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Wednesday, July 31, 2013

कल की कैबिनेट बैठक में तेलंगाना पर चर्चा की उम्मीद नहीं


कल की कैबिनेट बैठक में तेलंगाना पर चर्चा की उम्मीद नहीं

Wednesday, 31 July 2013 18:00

नयी दिल्ली। तेलंगाना मुद्दे पर कल केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा होने की संभावना नहीं है। 
गृह मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कल होने वाली कैबिनेट बैठक के लिए अभी :तेलंगाना पर: कोई नोट नहीं तैयार किया गया है ।
कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा तेलंगाना के रूप में 29वें राज्य के गठन की सिफारिश केन््रद सरकार से करने के कल :मंगलवार: के फैसले के बाद अटकलों का बाजार गर्म था कि कैबिनेट की आगामी बैठक में इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा ।
कहा जाता है कि कैबिनेट को पहले मंत्रीसमूह के गठन के जरिए तेलंगाना के गठन की प्रक्रिया की शुरूआत करनी है । मंत्रीसमूह नये राज्य के गठन से जुडे आर्थिक मुद्दों को देखेगा ।
अधिकारी ने कहा कि इतने दूरगामी परिणाम वाले मुद्दे पर कैबिनेट नोट तैयार करने की प्रक्रिया में समय लगता है और इसके लिए व्यापक सलाह मशविरे की आवश्यकता है । इसे जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता ।
अधिकारी ने बताया कि सरकार के शीर्ष पदाधिकारियों की ओर से संकेत हैं कि केन््रद इस मुद्दे पर कैबिनेट में विचार से पहले आंध्र प्रदेश विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने का इंतजार कर सकता है ।
नये तेलंगाना राज्य के गठन में वैसे छह महीने का समय लगेगा क्योंकि संसद द्वारा साधारण बहुमत से राज्य पुनर्गठन विधेयक को पारित करने सहित विभिन्न कदम उठाने की आवश्यकता होगी ।
केन््रदीय मंत्रिमंडल की बैठक में मंत्रीसमूह के गठन के प्रस्ताव को सिद्धांतत: मंजूरी दी जाएगी । मंत्रीसमूह में गृह, वित्त, मानव संसाधन विकास, स्वास्थ्य, सिंचाई, बिजली, पर्यावरण एवं वन, रेलवे मंत्री तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष शामिल होंगे । यह मंत्रीसमूह नये राज्य का गठन होने पर उत्पन्न विभिन्न आर्थिक मुद्दों पर विचार करेगा ।
गृह मंत्रालय राज्य सरकार से मिले प्रस्ताव के आधार पर तेलंगाना के गठन के लिए केन््रदीय मंत्रिमंडल को एक नोट सौंपेगा । इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 40 दिन का समय लगेगा ।

वित्त मंत्रालय भी एक विशेषज्ञ समिति का गठन करेगा, जो पुनर्गठित राज्य के लिए वित्तीय प्रबंधन एवं व्यवहारिकता को लेकर सुचारू प्रक्रिया एवं उपाय सुझाएगा ।
नये तेलंगाना राज्य का गठन होने के बाद आंध्र प्रदेश में नियामक आर्थिक पहलुओं के मद्देनजर योजना आयोग में एक समर्पित इकाई का गठन किया जाएगा जो विशेष तौर पर पुनर्गठित राज्य के मसले देखेगी और इसकी कमान सीधे योजना आयोग के उपाध्यक्ष के पास होगी ।
यह इकाई सुनिश्चित करेगी कि बेहतर वित्तीय प्रबंधन और केन््रद से पर्याप्त धन हस्तांतरण की मदद से क्षेत्र का बहुआयामी विकास हो, विशेष तौर पर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्र में विकास सुनिश्चित हो ।
केन््रदीय गृह मंत्रालय मंत्रीसमूह की सिफारिश और सुझावों के आधार पर कैबिनेट के लिए एक अन्य नोट तैयार करेगा, जिसमें आग्रह किया जाएगा कि कैबिनेट राज्य पुनर्गठन विधेयक मंजूर करे और राष्ट्रपति से सिफारिश करे कि विधेयक को राज्य विधायिका के विचारार्थ भेजा जाए ।
दूसरी कैबिनेट बैठक के बाद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से सिफारिश करेंगे कि संविधान के अनुच्छेद-3 के तहत मसौदा विधेयक पर राज्य विधायिका का नजरिया 30 दिन के भीतर हासिल करने के लिए उसे राज्य विधायिका को भेजा जाए ।
राज्य विधायिका की सिफारिशों को मसौदा विधेयक में शामिल किया जाएगा और इसकी समीक्षा कानून मंत्रालय करेगा । फिर राज्य पुनर्गठन विधेयक के मसौदे को लेकर तीसरा नोट तैयार किया जाएगा और इसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा ताकि विधेयक को संसद में पेश किया जा सके ।
संसद के दोनों सदनों में पेश होने के बाद विधेयक को साधारण बहुमत से पारित कराना होगा । इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और नया तेलंगाना राज्य अस्तित्व में आ जाएगा ।

तेलंगाना आंदोलन का इतिहास

तेलंगाना आंदोलन का इतिहास

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अलग तेलंगाना राज्य कांग्रेस के गले की फांस बन गया है। लंबे समय तक चला तेलंगाना आंदोलन आज भी ठंडा नहीं पड़ा है और जब तब उबाल मार देता है। इस बार जैसे जैसे आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तेलंगाना राज्य के गठन की कोशिश और विरोध दोनों तेज होते जा रहे हैं। एक बार फिर केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने अलग तेलंगाना राज्य के गठन की पहल की है। आइये देखते हैं तेलंगाना राज्य के आंदोलन का इतिहास क्या है?

आज जिस तेलंगाना राज्य को लेकर राजनीतिक गथिविधियां चरम हैं उसके लिए आंदोलन की शुरूआत 1969 में हुई. 1969 में हुए साल हुए आंदोलन में उस्मानिया विश्वविद्यालय के 350 से अधिक छात्र शहीद हो गये. इस आंदोलन का नेतृत्व एक कांग्रेसी नेता मरिचन्ना रेड्डी ने किया. उन्होंने अलग तेलंगाना राज्य के लिए जय तेलंगाना का नारा दिया और अलग से तेलंगाना प्रजा समिति की स्थापना की. लेकिन इंदिरा गांधी ने उन्हें दोबारा कांग्रेस में शामिल कर लिया और उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया.

असल में इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर आंदोलन को खत्म कर दिया था. इसके बाद 1971 में पीवी नरसिंहराव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया क्योंकि वे तेलंगाना रीजन से ही आते थे. इसके कारण आजादी के बाद मुखर हुई अलग तेलंगाना राज्य की मांग एक तरह से दब गयी. लेकिन अलग तेलंगाना की मांग को एक बार फिर हवा दी के चंद्रशेखर राव ने जिन्होंने 2001 में टीडीपी से अलग होकर अलग तेलंगाना राज्य के लिए तेलंगाना राष्ट्र समिति की स्थापना की. 2004 के चुनाव में वाई एस राजशेखर रेड्डी ने टीआरएस का समर्थन करते हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि वे अलग तेलंगाना राज्य की स्थापना में उनकी मदद करेंगे. इसका सीधा फायदा कांग्रेस को हुआ लेकिन अलग तेलंगाना की मांग ठंडे बस्ते में चली गयी और आखिरकार के चंद्रशेखर राव ने केन्द्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

तेलंगाना की मांग को समझने के लिए आंध्र प्रदेश के गठन का इतिहास समझना होगा. 1948 में निजामशाही का खात्मा हुआ और हैदराबाद राज्य की स्थापना हुई. 19 अक्टूबर 1952 को मद्रास स्थित महर्षि बुलुसु सांबामूर्ति के घर पर अलग आंध्र की मांग को लेकर महान गांधीवादी श्री अमरजीवी पोट्टीरामालु ने आमरण अनशन शुरू किया था, लेकिन तत्कालीन सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली और 58 दिनों के बाद आखिरकार उनकी मौत हो गई। उनके इस त्याग के बाद जो बखेड़ा खड़ा हुआ वह किसी से छुपा नहीं है। तीन चार दिन के भीषण आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू को अलग आंध्र प्रदेश बनाने की घोषणा करनी पड़ी। 1 अक्टूबर 1953 को अलग आंध्र प्रदेश का गठन हुआ और कुर्नूल को राजधानी बनाया गया। तब तक तेलंगाना एक अलग राज्य के रूप में विद्यमान था। 1 नवम्बर 1956 को स्टेट रिआर्गेनाइजेशन कमीशन की रिपोर्ट को दरकिनार कर तेलंगाना को आंध्र में मिला दिया गया। हैदराबाद अब इस नए आंध्र की राजधानी बन गया।

तेलंगाना के प्राचीन स्वरूप पर एक नजर डालें तो तेलंगाना से तात्पर्य है - 'तेलुगु की भूमि।' महाभारत में तेलंगाना के लिए तेलिंगा राज्य का जिक्र किया गया है एवं यहां के निवासियों को तेलावाना संबोधित किया गया है। इन्होंने पांडवों के पक्ष में महाभारत की लडाई में भी भाग लिया था। तेलंगाना के वारंगल जिले में स्थित पांडाचुलू गुहालू में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य भी मिले हैं कि लाक्षागृह की घटना के बाद पांडवों ने अपनी माता कुंती के साथ काफी समय यहां गुजारा था। कथाओं के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्री राम ने अपने वनवास के दौरान अपनी पत्नी सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ खम्मम जिला स्थित भद्राचलम से 25 किलोमीटर दूर गोदावरी नदी के किनारे पर्णशाला में समय व्यतीत किया था।

सन 1947 में आजादी मिलने के उपरांत जब हैदराबाद का निजाम स्वायत्ता चाहता था, तब भारत सरकार ने सेना के आपरेशन पोलो के तहत 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद को भारत के साथ मिला लिया। उस समय समूचे प्रांत को 22 जिलों में बांट दिया। इनमें से तेलंगाना के 9 जिले हैदराबाद राज्य में, 12 मद्रास में और एक अलग फ्रांस के नियंत्रण में यमन बनाया गया। तब भी तटीय आंध्र और रायलसीमा राज्य ब्रिटिश सत्ता के अधीन स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए थे। उस समय यहां विकास की गति अति तीव्र थी। शिक्षा, चिकित्सा, कॉलेज, विश्वविद्यालय, सडक, उद्योग धंधे तेजी से फल फूल रहे थे। तेलंगाना आर्थिक रूप से बहुत कमजोर अपने राजनीतिक, भाषा और संस्कृति के लिए संघर्ष कर रहा था।

सन् 1953 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भाषा के आधार पर स्टेट रिआर्गेनाइजेशन कमीशन आयुक्त जस्टिस फजल अली को राज्यों की रूपरेखा तय करने का कार्य सोंपा। कमीशन ने 1954 में भारतीय राज्यों के पुनर्गठन की अनुशंषा रिपोर्ट तैयार की। फजल अली कमीशन उस समय तेलंगाना व आंध्र प्रदेश के विलय के पक्ष में नहीं था। रिपोर्ट के पैरा 382 में तेलंगाना के लोगों की असहमति का साफ तौर पर उल्लेख है, और इसमें यह भी जिक्र किया गया है कि इनके विलय हो जाने से भविष्य में पुनः समस्या उत्पन्न हो सकती है।  पैरा 386 में आंध्र व तेलंगाना को अलग प्रदेश बनाए जाने की बात कही गई है। इसके बावजूद कांगेस पार्टी जो उस समय आंघ्र में मजबूत स्थिति में थी, ने इस कमीशन को रिपोर्ट को दरकिनार कर इनके विलय को तैयार थी। यद्यपि इसके एवज में तेलंगाना के लोगों के साथ सत्ता और प्रशासन में भागीदारी का एक 'जेन्टलमैन एग्रीमेंट' कर उन्हें खुश कर करने की कोशिश जरूर की गयी। 1956 में तैयार इस जेन्टल मैन मसौदे को आंध्र के निर्माण के पश्चात कोई तवज्जो नहीं दी गई। तेलंगाना निवासियों की शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। हद तो तब हो गई, जब 1969 में इस मसौदे को ही खत्म कर दिया गया जिसके बाद एक बार अलग तेलंगाना राज्य की मांग ने जोर पकड़ लिया.

इसकी परिणिति हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी के छात्र आंदोलन के रूप में हुई। सरकारी कर्मचारी और विधानसभा में विपक्ष ने इन छात्रों का समर्थन किया। यह अभियान 'जय तेलंगाना'  के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें 360 छात्रों और सैंकडों अन्य निवासियों की जाने गई। लेकिन कांगेस के लोगों पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। उन्होंने इसे राष्ट्रविरोधी गतिविधि की संज्ञा दे डाली। इस स्थिति में कांग्रेस के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर एम. चेन्ना रेड्डी ने तेलंगाना पीपुल्स एसोसिएशन (तेलंगाना प्रजा समिति) की स्थापना की। तब से लेकर आज तक यह आंदोलन समय के साथ नए लोगों, नए विचारों के साथ चलता आ रहा है। इस बीच तेलंगाना की मुक्ति के लिए नई पार्टियां भी गठित हुई हैं।

वर्तमान में जिस तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है उसकी भौगोलिक सीमा में वर्तमान आंध्र प्रदेश के 23 में से 10 जिले आते हैं जिसमें महबूब नगर, नलगोंडा, खम्मम, रंगारेड्डी, वारंगल, मेडक, निजामाबाद, अदिलाबाद, करीमनगर और हैदराबाद शामिल हैं. पूर्व में निजामशाही का प्रमुख हिस्सा रहे तेलंगाना के हिस्से में विधानसभा की 294 सीटों में से 119 सीटे आती हैं. जाहिर है राजनीतिक रूप से कांग्रेस या फिर किसी भी राजनीतिक दल के लिए आंध्र से अलग तेलंगाना के अस्तित्व को मान्यता देना बहुत मुश्किल फैसला होगा लेकिन स्थानीय संस्कृति और शेष आंध्र प्रदेश से अलग सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों के कारण अलग तेलंगाना राज्य की मांग नाजायाज भी नहीं है. आखिरकार, पूर्व में भी उसका अपना अलग अस्तित्व तो रहा ही है.

चलो भाग चलें अमेरिका की ओर

चलो भाग चलें अमेरिका की ओर

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पूरी दुनिया दो बातों की दीवानी हो चली है। एक अमेरिका का पिज्जा और दूसरा अमेरिका का वीजा। जिसे देखो वह अमेरिकन पिज्जा खाना चाहता है और मौका मिलते ही अमेरिकी वीजा हथियाकर अमेरिका भाग जाना चाहता है। वैसे आज के अमेरिका के लिए यह कोई नया काम नहीं है। यह देश ही भगोड़े, नालायकों और अपराधियों का बसाया हुआ देश है। यूरोप के नालायकों ने जब अमेरिका में कदम रखा तो सबसे पहले वहाँ के मूल निवासियों को अपना गुलाम बनाया और फिर पैसा बनाने के धंधे में लग गए।

चूँकि सबका अमेरिका जाने का मकसद अधिक से अधिक धन एकत्र करना था इसलिए जितनी भी चीजें इस काम में सहायक थीं सब विकसित की गयीं। लुटेरों की कोई सामाजिक संस्कृति नहीं होती है इसलिए उन्होंने अपने मनमाने कायदे -कानून तय किये। कम समय में भोजन करने और थके दिमाग और शरीर को रिलैक्स करने के उपाय ढूंढ़े जिसको अमरीकन कल्चर कहा जाता है। पूरी दुनिया इस अमरीकन कल्चर को गाली देती है लेकिन इसके चंगुल में बुरी तरह फँस चुकी है, दुनिया के लगभग सभी देश अमरीका से घृणा करते हैं। चूँकि लुटेरों की खास प्रवृत्ति होती है कि वो हर किसी को अपने जूते की नोक पर रखना पसंद करते हैं इसलिए अमेरिका भी इसी का पोषक है।

माल कमाने की होड़ में बौद्धिक विकास को बहुत तरजीह नहीं दी जाती है क्योंकि इस प्रक्रिया में बुद्धिमान लोगों को खरीद कर अपनी खराद पर चढ़ा दिया जाता है। अमेरिका ने भी तमाम दिमागदारों को खरीद कर अपने धंधे में शामिल कर लिया है, दुनिया भर के लोग उसकी प्रयोगशालाओं में खट रहे हैं। अमेरिकन्स की अपनी बुद्धि का आलम ये है कि जब अफगानिस्तान पर हमला करने की बात आई तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सलाहकार से पूछा ये देश है किधर जब उनको समझाया गया कि चाहे जहाँ हो पर बिन लादेन ग्रुप और उसकी सहयोगी अमेरिकी कंपनियों के आर्म्स एंड कंस्ट्रक्सन बिजनेस के लिए हमला जरुरी है तो मिस्टर प्रेसीडेंट ने हमले का आदेश दिया। कहा गया कि हफ्ते भर का मामला है लेकिन बाद में पता चला की आर्थिक मंदी से उबरने के लिए हथियार कम्पनियाँ चाहती हैं कि युद्ध चलता रहे तो तब से कई प्रेसीडेंट चले गए लेकिन युद्ध जारी है। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी ने ये हिम्मत दिखाई थी कि संयुक्त राष्ट्र संघ में खुले आम कहा था कि ये संस्था दुनिया का नहीं अमेरिकी हितों का प्रतिनिधित्व करती है और यहाँ बैठने वाले अमेरिकी टट्टू हैं फिर उनका क्या हाल हुआ दुनिया जानती है। गली -मोहल्ले के दादा के खिलाफ बोलने वाला एक्सीडेंट में मारा जाता है तो दुनिया के दादा के खिलाफ बोल कर कोई कैसे बच सकता है। ईराक पर रिपोर्ट तैयार करवाई गयी कि उसके पास खतरनाक रासायनिक हथियार हैं जो मानवता के लिए खतरा हैं, हमला हुआ, ईराक आज तक कराह रहा है। जिन नदियों के किनारे मानव सभ्यता का एक अंग विकसित हुआ था आज वहाँ मातम है, ये अलग बात है कि रिपोर्ट तैयार करनेवाली टीम के मुखिया ने बाद में आत्महत्या करली थी क्योंकि वो झूठी रिपोर्ट दबाव में लिखवाई गयी थी।

सबसे बड़ी बात, जिनके वीसा पर वाद विवाद हो रहा है, उन्हें भले शांति का नोबल पुरस्कार न मिले लेकिन बता दीजिये कि उनकी कौन सी पॉलिसी अमेरिका के विरोध की है? सारे तौर तरीके अमेरिकी, वही विकास और उसी तरह नफासत से अपने रास्ते में आने वाले को किनारे लगाना, वही टेक्नोलोजी और वैसे ही बिग ओ की तरह हवाई समां बांधना क्योंकि बाज़ार को अभी जरुरत है कि माल बिकता रहे, ब्राण्ड टिका रहे। कहीं ये अमेरिकन प्रोडक्ट ही तो नहीं है?अमेरिका को बेसिकली बैंकर्स और मल्टी नेशनल कम्पनियाँ चलाती हैं यानी जिस आधार पर लुटेरों ने नया अमेरिका बनाया था वो अभी कायम है साथ ही अधिक मजबूती से पूरी दुनिया को लीलने की कोशिश में सफलता से बढ़ रहा है। अभी आर्थिक मंदी का दौर था और जेलों में अस्सी प्रतिशत ब्लैक अपराधी ही थे तो कुछ तूफानी करने के नाम पर एक ब्लैक प्रेसीडेंट बना दिया गया, जिसकी नस्ल और धर्म को लेकर भी बहस चली, कभी मिडिल नेम हुसैन तो कभी अफ्रीका, इंडोनेशिया और हवाई में अपनी जड़ तलाशने वाले प्रेसीडेंट। इनके पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन में हफ्ते भर बचे थे, नामांकन हुआ और पुरस्कार भी मिस्टर बिग ओ को मिल गया, बोलते तो इतना बढ़िया हैं कि उनका भाषण लिखने वाले को हायर करने के लिए लोगों की लाईन लगी है। मिस्टर प्रेसीडेंट 'नोबल फॉर पीस विनर' सिविल लिबर्टी को लेकर भी बहुत चिंतित हैं, सीरिया में मानव सभ्यता का भीषणतम संघर्ष चल रहा है पर हथियार कम्पनियाँ अभी चलाये रखना चाहती हैं इसलिए बिग ओ शांत हैं। देश में गन कल्चर को रोकने के लिए तमाम लोग सड़क पर हैं पर नए नियम आगये कि हर स्कूल के बाहर कम से कम दो गनमैन रहेंगे, बच्चे जिन बंदूकों को फिल्म में देखते थे, अब स्कूल में ही देखा करेंगे।

ईराक में अमेरिकन सैनिकों द्वारा मासूम बच्चों और सामान्य खरीदारों के ऊपर हेलिकॉप्टर से गोलियाँ बरसाने की असामान्य तस्वीर को दुनिया के सामने रख देने वाला अमेरिकन सिपाही ब्रैडली मैन्निंग लगभग डेढ़ सौ साल की सजा के लिए जेल में है, इसके विरोध में हजारों लोगों के साथ मिस्टर ओ को लॉ पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर भी सड़क पर उतर चुके हैं लेकिन लिबर्टी को स्टेच्यू बना कर रख देने वाला प्रेसीडेंट मुस्कुरा रहा है। उसे मोंसेतो और मैक डोनाल्ड के सपनों को पूरा करना है। अभी एक अमेरिकन ख़ुफ़िया अधिकारी ने खुलासा किया है कि कैसे चंद डालर के लिए किसी शिया से सुन्नी मस्जिद में बम ब्लास्ट करवाया जाता है और कैसे किसी सुन्नी को फाँस कर शियाओं के कब्रिस्तान में मिटटी देने आये लोगों पर गोलियाँ चलवाई जाती हैं, फिर तो ख़ुदा के बन्दे आगे का काम खुद ही आसान कर देते हैं।

लुटेरों, माफियाओं की हवेली में जाने से पहले बहुत कड़ी जामा तलाशी होती है, अपनी करतूतों से वो ढेर सारे दुश्मन पाले रहते हैं और साथ ही गैंग के भी कुछ खास लोगों को पास फटकने की अनुमति नहीं होती। ये ख़ास लोग अंडर कवर एजेंट के रूप में काम करते हैं और अपनी दुनिया में बादशाह होते हैं, जिनका विरोध नहीं किया जा सकता क्योंकि वो बाज़ार के लिए भी मुफीद होते हैं,उनके सहारे बाज़ार विस्तार पाता है। अमेरिका में भी हर कोई घुस नहीं सकता, गेट पर नंगा कराकर तलाशी होती है और कुछ लोगों को तो बाहर ही रखा जाता है जो अमेरिकी एजेंडे पर अपनी दुनिया चलाते हैं।

सुना है एक संस्कारी पार्टी के मुखिया भी वीसा एजेंट की तरह अमेरिका में किसी का वीसा दिलवाने की बात करने गए थे, उनके साथ नीरा राडिया को भारत में स्थापित करवाने वाले अनंत प्रतिभा के धनी सज्जन भी थे लेकिन लॉबीइंग काम नहीं आई। उस पर से कोढ़ पर खाज की बात ये हुई की देश के कुछ सांसदों ने अपने मामा को ख़त भेज दिया की वीसा मत देना, अजीब हाल है अपने अंदरूनी मामलों में मामा को क्यों बुला रहे हो भाई? वो भी उसको जिसे हमेशा गाली देते हो, साथ ही जो वीसा माँगने गए थे वो खुद किसको भरम में डाल रहे हैं ? पोस्टर लग चुके हैं कि अगला प्रधानमंत्री बनने वाला है, बन जाने दो तब खुद ही स्टेट गेस्ट बन कर अमेरिका जाने का मौका मिल जाएगा या माँगने गए लोगों को खुद ही भरोसा नहीं है कि ऐसा भी कभी होगा ?

बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों और घरों पर टूटा जमात का कहर

बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों और घरों पर टूटा जमात का कहर

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बांग्लादेश में पिछले माह जब से कट्टरपंथी मुस्लिम नेता सईदी को युद्ध अपराध के लिए मौत की सजा सुनाई गई तब से मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पूरे बांग्लादेश में दर्जनों हिंदू मंदिरों और सैकड़ों घरों पर हमला कर उन्हें जला दिया है। हिंदू मंदिरों की देखरेख करने वाली बांग्लादेश पूजा उद्जापन परिषद नामक हिंदुओं के एक संगठन ने बुधवार को कहा कि जब से दिलवर हुसैन सईदी के खिलाफ फैसला आया है तब से 47 मंदिर और कम से कम 700 हिंदू घर या तो जला दिए गए या उन्हें तहस-नहस कर डाला गया है।

सईदी बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी की उपाध्यक्ष है। उन्हें वर्ष 1971 के बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए हत्या और दुष्कर्म के अपराधों के लिए गत 28 फरवरी को फांसी की सजा सुनाई गई थी। सजा सुनाए जाते ही मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में हिंसा फैल गई। देशभर में फैली हिंसा में अब तक 85 लोगों की मौत हो चुकी है।

परिषद के उपाध्यक्ष काजल देबनाथ ने मंदिरों और हिंदुओं के घरों पर हमले के लिए जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर को जिम्मेदार ठहराया है। वह कहते हैं कि यह जमात और शिबिर का काम है, लेकिन हम मंदिरों व हिंदू समुदाय की रक्षा करने में नाकाम रहने के लिए सरकार, पुलिस और सरकार के स्थानीय प्रतिनिधियों को भी दोषी मानते हैं जिसमें हमारे सांसद भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हमलावरों को हमारे मंदिरों को जलाने और तहस-नहस कर देने के लिए खुला छोड़ दिया गया। जमात ने इन हमलों में अपनी किसी भूमिका से इन्कार किया है और हिंसा के लिए सत्तारूढ़ अवामी लीग के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराया है। इससे उलट विदेश मंत्री दीपू मोनी ने पिछले हफ्ते कहा था कि जमात और शिबिर ने हिंदू मंदिरों और घरों पर पूर्व नियोजित योजनाबद्ध ढंग से हमला किया।

15 करोड़ 30 लाख की जनसंख्या वाले बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी करीब दस फीसद है। परंपरागत रूप से इन्हें अवामी लीग के समर्थक के रूप में देखा जाता है। लीग ने अपनी छवि धर्म निरपेक्ष दल की बना ली है। हिंदू समुदाय के लोग 1971 के पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश की स्वाधीनता की लड़ाई में भी मुख्य निशाने पर थे। जमात-ए-इस्लामी के नेताओं के खिलाफ बांग्लादेश के ही अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण में पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर साजिश रचने का मुकदमा चल रहा है।

परमाणु उर्जा का कोई भविष्य नहीं

परमाणु उर्जा का कोई भविष्य नहीं

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कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के मामले पर उच्चतम न्यायालय के हालिया फ़ैसले के बाद इस संयंत्र से बेशक बिजली उत्पादन करने का रास्ता साफ़ हो गया है, लेकिन कुडनकुलम न्यक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हज़ारों लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान कर दिया है। अदालत के इस फ़ैसले के बाद आगे का रास्ता क्या होगा, इसी मसले पर पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी ( पीएमएएनई) के संयोजक डॉ. एस.पी उदयकुमार से कुडनुकुलम पहुंचकर अभिषेक रंजन सिंह बात की-

प्रश्न- सुप्रीम कोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र में बिजली उत्पादन को मंजूरी दे दी है साथ ही अदालत ने यह भी टिप्पणी की है कि देश में ऊर्जा की काफ़ी आवश्यकता है, इसलिए यह पॉवर प्लांट देशहित में है। इस फ़ैसले के बारे में क्या कहेंगे आप ?
उत्तर- निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय का यह फ़ैसला निराशाजनक है। अदालत में दो जजों की बेंच ने लाखों लोगों के भविष्य की अनदेखी की है। देश की न्यायपालिका हम सम्मान करते हैं, लेकिन अगर अदालत ही इस तरह से एकपक्षीय फ़ैसला सुनाने लगे, तो वाकई यह चिंता की बात है। हैरत की बात है कि विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फ़ैसले में परमाणु उर्जा को अन्य ऊर्जा श्रोतों के मुक़ाबले बेहद सस्ती क़रार दिया है। इससे बड़ी हास्यास्पद बात भला और क्या हो सकती है। बहरहाल, कुडनकुलम परमाणु उर्जा संयंत्र के ख़िलाफ़ हमारा आंदोलन जारी रहेगा, क्योंकि हमारा संघर्ष जन अधिकारों के लिए है और इसे छीनने का अधिकार किसी को नहीं है।

प्रश्न- उच्चतम न्यायालय के इस फ़ैसले के बाद आपकी आगे की रणनीति क्या होगी?
उत्तर- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ हमने पुनः उसी ग्राउंड पर अपील दायर की है, क्योंकि हमारी याचिका पर अदालत ने सही सुनवाई नहीं की है। न्यूक्लियर पॉवर प्लांट से होने वाले पर्यावरणीय नुक़सान और इससे प्रभावित होने वाले मछुआरों की अनदेखी भला कोर्ट कैसे कर सकता है। उन्हें इन सभी बिंदुओं पर ग़ौर करना होगा, क्योंकि एक लोकतांत्रिक देश में चंद लोगों की खुशी और उसके फ़ायदे के लिए लाखों लोगों की खुशियां नहीं छीनी जा सकती। कुडनकुलम पॉवर प्लांट का विरोध कर रहे इडिंटकरई समेत कई तटीय गांवों के करीब दस हज़ार लोगों, जिनमें महिलाएं, बूढ़े और नौजवान शामिल हैं, उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह समेत सैकड़ों मुक़दमे दर्ज हैं। बावजूद इसके आंदोलनकारियों ने अपनी हिम्मत नहीं हारी है।

प्रश्न- उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद कुडनकुलम परमाणु संयंत्र से बिजली उत्पादन का काम शुरू हो गया है, ऐसे में आप लोगों के विरोध का क्या औचित्य है?
उत्तर- आप कुडनकुलम न्यक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट से 700-800 की मीटर दूरी पर हैं। आप ख़ुद देखिए प्लांट से किसी तरह का कोई शोर आ रहा है ? क्या प्लांट की चिमनियों से कोई धुंआ निकल रहा है? केंद्र सरकार की ओर से यह झूठ प्रचारित किया जा रहा है कि कुडनकुलम की सभी बाधाएं समाप्त हो चुकी हैं और यहां बिजली का उत्पादन शुरू हो गया है, ताकि इस जनविरोधी परियोजनाओं के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को शांत किया जा सके।

कुडनकुलम न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन पर सीपीआई, सीपीएम, फॉरवर्ड ब्लॉक और सीपीआईएमल खुलकर नहीं, बल्कि दबी जुबान से कह रहे हैं कि इस पॉवर प्लांट से ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी होंगी और इससे लोगों का फायदा होगा, लेकिन यही कम्युनिस्ट पार्टियां महाराष्ट्र के जैतापुर में निर्माणाधीन न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का तीव्र विरोध कर रहे हैं। दो न्यूक्लियर पॉवर प्लांट और दो स्वर की मूल वजह है रूस और फ्रांस। कम्युनिस्ट पार्टियां कुडनकुलम प्लांट का विरोध इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह रूस की सहायता से बन रहा है। जबकि जैतापुर प्लांट का विरोध कम्युनिस्ट पार्टियां इस वजह से कर रहे हैं, क्योंकि यह फ्रांस के सहयोग से बन रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियां का दोगलापन इससे साफ़ ज़ाहिर होता है।

प्रश्न- कुडनकुलम न्यक्लियर पॉवर प्लांट को यूपीए सरकार अपनी एक बड़ी उपलब्धि मान रही है। इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार की क्या भूमिका है?
उत्तर- केंद्र सरकार सिर्फ कुडनकुलम न्यूक्लियर पॉवर प्लांट को लेकर ही खुश नहीं है। सरकार तो 123 अमेरिकी परमाणु समझौते से भी प्रसन्न है। हालांकि कुडनकुलम पॉवर प्लांट से कांग्रेस पार्टी की विशेष भावनाएं जुड़ी हैं, क्योंकि वर्ष 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव के बीच कुडनकुलम न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट को लेकर एक समझौता हुआ था। हालांकि, इस समझौते के दो साल पहले ही चेर्नोविल सोवियत संघ में हादसा हो गया। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि सोवियत संघ के विघटन के लिए गोर्वाचोव ने चेर्नोविल दुर्घटना को ज़िम्मेदार ठहराया था। रूस ने इस हादसे से सबक लेते हुए अपने सभी प्रस्तावित न्यूक्लियर पॉवर प्लांट को बंद कर दिया। इतना ही नहीं, चीन, इटली और जापान जैसे देशों ने भी न्यूक्लियर एनर्जी को एक ख़तरनाक और तबाही का कारण मानते हुए पिछले कुछ वर्षों में एक भी नए रिएक्टर नहीं लगाए हैं।

प्रश्न- परमाणु ऊर्जा ख़तरनाक और अपेक्षाकृत महंगी भी है, बावजूद इसके भारत सरकार नई परियोजनाओं को मंजूरी दे रही है। आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है?
उत्तर- यह सवाल नई दिल्ली में बैठी उस सरकार से कीजए, जो हिरोशिमा, नागाशाकी, चेर्नोविल और फुकुशिमा जैसी त्रासदियों से भी कोई सबक नहीं लेना चाहती है। महाराष्ट्र के जैतापुर, हरियाणा के फतेहाबाद, पश्चिम बंगाल के हरिपुर और मध्य प्रदेश के चुटका में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट बनाने के लिए केंद्र सरकार पूरी ताकत लगा दी है, लेकिन इसके विरोध में उससे दोगुनी ताकत वहां के स्थानीय ग्रामीण और किसानों ने लगा दी है। कहने को यह एक प्रजातांत्रिक देश है, लेकिन यहां सरकारों का रवैया पूरी तरह जनविरोधी है।

प्रश्न- परमाणु ऊर्जा को लेकर सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में एक बहस छिड़ी हुई है, ऐसे में भारत सरकार ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर क्यों नहीं विचार करती?
उत्तर- हमारी सरकार इस पर विचार नहीं करेगी, क्योंकि ऊर्जा के अन्य विकल्प जो न केवल सस्ता है, बल्कि पर्यावरण हितैषी भी है, उसमें कमीशन की गुंजाइश काफ़ी कम है, इसलिए सरकार वह काम करेगी, जिसमें उसे मोटा कमीशन मिले। चीन, जापान समेत कई यूरोपीय देश पवन ऊर्जा और सोलर एनर्जी पर काफी अच्छा काम कर रहे हैं। भारत में पवन उर्जा की भरपूर संभावनाएं है, क्योंकि देश में 7500 किलोमीटर तटीय इलाका है, लेकिन इस विशेष की अनदेखी कर केंद्र सरकार न्यूक्लियर एनर्जी में भारत का भविष्य देख रही है।

प्रश्न- कुडनकुलम समेत अन्य प्रस्तावित न्यूक्लियर पॉवर प्लांट पर राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर- न्यूक्लियर पॉवर प्लांट को तथाकथित विकास का हवाला देते हुए सभी राजनीतिक दलों की भूमिका एक जैसी है। सार्वजनिक मंचों पर भले ही वे यूपीए सरकार की नीतियों की आलोचना करें, लेकिन अंदरखाने की बैठकों में उनके सुर एक हो जाते हैं। कुडनकुलम के मसले पर जयललिता सरकार पूरी तरह केंद्र सरकार के साथ खड़ी है, वहीं डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि और उनकी पार्टी में शामिल नेताओं की खामोशी यह बताने के लिए काफी है कि उनकी राह भी वही है, जो मुख्यमंत्री जयललिता और केंद्र सरकार की है। हालांकि कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका हैरान करने वाली है।

रुपये का तो भगवान ही मालिक

रुपये का तो भगवान ही मालिक


जो निवेशक अभी तक भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर हसरत भरी नजरों से देख रहे थे, अब उनकी प्राथमिकता में अमेरिका है. पिछले दिनों अमेरिकी निवेशकों ने कहा भी कि वे भारतीय बाजार में उतरने को सहज महसूस नहीं कर रहे हैं...

अरविंद जयतिलक


http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4209-rupye-ka-to-bhagvan-hi-malik-by-arvind-jaitilak-for-janjwar


देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अरसे से भरोसा दे रहे हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए वह हरसंभव उपाय कर रही है, जो जरुरी है. वित्तमंत्री पी चिदंबरम भी बैंकरों और उद्योगपतियों को आश्वासन दे रहे हैं कि सरकार अटकी पड़ी सैकड़ों परियोजनाओं को चालू कर अर्थव्यवस्था को गति देगी, लेकिन इन दोनों अर्थशास्त्रियों का भरोसा और आश्वासन रसातल में समाती अर्थव्यवस्था को थामने में मददगार साबित नहीं हो रहा है.

rupya-vs-doller

रुपए का दम निकलता जा रहा है और वह एक डॉलर के मुकाबले इकसठ रुपए पर आ गया है. देखा जाए तो उसकी कीमत में सात फीसद की गिरावट आयी है. अब जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक के एलान के बाद विदेशी निवेशकों द्वारा कर्ज बाजार से निवेश निकालने की होड़ मची है, ऐसे में रुपया किस घाट लगेगा भगवान ही मालिक है.

वित्तमंत्री उम्मीद जता रहे हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक राहत पैकेज वापस लेने में देरी से वैश्विक बाजार में डॉलर की आवक बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा, लेकिन यह दूर की कौड़ी है. सच्चाई यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधार पर है और उसमें निवेशकों की रुचि बढ़ती जा रही है.

उनकी प्राथमिकता अब अधिकाधिक निवेश कर सुरक्षित रिटर्न हासिल करना है. यानी जो निवेशक अभी तक भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर हसरत भरी नजरों से देख रहे थे, अब उनकी प्राथमिकता में अमेरिका है. पिछले दिनों अमेरिकी निवेशकों ने कहा भी कि वे भारतीय बाजार में उतरने को सहज महसूस नहीं कर रहे हैं.

दरअसल उनका इशारा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और सरकार की नीतिगत अक्षमता की ओर था. हालांकि सरकार ने विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए कई तरह की रियायतों की घोषणा की है. जैसे सरकारी श्रेणी की प्रतिभूतियों में निवेश की सीमा 5 अरब डॉलर से बढ़ाकर 25 अरब डॉलर और कॉरपोरेट बांड में निवेश की सीमा 51 अरब डॉलर की है. टेलीकॉम में सौ फीसद निवेश का रास्ता साफ कर दिया है, लेकिन विदेशी निवेशकों में उत्साह न के बराबर है.

निवेश की कमी और डूबते रुपए की चिंता से निढाल पड़ी सरकार के समक्ष चालू खाते का घाटा और अनियंत्रित विदेशी कर्ज खतरनाक स्तर पर जा पहुंचा है. चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 4.8 फीसद के रिकार्ड स्तर पर आ गया है. आशंका बढ़ गयी है कि पूरे वित्त वर्ष में घाटा पांच फीसद से उपर भी जा सकता है. इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल और सोने के आयात में लगातार हो रही वृद्धि है.

रिजर्व बैंक के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष के कुल आयात बिल में कच्चे तेल और सोने चांदी की सबसे ज्यादा 45 फीसद हिस्सेदारी रही. इस दौरान 53.8 अरब डॉलर का सोना-चांदी और 169.4 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया गया. संभवतः इसी के कारण चालू खाते का घाटा 87.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

दूसरी ओर भारत पर विदेशी कर्ज 390 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में तकरीबन 13 फीसद अधिक है. सवाल लाजिमी है कि देश बढ़ते चालू खाते का घाटा और विदेशी कर्ज से कैसे मुक्त होगा? आयात-निर्यात का संतुलन कैसे स्थापित होगा? इसके लिए सरकार के पास निर्यात को बढ़ावा देने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं है, लेकिन यह दोनों सरकार के लिए आसान नहीं है.

सरकार निर्यात को बढ़ावा देने का लक्ष्य निर्धारित करती है, लेकिन उसे हासिल करने का उसके पास कोई रोडमैप नहीं होता है. निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने अपने विदेश व्यापार नीति (2009-14) के वार्षिक अनुपूरक समीक्षा में सात सूत्री रणनीति की घोषणा की. 5 जून, 2012 को वाणिज्य और उद्योगमंत्री आनंद शर्मा ने चालू वित्त वर्ष में भारत के निर्यात को 20 फीसद वृद्धि के साथ 360 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया, लेकिन 2011-12 में कुल 303.7 अरब डॉलर का निर्यात हुआ.

व्यापार नीति के अंतिम वर्ष यानी 2013-14 तक वार्षिक निर्यात का लक्ष्य 500 अरब डॉलर रखा गया है, लेकिन इसे हासिल करना आसान नहीं है. वजह अमेरिका और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था में चौपट होने के कारण देश से होने वाले निर्यात में भारी गिरावट आयी है. पिछले साल निर्यात क्षेत्र नकारात्मक वृद्धि दर के करीब पहुंच गया था. देखा जाए तो अक्टूबर 2008 से ही भारत के निर्यात में संकुचन का दौर जारी है. विनिर्माण क्षेत्र हांफ रहा है. महंगाई की वजह से लोगों के उपभोग में जबर्दस्त कमी आयी है.

इंफ्रास्ट्रक्टर से जुड़े उत्पादों की मांग घटी है. होटल, परिवहन और संचार का धंधा धीमा पड़ा है. दोपहिया और चौपहिया वाहनों की बिक्री कम हुई है. आंकड़े बताते हैं कि देश में कारों की बिक्री में 12.36 फीसद की कमी आयी है. कार बाजार में गिरावट का यह सिलसिला पिछले सात माह से जारी है. आशंका प्रबल है कि विनिर्माता रोजगार में कटौती कर सकते हैं.

निर्यात में कमी की दूसरी प्रमुख वजह पड़ोसी देशों से मिल रही कड़ी चुनौती भी है. उदाहरण के तौर पर आज चीन दुनिया में सालाना विनिर्मित कुल माल का 10 से 12 फीसद अकेले उत्पादन कर रहा है. इससे भारतीय बाजार प्रभावित हो रहा है. निर्यात की जाने वाली वस्तुएं मसलन कॉफी, चाय, चीनी, चावल मांस, अभ्रक, लौह अयस्क, सूती धागे, सिले-सिलाए वस्त्र, रत्न, आभूषण इत्यादि के क्षेत्र में भी भारत को अपने पड़ोसियों से कड़ी चुनौती मिल रही है.

इससे पार पाने के लिए भारत को विनिर्माण क्षेत्र मजबूत करना होगा, किंतु दुर्भाग्य है कि इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाया नहीं जा रहा है. उदाहरण के तौर पर पिछले आधे दशक से दिल्ली-मुंबई और मुंबई-बंगलुरु औद्योगिक गलियारा बनाने का शिगूफा हवा में है. वहीं भूमि अधिग्रहण कानून ठंडे बस्ते में है. पर्यावरण संबंधी मंजूरी को लेकर 10 लाख करोड़ रुपए की परियोजनाएं धूल फांक रही हैं, लेकिन इसे लेकर सरकार तनिक भी चिंतित नहीं है.

पिछले दिनों उसने चालू खाते का घाटा कम करने के लिए छोटे निर्यातकों को रियायतें देने का संकेत दिया, लेकिन इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया. सरकार इससे अच्छी तरह अवगत है कि कच्चे तेल का आयात विदेशी मुद्रा भण्डार को सोख रहा है, लेकिन वह देश को तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोई सकारात्मक पहल नहीं कर रही है. पिछले दिनों पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री वीरप्पा मोइली यह कहते सुने गए कि तेल आयात करने वाली लाॅबी पेट्रोलियम मंत्रियों को धमकी देती है. उन्होंने यह भी कहा कि तेल आयात करने वाली लाॅबी नहीं चाहती है कि भारत में कच्चे तेल और गैस का उत्पादन बढ़े, लेकिन सवाल यह है कि सरकार उनके दबाव में क्यों है?

कहना गलत नहीं होगा कि आज अगर देश को कच्चे तेल के लिए अरबों डॉलर फूंकना पड़ रहा है और जो चालू खाते का घाटा का एक अहम कारण भी है, उसके लिए सरकार की असफल अर्थनीति ही जिम्मेदार है. यह तथ्य है कि भारत जरुरत का लगभग 80 फीसद तेल आयात करता है, लेकिन जब देश में तेल व गैस के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं तो उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि आर्थिक अनिश्चितता के इस माहौल में यूपीए सरकार रुपए की चमक वापस लाने, निवेशकों का विश्वास जीतने और महंगाई कम करने के लिए क्या पहल करती है.

arvind -aiteelakअरविंद जयतिलक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.


http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4209-rupye-ka-to-bhagvan-hi-malik-by-arvind-jaitilak-for-janjwar

एक वर्ष में होते एक करोड़ गिरफ्तार

एक वर्ष में होते एक करोड़ गिरफ्तार


वर्षभर में देश में लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं. देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार भी देश में पिछ्ले तीन वर्षों में कम से कम 3,668 अवैध गिरफ्तारियां हुई हैं...

मनीराम शर्मा

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/4211-ek-varsh-men-hote-ek-karod-girftaar-by-maniram-sharma-for-janjwar


भारतीय गणराज्य में कार्यरत समस्त शासनाध्यक्ष और प्राधिकारियों को इस बात की भली-भांति जानकारी होगी कि अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 256 और भारत में 130 पुलिस बल है. जबकि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुना मामले दर्ज होते हैं. फिर भी भारत में प्रति लाख जनसंख्या 56 केन्द्रीय पुलिस बल इसके अतिरिक्त हैं.

police-lathicharge
फाइल फोटो

अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 5806 मुकदमे दायर होते हैं, जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है. फिर भी भारत में प्रति लाख जनसंख्या मात्र 68  पुलिसबल होना पर्याप्त है. मगर भारत में मात्र 25% पुलिस बल ही थानों में जनता की सेवा के लिए तैनात है और शेष बल लाइन आदि में तैनात है जिसमें से एक बड़ा भाग अंग्रेजी शासनकाल से ही विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, वसूली करने आदि में लग जाता है.

भारत में अंग्रेज जनता पर अत्याचार कर उनका शोषण करने और ब्रिटेन के राजकोष को धन से भरने के लिए आये थे, अत: उनकी सुरक्षा को खतरे का अनुमान तो लगाया जा सकता है. मगर जनतन्त्र में शासन की बागडोर जनप्रिय, सेवाभावी और साफ़ छवि वाले लोगों के हाथों में होती है, अत: अपवादों को छोड़ते हुए उनकी सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं हो सकता. फिर भी इन राजपुरुषों की सुरक्षा को लोकतंत्र में भी कोई ख़तरा होता है, तो उसके लिए उनका आचरण ही अधिक जिम्मेदार है.

पुलिस अपनी बची-खुची ऊर्जा व समय का उपयोग अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है. वर्षभर में देश में लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं व देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार भी देश में पिछ्ले तीन वर्षों में कम से कम 3,668 अवैध गिरफ्तारियां हुई हैं. यह आंकडा तो मात्र रिपोर्ट किये गए मामले ही बताता है, जो वास्तविकता का मात्र 5% ही है. इसमें राज्य आयोगों और बिना रिपोर्ट हुए/दबाये गए आंकड़े जोड़ दिए जाएं तो स्थिति भयावह नजर आती है.

दुखद तथ्य है कि अपनी सुरक्षा के लिए, जिस पुलिस पर देश की जनता पूरा खर्च कर रही है उसका उसे मात्र 25% प्रतिफल ही मिल रहा है और न केवल आम नागरिक की सुरक्षा के साथ समझौता किया जा रहा है, बल्कि अनुसंधान में देरी का लाभ दोषियों को मिल रहा है.

आपराधिक मामलों में 10-15 वर्ष मात्र अनुसंधान में आम तौर पर लगना इस दोषपूर्ण तैनाती नीति की ही परिणति है. अत: अब नीति बनायी जाए की कुल पुलिस बल का कम से कम आधा भाग जनता की सेवा में पुलिस थानों में तैनात किया जाए ताकि जनता कि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके, अपराधियों को शीघ्र दंड मिल सके और उन पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके.

maniram-sharmaमनीराम शर्मा राजस्थान में वकालत करते हैं.

मैं नास्तिक क्यों हूं# Necessity of Atheism#!Genetics Bharat Teertha

হে মোর চিত্ত, Prey for Humanity!

मनुस्मृति नस्ली राजकाज राजनीति में OBC Trump Card और जयभीम कामरेड

Gorkhaland again?আত্মঘাতী বাঙালি আবার বিভাজন বিপর্যয়ের মুখোমুখি!

हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला हिंदुत्व की राजनीति से नहीं किया जा सकता।

In conversation with Palash Biswas

Palash Biswas On Unique Identity No1.mpg

Save the Universities!

RSS might replace Gandhi with Ambedkar on currency notes!

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी,आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

#BEEFGATEঅন্ধকার বৃত্তান্তঃ হত্যার রাজনীতি

अलविदा पत्रकारिता,अब कोई प्रतिक्रिया नहीं! पलाश विश्वास

ভালোবাসার মুখ,প্রতিবাদের মুখ মন্দাক্রান্তার পাশে আছি,যে মেয়েটি আজও লিখতে পারছেঃ আমাক ধর্ষণ করবে?

Palash Biswas on BAMCEF UNIFICATION!

THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS ON NEPALI SENTIMENT, GORKHALAND, KUMAON AND GARHWAL ETC.and BAMCEF UNIFICATION! Published on Mar 19, 2013 The Himalayan Voice Cambridge, Massachusetts United States of America

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Imminent Massive earthquake in the Himalayas

Palash Biswas on Citizenship Amendment Act

Mr. PALASH BISWAS DELIVERING SPEECH AT BAMCEF PROGRAM AT NAGPUR ON 17 & 18 SEPTEMBER 2003 Sub:- CITIZENSHIP AMENDMENT ACT 2003 http://youtu.be/zGDfsLzxTXo

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