विडंबना की रूदाली
#विडंबना
निरंकुश सत्ता और वर्चस्ववादी विषमता की व्यवस्था बहिष्कार संस्कृत पर आधारित है।
लोकतंत्र समावेशी है।
असहमति को कुचल देना कट्टरपंथ है।
लोकतांत्रिक,प्रगतिवादी लोग असहमति का कितना सम्मान करते हैं?
दक्षिणपंथ में भी संवाद के दरवाजे खुले होते हैं।
वामपंथ में फिर क्यों बहिष्कार संस्कृत?
क्यों संवादहीनता?
क्यों वर्चस्ववाद?
दक्षिणपंथी जनता से हर स्तर पर जुड़े होते हैं।निरंतर उनकी सामाजिकता, गतिविधियां बनी रहती हैं। उनके कार्यकर्ता घर घर जाते हैं।
वामपंथ, उदारतावाद और लोकतंत्र को क्यों ऐन चुनाव के वक्त जनता याद आती है?
जनाधार क्यों खत्म है?
रोड शो और नारेबाजी, सनसनी और सत्तापक्ष की अंध आलोचना से सत्ता समर्थक बहुसंख्य वोटरों को सत्ता के विरुद्ध लामबंद किया जा सकता है क्या?
क्या निरंकुश नरेंद्र मोदी के मुकाबले सर्वमान्य कोई विपक्षी नेता हैं?
क्या गोदी मीडिया के खिलाफ स्वतंत्र, वैकल्पिक मीडिया बनाने की कोशिश कभी हुई?
क्या संघ परिवार के रंग बिरंगे संगठनों का जमीन पर कहीं मुकाबला हुआ है?
क्या जनता को सूचित करते रहने या जागरूक करने का काम किया गया?
सरकारी व प्रशासनिक व्यवस्था हमेशा सत्ता पक्ष की होती है।कांग्रेस के समय थी तो भाजपा तो उससे कहीं ज्यादा निरंकुश और संगठित है। आपके संगठनों का क्या हुआ?
आपने सिर्फ असहमति के लिए कितने प्रतिबद्ध साथियों, वैचारिक और निजी मित्रों का बहिष्कार किया, याद कीजिए।
संघ परिवार जोड़ जोड़ कर राष्ट्रीय हो गया तो आप तोड़ तोड़ कर क्षेत्रीय हो गए। जाति, अस्मिता और वंशवाद के दलदल से निकले बिना, वर्गीय ध्रुवीकरण के बिना सांप्रदायिक उन्माद, अनर्गल प्रचार, अकूत दौलत और फ़ासिज़्म का मुकाबला संभव है?
तोड़ते तोड़ते आपके अपने पांव के नीचे जमीन गायब है और सर पर आसमान भी नहीं है।
अब उनकी भारी जीत और अपनी भारी हार के शिक्षित गाते रहिए,वैचारिक विश्लेषण करते रहिए।
निरंकुश तंत्र का मुकाबला इस तरह होता है?
इसी तरह संगठित फ़ासिज़्म के मुकाबले दिशाहीन, अदूरदर्शी, बिखराव और विभाजन की जनाधारविहीन राजनीति से आप चले देश बदलने?
इसी तरह बनता है राजनीतिक विकल्प हीरो के फटे हुए गंदे पोस्टरों से?
समाचार संदर्भ बिहार:
बिहार के विधानसभा चुनाव में एनडीए की आंधी चली है। ताजा चुनावी नतीजों के मुताबिक, एनडीए गठबंधन 200 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं। इसमें से वह कई सीटें जीत भी चुका है। दूसरी ओर, राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन को झटका लगा है। महागठबंधन का 40 सीटों के आंकड़े तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल दिखाई दे रहा है। चुनाव आयोग लगातार चुनाव नतीजों की घोषणा कर रहा है।

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