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Tuesday, June 25, 2013

सरकारों को लाशों से मतलब नहीं, उसे बस ‘विकास’ चाहिए

सरकारों को लाशों से मतलब नहीं, उसे बस 'विकास' चाहिए

25 JUNE 2013 ONE COMMENT
Myrtyre Memorial
शहीद स्‍थल

Tata Project
टाटा स्‍टील प्रोजेक्‍ट

♦ ग्लैडसन डुंगडुंग

दोजनवरी, 2006 को उड़ीसा के जजपुर जिले के कलिंगनगर में टाटा कंपनी के प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड परियोजना का विरोध करने वाले आदिवासियों पर बम और बंदूक से हमला किया गया। 19 आंदोलनकारी मारे गये। इतिहास बताता है कि जहां-जहां आंदोलनकारी शहीद हुए हैं, वहां उनकी जमीन बच गयी है। इसलिए कलिंगनगर जाते समय मेरे मन में भी काफी उत्साह था उस आंदोलन के बारे में जानने के लिए। मैं उन बहादुर आदिवासी शहीदों के बारे में जानना चाहता था, जिन्होंने अपने पूवजों की धरोहर को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। लेकिन कलिंगनगर पहुंचते ही मेरे होश उड़ गये क्‍योंकि वहां टाटा कंपनी का एक विराट स्टील प्लांट खड़ा किया जा रहा है। फिर भी हम बचे हुए आंदोलनकारियों को खोजने लगे। शाम होते ही कलिंगनगर रोशनी की चकाचौंध भरी छटा से सराबोर हो गया। आधुनिक दौड़ में इसी को विकास कहते हैं विकास पंडित। लेकिन हम तो इस रोशनी में भी उन आदिवासियों को देखना चाहते थे, जिनकी जमीन पर टाटा कंपनी की विशाल इमारत खड़ा की जा रही है। निश्चय ही आदिवासी दिखे, लेकिन अपनी ही जमीन पर मजदूरी करते हुए। टाटा प्लांट के बाहर सैकड़ों की संख्या में हड़िया बेचते हुए। और कुछ लोग इस चिंता में पड़े हुए मिले कि उनका अस्तित्व बच पाएगा या नहीं। कुल मिलकर कहें तो भविष्‍य अंधकारमय!

कंलिंगानगर का इलाका 'हो' आदिवासी बहुल था। लेकिन नीलाचल और टाटा कंपनी की स्थापना के बाद यहां गैर-आदिवासियों की संख्या निरंतर बढ़ने लगी है। नये-नये रेस्टोरेंट, होटल और टाउनशिप का निमार्ण हो रहा है। आदिवासियों के साथ एक और बड़ी त्रासदी यह है कि निलाचल, टाटा कंपनी और उड़ीसा सरकार ने तो विकास के नाम पर उनसे लगभग 13 हजार एकड़ जमीन छीन ली है। लेकिन इन कंपनियों में नौकरी करने आये गैर-आदिवासियों ने भी गैर-कानूनी तरीके से उनकी बची-खुची जमीन को हड़पने का प्रयास जारी रखा है, जो तब तक चलता रहेगा जब तक यहां के आदिवासी पूरी तरह से लुट नहीं जाते हैं। गांवों से शहरों में विकसित किया गया जमशेदपुर, रांची, बोकारो, राउरकेला या आप कहीं का भी उदाहरण ले लीजिए – वे इसी तरह लूटे गये हैं और लूटे जा रहे हैं। आज के जमाने में विकास का मतलब ही यही है कि आदिवासियों से उनकी जमीन, जंगल, पानी, खनिज और पहाड़ छीनकर पूंजीपतियों को दे देना। और जिन-जिन राज्यों की सरकारें इसमें जितना ज्यादा माहिर हैं, उसे उतने ही ज्यादा तेजी से उभरता हुआ राज्य कहा जा रहा है। अब इस सूची में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा पहले और दूसरे पायदान पर दिखाई दे रहे हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि इन राज्यों में आदिवासियों के संसाधनों को लूटने की रफ्तार कितनी तेज है।

आदिवासियों के कलिंगनगर आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। यह क्षेत्र सुकिंदा कहलाता है, जहां सुकिंदा राजा का शासन चलता था। कहा जाता है कि सुकिंदा और पोड़हाट के राजाओं के बीच काफी अच्छी दोस्ती थी। सुकिंदा राजा के पास प्रजा बहुत कम थे इसलिए जंगल की रक्षा हेतु उन्होंने पोड़हाट के राजा से कुछ प्रजा अपने यहां भेजने का आग्रह किया। इस पर पोड़हाट के राजा राजी हो गये और आदिवासियों को यहां भेज दिया। इस तरह से आदिवासी यहां पर आये। सुकिंदा राजा ने आदिवासियों की मेहनत को देखकर उन्हें यहीं बसाया और उन्हें जमीन भी दे दी। इसके बाद में और भी आदिवासी इस क्षेत्र में आये, जिन्होंने जंगल साफ कर खेती योग्य जमीन बनायी। आज भी आदिवासियों के पास राजा द्वारा निर्गत पट्टा उपलब्ध है। हालांकि 1928 में पहली बार अंग्रेज सरकार ने जमीन का सेटलमेंट किया लेकिन उस समय भी सभी को पट्टा नहीं दिया गया। यहां के आदिवासी आज भी जमीन पर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि जमीन उनकी आजीविका का संसाधन भर नहीं है बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, इतिहास, विरासत और अस्तित्व भी जमीन पर ही निर्भर है।

1991 में उदारीकरण के तुरंत बाद सरकार की नजर इस क्षेत्र पर पड़ी। 1992 में उड़ीसा सरकार ने यहां ''कलिंगनगर इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स'' के निर्माण लिए जमीन अधिग्रहण कानून 1894 के तहत जमीन का मूल्य प्रति एकड़ 37,000 रुपये निर्धारित कर अधिग्रहण शुरू किया लेकिन आदिवासियों ने इसका भारी विरोध किया। इसी बीच कुछ गैर-आदिवासी लोग सरकार को जमीन देने के लिए तैयार हो गये। इस तरह से सरकार ने 13,000 एकड़ जमीन को अधिगृहित घोषित कर दिया लेकिन रैयतों से जमीन हासिल करने में असमर्थ रहा। इसी बीच कुछ अधिगृहित जमीन पर भूमि पूजन भी किया गया लेकिन फिर से रैयतों के विरोध के कारण काम शुरू नहीं किया जा सका। इसी बीच भूषण कंपनी और सिमलेक्स कंपनी ने भी इस क्षेत्र में जमीन लेने का प्रयास किया लेकिन आदिवासियों के भारी विरोध की वजह से वे भी अपने मनसूबे में कामयाब नहीं हुए।

फिर 1997 में उड़ीसा सरकार के सहयोग से चलने वाली कंपनी 'नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड' का यहां आगमन हुआ। कंपनी ने प्रतिवर्ष 1.1 मिलियन टन आयन और स्टील उत्पादन क्षमता वाले प्लांट की स्थापना का प्रयास शुरू किया। कंपनी ने जमीन के बदले मुआवजा और नौकरी देने के नाम पर आदिवासियों से लगभग 2500 एकड़ जमीन मांगा। जब आदिवासी लोग इसके लिए तैयार हो गये, तो कंपनी ने पूरी जमीन पर घेरा डाल दिया। इसके बाद सेरेंगसाई, खोडयापुम, सरामपुर, डोंकागडिया और हेसाकुंडी के लगभग 1000 घरों को बुलडोजर से रौंद दिया गया और विरोध करने वाले आदिवासियों को पुलिस द्वारा लाठी चलवाया गया और उन्हें जेलों में डाल दिया गया। इसके बाद बचे हुए लोगों को गोबरघाटी कॉलोनी में डंप कर दिया गया तथा सात वर्षों तक उन्हें न मुआवजा और न ही नौकरी दी गयी। कंपनी के रवैये को देखते हुए आदिवासियों ने 2004 में ''विस्थापन विरोधी जनामंच'' का गठन कर कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आदिवासियों के भारी विरोध को देखते हुए नीलाचल कंपनी ने रैयतों को जमीन का मुआवजा और नौकरी देना शुरू किया। हालांकि अभी भी सभी रैयतों को मुआवजा और नौकरी नहीं मिल पायी है। आंदोलन के नेतृत्वकर्ता चक्रधर हाईब्रू कहते हैं कि आंदोलन नहीं होने से रैयतों को कुछ भी नहीं मिलता।

इसी बीच 17 नवंबर, 2004 को ओड़िसा सरकार और टाटा कंपनी के बीच ग्रीनफिल्ड परियोजना हेतु एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर किया गया। कलिंगनगर परियोजना टाटा की दूसरी सबसे बड़ी ग्रीनफिल्ड परियोजना है, जो दो फेज में तीन-तीन मिलियन टन की बनेगी, जिसकी लागत 15,400 करोड़ रुपये है और जिसके लिए कंपनी को कुल छह हजार एकड़ जमीन की जरूरत है। सरकार ने टाटा कंपनी को 3471.808 एकड़ जमीन दे दी है, जो उड़ीसा इंडस्ट्रियल इनफ्रास्‍ट्रक्‍चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन द्वारा हस्तांतरित है, जिसमें 2755.812 एकड़ जमीन 1195 परिवारों से ली गयी है। टाटा कंपनी दावा करती है कि सरकार ने रैयतों से 1992 में ही भूमि अधिग्रहण कानून 1894 की धारा-34 के तहत मुआवजा दे दिया था लेकिन विस्थापित लोगों को जमीन से बेदखल नहीं किया गया था। इस तरह से टाटा कंपनी इस क्षेत्र में प्रवेश कर गयी और परियोजना लगाने का प्रयास शुरू कर दिया।

दो जनवरी, 2006 को टाटा कंपनी ने बुलडोजर लगाकर जमीन का समतलीकरण शुरू किया, जिसको देखते हुए आदिवासियों के बीच आक्रोश पैदा हुआ और वे काम रोकने के लिए प्रस्तावित परियोजना स्थल पर गये, जहां पुलिस के साथ सीधा संघर्ष हुआ। आंदोलन के नेता अमर सिंह वानारा बताते हैं कि परियोजना स्थल को लगभग तीन सौ सुरक्षा बलों ने घेर रखा था और कंपनी के लोगों ने जमीन में लैंड माइंस बिछाया था, इसलिए जैसे ही आंदोलनकारी वहां विरोध करने पहुंचे, लैंड माइंस बलास्ट किया गया और लोगों के ऊपर फायरिंग भी की गयी। फायरिंग में मौके पर ही 12 लोगों की मृत्यु हो गयी और 50-60 लोग बुरी तरह घायल हो गये। इतना ही नहीं, कंपनी के लोगों ने लाशों के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया। चक्रधर हाईब्रू और अमर सिंह वानारा दोनों बताते हैं कि पोस्ट मॉर्टम के बाद जब उन्हें लाश दी गयी, तब कुछ महिलाओं के स्तन और कुछ के हाथ कटे हुए थे। इससे जनाक्रोश और ज्यादा बढ़ गया। आंदोलनकारियों ने सभी शहीदों का अंतिम संस्कार एक ही जगह किया, जहां शहीद स्थल का निर्माण किया गया है। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 12 लोग एक साथ मारे गये थे और सात लोगों की मौत इलाज के दौरान अस्पाताल में हुई। इस तरह से कलिंगनगर गोलीकांड में कुल 19 आदिवासी लोग शहीद हो गये।

इस घटना के बाद आंदोलन और ज्यादा तेज हो गया। कलिंगनगर से पारादीप जाने वाली सड़क को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया, जो 14 महीनों तक जारी रहा। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि टाटा कंपनी के लिए परियोजना लगाना मुश्किल दिखाई दे रहा था। और जब 19 लोग शहीद हुए हों, तो मानवता के नाते भी टाटा कंपनी को परियोजना वापस ले लेना चाहिए था। लेकिन टाटा कंपनी को सिर्फ और सिर्फ लाभ चाहिए। उन्हें मानवता से क्या लेना देना? टाटा कंपनी ने कई गांवों के युवाओं को पैसे का लालच देकर दलाल बनाया। इसका सबसे बड़ा साक्ष्‍य यह है कि गांवों में आधुनिक गाड़ियां बॉलेरो, पजेरो, स्कॉरपियो इत्यादि देखा जा सकता है। ये गाड़ियां गांवों में कैसे पहुंची? आंदोलनकारियों के खिलाफ फर्जी मुकदमा किया गया। आठ आंदोलनकारियों को कंपनी के एक कर्मचारी की हत्या करने के आरोप में जेल भेज दिया गया। चक्रधर हाईब्रू, रवि जारिका, चक्रधर हाईब्रू (जूनियर), तुरम पूर्ति, प्रताप चाला इत्यादि के खिलाफ माओवादी होने का आरोप लगाकर फर्जी मुकदमा दर्ज किया गया। कोई भी ऐसा आंदोलनकारी नहीं है, जिसको पुलिस ने धमकाने की कोशिश नहीं की। पुलिस आंदोलनकारियों को बाजार, घर या तालाब कहीं से भी उठा लेती थी। इस तरह से लगभग 120 लोगों को जेल में डाला गया। आंदोलन को तोड़ा गया, जिसमें राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं ने भी इसमें प्रमुख भूमिका निभायी क्योंकि उन्हें भी पैसे का लालच दिया गया।

इतना ही नहीं, जजपुर जिले के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और सहायक पुलिस अधीक्षक लगातार आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं के पास जाकर उन्हें समझाने व धमकाने की कोशिश में जुटे रहे। ऐसा लगने लगा था कि जजपुर जिले का प्रशासन और पुलिस दोनों सिर्फ टाटा कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। आंदोलन के नेता चक्रधर हाईब्रू बताते हैं कि जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और सहायक पुलिस अधीक्षक उसके यहां जाते थे और उसे गेस्ट हाउस भी बुलाकर यही कहते थे कि वे कंपनी का विरोध नहीं करें, नहीं तो उन्‍हें इसके लिए भुगतना पड़ेगा। पुलिस दमन के कारण आंदोलनकारी और ग्रामीण भयभीत हो गये व जमीन देने के अलावा उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा। आंदोलनकारी अमर सिंह वानरा कहते हैं कि राजकीय दमन ने आदिवासियों को जमीन छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। हार कर आदिवासियों ने टाटा कंपनी को अपनी जमीनें दे दी। इस परियोजना से सनचानडिया, बैइबुरू, चंपाकोयला-1, कालामाटी, चंडिया, बालिगोथा, गोबरघाटी, बमियागोथा, चंपाकोयला-2, अंबागडिया, ससोगोथा, गदापुर और बंदगाडिया गांवों के लगभग छह हजार लोग विस्थापित हो गये। उनके गांवों को बुलडोज कर उन्हें ट्रांजिट कॉलोनियों में रख दिया गया और प्रचार किया गया कि वे स्वयं ही जमीन देने के लिए राजी हो गये और टाटा परिवार के सदस्य बन गये हैं।

टाटा कंपनी की कलिंगनगर परियोजना का निर्माण ठेका पर किया जा रहा है, जिसमें 35 हजार मजदूर प्रतिदिन 170 रुपये की हाजरी पर कार्यरत हैं। यह अलग बात है कि ओवर टाइम काम करके वे ज्यादा पैसा कमा लेते हैं लेकिन वे प्रतिदिन शाम में नशीले पदार्थों का सेवन कर अपनी सेहत भी बिगाड़ रहे हैं। और यह करना उनकी मजबूरी है वरना काम ही नहीं कर पाएंगे। इतना ही नहीं कंपनी के बाहर सैकड़ों की संख्या में हड़िया दुकान, दारू दुकान और छोटी-छोटी अन्य दुकानें हैं। मीडिया की भाषा में ये सारे रोजगार हैं, जो कंपनी द्वारा पैदा किया जाता है। इसमें हास्यास्पद बात यह है कि जहां भी कोई बड़ी परियोजना का निर्माण होता है, उसमें दिहाड़ी मजदूरी, उसके इर्द-गिर्द लगने वाली सभी तरह की दुकानें हड़िया-दारू दुकान सहित रोजगार के श्रेणी में आती हैं लेकिन वहीं काम आम जगहों पर होने पर रोजगार की श्रेणी में नहीं गिने जाते हैं। कभी-कभी तो इसे गैर-कानूनी कार्य की श्रेणी में भी रखा जाता है और लोगों को जेल भी जाना पड़ता है। सवाल यह भी है कि 35 हजार मजदूरों का भविष्‍य क्या है? क्या प्लांट तैयार हो जाने के बाद उन्हें बाहर नहीं कर दिया जाएगा? बड़े उद्योग को ही विकास और रोजगार बताकर ढोल पीटने वाले मीडिया को इसका जवाब देना चाहिए।

26 जनवरी, 2001 को देश के पूर्व राष्‍ट्रपति केआर नारायणन ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्‍ट्र को संबोधित करते समय देशवासियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि ''आनेवाली पीढ़ी हमें यह न कहे कि इस हरी-भरी धरती और उस पर सदियों से वास करने वाले बेगुनाह आदिवासियों को बर्बाद कर भारतीय गणतंत्र का निर्माण किया गया''। लेकिन कलिंगनगर का दौरा करने के बाद मुझे यह विश्वास हो चुका है कि भारतीय गणतंत्र को आदिवासियों की हत्या करने में शर्म नहीं आती है। और वह लगातार आदिवासियों की लाश पर इस आधुनिक भारत के निर्माण में लगा हुआ है। अब मेरा विश्वास भी तथाकथित लोकतंत्र से लगातार टूटता जा रहा हैं। आजकल राष्‍ट्रीय टेलीविजन चैनलों में हम आदिवासियों को यह लेक्चर दिया जा रहा है कि अगर हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो हमें लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठानी चाहिए न कि बंदूक की गोली से। मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि आप किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं? क्या कलिंगनगर के आदिवासी बंदूक लेकर टाटा कंपनी का विरोध कर रहे थे? जब जिले का उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक पूंजीपतियों को जमीन दिलाने में दिन-रात एक कर दे, तो आदिवासी लोग किसके पास जाए? जिले के उपायुक्त को ही तो आदिवासियों की जमीन रक्षा का जिम्मा दिया गया है? आदिवासियों के लिए लोकतंत्र कहां है?

टाटा कंपनी की कलिंगनगर परियोजना का नारा है ''नया जीवन, नयी आशा'' … लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि 19 आदिवासियों की हत्या कर उनकी जमीन पर विकास की इमारत खड़ा करने वाली टाटा कंपनी आदिवासियों को क्या नया जीवन और नयी आशा दे सकती है? क्या 19 शहीदों का कोई मूल्य भी है? क्या कंपनी और सरकार तब भी इसी तरह का व्यवहार करते, जब 19 गैर-आदिवासी वहां शहीद हो गये होते? आदिवासियों की लाश पर विकास की इमारत खड़ा करने से पहले पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून की अनदेखी क्यों की गयी? क्यों आदिवासियों से यह नहीं पूछा गया कि वे क्या चाहते हैं? क्या इस लोकतंत्र में आदिवासियों का कोई अधिकार ही नहीं है? आदिवासियों को चारों तरफ से क्यों लूटा जा रहा है? क्या तथाकथित मुख्यधारा में शामिल लोगों के पास मानवता, नैतिकता और भाईचारा ही नहीं बची है? अगर ऐसा ही है तो आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल कर आप उन्हें भी लूटेरा मत बनाइए। आदिवासियों को आदिवासी ही रहने दीजिए क्‍योंकि हम हरी-भरी धरती और किसी की लाश पर विकास की इमारत खड़ा नहीं करना चाहते हैं।

(ग्‍लैडसन डुंगडुंग। मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक। उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चा में आये। आईआईएचआर, नयी दिल्‍ली से ह्यूमन राइट्स में पोस्‍ट ग्रैजुएट किया। नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्‍टडीज, पुणे से इंटर्नशिप की। फिलहाल वो झारखंड इंडिजिनस पीपुल्‍स फोरम के संयोजक हैं। उनसे gladsonhractivist@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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