रणाली और नीति निर्माण पद्धति से लेकर कर प्रणाली ,बुनियादी सेवाओं और जरुरतों के सारे परिदृश्य सिरे से बदल गये हैं।आम जनता के लिए अब कोई योजना नहीं है न विकास है।लाटरी के झुनझुना मोबाइल परमाणु बम है।हिरोशिमा नागासाकी महोत्सव है।भुखमरी और मंदी,बेरोजगारी और बेदखली विस्थापन का भविष्य है।

यूपी जीतने के लिए कायदा कानून और अर्थव्यवस्था से लेकर मुक्त बाजार के व्याकरण को जैसे ताक पर रखकर नोटबंदी जारी की गयी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देश के कारपोरेट घरानों के एकाधिकार वर्चस्व के लिए जैसे जबरन कैशलैस डिजिटल इंडिया बनाने के लिए अर्थव्यवस्था को ही लाटरी में तब्दील कर दिया गया है,तो 2014 के उस जनादेश की परिणति के बारे में मतदाताओं को अपने वजूद के लिए सोचना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।इसलिए जनादेश से कुछ बदलने के आसार कम है।

एकबार फिर यूपी के रास्ते हिंदुस्तान फतह करने के लिएसत्ता वर्ग बुनियादी मसलों को किनारे करके हिंदुत्व की सुनामी राम के सौगंध के साथ बनाने में जुटे हैें और यूपी की जनता को ही वानर सेना में तब्दील करके हिंदुस्तान फतह करने की चाकचौबंद तैयारी है।जिसका प्रतिरोध अगर संभव है तो वह करिश्मा यूपी वालों कोही कर दिखाना है।

दूसरी ओर,चुनाव जीतने के मकसद से बजट के इस्तेमाल के इरादे के तहत पहली जनवरी को ही बजट पेश करने की जिद को सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की हरी झंडी मिल जाने से,फिर उस बजट में पांच राज्यों में विधानसभा के मद्देनजर चुनाव आयोग ने बजट प्रावधान पर जो निषेधाज्ञा लागू कर दी है,उससे पांचों राज्यों के लिए और उनकी जनता के लिए यह नोटबंदी के बाद दुधारी मार है।

उत्तराखंड,मणिपुर और गोवा के लोग सालभर अगर झुनझुना बजाने के लिए छोड़ दिये गये,तो आगे उनका गुजारा कैसे होगा,यह नोटबंदी करने वाले झोलाछाप विशेषज्ञ ही तय करने वाले हैं।हमारे पास झुनझुना बजाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है।

नशाग्रस्त पंजाब में हालात और खराब होंगे और यूपी कितना और पिछड़ जायेगा,यह बाद में देखा जाना है। झुनझुना बजाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है।

भारत में बहुमत का जलवा हम अक्सर समझ नहीं पाते और चुनाव से पहले और चुनाव के बाद जनादेश की भूमिका,देश की अर्थव्यवस्था,कायदा कानून,बहुलता विविधता, लोकतांत्रिक संस्थानों पर उसके दीर्घस्थायी असर,राष्ट्रीय संसाधनों से लेकर जलवायु पर्यावरण,भूख,बेरोजगारी जैसी बुनियादी चुनौतियों, समता और न्याय के लक्ष्य,बुनियादी सेवाओं और जरुरतों के बारे में वोट डालने से पहले हम कतई नहीं सोचते।

अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रबंधन,नीति निर्धारण के बारे में बहुजनों की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती,यही मनुस्मृति के फासिस्ट नस्ली राजकाज की पूंजी है।

भावनाओं में बहकर हवाओं के इशारों से हम अपना नुमाइंदा चुनकर जो जनादेश बनाते हैं,उसे सामूहिक आत्महत्या कहे तो वह भी कम होगा।

हर बार हम जनादेश मार्फत सामूहिक आत्महत्या ही करते हैं।

मसलन अमेरिका में पचास राज्य हैं और उनकी किस्मत का फैसला चुनिंदा कुछ राज्यों के वोट से हो जाता है जैसे डोनाल्ड ट्रंप का चुनाव अमेरिकी बहुमत के खिलाफ हो गया और इसका खामियाजा सिर्फ अमेरिका ही नहीं,बाकी दुनिया को भी भुगतना होगा।

जनादेश यूपी वालों का होगा और उसका दीर्घकालीन असर पूरे देश पर होना है।

भारत में भी यूपी बिहार तमिलनाडु मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भावनाओं की सुनामी से पूरे मुल्क को फतह करने का सिलसिला आजाद भारत का लोकतंत्र है।

यूपी का जनादेश हमेशा पूरे देश की किस्मत का फैसला करने वाला होता है और इसीलिए देश के सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री यूपी से ही चुने जाते रहे हैं।

ओड़ीशा, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ ,केरल,गोवा,पंजाब,राजस्थान और पूर्वोत्तर के राज्यों से राष्ट्रीय नेतृत्व का उभार असंभव है।

हालांकि गुजरात से नरेंद्र मोदी का उत्थान एक अपवाद ही कहा जा सकता है लेकिन यह भी जनप्रतिनिधित्व या लोकतंत्र का करिश्मा नहीं है।हिंदुत्व के एजंडे के मुताबिक भावनाओं की जिस सुनामी से मोदी देश के नेता बने, उस तरह किसी माणिक सरकार,चंद्रबाबू नायडु या नवीन पटनायक और यहां तक कि किसी ममता बनर्जी या नीतीश कुमार के भी  के प्रधानमंत्री बनने के आसार नहीं है।

अजूबा लोकतंत्र हमारा है,जहां राजनीति में स्त्री के परतिनिधित्व से पितृसत्ता के तहत पूरी राजनीति लामबंद है।

उत्तराखंड जैसा राज्य और पूर्वोत्तर के तमाम राज्य केंद्र सरकार की मेहरबानी पर निर्भर है क्योंकि राष्ट्रीय नेतत्व के लिए ये राज्य निर्णायक नहीं है।

ऐसे राज्यों में नेतृत्व न पिद्दी है और न पिद्दी का शोरबा है।

बहरहाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है आम बजट को विधानसभा चुनाव के बाद पेश करने पर विचार करें, ताकि उत्तर प्रदेश के विकास व जनता के हित में योजनाओं की घोषणा हो सके। अखिलेश ने अपने पत्र में चुनाव आयोग की ओर से भारत सरकार को 23 जनवरी को जारी किए गए पत्र का हवाला देते हुए लिखा है।इस पत्र में आयोग ने निर्देश दिया है कि भारत सरकार के आगामी बजट में चुनाव आचार संहिता से प्रभावित पांच राज्यों के हित में कोई भी विशेष योजना घोषित नहीं की जाए।

इसकी कोई सुनवाई होने के आसार नहीं है।

पीएम को किसी सीएम के खत से हालात बदलने बाले नहीं है।

कदम कदम कदमबोशी करने वाले बागी हो नहीं सकते।

देश किसी कुनबे का महाभारत या मूसलपर्व भी नहीं है कि धोबीपाट से जीत लें।

अखिलेश का भी इसे चुनावी मुद्दा बनाने के अलावा हकीकत की चुनौतियों से निबटने का कोई इरादा लग नहीं रहा है क्योंकि उन्होंने यूपी को हिंदुत्व के एजंडे का गिलोटिन बनाने से रोकने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया है बल्कि फासिज्म के राजकाज को मजबूती से अंजाम देने में वे सबसे आगे रहे हैं।

इसके उलट यूपी से सबसे ज्यादा लोकसभा सदस्य और राज्यसभा सदस्य हैं तो राष्ट्रपति चुनाव में अप्रत्यक्ष मतदान में यूपी के वोट का मूल्य सबसे ज्यादा है।

अखिलेश यादव अगर बाहैसियत सीएम यूपी वालों का ईमानदारी से नुमांइदंगी कर रहे होते तो यूपी की सरजमीं का बेजां इस्तेमाल रोककर नरसंहारी अश्वमेधी अभियान को रोकने में उनकी कोई न कोई पहल जरुर होती।

आवाम की रहमुनमाई करने के बजाय अखिलेश ने यूपी और यूपीवालों को फासिज्म का सबसे उपजाऊ उपनिवेश बना दिया है।

अंदेशा यही है कि इस खुदकशी का अंजाम यूपी के जनादेश में भी नजर आयेगा।

आजादी के बाद के मतदान का पूरा इतिहास उठा लें तो राष्ट्र के भविष्य निर्माण में सकारात्मक नकारात्मक दोनों प्रभाव हमेशा यूपी का ज्यादा रहा है।

भारत की राजनीति जिस हिंदुत्व के एजंडे से सिरे से बदल गयी है,उसके पीछे जो आरक्षण विरोधी आंदोलन हो या राममंदिर आंदोलन और बाबरी विध्वंस हो,उसकी जमीन यूपी है।गुजरात नरसंहार और 1984 में सिखों के नरसंहार यूपी की ताकत,यूपी के जनादेश  के बेजां इस्तेमाल का अंजाम हैं।तो दूसरी ओर सामाजिक बदलाव के आंदोलन  के तहत यूपी में भाजपा 16 साल से और कांग्रेस 29 साल से सत्ता से बाहर है।

क्या यूपी वालों का नेतृत्व करके फासिज्म के खिलाफ लड़ाई में अखिलेश आगे आने को तैयार हैं,इस सवाल का जबाव यूपी वालों को खुद से जरुर पूछना चाहिए और उसके मुताबिक फैसला करना चाहिए कि उनका जनादेश क्या हो।

यूपी वाले अपनी अपनी  निर्णायक ताकत को समझें और जनादेश को समूचे देश के लिए सामूहिक आत्महत्या बनने न दें,आज सबसे बड़ी चुनौती यही है।

अखिलेश ने अपने पत्र में लिखा है कि अगर चुनाव से पहले बजट पेश होता है तो यूपी के लिए आप किसी योजना का ऐलान नहीं कर सकते, ऐसे में यूपी का बड़ा नुकसान होगा। यूपी राज्य जिसमें देश की बड़ी जनसंख्या निवास करती है को भारत के आगामी सामान्य/रेल बजट में कोई विशेष लाभ/योजना प्राप्त नहीं हो सकेगी, जिसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव यूपी के विकासकार्यों एवं यहां के 20 करोड़ निवासियों के हितों पर पड़ेंगा। साथ ही अखिलेश ने यह भी लिखा है कि 2012 में राज्यों के चुनाव की वजह से चुनाव बाद बजट पेश किया गया था।

अखिलेश यादव ने कहा कि ऐसी स्थिति में अब प्रबल संभावना बन गई है कि उत्तर प्रदेश को आम बजट का कोई विशेष लाभ या योजना मिलने नहीं जा रही है। अखिलेश ने लिखा है जनसंख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, ऐसे में यह उत्तर प्रदेश के साथ इंसाफ नहीं होगा। इसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव प्रदेश के विकास कार्यों और यहां के 20 करोड़ निवासियों के हितों पर पड़ेगा। अखिलेश ने याद दिलाया कि फरवरी-मार्च 2012 में भी राज्यों के आम चुनावों को देखते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार ने चुनावों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए खुद ही निर्वाचन के बाद सामान्य और रेल बजट पेश किया था। उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंधन के बावजूद बहुकोणीय मुकाबला होने की उम्मीद है। यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 224 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इसके बाद बसपा को 80, बीजेपी को 47, कांग्रेस को 28, रालोद को 9 और अन्य को 24 सीटें मिलीं थीं।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने केंद्र से कहा कि बजट में वह पांच राज्यों के बारे में कोई विशेष घोषणा न की जाए, जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। आयोग ने एक फरवरी को बजट पेश करने को मंजूरी दे दी है।

गौरतलब है कि पंजाब और गोवा में मतदान 4 फरवरी से शुरू होना है, वहीं उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से होगा. पांचों राज्यों में 11 मार्च को नतीजे आएंगे। 16 राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से आग्रह किया था कि वह सरकार से चुनाव के बाद केंद्रीय बजट पेश करने के लिए कहे ताकि इसका उपयोग पांच राज्यों में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जा सके, जहां चुनाव होने हैं। केंद्र सरकार के एक फरवरी को बजट पेश करने के खिलाफ दाखिल याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने बीते सोमवार को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि आम बजट केंद्रीय होता है और इसका राज्यों से कोई लेना-देना नहीं है।



एचडीएफसी बैंक ने अक्टूबर से लेकर दिसंबर की तिमाही में 4500 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। इस वजह है कि आय वृद्धि 18 साल के निचले स्तर में गिरावट और लागत पर खर्चा अधिक हो गया। एचडीएफसी बैंक ने बताया कि सितंबर 2016 में बैंक में 95,002 कर्मचारी थे, जो दिसंबर में 5 प्रतिशत घटकर 90,421 तक आ गए।

इकॉनोमिक्स टाइम्स के मुताबिक, एचडीएफसी बैंक ने कहा कि उसका मुनाफा 15 प्रतिशत बढ़कर 3,865 करोड़ रुपए हो गया, जो एक साल पहले 3,357 करोड़ रुपए था। लेकिन यह जून 1998 से उसकी सबसे कम ग्रोथ है। बॉन्ड और करंसी में प्री-टैक्स प्रॉफिट भी 253 करोड़ रुपए रह गया, जो पिछले साल 513 करोड़ था। नोटबंदी के बाद बैंकों की इनकम भी मात्र 9.4 प्रतिशत ही बढ़ी है।

मंगलवार को जारी हुए नतीजों में कहा गया कि बैंक के परिचालन खर्च में 0.55 प्रतिशत की गिरावट आई है और दिसंबर के अंत में यह 4.843 करोड़ रह गया, जो सितंबर में 4, 870 करोड़ रुपए था। इसके अलावा बाकी परिचालन खर्च भी 1.83 प्रतिशत गिरकर 3,154 करोड़ पर आ गया। सितंबर में यह 3,213 करोड़ रुपए था। हालांकि कर्मचारी लागत में 1.93 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 1,689 करोड़ से 1,657 करोड़ तक आ गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी बैंक द्वारा एक तिमाही में इतनी बड़ी छंटनी का यह पहला मामला है, जो आगे भी जारी रह सकता है अगर स्थितियां नहीं सुधरीं। बैंक ने संकेत दिया है कि उसका फोकस फिलहाल उत्पादकता पर है और भविष्य में हायरिंग में गिरावट रहने वाली है। बैंक के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर परेश सुखतांकर ने बताया कि छंटनी कर्मचारियों की उत्पादकता और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने का एक नियमित हिस्सा है।



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Wednesday, January 25, 2017

পি. আর. ঠাকুর কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর Eminent Bengali writer Kapil Krishna Tahkur wrote about Matua Icon PR Thakur`s role in the Constituent assembly

পি. আর. ঠাকুর
কপিল কৃষ্ণ ঠাকুর
পি.আর.ঠাকুর, বিশেষত সংবিধান পরিষদে তাঁর ভূমিকা নিয়ে অনেকেই মনগড়া মন্তব্য করেন, যা বিভ্রান্তিকর। এ বিষয়ে আলোকপাত করার জন্য অনেক অনুরোধ জমা হয়ে আছে। সেই তাগিদ থেকেই এই সংক্ষিপ্ত উপস্থাপনা: সংবিধান পরিষদের কার্য বিবরণী অনুসরণ করে দেখা যাচ্ছে, বঞ্চিত জনগোষ্ঠীর স্বার্থে সব চেয়ে উচ্চগ্রামে যিনি কথা বলেছেন, তিনি পি.আর.ঠাকুর। সুকৌশলী ও দূরদর্শী বাবাসাহেব আম্বেদকর সংবিধান পরিষদে হয়ে উঠেছিলেন সমন্বয়বাদী তথা সকলের প্রতিনিধি। পরিষদের প্রথম সভা হয় ৯.১২.৪৬ তারিখে। ড. আম্বেদকর ১৭.১২.৪৬ তারিখে প্রথম ভাষণেই ( সংবিধানের Aims & objects সম্পর্কে) নিজের এই ভাবমূর্তি তুলে ধরেন—"I know today we are divided politically, socially and economically, we are a group of warring camps and I may go even to the extent of confessing that I am probably one of the leaders of such a camp. But, sir, with all this I am quite convinced that given time and circumstances nothing in the world will prevent this country from becoming one.(Applause). With all our caste and creeds, I have not the slightest hesitation that we shall in some form be a united people." (Cheers). এই সূত্রে ১৯.১২.৪৬ তারিখে পি.আর.ঠাকুর বলেন, "Sir, Dr. Ambedkar did not say anything last time about the Depressed Classes, so I consider it a great honour to speak to the members of the Constituent Assembly on behalf of the Scheduled Castes in general of India." দীর্ঘ ভাষণের শেষ দিকে তাঁর বিস্ফোরক ঘোষণা ছিল: "We the Depressed Classes are the original inhabitants of this country. We do not claim to have come to India from outside as conquerors, as do the Caste Hindus and the Muslims. As a matter of fact, India belongs to us and we cannot tolerate the idea that this ancient mother country of ours will be divided between the Muslims and the Caste Hindus only…."
ড. আম্বেদকর যেখানে জোর দিয়েছেন, শত জাত-বর্ণে বিভক্ত হওয়া সত্ত্বেও ভারতবর্ষে একদিন সবাই মিলে মিশে আমরা এক হয়ে যাব; পি.আর.ঠাকুর সেখানে নিজেকে নিপীড়িত জনগোষ্ঠীর প্রতিনিধি হিসেবে তুলে ধরে বলেছেন, এই ভারতবর্ষের আমরাই মূলনিবাসী, সুতরাং আমাদের স্বার্থ বিপন্ন করে শুধুমাত্র বহিরাগতদের মধ্যে এই প্রাচীন মাতৃভূমিকে ভাগ-বাঁটোয়ারা করে দেবার চিন্তাভাবনা আমরা কিছুতেই বরদাস্ত করব না।(ক্রমশঃ) 

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Tuesday, January 24, 2017

जब तक आधी आबादी उठ खड़ी नहीं आजाद,तब तक लोकतंत्र की हर लड़ाई अधूरी है। पलाश विश्वास


अब लड़ाई मैराथन है,यूपी के फर्राटे क आगे भी सोचें!

जब तक आधी आबादी उठ खड़ी नहीं आजाद,तब तक लोकतंत्र की हर लड़ाई अधूरी है।

पलाश विश्वास

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीति का जो वीभत्स चेहरा सामने है,नतीजा कुछ भी हो हालात बदलने के आसार नहीं हैं।

इसबीच भक्तों के लिए खुशखबरी है कि नई विश्वव्यवस्था के ग्लोबल हिंदुत्व के ईश्वर आज रात ग्यारह बजे दुनिया के चार नेताओं से बात करने के बाद भारत के नेतृत्व से बतियायेंगे।ओबामा के लंगोटिया यार को डान डोनाल्ड ने भाव कुछ कम दिया है,ऐसा बी न सोचें।असल में हम तो उन्हीं के प्रजाजन हैं और वे स्वंय मनुमहाराज हैं।सबसे बड़े उपनिवेश को और चाहिए भी तो क्या,बताइये।लाइव देखिते रहिये चैनल वैनल।

यह भी मत कहिये कि भाई,हद है कि बलि,जब ट्रम्प ने यूएस इलेक्शन जीता था, तब मोदी उन्हें सबसे पहले फोन करने वाले नेताओं में शामिल थे।

अभी 2014 के बाद नरसंहारी अश्वमेध अभियान तेज जरुर हुआ है लेकिन हालात दरअसल 2014 से पहले कुछ बेहतर नहीं थे।नरसंहार के सिलसिले में यह फासिज्म का राजकाज कारपोरेट नरसंहार का हिंदुत्व एजंडा ग्लोबल है।प्रगति यही है।

हजारों बार पिछले पच्चीस सालों से घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा हम देते रहे हैं।उन्हें दोहराये बिना सिर्फ इतना कहना है कि हम एक के बाद एक नरसंहार के घटनाक्रम से होकर पंजाब की पांचों नदियां खून से लबालब,सारा का सारा गंगा यमुना नर्मदा ब्रह्मपुत्र कृष्णा कावेरी गोदावरी के उपजाऊ मैदानों से लेकर हिमालय, समुदंर, अरण्य, विंध्य, अरावली, सतपूड़ा,रेगिस्तान रण के साथ साथ एक एक जनपद को मरघट में तब्दील होने के नजारे देखते हुए मौजूदा मुकाम पर निःशस्त्र मौनी बाबा जय श्री जयश्री बजंरगी केसरिया हो चुके हैं।

पच्चीस साल के मुक्तबाजार के सफरनामे में फर्क सिर्फ यही है।

सारी विचारधाराओं का आत्मसमर्पण उपलब्धि है।

मौलिक अधिकारों का हनन उपलब्धि है।

सारे माध्यमों का,विधाओं,विषयों का अवसान है।

बहुलता विविधता सहिष्णुता अमन चैन का विसर्जन है।

दसों दिशाओं में आगजनी,हिंसा की दंगाई राजनीति है।

इतिहास के अंधेरे ब्लैकहोल में गोताखोरी है और ज्ञान मिथकों में सीमाबद्ध है।

नागरिक और मानवाधिकारों का हनन उपलब्धि है।

संविधान और कायादे कानून का कत्लेआम का नवजागरण है।

सारे राष्ट्रीय संसाधनों संपत्तियों का निजीकरण नीलामी विनिवेश उपलब्थि है।

बिल्डर प्रोमोटर माफिया राज उपलब्धि है।

रोजगार संकट आजीविका संकट पर्यावरण जलवायु संकट उपलब्धि है।

फिलवक्त कैशलैस डिजिटल इंडिया का फाइव जी स्टार पेटीएम जिओ बाजार बम बम है।हर बम परमाणु बम है।आगे भुखमरी मंदी और हिरोशिमा नागासाकी महोत्सव हैं।

फर्क यही है कि मुक्तबाजार में सबसे बड़ा रुपइया है,न बाप बड़ा है न भइया और न मइया।नोटबंदी के पहले जो हाल रहा है,अबभी वहीं हाल है।

नोटबंदी से पहले और बाद में भी डिजिटल कैशलैस इंडिया में नकदी की क्रयशक्ति हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है और हम परिवार से बेदखल हो गये हैं तो बच्चे लावारिश हो गये हैं और समाज संस्कृति सिरे से लापता हैं और हमारा सारा कामकाज और राजकाज मुक्तबाजार है।हम किसी देश के नहीं मुक्त बाजार के लावारिश गुलाम प्रजाजन हैं।

पंजाब में अस्सी के दशक से भी भयानक संकट सर्वव्यापी नशा है तो बाकी देश में भी नशा के शिकंजे में नई पीढ़ी है।

बांग्ला अखबारों में,चैनलों में  रोज रोज सिलिसलेवार ब्यौरा किसी न किसी टीनएजर या नवयुवा के नशे के शिकंजे में बाप,भाई,मां या दादी को मार देने या विवाहित युवक द्वारा पत्नी और बच्चों को निर्मम तरीके से मार देने का छप दीख रहा है।कलेजा चाक होने के बदले लोगों को इस खतरनाक केल से मजा आ रहे है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके बच्चे सही सलामत हैं और रेस में सबसे तेज दौड़ रहे हैं।हालात उलट हैं।

टुजी थ्रीजी फोर जी फाइव जी दरअसल जी नहीं,उपभोक्ता वाद के चरणबद्ध स्टार है।हमारे बच्चे हत्यारों में,अपराधियों में,बलात्कारियों में शामिल हो रहे हैं।

यह संचार क्रांति भी नहीं है।विशुध उपभोक्ता क्रांति है।अपराध क्रांति भी है यह।

सूचना,जानकारी ज्ञान सिरे से लापता हैं।

तकनीक को छोड़ सारे विषय उपेक्षित हैं।

उच्च शिक्षा शोध के बदले तकनीक और सिर्फ तकनीक है।

ज्यादा से ज्यादा कमाने,ज्यादा से ज्यादा खर्च करने और ज्यादा से ज्यादा भोग की आपाधापी भगदड़ है।सुरसामुखी बेरोजगारी है।नशा है और बेलगाम अपराध बाहुबलि राज है।सारे बच्चे इस अपराध जगत के वाशिंदे बना दिये जा रहे हैं।हम बेपरवाह हैं।

हम बेपरवाह है कि हमारे बच्चे लावारिश भटक रहे हैं।

हर विधा माध्यम में मनोरंजन भोग कार्निवाल है।

अर्थव्यवस्था या उत्पादन प्रणाली के प्रबंधन के बजाय सत्ता वर्ग के लिए रंगबिरंगी योजनाओं में खैरात बांटकर लोकलुभावन बजट या मौके बेमौके मुआवजा,लाटरी या पुरस्कार सम्मान भत्ता के जरिये या फिर खालिस घोषणाओं से,टैक्स राहत,कर्ज-पैकेज के ऐलान से  सरकारी खर्च से वोटबैंक मजबूत बनाकर नकदी बढ़ाकर बाजार में आम जनता कासारा पैसा बचत जाममाल झोंककर अनंतकाल तक इलेक्शन जीतने का मौका है।

बजट इसीलिए वित्तीय प्रबंधन नहीं वोटबैंक प्रंबंधन है।नोटों की वर्षा है।

सेवा जारी है।तकनीक ब्लिट्ज है और मनोरंजन भारी है।

देश के संसाधनों का संसाधनों का क्या हो रहा है,मेहनतकशों और बहुजनों,बच्चों और औरतों के क्या हाल हैं,बुनियादी सेवाओं और जरुरतो का किस्सा क्या है,रोजगार और आजीविका का क्या बना,उत्पादन प्रणाली या अर्थव्यवस्था की सेहत के बारे में सोचने समझने की मोबाइल नागरिकों को कोई परवाह नहीं है।

मसलन वित्तीय घाटे के सरकारी आंकड़ों पर सीएजी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सीएजी का अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2016 में वित्तीय घाटा सरकारी अनुमान से 50,000 करोड़ रुपये ज्यादा हो सकता है।सीएजी के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा बढ़ने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2016 में जीडीपी का 4.31 फीसदी वित्तीय घाटा होगा। वहीं सरकार का वित्तीय घाटा, जीडीपी का 3.9 फीसदी रहने का अनुमान है। इस तरह, सीएजी के मुताबिक सरकारी अनुमान से 50,407 करोड़ रुपये ज्यादा घाटा संभव है

मसलन नोटबंदी के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए कैबिनेट ने आज कई बड़ी योजनाओं को मंजूरी दी है।चुनाव आयोग के निषेध के बाद यह सीधे पुल मारकर छक्का है।अलग पांच राज्यों की जनता को अलग से भरमाने के बजाय थोक भाव से आम जनता के बहुमत पर सीधा निवेश है।

खेती ,कारोबार चौपट है,नकदी है नहीं लेकिन गांवों में घर बनाने या पुराने घर के विस्तार के लिए कर्ज पर ब्याज में सब्सिडी मिलेगी। इसके अलावा फसल कर्ज पर से ब्याज में राहत दी गई है।

सरकारी दावा है कि गांवों में अब घर बनाना ज्यादा आसान होगा।

कर्ज किसे मिलेगा और किसे नहीं.जाहिर है कि यह हैसियत पर निर्भर होगा।

कैबिनेट ने गांवों में घर बनाने के लिए एक नई स्कीम को मंजूरी दी है।

गांवों में नए घर बनाने या पुराने घर के विस्तार के लिए 2 लाख तक के लोन में ब्याज में सब्सिडी देने की योजना है।

सरकारी खर्च बपौती धंधा है,अपनी अपनी राजनीति के लिए जितना चाहे खर्च करो क्या कर लेगा कोई आयोग या अदालत।

वहीं नोटबंदी की मार के बाद अब किसानों को जख्म पर सरकार मरहम लगाने में जुटी है। आज कैबिनेट में किसानों को राहत देने के कुछ फैसले लिए गए हैं। किसानों को फसल पर लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए 2 महीने की मोहलत दी गई है। नोटबंदी की वजह से किसानों को 2 महीने और मोहलत दी गई है।

कैबिनेट ने वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना को भी मंजूरी दी है। इसके अलावा आईएम बिल को भी कैबिनेट मंजूरी दे दी है। अब आईआईएम से एमबीए करने वालों को डिप्लोमा की जगह डिग्री मिलेगी।

और आम नागरिक बल्ले बल्ले हैं। छप्पर फाड़ सुनहले दिनों की उम्मीद में हम मजा लूटने के मकसद से रातोंरात केसरिया फौज में शामिल हो गये हैं।

रथी महारथियों के चेहरे बदल भी जायें तो जल जंगल जमीन आजीविका रोजगार नागरिकता मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर मेहनतकशों के हक हकूक और बुनियादी सेवाओं,जरुरतों और पहचान और वजूद से बेधखल बंचित बहुजनों की रोजमर्रे की जिंदगी में बदलाव के आसार कम ही हैं।

आजादी के बाद,गणतंत्र लागू होने के बाद एक और गणतंत्र दिवस के उत्सव से पहले तक बुनियादी अंतर समानता,न्याय और स्वतंत्रता के लक्ष्यों के मद्देनजर कभी नहीं आया है।हालात आजादी से पहले थे,उससे कहीं बदतर हैं।पहले कमसकम ख्वाब थेषख्वाबों को अंजाम देने के विचार थे।जनांदोलन थे।अब सिर्फ मुक्तबाजार है।मौकापरस्ती है।

बहरहाल तमिलनाडु में आत्मसम्मान वाया सिनेमा अब जल्लीकट्टू है। जल्लीकट्टू पर आज भी तमिलनाडु जल रहा है। यह भी अलग तरह का राममंदिर निर्माण है।

बुनियादी बदलाव की कोई सोच नहीं,कोई ख्वाब नहीं किसी भी भावनात्मक मुद्दे पर जब चाहो,तब पूरे देश को आग में झोंक दो।

आंदोलन भी सेलिब्रेटी शो लाइव सिनेमा ब्लिट्ज है।

जबकि जड़ों मे न खाद है और न पानी है।

न मिट्टी है कहीं किसी किस्म की।

सबकुछ हवा हवाई है।

बुनियादी मुद्दे और बुनियादी सवाल भी हवा हवाई है।

आज भी हजारों की संख्या में लोगों ने मरीना बीच पर जमा होकर विरोध प्रदर्शन किया। जल्लीकट्टू को कल तमिलनाडु विधानसभा में मान्यता मिलने के बाद आज चेन्नई पुलिस ने इसके समर्थन में प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना शुरू कर दिया है। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के बीच घुसकर असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ रहे हैं।

तमाशा अभी जारी है कि व जल्लीकट्टू बिल पास होने के बाद पड़ोसी राज्य कर्नाटक ने भी उनके कंबाला यानि भैंस दौड़ पर लगे प्रतिबंध को हटाने की केंद्र सरकार के सामने मांग रखी है।महाराष्ट्र में बैलगाड़ी आंदोलन जोर पकड़ रहा है।

गोवंश पर गहराते संकट पर संघ परिवार मौन है।

वहीं अभिनेता कमल हासन ने ट्वीट करके कहा कि वो जल्लीकट्टू के समर्थन वाले बिल की मांग 20 सालों से कर रहे हैं।

फिलवक्त पक्ष प्रतिपक्ष दोनों हिंदुत्व का मनुस्मृति पुनरूत्थान का मुक्तबाजार है।सूबे की सरकारें संघ परिवार की नहीं भी बनीं तो हालात में फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि सूबे का राजकाज सिरे से केंद्र की मेहरबानी है और सूबे में सरकार चाहे किसी की बने,केंद्र के साथ उसके नत्थी हो जाने और उसके जरिये केंद्र का केसरिया एजंडा पूरा होते रहने का सिलसिला जारी रहना नियति है।

मसलन ममता बनर्जी हो या अखिलेश यादव या बीजू पटनायक हो या चंद्रबाबू नायडु या हरीश रावत,आम जनता के हकहकूक पर कुठाराघात और आम जनता के विरोध के अधिकार,मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात या जल जमीन जंगल आजीविका से  बेदखली और अंधाधुंध शहरीकरण और अंधाधुंध औद्योगीकरण के एजंडा जस का तस रहना है।बहुजनों का दमन सर्वत्र है।स्त्री के विरुद्ध अत्याचार सुनामी सर्वत्र है।सर्वत्र मेहनतकशो का एक समान सफाया है।युवा हाथ सर्वत्र बेरोजगार हैं।

गौरतलब है कि बंगाल में 35 साल तक वाम शासन के दौरान भी सत्ता और राष्ट्र के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन आया नहीं है या फिर बहन मायावती के चार चार बार यूपी के मुख्यमंत्री बन जाने से न अंबेडकर का मिशन तेज हुआ है और न मनुस्मृति राजकाज पर कोई अंकुश लगा है।

गौरतलब है कि 1914 से पहले 1991 के बाद बनी तमाम सरकारें अल्मत सरकारें रही हैं।संसद में हाल में हाशिये पर जाने वाला वाम भी लंबे समय तक कमसकम मनमोहन राजकाज के दस साल तक निर्णायक भी रहे हैं,लेकिन जनविरोधी नीतियों और कानून सर्वदलीय सहमति से बनते रहे हैं।संसद और केंद्रीय मंत्रिमंडल तक को हाशिये पर रखकर राजकाज जारी है और हम इसे अभी भी लोकतंत्र कह रहे हैं।

अब राजनीति न कोई विचारधारा है, न बदलाव के ख्वाब है राजनीति और न उसमें जनता की आशा आकांक्षाओं की कोई छाप है।

धनबल बाहुबल की राजनीति विशुध जाति धर्म का समीकरण है जो साध लें ,वही सिकंदर है।यह बेहद खतरनाक स्थिति है कि आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं है।

लोकतंत्र में बहुमत अभिशाप बन गया है।

जर्मनी ने इस बहुमत का मोल चुकाया है।

अब अमेरिका की बारी है।

हम आजादी के पहले दिन से किश्त दर किश्त मोल चुका रहे हैं।

शासकों को बदल डालने की गरज से हम पुराने या फिर नये शासक पहले से भी खराब चुन रहे हैं।वाम अवसान के बाद का परिवर्तन वही साबित हुआ है।

यूपी बिहार में सत्ता में बहुजनों की भागेदारी और बाकी देश में भी तमाम बहुजन सत्ता सिपाहसालार लेकिन न अस्पृश्यता खत्म हुई है और न जाति धर्म लिंग नस्ल के आधार पर भेदभाव खत्म हुआ है क्योंकि राजनीति में सिर्फ चेहरे बदल रहे हैं,सत्ता समीकरण बदल रहा है ,बाकी तंत्र मंत्र यंत्र और हिंदुत्व का एजंडा वही है,जिसके तहत भारत का विभाजन हो गया और बंटवारे का सिलसिला अबभी जारी है।

अमेरिका के हर शहर में महिलाओं की अगुवाई में लाखों महिलाओं के सड़कों पर उतर आने पर सविता बाबू ने सवाल किया कि ये लोग मतदान के दौरान क्या कर रहे थे।

संजोगवश खुद जिनके खिलाफ यह जनविद्रोह है,उन्हीं डोनाल्ड ट्रंप का सवाल भी यही है।मुद्दे की बात तो यह है कि वियतनाम युद्ध के बाद सत्ता के खिलाफ अमेरिकी नागरिकों के इतने बड़े विरोध प्रदर्शन का कोई इतिहास नहीं है।

बहुमत जनादेश के बावजूद आधी आबादी और आधा से जियादा अमेरिका को नये राष्ट्रपति को अपना राष्ट्रपति मानने से इंकार किया है।

वाशिंगटन मार्च का नारा है,यह मैराथन दौड़ है,फर्राटा कतई नहीं है।

राजनीति भी दरअसल मैराथन दौड़ है,फर्राटा है नहीं।

बहुमत और जनादेश के दम पर जनता के हकहकूक को कुचलने रौंदने का हक हुकूमत को नहीं है।

यह कोई दासखत नहीं है कि एकदफा वोट दे दिया तो पांच साल तक चूं भी नहीं कर सकते।

सबसे बड़ी बात जो हम शुरु से बार बार कह रहे हैं,वह यह है कि जब तक आधी आबादी उठ खड़ी नहीं आजाद,तब तक लोकतंत्र की हर लड़ाई अधूरी है।

ऐसा भी कतई नहीं है कि अमेरिकी महिलाएं भारत की महिलाओं की तुलना में दम खम में कुछ ज्यादा मजबूत हैं या उनकी औसत शिक्षा भारत की महिलाओं से कुछ कम है।

पितृसत्ता और मनुस्मृति के दोहरे बंधन में भारत की महिलाएं जो सबसे ज्यादा मेहनतकश हैं,सिरे से या दासी ,या शूद्र या अस्पृश्य या बंधुआ या देवदासी हैं या सिर्फ देवी हैं और उनका कोई वजूद नहीं है।

मतलब  यह है कि आजादी से पहले हो गये सती प्रथा उन्मूलन,विधवा विवाह,स्त्री शिक्षा जैसे क्रांतिकारी सुधारों के बावजूद भारत में स्त्री सशक्तीकरण की कोई जमीन नहीं है।कुछ महिलाओं के सितारे की भांति चमक दमक के बावजूद भारत में स्त्री अभी अपने पांवों पर खड़ी नहीं हो सकती।सबसे पहले हकीकत की यह जमीन बदलने की अनिवार्यता है,जिसके बिना लोकतंत्र की कोई खेती सिरे से अंसभव है।

जब आधी आबादी पूरीतरह बंधुआ है और पंचानब्वे फीसद बहुजनों को जाति धर्म नस्ल भूगोल जीवन के हर क्षेत्र से हर हकहकूक से बेदखल कर दिया गया है,तब लोकतंत्र की खुशफहमी के सिवाय हमारी राजनीति क्या है,इस सबसे पहले समझ लें।

इस अल्पमत वर्चस्व की रंगभेदी पितृसत्ता के खिलाफ हमारी मर्द राजनीति खामोश है,इसलिए प्रतिरोध की जमीन कहीं बन ही नहीं रही है और न बहुमत के सिवाय अल्पमत की कहीं कोई सुनवाई है और न बंधुआ बहुजनों या आधी आबादी स्त्रियों की किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई या रिहाई है।

हिंदुत्व की मुख्यधारा से एकदम अलहदा आदिवासी भूगोल और हिमालयी क्षेत्रों में प्रतिरोध की संस्कृति शुरु से है क्योंकि वहां पितृसत्ता हो न हो,स्त्री का नेतृत्व स्थापित है।

उत्तराखंड,मणिपुर,झारखंड और छत्तीसगढ़ के अलावा  पूरे आदिवासी भूगोल में स्त्री की भूमिका नेतृत्वकारी है तो राष्ट्र और सत्ता के दमन के खिलाफ भी उनकी हकहकूक की आवाजें हमेशा बाबुलंद गूंजती रही हैं।

देश के बाकी भूगोल में यह लोकतंत्र अनुपस्थित है।

क्योंकि पितृसत्ता के भूगोल में कोई स्त्रीकाल नहीं है।

भारत में हालात बदलने के लिए गांव गांव से,हर जनपद से राजधानी की ओर  स्त्री मार्च का मैराथन शुरु करना जरुरी है।


मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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