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Friday, July 14, 2017

खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा


खेती की तरह आईटी सेक्टर में भी खुदकशी का मौसम

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

पलाश विश्वास

नोटबंदी और जीएसटी के निराधार आधार चमत्कारों के मध्य अब किसानों मजदूरों के अलावा इंजीनियरों की खुदकशी की सुर्खियां बनने लगी है।प्रधान सेवक अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान महाबलि ट्रंप से हथियारों और परमाणु चूल्हों का सौदा तो कर आये लेकिन अमेरिकी नीतियों की वजह से खतरे में फंसे आईटी क्षेत्र में लगे लाखों युवाओं के लिए एक शब्द भी खर्च नही किया।अभी पिछले  गुरुवार को पुणे की एक होटल की बिल्डिंग से कूदकर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी जान दे दी। कमरे में मिले सुसाइड नोट में मृतक इंजीनियर ने आईटी क्षेत्र में जॉब सिक्योरिटी नहीं होने की वजह से खुदकशी  कर ली।

यह आईटी सेक्टर में गहराते संकट के बादलों का सच है,जिससे भारत सरकार सिरे से इंकार कर रही है।

गोरक्षा समय में पहले करोड़ नौकरियां पैदा करने के सुनहले दिनों के ख्वाब दिखाये गये और अब जीएसटी के जरिये रोजगार सृजन की बात की जा रही है।सुनहले दिनों के ख्वाब में युवाओं का न रोजगार है और न कोई भविष्य।जीवन साथी चुनना भी मुश्किल है।फर्जी तकनीकी शिक्षा के दुश्चक्र में परंपरागत शिक्षा से वंचित इस युवा पीढ़ी के हिस्से में अंधेरा ही अंधेरा है।

यह सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं है कि आप राहत की सांस लें कि बारह हजार खेत मजदूरों और किसानों की खुदकशी के मुकाबले एक खुदकशी  के मामले से बदलता कुछ नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले कई दिनों से आईटी सेक्टर में छाई मंदी को लेकर इस प्रोफेशन से जुड़े लोग अपने करियर को लेकर बेहद चिंतित हैं। आईटी प्रोफेशनल्स को कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा है। बीते महीनों आई एक खबर के मुताबिक, इन्फोसिस कर्मचारियों को नौकरी से निकालने वाली थी। इससे पहले भी दूसरी कंपनियां जैसे विप्रो, टीसीएस और कॉगनिजेंट भी अपने यहां कर्मियों की छंटनी कर चुकी हैं। इसी बात से चिंतित होकर गुरुप्रसाद ने आत्महत्या कर ली।


आईटी सेक्टर में भारी छंटनी के सिलसिले में कंपनियों ने कार्यदक्षता के मुताबिक नवीकरण की बात की तो भारत सरकार की ओर से कह दिया गया कि आईटी सेक्टर में कोई खतरा है ही नहीं।क्योंकि कंपनियां किसी की छंटनी नहीं कर रही है,सिर्फ कुछ लोगों के ठेके का नवीकरण नहीं किया जा रहा है।

मानव संसाधन से जुड़ी फर्म हेड हंटर्स इंडिया ने हाल में कहा है कि कि नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के कारण भारतीय आईटी क्षेत्र में अगले तीन साल तक हर साल 1.75-2 लाख इंजीनियरों की सलाना छंटनी होगी। हेड हंटर्स इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के लक्ष्मीकांत ने मैककिंसे एंड कंपनी द्वारा 17 फरवरी को भारतीय सॉफ्टवेयर सेवा कंपनियों के मंच नासकाम इंडिया लीडरशिप फोरम को सौंपी गई रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए कहा, "मीडिया में खबर आई है कि इस साल 56,000 आईटी पेशेवरों की छंटनी होगी, लेकिन नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप खुद को ढालने में आधी अधूरी तैयारी के चलते तीन साल तक हर साल वास्तव में 1.75-2 लाख आईटी पेशेवरों की छंटनी हो सकती है।"




श्रमकानूनों में सुधार की वजह से श्रम विभाग और लेबर कोर्ट की कोई भूमिका नहीं रह गयी है।ठेके पर नोकरियां तो मालिकान और प्रबंधकों की मर्जी है।वे अपने पैमाने खुद तय करते हैं और उसी हिसाब से कर्मचारियों की छंटनी कर सकते हैं ।कर्मचारियों की ओर से इसके संगठित विरोध की संभावना भी कम है।क्योंकि निजीकरण,विनिवेश और आटोमेशन के खिलाफ अभी तक मजदूर यूनियनों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया है।नये आर्तिक सुधारों की वजह से ऐसे प्रतिरोध लगभग असंभव है।


डिजिटल इंडिया में सरकारी क्षेत्र में नौकरियां हैं नहीं और सरकारी क्षेत्र का तेजी से विनिवेश हो रहा है।आधार परियोजना से वर्षों से बेहिसाब मुनाफा कमाने वाली कंपनी इंफोसिस भी अब रोबोटिक्स पर फोकस कर रही है।सभी क्षेत्रों में शत प्रतिशत आटोमेशन का लक्ष्य है क्योंकि कंपनियों को कर्मचारियों पर होने वाले खर्च में कटौती करके ही ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो सकता है।


दूसरी ओर मार्केटिंग और आईटी सेक्टर के अलावा पढ़े लिखे युवाओं के रोजगार किसी दूसरे क्षेत्र में होना मुश्किल है।बाजार में मंदी के संकट और कारपोरेट एकाधिकार वर्चस्व,खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी,ईटेलिंग इत्यादि वजह से मार्केंटिंग में भी नौकरियां मिलनी मुश्किल है।


नालेज इकोनामी में ज्ञान विज्ञान की पढ़ाई,उच्च शिक्षा और शोध का कोई महत्व न होने से सारा जोर तकनीकी ज्ञान पर है और मुक्तबाजार में आईटी इंजीनियरिंग ही युवाओं की पिछले कई दशकों से सर्वोच्च प्राथमिकता बन गयी है।विदेश यात्रा और बहुत भारी वेतनमान की वजह से आईटी सेक्टर में भारतीय युवाओं का भविष्य कैद हो गया है।


मुक्तबाजार से पहले कृषि इस हद तक चौपट नहीं हुई थी।नौकरी न मिले तो खेती या कारोबार का विकल्प था।लेकिन आईटी इंजीनियरों के सामने जीएसटी के जरिये हलवाई की दुकान या किराने की दुकान में आईटी सहायक के सिवाय कोई विकल्प बचा नहीं है।ऐसी नौकरी मिल भी जाये तो वह आईटी सेक्टर के भारी भरकम पगार के मुकाबले कुछ भी नहीं है।


हालत यह है कि मीडिया के मुताबिक आईटी कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाने की कोशिश में जुटा द फोरम फॉर आईटी एम्पलॉयीज (एफआईटीई) ने कहा है कि आईटी व अन्य बड़ी कंपनियों की तरफ से  छंटनी के खिलाफ विभिन्न राज्यों में श्रम विभाग के पास करीब 85 याचिका दाखिल की गई है। चेन्नई में संवाददाताओं से बातचीत में फोरम के महासचिव विनोद ए जे ने कहा, अगले छह हफ्तों में हमारे दिशानिर्देश के तहत अपनी-अपनी कंपनियों के खिलाफ करीब 100 कर्मचारी शिकायत दाखिल करेंगे।

फोरम का दावा है कि कॉग्निजेंट, विप्रो, वोडाफोन, सिनटेल और टेक महिंद्रा जैसे संगठनों के 47 कर्मचारियों ने श्रम विभाग पुणे में याचिका दाखिल की है, वहीं 13 याचिकाएं कॉग्निजेंट व टेक महिंद्रा के कर्मचारियों ने हैदराबाद में दाखिल की है। ये याचिकाएं औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 ए के तहत दाखिल की गई है, जो वैयक्तिक याचिकाओं के लिए है। उन्होंने कहा, इस अधिनियम की धारा 2के सामूहिक याचिका के लिए है। कॉग्निजेंट व अन्य कंपनियों ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि वे कर्मचारियों की छंटनी नहीं कर रहे हैं। फोरम का दावा है कि करीब 3,000 कर्मचारियों ने उनसे संपर्क किया है। इसकी योजना समर्थन के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से संपर्क की भी है।


खबरों के मुताबिक पुणे में एक इंजीनियर ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके फील्ड में जॉब सिक्योरिटी नहीं थी। मृतक गोपीकृष्ण गुरुप्रसाद (25) आंध्र प्रदेश का निवासी था। कुछ दिनों पहले ही मृतक ने पुणे में नई कंपनी जॉइन की थी। पुणे के विमानगर इलाके स्थित एक होटल के ऊपर वाली मंजिल से गुरुप्रसाद ने छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने से पहले मृतक ने अपना हाथ काटने की  कोशिश की। गुरुप्रसाद इससे पहले दिल्ली और हैदराबाद में भी नौकरी कर चुका था। मौके से पुलिस ने एक सुसाइड नोट भी बरामद किया।


नोट में मृतक ने लिखा, 'आईटी में कोई जॉब सिक्योरिटी नहीं है। मुझे अपने परिवार को लेकर चिंता होती है।' शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।


खुदकशी की इस घटना को नजर्ंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि मैककिंसे एंड कंपनी की रिपोर्ट में कहा गया था कि आईटी सेवा कंपनियों में अगले 3-4 सालों में आधे कर्मचारी अप्रासंगिक हो जाएंगे। मैककिंसे एंड कंपनी के निदेशक नोशिर काका ने भी कहा था कि इस उद्योग के सम्मुख बड़ी चुनौती 50-60 फीसदी कर्मचारी को पुन: प्रशिक्षित करना होगा क्योंकि प्रौद्योगिकियों में बड़ा बदलाव आएगा। इस उद्योग में 39 लाख लोग कार्यरत हैं और उनमें से ज्यादातर को फिर से प्रशिक्षण देने की जरूरत होगी।


बड़ी संख्या में आईटी इंजीनियरों के बेरोजगार होने या उनकी नौकरियां असुरक्षित हो जाने की स्थिति खेतों की तरह आईटी सेक्टर के बी कब्रिस्तान में तब्दील हो जाने का खतरा है।

अमेरिका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में वर्क वीजा पर कड़ाई की वजह से भारतीय सॉफ्टवेयर निर्यातक पर विशेष रूप से मार पड़ी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस  में नई प्रौद्योगिकी, रोबोटिक प्रक्रिया ऑटोमेशन और क्लाउड कंप्यूटिंग की वजह से कंपनियों अब कोई कार्य कम श्रमबल से कर सकती हैं। इसकी वजह से सॉफ्टवेयर कंपनियों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है।


भारतीय आईटी सेक्टर के प्रोफेशनल्स के छंटनी की टेंशन बाद एक और समस्या का पहाड़ उन लोगों पर टूटने लगा है। आईटी प्रोफेशनल्स को पहले अपनी जॉब तो अब अपने जीवनसाथी ढ़ढने में दिक्क्तें आ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईटी प्रोफेशनल्स से लोग शादी करने से अब कतरा रहे हैं।


मैट्रीमोनियल वेबसाइट के ट्रेंड और पारंपरिक तौर पर 'रिश्ते मिलाने वालों' को देखा जाए तो मालूम होता है कि समय बदल चुका है| 'साफ्टवेयर इंजीनियर' दूल्हों की डिमांड अब पहले के मुकाबले बहुत कम हो गई है। सूत्रों के मुताबिक सामने आया है कि इसकी मुख्य वजह है आईटी सेक्टर में अनिश्चतता और छंटनी, ऑटोमेशन से नौकरियों पर मंडराता खतरा। इसके पीछे एक बड़ी वजह मानी जा रही है अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के तहत संरक्षणवादी भावना का बढ़ना। इस वजह कई भारतीय को अमेरिका से भारत लौटना पड़ा हैं।


सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स पर जो आदर्श वर का ठप्पा लगा था वह अब कम होने लग गया है, खासतौर पर जब अरेंज मैरिज की बात हो।

एक अंग्रेजी पेपर में छपी खबर के मुताबिक एक मेट्रीमोनियल एड का जिक्र है जिसमें तमिल के रहने वाले माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए दूल्हे का ऐड छपवाया जिसके अंत में लिखा था हमें आईएएम, आईपीएस, डॉक्टर और बिजनेस मेन की तलाश है, कृपया सॉफ्टवेयर इंजीनियर कॉल न करें। शादी डॉट कॉम के सीईओ गौरव ने बताया कि, इस साल की शुरूआत से ही आईटी प्रोफेशनल्स तलाशने वाली लड़कियों की संख्या में कमी दर्ज की है।


Thursday, July 13, 2017

शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. ताराचंद्र त्रिपाठी

शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. 
ताराचंद्र त्रिपाठी

शैलेश मटियानी पर गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने अपने फेस बुक वाल पर यह बेहद प्रासंगिक,मार्मिक और वैचारिक आलेख पोस्ट किया है।पहाड़ में बटरोही के अलावा बाकी किसी साहित्यकार ने अबतक शैलेश जी के कृतित्व पर कोई खास टिप्पणी नहीं की है।

हम जब जीआईसी में गुरुजी के छात्र थे,तभी उन्होंने हमें शैलेश जी की कहानियों और उपन्यासों के जरिये पहाड़ के सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए कहा था।लेकिन अब तक उनका शैलेश जी पर लिखा कोई आलेख देखने को नहीं मिला,जबकि वे हमेशा शैलेश जी के जीवन संघर्ष,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुत महत्व दिया करते थे।उन्हींके सान्निध्य में कपिलेश भोज और मुझे सबसे पहले शैलेश मटियानी की रचनाओं के मार्फत पहाड़ और बाकी दुनिया को समझने की दृष्टि मिली थी।
यह आलेख शैलेश जी के अवसान के बाद उनकी समाज और सत्ता की ओर से घोर उपेक्षा और उनकी स्मृति अवशेष के निरादर पर यह बेहद विचारोत्तेजक टिप्पणी है।बेटे की मृत्यु के बाद आजीवन प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के लड़ने वाले मटियानी जी में थोड़ा वैचारिक परिवर्तन आया,जिस अपराध में हिंदी के प्रगतिशील तत्वों ने उन्हे और उनके योगदान को सिरे सेखारिज कर दिया।लेकिन देखनेवाली बात यह है कि जो सामाजिक यथार्थ और उससे जुड़े अस्पृश्यता के दंश से लहूलुहान पहाड़ और बाकी देश का साक्षी है उनका रचनासमग्र ,वह कुलमिलाकर नस्ली फासिज्म की विचारधारा के खिलाफ ही है ,जिसका इस्तेमाल अन्याय और असमता की मनुस्मृति व्यवस्था के हित में कतई नहीं हो सकता और न सत्ता की राजनीति में शैलेश जी का दुरुपयोग संभव है।
नतीजतन वामपक्ष की तरह दक्षिणपंथी हिंदुत्ववाजियों ने भी शैलेश जी की कोई सुधि नहीं ली,जिनके साथ शैलेशजी को नत्थी कर देने की कोशिशें लगातार हो ती रही है।
शैलेश मटियानी और उनके कृतित्व को समझने के लिए हमारे हिसाब से हिंदी और भारतीय साहित्य के हर पाठक को ताराचंद्र त्रिपाठी का यह आलेख अवश्य पढ़ना चाहिए।
हम चूंकि साहित्यिक बिरादरी में नहीं हैं,इसलिए कवियों,साहित्यकारों और संपादकों और आलोचकों के लिए मेरा यह बयान नहीं है।मेरे हिमालय के लोग और मरे बारत के आम लोग शैलेश जी की भूमिका के बारे में तनिक विवेचना करें,इसके लिए गुरुजी की यह टिपप्णी शेयर कर रहा हूं।
पलाश विश्वास

आदरणीय गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी के फेसबुक वाल से 

विधाता. जब किसी को भरपूर प्रतिभा देता है तो उसके साथ ऐसी विसंगतियाँ भी जोड़ देता है कि उसके लिए जीना दूभर हो जाता है. इस विसंगति के चक्रव्यूह से वही निकल पाते हैं जिनमें संघर्ष करने की अपार क्षमता होती है. इसी को चाल्र्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन या योग्यतम की उत्तरजीविता की प्रकृतिक प्रक्रिया कहा है.
शैलेश मटियानी का जीवन भी इसका एक जीता­जागता नमूना है. वे आजादी से सोलह साल पहले एक पिछड़ेे पर्वतीय गाँव के बेहद गरीब परिवार में जन्मे और बारह वर्ष की अवस्था में अनाथ हो गये. दो जून रोटी के लिए न केवल अपने चाचा की मांस की दूकान में काम करना पड़ा, अपितु कलम संभालते ही अपने गरीब और पिछड़ेे परिवेश से उठने के प्रयास में एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला छोकरा इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त से टक्कर लेना चाहता है. जैसे व्यंग बाण भी सहे.
उनको तपा­तपा कर सोना बनाने की प्रक्रिया में काल भी जैसे क्रूरता की हदें पार कर गया. अपने पापी पेट की भूख को शान्त करने के लिए होटल में जूठे बरतन माँजने से लेकर अनेक छोटे­मोटे काम करने पडे. दिल्ली, मुजफ्फर नगर, फिर कुछ दिन अल्मोड़ा, और अन्ततः इलाहाबाद आ गये. इतनी भटकन और अभावों से उनके जीवन पथ को कंटकाकीर्ण बनाने के बाद भी जैसे काल संतुष्ट नहीं हुआ, और उनके मासूम छोटे पुत्र की हत्या के प्रहार ने उन्हें बुरी तरह तोड दिया. मौत भी ऐसी दी कि क्रूर से क्रूर व्यक्ति को रोना आ जाय.
इतने कठिन जीवन संघर्ष के बीच उन्होंने न केवल हिन्दी साहित्य को दर्जनों अमर कृतियों की सौगात दी अपितु अपने अंचल के जीवन को भी अपनी रचनाओं में जीवन्त रूप से उभारा. सच पूछें तो कुमाऊँ की पृष्ठभूमि, उसके सुख दुख, अभावों और संघर्ष के बीच भी जनजीवन के मुस्कुराने के पल दो पल खोजने के प्रयासों को भी उनके अलावा पर्वतीय अंचल का कोई अन्य कथाकार उतनी शिद्दत के साथ नहीं उभर पाया है.
उन्होंने अनेक उपन्यास लिखे, दर्जनों कहनियाँ लिखीं, 'पितुआ पोस्टमैन' के सामान्य धरातल से उठ कर वे 'प्रेतमुक्ति' के जाति, वर्ग, सामाजिक विडंबनाओं से मुक्त मानवत्व की महान ऊँचाइयों पर पहुँचे. जब कि उनका सहारा लेकर उठे, और लक्ष्मी के वरद्पुत्र बने तथाकथित रचनाकार समाज में सामन्ती युग के प्रेतों को जगाने में लगे हुए हैं.
शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. हल्द्वानी में उनके आवास को जाने वाले मार्ग का नामकरण 'शैलेश मटियानी मार्ग, का शिला पट्ट लगाकर, जैसे उन पर एहसान कर दिया. उस शिला पट्ट की हालत यह है कि, उस पर परत­दर­परत कितने व्यावसायिक विज्ञापन चिपकते जा रहे हैं इस पर ध्यान देने की किसी को फुर्सत नहीं है.
उनका आवास जीर्ण­शीर्ण हो चुका है, टपकते घर के बीच उनका परिवार जैसे­तैसे दिन काट रहा है, अपने पिता की थात को फिर से लोगों के सामने लाने के लिए उनके ज्येष्ठ पुत्र राकेश, रात­दिन अकेले लगे हुए हैं. सत्ता और पद के मद में आकंठ निमग्न, जुगाड़­धर्मी अन्धी व्यवस्था में ही नहीं अपने आप को रचनाधर्मी कहने वाले हम लोगों में भी मौखिक सहानुभूति के अलावा उनकी स्मृति को सुरक्षित करने और नयी पीढी को अभावों से लोहा लेते हुए अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने की प्रेरणा देने के लिए कोई विचार नहीं है.
कितने कृतघ्न हैं हम लोग! यह इस देश में नहीं पता चलता, विदेशों में जाने पर पता चलता है. मुझे 2011 तथा 2013 में छः मास लन्दन में बिताने का अवसर मिला. अपनी यायावरी की आदत से लाचार मैंने लन्दन का कोना­कोना छान मारा. वैभव और उपलब्धियों से भरे इस महानगर में सबसे ध्यानाकर्षक बात लगी 'अपने कृती पुरखों के याद को बनाये रखने की प्रवृत्ति. अकेले लन्दन में कीट्स, सेमुअल जोन्सन, चाल्र्स डिकिंस, चाल्र्स डार्विन, जैसे उनसठ रचनाधर्मियों के आवासों को उनके कृतित्व का संग्रहालय बना दिया गया है. इस श्रद्धापर्व में उनके अपने लोग ही शामिल नहीं है. नाजी जर्मनी के उत्पीड़न से बचने के लिए लन्दन में शरण लेने वाले फ्रायड जैसे अनेक विदेशी मूल के कृती भी विद्यमान हैं. यही नहीं आज के रसेल स्क्वायर के जिस आवास में चाल्र्स डिकिन्स आठ वर्ष रहे और अपने कृतित्व को उभारा, आज पाँच सितारा होटल में रूपान्तरित होने पर भी, उसके मालिक अपनी दीवार पर यह लिखना नहीं भूले कि इस आवास में चाल्र्स डिकिंस आठ वर्ष रहे थे. ब्रिटिश पुस्तकालय के प्रांगण में आइजेक न्यूटन आज भी अपना परकार (कंपास) लेकर अन्वेषण में लगे हुए हैं. बैंक आफ इंग्लैंड वाले मार्ग पर 1808 मे जेलों में सुधार करने के लिए संघर्ष करने वाली महिला ऐलिजाबेथ के आवास पर, जो आज एक विशाल भवन में रूपान्तरित हो चुका है, उनके नाम और कृतित्व को सूचित करने वाली पट्टिका लगी हुई है. किसी भी सड़क पर चले जाइये, आपको अपने पूर्वजों के कृतित्व के प्रति आभार व्यक्त करने वाली पट्टिकाएँ मिल जायेंगी. और हमने अपने लोक जीवन को साहित्य के शिखर पर उत्कीर्ण करने वाले कथाकार के नाम पर एक मार्ग पट्टिका लगाई भी तो उसे अंट­शंट विज्ञापनों के तले पाताल में दफना दिया.
दो सौ साल जिनकी गुलामी में रहे, जिनकी भाषा, वेश­भूषा, बाहरी ताम­झाम को, अपनी परंपराओं को दुत्कारते हुए हमने अंगीकार किया, उनके आन्तरिक गुणों और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता बोध को हम ग्रहण नहीं कर सके. आज भी हम वहीं पर हैं. पंजाब से आये लोगों की कर्मठता को अंगीकार करने के स्थान पर हम उनके नव धनिक वर्ग के तमाशों और तड़क­भड़क के सामने अपनी हजारों वर्ष के अन्तराल में विकसित सरल और प्राकृ्तिक रूप से अनुकूलित परंपराओं को ठुकराते जा रहे हैं.
तब और भी दुख होता है कि जहाँ प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर उनके ही जनपद का व्यक्ति आसीन है, उनके पुत्र को अपने कृती पिता की स्मृति को धूमिल होने और अपने बीमार घर को धराशायी होने से बचाने के लिए दर­दर भटकना पड रहा है.
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Just Hell losing in Darjeeling Hills. Ten vehicles destroyed in Teesta Bazar on Sikkim Road,minister`s convoy attacked,Power production stopped!

Just Hell losing in Darjeeling Hills.

Ten vehicles destroyed in Teesta Bazar on Sikkim Road,minister`s convoy attacked,Power production stopped!

Palash Biswas

Now it is peace time in 24 pgs as Communal agenda is exposed but the politics of racist communal violence is playing havoc in Bengal hills which also burns Sikkim herading serious strategic calamity keeping in mind Chinese threat to make a Kashmir in Sikkim and the Sikkkim stand off itself.Both  governments of Bengal and India have miserably failed to initiate peace talks in burning Darjeeling while the people of India seem to have no idea about the crisis.

The most dangerous implications of Darjeeling unrest seem to be emerging now.Ten vehicles on Sikkim Road at Teesta Bazar which connects darjeeling,have been destroyed.Power plants have stopped production and the convoy of WB minister of tourism Gatam Dev has been attcked in Panihata amidst fresh incidents of arson and violence.Bengal and Sikkim have to suffer from power deficit now while tea industry and tourims lost almost everything and every home seem to be out of ration in this rainy season.


Gorkhaland mevement seems to be beyond the control of its leaders now.State administration  and police seem to be absent and it is anarchy in full bloom while CM of west Bengal Mamata Banerjee is claiming to restore peace very soon.


From tomorrow it would be fast unto death with resignation of all political representatives from every level.It is perhaps no point of return in darjeeling Hills.Just hell losing!Mind you,July 15 will mark one month of the indefinite strike in Darjeeling as the protesters continue to demand a separate state of Gorkhaland. On this day, leaders from all parties, including the BJP and Congress, will go on an indefinite hunger strike at Chowrasta in Darjeeling. While party spokesperson Neeraj Zimba will represent GNLF in the hunger strike, GJM will be represented by assistant general secretary Binay Tamang and Akhil Bharatiya Gorkha League by Pratap Kerri. All other parties will nominate representatives over the next two days.


Meanwhile,in another incident of mob violence in Darjeeling, a group of people set fire to a Gorkhaland Territorial Administration Tourist Information office on Wednesday night. According to reports, supporters of Gorkha Janmukti Morcha (GJM), which spearheads the agitation, took out a rally at Chowkbazar in Darjeeling on Wednesday with the body of Ashok Tamang, the man who was killed in alleged police firing. The agitation then took a violent turn and the angry protesters torched the office building late at night.


Tamang, a janitor for the Darjeeling municipality, had suffered injuries in police firing during an agitation on Saturday. He succumbed to his injuries on Tuesday morning at Manipal hospital in the neighbouring Sikkim. He is survived by two children.

The National Hydroelectric Power Corporation (NHPC) has shut down its hydel power plant at Ramdi in Darjeeling hills after a mob of over 600 people began agitation outside the plant site, a NHPC official said on Thursday.


"We had shut down operations of Teesta Low Dam-III plan of 132 MW as a precaution after a mob of over 600 people gheraoed the site and began agitation," the NHPC official told PTI.

The official said the regional head of NHPC is slated to meet the West Bengal power secretary later in the day to discuss the issue.


"We had already written to state power secretary, chief secretary and district magistrate to beef up security at the NHPC installations in Darjeeling district," the official said.


NHPC will resume power generation at the Ramdi plant once it gets assurance of security of the unit, officials said. NHPC has another unit Teesta Low dam-IV of 160MW in Darjeeling hills.


Pro-Gorkhaland supporters had on Wednesday set ablaze a panchayat office and damaged a few government vehicles in Darjeeling on the 28th day of the indefinite shutdown.

ABP anad reports:

পানিহাটায় পর্যটনমন্ত্রী গৌতম দেবের গাড়িতে হামলা, পুলিশের গাড়িতেও ভাঙচুর মোর্চার

দার্জিলিং: পাহাড়ে ফের তাণ্ডব চালাল গোর্খা জনমুক্তি মোর্চা।


শিলিগুড়ির কাছে পানিঘাটায় আক্রান্ত হয়েছেন পর্যটনমন্ত্রী গৌতম দেব। নেপালি কবি ভানুভক্তের জন্মজয়ন্তী অনুষ্ঠানে যোগ দিতে পানিঘাটায় যান পর্যটনমন্ত্রী। গৌতমের অভিযোগ, পানিঘাটায় ঢুকতেই কুকরি নিয়ে হামলা চালায় মোর্চা সমর্থকরা। মন্ত্রীর গাড়ি আটকে বিক্ষোভ দেখায় তারা। চলে ইটবৃষ্টিও। কোনওক্রমে ব্যাঙডুবির সেনা ছাউনিতে আশ্রয় নেন পর্যটনমন্ত্রী। তিনি এলাকা ছাড়ার পর পুলিশের একটি গাড়িতেও ভাঙচুর চালানো হয়।


এছাড়া তিস্তা বাজারে সিকিমগামী ১০টি গাড়িতে হামলা চালিয়েছে মোর্চা। কালিম্পঙে তামাং বোর্ডের চেয়ারম্যানের বাড়িতে ভাঙচুর করে আগুন ধরিয়ে দেওয়া হয়েছে। সান্দাকফু যাওয়ার পথে দার্জিলিঙের ধত্রেয় বনবাংলো ও কালিম্পঙের তিস্তা বন বাংলোতেও আগুন লাগানো হয়।


এর আগে গতকাল মাঝ রাতে দার্জিলিং ম্যালে ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টার ও রাত ৮টা নাগাদ সুকনায় রেভিনিউ ইন্সপেক্টরের অফিসেও অগ্নিসংযোগ ঘটে। যদিও গোর্খা জনমুক্তি মোর্চা অস্বীকার করেছে যাবতীয় অভিযোগ। ম্যালে কাঠের তৈরি ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টারে আগুন লাগানোর ঘটনা নতুন নয়। পাহাড়ে যতবার আন্দোলন হয়েছে, ততবারই অশান্তির আগুনে পুড়েছে এই অফিস। গতকালের আগুনে ভস্মীভূত হয়ে যায় ট্যুরিস্ট ইনফরমেশন সেন্টার। সকালে দমকলের একটি ইঞ্জিন এসে আগুন নিয়ন্ত্রণে আনে। রাত ৮টা নাগাদ সুকনায় রেভিনিউ ইন্সপেক্টরের অফিসে আগুন লাগানো হয়। গোটা অফিস পুড়ে ছাই। পুড়ে গিয়েছে বহু গুরুত্বপূর্ণ নথি।

http://abpananda.abplive.in/state/goutam-debs-car-attacked-in-panihata-darjeeling-tense-360528

Tuesday, July 11, 2017

Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people! Sikkim CM Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue! পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও Palash Biswas

Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people!
Sikkim CM Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue!

পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও

 Palash Biswas
Darjeeling stand off takes a very serious turn as represenatives of all hill parties decided to go on fast unto death to push their demand for Gorkhaland.Mamata Banerjee`s belated call for peace and talks jejected and hithertoo no intiative fom the centre to sesolve the issue.Hills parties also decided tio gherao all SDO offices and have warned that the preople from every corner of the Hills would come down to Siliguri with bags to get ration!Particularly this decision if translated in act might create quite an anarchy as Anti Gorkhaland movement in plains has been launched whcih means economic blockade of Darjeeling as well as Sikkim.Heavy rain in hills have worsened day to day life in hills and hell losing as tea gardens might not feed the people
The chairman and vice chairman of the development boards set up by the State government has been asked to resign at 6pm on July 14.

Meanwhile, Chief Minister Mamata Banerjee who addressed a public gathering at Digha in Purba Medinipur assured people that her government would restore peace in the hills.While she urged the people in the hills to give peace a chance and not play with fire, she accused the Centre of creating tension in the Darjeeling hills.

Shamsul Haq rightly pointed out in detail in his article published in Indian Express that Baduria and Bashirhat have no history of communal clash or riots even in prepartition days.Mamata Banerjee is framing government of India alleging that the centre has been behind the riots in Bashirhat and it opened the border with Bangladesh wherefrom Bangladeshi nationals came over to Bashirhat and Baduria who were indulged in communal violence.Bashirhat is returning to normalcy and the media based in Kolkata played a very positive role to sustain peace.RSS leaders based in Bengal and rest of India misused social media to proveke hindutva with false scenes posted,copied and pasted from films,Gujarat killings and Bangladesh communal clash.
Bengal united for peace in Bashirhat but neither Bengal nor India seem to care for Darjeeling and Sikkim people!
But Darjeeling seems to be quite a different issue and media is not playing that positive role as far as Darjeeling and Sikkim are concerned.Mamata Banerjee sees RSS hand in Gorkhaland movement and lost the opportunity to resolve the problem taking peace initiative earlier.
Now as it happened ,an all-party meeting in Darjeeling on Tuesday concluded that one representative of each political party in the hills will undertake a fast unto death from July 15 to take forward the demand of Gorkhaland.Announcing the decision, Benoy Tamang, Assistant General Secretary of Gorkha Janmukti Morcha (GJM), said the ongoing indefinite strike that began on June 15 will continue.

In addition, the parties also decided to lay seige to the offices of the District Magistrate and Sub Divisional Officers with the help of Gorkhaland supporters from July 14.Keeping in mind that political parties have lost control over their supporters indulging in violence and arson,the administration would have to face tougher weather in Hills and army might be deployed in every corner of the hills without any peace initiative from either the government of India or government of West Bengal.

The Gorkhaland Movement Coordination Committee (GMCC), convened by the representatives of all the political parties in the hills, decided that all awards received from West Bengal Government would be returned on July 13.

Meanwhile ,Sikkim Chief Minister Pawan Chamling today demanded urgent intervention of the Centre for early settlement of the Gorkhaland issue to safeguard the interest of Sikkim. He said in case the issue was not addressed on priority basis, the Sikkim government might approach the top court of India. "I seek urgent intervention of Government of India and all the authorities concerned for early settlement of the situation to safeguard the interest of Sikkim from these hazards and constraints on priority," Mr Chamling said through a press statement issued by the Information and Public Relations department of the state.

Chamling already supported the demand of Gorkhaland,Moreover,Sikkim assembly passed aresolution supporting the demand.West Bengal goverment lodged a formal protest aginst Chmaling.

"In case of not addressing this issue on priority, the state government may have to approach the apex court of India in the larger interest of Sikkimese people for justice," the statement said.Stating that the inter-state ramifications of the Gorkhaland agitation and treating it "merely as a West Bengal issue" was not adequate, the chief minister noted that the present situation in Darjeeling Hills has had a direct impact on life of the people of Sikkim and that this issue must be looked into with utmost seriousness.

"Sikkim's geographical location having international boundaries with three countries - China in the North, Bhutan in the East and Nepal in the West, and the potential threat to the national security is a matter of supreme importance," the statement said.

"The only access to the rest of the country is through the state of West Bengal. Sikkim is sandwiched due to the agitation and prevailing law and order situation."

"As far as the national security is concerned, Government of India is appropriately handling the matter. We fully support Government of India's effort, which is addressing the national security in the best interest of our country," the statement said.

The Sikkim Chief Minister also said that the law and order being a matter of the government of West Bengal, the loss and misery suffered by Sikkim could have been avoided. "The Gorkhaland agitation-related anguish of Sikkim is as old as the agitation itself. Sikkim bound vehicles have been targeted by fringe groups in Siliguri," it said.


"Trucks carrying essential goods, commodities and petroleum products are being ransacked right in the presence of the West Bengal Police, and it has been learnt that in some cases, the West Bengal police itself is overseeing the situation," it said.

The statement also said that people in need of immediate advanced medical care were affected. In addition, the economic development of Sikkim has also been affected.

The CM's statement also said that due to the unrest in the neighbouring state of Bengal, "Sikkim has already borne the loss of over Rs. 60,000 crore."

"In the agitation related violence on NH10, Sikkim's only road link with the rest of the nation, over 5,000 vehicles have been vandalised and around 1,300 people (drivers and passengers) killed in the last 32 years of Gorkhaland agitation," it said.

Anand Bazar Patrika reports:

পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে, চাপ বাড়াতে এ বার আমরণ অনশন, ঘেরাও

ভেতরে কট্টরপন্থীদের চাপ আর বাইরে কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারের চাপের মোকাবিলায় এ বার পাল্টা চাপের রাস্তা নিল পাহাড়ের সর্বদলীয় কমিটি।

মঙ্গলবারের বৈঠকে কমিটি সিদ্ধান্ত নিল, পাহাড়ে বন্‌ধ চলবে। কোনও ভাবেই তা প্রত্যাহার করা হবে না। বিমল গুরুঙ্গ, বিনয় তামাঙ্গ, নীরজ জিম্বা সহ কমিটির প্রতিনিধিরা সিদ্ধান্ত নিয়েছেন, ১৫ জুলাই থেকে তাঁরা ম্যালে শুরু করবেন আমরণ অনশন। অনশনের পাশাপাশি থাকবে ঘেরাওয়ের কর্মসূচিও। ১৪ জুলাই শিলিগুড়ি সহ পাহাড়, তরাই ও ডুয়ার্সের এসডিও অফিসগুলিও ঘেরাও করা হবে।

কমিটির অভিযোগ, পাহাড়গামী গাড়িগুলি থেকে জিএসটি বিল আদায় করা হচ্ছে যথেচ্ছ। তা বন্ধ করতে এ দিনের বৈঠকে সিদ্ধান্ত নেওয়া হয়েছে, ২৫ জুলাই থেকে ঝোলা নিয়ে পাহাড় থেকে শিলিগুড়ি পর্যন্ত পদযাত্রা শুরু হবে।

পাহাড়ে কট্টরপন্থীরা বলতে শুরু করেছিলেন, কেন্দ্র ও রাজ্যের চাপের কাছে উত্তরোত্তর গলার সুর নরম করে ফেলছেন আন্দোলনকারীরা। সেই সুযোগে কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারের চাপও বাড়তে শুরু করেছে।

অনেকেই মনে করছেন, 'ঘর'কে কিছুটা শান্ত রাখতে আর 'বাইরে'র চাপের বোঝাটা কাঁধ থেকে কিছুটা নামাতেই এই পাল্টা চাপের রাস্তায় হাঁটল কমিটি।


Sunday, July 9, 2017

आखिरकार दार्जिलिंग को कश्मीर बनाने पर तुले क्यों है देश चलाने वाले लोग? पलाश विश्वास

आखिरकार दार्जिलिंग को कश्मीर बनाने पर तुले क्यों है देश चलाने वाले लोग?

पलाश विश्वास

दार्जिंलिंग में हिंसा दावानल की तरह भड़क उठी है।


कल चार लोग इस हिंसा के शिकार हो गये।लाशें लेकर दार्जिलिंग के चौक बाजार में फिर जुलूस निकला है।


बहुत देरी से ममता बनर्जी ने इस मसले को सुलझाने के लिए पहाड़ के राजनीतिक दलों से बातचीत करने की पेशकश की है। लेकिन गोरखा आंदोलनकारियों ने राज्य सरकार से कोई बातचीत करने से मना कर दिया है।


कल और आज दार्जिलंग पहाड़ का चप्पा चप्पा सुलग रहा है।दार्जिलिंग में फिर सेना लगा दी गयी है।लेकिन कार्शियांग से लेकर कलिंगपोंग तक जैसे हर कहीं हिंसा भड़क रही है,जैसे उग्र आंदोलनकारी और उनके समर्थक मरने मारने की शहादत मुद्रा में आ गये हैंं और रेलवे स्टेशन,पंचायत भवन,पुस्तकालय,सरकारी दफ्तर,पुलिस चौकी और वन दफ्तर थोक भाव से फूंके जा रहे हैं।उससे सेना शायद दार्जिलिंग जिले में सर्वत्र लगानी पड़ जाये।केंद्र की ओर से अभीतक बातचीत की पहल शुरु ही नहीं हुई है।


आखिरकार दार्जिलिंग को कश्मीर बनाने पर तुले क्यों है देश चलाने वाले लोग?


चीन से निबटने के लिए सेना और सरकार दोनों तैयार हैं।यह कैसी तैयारी है कि सिक्किम का मुख्यमंत्री पूछने लगे हैं कि क्या भारत में सिक्किम का विलय चीन और बंगाल के बीच सैंडविच बनने के लिए हुआ है?पवन चामलिंग के इस बयान का मौजूदा हालात के मुताबिक बहुत खतरनाक मतलब है क्योंकि चान ने सिक्किम को भी कश्मीर बना देने की धमकी दी है।


भारत चीन सीमा विवाद से गहराते युद्ध के बादल के मद्देनजर हालात का खुलासा हमने हस्तक्षेप पर किया तो लोगों ने हम पर राष्ट्रद्रोह का आरोप भी लगा दिया।अब देखिये,राष्ट्रभक्तों का राजकाज क्या है और राजनय क्या है।


हमने पहले ही लिखा है कि बंगाल के बेकाबू  हालात राष्ट्रीय सुरक्षा, एकता और अखडंता के लिए बेहद खतरनाक, चीनी हस्तक्षेप से बिगड़ सकते हैं हालात।


हम पहले ही चेता चुके हैं कि बंगाल में जो बेलगाम हिंसा भड़क गयी है,राजनीतिक दलों की सत्ता की लड़ाई में उसके खतरे पक्ष विपक्ष में राजनीतिक तौर पर बंट जाने से बाकी देश को शायद नजर नहीं आ रहे हैं।

जिस दिन ममता बनर्जी अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ दार्जिलिंग में घिर गयी थी,उसीदिन हमने खासकर बंगालियों को वीडियो मार्फत बता दिया था कि सत्ता की राजनीति के आक्रामक रवैये और नस्ली अल्पसंख्यकों के दमन के उग्र बंगाली राष्ट्रवाद के नतीजतन बंगाल का फिर एक विभाजन होने वाला है और यही संघपरिवार का गेमप्लान है।बंगाल, पंजाब,बिहार,यूपी,महाराष्ट्र और उन सभी राज्यों से जहां से भी केंद्र की सत्ता को चुनौती मिलती है,उन्हें तोड़कर सत्ता के नस्ली वर्चस्व को निरंकुस बनाने के संस्थागत फासिज्म से देश का संघीय ढांचा चरमरा गया है।आधार से जहां नागरिकों की निजता,गोपनीयता और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है,वहीं डिजिटल इंडिया में खेती और कारोबार में नरसंहार संस्कृति है।तो जीएसटी और नोटबंदी से अर्थव्यवस्था कारपोरेट पूंजी के हवाले हैं।


हम रोजाना दार्जिलिंग के अपडेट सोशल मीडिया में लगातार डाल रहे हैं और बार बार चेता रहे हैं कि हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडा से धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें सचेत रहें।


बशीरहाट में दंगा भड़काने के लिए ममता बनर्जी के मुताबिक भारत बांग्लादेश सीमा खोल दी गयी हैं,जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र की है।


बशीरहाट में बाहरी और विदेशियों के व्यापक दंगा भड़काने की सािश अब बेनकाब हो गयी है।भोजपुरी फिल्म ही नहीं,बजरंगी सेना बांग्लादेश और गुजरात की हिंसा के दृस्य पोस्ट करके बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण की कोशिश करते रहे हैं।


इस पूरे परिदृश्य में बंगाल में मीडिया ने बेहद सकारात्मक रवैया अपनाया है और रोजाना पेज के पेज साझा चूल्हे की विरासत के मुताबिक दोनों समुदायों के आपसी और निजी रिश्तों को लेकर लिखा गया है,टीवी पर दिखाया गया है।


अब यह संजोग ही कहा जायेगा कि दंगाई सियासत बेपर्दा होने के साथ उत्तर 24 परगना में जब अमन चैन का माहोल फिर बनने लगा है,तभी पहाडो़ं में नये सिरे से आग भड़क उठी है।


केंद्रीय गृहमंत्री ने सिक्किम के मुख्यमंत्री को आज फोन पर कहा है कि दार्जिंलिंग के हालात का सिक्किम पर कोई असर नहीं होगा।सिलिगुड़ी से दार्जिलंग जिला पार करके ही सिक्किम जाना है और पहाड़ों में हिसा के साथ प्रतिक्रिया में मैदानों में भी हिंसा भड़कने लगी है और जब दार्जिंलिंग में चायबागानों में मृत्यु जुलूस का अनंत सिलसिला है,पर्यटन खत्म है और राशन पानी खत्म है,तो शुरु के दिन से ही सिक्किम की अघोषित आर्थिक नाकेबंदी चल रही है।


गोरखा आंदोलनकारियों का कहना है कि वे अलग राज्य मांग रहे हैं और उनकी मांग राज्य सरकार पूरी नहीं कर सकती।केंद्र सरकार ही यह समस्या सुलझायें तो ऐसे हालात में सभी पक्षों को बातचीत के लिए तैयार करने की कोई पहल केंद्र सरकार क्यों नहीं कर रही है?


दार्जिलिंग से भाजपा सांसद और बंगाल प्रदेश बाभाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष बार बार कहते रहे हैं कि वे छोटे राज्य का समर्थन करते हैं लेकिन भाजपा यह नहीं मानती कि वह गोरखालैंड का समर्थन करती है और वह यह दावा भी नहीं करती कि भाजपा गोरखालैंड का विरोध करती है।इसका मतलब क्या है।


कोलकाता से लगे समूचे उत्तर 24 परगना जिला हिंसा की चपेट में है और पहाड़ में दार्जिंलिग में बंद और हिंसा का सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा है।गोरखा जन मुक्ति मोर्चा ने  अंतिम लड़ाई का ऐलान कर दिया है और पहाड़ों में बरसात और भूस्खलन के मौसम में जनजीवन अस्तव्यस्त है।


 इस बीच खबरों के मुताबिक गोरखालैंड समर्थक आंदोलन के 25वें दिन रविवार को दार्जिलिंग में फिर से हिंसा भड़क गई। आंदोलनकारियों ने एक पुलिस शिविर को आग के हवाले कर दिया, जिसमें चार पुलिसकर्मी घायल हो गए। वहीं पोकरीबोंग में एक बीडीओ कार्यालय पर भी हमला किया गया।


जीजेएम कार्यकर्ताओं ने सूरज सुंदास और समीर सुब्बा के शवों के साथ चौकबाज़ार में एक रैली भी निकाली. ये लोग पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे।


जीएनएलएफ ने ताशी भूटिया के शव के साथ सोनादा में एक जुलूस भी निकाला. वह भ। पुलिस गोलीबारी में मारा गया था।


प्रदर्शनकारियों ने सोनादा पुलिस थाना पर भी हमला किया और इसका एक हिस्सा फूंक दिया. पिछले दो दिनों में इस तरह का यह दूसरा हमला था।


सोनादा पुलिस थाना पर शनिवार को भी प्रदर्शनकारियों ने हमला किया था। प्रदर्शनकारियों ने दार्जिलिंग में एक पुलिस बूथ को आग के हवाले कर दिया।


पोकरीबोंग में रविवार दोपहर एक बड़ी भीड़ ने एक बीडीओ कार्यालय और एक पुलिस शिविर पर हमला किया। कई पुलिसकर्मियों की पिटाई भी की गई।


इस बीच 18 जुलाई को होने वाली पर्वतीय पार्टियों की एक सर्वदलीय बैठक की तारीख 11 जुलाई कर दी गई है।


जीजेएम ने दावा किया है कि गोरखालैंड समर्थकों और पुलिस के बीच शनिवार को पर्वतीय क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में हुई झड़पों के बाद पुलिस गोलीबारी में चार लोग मारे गए हैं। उधर पुलिस ने गोलीबारी की खबरों से इनकार किया है और कहा कि इसने कोई गोली नहीं चलाई।


विकास बोर्ड के अध्यक्ष एमएस राय ने कथित हत्याओं के खिलाफ विरोध दर्ज़ कराते हुए बीती रात इस्तीफा दे दिया। जीजेएम ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की वार्ता की पेशकश खारिज़ कर दी।


Saturday, July 8, 2017

GIRISH SEN: THE MAN WHO TRANSLATED " THE QURAN "INTO BENGALI

Bhaskar Sur

GIRISH SEN: THE MAN WHO TRANSLATED " THE QURAN "INTO BENGALI
West Bengal in recent past has witnessed sporadic sectarian violence chiefly owing to power games between the ruling Trinamul Congress and Hindu rightist BJP ,desperate to carve a place in the state.In Bengal Muslims account for about 27% of the population and despite Hindu influx(15 million) from Bangladesh( erstwhile East Pakistan)it has been an exemplarily tolerant society.The Left has unjustly taken the entire credit for that which ought to go to the syncretic tradition and the reformist Brahmo movement initiated by Raja Rammohun Roy,the first modern man of India.Girish Sen ( 1836- 1910),the first translator of the Quran in Bengali belonged to this movement whose noble aim it was to bring Hinduism closer to reason and ' universal religious harmony' through mutual understanding.
It was Keshab Sen ,the great religious reformer who asked him to undertake the project with love and respect.Sen was humble enough to admit that he was ' uneducated and unworthy of the onerous responsibly." With a rare dedication and zeal ,he began to learn Arabic,a semitic language,at the age 42 and soon made great progress. In 1876,he travelled to Lucknow ,then a great seat of Islamic learning.He stayed there for a full year and after returning Bengal spent another four years diving deep in the Islamic lore.Besides Arabic ,he mastered Persian and Urdu.He had to face unexpected difficulties in procuring a copy of the Quran.A Muslim book seller declined to let him touch the book,let alone sell it.However ,Mia Zalaluddin ,a liberal Muslim.eagerly supported him with the necessary books from his library.Sen proved himself equal to the task and brought out a scholarly and accurate translation in two thick volumes.While it was highly acclaimed by the wide reading public,some fanatical Muslims were infuriated that a kafir should translate their holy book and issued a ' fatwah' to behead him.Sen faced the situation bravely and was able to win support from most of the educated Muslims who called it ' an unparalled and wonderful achievement of textual accuracy and Islamic scholarship."Sen altogether wrote twenty three books on Islam,mostly translations from Arabic and Persian as well as exegesis..A grateful Muslim community honoured him with the epithet 'Maulana' which he gracefully accepted.
Sen was basically a pious scholar living a life of voluntary poverty.However ,he took political position during the first Partition of Bengal (1905)by Lord Curzon.Going against the strong current of Hindu nationalism,he supported the new political arrangement as the new province would create some space for Muslims and Hindu lower castes.Had the Hindu elite,the dominanant minority ,been more sensitive to the just demands of Muslims ,perhaps the Partition of 1947 could have been averted.Today ,in an atmosphere of hatred and mutual distrust,we need to remember persons like Girish Sen and the rich legacy they left.

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Friday, July 7, 2017

#नाॅट_इन_माई_नेम_अगेन

This FB post raises solid and valid question to be answered by Secular and democratic forces if they seriously want to resist racist fascist institutional Hindutva agenda.Muslim community is misused by political parties irrelevant of their ideology just to reduce them in Vote Bank. Aggressive Islamic identity provokes majority Hindu population,it should be understood.Why they should react so violently?If they behave like this,it is just cake walk for cow politics!It is happening in Bengal and trending in rest of India.It would further strengthen Islamophobia as Islamic terror organized and aligned Anti Islam forces world wide.

Majority of Hindus tend to be secular and democratic and majority of Muslims are also secular and democratic.Majority people of India irrespective of caste,class,religion,language and race are also secular and democrate.

If we happen to be secular and democrat and want peace and fraternity,resistance of Islamic terror is as much as necessary as the resistance against cow politics.

I am sharing a FB post already shared by Gandhian Activist Himanshu Kumar ji.A muslim brother has raised very justified questions for Muslim community and these questions must be addressed by all secular,democrat and peace loving patriotic citizens  irespective of identity if we seriously want to resist institutional fascist ethnic cleansing !

#नाॅट_इन_माई_नेम_अगेन

तनिक भी भ्रमित मत होइयेगा कि अब क्यों नाॅट इन माई नेम... अब तो बंगाल में मियाँ भाई भी गदर काट दिये। हाँ काट दिये तो... इसीलिये तो शायद अब ऐसे बैनर की जरूरत और प्रासंगिक हो उठी है, क्योंकि अब वह हिंदू, जो इस अभियान में हमारे साथ हमारी आवाज उठाने आया था, वह कशमकश में पड़ा हमें देख रहा है।

क्या था औचित्य इस अभियान का... यही न कि धर्म या आस्था के नाम पर हिंसक होती भीड़ का विरोध। सड़क पर होते इंसाफ के नंगे प्रदर्शन के खिलाफ एकजुट कोशिश... लेकिन बंगाल में तो इसी कोशिश को पलीता लगा दिया गया। साबित कर दिया कि धर्म या आस्था के नाम पे हिंसक होने वाली भीड़ भगवा ही नहीं हरी भी होती है।

चालीस पचास साल के मर्द अधेड़ मशाले लिये एक लड़के का घर फूंकने चल पड़े... खुद आपने मैच्योरिटी दिखाई न और उस सोलह-सत्रह साल के लड़के से मैच्योरिटी की उम्मीद कर रहे थे? इस बात का कोई मतलब नहीं कि यह संघ या भाजपा की साजिश है... हाँ है तो? नाक से खाना तो नहीं खाते होंगे न आप, तो कैसे सब जानते हुए संघ/भाजपा की साजिश में फंस जाते हैं।

नाॅट इन माई नेम के बैनर तले आपका प्रतिकार इसलिये भी तो था कि अगर कोई गौकशी या गौमांस भक्षण का दोषी भी है तो उसे पुलिस के हवाले कीजिये, और कानून जो भी उचित कार्रवाई समझे, करे... लेकिन जैसी ही चोट अपनी आस्था पर आयी तो कानून पर से विश्वास डिग गया और निकल पड़े सड़कों पर भीड़ बनके इंसाफ करने।

पहले कमलेश तिवारी ने और फिर सौविक सरकार ने जो किया वह फेसबुक पर हर रोज होता है और सैकड़ों बार होता है, लेकिन खैर बाकियों की तरफ से आंखें मूंद कर आप जिसे 'चिन्हित' कर पायें, उसके खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई करवाइये और उस पर संतुष्ट होना सीखिये।

यह क्या कि भीड़ बन के सड़कों पर आतंक फैला कर दोषी के लिये फांसी की मांग करना... इस्लामिक हुकूमत है भारत में? शरिया लागू है कि ईशनिंदा कानून के तहत पैगम्बर पर उंगली उठाने वाले को फांसी पर लटका दिया जाये? आप अपने लिये तो सेकुलर मुल्क चाहते हैं, जहां एक अल्पसंख्यक के बावजूद आपको सारे अधिकार और सुरक्षा मिले, लेकिन दूसरों को सेकुलर मुल्क देने में क्यों पीछे हट जाते हैं? क्यों आपका धर्म घर से निकल कर सड़कों पर उतर आता है?

जिन्होंने बंगाल में यह हिंसक भीड़ बनाई, जितने वे दोषी हैं, उतने ही दोषी वे भी हैं जो एसी हरकतों को अपने कुतर्कों से जस्टिफाई करते हैं... बजाय खुल कर, मुखर हो के विरोध करने के। बजाय आगे आ कर लोगों को यह बताने के... कि हम बंगाल में आस्था को लेकर दंगा करने वाली भीड़ के भी उतने ही खिलाफ हैं, जितने अखलाक या जुनैद को मारने वाली भीड़ के हैं।

नाॅट इन माई नेम के तहत आपके हक की आवाज उठाने वाले और आपकी तकलीफ पर आपके साथ खड़े होने वाले हिंदू देख रहे हैं आपकी तरफ... खुद से आगे बढ़िये और उन्हें यकीन दिलाइये कि गलत बात पर अपने धर्म के लोगों का भी समर्थन हम नहीं करते।

देश सबका है, समस्यायें भी सबकी हैं और उनसे लड़ने के लिये साथ भी सबका चाहिये... मेरा तेरा करके लड़ाइयां नहीं लड़ी जातीं। गलत को हर हाल में मुखर हो के, बआवाजे बुलंद गलत कहने की आदत बनानी होगी।

आपको खुल के कहना होगा कि मजहब या आस्था के नाम पे हिंसक होने वाली किसी भी भीड़ का समर्थन हम नहीं करेंगे, फिर चाहे वह भीड़ हमारे अपने ही लोगों की क्यों न हो।

नाॅट इन माई नेम सबके लिये है... और हर हिंसक भीड़ के खिलाफ एक कोशिश है।

~ Ashfaq Ahmad

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA

THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER

http://youtu.be/NrcmNEjaN8c The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today. http://youtu.be/NrcmNEjaN8c Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program ______________________________________________________ By JIM YARDLEY http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR

Published on 10 Apr 2013 Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya. http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk

THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST

We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas. http://youtu.be/7IzWUpRECJM

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP

[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also. He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT

THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM

Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia. http://youtu.be/lD2_V7CB2Is

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE

अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।' http://youtu.be/j8GXlmSBbbk