Wednesday, December 31, 2025
भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में
भारत विभाजन की त्रासदी को जिया ऋत्विक घटक ने अपनी फिल्मों में
पलाश विश्वास
एक
15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। देश के विभाजन की कीमत पर यह आजादी मिली। रातोंरात अखंड भारत दो हिस्सों में बंट गया। भारी खून खराबा, दंगा, लूटपाट, आगजनी, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं के मध्य अखंड भारत के पूर्वी और पश्चिम हिस्से को पाकिस्तान बना दिया गया और वहां के लोग अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए। एक निरंतर चलने वाले युद्ध और गृहयुद्ध शुरू हो गया। जिस देश में हजारों साल से विविधता और बहुलता का लोकतंत्र था, साझा चूल्हा का चलन था,किसी को किसी से बैर नहीं था, अलग अलग धर्म जाति, नस्ल के लोग एक साथ अमन चैन से रहते थे, वहां निरंतर जलने वाली हिंसा और नफरी की आग सुलगा दी गई। करोड़ों लोग विभाजन की त्रासदी के शिकार हुए।
भारत विभाजन के दौरान हुई हिंसा में कम से कम 10 लाख लोग मारे गए थे, हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 15 लाख से 20 लाख तक भी हो सकती है। इस दौरान लगभग 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे। जो लोग जिंदा बच गए,इस देश में वे आज भी भारत विभाजन का दंश झेल रहे हैं। कटे फटे उन लोगों की संतानें अब भी विभाजन की त्रासदी झेल रहे हैं। उनकी नागरिकता संदिग्ध है।वे घुसपैठियों के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं आज भी।नागरिक और मानवाधिकार, इतिहास, भूगोल, विरासत, मातृभाषा, संस्कृति, पहचान से वंचित हो गए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी विभाजन का दर्द झेल रहे हैं।
करोड़ों दूसरे लोगों की तरह ऋत्विक घटक ने भी भारत विभाजन के फलस्वरूप भारत में शरण ली और शरणार्थी होने का यथार्थ को भोगा। यूं तो पूर्वी बंगाल और पश्चिम पाकिस्तान से आए कुलीन, सम्पन्न तबके के अनेक लोग बंगाल और बाकी देश में राजनीति, अर्थ व्यवस्था, साहित्य, कला, फिल्म आदि क्षेत्रों में अग्रणी बन गए और विभाजन की त्रासदी का कुलीन,संपन्न तबके पर कोई असर नहीं हुआ।
ऐसा पाकिस्तान में भी हुआ।भारत से जो लोग पाकिस्तान चले गए,उनमें जो संपन्न और कुलीन थे, उनकी हैसियत में खास फर्क नहीं पड़ा। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में अभिजात तबकों पर विभाजन का असर एक सदमा जैसा होकर गुजर गया।
ऋत्विक घटक के परिवार की पृष्ठभूमि कुलीन थी। उनके परिवार के लोग आदरणीय हैं और विविध क्षेत्रों में उनका योगदान अविस्मरणीय है। लेकिन ऋत्विक ने एक आम शरणार्थी की तरह अपनी तमाम फिल्मों में विभाजन की त्रासदी को निरंतर जिया, जैसे विभाजनपीडित हर शरणार्थी पीढ़ी दर पीढ़ी जीता है।
भारत विभाजन पर ऋत्विक घटक की तीन फिल्में विश्वविख्यात हैं। शरणार्थी स्त्रियों ने विभाजन के कारण बेपटरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने के लिया, परिवार का सारा बोझ अपने कंधे पर लेकर जो ऐतिहासिक लड़ाई वक्त की चुनौतियों के मुकाबले लगातार अपना वजूद मिटाकर लड़ती रही, उनकी जिजीविषा पर ऋत्विक की मास्टरपीस फिल्म है मेघे ढाका तारा। भारत विभाजन के सदमे और सामूहिक पीड़ा की पृष्ठभूमि में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन यानि भारतीय जन नाट्य संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बिखराव पर उनकी फिल्म है कोमल गांधार।
भारत आए शरणार्थियों के साथ जाति के आधार पर जो भेदभाव किया गया, उसपर भारतीय साहित्य मौन है। क्योंकि वंचित तबकों के लोग अपढ़ अधपढ़ थे और वे अपनी आपबीती कहीं दर्ज नहीं कर सके।भारत विभाजन का पूरा आख्यान , पूरा narrative शासक वर्ग का रचा इतिहास है,जिसमें विभाजन पीड़ितों का पक्ष किसी ने नहीं रखा। शरणार्थी शिविरों और पुनर्वास योजनाओं में जाति के आधार पर भेदभाव पर केंद्रित है ऋत्विक की भारत विभाजन पर बनाई तीसरी फिल्म सुवर्णरेखा।
इन तीन फिल्मों की बहुत भारी कीमत उन्हें आजीवन चुकाते रहना पड़ा। वे कम्युनिस्ट पार्टी से निकाले गए।बंगाल से बहिष्कृत कर दिए गए।
ऋत्विक की फिल्मों की अंतर्वस्तु उनकी कथा की आम जिंदगी में रचा बसा लोक है। उनकी फिल्मों में लोक कोई सितम गीत नृत्य नहीं है,फ्रेम दर फ्रेम संरचना है।इसलिए उनकी सारी फिल्में बाकी भारतीय फिल्मकारों की फिल्मों से एकदम अलहदा हैं।
दो
ऋत्विक घटक और उनकी फिल्मों को समझने के लिए उनकी जड़ों को पहचानने और समझने की जरूरत है। उनकी जीवन दृष्टि और उनके सौंदर्यबोध की पृष्ठभूमि को समझे बिना बंगाल के सर्वव्यापी लोक और जनपदों की जीवनशैली और इस मेहनतकश मुश्किल जीवन यापन में रची बसी उनकी रचनात्मक प्रतिभा को समझना मुश्किल है।अपने उतार-चढ़ाव भरे करियर में उन्होंने भले ही कुछ एक फिल्में निर्देशित कीं, अनेक फिल्में आधी अधूरी छोड़ दी, अपनी ही रचना से उपजे गहरे असंतोष के कारण,लेकिन उनका काम भारतीय और वैश्विक सिनेमा की भाषा को नई दिशा देता है। वे न केवल बांग्ला फिल्मों में बल्कि सिनेमायी आधुनिकता में भी आधारभूत व्यक्तित्व हैं। उनकी रचनात्मकता आम जनमानस का दर्पण बना सिनेमा की भाषा में। व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिक आघात को उन्होंने जिस नवाचारी शैली के साथ जोड़ा, उसने पीढ़ियों के फिल्मकारों और दर्शकों को झकझोरा है।
1947 का भारत-विभाजन ऋत्विक घटक के जीवन और रचनात्मकता दोनों पर गहरी छाप छोड़ गया। ढाका में जन्मे ऋत्विक लाखों विस्थापितों की तरह बंगाल के बंटवारे के शिकार बने। जहां अधिकतर समकालीन फिल्मकारों ने विभाजन को या तो किनारे से छुआ या उसकी हिंसा तक ही सीमित रखा, वहीं ऋत्विक की फिल्में विभाजन के मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत घावों को केंद्र में रखती हैं। खुद उनका वजूद लहूलुहान रहा जीवनभर इस त्रासदी से आम विभाजनपीड़ितों की तरह।
कोमल गांधार फिल्म में जन नाट्य संघ की एक नाट्यमंडली के पद्मा नदी के किनारे विभाजन की त्रासदी को अनुभव करने वाला दृश्य याद करें। ट्रेन का इंजन त shunting करते हुए ठीक पद्मा नदी के किनारे रुक जाती है।एक जबरदस्त झटके से जूम करता कैमरा क्लोज अप में जम हो जाता है। हृदय विदारक दृश्य है।कैमरा नायक नायिका के पीड़ित,दुखी चेहरों पर फोकस करता है।नायक नायिका की आंखों में एकमुश्त स्मृतियों और पीड़ाओं का समुंदर झोंकता हुआ उंगली के इशारे पर बेटे के इंतजार में खड़ी मां की छवि उकेरते हुए खाता है।वहीं खड़ी मन मेरा इंतजार करती थी। जो अब पाकिस्तान है।
आपने भूस्खलन की त्रासदी देखी है? लोगों को जिंदा दफ्न होते देखा है? गांव जनपद को जमीन और पानी में,नदी और समुद्र में समाहित होते देखा है? हिमालय के लोग इस अभिज्ञता का जीवनभर सामना करते हैं ।हम इसे प्राकृतिक आपदा कहते हैं। मुर्शिदाबाद जिले के लालगोला इलाके मन पद्मा नदी को किनारे का जनजीवन लीलते हुए देखा है? इसे लोग प्राकृतिक आपदा कहते हैं।
वजूद का खींचों में बिखरकर अनंत में समाहित होने और फिसलते रेत की तरह स्मृतियों के क्षरण को हम भारत विभाजन की राजनीतिक त्रासदी कह सकते है। इस त्रासदी के गहरे साए में कैमरे की भाषा के साथ ऋत्विक के सौंदर्यबोध के साथ बेबस पीड़ितों की पीड़ा, आर्तनाद और आक्रोश एकमुश्त अभिव्यक्त होती है। ऋत्विक की इस रचना प्रक्रिया को समझना हर किसी के बूते में नहीं है।फिल्मकारों, फिल्मविशेषज्ञों के लिए भी उनकी फिल्म समय सरोकार और मनुष्यता की प्रति सघन प्रतिबद्धता के साथ गंभीर चुनौती बन जाती है।
मेघे ढाका तारा में टीबी मरीज बन गई नीता का अपने कामयाब संगीतकार भाई के सामने चरमोत्कर्ष के क्षण समूचे हिमालय की दहलती हुई जिजीविषा चीख दादा आमी बाँचते चाई.. इसी त्रासदी का ज्वालामुखी विस्फोट है,जो दर्शक के दिलोदिमाग की गूंज बनकर ठहर जाती है।प्रतिध्वनित होती रहती है। या रिफ्यूजी बस्ती में नीता के कमरे में छनछनाती तार तार चांदनी में नीता का उस प्रेमी से संवाद, जो अंततः उसकी छोटी बहन से विवाह कर लेता है। कोमल गांधार में विवाह के दौरान गाय जाने वाले उच्चकित लोकगीत का विरोधाभासी द्वंद्व या सुवर्णरेखा की पतिता बन गई रिफ्यूजी बहन सीता के कमरे में ग्राहक बनकर उपस्थित हुए सगे नहीं का सदमा, यह सबकुछ सिनेमा की भाषा को सिरे से बदल कर रख देता है। बौद्धिक समुदाय जिसे मेलोड्रामा कहता है, दरअसल वह ऋत्विक का अपना लोकसंसार है,जो उनकी फिल्म की परत दर परत झीनी झीनी बिनी चदरिया है।
ऋत्विक घटक का जन्म पूर्वी बंगाल में ढाका में हुआ था (अब बांग्लादेश)। वे और उनका परिवार पश्चिम बंगाल में कलकत्ता में स्थानांतरित हो गये (अब कोलकाता), जिसके तुरंत बाद पूर्वी बंगाल से लाखों शरणार्थियों का इस शहर में आगमन शुरू हो गया, वे लोग विनाशकारी 1943 के बंगाल के अकाल और 1947 में बंगाल के विभाजन के कारण वहां से पलायन करने लगे थे।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध और आजाद हिंद फौज के महासंग्राम के मद्देनजर और खासकर ,1946 के डायरेक्ट एक्शन के दौरान बंगाल के पढ़े लिखे भद्रलोक बंगाली को विभाजन की
नियति का अनुभव हो गया। भारत का विभाजन उनके लिए नियति का अभिसार था।लेकिन पूर्वी बंगाल के हिंदुओं और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में जो अपढ़, अधपढ़ आम लोग थे, उन्हें बदलते हुए वैश्विक प्रदर्श, ब्रिटिश हुकूमत के डूबते हुए सूरज और सत्ता शतरंज के दांवपेंच का कोई अंदाजा नहीं था।सम्पन्न वर्ग की जड़ें कोलकाता और पश्चिम बंगाल में गहरी पैठी थी। नौकरी पेशा और जमीनदार श्रेणी को विभाजन से प्रयाप्त पहले पश्चिम बंगाल में सुरक्षित स्थानांतरित होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पश्चिम पाकिस्तान में भी बहुत हद तक ऐसा ही हुआ। इसके विपरीत भारत विभाजन होने के बावजूद आम लोग हर कीमत पर अपना गांव खेत जनपद को छोड़ने को तैयार नहीं थे।सरहद के आरपार हुए दंगों में वे छिन्नमूल बनकर रह गए।
ऋत्विक घटक भी छिन्नमूल हो गए और आजीवन छिन्नमूल होकर जिए।उनकी फिल्में छिन्नमूल मनुष्यता की कथा व्यथा और जिजीविषा, विस्थापन का यथार्थ और पुनर्वास की लड़ाई का महाकाव्यिक आख्यान है।
शरणार्थी जीवन का उनका यह अनुभव उनके काम में बखूबी नज़र आता है, जिसने सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन के लिए एक अधिभावी रूपक का काम किया और उनके बाद के रचनात्मक कार्यों को एक सूत्र में पिरोया. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध ने भी, जिसके कारण और अधिक शरणार्थी भारत आये, उनके कार्यों को समान रूप से प्रभावित किया।
पूर्वी बंगाल के पाकिस्तान का हिस्सा बन जाने और 26 मार्च 1971 को स्वतंत्र बांग्लादेश बन जाने के बावजूद विभाजनपीड़ितों के लिए भारत विभाजन की विभीषिका निरंतर जारी है। इस त्रासदी,पीड़ा और जीवनसंघर्ष को ऋत्विक ने ही सिनेमा की भाषा में प्रस्तुत किया।
समूचा पूर्वी बंगाल बंगाल की खाड़ी के समुद्री तूफानों के दायरे में हैं। समुंदर में गहरे धंसे पूर्वी बंगाल की सारी जमीन असंख्य नदियों,झीलों में बंटी हुई है। यातायात जलपथ से होता रहा है। पेयजल नदियों और झील का पानी। नदी से जल भरने के गीतों की दर्जनों शैलियां हैं। नदी में नाव,ज्वार भाटा का भटियाली संगीत सर्वव्यापी है। यह मंगल काव्यों की जमीन है,जहां हिन्दू मुसलमान साझा चूल्हे के वारिश सदियों से सारे तीज त्यौहार मनाते रहे हैं। हमलावरों से सुरक्षित इस भूगोल में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा आम जनजीवन पर जमींदारों के अमानवीय अत्याचार और कठोर पुरोहित तंत्र को छोड़कर भारत विभाजन से पहले कोई राजनीतिक भूचाल का इतिहास नहीं है।यहीं के जनपदों में गीत नृत्य गीतिका जीवन यौन का अनिवार्य अंग है।
पूर्वी बंगाल (आज के पश्चिम बंगाल के क्षेत्र) का भूगोल, मौसम और जलवायु मुख्य रूप से इसकी विविध भौगोलिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिसमें उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक शामिल है। यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित होती है। मौसम में बहुत गर्मी और आर्द्रता (गर्मी में), भारी बारिश (मानसून के दौरान) और हल्की ठंड (सर्दियों में) होती है। भूगोल, जलवायु और मौसम की विविधता, बहुलता और विचित्रता के कारण पूर्वी बंगाल का लोक संसार इंद्रधनुषी है। बाउल, पीर, साधु, संत,फकीर का सामाजिक नेतृत्व ने हमेशा साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद की चुके हिलाने के जनविद्रोह किसान, आदिवासी विद्रोह का सिलसिला बनाए रखा। भारत में पहला बहुजन आंदोलन जल जंगल जमीन हक्की का मतुआ आंदोलन की दो सौ साल की निरंतरता की हकीकत और मनुस्मृति राज, विधान और अनुशासन के खिलाफ अस्पृश्यता मुक्ति का नमोशुद्र आंदोलन इसी भूगोल, जलवायु और मौसम का सच है, जिसका सबसे ईमानदारी से सामना लोक की सघन ऊर्जा के साथ ऋत्विक घटक ने निरंतर किया है।
जिस ढाका शहर में ऋत्विक का जन्म हुआ, वह हमेशा कृषि,कारोबार और मेहनतकश तबकों का केंद्र रहा है। कोलकाता इस तुलना में अतिशय भद्रलोक है। चैन तरफ जनपदों से घिरे होने के बावजूद कोलकाता कोई जनपद नहीं है।जबकि मुगल साम्राज्य के दौरान दौरान ढाका को 17वीं शताब्दी में जहाँगीर नगर के नाम से भी जाना जाता था, यह न सिर्फ प्रादेशिक राजधानी हुआ करती थी बल्कि यहाँ पर निर्मित होने वाले मलमल के व्यापार में इस शहर का पूरी दुनिया में दबदबा था। आधुनिक ढाका का निर्माण एवं विकास ब्रिटिश शासन के दौरान उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और जल्द ही यह कोलकाता के बाद पूरे बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गया। आज भी ढाका कपड़ा उद्योग का वैश्विक केंद्र है।
ढाका जनपदों से घिरा हुआ स्वयं एक जनपद है।हर जनपद की बोली अलग है।रीति रिवाज,जीवनशैली अलग है,लोक और जीवन यौन अलग अलग है। लेकिन हिलसा मछली का स्वाद जैसा कुछ,भटियाली का संगीत जैसा कुछ बहुत कुछ एकदम साझा चूल्हा है।
ऋत्विक इस साझा चूल्हा का रसोइया है।
तीन
भारत विभाजन की त्रासदी पर अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के उत्कर्ष समय में ऋत्विक घटक ने अपनी विभाजन त्रयी फिल्में पार्टीशन ट्रायलॉजी, एक के बाद एक तीन फिल्में बनाईं। वे रंगकर्मी थे। विचारधारा के प्रतिबद्ध थे। वे 1950 में पूर्वी बंगाल से छिन्नमूल होकर लौटने के बाद कहानियां और नाटक लिखते थे।अच्छे अभिनेता भी थे। नाटकों का इस्तेमाल उन्होंने सतर्कता पूर्वक किया राजनीतिक हथियार के रूप में। फिल्म को उन्होंने सबसे शक्तिशाली माध्यम समझकर इसको भी छिन्नमूल मनुष्यता के हक में राजनीतिक हथियार बतौर बनाना शुरू किया।बिजन भट्टाचार्य और वे दोनों जन नाट्य संघ में सक्रिय थे।
भारत विभाजन की त्रासदी करोड़ों विभाजन पीड़ितों की तरह बेइंतहा दर्द और बेचैनी के साथ उनके खून, दिल और दिमाग में आजीवन खौलती रही ज्वालामुखी के लव की तरह। उनका जन्म जरूर ढाका में हुआ,लेकिन उनका घर राजशाही जिले में था। राजशाही पूर्वी बंगाल में शिक्षा और संस्कृति का गढ़ रहा है। जनपदों में अमन चैन के साझा चूल्हे के इस तरह हिंसा,नफरत और मारकाट के दावानल में बदल जाने के भयंकर वास्तव को वे कभी स्वीकार नहीं कर पाए।यह विघटन क्यों हुआ? किसने सामाजिक ताना बाना को क्यों और कैसे तहस नहस कर दिया, करोड़ों विभाजन पीड़ितों में पीढ़ी दर पीढ़ी सुलग रहे इस सवाल का जवाब वे ढूंढते रहे। राजनीतिक हथियार की तरह गहन संवेदना की गहराइयों में पैठकर अपनी फिल्मों में उनकी तफ्तीश जारी रही।
1960 में उन्होंने मेघे ढाका तारा बनाई। 1961 में बनाई कोमल गांधार और अगले ही साल सुवर्णरेखा। यह फिल्म बनी 1962 में लेकिन तीन साल बाद रिलीज़ हो सकी। क्यों? यह सवाल वाजिब है क्योंकि मेघे ढाका तारा को लेकर कोई विवाद नहीं था। शरणार्थी बेटी का संघर्ष बंगाल, पंजाब और बाकी देश का सच था। विस्थापन, युद्ध, गृहयुद्ध , दंगा फसाद की शिकार होती हैं स्त्रियां सबसे ज्यादा, लेकिन अपने लिए,परिवार के लिए और समाज व राष्ट्र के लिए मुक्तिमार्ग का निर्माण भी करती है स्त्री। इस सच को, वैश्विक वास्तव को अस्वीकार करने का उपाय नहीं था। नीता की जिजीविषा इस फिल्म का चरमोत्कर्ष और सार दोनों है।
सुगबुगाहट शुरू ही कोमल गांधार के सच का सामना करने से राजनीतिक, वर्गीय, जातिगत वर्चस्ववाद के सीरे से इनकार के साथ। तीनों फिल्मों में विभाजन विभीषिका की तीव्रतम अभिव्यक्ति ही है।तीनों में दर्द अलगाव,उपेक्षा और अपमान का घनघोर झंझावात है, जो चक्रवात की तरह वजूद की चुके हिलाकर रख देता है। तीनों फिल्म का सच है छिन्नमूल मनुष्यता, जो मनुस्मृति राज में वंचितों के सारे अधिकारों से वंचित होने की समग्र यातना, उत्पीड़न और विध्वंस, विघटन, इतिहास,भूगोल, मातृभाषा,विरासत, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक पहचान और शक्ति से जबरन बेदखल करने का बेइंतहा जनसंहार का पर्याय है। कोमल गांधार में रेलवे लाइन और नदी को योग वियोग के प्रतीक के रूप में सघन सिनेमाई प्रयोग के तहत जलजला में तब्दील करने के साथ पूर्वी बंगाल के ठेठ लोक संसार और जनपदों की विरासत की प्रस्तुति है तो जन नाट्य संघ में पार्टी की राजनीतिक दख़लदारी का दो नाट्य गुटों के विवाद कोलाहल के जरिए खुलासा भी है। जन नाट्य आंदोलन में तब हर विधा, हर माध्यम, हर कला के सर्वश्रेष्ठ लोग थे,जिन्हें किनारा कर दिया जा रहा था। कोमल गांधार इस राजनीतिक दुष्कृत्य का सिनेमाई प्रतिरोध है। कुलीन वर्चस्व को यह कतई मंजूर न हुआ।
विभाजन पर बनी इन तीनों फिल्मों में विजन भट्टाचार्य की खास भूमिकाएं थीं। ऋत्विक ने खुद अभिनय किया। महाश्वेता देवी के पति और नवारुण भट्टाचार्य के पिता जन नाट्य संघ के नाटक नवान्न के बिजन भट्टाचार्य भी इस वर्चस्ववाद के शिकार हुए। दूसरे लोग भी होते रहे।इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता यहां नहीं है।लेकिन कोमल गांधार बनने से पहले ही जन नाट्य संघ का बिखराव और टूटन सत्ता की राजनीति में विचारधारा के समहित होने की प्रक्रिया के साथ शुरू हो गया था।ऋत्विक और विजन दोनों वैचारिक रूप से इस्पात की तरह मजबूत थे। कोमल गांधार से उनके बहिष्कार की शुरुआत हुई।
फिर सुवर्णरेखा में तो ऋत्विक ने इस बहिष्कार के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध घोषणा कर दी मनुस्मृति वर्चस्ववाद के विरुद्ध, कुलीनत्व के विरुद्ध और ब्राह्मणवाद की अंतरण जातिव्यवस्था के विरुद्ध। जाति व्यवस्था और कुलीन तंत्र को बनाए रखने के लिए ही भारत का विभाजन हुआ, शायद सुवर्णरेखा बनाते वक्त ऋत्विक इस सच को जान चुके थे।सन्यासी विद्रोह , मतु आ नमोशुद्र आंदोलन, आदिवासी किसान विद्रोह और आंदोलन, हरिचांद गुरु चांद ठाकुर, ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, जोगेंद्र नाथ मंडल के नेतृत्व में आदिवासियों मुसलमानों दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की साझा राजनीतिक शक्ति, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत से ब्राह्मणवाद के अस्तित्व और मनुस्मृति राज को जो गंभीर खतरा पैदा हो गया था, उसे विखंडित करने के लिए भारत विभाजन की विभीषिका रचा गया।
सुवर्ण रेखा में वर्चस्ववाद के मूल जाति व्यवस्था पर सबसे ताकतवर प्रहार किया सुवर्ण रेखा में ऋत्विक घटक ने। शरणार्थी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंप और पुनर्वास कालोनियों में हुए भेदभाव का चरमोत्कर्ष छिन्नमूल स्त्री सीता की आत्महत्या है। इस आत्मध्वंस के बिना जाती वर्चस्व के सम्मुख अपने ईश्वर, अपने मतवाले मदहोश सगे भाई से अपना सम्मान, अपनी अस्मिता को बचाने का कोई रास्ता नहीं है। आक्रोश में बहन का गला काटकर उसे बचाने से भी तीव्र है यह अभिव्यक्ति। छिन्नमूल भाई बहन ईश्वर और सीता को कोलकाता की रिफ्यूजी कॉलोनी में पनाह मिली थी। दोनों भाई बहन कुलीन ब्राह्मण थे। ईश्वर ने बालिका छोटी बहन सीता के साथ एक दलित बालक अभिराम का पालन पोषण कर रहे थे।
इसी रिफ्यूजी कॉलोनी में अति दलित बागदी बहू को जमींदार के लोग उठा ले जाते हैं जिसे कॉलोनी से बहिष्कृत किया जाता है। जाति वर्चस्व के कारण किसी की हिम्मत नहीं होती विरोध करने की। फिर सुवर्ण रेखा के तट पर सिंहभूम के घाटशिला के आदिवासी भूगोल में प्राकृतिक परिवेश में अति सुंदरी बहन सीता और अभिराम को लेकर नौकरी करने चले जाते हैं। जाति वर्चस्व के सच का पर्दाफाश करने के लिए ऋत्विक ने जेल जंगल जमीन के हक हकूक की हजारों साल की विरासत जमीन आदिवासी भूगोल को ही क्यों चुना? क्योंकि यही तो मूल निवास है वंचितों का,जिसे वर्गीय जाति आधारित कुलीन वर्चस्व के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक ढांचा ने अपने जनसंहार अश्वमेध से तहस बहस कर दिया और यह सिलसिला आज भी जारी है।
साथ साथ पले बढ़े सीता और अभिराम के प्रेम से कुलीन ब्राह्मण ईश्वर के उदारतावाद का अंत हो गया।रातोंरात उसने अन्यत्र सीता का विवाह तय कर दिया और सीता अभिराम के साथ कोलकाता भाग गया। कोलकाता में मोबलिंचिंग में अभिराम मारा गया तो नए सिरे से छिन्नमूल हो गई सीता के लिए नाचने गाने की आजीविका अपनाने को बाध्य होना पड़ा और हुआ यह कि जो पहला ग्राहक के सामने उसे पेश किया गया, वह पिता समान उसका बड़ा भाई था जिसे इतना नशा हो गया था कि पता ही नहीं चला कि उसके सामने उसकी सगी बहन है।
सीता ईश्वर की हत्या नहीं कर सकती थी तो क्या करती?
यह भारत विभाजन की कुल कथा है। जाति वर्चस्व की विभीषिका है विभागों की त्रासदी, यही ऋत्विक घटक की फिल्म सुवर्णरेखा है।
रिफ्यूजी कालोनियों, रिफ्यूजी कैंपों , पुनर्वास कालोनियों , पहाड़ों, मरुस्थल, टाइगर फॉरेस्ट समेत घने जंगलों में बंगाल से बाहर विभाजन पीड़ित जिन करोड़ों लोगों को बिखेर दिया गया, वे पूर्वी बंगाल में आदिवासियों, मुसलमानों,दलितों और पिछड़ों की सम्मिलित फौज थी,जिसने मनुस्मृति राज के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था पलाशी के युद्ध के समय से, उन्हें तहस नहस करने की कथा ऋत्विक ने चूआड़ विद्रोह की जमीन पर कहने का विकल्प चुना। क्या यह सिर्फ संजोग है?
यह क्या संजोग मात्र है कि 99 प्रतिशत पूर्वी बंगाल के सवर्ण विस्थापित पश्चिम बंगाल में न सिर्फ व्यवस्थित हो गए, जीवन के हर क्षेत्र में वे आगे हैं? दूसरी ओर 99 प्रतिशत दलित और पिछड़े बंगाल से बाहर 22 राज्यों में बिखेर दिए गए बंगाल के मौसम,जलवायु,जमीन की तरह मातृभाषा,इतिहास,भूगोल, संस्कृति ,विरासत और नागरिकता से भी बेदखल। अंडमान निकोबार और दंडकारण्य से लेकर उत्तर भारत के टाइगर प्रोजेक्ट में जिन्हें बाघ, मगरमच्छ और समुद्री तूफान का चारा बना दिया गया। नई दिल्ली,मुंबई और देश के बड़े शहरों में जहां बंगाली विस्थापितों की पुनर्वास कालोनियों का निर्माण हुआ,वहां दलित और पिछड़े कितने हैं?
सिंध से आए सारे सम्पन्न स्वर्ण शरणार्थियों को बड़े शहरों में पुनर्वास दिया गया। पश्चिम पाकिस्तान से आए पंजाबी सवर्ण हिंदुओं और कुलीन सिखों को पंजाब, नई दिल्ली में जगह मिल गई लेकिन दिल्ली में ही दलित पंजाबियों की बस्तियों की कहानी और हैं वैसी ही जैसी पश्चिम बंगाल की हजारों जबर दखल कॉलोनियों में फंसे रह गए दलित पिछड़े पूर्वी बंगाल के विस्थापित। राय सिखों, मजहबी सिखों को तो पूर्वी बंगाल के दलित शरणार्थियों के साथ टाइगर प्रोजेक्ट में ही बाघ का चारा बना दिया गया।सरहद के उस पर पूर्वी पाकिस्तान जा पहुंचे बिहारी यानी उर्दू भाषी मुसलमानों और पश्चिम पाकिस्तान चले गए मुहाजिरों का क्या हुआ।
सरहद के आर पार भारत विभाजन के कारण बह निकली खून की नदियां आज भी जिंदा हैं।निरंतर जल प्रवाह के साथ बह रहा है वंचितों का खून। मॉब लांचिंग तो अब सांस्कृतिक राजनीतिक महोत्सव है साहित्य उत्सव की तरह कुलीन।
विभाजन की इस जातिगत,वर्चस्ववादी कथा को खाने का दुस्साहस ऋत्विक ने किया और इसी तरह विभाजन की त्रासदी को जिया। बांग्लादेश बनने के बाद वहां जाकर युक्ति तर्क गप्पों या तितास एकटी नदी जैसी फिल्म बनाई। कितना दर्द, कितना विद्रोह और कितने ज्वालामुखी का समाहार है ऋत्विक।
स्त्री अस्मिता इस वर्गीय जातिगत वर्चस्ववाद के विरुद्ध इन तीनों फिल्मों में ऋत्विक का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार और सिनेमाई चमत्कार है। मेघे ढाका तारा की नीता का चीत्कार, कोमल गांधार की अनुसुइया की दृढ़ता, सीता का आत्मध्वंस और बाग़दी बहू के भिड़ाकर से तार तार हो गया वर्चस्ववादी कुलीनत्व।
यही ऋत्विक घटक का अपराध है।
इसकी सजा को उन्होंने आजीवन भोगा।
इन फिल्मों के पात्र परिचय और कलात्मक पक्ष को हम इस लेख में छू नहीं सके।इस पर लगातार चर्चा होती रही। जिसकी कभी चर्चा नहीं हो सकी, या चर्चा नहीं होने दी, हमने सिर्फ वही लिखा
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जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।
#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি
अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास
ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?
Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION!
Published on Mar 19, 2013
The Himalayan Voice
Cambridge, Massachusetts
United States of America
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Download Bengali Fonts to read Bengali
Imminent Massive earthquake in the Himalayas
Palash Biswas on Citizenship Amendment Act
Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003
Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003
http://youtu.be/zGDfsLzxTXo
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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS BLASTS INDIANS THAT CLAIM BUDDHA WAS BORN IN INDIA
THE HIMALAYAN TALK: INDIAN GOVERNMENT FOOD SECURITY PROGRAM RISKIER
http://youtu.be/NrcmNEjaN8c
The government of India has announced food security program ahead of elections in 2014. We discussed the issue with Palash Biswas in Kolkata today.
http://youtu.be/NrcmNEjaN8c
Ahead of Elections, India's Cabinet Approves Food Security Program
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By JIM YARDLEY
http://india.blogs.nytimes.com/2013/07/04/indias-cabinet-passes-food-security-law/
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA
THE HIMALAYAN VOICE: PALASH BISWAS DISCUSSES RAM MANDIR
Published on 10 Apr 2013
Palash Biswas spoke to us from Kolkota and shared his views on Visho Hindu Parashid's programme from tomorrow ( April 11, 2013) to build Ram Mandir in disputed Ayodhya.
http://www.youtube.com/watch?v=77cZuBunAGk
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE
अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।'
http://youtu.be/j8GXlmSBbbk
THE HIMALAYAN DISASTER: TRANSNATIONAL DISASTER MANAGEMENT MECHANISM A MUST
We talked with Palash Biswas, an editor for Indian Express in Kolkata today also. He urged that there must a transnational disaster management mechanism to avert such scale disaster in the Himalayas.
http://youtu.be/7IzWUpRECJM
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICAL OF BAMCEF LEADERSHIP
[Palash Biswas, one of the BAMCEF leaders and editors for Indian Express spoke to us from Kolkata today and criticized BAMCEF leadership in New Delhi, which according to him, is messing up with Nepalese indigenous peoples also.
He also flayed MP Jay Narayan Prasad Nishad, who recently offered a Puja in his New Delhi home for Narendra Modi's victory in 2014.]
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS CRITICIZES GOVT FOR WORLD`S BIGGEST BLACK OUT
THE HIMALAYAN TALK: PALSH BISWAS FLAYS SOUTH ASIAN GOVERNM
Palash Biswas, lashed out those 1% people in the government in New Delhi for failure of delivery and creating hosts of problems everywhere in South Asia.
http://youtu.be/lD2_V7CB2Is
THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS LASHES OUT KATHMANDU INT'L 'MULVASI' CONFERENCE
अहिले भर्खर कोलकता भारतमा हामीले पलाश विश्वाससंग काठमाडौँमा आज भै रहेको अन्तर्राष्ट्रिय मूलवासी सम्मेलनको बारेमा कुराकानी गर्यौ । उहाले भन्नु भयो सो सम्मेलन 'नेपालको आदिवासी जनजातिहरुको आन्दोलनलाई कम्जोर बनाउने षडयन्त्र हो।'
http://youtu.be/j8GXlmSBbbk



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