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Monday, June 10, 2013

अल्पसंख्यक वोट बैंक खोने के डर से दीदी ने उछाला असंभव तीसरे मोर्चे का नारा!

अल्पसंख्यक वोट बैंक खोने के डर से दीदी ने उछाला असंभव तीसरे मोर्चे का  नारा!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


भाजपा में मचे घमासान के बीच बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपनी ताजा फेसबुक पोस्ट के जरिये तीसरे मोर्चे का नारा उछाला है। ऐसा नहीं है कि लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के इस्तीफे से संघपरिवार के लोकसभा अभियान में कोई फर्क पड़ने वाला है। आडवाणी को मनाने की कोशिशें जारी हैं , वे माने तो ठीक वरना किनारे कर दिये जायंगे। यह कटु सत्य है कि भाजपा कलिए आडवाणी से ज्यादा नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों के लिए बेहतर नेता हैं।


भाजपा के अंतर्कलह से केंद्र में सत्ता समीकरण भी तत्काल बदलने वाली नहीं है। चाहे अल्पमत की ही गठबंधन सरकार  क्यों न हो, उसकी अगुवाई कांग्रेस करेगी या फिर भाजपा। कम से कम तृणमूल कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र सरकार की अगुवाई करने का कोई मौका नहीं है।


क्षत्रपों की बारात में तो कोई बाराती है ही नहीं, हर कोई दूल्हा है और अपनी अपनी घोड़ी से उतरने को तैयार नहीं है।लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई क्षेत्रीय दलों के संघीय मोर्चे के गठन का आह्वान किया और कहा कि कार्ययोजना तय की जानी चाहिए।यह सही है कि अनेक क्षेत्रीय नेता आज अपने अपने क्षेत्रों में मजबूत स्थिति में हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बहुत मजबूत हैं, तो ओडिशा में नवीन पटनायक, बिहार में नीतीश कुमार हैं, तो तमिलनाडु में कुमारी जयललिता। और अब उत्तर प्रदेश की सत्ता अखिलेश यादव के हाथ में आ गई है।लेकिन इस मोर्चे के लिए दीदी के अलावा मुलायम सिंह भी आवाज देते रहे हैं। पर कहीं सुनवाई नहीं हुई है। तीसरे मोर्चे की पिछली सरकारों में लालू यादव और राम विलास पासवान की भूमिका भी खास रही है, जो अब तीसरे मोर्चे के बारे में बात भी नहीं कर रहे हैं।इसके अलावा तीसरे मोर्चे में शामिल हो सकने वाली संभावित पार्टियों के चरित्र को देखें, तब यह दिखाइ्र पड़ता है कि वे अव्वल दर्जे की अवसरवादी हैं और उनका अपने क्षेत्र से बाहर कोई प्रभाव नहीं है। वामपंथी पार्टियों का इस मोर्चे में क्या स्थान होगा, यह एक अलग सवाल है। ममता बनर्जी वामपंथी पार्टियों की सख्त विरोधी हैं। वामपंथी पार्टियों की हालत पिछले चुनाव में खस्ता हो गई थी और उनकी संख्या 62 से घटकर 24 हो गई थी।मोर्चे के रास्ते में ममता बनर्जी का वाम विरोध भी एक बड़ा रोड़ा है। मुलायम सिंह वामपंथी दलों को छोड़कर कोई मोर्चेबंदी नहीं करना चाहेंगे और ममता बनर्जी किसी भी सूरत में वामपंथी दलों के साथ एक मोर्चे में दिखाई पड़ना नहीं चाहेंगी। यदि इस तरह का कोई मोर्चा बन भी गया, तो वह बिना कांग्रेस अथवा भाजपा के समर्थन के सरकार का गठन कर ही नहीं सकता।


ममता बनर्जी ने बिना किसी दल का नाम लिए क्षेत्रीय दलों से अपनी एक अपील में कहा कि हमें साथ खड़ा हो जाना चाहिए। हमें आपस में बातचीत करनी चाहिए। हमें अगले लोकसभा चुनाव के लिए कार्ययोजना तय करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय दलों के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में संघीय मोर्चा बनाने का समय आ गया है।संप्रग की पूर्व सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता ने कहा कि मैं सभी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई दलों से देश को कुशासन एवं जन विरोधी फैसलों से मुक्त कराने के लिए एकजुट संघर्ष शुरू करने तथा बेहतर एवं उज्ज्वल भारत के निर्माण के लिए साथ मिलकर काम करने की अपील करती हूं।


हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने तीसरे मोर्चे को समय की जरूरत बताते हुए जालंधर में कहा कि क्षेत्रीय दलों के आपसी गठबंधन से आगामी आम चुनाव के पहले या बाद में तीसरा मोर्चा अस्तित्व में आएगा।उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार के कुशासन को उखाड़ फेंकने के लिए देश में तीसरा मोर्चा समय की मांग है। चुनाव से पहले या चुनाव के बाद यह निश्चित तौर पर अस्तित्व में आएगा हालांकि अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दीबाजी होगी। तेलुगुदेशम पार्टी के अध्यक्ष एन. चंद्रबाबू नायडू ने हैदराबाद में कहा कि देश के लिए बेहतरीन राजनीतिक गठजोड़ क्या हो सकता है, यह भविष्य तय करेगा। उन्होंने कहा कि वक्त आने पर तीसरा मोर्चा भी उभरेगा।


हालांकि देश में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ एक मोर्चा गठित करने के पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रस्ताव को आज ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बहुत जल्दबाजी में दिया सुझाव बताया है। क्षेत्रीय दलों के मोर्चे के गठन की तृणमूल कांग्रेस प्रमुख की इच्छा के बाबत पूछे जाने पर पटनायक ने कहा कि ममता बनर्जी का प्रस्ताव जल्दबाजी में दिया गया सुझाव है। तीसरे मोर्चे के गठन के लिए कुछ कहना अभी बहुत जल्दी होगी।पटनायक ने हालांकि पहले वैकल्पिक मोर्चे की वकालत की थी और उन्होंने कांग्रेस की अगुवाई वाले संप्रग को 'घोटाले से घिरा' तथा भाजपा की अगुवाई वाले राजग को 'सांप्रदायिकता का दागदार' हुआ बताया था। ममता ने कल कहा था कि अगर राज्यों के मुख्यमंत्री देश के भविष्य के लिए साथ बैठते हैं तो वे बेहद खुश होंगी।




दरअसल इस हकीकत को नहीं समझने वाली राजनेता ममता बनर्जी नहीं हैं। उनका लक्ष्य लोकसभा चुनाव फिलहाल नहीं है। अर्जुन की तीरंदाजी की तरह दीदी की तीक्ष्ण नजर बंगाल में बनते बिगडते समीकरण पर है, जो कुल मिलाकर सबसे ज्यादा निर्भर है अल्पसंख्यक वोट पर। भूमि आंदोलन की वजह से नहीं, बल्कि सच्चर कमिटी की रपट में बंगाल में वामशासन के दौरान अल्पसंख्यकों की फटेहाल हालात का पर्दाफास होने से ही वाममोर्चे का रक्षाकवच बना अल्पसंख्यक वोट बैंक टूट गया।


अपने दो साल के कार्यकाल में दीदी ने अल्पसंख्यकों के बीच अपना जनाधार बनाये रखने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाये। मुसलिम महिलाओं की वेश भूषा अपनाने से लेकर नमाज अदायगी तक। तमाम घोषणाएं की।लेकिन अल्पसंख्यकों की नाराजगी तेजी सेबढ़ती जा रही है। हावड़ा संसदीय उपचुनाव में करीब चालीस हजार वोटों वाली भाजपा का समर्थन न मिला होता तो दीदी की अग्निपरीक्षा का अंजाम क्या होता, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। तृणमूल कांग्रेस सरकार भले ही अपने शासन के तीसरे साल में कदम रख रही है लेकिन करोड़ों रूपए के चिटफंट घोटाले को लेकर वह एक बहुत बड़ी चुनौती से जूझ रही है। इस घोटाले ने राज्य में लाखों लोगों पर बुरा असर डाला है। शारदा समूह और इस तरह की कई छोटी चिटफंड कंपनियों के डूब जाने के बाद कई निवेशकों एवं एजेंटों ने आत्महत्या कर ली है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस समर्थक मीडिया घराने इन चिटफंड कंपनियों द्वारा चलाए जाते हैं तथा सारदा समूह के साथ तृणमूल सांसद कुणाल घोष एवं पार्टी नेतृत्व के एक वर्ग की कथित साठगांठ की वजह से निवेशक इस धोखाधड़ी के शिकार हुए।इस घोटाले की गंभीरता इस बात से आंकी जा सकती है कि इसकी जांच के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने जो श्यामल सेन आयोग बनाया है उसे शारदा समूह के एजेंटों एवं निवेशकों से चार लाख से अधिक आवेदन मिले हैं।


हावड़ा में विधानसभा चुनावों की  एक लाख चौरासी हजार वोटों की लीड संसदीय उपचुनाव में भाजपायी समर्थन के बावजूद जो सत्ताइस हजार में सिमट गयी, उसकी वजह शारदा फर्जीवाड़े का पर्दाफाश कम से कम नहीं है। दीदी का अल्पसंख्यक वोट बैंक तेजी से टूटने लगा है।भाजपा से दीदी मधुर संबंध को कांग्रेस और भाजपा ने मुद्दा बनाया है तो दीदी का बिना शर्त समर्थन जारी रखकर भाजपा ने अल्पसंख्यक वोट बैंक में मोहभंग की स्थिति पैदा कर दी है ।


अब भले ही करीब 3 हजार सीटों पर तृणमूल प्रत्याशी निर्विरोध जीत गये हों और राज्यभर में विपक्षी दल नामांकन दाखिल करने में हिंसा के शिकार हो रहे हों, लेकिन जहां चुनाव होंगे, वहां इस बदलते समीकरण का असर जरूर होना है।


नरेंद्र मोदी हिंदुत्ववादियों के नेता जरुर हैं और उनके नाम पर देश बर में हिंदू वोटों का ध्रूवीकरण संभव है, लेकिन बंगाल में अल्पसंख्यक बहुल चुनाव क्षेत्रों में उनके प्रधानमंत्रित्व की संभावना से यूपी बिहार की तरह अल्पसंख्यक वोच बैंक के ध्रूवीकरण की पूरी संभावना है। तुरंत भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले बिना दीदी को इस समीकरण से नुकसान ही नुकसान है और कांग्रेस और वाममोर्चा को फायदा ही फायदा है। इसीलिए केंद्र में भाजपा के घमासान का बंगाल में कोई असर न होने  के बावजूद देशबर में सबसे पहले



तीसरे मोर्चे का गठन वामदलों के बिना असंभव है लेकिन उन्होंने वाममोर्चे को किनारे रखकर क्षेत्रीय दलों के तीसरे मोर्चे का गुब्बारा हवा में उड़ा दिया।कभी चुनाव के पहले तो कभी चुनाव के बाद तीसरे मोर्चा की बात हमेशा हमारे सामने आती रहती है। इस तरह का एक मोर्चा वामपंथियों की सहायता से केन्द्र में सरकार भी चला चुका है।  इससे बंगाल में पंचायत चुनाव के ऐन पहले मतदाताओं को संदेश जायेगा कि दीदी जितना विरोध कांग्रेस का करती हैं, ठीक उतना ही विरोध भाजपा का भी कर रही हैं और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के खिलाफ हैं वे। जबकि नरेंद्र मोदी को दीदी रोकने की हालत में कतई नहीं हैं।


नरेंद्र मोदी को रोकना है तो कांग्रेस को रोकना होगा, जिसको केंद्र से बेदखल करने की कसम खायी है दीदी ने। अपनी हर सभा में दीदी खुला ऐलान कर रही हैं कि अब तीसरी यूपीए सरकार नहीं। इससे अल्पसंख्यकों में भ्रम पैदा हो रहा है कि क्या दीदी लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को रोकने के लिए राजग में शामिल होने जा रही है?


अल्पसंख्यकं की यह दुविधा तेजी से बंगाल में कांग्रेस को मजबूत कर सकती है और वाम मोर्चे की वापसी का रास्ता आसान कर सकती है। इसीलिए दीदी ने दरअसल अल्पसंख्यकों को आश्वस्त करने के लिए ही यह बयान जारी कर दिया। जबकि इस सिलसिले में क्षेत्रीय दलों से उनका कोई संवाद भी नहीं हुआ है और न बयान जारी करने के अलावा उन्होंने कोई सकारात्मक ऐसी पहल की है, जिससे तीसरे मोर्चे की संभावन उज्ज्वल होती हो।


तीसरे मोर्चे की अपील कर दी दीदी ने।


खास बात तो यह है कि दिल्‍ली में फिक्‍की में हुए कार्यक्रम में महिलाओं का दिल जीतने के बाद गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी कोलकाता में भी छा गए!दीदी तब दिल्ली चली गयी थी। लेकिन मोदी ने दीदी की भाषा और दीदी के लहजे में ही वाम मोर्चा और केंद्र की जमकर धुलाई करते हुए दीदी की खूब तारीफ की और तबसे बंगाल भाजपा दीदी की बी टीम बन गयी है। शहर के तीन चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा यहां संयुक्त रूप से आयोजित एक कार्यक्रम में मोदी ने कहा, 'केंद्र की संप्रग सरकार कैलेंडर नहीं बल्कि घड़ी देख रही है। यह आखिरी घड़ियां गिन रही है।'


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के केंद्र के गैर कांग्रेसी राज्यों के साथ पक्षपात करने के आरोपों में सुर मिलाते हुए मोदी ने कहा कि संप्रग सरकार का रवैया देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने वाला है। केन्द्र की कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि केन्द्र राज्यों के साथ भेदभाव करता है। यूपीए शासित राज्यों को फायदा पहुंचाया जाता है जबकि गैर यूपीए शासित राज्यों को नुकसान पहुंचाया जाता है।


उन्होंने कहा कि राज्यों के साथ भेदभाव तुरंत रोका जाना चाहिए क्योंकि इससे संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचता है। केन्द्र सरकार को देश को एक साथ लेकर चलना चाहिए। मोदी ने कहा कि केन्द्र में कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती और फैसले सिर्फ सियासी नफा-नुकसान देखकर लिए जाते हैं। मोदी ने कहा कि जब अटल बिहारी वाजपेयी राजग सरकार की अगुवाई कर रहे थे तब बंगाल से किसी ने नहीं कहा था कि उनके खिलाफ भेदभाव हो रहा है लेकिन अब यह हो रहा है। उन्होंने कहा, 'संप्रग सरकार के पास किसी भी सरकार के साथ भेदभाव करने का हक नहीं है।'


मोदी की राज्यों से भेदभाव वाली यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आरोपों की पृष्ठभूमि में आयी, जिसमें उन्होंने केंद्र पर राज्य की 'आर्थिक नाकेबंदी' करने का आरोप लगाया था। गुजरात के मुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल में पूर्व की वाम मोर्चा सरकार की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि 32 वर्ष के शासनकाल में उसने ढेरों गड्ढे खोद डाले। ममता सरकार इन गड्ढों की भरने में लगी हैं। मोदी ने दावा किया, 'कांग्रेस ने गुजरात में जो हालात पैदा किए तो मुझे सही करने में और गड्ढों को भरने में 10 साल लगे।'


मोदी ने कहा कि मैं यहां कोई विवाद पैदा करने नहीं आया हूं और न ही पश्चिम बंगाल से गुजरात की तुलना करने आया हूं। मैं यहां कुछ सीखने आया हूं और कोलकाता से बहुत कुछ सीख कर जाऊंगा। मोदी ने कहा कि बंगाल में गुलामी के जमाने में भी ज्ञान की गंगा बहती थी। बंगाल की भूमि असाधारण है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर की तरक्की बंगाल से शुरू होनी चाहिए और अब बंगाल सही रास्ते पर है।


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