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Friday, July 19, 2013

हिंदी समाज इतना असंवेदनशील क्यों है?डोंगरिया कंध आदिवासी नियमगिरी को देवता मानते हैं और इसलिए पर्वत की खुदाई नहीं चाहते!चूंकि आदिवासियों का धर्म हिंदुत्व नहीं है, इसलिए उनकी आस्था का हमारे लिए कोई मूल्य नहीं है।

हिंदी समाज इतना असंवेदनशील क्यों है?डोंगरिया कंध आदिवासी नियमगिरी को देवता मानते हैं और इसलिए पर्वत की खुदाई नहीं चाहते!चूंकि आदिवासियों का धर्म हिंदुत्व नहीं है, इसलिए उनकी आस्था का हमारे लिए कोई मूल्य नहीं है।


पलाश विश्वास



घटनाक्रम इतना तेज हो गया है कि मजबूरन लिखना पड़ रहा है।सोशल मीडिया के दोस्त परेशान हो जाते होंगे कि हमको क्या हो गया है। बाकी लोगों को भी स्पेस देना जरुरी होता है।मुश्कल यह है कि अंग्रेजी में लिखने से सत्तावर्ग और कारपोरेट समर्थक पढ़ लेते हैं लेकिन जिन लोगों को संबोधित करना होता है, वे असंबोधित रह जाते हैं। हमारे बहिस्कृत निनानब्वे फीसद जनगण अंग्रेजी ज्ञान के विशेषाधिकार से वंचित हैं। हमने अंग्रेजी में लिखने का दुस्साहस इसलिए किया कि शुरुआती दौर में हिंदी लिखना इतना आसान नहीं था। अब तकनीक का कुछ फायदा यह है कि निरंतर हिंदी में बिना किसी मुश्किल लिखा जा सकता है। सिंगुर नंदीग्राम समय में यह सुविधा नहीं थी। तब बंगाल को संबोधित करने की फौरी जरुरत भी थी। अब बांग्ला लिखना भी कठिन नहीं है, पर बांग्ला में सोशल मीडिया का अभी विकास हुआ नहीं हैं और न नेट पर लोग बांग्ला पढ़ने को अभ्यस्त हैं।


बीबीसी के मुतबिक रायगडा ज़िले के सेरकापाड़ी में हुई ग्राम सभा की बैठक ने नियामगिरि पर्वत में बॉक्साइट के खनन के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से ख़ारिज कर दिया है. यहां ब्रितानी वेदांता एल्युमीनियम कंपनी प्लांट लगाना चाहती है.ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 18 अप्रैल के अपने एक फ़ैसले में आदिवासियों के 'पवित्र पर्वत' पर खुदाई की इजाज़त दिए जाने या नकारने का निर्णय क्लिक करेंग्राम सभाओंपर छोड़ दिया था.सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल करते हुए राज्य सरकार ने नियामगिरि के इर्दगिर्द बसे रायगडा और कालाहांडी ज़िलों के 12 गावों में ग्राम सभा गठन की घोषणा की.गुरुवार को 12 ग्राम सभाओं की श्रृंखला में हुई पहली ग्राम सभा में उपस्थित सभी 38 सदस्यों ने नियामगिरि में खनन का कड़ा विरोध किया.

ग्राम सभा के सदस्यों ने कहा कि नियामगिरि पहाड़ को वे अपना देवता मानते हैं और उस पर खुदाई की इज़ाज़त कतई नहीं देंगे.


डोंगरिया कंध आदिवासी नियमगिरी को देवता मानते हैं और इसलिए पर्वत की खुदाई नहीं चाहते!



उच्चतम न्यायालय उड़ीसा के रायगढ़ और कालाहांडी जिले ग्राम सभाओं से मंजूरी मिलने तक नियमागिरि पहाडिय़ों में वेदांता समूह की बाक्साइट खनन परियोजना पर रोक लगा दी।आदिवासी ग्रामसभाओं ने इसकी मंजूरी नहीं दी है और उन पर दबाव बढता ही जा रहा है।न्यायमूर्ति आफताब आलम, न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की खंडपीठ ने इन दो जिलों की ग्राम सभाओं को भी इलाके में रहने वाले आदिवासियों सहित इस खनन परियोजना से जुड़े तमाम मसलों पर तीन महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।अनिल अग्रवाल प्रवर्तित वेदांत समूह को बॉक्साइट किल्लत के कारण 10 लाख टन सालाना क्षमता वाली लांजीगढ़ एल्युमिना रिफाइनरी बंद करनी पड़ी थी। समूह ने नियमगिरि पहाड़ी से बॉक्साइट के खनन के लिए राज्य सरकार की स्वामित्व वाली उड़ीसा माइनिंग कॉरपोरेशन के साथ करार पर हस्ताक्षर किए थे। इसके 15 वर्ष बाद लांजीगढ़ रिफाइनरी को बंद किया गया है।


बार बार आपकी नींद में खलल डालने की यह भूमिका है। अभी दो चार दिन ही बीते होंगे कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि जमीन जिसकी है, उस जमीन के नीचे खनिज भी उसीका। उसपर लिखते हुए हमने नियमागिरि मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था।समूह वेदांत एल्युमीनियम के तहत एल्युमीनियम कारोबार स्थापित करने के लिए छह वर्षों के दौरान करीब 30,000 करोड़ रुपये निवेश कर चुका है। कंपनी को उम्मीद थी कि संयंत्रों को चालू होने तक वह निजी (कैप्टिव) बॉक्साइट खदानों के लिए जरूरी मंजूरियां हासिल कर लेगी। वेदांत एल्युमीनियम ने अंतत: 1 एमटीपीए क्षमता का एक रिफाइनर, 0.5 एमटीपीए क्षमता का एक स्मेल्टर और 1,215 मेगावॉट क्षमता का एक बिजली संयंत्र चालू कर दिया, लेकिन बॉक्साइट खनन की मंजूरी नहीं मिली।


न्यायालय ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को निर्देश दिया कि ग्राम सभाओं से रिपोर्ट मिलने के बाद ही दो महीने के भीतर इस मामले में कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने राज्य के स्वामित्व वाली उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन की याचिका पर यह निर्देश दिया।


कॉर्पोरेशन ने ब्रिटेन स्थित वेदांता समूह की भारतीय कंपनी स्टरलाइट इंडस्ट्रीज लि के नियामगिरि बाक्साईट खनन परियोजना की पर्यावरण मंजूरी रद्द करने के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के निर्णय को चुनौती दी थी। मंत्रालय ने वन परामर्श समिति की सिफारिश स्वीकार करते हुए लांजीगढ़, कालाहांडी और राजगढ़ जिलों में नियामगिरि की पहाडिय़ों में ओएमसी और स्टरलाइट की खनन परियोजना को दूसरे चरण की वन मंजूरी देने से इंकार कर दिया था।


इस मामले की सुनवाई के दौरान ओएमसी और स्टरलाइट इंडस्ट्रीज ने दावा किया था कि नियमगिरि की पहाडिय़ों में खनन गतिविधियों के कारण पारिस्थितिकी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ है।पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और आदिवासी अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे समूहों ने इसका विरोध करते हुए आरोप लगाया था क इस परियोजना में पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन हुआ है।



मुश्किल यह है कि इस देश में लोकतंत्र का ताना बाना बहुत विकेंद्रित हो गया है। कहने को पंचायती राज और स्वायत्त निकाय हैं। उनपर करोड़ों का न्यारा वार भी है बाजार के विस्तार के लिए विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज से चलायी जा रही सामाजिक योजनाओं के कारण। इसे लेकर मारामारी कितना प्रबल है, बगाल के आत्मघाती अराजक हिंसा उसका ज्वलंत उदाहरण है। यह सत्ता में जनता की भागेदारी उतनी नहीं है, जितना कि अनुदानों और ठेकों की लूट। उसीतरह संविधान भी है और संसदीय प्रणाली भी। संविधान अभी बहिस्कृत भूगोल में कहीं लागू हुआ नही है और न इस देश में संविधान लागू करने के लिए अब तक कोई आंदोलन है। सर्वत्र अपने अपने तरह के मुक्ति संग्राम और अपने अपने तरह के मुक्तांचल जरुर है।संसदीय प्रणाली बाहुबलियों और कारपोरेट तत्वों के हाथों बेदखल है जो अबाध पूंजी प्रवाह और कालाधन के प्रति जिम्मेवार है, जनता के प्रति नहीं। लोक कल्याणकारी राज्य के बजाय मुक्त बाजार का आखेटगाह है। सारी अनिवार्य सेवाएं क्रयशक्ति सापेक्ष हैं। कानून का राज कहीं है ही नहीं।


इसी हकीकत की जमीन पर नियमागिरि और वहां रहने वाले आदिवासियों का भूत भविष्य और वर्तमान है, सुप्रीम कोर्ट के क्रांतिकारी फैसले से जो बदलने वाले नहीं हैं। अरुंधति राय का लिखा जिन लोगों को विकास विरोधी लगता है, वे ही लोग इस देशके भाग्य विधाता है ौर जनगणमन भी उन्ही के लिए। वंदेमतरम भी। इस देश में विकल्प मात्र दो है। नरम हिंदुत्व या गरम हिंदुत्व। नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी। बाकी लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, नागरिकता, नागरिक मानव अधिकार, पर्यावरण, संविधान, संसद, विधानसभा , कानून का राज और यहांतक कि सुप्रीम कोर्ट और समूची न्याय प्रणाली अप्रासंगिक हैं।


इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला न नियमागिरि में,न दंडकारण्य में अन्यत्र कही, न कश्मीर या पूर्वोत्तर में और न हिमालय में लागू होने और अबाध पूंजी व कालाधन की विकासगाथा बाधित होने की कोई आशंका है। सबकुछ ठीकठाक है।


आज कोलकाता के प्रेस क्लब में प्रख्यात गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशुकुमार की प्रेस  कांफ्रेंस थी दोपहर बाद तीन बजे। लेकिन बीटी रोड दोपहर से ही अवरुद्ध हो गया राजनीतिक संघर्ष से। हिमांशु जी सोनी सोरी प्रकऱम पर बोलने वाले थे। वे छत्तीसगढ़ और दंडकारण्य की घटनाओं का आंखों देखा हाल बताते रहते हैं। अरुंधति का लेख न पढ़ने वाले लोगों को भी हिमांशु जी का लिखा मिल जाता है। बंगाल में महाश्वेता दी का समूचा साहित्य आदिवासियों के जीवनऔर संघर्ष पर केंद्रित है। जिनका खूब अनुवाद हुआ है। इसके बावजूद हिंदी समाज में न नियमागिरि और न दंडकारण्य और न आदिवासियों को लेकर कोई हलचल है। हिंदी समाज मुख्यधारा है और राष्ट्रभाषा में संवाद करता है। राजनीति की दशा दिशा तय करता है और हिंदुत्व का सबसे प्रबल झंडेवरदार है। जबकि दंडकारण्य के इलाकों में ज्यादातर हिंदी प्रदेश हैं। झारखंड  हिंदीभाषी है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेस भी हिंदी भाषी है। महाराष्ट्र का नागपुर हिंदी का गढ़ हुआ करता है , जिसको घेरे हुए हैं चंद्रपुर, गढ़चिरौली,गोंडिया और भंडारा जैसे आदिवासी इलाके। उड़ीशा और आंध्र के आदिवासी इलाकों में भी हिंदी ही संवाद का माध्यम है। और तो और, जिस मणिपुर और पूर्वोत्तर में हिंदी लगभग निषिद्द हैं, वहां भी हिंदी ही संवाद औस संपर्क की भाषा है।


हमारे उत्तराखंड ने हिंदी को बेहतरीन साहित्यकार, पत्रकार दिये जबकि उनकी मातृभाषा या तो कुमांयनी है या गढ़वाली। हिमालय के गर्भ सेतमाम नदिया ं निकली हैं। पवित्र और अपवित्र। हिंदुत्व के सारे कर्मकांड जिन पवित्र नदियों के जल से संपन्न होते हैं वे हिमालय से ही निकलती हैं। यही नहीं चार धामों वाले उत्तराखंड अपने को सवर्ण कहता है। उत्तरखंड राज्य का निर्माण भी आरक्षण विरोध की वजह से हुआ, पर्वरण आंदोलन के कारण नहीं। लेकिन हिंदी भाषी समाज और हिंदुत्व को इस देवभूमि की कितनी परवाह है हिमालयजलप्रलय ने पूरे देश को स्पर्श किया चार धामों में फंसे तीर्थयात्रियों के कारण। बाकी हिमालय या हिमालयवासियों से हिंदीभाषियों का कोई लेना देना नहीं है। ठीक वैसा ही जैसे आदिवासियों का अपना स्वजन नही मानता हिंदी समाज। हिंदूराष्ट्र नेपाल के नागरिक और बंगाल की गोरखाभूमिके लोग हमारे लिए सिर्फ गोरखे हैं। उत्तराखंड और हिमाचली लोग महज पहाड़ी, मुख्यधारा से बाहर के लोग। ठीक वैसे ही जैसे कश्मीरी, मणिपुरी या फिर नगा।


हिंदी समाज की राजनीति जाति और धर्म की अस्मिता पर आधारित है। हिंदी चेतना भी हिंदुत्व से उद्बुद्ध है। हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान। इसके परे हिंदी समाज का कोई प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष सोच नहीं है। पेरियार का हिंदी विरोधी स्वाभिमान आंदोलन कोई हिंदी विरोधी आंदोलन नही है, यह हिंदुत्व में ओतप्रोत हिंदी मुख्यधारा की सामंती, सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी मानसिकता और वर्चस्व के विरुद्ध है। मणिपुर में भी लोग यही कहते हैं कि हिंदी से उनका विरोध नहीं है विरोध है केद्रीकृत हिंदुत्ववादी हिंदी सत्ता से, जो नरेंद्र मोदी के गुजरात गौरव कोतो आत्मसात करता है लेकिन बाकी समुदायों के वजूद से सिरे से इंकार करता है।


इस देश में स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल विरोध तक इतिहास गवाह है कि जब जब हिंदी समाज ने करवट बदली है, इतिहास का निरमाण हुआ है। अपनी शक्ति से हिंदी समाज अभी अनजान है। इस देश में आदिवासी भूगोल, हिमालय और पूर्वोत्तर को अगर मुख्यधारा में लोकतांत्रिक प्रणाली में शामिल करना है और सचमुच भारत लोकगणराज्य को महाशक्ति में उन्नीत करना है तो पहल हिंदी समाजको ही करनी है।आदिवासी भूगोल के खिलाफ युद्धघोषणा इसलिए है कि हिंदी समाज ने प्रतिवाद नही किया। उसीतरह सशस्त्र सैन्.बल अधिनियम की बेशरम निरंकुश निर्ममता इसलिए जारी है कि हिंदी समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सोनी सोरी. इरोम शर्मिला और सीमा आजाद, कबीर कला केंद्र की आवाज में आवाज मिलाकर तो देखें कि हालात कैसे बदलते हैं। हिदी समाज उठ खड़ा हो तो कानून का राज बहाल होगा और संविधान भी लागू होगा। फिर आदिवासियों के हक में हिंदी समाज ने आवाज उठायी तो उसे संवैधानिक रक्षाकवच भी मिलेंगे और लागू होंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी।


हिंदी समाज इतना असंवेदनशील क्यों है?


स्थानीय पत्रकार मनोज पात्र ने बीबीसी को बताया कि बैठक स्थल पर पुलिस की तगड़ी उपस्थति के बावजूद सदस्यों ने खुलकर अपना विरोध जताया और स्पष्ट किया की वे मरते दम तक नियामगिरि में खनन का विरोध करते रहेंगे.


बैठक की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार रायगडा ज़िला जज शरत चन्द्र मिश्र वहां बतौर पर्यवेक्षक उपस्थित थे.


कुछ आदिवासियों ने 'कुई' भाषा में अपनी बात कही, जिसका एक इंटरप्रेटर के ज़रिए तरजुमा किया गया और फिर उसे कागज़ पर लिखकर उस पर सदस्यों के हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान लिए गए.


हालाँकि राज्य सरकार और वेदांता दोनों ही सेरकापाड़ी ग्राम सभा की बैठक के बारे में प्रतिक्रिया देने से कतरा रहे हैं. लेकिन माना जा रहा है कि फ़ैसले से दोनों को गहरी निराशा हुई होगी.


डोंगरिया कंध आदिवासी नियमगिरी को देवता मानते हैं और इसलिए पर्वत की खुदाई नहीं चाहते.


दूसरी तरफ़ नियामगिरि में खनन का विरोध कर रहे संगठन ग्राम सभा के फ़ैसले से काफ़ी उत्साहित है.


'इरादा तर्क करे'


बीबीसी के मुतबिक  डोंगरिया कंध आदिवासियों का संगठन नियामगिरि सुरक्षा समिति के सलाहकार भालचंद्र सडन्गी ने बीबीसी से टेलीफोन पर बातचीत में कहा, "बाक़ि 11 ग्राम सभा में भी यही होगा इसलिए सरकार को क्लिक करेंदीवार पर लेखको पढ़ लेना चाहिए और नियामगिरि में बॉक्साइट खनन का इरादा छोड़ देना चाहिए."


नियामगिरि सुरक्षा समिति ने पहले ही आरोप लगाया है कि पर्वत के आसपास 100 से भी अधिक गाँव होने के बावजूद ओडिशा सरकार ने केवल 12 गाँव में ग्राम सभा कराने का निर्णय लेकर वेदांत के लिए रास्ता आसान करने की कोशिश कर रही है.


समिति ने घोषणा की है कि वह 112 गावों में ग्राम सभा आयोजित करेगी तथा बैठक की विडियो रिकॉर्डिंग और उनमें पारित प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट के पास भेजेगी.


ग़ौरतलब है कि नियामगिरि में खनन पर पर्यावरण मंत्रालय द्वारा लगाए गए प्रतिबन्ध के कारण पर्वत के निकट कालाहांडी ज़िले के लांजिगढ़ में वेदांत द्वारा लगाई गई एक मिलियन टन की रिफ़ाइनरी पिछले दिसम्बर पांच से बंद पड़ी है.


प्लांट पर ख़तरा


बीबीसी के मुतबिक  अगर वेदांता को नियामगिरि में खुदाई की अनुमति नहीं मिलती तो न केवल यह रिफ़ाइनरी बल्कि झारसुगुडा में कंपनी के स्मेल्टर प्लांट की भी बंद होने की नौबत आ जाएगी और कंपनी द्वारा 40, 000 करोड़ की लागत पर बनी यह पूरी परियोजना ख़तरे में पड़ जाएगी.


सन 2003 में वेदांता और राज्य सरकार के उपक्रम ओडिशा माइनिंग कंपनी या ओएमसी के बीच हुए समझौते के अनुसार वेदांता अगले 30 सालों में क़रीब 150 मिलियन टन बॉक्साइट का खनन करने वाली थी.


लेकिन स्थानीय डोंगरिया कोंध आदिवासियों के विरोध और अदालत में चल रहे मामलों के कारण कंपनी अभी तक यहाँ से एक ग्राम बॉक्साइट भी नहीं निकाल पाई है.



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