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Saturday, September 5, 2015

कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास -राम पुनियानी

05 सितंबर 2015

कलबुर्गी की हत्या तार्किकता का गला घोंटने का प्रयास

-राम पुनियानी

गत 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर मलीशप्पा माधीवलप्पा कलबुर्गी की हत्या से देश के उन सभी लोगों को गहरा सदमा पहुंचा है जो उदारवादी समाज के हामी हैं, तार्किकता के मूल्यों का आदर करते हैं और अंधश्रद्धा के खिलाफ हैं। प्रोफेसर कलबुर्गी, जानेमाने विद्वान थे और उन्होंने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं थीं। वे 12वीं सदी के कन्नड़ संत कवि बस्वना की विचारधारा को जनता के सामने लाए। वे मानते थे कि लिंगायत - जो कि बस्वना के अनुयायी हैं - को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि वे वैदिक परंपरा का हिस्सा नहीं हैं। बस्वना के छंदों में निहित शिक्षाओं, जिन्हें ''वचना'' कहा जाता है, का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया था और इसने उनकी तार्किकतावादी सोच को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

कलबुर्गी द्वारा बस्वना की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार और मूर्तिपूजा व ब्राह्मणवादी धार्मिक अनुष्ठानों की उनकी खिलाफत ने बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों को उनका शत्रु बना दिया। तथ्य यह है कि पुरातनकाल से नास्तिकतावादी परंपरा, हिंदू धर्म का हिस्सा रही है। इस परंपरा के एक प्राचीन उपासक थे चार्वाक। मूर्तिपूजा का विरोध भी हिंदू धर्म के लिए कोई नई बात नहीं है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्तिपूजा न करने का आह्वान किया था।

कलबुर्गी की हत्या से कुछ समय पहले, पड़ोसी बांग्लादेश में तीन धर्मनिरपेक्ष युवा ब्लॉगर्स की हत्या कर दी गई थी। सीरिया में इस्लामिक स्टेट के कट्टरवादियों ने खालिद अल-असद नामक अध्येता को जान से मार दिया था। महाराष्ट्र में लगभग दो वर्ष पहले, प्रसिद्ध तार्किकतावादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश में हलचल पैदा कर दी थी। उनके प्रयासों से ही महाराष्ट्र में काला जादू और अंधश्रद्धा विरोधी कानून लागू हुआ था। एक अन्य सम्मानित कार्यकर्ता कामरेड गोविंद पंसारे को लगभग एक वर्ष पहले मौत के घाट उतार दिया गया था। पंसारे जिन कई क्षेत्रों में सक्रिय थे, अंधश्रद्धा का विरोध उनमें से एक था। महाराष्ट्र में अत्यंत सम्मान से देखे जाने वाले शासक शिवाजी पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जो खासी लोकप्रिय हुई थी। पंसारे अपनी पुस्तक में बताते हैं कि शिवाजी किसानों के हितैषी थे व सभी धर्मों का सम्मान करते थे। शिवाजी के चरित्र का यह प्रस्तुतिकरण, हिंदुत्ववादियों को रास नहीं आया।

डॉ. कलबुर्गी की हत्या, धारवाड़ में उनके घर पर हुई। प्रोफेसर कलबुर्गी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे हंपी स्थित कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। वे राष्ट्रीय और कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कारों के विजेता थे। इस विद्वान प्राध्यापक ने वीरशैव व बस्वना परंपरा का विशद अध्ययन किया था। विवादों ने उनका कभी पीछा नहीं छोड़ा और ना ही कट्टरपंथियों की धमकियों ने। वीरशैव व बस्वना सहित कन्नड़ लोकपरंपरा पर आधारित आलेखों का उनका संग्रह 'मार्ग' सबसे पहले विवादों के घेरे में आया। उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियाँ मिलीं। उन्हें पुलिस सुरक्षा प्रदान की गयी, जिसे उनके ही अनुरोध पर कुछ समय पहले वापस ले लिया गया। उन्होंने मूर्तिपूजा बंद करने के मुद्दे पर यूआर अनंथमूर्ति का समर्थन किया था। उनके द्वारा विहिप नेताओं और विश्वेश्वरतीर्थ स्वामी को सार्वजनिक बहस के लिए निमंत्रित करने से एक नए विवाद का जन्म हुआ। कर्नाटक सरकार के अन्धविश्वास विरोधी विधेयक का समर्थन करने के कारण उन्हें बजरंग दल जैसे संगठनों के कोप का शिकार बनना पड़ा। उनका जमकर विरोध हुआ और कई स्थानों पर उनके पुतले जलाये गए।     

दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्याओं में कई समानताएं हैं। यद्यपि वे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय थे तथापि तीनों तार्किकतावादी थे, अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कहते थे और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती थीं। उनके हत्या के तरीके में भी कई साम्य हैं। तीनों की हत्या अलसुबह हुईं, हत्यारे मोटरसाइकिल सवार थे, जिनमें से एक बाइक चला रहा था और दूसरे ने ताबड़तोड़ ढंग से गोलियां चलाईं और फिर दोनों भाग निकले। यह भी क्या अजीब नहीं है कि इतना समय बीत जाने के बाद भी, दाभोलकर और पंसारे के हत्यारे पुलिस की पहुँच से दूर हैं।

कलबुर्गी की हत्या के बाद, बजरंग दल के एक कार्यकर्ता भुविथ शेट्टी ने ट्वीट किया, "पहले यूआर अनंथमूर्ति और अब एमएम कलबुर्गी। हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाओ और कुत्ते की मौत मरो। और प्रिय केएस भगवान, अब तुम्हारी बारी है"। इस ट्वीट को बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद, हिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कई लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि कलबुर्गी द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किये जाने से उनके प्रति हिन्दुओं के मन में रोष था और इसलिए उनकी हत्या हुई। यह एक तरह से उस असहिष्णुता को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास है, जो हमारे समाज में जड़ें जमाती जा रही है। इस मामले में सभी धर्मों के कट्टरपंथियों की सोच एक-सी है। सलमान रूश्दी को धमकियाँ दीं गयीं थीं और तस्लीमा नसरीन संकुचित सोच वालों के निशाने पर थीं। बांग्लादेश में ब्लॉगरों की हत्या हुई तो पाकिस्तान में सलमान तासीर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। तासीर का कसूर यह था कि वे ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला का बचाव कर रहे थे।

तार्किकता का विरोध, मानव इतिहास का अंग रहा है। चार्वाक ने हमारी दुनिया के प्रति ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण और विशेषकर वेदों को दैवीय बताए जाने पर प्रश्न उठाए। चार्वाक का कहना था कि वेदों को मनुष्यों ने लिखा है और वे सामाजिक ग्रंथ हैं। इस कारण चार्वाक को प्रताडि़त किया गया। समय के साथ, पुरोहित वर्ग द्वारा अपने विचारों को समाज पर लादने की प्रक्रिया ने संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लिया। गौतमबुद्ध, जो अनीश्वरवादी थे और मनुष्यों की समस्याओं का हल इसी दुनिया में खोजने के हामी थे, की शिक्षाओं का जबरदस्त विरोध हुआ। मध्यकालीन भक्ति संत तार्किक सोच के हामी थे और धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक रीति-रिवाजों और पाखंडों के विरोधी। महाराष्ट्र के तुकाराम जैसे कई संतों को पुरोहित वर्ग के हाथों प्रताड़ना सहनी पड़ी।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसा ही हुआ। यूरोप में कई वैज्ञानिकों को चर्च के कोप का शिकार बनना पड़ा। जब गैलिलियों ने यह कहा कि धरती गोल है तो चर्च ने उन्हें नरक में जाने का श्राप दिया। इसी तरह की प्रताड़ना, कष्ट और सज़ाएं कई वैज्ञानिकों को भोगनी पड़ीं। चर्च अपनी ''दैवीय सत्ता'' का इस्तेमाल, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बाधित करने के लिए करता रहा। शनैः शनैः तार्किक सोच के विरोधी कमज़ोर पड़ते गए। पुरोहित वर्ग का तर्क यह रहता है कि वे सारे ज्ञान का भंडार हैं क्योंकि हमारे ''पवित्र ग्रंथों'' में सारा ज्ञान समाहित है। इस सोच का विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में अलग-अलग ढंग से प्रकटीकरण हुआ है। पाकिस्तान में कुछ मौलानाओं ने यह दावा किया कि देश में बिजली की कमी को जिन्नात की मदद से दूर किया जा सकता है क्योंकि जिन्नात असीमित ऊर्जा के स्त्रोत हैं। उन्होंने अपने इस दावे का आधार धर्म को बताया।

भारत में स्वाधीनता संग्राम के दौरान, सामाजिक परिवर्तन के हामियों ने तार्किक सोच को बढ़ावा दिया और धार्मिक ग्रंथों को तार्किकता की कसौटी पर कसना शुरू किया। परपंरावादी, जो पुरातन सामाजिक समीकरणों को बनाए रखना चाहते थे, ने ''ज्ञान की हमारी महान प्राचीन विरासत'' का राग अलापना शुरू कर दिया। आस्था पर आधारित सोच और वैज्ञानिक पड़ताल एक-दूसरे के सामने आ गए। स्वतंत्रता के बाद, मुख्यतः पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री होने के कारण, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिला और उच्च शिक्षा व शोध के कई संस्थान स्थापित हुए। इससे देश न केवल आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ा वरन् उसके चरित्र का भी प्रजातांत्रिकरण हुआ। यह वह युग था जब देशवासी भारत के समग्र विकास की कल्पना को साकार करने में जुटे हुए थे और तार्किक सोच को प्रोत्साहित करना, इस प्रक्रिया का आवश्यक अंग था। सन् 1958 में संसद ने राष्ट्रीय वैज्ञानिक नीति संकल्प पारित किया।

सन 1980 के दशक के बाद से स्थितियां बदलने लगीं। धर्म के नाम पर राजनीति का उभार हुआ। सामाजिक उद्विग्नता को कम करने के लिए आस्था के भावनात्मक सहारे का इस्तेमाल होने लगा। कुछ राजनैतिक ताकतों ने धार्मिक पहचान और आस्था पर राजनीति करनी शुरू कर दी। जैसे-जैसे सामाजिक रूढि़वाद बढ़ा, तार्किक सोच का विरोध भी बढ़ने लगा। लगभग इसी समय ऐसे समूह व संगठन भी उभरे जो तार्किक व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहते थे और अंधश्रद्धा के विरोधी थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण था केरल शास्त्र साहित्य परिषद। बाद में, महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर ने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन किया।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्यकर्ता, गांव-गांव जाकर यह प्रदर्शित करने लगे कि किस प्रकार बाबाओं और तथाकथित साधुओं द्वारा दिखाए जाने वाले ''चमत्कार'' केवल हाथ की सफाई हैं। और यह भी कि ये बाबा, गरीब ग्रामीणों के असुरक्षा के भाव का लाभ उठाकर उनका शोषण करते हैं। अंधश्रद्धा का विरोध करने के अतिरिक्त, पंसारे ने शिवाजी का एक ऐसे शासक के रूप में चित्रण करना शुरू किया जो कि सभी धर्मों का समान रूप से आदर करता था। दक्षिणपंथी इस प्रचार को पचा नहीं पा रहे थे परंतु उनके पास दाभोलकर के धारदार तर्कों का कोई जवाब भी नहीं था। कर्नाटक में यूआर अनंथमूर्ति ने मूर्तिपूजा और अंधश्रद्धा के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। कलबुर्गी ने न केवल अनंथमूर्ति का समर्थन किया वरन उन्होंने अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करने संबंधी विधेयक का समर्थन भी किया। उन्होंने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए कई पुस्तकें और पेम्फलेट लिखे।

इसके कुछ समय पहले, पहली एनडीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने पौरोहित्य व ज्योतिषशास्त्र के पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों में लागू किए। इससे उन तत्वों को बढ़ावा मिला जो हिंदू धर्म की राजनीति करने वाली ताकतों के साथ थे और ''आस्था'' के नाम पर आमजनों को बेवकूफ बनाने में लगे हुए थे। सन् 2014 में भाजपा सरकार के दिल्ली में शासन में आने के बाद से पौराणिकता को इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्राचीन भारत में हवाई जहाज हुआ करते थे और प्लास्टिक सर्जरी की जाती थी, इस तरह के बेसिरपैर के दावे किए जा रहे हैं। इस सरकार के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी राजनीति का अतिवादी तबका बहुत उत्साहित है व काफी आक्रामक हो गया है। समाज में उदारवादी सोच के लिए स्थान कम होता जा रहा है और बहस का स्थान हिंसा ने ले लिया है। असहमत होने के अधिकार को तिलांजलि देने की कोशिश हो रही है और जो आपसे असहमत है, उसे बल प्रयोग और डराधमका कर चुप करने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे साधु प्रवृत्ति के विद्वानों की हत्या यह बताती है कि हमारे देश में प्रतिगामी व कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला बढ़ रहा है। ये तत्व तार्किक सोच को समूल उखाड़ फेंकना चाहते हैं।

हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों द्वारा अत्यंत आक्रामकता से उन लोगों का विरोध किया जा रहा है जो तार्किक सोच के पैरोकार हैं और जातिप्रथा व मूर्तिपूजा के विरोधी हैं। ये तत्व, हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति को मज़बूती दे रहे हैं। हालिया वर्षों में राममंदिर व गौहत्या जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों को सीढ़ी बनाकर यह राजनीति सत्ता तक पहुंची है। यह राजनीति ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म, जो कि जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराता है, पर आधारित है। दाभोलकर, पंसारे व कलबुर्गी जैसे व्यक्तियों की विचारधारा, हिंदुत्ववादी राजनीति की जड़ों पर प्रहार करती है। हिंदुत्ववादी, धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि हिंदू धर्म में ही अनेक विविध और परस्पर विरोधाभासी विचारधाराएं मान्यताएं सदियों से विद्यमान रही हैं। कलबुर्गी की हत्या, यथास्थितिवादियों और परिवर्तनकामियों के बीच चल रहे संघर्ष का प्रतीक है।

यह सुखद है कि इन नृशंस हत्याओं का जबरदस्त विरोध हो रहा है। विविधता और तार्किकता के समर्थक समूह सोशल मीडिया में इनका विरोध कर रहे हैं और इनके पीछे की विचारधारा का पर्दाफाश कर रहे हैं। इससे यह साफ है कि अभी भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो तार्किकतवादी मूल्यों में आस्था रखते हैं और यही हम सबके लिए आशा की किरण है। दाभोलकर की हत्या के बाद से कई ऐसे संगठन एक मंच पर आए हैं। वे असहिष्णु, परंपरावादी, आक्रामक दक्षिणपंथी राजनीति का विरोध करने के प्रति दृढ़संकल्पित हैं और सामाजिक परिवर्तन के इन पैरोकारों के अधूरे कार्य को पूरा करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)



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THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

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